भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 601–610
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 601–610
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४७२ नाट्यशास्त्रम् इस प्रकार द्विभूमि नाट्यमण्डप होने पर गीत ( तथा वाद्यों में ) विद्य-मान स्वरों की गम्भीरता नाट्यमण्डप में घूम कर एक दूसरे की प्रतिध्वनि को उत्पन्न कर भर जाने के कारण हो जाती है । ' कुतप ' शब्द का अर्थ है गायक एवं वादक वर्ग । इसकी व्युत्पत्ति है -' कुन टियभूमिस्तां तपत्युज्ज्वलयतीति कृत्वा कुतुपः ' अर्थात् जो नाट्यभूमि को उज्ज्वल या सुशोभित करे उसे ' कुतुप ' कहा जाता है । इसकी अन्यत्युत्पत्ति है — ' कुतं शब्दं पातीति कुतपः ' अर्थात् जो शब्दों की रक्षा करता हो । ९ १ - ९ २. यद्यपि विकृष्ट नाट्यमण्डप के वर्णन से चतुरस्र नाट्यमण्डप का भी अनुमान सम्भव हो सकता है फिर भी विस्पष्ट कथन के उद्देश्य से मुनि ने इसका ' पुनरेव ' इत्यादि से अलग विवरण दिया है । इसके अतिरिक्त चतु-मण्डप के लक्षण के बिना विकृष्ट नाट्यमण्डप के स्तम्भविभाग एवं प्रेक्ष-कादि की उपवेशन - भूमि व्यवस्था आदि का समग्रतया बोध भी सम्भव नहीं है । इस कारण चतुरस्र नाट्यमण्डप का पृथक् सुस्पष्ट लक्षण देना आवश्यक है । विकृष्ट नाट्यमण्डप के लक्षण में मुनि ने स्तम्भों एवं रंगयोजना ( या प्रेक्षकों को बैठने के उपयुक्त भूभाग की व्यवस्था ) को चतुरस्र नाट्यमण्डप के समान समझने का उल्लेख किया है; अतएव विकृष्ट के लक्षण को पूर्ण करने के लिये भी चतुरस्र का लक्षण बतलाना आवश्यक है इस तथ्य को मूल-कारिका के ' पुनः ' शब्द से यहाँ सूचित किया गया है । ' समन्ततः ' का आशय है कि चारों दिशाओं में बत्तीस - बत्तीस हाथ के प्रमाण वाला वर्गाकार ( चौकोर ) नाटघमण्डप का निर्माण किया जाए । ९ ३. ' प्रविभज्य च ' का अर्थ है पूर्ववत् ३२४ ३२ हाथ के प्रमाण को नाप कर इस प्रकार पूर्ववर्णित विकृष्ट नाटघमण्डप के विधानानुसार ही आरम्भ से लेकर विभागानुसार सभी कार्य सम्पन्न किये जाएँ तथा बाहर की ओर पक्की ईंटों की दीवारें बनवा दी जाएँ । ९ ४. इसके उपरान्त जिन स्तम्भों को ( नाट्यमण्डप ) भीतर लगाना है उनका विधान इस कारिका से बतलाया गया है । तदनुसार चतुरस्रनाट्य-` मण्डप के ३२ × ३२ हाथ के भूक्षेत्र को चारों ओर से आठ - आठ विभागों में विभक्त करना चाहिए जिससे शतरंज या चौपड़ के फलक के समान चौसठ कोठों का एक क्षेत्र तैयार हो । इसमें बीच के कोठों में चारों ओर से आठ-आठ हाथ प्रमाण वाला रङ्गपीठ बनाया जाए । इसके पश्चिम की ओर पूर्व-पश्चिम बारह हाथ का एवं उत्तर - दक्षिण बत्तीस हाथ का क्षेत्र बचेगा । इसमें रंगपीठ के अन्दर समाविष्ट भाग आठ हाथ का होगा । पश्चिम की ओर जो बारह हाथ का ( अर्थात् १२४३२ हाथ का ) क्षेत्र बचेगा, उसमें से रङ्गपीठ
