भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 591–600
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 591–600
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४६२ नाट्यशास्त्रम् है । स्वर का गुञ्जन तत्व ही स्वरूप है यह बात आगे गेयाधिकार प्रकरण. ( ना ० शा ० २६ ) में विस्तार से कही जाएगी । पाठ्य के समान ही योगक्षेम रखने के कारण गीत और आतोद्य का भी इसी से विस्वरत्व गृहीत समझना चाहिए । २३. नाट्य के प्रधानभूत अङ्ग पाठ्य एवं अनुरञ्जक गीत, वाद्य आदि के विस्वरत्व होने पर अभिनय का ठीक से प्रत्यक्षीकरण असंभव हो जाता है । आस्यगत का अर्थ है चेहरे पर विद्यमान भाव भी जो अभिनेताओं द्वारा प्रस्तुत अनेक प्रकार की दृष्टियों, अश्रु, स्वेद, विवर्णता आदि अनुभावों, मुकुट, पगड़ी आदि वेषभूषाओं तथा आङ्गिक चेष्टाओं के अभिनय से गृहीत होता है - यह भी प्रेक्षागृह के अतिविस्तीर्ण होने पर अस्पष्टता धारण करेगा । ' प्रकृष्टत्वात् ' पद की व्याख्या है— ' प्रगतं कृष्टं कर्षणं देयं यस्य तस्य भावस्तस्मात् ' अर्थात् जिसका कृष्ट अर्थात् कर्षण या दीर्घता प्रगत अर्थात् नष्ट हो चुकी हो उसी का भाव प्रकृष्टत्व कहलाता है । इस प्रकार नाट्यवेश्म के छोटे होने पर भी अतिसामीप्य के कारण उत्पन्न होनेवाली दूसरी स्थिति अव्यक्तता की आ जाती है । पहिले अतिदूर होने एवं प्रेक्षागृह के बड़े होने के कारण अव्यक्तता आयी थी जो उसके छोटे होने पर भी तथैव उपस्थित हो जाती है । आशय यह कि अतिदीर्घ एवं अतिशय छोटा प्रेक्षागृह उत्तम या उपयुत्त नहीं है, अतः मध्यम प्रेक्षागृह ही उत्तम होता है । २४. मध्यम प्रेक्षागृह के उचित होने का एक अन्य कारण यह भी है कि यह अधिक पसन्द भी किया जाता है, क्योंकि इसमें प्रस्तुत किये जानेवाले सभी रूपक भेदों के अन्तर्गत अङ्गभूत पाठ्य, उपरंजक गीत वाद्य एवं अभिनय की स्पष्ट प्रतिपत्ति होती है । २५. दण्ड समाश्रित प्रमाण वाले प्रेक्षागृहों का अभिधान देवताओं के अभिप्राय से ही किया गया है अतः मनुष्यों के लिये हस्त समाश्रित प्रमाण का ही विधान अभिप्रेत है यह स्पष्ट हो जाता है । अतएव हस्तसमाश्रित प्रमाण-वाले नाट्यमण्डपों का ही लक्षण प्रमाण आदि बतलाना यहाँ इष्ट है । ( और दण्डसमाश्रित प्रमाण के प्रेक्षागृहों को इन्हीं के समान केवल शास्त्रलक्षण की पूर्ति के हेतु ही यहाँ उपस्थापित किया गया समझना चाहिए । ) २६. यहाँ विभागपद हेयोपादेयता रूप तथा वास्तुपद गृहमण्डप का चाहिए । अर्थात् भूमि का विभाग हेय तथा उपादेय ( दोनों ) वाचक समझना दृष्टियों से परीक्षा करते हुए देखा जाना चाहिए । वास्तु प्रमाण का आशय
