भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 611–620

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 611–620

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४८२ नाट्यशास्त्र २८-३३. करणों के समूहों को निदर्शित कर अङ्गहारों का प्रयोग किया जाता है इनमें जब एक करण के साथ लगे हुये दूसरे करण को प्रस्तुत किया जाता है तब हस्त, पाद आदि अङ्गों को एक साथ विधिवत् न्यस्त कर प्रयोग करते हैं । मुनि ने इस प्रकार प्रयुक्त इन करणों को भी बतलाने का संकेत प्रस्तुत है जिसका आशय है कि कभी - कभी इन प्रयोगों को ऊह या तर्क के द्वारा किया चाहिये । यही आशय ' च ' शब्द द्वारा संकेतित किया गया है । भी समझना के हस्त पादादि की जो क्रिया विलासपूर्ण प्रकार से बिना रसविच्छेद की जाती है उसका पूर्ण नाम है ' नृत्तकरण ' । व्यवहार में इसे पूरा न प्रस्तुत एक करण को ही अभिहित किया जाता है । जैसे भीमसेन कहते हुये इसके को ' भीम ' कहना । के एकाधिक अङ्गहारों की विशिष्टता के बोधार्थ उनसे सम्बंध करणों बतलाये गये हैं । नृतमातृका का अर्थ है नृत्त से उत्पन्न करने में जो मेल करणों के मेल से ही नृत्त का निर्माण होता है जो करणीभूत हैं । एकाधिक संख्यागत आधिक्य के होने पर देर तक चलते हुए स्पष्टरूप प्राप्त करता जाता है । इस प्रकार ( यहाँ सर्वत्र ) दो से अधिक संख्या का मेल ही वाञ्छित है जिसे ' एव ' शब्द से संकेतित किया गया है । ये तीन करणों के मेल वाले • कलापक भेद से लेकर नवकरणों के भेद संघातक तक बनते हैं और इस प्रकार बनाकर अङ्गहारों का निर्माण करते हैं । समुदाय यहाँ यह एक आशंका अवश्य उत्पन्न होती है कि जब इस अध्याय में करणों के लक्षण बतलाये गये तो उसके भी आधार या अङ्ग स्वरूप स्थान, चारी आदि के स्वरूप भी करणों के पूर्व ही बतलाना चाहिये था । इसका उत्तर यही है कि जब तण्डु से मुनि ने ताण्डव का ज्ञान प्राप्त किया तब मुनि को चारी, स्थान तथा हस्ताभिनय का ज्ञान प्राप्त था और तण्डु से केवल करण एवं अंगहारों की ही प्राप्ति होने के कारण उन्हें यहाँ सलक्षण बतला दिया गया ( और अन्य अभिनयों का मुनि ने अपने उद्दिष्ट अध्यायों में आङ्गिक अभिनय के अन्तर्गत लक्षण सहित यथावसर ही निरूपण किया ) । ३४-५५. करणों की संख्या १०८ है जिनके क्रमशः नाम यहाँ विवरण सहित उल्लिखित है । होने से ही यहाँ गति, तथा प्रचार आदि का ५६-६०. करणों के सहायक अंग ( भूत ) स्वरूप में निरूपण किया गया है परन्तु अभिनयादि में गति में विनियोजना भी की जाती है और इनका प्रयोग भी आदि की स्वतन्त्ररूप होता है । इसी कारण यहाँ गति, परिक्रम आदि का मुनि ने उल्लेखमात्र किया है परन्तु गति आदि के अन्यत्र उद्देश्यक्रमप्राप्त अध्यायों में ही ) पृथक् एवं सम्पूर्ण लक्षण दिये गये हैं ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४८३ करण— स्थिति ( अवस्थान या खड़े होने की दशा ) और गति ( अर्थात् पैरों की चाल ) जैसे दो तत्वों के आधार पर करण प्रवृत्त हुआ है । इनमें भी अवस्थान दशा में स्थानों और गति में चारियों का प्रयोग होता है । इनमें शरीर के ऊपरी भाग या अङ्ग और गति में नृत्तहस्त एवं दृष्टियों का तथा स्थिति में पताक आदि हस्तों का प्रयोग वाञ्छित होता है इस कारण यद्यपि गति और स्थिति के सम्मिलित रूप को करण माना गया है परन्तु अङ्गहारों के निर्माण में करणों का विनियोजन शास्त्र एवं परम्परासंगत है । इसी कारण मान्य करणों की संख्या १०८ है यद्यपि इनके गति और स्थिति के आधार पर असीम भेद किये जा सकते हैं । ( १ ) तलपुष्पपुर ६०-६२. इस करण में हाथ पुष्पपुट मुद्रा ( ना ० शा ० ६।१५० ) में रहता है और पैर अग्रतलसंचर ( ना ० शा ० १०।४८ ) रखा जाता है । इसमें पार्श्व ( कोख ) को सन्नत ( ना ० शा ० १०।१२ ) रखते हैं और पुष्पपुटहस्त को उन्नत उरोदेश से संशिलिष्ट कर स्थापित करते हैं । इस करण में पुष्पपुद हस्त और अग्रतलसंचर पाद के मेल के एक भाग की सूचना देने से इसका नाम भी ' तलपुष्पपुट ' रखा गया है । इसकी योजना पुष्पाञ्जलि विकीर्ण करने एवं लज्जा भाव के अभिनय में की जाती है । ( २ ) वर्तित ६२-६३. इस करण में तलपुष्पपुट स्थिति प्रस्तुत कर हाथ झुका कर नीचे जंघाओं के बराबर लटकाते हुये फैला दिया जाता है । संगीतरत्नाकर के अनुसार- ' यदि दोनों हाथों को एक साथ मिला कर कलाई को स्वस्तिक स्थिति में रखे और फिर उन्हें व्यावृत्त और परिवर्तित कर जंघाओं के बरा-बर हथेली रखते हुये लटकाया जाए तो ' वर्तित ' करण हो जाता है । इसकी योजना असूया के अभिनय में की जाती है पर यदि पताक हस्तों को नीचे की ओर ले जाकर मसलते हुये रखे तो यह क्रोध भाव को भी प्रकट करता है । ( ३ ) बलितोरुक ६२-६४. इस करण में हाथ शुक्रतुण्ड ( ना ० शा ० ६१५३ ) मुद्रा में रहता हैं और जंघाओं को वलित रखते हुये ( ना ० शा ० १० २८ ) आक्षिप्ता चारी में पैर को टिकाते हैं और अन्त में बद्धाचारी ( ना ० शा ० ११।२१ ) में दोनों पैरों को न्यस्त करते हैं । इसमें शुकतुण्ड हस्त नीचे मुख किये हुये ( अधोमुख )

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४८४ योजना मुग्धा नायिका के लज्जाभाव के अभिनय में की रखते हैं । इसकी जाती है । ( ४ ) अपविद्ध ६४-६५. इस करण में हाथ को चतुरस्र स्थिति ( में रख कर ( दाहिने हाथ को ) गोल चक्राकार रूप आक्षिप्ता चारी में ( ना ० शा ० ११।३७ ) स्थित हो शुकतुण्ड मुद्रा ( ना ० शा ० १।५३ ) में जंघा पर व्यस्त हाथ कटकामुखमुद्रा ( ना ० शा ० ६।६० ) में बायां जाता है । इसकी योजना असूया तथा क्रोधभाव में की ( ५ ) समनख ६५-६६. इस करण में दोनों हाथ लताहस्त मुद्रा ना ० शा ० ६।१७८ ) में निकाल कर फिर इसी दाहिने हाथ को किया जाता है और वक्ष पर व्यस्त किया जाती है । -0.3 ( ना ० शा ० ६।