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४७३ का समीपवर्ती - पूर्व पश्चिम चार हाथ और चौड़ाई में बत्तीस हाथ क्षेत्र को लेकर उस पर रङ्गपीठ से पश्चिम की ओर उतने ही प्रमाण वाले ( अर्थात् ४ x ३२ हाथ के ) षड्दारुक समन्वित रङ्गपीठ की रचना करना चाहिये तथा इससे पश्चिम में बचे हुये भाग पर ( अर्थात् ८ x ३२ हाथ के क्षेत्र पर ) नेपथ्यगृह का निर्माण करना चाहिये । इस प्रकार जब रंगपीठ, रंगशीर्ष तथा नेपथ्यगृह का निर्माण हो जाए तो रंगपीठ को लक्ष्य केन्द्र मान कर बड़दारुक स्तम्भों के अतिरिक्त ( आगे बत-लाये गये ) विधानानुसार दस स्तम्भ लगाना चाहिए । इनका विभाजन इस प्रकार है — पहिले चार स्तम्भ रंगपीठ के चारों कोनों में लगाये जाएँ । इसके पश्चात् आग्नेयकोण के स्तम्भ से चार हाथ की दूरी पर दक्षिण की ओर एक स्तम्भ लगाना चाहिये । इसी प्रकार नैर्ऋत्य कोण के स्तम्भ से भी चार हाथ की दूरी पर दक्षिण की ओर दूसरा स्तम्भ लगाया जाए । [ फिर ईशान कोण के स्तम्भ से चार हाथ दूरी पर उत्तर की ओर एक स्तम्भ तथा वायव्य कोण के स्तम्भ से चार हाथ की दूरी पर दूसरा इसी प्रकार स्तम्भ लगाया जाए । ] तब पूर्वभाग के ईशान और आग्नेय कोण के स्तम्भों से चार हाथ की दूरी पर पूर्व की ओर दो स्तम्भ ओर लगाये जाते हैं । इस प्रकार कुल मिलाकर कोणों में लगने वाले छः स्तम्भ हो जाते हैं । इनमें यदि रंगपीठ के चारों कोनों में लगने वाले चार स्तम्भों को और जोड़ दें तो सब मिलाकर स्तम्भों की संख्या दस हो जाती है । ये दस स्तम्भ रङ्गपीठ पर लगाये जाते हैं । ९ ५ - ९ ६. इन दस स्तम्भों के बाहर की ओर दर्शकों के [ सामाजिकों के ] बैठने के लिये आसन बनाना चाहिये जो लकड़ी और ईटों से सोपानबद्ध आकृति में बनाये जाते हैं । ये आसन स्तम्भों के बाहर रहते हैं क्योंकि उनके समीप रहने पर देखने में रुकावट आती है । यहाँ ' रङ्गपीठावलोक्यम् ' पद से इसी तथ्य की ओर संकेत किया गया गया है । इसकी व्याख्या है-' रङ्गपीठावलोकने साधु भूतं रङ्गपीठावलोक्यम् ' । इससे भी नाटयमण्डप के द्विमित्व का समर्थन होता है । ९ ७. बीच में लगनेवाले अन्य स्तम्भों का इस कारिका में विवरण दिया गया है । इनका क्रम यह है— रङ्गपीठ के दक्षिण में लगाये गये दो स्तम्भों से चार हाथ के अन्तर पर एवं एक दूसरे आठ हाथ के अन्तर पर दो स्तम्भ, दक्षिण पूर्व के आग्नेय कोण के स्तम्भ के सामने आने वाले पूर्व स्तम्भ में चार हाथ की दूरी पर दक्षिण की ओर दक्षिण स्तम्भ लगाते हैं । इसी प्रकार पूर्व स्थापित दस स्तम्भों में से दक्षिण की ओर स्तम्भों एवं दक्षिण की भित्ति के मध्य भाग में तीन स्तम्भ लगते हैं । इसी प्रकार उत्तर की ओर भी तीन