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४६३ है कि जिस नाटयमण्डप का निर्माण होना है उसी के विवरण एवं प्रमाणों के [ तथा वास्तुशास्त्र के अनुकुल एवं तदनुसार विवरण एवं प्रमाणों के ] अनुसार निर्माण करना चाहिए । ३१-३७. कपास, मूञ्ज या सन का सूत ( डोरी ) बन सकता है जिसका उपयोग यहाँ किया जाता है परन्तु चमड़े का मानसूत्र ( जिसे आजकल फोता कहते हैं ) नहीं बनाया जाए । स्वामी पद का अर्थ है प्रेक्षा या खेल को कर-वाने की आज्ञा देनेवाले या इसमें मुख्यतः सहायक बनने वाले अर्थात् राजा या अर्थपति । ३७-३८ मध्यम परिमाण के जिस विकृष्ट नाट्यमण्डप का अभी उल्लेख किया गया अब उसी का सूत्रपात कर व्यवस्थित विवरण बतलाया जा रहा है । इसकी विभाग विधि यह है कि चौसठ हाथ लम्बाई ( दैर्ध्य ) एवं बत्तीस हाथ चौड़ाई ( विस्तार ) का क्षेत्र लेकर उसके बीच चौड़ाई की ओर से विभागार्थं सूत को फैलाना चाहिए । इनमें जो पीछे की ओर रहने वाला भाग पड़ेगा ऐसे भाग को मूल में पृष्ठभाग कहा गया है । इसके बीच में फिर चौड़ाई में सूत फैलाकर विभाग करना चाहिए । इस प्रकार उस पिछले ( ३२ x ३२ ) हाथवाले भाग के सोलह हाथ ( अर्थात् १६ x ३२ हाथ ) के दो भाग हो जाएँगें । उनमें से अगले ( १६ x ३२ हाथ वाले ) भाग को आधा विभक्त करे और उसमें आगे रहनेवाले भाग पर रङ्गपीठ और उसके बाद के ( १६ ८ हाथ वाले ) पिछले भाग पर रङ्गशीर्ष की रचना करते हैं । रङ्ग-शीर्ष कहते हैं उस स्थान को जो नेपथ्यगृह से रङ्गपीठ पर आनेवाले ( प्रवेश करने वाले ) पात्रों के बीच में पड़ने वाला रंगमञ्च का प्रदेश होता है । यदि प्रेक्षागृह के मुख्य प्रवेशद्वार की ओर पैर करते हुए कोई मनुष्य चित्त सो जाए तो उसका मस्तक जैसे सर्वोच्च भाग में रहता है इसी प्रकार नाट्यमण्डप के प्रवेश द्वार से जिसका अन्तिम छोर दिखलाई पड़ े ऐसा रंगपीठ से और नेपथ्य से लगा हुआ मध्यवर्ती प्रदेश- जिसका विस्तार १६ X = हाथ का प्रमाण रहता है - रंगशीर्ष समझना चाहिए । इस रंगशीर्ष के पीछे ( लम्बाई में १६ x ३२ हाथ का ) नेपथ्यगृह बनाया जाता है । इसमें अभिनेतागण वेषभूषा परिवर्तन तथा वेषभूषा धारण, विश्राम एवं प्रतीक्षा आदि कार्य करते हैं ( जैसा कि नाटयशास्त्र में निदर्शित है ) । अतएव नाट्यमण्डप के सबसे पिछले ( १६ x ३२ हाथ के ) भाग में नेपथ्य-गृह बनाया जाता है । विकृष्ट ( या आयताकार ) नाट्यमण्डप के मान का यही विभाजनक्रम होता है ।
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४६४ नाट्यशास्त्रम् विद्वानों का यह मत भी है कि जब चौड़ाई में रंगपीठ बत्तीस हाथ कुछ में आठ हाथ हो तो उसे उपर्युक्त विवरण से समझने में कठिनाई और लम्बाई चौड़ाई से अधिक होती है क्योंकि ६४ x ३२ हाथ के पड़ेगी क्योंकि लम्बाई विभाजन में १६ x ३२ तथा चोथे १६+ ८ क्षेत्र में जो लम्बाई थी वह तीसरे बन जाएगा । यह केवल समझने की बात ही है क्योंकि विवरणा-में चौड़ाई प्रमाण आदि में इससे कोई अन्तर नहीं नुसार सम्पन्न करने पर आकार आता । रङ्गशीर्ष तथा रङ्गपीठ: नाट्यशास्त्र के विवेचक विद्वानों ने रंगशीर्ष तथा रंगपीठ के स्थान, स्वरूप आदि के विषय में पर्याप्त उहापोह किया है । डॉ ० मनोमोहन घोष रंगशीर्ष तथा रंगपीठ को पृथक नहीं मानते । इनके मत में ये दोनों शब्द एक - दूसरे के पर्याय हैं तथा अभिन्न भी । इनके मत में नाट्यमण्डप का तीन चौथाई भाग प्रेक्षकों के बैठने के लिये और एक चतुर्थांश क्षेत्र रङ्गपीठ और नेपथ्यगृह के लिये रखा जाता है । नेपथ्यगृह के द्वार पर जो एक पर्दा स्थापित करते हैं यही यवनिका है जिसे उठाकर रङ्गमंच पर पात्र प्रवेश करते हैं । प्रो ० डी ० आर ० मनकड ने श्री घोष के मत की आलोचना करते हुए द्वारा अभिप्रेत रङ्गपीठ तथा रङ्गशीर्ष की पृथक् स्थिति को स्पष्ट नाट्यशास्त्र किया । तदनुसार भरतमुनि ने विकृष्ट नाट्यमण्डप में समुन्नत तथा चतुरस्र में सम रङ्गशीर्ष बनाने का विधान ( ना ० शा ० २।