भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 581–590
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 581–590
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४५२ नाट्यशास्त्रम् प्राचीन काल में ( भी ) यही परिपाटी प्रचलित थी तथा इसी कारण भास आदि नाव्यकारों की रचना में नान्दी पाठ कहीं नहीं मिलता और ' नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः ' लिखने का भी यही कारण स्पष्ट हो जाता है । दैत्यों पर देवगण की विजय के आख्यान को प्रस्तुत करने का आशय केवल इतना ही है कि डिम, समवकार या ईहामृग प्रकारों वाले रूपकों में से अन्यतम का प्रदर्शन आरम्भ करना । यद्यपि भरतपुत्रों को रूपकों के सभी प्रकारों का शिक्षण दिया गया था एवं अभ्यास भी करवाया गया था किन्तु उन सभी एक का एक साथ प्रदर्शन सम्भव नहीं होने से उनमें से एक का यहाँ प्रथम प्रयोग प्रस्तुत किया गया । इस पर कुछ व्याख्याकार आपत्ति प्रस्तुत कर कहते हैं कि - ' युद्धादि से भयंकर स्वरूप रखने वाले समवकार जैसे रूपक प्रकार में कैशिकी का स्थान नहीं होता अतः कैशिकी वृत्ति के प्रयोगार्थ उचित सामग्री प्राप्त करने का प्रतिपादक पूर्वग्रन्थ असंगत मानना पड़ेगा ' । यह उचित नहीं । क्योंकि समवकार में भी जो सौन्दर्यात्मक वैचित्र्य होता है वह भी कैशिकी के कारण है अतः बिना कैशिकी के वह कैसे सम्पन्न होगा । इस प्रयोग में देवगण एवं असुरों के वर्तमान चरित्र का अभिनय प्रस्तुत नहीं किया गया था यह तो पूर्वमन्वन्तर के देव एवं असुरों का चरित्र था । पूर्वमन्वन्तर में होनेवाली असुरों की पराजय के प्रख्यात कथानक को भ्रमवश असुरों ने समान जातीय होने के कारण वर्तमान सन्दर्भ में अपनी पराजय मान ली और वे क्षुब्ध हो गये । इससे एक अन्य संकेत यह भी मिलता है कि वर्तमान चरित्रों एवं उनसे मिलते जुलते चरित्रों का अभिनय उचित नहीं होता क्योंकि ऐसा करने पर अनेक कठिनाइयां उपस्थित हो जाती हैं । ६ ९ -७०. ' जर्जर ' शब्द का विग्रह है ' जीर्यत्यतिशयमनेनेति जर्जरः ' । इसे ' नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः ' ( अ ० ३ | १ | १३४ ) से अच प्रत्यय कर यङ् लुगन्त में निष्पन्न करते हैं । यहाँ जर्जर शब्द दो बार प्रयुक्त हुआ है । दूसरी बार जर्जर शब्द ध्वज के लिये आया है । इसे जृ धातु से णिच् प्रत्यय के पश्चात् अच् प्रत्यय करके निष्पन्न किया जाए । इस समय उपाख्यान का संकेत यही है कि नाट्यप्रयोग में विघ्न करने वाले तत्वों पर शासन नियन्त्रण करे तथा ( हो सके तो ) दण्ड की भी व्यवस्था करे । १०५-१०६. मूल में प्रयुक्त ' वचन ' पद से यह सूचित किया गया है कि जो दोषारोपण किया गया है उसका सरलता से समाधान या निवारण किया जा सकता है । यहाँ देवताओं के प्रति जो पक्षपात का आरोप है उसे मिथ्या-