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४७४ नाट्यशास्त्रम् स्तम्भ लगाये जाते हैं जो सब मिला कर मध्यभाग में लगने वाले छः स्तम्भ हो जाते हैं । ९ ८. इसके पश्चात् आठ स्तम्भ और लगाते हैं । इनका योजना क्रम इस प्रकार है— दक्षिणभित्ति के उत्तरभाग की ओर चार हाथ के अन्तर पर एक स्तम्भ पूर्व में लगाया जाता है । यह उत्तर की ओर पूर्व स्थापित छः स्तम्भों में से तृतीय स्तम्भ से एवं दक्षिणभित्ति से ( भी ) चार हाथ के अन्तर पर होता है । इसी प्रकार उत्तरभित्ति से दक्षिणभाग की ओर भी चार हाथ के अन्तर पर एक स्तम्भ लगाएँ । इसके बाद पूर्व की भित्ति से चार हाथ की दूरी पर रंगमञ्च के विभागों को मान कर तदनुसार दो स्तम्भ और फिर इन से भी प्रत्येक से चार - चार हाथ के अन्तर पर दो - दो स्तम्भ ( अर्थात् ४ स्तम्भ ) लगाते हैं । इस प्रकार सब मिलाकर ( १ + १ + २ + ४ = ८ ) आठ स्तम्भ हो जाते हैं । ' विद्वास्य ' - पद की व्याख्या है - ' विद्वामास्यं मुखं यस्य तत् ' अर्थात् जिनके मुख विधने के कारण एक दूसरे के अन्दर घुसे हुये रहते हों । इस प्रकार के आठ - आठ हाथ वाले शहतीरों को- जिन पर कलात्मक विधान में पद्म आदि उत्कीर्ण किये हों इन स्तम्भों पर स्थापित कर दे और इन शह तीरों के मुखों के जोड़ पर एक हाथ के प्रमाण की धारिणी - अर्थात् तुलाओं को रोकने वाले स्तम्भों को सहारा देनेवाले काष्ठखण्डों को ऊपर स्थापित करते हैं । चतुरस्रमण्डप का यही स्तम्भ विधान है । इसी विधान को विकृष्ट तथा त्र्यश्र नाट्यमण्डपों पर भी विचार कर ठीक से लागू करना चाहिए । उपर्युक्त मान्यता नाट्यशास्त्र के प्राचीन व्याख्याकार श्री शंकुक की है । भट्ट लोल्लट आदि अन्य व्याख्याकारों का मत है कि ये आठ स्तम्भ नेपथ्यगृह में लगाए जाते हैं । इसके अतिरिक्त नाटयशास्त्र के वार्तिककार ( हर्ष ) ने इन स्तम्भों की व्यवस्था का निम्न क्रम बतलाया है
अन्तर्नेपथ्यगृहं स्तम्भो द्वो पीठगाश्च चत्वारः ।
परितोऽन्ये चत्वारो दशैवमुक्ता भवन्त्येते ॥ क ॥
चत्वारः पाश्वभ्यां पश्चादप्रे च याविह द्वौ द्वौ ।
ते चाप्यष्टावन्ये ह्मपरि निवेश्या य उद्दिष्टाः ॥ ख ॥।
षट् सान्तरास्तथान्ये कार्या इति भवति शास्त्रतात्पर्यम् ।
दत्तोऽन्यथा क्रमस्तेषां वा कश्विदेवं भवेदत्र ॥ ग ॥
भित्तेः स्तम्भानाञ्च स्यादन्तरमष्टहस्तमेवान्ते ।
तैरुत्क्षिप्तः स्यादिह चाधारो ह्युपरि काष्ठासु ॥ च ॥
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४७५ पूर्ववर्णित दस स्तम्भों में से दो स्तम्भ नेपथ्यगृह में, चार स्तम्भ रङ्गपीठ स्तम्भ रङ्गपीठ की दोनों बाजुओं में प्रत्येक आठ - आठ पर तथा शेष चार । ( इस प्रकार कारिका २२६७ में कहे - हाथ की दूरी पर लगाए जाने चाहिए गये दस स्तम्भों की स्थापना की गयी ) | ( क ) आठ स्तम्भों में से चार स्तम्भ रङ्गपीठ के पावों में रङ्ग-इसके पश्चात् पीछे दो - दो स्तम्भ प्रत्येक ओर लगाये जाते हैं । ( इस पीठ के आगे और स्तम्भ की विधि हो गयी ) । ( ख ) प्रकार कारिका २१८ के अनुसार आठ उपरान्त शेष स्थानों पर आवश्यकता एवं अवसर का विचार इसके छः स्तम्भ और लगाना चाहिये । परन्तु इसके अति-करते हुए शास्त्रानुसार क्रम