१०४ ) किया नाट्यमण्डप । यह किसकी अपेक्षा समुन्नत या सम रखो जाएं इस जिज्ञासा का उत्तर है है रंगपीठ की अपेक्षा रंगपीठ समुन्नत या सम रहने चाहिए । इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र में ही रंगशीर्ष और रंगपीठ को एक ही पद्य में पृथक् - पृथक् निर्देशित भी किया गया है ( ना ० शा ० २०७३ ) । इस प्रकार स्पष्ट हो गया कि ) रंगपीठ और रंगशीर्ष दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं । डॉ ० वे ० राघवन् ने भी नाट्यशास्त्र के उपर्युक्त प्रमाणों एवं अभिनव भारती के साक्ष्य पर रंगशीर्ष तथा रंगपीठ को पृथक् निरूपित किया । इनने द्वारा बतलाये गये यवनिका लगाने के स्थान को लेकर कहा कि अभिनवगुप्त और रंगशीर्ष के बीच में यवनिका लगायी जाती हो तो इससे ही जब रंगपीठ तथा रंगपीठ भिन्न हैं तथा इन दोनों का स्पष्ट हो जाएगा कि रंगशीर्ष विभाजन यवनिका करती है जिसे उठाकर पात्र मंच पर प्रवेश करते हैं ।
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परिशिष्ठ: टिप्पणी, अध्याय २ ४६५ आचार्य विश्वेश्वर ने ' रङ्गशीर्ष ' मूल पाठ बनाकर इसी तथ्य को सहमति दी कि रङ्गशीर्ष तथा रङ्गपीठ दो भिन्न स्थान पर होने से पृथक् ही हैं जिसे स्वयं भरतमुनि तथा आचार्य अभिनवगुप्त ने बतलाया । परन्तु इस प्रकार के मूल पाठ संशोधन के बिना ही जब श्री प्रो ० मनडक एवं डॉ राघवन द्वारा निर्देशित प्रमाणों एवं विवेचन से जब स्पष्ट हो गया तो फिर इस प्रयास की युक्तिसंगत अपेक्षा नहीं है । डॉ ० सुब्बाराव ने रंगशीषं तथा रङ्गपीठ का स्पष्टीकरण नहीं दिया परन्तु इन दोनों को अभिन्न मान कर डॉ ० द्योप की ही पुष्टि की । मत्तवारणी ६७. यद्यपि मूल में ' पार्श्व ' पद एकवचन में प्रयुक्त किया गया है परन्तु किसी विशेष पार्श्व का ग्रहण न होने के कारण एवं अगली कारिका में ' उत्सेधेन तयोस्तुल्यम् ' में ' तयो: ' पद के द्विवचन द्वारा दोनों बाजुओं में मत-वारणी का निर्माण करने की प्रतीति अवाधित रूप से होती है । यहाँ मत्तवारणी के जो चार स्तम्भ बतलाये हैं उन्हें मण्डप के बाहर निकले हुए रखा जाता है । इसलिये रङ्गपीठ की दीवार के पूरे होने पर उससे मिले हुए मण्डप से बाहर की ओर दो खम्भे तथा उससे भी परे भित्ति के बाहर की ओर एक दूसरे से और पूर्व में लगाए गए दोनों खम्भों से भी आठ हाथ के अन्तर पर दो खम्भे लगेंगे । इस प्रकार आठ हाथ की लम्बाई चौड़ाई ( ८ x ८ हाथ ) के चौकोर वर्गाकार वाले दो बरामदे बन जाते हैं जिन्हें मत्तवारणी कहते हैं । जिन विद्वानों को विकृष्ट नाट्यमण्डप में विकृष्ट स्वरूप की मत्तवारणी इष्ट है उनके मत में सोलह हाथ लम्बी और आठ हाथ चौड़ी मत्तवारणी बनाने पर विकृष्टता सम्भव है । ऐसी दशा में सोलह