१६८ ) में लटकते हुये रखते हैं । पैरों को समनख मुद्रा ( ११।१४ ) में रखने का आशय अंगुलियों को मिला कर रखना जिससे नख साथ - साथ ( पास - पास ) रहें । है समनखी के स्थान पर कहीं ' समनयो ' पाठान्तर भी मिलता है तदनुसार अर्थ होगा - ' दोनों चरण मिलाकर रखे हुये हों ' । इसकी योजना वृत्त के समय होने वाले प्रथम प्रवेश में की जाती है । ( ६ ) लीन ६६-६७. इस करण में दो पताक हस्त ( ना ० शा ० ६१८ ) अंजलि मुद्रा में ( ना ० शा ० २।१८८ ) वक्ष पर व्यस्त करते हैं और निकुंचित शिर ( ना ० शा ० ८।३२ ) रखते हैं । इसमें पहिले नृत्तहस्तों को ऊर्ध्वमण्डल ( ना ० शा ० - २०३ ) मुद्रा में रख कर फिर वक्ष पर दो पताक हस्तों से अंजलि बनाकर रखते हैं । यह अंजलि मुद्रा ऊर्ध्वं मण्डलनृत्त हस्त के पश्चात् बनायी जाती है । इसकी योजना प्रिय की चाटुकारिता या प्रार्थना के वाक्यार्थाभिनय में की जाती है । ( ७ ) स्वस्तिक- रेचित ६७-६८. इस करण में दो चतुरस्र हस्तों को हंसपक्ष- मुद्रा ( ना ० शा ० ६।१०६ ) में रेचित करते हुये ( ना ० शा ० ९ ।१ ९ ३ ) फिर आविद्धवक्र मुद्रा में ( ना ० शा ० ६ १६० ) रख कर स्वस्तिक और फिर विप्रकीर्ण ( ना ० शा ० ε । १८७ ) करते हैं । इसके बाद इन्हें ' पक्षवश्वितक मुद्रा ( ना ० शा ० 81२०० ) में रखकर पक्ष प्रद्योतक ( ना ० शा ० ६।२०१ ) मुद्रा के नृत्तहस्त प्रस्तुत कर

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४८५ कटिप्रदेश पर न्यस्त करते हैं और दोनों पैरों को स्वस्तिक स्थित में रखते हैं । ( इस प्रकार इस करण में छः नृत्तहस्तों का सलक्षण प्रयोग होता है । ) इसकी योजना हर्ष भाव के प्रकट करने एवं नृताभिनय में की जाती है । ( ८ ) मण्डलस्वस्तिक ६८-६९. इस करण में दोनों हाथों को चतुरस्रमुद्रा में ( ना ० शा ० ६।२८४ ) और दोनों पैरों को विच्युताचारी ( ना ० शा ० ११।१६ ) में न्यस्त करते हैं फिर चक्राकार गति से ऊठवंमण्डल हस्तों ( ना ० शा ० ६।२०३ ) को कर मण्डलस्थानक ( ना ० शा ० ११।६५ ) में स्थित हो जाते हैं । स्वस्तिक इसमें दोनों पैर अग्रतलसंचर स्थिति में न्यस्त कर दोनों हाथों को आभुग्न कर वक्षस्थल ( ना ० शा ० ८।२-३ ) पर रखा जाता है । [ संगीतरत्नाकर के अनुसार इस करण में ( वक्षःस्थल के आभुग्न न होने पर भी ) केवल निर्दिष्ट विधि के अनुसार हाथों को वक्ष पर न्यस्त करना इष्ट है । ] इसकी योजना लज्जा और पश्चात्ताप में तथा पराभव के वाक्यार्थाभिनय में की जाती है । ( ९ ) निकुट्टक ६ ९ -७०. इस करण में मण्डल स्थान में ( ना ० शा ० ११।६५ ) स्थित होकर हाथों को चतुरस्र दशा में ( ना ० शा ० २।