में भी इन्हें रखा जा सकता है । ( ग ) रिक्त तर्कसम्मत अन्य प्रत्येक स्थिति में भित्ति से स्तम्भों का अन्तर अधिक से अधिक किन्तु का रहना चाहिये ( और कम से कम चार हाथ भी रह सकता आठ हाथ है ) । इस प्रकार स्तम्भों को स्थापित करने से ऊपर की ओर काष्ठाच्छादन या छत के लिये ठीक आधार प्राप्त हो जाता है । ( घ ) स्तम्भविषयक व्यवस्था में इस प्रकार इन आचार्यों के विविध मत प्राप्त हैं । इस विषय में उपाध्याय भट्ट तौत ने तात्विक विश्लेषण करते हुये होते कि प्रेक्षागृह के तीन विभाग होते हैं— अधोभूमि, रङ्गपीठ तथा बतलाया सहित ] नेपथ्य । स्तम्भों का विभाजन इन्हीं विभागों में स्तम्भ [ रङ्गपीठ गया है । तदनुसार ' तत्राभ्यन्तरतः ' इत्यादि के द्वारा अधो-. स्थापनार्थं किया भूमि ( सामाजिकों के बैठने के स्थान ) में दस स्तम्भ लगाते हैं । इनका क्रम यह है कि बत्तीस हाथ की चौड़ाई में दोनों भित्तियों से एवं एक दूसरे से चार हाथ की दूरी पर दो - दो स्तम्भ लगाये जाते हैं । इस प्रकार दोनों चार की दीवारों के पास चार स्तम्भ हुए । फिर इन्हीं भित्तियों में आठ - आठ हाथ ओर की दूरी पर दो - दो स्तम्भ और लगाए जाएँ जो चार होंगें । इस प्रकार सब मिलाकर आठ स्तम्भ हो जाएंगे । इन स्तम्भों को लगाते समय एवं इनका एक दूसरे से अन्तर रखते समय ( भी ) यह ध्यान रहना चाहिये कि इनमें से कोई स्तम्भ किसी द्वार के सामने न आने पाए । इस प्रकार पूर्व अभिहित दस स्तम्भों में से आठ स्तम्भ लग जाने पर दो स्तम्भ रङ्गपीठ के पूर्वभाग की ओर लगे हुये दोनों स्तम्भों की बाजू में एक दूसरे से आठ हाथ की दूरी पर लगा दिये जाएं । अब इस प्रकार दोनों ओर पांच - पांच स्तम्भ हो जाएंगे ।
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४७६ नाट्यशास्त्रम् रङ्गपीठोपरिस्थिताः ' में विद्यमान उपरि शब्द का अर्थ सम्मुख लेना चाहिये ( अर्थात् रङ्गपीठ के सम्मुख ) । आशय यह है कि रङ्गपीठ को छोड़ कर उसके अगले भाग अर्थात् अधोभूमि में ये दस स्तम्भ लगाये जाने चाहिये । तब फिर बची हुई भूमि में प्रेक्षकों के उपवेशनार्थ आसनों की व्यवस्था करनी चाहिये । इसके पश्चात् रङ्गपीठ पर छः स्तम्भ लगाये जाते हैं । ये बत्तीस हाथ की लम्बाई में रङ्गपीठ के पूर्व दिशा वाले दोनों कोणों पर दो स्तम्भ तथा उसके समीप उत्तर दक्षिण में आठ - आठ हाथ के अन्तर पर दो स्तम्भ और लगते हैं । इस प्रकार सब मिला कर आठ - आठ हाथ की दूरी पर चार स्तम्भ हो जाते हैं । इसके बाद अधोभूमि में रङ्गपीठ के कोनों पर स्थित दोनों स्तम्भों से पूर्व की ओर आठ - आठ हाथ के अन्तर पर दो स्तम्भ लगाये जाते हैं । इस प्रकार आठ - आठ हाथ के अन्तर पर छः स्तम्भ लगते हैं । इसके उपरान्त रङ्गपीठ के पीछे रङ्गशीर्ष का ( बारह हाथ चौड़ा एवं बत्तीस हाथ लम्बा ) भाग बचता है । उनका चार हाथ चौड़ा तथा बत्तीस हाथ लम्बा जो भाग होगा उस पर दो तुलाएँ डालना