हाथ लम्बे - रङ्गशीषं तथा रङ्गपीठ के सामने के भाग की ओर से मिलाते हुए इसे उठाया जाएगा । ६८. प्रेक्षकों के बैठने के स्थान की अपेक्षा मत्तवारणी को डेढ़ हाथ ऊँचा रखा जाता है 1 । कुछ विद्वान् डेढ़ हाथ की अपेक्षा एक हाथ ऊँचा रखना भी उचित मानते हैं । मूल में प्रयुक्त ' तयोः ' पद इस बात का ज्ञापक है कि मत्तवारणी दोनों बाजुओं में बनाई जाए । मत्तवारणी की ऊंचाई के उपयुक्त प्रमाण में रङ्गपीठ की ऊँचाई रखी जाती है । इसका आशय यह है कि रंग-मण्डप के निचले भूभाग ( ब्रघ्न ) की अपेक्षा रङ्गपीठ की ऊँचाई डेढ़ हाथ रहनी चाहिए जिससे मत्तवारणी की आड़ न पड़ने के कारण रङ्गपीठ पर होने ३० ना ० शा ० प्र ०
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४६६ - नाटयशास्त्रम् वाले अभिनय कार्य तथा दृश्यों को ठीक से देखा जा सकता है । इसके अति-रिक्त ' उत्सेधेन ' पद में रखे गये एकवचन से भी यही सूचित होता है कि मत-वारणी और रंगपीठ के समान ऊंचाई पर स्थित रहने से मत्तवारणी की आड़ नहीं होगी ओर रङ्गपीठ की दृश्यावलि सुस्पष्ट दिखलाई पड़ेगी । इसके विपरीत यदि रङ्गपीठ की अपेक्षा मत्तवारणी को अधिक ऊँचा रखा जाएगा तो रंगपीठ पर होने वाले अभिनयादि ठीक से दृष्टिगोचर न होंगे । भरतमुनि के मूलवचन तथा अभिनवगुप्त की व्याख्या के आधार पर विचार करने पर स्पष्ट होगा कि रंगपीठ, रङ्गशीर्ष तथा नेपथ्यगृह प्रेक्षकों के बैठने के स्थान की अपेक्षा ऊंचे रखे जाते थे । इसका समर्थन मुनि के ' पूरणे मृत्तिका चात्र ' ( ना ० शा ० २०७४ ) इत्यादि से भी होता है । यह भराव रङ्गशीर्ष के बनाने तथा वेदिका भूमि को ऊंचा उठाने हेतु किया जाता था । इस प्रकार स्पष्ट है कि रङ्गपीठ और उसी के समान मत्तवारणियां भी सामा-जिकों के बैठने के स्थान ( अर्थात् आगे की प्रथम पंक्ति ) की अपेक्षा ऊँची रखी जाती है । इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि रंगपीठ के दोनों पार्श्व में ' मत्तवारणी ' की रचना की जाती थी । ( इसे न तो रंगशीर्ष पर और न ही किसी एक बाजू में बनाया जाता था । ' मत्तवारणी ' का विश्लेषण नाट्यशास्त्र के अनुशीलनकर्त्ताओं के लिये महत्वपूर्ण स्थान रखता है । कुछ विद्वान् ' मत्तवारण ' शब्द को उपयुक्त मानते हैं क्योंकि ' मत्तवारण ' का अर्थ कोश में ' प्रसादवीथीनां वरण्डः ' दिया गया है जिसमें कोई भ्रम नहीं रहता । परन्तु ' मत्तवारण ' शब्द को ही स्त्रीलिंग में सौन्दर्याधान की दृष्टि से ही प्राचीन काल में परिवर्तित कर दिया गया होगा क्योंकि ' नाट्यशास्त्र ' में सर्वत्र ' मत्तवारणी ' पद ही मिलता है । कुमारी गोदावरी केतकर ने मत्तवारणी शब्द को अशुद्ध माना है । उनके मत में कारिणी, धारिणी की तरह ' मत्तवारिणी ' शब्द व्याकरण सम्मत है । परन्तु इनकी कल्पना उचित नहीं मानी जा सकती । ' मत्तवारण ' शब्द से ' षिद्गौरादिभ्यश्च ' से ङीष् प्रत्यय का विधान कर ' मत्तवारणी ' शब्द बनाया जा सकता है तथा व्याकरण की दृष्टि से भी इसमें अशुद्धि नहीं होगी ( क्योंकि गौरादि आकृतिगण होने से ङीष् प्रत्यय निर्बाध है ) । इसलिये जब ' मत्तवा-रणी ' शब्द अशुद्ध नहीं है तो फिर इसके शुद्ध करने के प्रयास निरर्थक ही होंगे । ‘ मत्तवारण ' शब्द की व्युत्पत्ति ' मत्तं वारयति इति ' मत्तवारण: ' भी की जाती है । यद्यपि ऐसी व्युत्पत्ति से इसके स्वरूप का कोई संकेत नहीं मिलता