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ४५३ ज्ञान से गृहीत रज्जु में सर्प से उत्पन्न भय के समान भ्रान्तिदायक समझना चाहिए । नाट्यप्रयोग का उद्देश्य या आशय दैत्यों की दुष्टता तथा देवों की सज्जनता की प्रसिद्धि या प्रचार करना नहीं है । यहाँ केवल शुभ तथा अशुभ कर्मों का फल दिखलाना इष्ट है । इसके अतिरिक्त इसमें देवगण या दैत्यों पर ही कोई बल नहीं दिया गया है प्रत्युत उत्तमकर्म का उत्तम परिणाम दिखलाया गया है जिसे एकपक्षीय पक्षपात नहीं मान सकते; क्योंकि दैत्यों के शुभकर्मों का भी नाट्य में शुभ परिणाम दिखलाया जा सकता है । दूसरे इसका कारण यह भी है कि शुभाशुभ कर्म धर्माधर्मं रूप होते हैं और नाट्यवेद उन्हें सुख एवं दुःख के फलस्वरूप अलग - अलग निर्धारित करता है । इसका आशय यही है कि जो किसी विशिष्ट देश एवं काल में इस प्रकार शुभाशुभ कर्मों के द्वारा धर्माधर्म का उपार्जन करता है उसे तदनुरूप फल की उपलब्धि होती है । इस तथ्य की नाट्यवेद प्रेरणा भर देता है क्योंकि वह वेद या धर्मशास्त्र के समान आदेशात्मक उपदेश का प्रदाता नहीं हैं । १०७ परन्तु उपर्युक्त तथ्य के मान लेने पर भी एक प्रश्न पुनः उपस्थित होता है कि ऐसा होने पर भी ऐसे चरित्रों की उद्भावना ही क्यों की जाए जिससे क्षोभ, असन्तोष या दुःख उत्पन्न होता हो? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि नाट्य के बाहर सभी अपने स्वरूप में विद्यमान रहे क्योंकि इसमें केवल देवों या असुरों का ही चरित्र प्रदर्शित नहीं होता और उन्हीं के किसी चरित्र के प्रदर्शन करने का इसका उद्देश्य भी नहीं है । क्योंकि नाट्य-प्रदर्शन में उनका तात्विकबोध नहीं होता, न ही सादृश्यज्ञान से ' यह इसके समान है ' ऐसा बोध होता है, न ही भ्रान्तरूप में शुक्तिका रजतवत् स्मृतिरूप ज्ञान रखा जाता है, न ही सत्यज्ञान से बाधित मिथ्याज्ञान का यहाँ आरोप रहता है, न ही समानगुणों के अध्यवसाय द्वारा ' गौर्वाहीकः ' के समान बोध करवाना यहाँ इष्ट है, मुख में चन्द्र की सम्भावना द्वारा उत्प्रेक्षमाण स्वरूप का बोध भी यहाँ इष्ट नहीं है, न प्रतिकृति या अनुकृतरूपवाले खिलौनों की तरह इसमें किसी प्रतिकृति का प्रस्तुतीकरण है, न ही गुरुशिष्यों के व्याख्यान की तरह स्वभावानुकरण का प्रतिपादन है, न इन्द्रजाल की तरह तात्कालिक निर्माण और दक्षता से किसी की हूबहू नकल करने की हाथ की सफाई या. मायाकारी ' सदृश नटों में रामादि बुद्धि इसमें होती है । इस प्रकार निर्दिष्ट इन सभी पक्षों में असाधारणता होने से रसास्वाद सम्भव नहीं है । इसके अतिरिक्त कवि के लिये भी वर्णनीय नियत व्यक्ति के वर्णन में अनौचित्य का परिहार सम्भव न हो तो काव्यनिर्माण कैसे सम्भव
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४५४ नाट्यशास्त्रम् होगा । चाहे मुख्य अनुकार्य का दर्शन हो या प्रयोक्ता ( अभिनेता ) का, दोनों दशाओं में लौकिक व्यापार के देखने पर सांसारिक या लौकिक हर्ष क्रोधादि की उत्पत्ति अवश्य होगी तथा इन दोनों के देखने में ही बुद्धि को केन्द्रित करने या लगाये रखने पर रसानुभूति भी नहीं हो सकेगी । ऐसी स्थिति में - ' नाट्य में ऐसा क्या दिखलाया जाता है ' जसा प्रश्न बना ही रह जाता है तथा इसी के समाधान के हेतु भरतमुनि ने — त्रैलोक्यस्यास्य ' इत्यादि कारिका का उत्तरार्धं कहा है । तदनुसार नाट्य न तो किसी अनुकार्य या व्यक्तिविशेष के चरित्र का अनुभावन अर्थात् प्रत्यक्ष करवाता है और न ही उसका अनुकरण