चाहिये और प्रत्येक के नीचे आठ - आठ हाथ के अन्तर पर चार स्तम्भ लगाना चाहिये । ये आठ स्तम्भ रङ्ग शीर्ष पर लगाये जाते हैं जिनका मुनि ने ' अष्टौ स्तम्भान् पुनश्चैव ' ( ना ० शा ० २६८ ) के द्वारा निर्देश किया है । अतएव रङ्गशीर्ष पर ये आठ स्तम्भ नियमतः लगाये जाने चाहिये । १००. अधोभूमि, रङ्गपीठ तथा रङ्गशीर्ष पर स्तम्भों के लगाने के पश्चात् प्रेक्षागृह के ३२८ हाथ वाले अवशिष्ट भूभाग पर जो नेपथ्यगृह है तथा जहाँ से रङ्गपीठ पर पात्रों का प्रवेश होता है, उस कक्ष्या विभाग में दो द्वार रखे जाते हैं । इन दो द्वारों को मुनि ने काक्ष्या विभाग अध्याय में बतलाया भी है । अतएव द्वार शब्द को जातिपरक मान कर यहाँ एकवचन में प्रयुक्त समझना चाहिए । इसके अतिरिक्त द्वार का ' एकम् ' विशेषण भी वर्गीकरण के लिये ही यहां प्रयुक्त किया गया है । १०१. नेपथ्यगृह में रखा गया एक अन्य ( तीसरा ) द्वार पात्रों के प्रवे-शार्थ रखा जाता है जिससे सूत्रधार तथा इसकी भार्या आदि पात्रों का प्रवेश होता है । इसके अतिरिक्त मुख्य द्वार के रूप में चौथा द्वार प्रेक्षकों के प्रवेश के लिये ( प्रेक्षागृह के ) सामने की ओर बनाते हैं । यहाँ सामने शब्द का अर्थ
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ४७७ है पूर्व दिशा में । जैसा कि कक्षाध्याय ( ना ० शा ० अ ० १३ ) में बतलाया गया है कि नेपथ्यगृह के सामने पड़नेवाला द्वार पूर्वद्वार कहलाता है । इस प्रकार सब मिला कर [ दो द्वार वाद्यवादकों के प्रवेशार्थ, एक पात्रों के प्रवेशार्थ तथा एक मुख्य द्वार सामाजिकों के प्रवेशार्थं ] चार द्वार हो जाते हैं । अन्य आचार्यों का मत है कि दो द्वार वाद्यवादकों के प्रवेशार्थं, दो द्वार पात्रों एवं प्रेक्षकों के प्रवेशार्थ उपर्युक्त विधानानुसार रखने के अतिरिक्त प्रकाश एवं वायु के लिये दो द्वार अगल - बगल में भी रखे जाएं । इस प्रकार नाट्यगृह में छः द्वार रहने चाहिये । १०४. ' समुन्नत ' का आशय है कि रङ्गपीठ की अपेक्षा ऊंचाई पर विकृष्ट नाट्यमण्डप में रङ्गशीर्ष बनाया जाए ( क्योंकि चतुरस्र में रङ्गशीषं समतल होता है ) । इससे यह भी सूचित होता है कि विकृष्ट नाट्यमण्डप में चतुरस्र के क्रम में कहे गये स्तम्भों की संख्या को भी दुगुना कर देना चाहिये । यही दोनों में अन्तर है । १०५-१०६. इस स्थान पर मूल में प्रयुक्त त्र्यश्र पद लक्ष्य तथा ' त्रिकोण ' पद लक्षण है । क्योंकि यह नाट्यमण्डप पूर्वोक्त दोनों नाट्यमण्डपों से सम्बन्ध रखता है । अतएव इसका मान दोनों नाट्यमण्डपों के अनुसार [ अर्थात् त्र्यश्र नाट्यमण्डप का प्रत्येक भुजा का आकार ६४ हाथ या ३२ हाथ का ] रखा जाए । इनके बीच में रङ्गपीठ त्रिकोणात्मक आकारवाला तथा रङ्गशीषं तथा नेपथ्यगृह भी त्रिकोण ही रखे जाते हैं । १०७, इस नाट्यमण्डप का द्वार भी विकृष्ट तथा चतुरस्र नाट्यमण्डपों के ' समान पूर्व दिशा में कोण पर