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४६७ पर आगे हम बतलायेंगे कि ' मत्तः चासो वारण: ' के द्वारा स्वरूप का साधा-रण संकेत ग्रहण होता है अतएव ' मत्तवारण ' शब्द ही यहाँ उपर्युक्त प्रत्यय सम्पन्न होकर ' मत्तवारणी ' की सिद्धि में सहायक है । मत्तवारणी के साथ अनेक प्रश्न संसक्त हैं, जिन पर आधुनिक अनुशीलन-कर्त्ता विद्वानों ने पर्याप्त ऊहापोह एवं व्याख्यायें प्रस्तुत की हैं । अभिनवभारती के पिछले विवरण से स्पष्ट है कि रङ्गपीठ के दोनों ओर या फिर रंगपीठ तथा रंगशीषं के दोनों ओर मत्तवारणी की रचना की जाती थी । यह वरण्डा मुख्य भवन से बाहर की ओर बनेगा शीर्ष दोनों ) के बराबर बननेवाली नहीं । इस तथ्य को मूलनाट्यशास्त्र से हृदयंगम किया जाना चाहिये । इतने स्पष्ट विवरण के बाद भी आर ० मनकड ने मत्तवारणियों का भवन के अन्दर निर्मित माना । यह भारती के विपरीत है । प्रो ० भानु ने मत्तवारणी शब्द , भीतर नहीं; अतएव रंगपीठ ( तथा रंग-मत्तवारणी भी बाहर ही बनेगी, भीतर तथा अभिनवभारती के मिलान से ठीक डॉ ० मनोमोहन घोष तथा प्रा ० डी ० आकार वरण्डा मानते हुए भी इन्हें मुख्य कल्पना नवीन अवश्य है किन्तु अभिनव-की अन्वर्थं व्याख्या करते हुए कहा कि व्युत्पत्ति ( ' मत्तान् वारयतीति मत्तवारणी ' ) के आधार पर मत्तवारणी की स्थिति रंगपीठ के सामने रखी जाए । इनका मत है कि नाट्यप्रयोग को देखने-वाले ( दर्शक ) किसी दृश्य को देखकर कदाचित् भावावेश में आकर रंग-मच पर अभिनय करनेवाले पात्रों के पास पहुँचने की चेष्टा करने लगते हैं । इसलिए नाट्यप्रयोग को निर्बाध एवं व्यवस्थित रखने के लिये ऐसे दर्शकों की रोक आवश्यक है । इसी रोक के उद्देश्य से रंगमन्च के सामने लगाया जाने वाला कटहरा ही मत्तवारणी है । इसी मत का व्युत्पत्ति के आधार पर सम-र्थन कर श्री जयशङ्करप्रसाद ने भी मत्तवारणी का उपयोग मत्तवालों का वारण माना है परन्तु इनके मत में मत्तवारणी का स्थान रंगपीठ के अगले भाग में था जो रंगपीठ के बराबर केवल एक ओर चार खम्भों से रुकावट के लिये बनायी जाती थी । इसकी ऊँचाई डेढ़ हाथ रखी जाती थी तथा यह रंगपीठ के अगले भाग में लगा दी जाती थी । ( देखिये काव्यकला तथा अन्य निबन्ध- जयशंकर प्रसाद, पृष्ठ ६३ ) इस प्रकार अन्वर्थं व्याख्यान के आधार पर खड़ी की गयी मत्तवारणी की कल्पना सौन्दर्यमयी चाहे बन जाए किन्तु इस प्रकार की खींचातानी से उसकी सही स्थिति एवं उपयोग ही बदल डाला गया । प्रो ० भानु तथा श्री प्रसादजी