स्वरूप माना जाता है किन्तु यह तो साधारणीकरण व्यापार द्वारा समान्यीकृत स्वरूप से समग्र विश्व के भावों का ' अनुकीर्तन है ' अर्थात् इस नाट्य का ग्रहण अनुव्यव सायात्मक प्रतीति से होता है तथा प्रमाणों के आधार पर एक बार नाट्य की अनुकरणरूपता के खण्डन कर दिये जाने पर भी ( लौकिक अनुकरण के अनुसार उसके रहने के कारण ) गौण रूप से उसे अनुकरण मान लेने में भी कोई दोष नहीं होता और वास्तव में अनुकरणादि से नाटक का भेद सिद्ध हो जाने पर शाब्दिक विवाद की आवश्यकता ही नहीं रहती । ( इस तथ्य को आगे प्रसङ्गवश विस्तार से पुनः प्रतिपादित किया जाएगा १०८-११५. यहाँ ' क्वचिद्धर्म ' इत्यादि एवं पद्य ११२ आदि में अभिहित नाना भावों को बतलाया गया है । यहाँ प्रयुक्त धर्मादि शब्द औचित्यानुसार अपने से सम्बद्ध स्थायी, संचारीभाव एवं विभाव आदि के सूचक हैं । इनमें ' क्वचिद्धर्मः ' तथा ' क्वचिदर्थ ' पद से उत्साह स्थायीभाव सूचित किया गया है । इसी प्रकार ‘ क्रीड़ा’पद से विस्मयादि, ' शम ' से निवेद, ' हास्य ' से हास, ' युद्ध ' से क्रोध, ' काम ' से रति, ' वध ' से भय, जुगुप्सा एवं शोक आदि स्थायीभावों की सूचना दी गयी है । इन स्थायीभावों की सूचना से तदनुरूप संचारीभाव एवं विभावों को भी समझना चाहिए । इसके अतिरिक्त ' क्वचिद्धर्मः ' पद से धर्मप्रधान नाटक या प्रकरण भी गृहीत होते हैं । क्रीडा प्रधान रूपकों में भाण को लिया जा सकता है एवं अर्थ की प्रमुखता प्रकरण आदि में मिल सकती हैं । इस प्रकार लक्षणानुसार ये बातें दशरूपकों में भी देखी ( तथा समझी ) जा सकती हैं । समग्र नाटक में इन विशेषताओं को लक्षणानुसार देखने के अतिरिक्त नाटकादि के एक देश में भी इन्हें प्राप्त किया जा सकता है । तदनुसार धर्म-प्रधानता के लिये छलितराम नाटक के एक भाग में श्रीराम का अश्वमेधयज्ञ
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ४५५ करना ' धर्म ' का उदाहरण है । इसी प्रकार क्रीड़ा प्रधानता को स्वप्नवासवदत्त में देखा जा सकता है । इसके अतिरिक्त नाट्यादि के एक छोटे अंश में भी ये धर्मादि देखे जा सकते हैं । जैसे शाकुन्तल नाटक में-' दुष्यन्त - क्या यही कुलपति कण्व की असवर्णक्षेत्रसम्भवा कन्या है । ' यहाँ ' धर्म ' है । इस प्रकार किसी नाट्यरचना में अथवा उसके एक विभाग या • अंश में भी इन धर्मादि को उदाहरण स्वरूप प्राप्त किया जा सकता है । ११६. नाट्य में प्रमुखतः केवल धर्मादि का या पुरुषार्थ के उपाय मात्र का उपदेश ही नहीं दिया जाता है, किन्तु इन उपायों से प्राप्त होने वाले फल या परिणाम को भी दर्शाया जाता है या उसका संकेत किया जाता है । इसका आशय यही है कि साधारणीकरण व्यापार द्वारा समग्र विश्व के भावों को प्रस्तुत करने वाले नाट्य के देखने पर न दिखलाई देने या प्राप्त होने वाला कोई ज्ञानादि नहीं होता और ज्ञान शब्द से यहाँ आत्मज्ञान विषयक तथ्य भी लिया जा सकता है जिसे नाट्य में देखा भी जा सकता है । जैसे वेणीसंहार के ' आत्मारामा विहितरतयो ' ( वे ० सं ० १।