निर्मित किया जाए । यह द्वार प्रेक्षकों के प्रवे-शार्थं रहता है । रङ्गपीठ के पिछले भाग में विद्यमान रङ्गशीर्ष में दूसरे द्वार बनाये जाएँ । यहाँ भी पूर्ववत् जातिविवक्षा में द्वार शब्द का एकवचन में प्रयोग किया गया है । अतएव नेपथ्यगृह से प्रवेश करने वाले पात्रों के प्रवेशार्थं रङ्गशीर्षं तथा नेपथ्यगृह के मध्य दो द्वार ही बनाये जाते हैं । मूल में प्रयुक्त ' च ' शब्द से पात्रों के प्रवेशार्थं द्वार निर्माण करना समझना चाहिये । इस प्रकार त्र्यस्त्र नाट्यमण्डप में कुल तीन द्वार ही बनेंगे । १०८. यहाँ प्रयुक्त ' सर्व ' पद से चतुरस्र नाट्यमण्डप की अपेक्षा न्यूना-धिक्य न होना सूचित किया गया है क्योंकि विकृष्ट नाट्यमण्डप में स्तम्भों की द्विगुणता या आधिक्य बतलाया गया है । त्र्यश्र नाट्यमण्डप में प्रतिरङ्ग
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४७८ नाव्यशास्त्रम् रङ्गशीर्ष में दो द्वार बनाये जाएँ । ये रङ्गशीर्ष के पीछे तथा उसके अर्थात् दोनों ओर बनाये जा सकते हैं । १० ९. इस प्रकार नाट्यमण्डपों के इन अठारह प्रकारों के समझ लेने पर अनेक प्रकार के नाट्यमण्डप बनाये जा सकते हैं । यहाँ आवश्यकतानुसार करते हुये नाट्यमण्डप का निर्माण करवाने वाले चतुर एवं बुधैः पद ऊहापोह शिल्पशास्त्र - विज्ञाताओं के लिये प्रयुक्त किया गया है । -000000-B Preg
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तृतीय अध्याय १. नवनाटघमण्डप के निर्माण होने पर देवगण का अर्चन क्रम प्राप्त है । तथा आवश्यक भी । प्रथम अध्याय में स्वयं भरतमुनि ने अर्चनविधि सम्पन्न करने का निर्देश किया था अतएव उसका निरूपण करना ही प्रस्तुत अध्याय की संगति है जो प्रयोग के क्रम को ध्यान में रखते हुये स्थापित की गयी है । इसके अतिरिक्त मण्डप विधान के अनन्तर इसका विवरण आवश्यक होने के कारण भी यहाँ रखा गया है क्योंकि देवपूजन के बिना नाट्यप्रयोग को प्रस्तुत करना अभीष्ट नहीं है । यहाँ ' जप्यपर ' पद के द्वारा ब्राह्मणों से ' रक्षोघ्नमन्त्र ' का जप करवाना संकेतित किया गया है । २. ' अधिवासन ' शब्द का आशय है देवगण को नवनिर्मित नाटय भवन में निवासार्थ आमन्त्रित करना । १७. ' उद्योतन ' यहाँ पर्यग्निकरण विधि को संकेतित करता है । अर्थात् जलते हुये दर्भों या समिधा से रङ्गमश्च पर प्रकाश करना । यह एक धार्मिक विधि है । १ ९. ' प्रतिसर ' शब्द का अर्थ है सूत से निर्मित कंकण का बाँधना । आज भी यह प्रथा विद्यमान है । २४. ' प्रयुक्त ' शब्द से सर्व प्रथम ईशान कोण में भगवान् शिव की स्थापना करने का संकेत किया गया है । इसके उपरान्त क्रमशः दिशाओं में देवगण की विधिवत् स्थापना करनी चाहिये । ४३. ' उत्कारिक ' शब्द का अर्थ है मीठा पदार्थ जो लपसी या हलवा जैसा हो । ९९ -१००. देवगण के पूजन का उद्देश्य है प्रयोग में सम्भावित अनर्थ बाधा या असफलता का दूर होना । मुनि