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४६८ नाव्यशास्त्रम् के ये सुझाव विचित्र होकर रह गये । इसका कारण यह भी रहा कि ऐसी मत्तवारणी स्वयं ही दर्शक एवं अभिनय प्रयोग के मध्य रुकावट है । बडौदा से प्रकाशित अभिनवभारती व्याख्या समन्वित ' नाट्यशास्त्र ' के परिशिष्ट में प्रो ० सुब्बाराव ने ' नाट्यमण्डप ' पर स्वतन्त्र निबन्ध लिख कर समग्र द्वितीयाध्याय पर प्रकाश डालने का महनीय प्रयास किया । इसमें मत्त-वारणी पर एकदम अछूती तथा चौंका देने वाली कल्पना प्रस्तुत की गयी, जो उनकी अनुशीलनप्रतिभा प्रसूत है । इनका कहना है कि मदमत्त हाथियों की कलात्मक पंक्ति ( जिसे एक लम्बी पट्टी में उत्कीर्ण कर नाट्यमण्डप की ऊंचाई के मध्य अलङ्करण के लिये लगाया जाता है ) ही ' मत्तवारणी ' है । अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए इनने मूलपाठ में भी संशोधन किया है । इनके मत में ' चतुस्तम्भसमायुक्ता ' पाठ शुद्ध नहीं है अतएव इसे ' चतुस्तम्ब-समायुक्ता ' माना जाना उचित है । स्तम्बपद का अर्थ है हाथियों के बाँधने का खूंटा या स्तम्भ । अतएव चार खम्बों अर्थात् खूंटों से युक्त मत्त हाथियों की पंक्ति को रंगमच के सामने के भाग में एक पट्टी पर उत्कीर्ण कर ( या एक लम्बी पंक्ति में चित्रित कर ) सजावट के लिये लगाया जाए । यह डेढ़ हाथ मच के समतल ( के नीचे तक ) से उठायी जाती है । इस प्रकार ' मत्तानां वारणानां श्रेणिः मत्तवारणी ' अपने यौगिक अर्थ के अनुसार सम्पन्न की जा सकती है । इस मत्तवारणी को लगाने का एक विशेष अभिप्राय भी है । क्योंकि रंगपीठ का रक्षक देवता इन्द्र माना गया है अतएव उसके वाहन ऐरावत की यह प्रतीक है । इसीलिये मत्तवारणी की अधिदेवता विद्युत् नाट्यशास्त्र में मानी गयी है । श्री राव का मत है कि ' उत्सेधेन तयोस्तुल्यम् ' में ' तयोः पद का अर्थ होगा ' मत्तवारणीरंग मण्डपयोः ' । इस प्रकार इस वाक्य का अर्थ होगा-' मत्तवारणी रंगमण्डप के बराबर ऊंचाई से ' । यह ' मत्तवारणी ' एक पङ्क्ति की होगी अतएव यह सामने की ओर दिखाई देने वाली रंगपीठ की एक बाजू है । श्रीराव का यह मत अलंकरण की दृष्टि से भले ही एक उत्तम सुझाव हों किन्तु इससे भरतमुनि के आशय की सुस्पष्ट व्याख्या नहीं होती क्योंकि मत्त-वारणी केवल प्रतीक या नाट्यमण्डप का अलङ्कारमात्र नहीं है । ' मत्तवारणी ' नाट्यशाला में उपयोग के कारण अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है इसी कारण वह रंगपीठ की तथा कभी - कभी रंगपीठ एवं रंगशीर्ष की बाजू में निर्मित की जाती थी जो एक वेदिका पर बनी होती थी । मत्त-वारणी शब्द इसके ऊपरी आकार को भी संकेतित करता है क्योंकि एक वरंडे
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४६ ९ के आकार की बनाकर इसके ऊपरी भाग को हाथी द्वारा ऊँची की गई सूँड के आकार में अम्बारी के समान रखा जा सकता है । श्री भोजराज ने अपने समराङ्गणसूत्रधार में इसके आकार को इस प्रकार निर्देशित किया है: -मुखभद्रं भवेद्युक्तं वेदिका मत्तवारणैः । क्षेत्रभागोदयार्था भूराभूमिफलकान्तरम् ॥ ( राजगृह अध्या ० ३०१ ९ ) [ ऐसी मत्तवारणी से या अम्बारी से वेदिका का भाग सुहाना हो जायगा जो भूमि के एक छोर से उठकर भूमि के दूसरे छोर भाग को आच्छा-दित किये रहती है । ] इसके झुकाव का विवरण भी भोजराज ने वहीं दिया है । तदनुसार- ' यह अम्बारी जितनी बड़ी होगी उसकी ऊँचाई के तीसरे हिस्से के बराबर उसका निकास रखा जाएगा ' । उदाहरण के लिये यदि १२ फुट ऊँची मत्तवारणी बनायी जाती है तो इसके आगे की निकासी या छज्जे को ४ फुट आगे निकला हुआ बनाना चाहिए । ' ( राज ० अध्या ० ३०।