२३ ) पद्य में आत्मज्ञान है । शिल्प शब्द से माला गूंथने, चित्र या खिलोने बनाने या रंग रोगन चढ़ाने ( पुस्त ) आदि रचना को लिया जाता है । जैसे ' वेष्टितं ग्रंथित गुम्फ संहत रात-तैश्च कुसुमैः सपल्लवैः, इत्यादि में मालारचना शिल्प ही है । विद्या से आशय है राजनीति के अन्तर्गत दण्डनीति । जैसे बालरामायण के— ' श्रमव्यायामाभ्यां प्रतिविहिततन्त्रस्य नृपतेः ' ( बा ० रा ० ११२४ ) पद्य में दण्डनीति है । ' कला ' शब्द से गीतवाद्य आदि को लेना चाहिए । जैसे नागानन्द नाटक के - ' व्यक्तिर्व्यञ्जनधातुना ' ( ना ० नं ० १।१४ ) इत्यादि पद्य में संगीत कला का वर्णन है । योग का अर्थ है ज्ञान से कला पर्यन्त तत्वों का अपने भेदों सहित एक दूसरे में मिश्रण होना । जैसे— ' मेघाशङ्किशिखण्डिताण्डवविधा ' इत्यादि पद्य में वाद्य तथा गीत के अङ्गों का परस्पर मिश्रण रखा गया है । इसी प्रकार विक्रमोर्वशीय के - ' आविलपयोधराग्रं लवलीदल पाण्डुकोमल-च्छायम् ' ( विक्र ० ५ । ८ ) में शृङ्गारस के साथ आयुर्वेद तन्त्र का मिश्रण किया गया है । ' कर्म ' पद से युद्ध के व्यापार आदि लिये जा सकते हैं । जैसे — आलीढ़-
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४५६ नाट्यशास्त्रम् स्थितटङ्कितस्य ' इत्यादि पद्य में इन्द्र तथा असुरों के परस्पर युद्ध विषयक दावपेंचों का चित्रण है । ११ ९ -१२०. ' नाट्य ' जब देवता या असुरों से किसी प्रकार का भी सम्बद्ध नहीं होता तो फिर उनके नामादि का उल्लेख क्यों किया जाता है । ऐसी आशंका के समाधानार्थ यहाँ कहा जा रहा है-देव, असुर, भूपति, ( सामान्य ) गृहस्थ, ब्रह्मर्षि एवं मुनि आदि को अधि-कारी व्यक्ति या पात्र होने के कारण नाव्य में प्रस्तुत किया जाता है । इसका कारण यह भी है कि व्यक्तिविशेष का थोड़ा आधार न लेकर नाटकीय कथा का प्रस्तुतीकरण कैसे सम्भव हो सकता है । इसके अतिरिक्त निश्छल उदारता एवं धर्मादि से सम्पन्न बलि एवं प्रहलाद जैसे असुर पात्रों को भी नाटय में बनाया जा सकता है । इसलिये केवल देव एवं भूपति को ही नाटय आधार में रूप से प्रमुख प्रदर्शन हेतु लिये जाने की बात कहना व्यर्थ है । नाट्य में प्रमुख न केवल देव एवं असुरों को ही किन्तु ब्रह्मर्षि, मुनि, महीपति, सद्गृहस्थ आदि को भी रखा जा सकता है । अतएव असुरों का अपमान करने या देवताओं को प्रसन्न करने हेतु ही केवल नाट्य का निर्माण नहीं किया गया है यह स्पष्ट है । १२१. यहाँ ' अयं ' पद से प्रत्यक्षसदृश अनुव्यवसाय का विषयभूत लोक-कहा गया है जो सत्यासत्य विलक्षण होने से अनिर्वचनीय है । आशय स्वभाव यह कि साधारणीकरण व्यापार के द्वारा समग्र विश्व का स्वभाव जब अपने स्वभाव रूप में प्रतीत होनेवाला होकर आस्वाद्यमान स्थिति को प्राप्त करता है तो ऐसा अर्थ ' नाटय ' कहलाता है । यह सुख - दुःख से युक्त होने के कारण विचित्र है । इसमें केवल दुःखात्मकता या सुखात्मकता नहीं होती । अतएव लौकिक सुख दुःखादि भावों के सदृश या इन्हीं के संस्कारों से अनुप्राणित समुदायरूप अर्थ है ' नाटघ ' । इस नाट्य का अङ्ग अभिनय होता है । रत्यादिभाव या स्वरूप का अनुकरण करने वाला ' नाट्य ' प्रतीति का विषय कैसे होगा? इस आशंका के समाधानार्थ ही मूल में स्वभावपद का विशेषण दिया है— ' मङ्गाद्यमिनयोपेतः ' । अङ्गादि उन्हें कहते हैं जिनमें शाखा ( या आङ्गिक नृत्तादि तथा गीत ) की प्रमुखता रहती हो । ये अङ्गादि अनुमान ज्ञान या सङ्केतग्रह पर आश्रित शब्दज्ञान स्वरूप नहीं प्रत्यक्षसदृश, लौकिक, सम्यक्, मिथ्या आदि प्रतीति से विलक्षण होते किन्तु होने वाली प्रतीति में उपयोगी होने वाले होते आस्वादन नाम से अभिहित हैं । अथवा अङ्गपद से रसप्रतीति के हेतुभूत विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारि-