ने इसकी अनिवार्यता भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के कारण साग्रह बतलाई है । पूजन के अभाव में नाट्याचार्य के सम्पूर्ण श्रम के व्यर्थं होने की भी आशंका है तथा नाट्यप्रयोग में इस त्रुटि के कारण घातक परिणाम भी निकल सकते है । यहाँ इसी का संकेत किया गया है । १०३. यद्यपि नवनाट्यमण्डप निर्माण के समय ही इन निद्दिष्ट देवगण का पूजन करना चाहिये किन्तु कुछ आचार्य प्रत्येक प्रेक्षा या नाट्यप्रयोग के आरम्भ के अवसर पर भी इस पूजन - विधान को आवश्यक मानते हैं ।
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चतुर्थ अध्याय १. पूजन के उपरान्त नाट्यप्रयोग के प्रस्तुत करने में विलम्ब करना अभीष्ट नहीं होता, यह अर्थ ' क्षिप्र ' पद से मूल में दर्शाया गया है । यद्यपि सम्फेट, विद्रव आदि से युक्त प्रस्तावना को ही पहिले प्रस्तुत किया गया था परन्तु विघ्नों के द्वारा बीच में ही रुकावट उत्पन्न कर देने के कारण नाट्य-मण्डप का निर्माण कर विघ्नों की सान्त्वना के साथ ही नाट्यमण्डप के अधि-रक्षक देवताओं की स्थापना की गयी । इस प्रकार जब विघ्नों का कारी हो गया तो प्रयोग के प्रस्तुत करने में विलम्ब की आवश्यकता क्यों निराकरण । आशय यह कि प्रयोग का प्रस्तुतीकरण अब शीघ्र होना चाहिये । हो २-४. भरतमुनि ने ' अमृतमन्थन ' जैसी वीररसप्रधान पुराकथा को लोक-प्रसिद्ध आख्यान के रूप में रखा है । इस समवकार में चारों प्रकार के नायकों नामक स्थायीभाव से निष्पन्न वीररस की प्रमुखता है । इसी कारण के उत्साह चर्वणा को निष्पन्न करने में यह देव आदि सभी दर्शकों की रसास्वादनात्मा सक्षम प्रयोग होकर सर्वप्रथम प्रस्तुत किया गया था । ५-८. नाट्यप्रयोग के इतिवृत्तात्मक विवरण को प्रस्तुत करने के उप-कैशिकीवृत्ति के आत्मस्वरूप नृत्तप्रयोग का नाट्य के साथ प्रस्तुतीकरण रान्त के लिये मुनि ने पुनः उसकी पुराकथा के साथ विवृत्ति प्रस्तुत की । बतलाने यहाँ ' फिर किसी समय ' से आशय है जितना समय शिक्षणकाल में बीत चुका पश्चात् । ब्रह्मा का महेश्वर के समीप नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करने के हो उसके स्वयं पहुँचने का अर्थ है प्रयोग को सर्वप्रथम शास्त्रविद् पुरुषों के सम्मुख लिये लिये जाएं जिससे प्रयोग परिकृत होकर समाज में प्रस्तुत कर उनसे परामर्श में व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया जा सके । इसके अतिरिक्त मूल प्रयुक्त ' सन्दर्शयामः ' पद से प्रयोक्ता और कवि के मध्यवर्ती समीक्षक के रहने की सूचना मिलती है । ९ -१०. यहाँ ' अयम् ' पद से अमृतमन्थन समवकार जैसे नाट्यप्रयोग को संकेतित है । इसके अतिरिक्त शिव के उद्धत चरित्र को लेकर प्रस्तुत करना डिम के प्रयोग से परीक्षक की सन्तुष्टि को प्रस्तुत किये गये त्रिपुरदाह नामक हुये नृत्यप्रयोग की पृष्ठभूमि तैयार की गयी है । दिखलाते १३-१६. यहाँ आशय यह है कि भरतमुनि ने अन्तर्यवनिका में होनेवाले से लेकर जिन नौ अङ्कों का तथा गीतविधान से लेकर प्ररोचना तक प्रत्याहार