१०-११ ) नाट्यप्रयोग के लिये मत्तवारणी आवश्यक एवं उपयोगी अंग ( होती ) है क्योंकि एक अङ्क के अन्तर्गत आनेवाले दृश्यों का कई स्थानों पर अभिनय किया जाता है । यह अभिनय अधिकांश में रंगपीठ पर होता है अतएव जब किसी दूसरे प्रदेश तक जाने की पात्रों की स्थिति आती है तो ऐसे दृश्य में पात्र परिक्रमण करते हुए मत्तवारणी में सजे दृश्य में पहुँचा दिये जाते हैं । इससे स्पष्ट हो जाएगा कि मत्तवारणी वर्तमान प्रचलित पक्षक ( Wings ) नहीं है तथा इसकी नाट्यप्रयोग में उपयोगिता को ध्यान में रख कर ही भरतमुनि ने प्रमाप आदि देकर इतना सुस्पष्ट एवं विस्तीर्ण व्याख्यान किया था । षड्दारुक-७३–७७. रङ्गपीठ की रचना के प्रसङ्ग में ' रङ्गशीर्ष ' का उल्लेख हो चुका था अतः रंगशीर्ष के ' षड्दारुक ' के विषय में यहाँ विचार करना इष्ट है । नेपथ्यगृह की भित्ति के सामने -उससे लगे हुए एक दूसरे से आठ हाथ ही दूरी पर दो खम्भों को खड़ा कर उनके मध्य दो छोटे द्वार बनाने की अपेक्षा से चार हाथ के अन्तर पर अन्य दो खम्भों को खड़ा करते हैं । इनके ऊपर और नीचे दो लकड़ियों को लगाया जाए । इस प्रकार छः काष्ठ खण्डों के रहने से इसे ' षड्दारुक ' कहते हैं । इसका विग्रह होगा - ' यत्र षड् दारूणि
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४७० नाट्यशास्त्रम् तत् ' षड्दारुकं ', संज्ञायां कन् ' अर्थात् जिसमें छः काष्ठ खण्ड लगे हों उसे षड् दारुक कहते हैं । इसमें संज्ञा के अर्थ में ' कन् प्रत्यय ' का विधान करते हुए ' षड्दारुक ' शब्द निष्पन्न किया गया है । इससे नेपथ्यगृह में दो द्वार बनाते जाते हैं एवं इन दो द्वारों में एक दक्षिण तथा दूसरा उत्तर की ओर रखा जाता है । इनका उपयोग अभिनय पूर्ण करने के पश्चात् पात्रों के विश्रामं या प्रतीक्षा के लिए किया जाता है । रिक्त एकाएक सामाजिकों ( प्रेक्षकों ) की दृष्टि से बचने में भी यक होते हैं । इस पर प्राचीन व्याख्याकार नाट्यवर्तिकार हर्ष का निम्न ' पार्श्वद्वयोर्वाधर दारुमण्डितं स्तम्भद्वयोपेतमिह त्रिद्वारकम् । ' इति षड्दारुकम् । अर्थात् किनारों या बाजुओं में दो खम्भे, उनके ऊपर तथा इसके अति-ये द्वार सहा-मत है— नीचे दो लक-ड़ियों से युक्त और बीच में लगे दो खम्भों से युक्त तीन दरवाजे वाली तिदरी को यहाँ ' षड्दारुक ' कहा जाता है, क्योंकि इसमें लगी हुई लकड़ियों की संख्या छः होती है । अन्य ( तीसरे पक्ष के ) व्याख्याकारों का मत है कि दारुकर्म के जो छः प्रकार हैं उन्हें ही षड्दारुक समझना चाहिए जिनको भरतमुनि ने ही आगे दर्शाया है । दारुकर्म के ये छः प्रकार इस प्रकार हैं- ( १ ) कह, ( २ ) प्रत्यूह, ( ३ ) निर्यूह, ( ४ ) सज्जवन, ( ५ ) अनुबन्ध तथा ( ६ ) कुहर । ये ही षड्दारुक हैं । इनके लक्षण क्रमशः दिये जा रहे हैं । ( १ ) ' कह ' कहते हैं स्तम्भ के ऊपरी सिरे से निकला हुआ काष्ठ । ( २ ) ' प्रत्यूह ' का आशय है - तुला