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ४५७ लिये जा सकते हैं । ये जिसमें प्रधान हो वे अङ्गादि होंगे । ये विभा-भाव भी बनाने के निमित्त होने से वादि ही रस के अभिमुख्य नयन या आस्वादनयोग्य हैं । जैसा कि रसाध्याय ( ना ० शा ० अध्या ० ६ ) में आगे अभिनय कहलाते बतलाया जाएगा । के अभिनय से युक्त हो बुद्धिरूपी दर्पण में जो अर्थ प्रति-उन अङ्गादि वे ही ' नात्र्य ' हैं । यह नाटय नटनीय, नर्तनीय या नर्तनरूप, बिम्बित होते हैं होने योग्य स्वरूप वाला होता यत्नपूर्वक पहुँचाने वाला एवं हृदय में प्रविष्ट है । अतएव नटों का जो ( यह ) परम्परागत कार्य धर्मादि का प्रतिपादक होकर ' नाटय ' कहलाएगा । यह के फलों से सम्बद्ध होता है तथा इसका फल होता है भूतियों के अनन्तर होनेवाला हेयोपादेयता का ज्ञान भावाध्याय में ) और विस्तार से प्रस्तुत किया गया ( वृत्ति ) है, वह भी नाट्य सुख एवं दुःखों सुख - दुःखादि की अनु-। इसी तथ्य को आगे है ।
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द्वितीय अध्याय १. इस प्रकार प्रथमाध्याय के विषय का विधिवत् ज्ञान करने के एवं ' रङ्गपूजां कुरुष्व ' जैसे वचन से रंगपूजा के विषय में प्रेरणा लेने के उपरान्त उन मुनिजन ने फिर प्रश्न उपस्थापित किये । इसका कारण यह भी था कि कदाचित् भरतमुनि पाठ्यादि ( नाट्याङ्गों ) के समान पूजन की अन्तरंगता को ध्यान में रखते हुए विस्तार से सर्वप्रथम पूजन का ही प्रतिपादन करने लगेंगे तो पूजा के आधारस्थल रङ्गमण्डप का वर्णन नहीं हो सकेगा । इसके अतिरिक्त ' गानं रङ्गश्च सङ्ग्रहः ' में मुनि ने नाट्यमण्डप का सब अङ्गों के बाद उल्लेख किया है इसलिये उद्देश्यक्रम से इसका निरूपण यदि अन्त में किया गया तो फिर रंगमण्डप और पूजन की अन्विति नहीं रहने से व्यवस्थित बोध में प्रतिबन्ध उपस्थित जाएगा या उसके प्रतिपादन का अवसर हो न आएगा । इस प्रकार की आशंकाओं एवं सम्भावित स्थितियों को विचार कर ही आत्रेय आदि मुनियों ने रङ्गमण्डप विषयक जिज्ञासा की सर्वप्रथम अव-तारणा उपस्थापित की । २. ( इस ) कारिका में दिया गया ' अथवा ' शब्द पूजन विषयक पूछे गये पिछले प्रश्न के निराकरणार्थं प्रयुक्त है क्योंकि पूर्व प्रश्न मण्डपरचना के लिये करना अभीष्ट था और तभी पूजनविषयक प्रश्न करना क्रमप्राप्त होता । लक्षणपद से रंगमण्डप के विशेष आकार परिणाम आदि का स्वरूप ग्रहण समझना चाहिए । प्रश्न - असाधारण धर्म के कथन स्वरूप लक्षण को यहाँ कैसे ग्रहण न करें? उत्तर - यहाँ ' लक्ष्यते इति लक्षणं ' व्युत्पत्ति करते हैं । इसका आशय है कि जो लक्षित होता ( दिखलाई देता ) हो वही रङ्गमण्डप का आकार, सन्निवेश आदि यहाँ लक्षण पद से अभिप्रेत