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४८१ के दस अङ्गों का ब्रह्माजी से जो ज्ञान प्राप्त किया था उन अङ्गों से युक्त पूर्व-रङ्ग को वैचित्र्यहीन होने के कारण शुद्ध माना जाता था । किन्तु नाट्या-भिनय के साथ जब विनियोग सहित अङ्गहारों के साथ नृत्त की उसमें योजना हो गयी तो इस नृत्तादि से सम्पन्न ( समृद्ध? ) होकर यही प्रयोग विचित्रता या चित्रत्व सम्पन्न हो गया । इस प्रकार के प्रयोग के लिये वाञ्छित प्रदेश जब पूर्वरङ्ग था ही तब इस प्रक्रिया का अनुसरण करते हुये जब करण और अङ्गहारों से विभूषित सुकुमार एवं उद्धत नृत्तप्रयोग प्रस्तुत किये गये तो इसी का चित्र नामकरण हो गया! शुद्ध पूर्वरङ्ग केवल कर्तव्यमात्र होने से प्रस्तुत किया जाता था जिसका दृष्टफल तो था ही अदृष्टफल भी उतना ही माना जाता था । इस प्रकार यह दो प्रयोजन वाला होकर भी रंजक नहीं था क्योंकि इसमें शुष्क विधानों की भरमार थी । तब दोनों प्रयोजन का निर्वाह करते हुये नृत्त की भी इसमें योजना की गयी क्योंकि नृत्त दृष्टादृष्ट फल भी देता है और विचित्रता उत्पन्न करने के कारण रंजक भी होता है । अतएव पूर्वरङ्ग के उद्धत प्रयोग में महे-श्वरप्रयुक्त अङ्गहारों और सुकुमार प्रयोग में अनुद्धत अङ्गहारों से युक्त नृत्त का विधान किया गया । क्योंकि नृत्तप्रयोग की फलवत्ता अङ्गहारों के द्वारा ही होती है जिनके करण अङ्ग है । इसके अतिरिक्त गीतक, वर्धमानक आदि में और वाक्यार्थाभिनय में भी यथायोग्य दशा को ध्यान में रख कर अङ्गहार एवं पिण्डीबन्ध आदि का प्रयोग ( अभिनीत या ) प्रस्तुत किया जा सकता है । इसे ' सम्यगेवाभिनेति ' पद के द्वारा सूचित करते हुये उपर्युक्त तथ्य को निर्देशित किया है । १६- १ ९. भरतमुनि ने महेश्वर के प्रसाद की पुराकथा देकर अपनी अधिकारिता के साथ अभिनय के प्रस्तुतीकरण का रोचक - इतिवृत्त भी निदर्शित किया है । ' तण्डु ' ने अङ्गहार आदि का भरत को प्रयोग सहित ज्ञान करवाया था इसलिये अङ्गहारादि से युक्त इस नृत्त प्रयोग का नाम ' ताण्डव ' हो गया । यहाँ तण्डु शब्द नन्दी या नन्दिकेश्वर के लिये और मुनि शब्द भरत-मुनि के लिये प्रयुक्त है । नृत्त में अङ्गहारों की प्रमुखता रहती है इसी कारण उद्देश्यपूर्वक अङ्गहारों का प्रथम उल्लेख किया गया किन्तु करणों का समुदाय अङ्गहार होता है अतएव बिना करणों के अङ्गहारों का बोध ठीक से नहीं हो सकता इसलिये अङ्गभूत करणों का नामतः उद्देश्य कथन कर उनके ही लक्षण यहाँ सर्वप्रथम बतलाये जाएँगे । अङ्गहार बत्तीस हैं । वैसे अङ्गहारों की अनन्तता है फिर भी इतने प्रभेद प्रमुख एवं प्रसिद्ध हैं और परम्परा से इनके प्रयोग होते रहे हैं इसी कारण यहाँ इनका उद्देश्यकथन कर लक्षण भी दिया गया । ३१ ना ० शा ० प्र ०