या उस काष्ठ के ऊपर का दूसरा खण्ड, जो उससे भी अधिक बाहर निकला हुआ रहे, ( ३ ) ' निर्यूह ' का अर्थ है-तुला से बाहर दो खम्भों के मध्य लगा हुआ चौखट या तख्तों की दीवार । ( ४ ) ' सज्जवन ' कहते हैं — ऊपर की ओर उठे हुए दीवार जैसे लकड़ी के तख्ते को, ( ५ ) ‘ अनुबन्ध ' ऊपर की ओर उभार कर की गयी लकड़ी की खुदाई होती है तथा ( ६ ) ' कुहर ' का अर्थ होता है लकड़ी पर की गयी वह खुदाई जिसे अन्दर गड्ढ को गहरा करते हुए ( कुरेदते हुए ) किया जाता है । ७७-७८. रंगशीर्ष के धरातल पर कछुए की पीठ सा भाग ( अर्थात् चारों ओर से ढलवाँ और बीच में उभरा हुआ भाग ) ' कूर्मपृष्ठ ' कहलाता है ।
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४७१ ' मत्स्यपृष्ठ ' कहते हैं चारों ओर नीचा और बीच में दूर तक उभरा हुआ लम्बा भाग । आशय यही कि इन दोनों प्रकार के धरातल रंगशीर्ष के नहीं रहने चाहिए । ८०-८४. दारुकर्म के छः प्रकार हैं — कह, प्रत्यूह, निर्यूह, सज्जवन, अनु-बन्ध तथा कुहर । इनकी व्याख्या पूर्व में की जा चुकी है । ऊह तथा प्रत्यूह की एक व्याख्या और भी है । ऊह प्रत्यूह का अर्थ यहाँ होगा - ' तर्क में उपयोगी अन्वय का नाम है ' ऊह ' तथा व्यतिरेक का नाम होगा ' प्रत्यूह ' जिन्हें दूसरे शब्द में ऊहापोह भी कह सकते हैं । ८४-८५. प्रतिद्वार अर्थात् अवान्तर द्वार को द्वारविद्ध न करे अर्थात् दोनों दरवाजों का मध्यभाग एक दूसरे के सामने नहीं आने पाए । नागदन्त का अर्थ है खम्भे के ऊपर लगाई जाने वाली खूंटी जिसे पुतली या चित्रादि के टाँगने के लिये लगाया जाए । इसे कुछ शिल्पज्ञ गजमुख कहते हैं । आशय यह कि नागदन्त दीवारों में नहीं लगाये जायें । ८५-८६. आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने द्विभूमि के विषय में अन्य व्याख्या-कारों के कुछ मत दर्शाये हैं । तदनुसार द्विभूमि का प्रथमपक्ष ( १ ) में अर्थ है— दो भूमि अर्थात् रंगपीठ के नीचे और ऊपर की भूमि से युक्त । द्वितीयपक्ष ( २ ) में इसका अर्थ है — मत्तवारणी के बाहर निकले भाग के बराबर दूसरी भित्ति बना कर चारों प्रदक्षिणा मार्ग के समान दूसरी भूमि से युक्त जो होता है वही द्विभुमि कहलाता है । यह द्वितीयपक्ष है । तथा ( ३ ) मण्डप के ऊपर दूसरी मंजिल बनाने पर भी नाट्यमण्डप द्विभूिमि कहलाता है । यह तृतीयपक्ष है । इसके अतिरिक्त कुछ व्याख्याकार मूल में द्विभूमि पद को च्छेद कर ' अद्विभूमि ' पद मानते हैं । इनका मत है कि नाट्यमण्डप में एक ही मंजिल होती है । आचार्य भट्टतोत द्विभूमि पद की वीप्सागर्भ व्याख्या करते हैं । अर्थात् दो - दो प्रकार की भूमि जिसमें हो ऐसा नाट्यमण्डप द्विभूमि होगा । यह इस प्रकार होगा कि भूमि क्रमशः नीची, फिर ऊँची होती हुई रंगपीठ के पास से रंगपीठ के द्वार तक समान ऊँचाई में समाप्त होती है । इस प्रकार की भूमि रहने से प्रेक्षकों की एक दूसरे की आड़ नहीं आती और न एक दूसरे को ढँक सकता है । इसके अतिरिक्त इसका आकार पर्वतगुहा सदृश हो जाता है । जिससे शब्द बाहर नहीं जाता और जाली आदि बना कर वातायन की न्यूनता भी इसमें बनी रहती है ।