है । ३. ' नाव्ययोग ' का अर्थ है नाटय की उत्पत्ति । ' तावत् ' पद से पूर्व अभि-हित प्रश्नों को न छोड़ने का संकेत है । यहाँ ' लक्षण ' शब्द के साथ एव पद का अध्याहार होता है । अर्थात् लक्षण का आकार, परिणाम बतलाना अंग है । और नाट्यमण्डप के निर्माण के पश्चात् ही यजन किया जा सकता है अतएव अब प्रथम ' लक्षण ' बतलाना ही आवश्यक है । ४. मुनि ने मण्डप लक्षण एवं इनके यजन को बतलाने की बात कह दी किन्तु क्रिया अर्थात् रचनाशैली को छोड़ दिया था जिसे अगले पद्य में मुनि ने
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४५ ९ स्वयं निर्देशित किया । यहाँ उसके न बतलाने का कारण यह है कि मण्डप के लक्षण एवं यजन विधान की तो मनुष्यों के साथ देवगण के लिये आवश्य-कता थी किन्तु उन्हें क्रिया की अपेक्षा नहीं थी क्योंकि देवगण मानस शक्ति से सभी ( अपेक्षित मच आदि ) वस्तु के निर्माण की क्षमता रखते हैं । ६. ' वास्तु ' का अर्थ है नाड्यमण्डप के लिए ली जाने वाली भूमि का परिणाम आदि । ७. ' इह ' पद से आशय है प्रेक्षागृह के स्वरूपादि के विषय में । ' सन्निवेश ' अर्थात् आकार एवं परिमाण । विश्वकर्मा के द्वारा विचार कर इस सारे क्रम को मिश्रित करने के कारण उन्हें सक्षम विशेषण दिया गया है-- ' धीमता ' । प्रश्न- प्रेक्षागृह के आकार एवं परिमाण के अनुसार तीन प्रकारों को ही क्यों रखा गया । उत्तर- ' शास्त्रतः ' । क्योंकि शास्त्र से ही इनके वर्णित प्रकारों का इस प्रकार बोध होता है क्योंकि शास्त्र का अप्रामाण्य नहीं होता ( इसी कारण तीन प्रकार रखे गये ) । ८-१० ' विकृष्ट ' शब्द की व्याख्या है— ' विभागेन कृष्टः दीर्घः इति विकृष्टः ' अर्थात् लम्बाई चौड़ाई की दोनों दिशाओं में जो अलग - अलग ( विभागेन ) खींचा गया ( कृष्टः ) हो, अर्थात् चौड़ाई की अपेक्षा जिसकी लम्बाई अधिक रहे । चतुरस्र शब्द की व्याख्या ' चतस्रसु दिक्षु साम्येन इति चतुरस्र: ' अर्थात् जिसकी लम्बाई चौड़ाई चारों दिशाओं में समान हो [ या जिसकी चारों भुजायें समान हों ] ऐसा वर्गाकार क्षेत्र वाला प्रकार ' चतुरस्र ' कहलाएगा । व्यस्त्र शब्द की व्याख्या है— ' तिस्रो अश्रयः त्र्यश्री तदस्मिन्निति त्र्यश्रः " अर्थात् जिसमें तीन कोण ( अश्री ) हों वह त्र्यश्री और त्र्यश्री जिसका प्रकार हो वह त्र्यश्र अर्थात् त्रिकोण ( यहाँ ' तदस्मिन् ' इत्यादि पाणिनिसूत्र से मत्वर्थीय अच् एवं ईकार लोप आदि होकर त्र्यश्र पद निष्पन्न होता है ) । नाट्यमण्डपों के हस्त एवं दण्डप्रमाण के परिमाणानुसार ही ज्येष्ठ, मध्यम एवं कनिष्ठ भाव समझना चाहिए; विकृष्ट, चतुरस्र एवं त्र्यश्व के आकार के आधार पर नहीं । ये सभी भेद यद्यपि प्रचलित या उपयोगी नहीं हैं फिर भी किसी समय प्रयोग होने के कारण तथा भविष्य में किसी समय उपयोग की सम्भावना रहने के अतिरिक्त परम्परा के संरक्षणार्थ यहाँ इनका निर्देश एवं वर्णन किया गया है । ११. जहाँ देव एवं असुर सदृश नायक एवं प्रतिनायक हों तो आरभटी • वृत्ति प्रधान डिम आदि रूपकों के लिए लम्बे - चौड़े रङ्गमण्डप की अपेक्षा रहती है, क्योंकि इसमें ( भाण्ड प्रभृति ) वाद्यवादन का अधिक उपयोग होता है.
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४६० नाट्यशास्त्रम् और चलने फिरने, भागने आदि के लिये अधिक लम्बाई वाले एवं ऊंचे - नीचे स्थानों की आवश्यकता रहती है, जिनमें पात्रों के द्वारा भी दीर्घ परिमाण वाले तालानुसारी डग भरने आदि के विधान होने के कारण ज्येष्ठ नाट्यमण्डप उपयुक्त रहता है । इन रूपकों का अभिनय मध्यम प्रकार के या छोटे नाट्य-मण्डपों में ठीक से नहीं हो सकता है, इसी कारण ज्येष्ठमण्डप का विधान किया गया । ( कुछ ) अन्य आचार्यों का मत कि जहाँ देवगण प्रेक्षक हों वहाँ ज्येष्ठ नाट्यमण्डप का निर्माण किया जाए । आचार्य अभिनवगुप्त के अनुसार यहाँ देवताओं का प्रेक्षकरूप अभिप्रेत नहीं है अर्थात् देवगण द्वारा अभिनय करने या उनके प्रेक्षक बनने का यहाँ विचार करना असंगत होगा । हमें तो दशरूपकों के लिए उपयुक्त नाटघमण्डप पर ही विचार करना इष्ट है । क्योंकि डिम जैसे रूपकों में भयङ्कर दृश्य आदि दिखाना पड़ता है; अतएव इनके लिए ज्येष्ठ मण्डप की आवश्यकता है । इसका इतना ही आशय है कि ज्येष्ठ, मध्यम एवं अवर प्रकारों का सप्रभेद प्रतिपादन मनुष्यों के लिए ही किया गया है । १६. ' अणु ' उस त्र्यणुक ( या त्रसरेणु ) को कहते हैं जहाँ से दृश्यता आरम्भ होती है; अतएव वैशेषिकादिसम्मत अणुपरिमाण का द्व्यणुक यहाँ अणु शब्द से ग्रहण नहीं करना चाहिए । अर्थात् तीन द्वयणुक से निर्मित महत् परिमाण वाला ' त्र्यणुक ' हो -- जो दृश्य होता है -- यहाँ माप - तौल के व्यवहार में अणु मानकर प्रयुक्त होना चाहिए । १ ९. हस्त एवं दण्डप्रमाण के अनुसार नाट्यमण्डपों का ज्येष्ठादि क्रम में लक्षण निर्द्धारित किया गया है । इसका उद्देश्य यह है कि डिम जैसे रूपकों के लिये ज्येष्ठ मण्डप को राजा आदि धीरोदात्त नायक के चरित्र वाले नाटकादि के लिए मध्यमपरिमाण के मण्डप एवं तापस, विप्र आदि से सङ्कीर्ण चरित्रवाले प्रहसन आदि रूपकों के लिए कनिष्ठ परिमाण वाले नाट्यमण्डप को रखना उपयुक्त रहता है । आशय यह कि विविध रूपकों के प्रयोग प्रस्तुत करने के लिए उपयुक्त नाट्यमण्डप देना ही उद्देश्य है जिससे रूपकों में विद्यमान पात्रों का स्वभावा-नुसार साक्षात्कार दर्शकों को सम्भव हो सके । ( अतएव विवरणानुसार नाट्यमण्डप ही उपयुक्तता की दृष्टि से निर्माण होने चाहिए एवं इसी प्रकार के मण्डपों पर उपयुक्त रूपकादि का प्रयोग प्रस्तुत किया जाना चाहिए । ) २०. रङ्गमण्डप में नाट्यप्रयोक्ता के सामने की दिशा और उनके पीठ की ओर ( पीछे की ओर ) स्थित दिशा को लेकर नाटघमण्डप का जो भाग होगा
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४६१ वही उसकी लम्बाई समझी जाएगी । इसी प्रकार दोनों बाजुओं में रहनेवाली दिशाओं का भाग उसकी चौड़ाई होगी । मनुष्यों के लिए निर्मित नाटयमण्डपों को इससे अधिक परिमाण वाले नहीं रखना चाहिए क्योंकि बड़े नाट्यमण्डप होने पर उनमें प्रस्तुत नाट्यप्रयोगों को ठीक से देखना और समझना कठिन हो जाता है । २१. मध्यम नाट्यमण्डप सर्वाधिक उपयुक्त नाट्यमण्डप होता है क्योंकि इसके बाद किसी अन्य प्रकार की अपेक्षा नहीं रहती ( और सभी रूपकों के प्रकारों को इस पर प्रस्तुत किया जा सकता है । ) यहाँ नाट्यपद का प्रयोग रूपकों के सभी भेदों को बतलाने के लिये किया गया है । २२. ' विप्रकर्ष ' में प्रकर्ष का अर्थ होगा बड़ेपन या छोटेपन की अन्तिम सीमा । उसका जो अतिक्रमण करता है उसे ' विप्रकृष्ट ' कहा जाएगा [ अर्थात् ज्येष्ठ प्रमाण वाला नाटयमण्डप ] विप्रकृष्ट मण्डप के ज्येष्ठ प्रमाण वाले विस्तीर्ण प्रकार में पाठ्य ( जो नाठ्य का शरीर एवं मुख्य अङ्ग माना गया है, वही मुख्य अंग ) विस्वरता को प्राप्त करेगा जिससे प्रेक्षकवर्ग को उपताप-कता प्राप्त होगी । इस उपतापकता का कारण बनेगा ऊँचा करके या क्लेश-पूर्वक जिसके स्वर काकु आदि विभाग को समझ सकना । इसके अतिरिक्त दूरस्थ प्रेक्षकों के लिए यही ' विस्वरत्व ' अश्राव्यता भी उत्पन्न करेगा ( क्योंकि अधिक दूरी के होने से स्वर के धीमे होकर पहुँचने पर उसमें सुनाई देने की . योग्यता ही नहीं रहेगी ) । मुनि ने इस विस्वरता का कारण बतलाया है ' अनिस्सरणधर्मत्वात् ' अर्थात् अत्यन्त दूर पहुँचने पर शब्द का प्रसारित न हो पाना । इसी कारण पाठ्य विस्वरता को प्राप्त करता । अनिस्सरणधर्म को हम वर्तमान वैज्ञानिक परावर्तन- सिद्धान्त ( Principl of reffaction ) की में रख सकते हैं । बड़े प्रेक्षागृह में उच्चारित शब्दों की ध्वनियाँ प्रति-तुलना ध्वनि के कारण विघटन प्राप्त कर लेती हैं । यह कार्यं ध्वनियों के पारस्परिक अवरोध के कारण भी होता है, क्योंकि एक त्रिकोण आकार में जो भी छोटा है, ध्वनि प्रबल होने से वहाँ देर तक रहती है और प्रतिध्वनि का समय लम्बा कर देती है । वाणी की प्रतिध्वनि का समय संगीत की प्रतिध्वनि से भिन्न होता है, अतः प्रेक्षागृह को वाणी एवं संगीत दोनों के उपयुक्त होना अपेक्षित है । इसके अतिरिक्त अतिशय छोटे नाट्यमण्डप में भी उच्चस्वर से बोला गया पाठ्य एवं गीत ' अनिस्सरणधर्म ' वाला होने के कारण माधुर्य - हीन हो जाता है क्योंकि यह अनुरणनरूप मधुरगुञ्जन को उत्पन्न करने वाला स्वर नहीं