१८४ ) घुमाते हुये ऊपर हुये मस्तक पर निकुट्टित करें और पैर उद्घट्टित स्थिति ( ना ० शा ० उठाते १०१४१-४२ ) में रखे और इसी प्रकार क्रमशः दोनों हाथों को संचालित करना चाहिये । जब दाहिने हाथ से यह क्रम सञ्चालन हो तो बायें हाथ को आविद्ध क्रम में संचालित कर चतुरस्र मुद्रा में न्यस्त करे करे आ और फिर बायें हाथ और पैर को निकुट्टित करे । चतुरस्र हस्त से मस्तक पर निकुट्टन का आशय है अलपल्लव हस्त ( ना ० शा ० ६६१ ) की कनिष्ठ उङ्गली का ऊपर - नीचे मस्तक और बाहु के मध्य भाग में निकुट्टन करना । पाद के अश्चित करने का आशय है उन्हें उद्घट्टित दशा में निकुट्टन के लिये व्यस्त करना । इसकी योजना आत्मसम्भावना के वाक्यार्थाभिनय में की जाती है । ( १० ) अर्ध - निकुट्टक ७०-७१. इस करण के अन्तिम अर्ध भाग में निकुट्टक का लक्षण विद्य-मान है । अतएव अनेक ( अन्य ) आचार्य निकुट्टक के एक भाग का या एक

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४८६ नाव्यशास्त्र बाजू किया जाने वाला आधे भाग का अभिनय करने से इसे अर्धनिकुट्टक मानते हैं । अश्चित हस्त से आशय है उसे यहाँ अपल्लव मुद्रा ( ना ० शा ० १ ) में व्यस्त करना । आत्मसम्भावना के अल्प मात्रा में रहने की स्थिति वाले वाक्यार्थाभिनय में इस करण की योजना की जाती है । ( ११ ) कटिच्छिन्न ७१-७२. इस करण में भ्रमरी चारी ( ना ० शा ० ११।४५ ) में दोनों बाजुओं से घुमाव लेकर मण्डलस्थान में ( ना ० शा ० ११।६५ ) स्थिति होते हैं तथा कटि को छिन्ना दशा ( ना ० शा ० ६ । २४५ ) में रखते हैं । फिर बाहु एवं मस्तक के बराबर दोनों हाथों को पल्लव मुद्रा में व्यस्त करते हैं । पल्लवहस्त पताक ( ना ० शा ० ६।१८ ) और अलपल्लव ( ना ० शा ० ६।१६६ ) हस्त साथ रखते हैं । इस प्रकार यह क्रम पर्याय से किया जाता है और ऐसी आवृत्ति दो या तीन बार की जाती है जिससे यह करण बन जाता है विस्मयप्रधान वाक्यार्थाभिनय में इसकी योजना की अलपल्लव का किया जाने वाला प्रयोग भी विस्मयभाव संकेतित कर रहा है । ( १२ ) अर्ध रेचित ७२-७३. इस करण में मण्डलस्थान में स्थित होकर वक्ष मुख हस्त ( ना ० शा ० ९ ।६० ) व्यस्त कर उसे सूचीमुख । जाती है । यहाँ की प्रमुखता को प्रदेश पर कटका-मुद्रा ( ना ० शा ० १ ९ १ ) में कर ले और फिर वहां से हटा कर ' अपसृत ' स्थिति में ले जाए, सौष्ठव प्रक्रिया से पार्श्व को ' नत ' करे और चरण को निकुट्टित कर शरीर के अर्धभाग को रेचित या बाहर की ओर ले जाने वाला रखे । इसकी योजना असमंजस चेष्टा के वाक्यार्थाभिनय में की जाती है । ( १३ ) वक्षःस्वस्तिक ७३-७४. इस करण में चतुरस्र हस्तों को रेचित कर फिर व्यावृत्त करते हुये वक्ष तक ऊपर ले जाते हैं और आभुग्न या झुके हुये वक्ष ( ना ० शा ० २० ) पर स्वस्तिक करते हुये न्यस्त करते हैं । हस्त स्वस्तिक के समय ही दोनों पैरों को भी स्वस्तिक दशा में ( एक पैर की दूरी जंघा और टखनी के साथ रखते हुये स्वस्तिक बना कर ) रखते हैं । इसमें सौष्ठव का प्रमुखरूप में विनियोजन रखा जाता है ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४८७ इसकी योजना लज्जित एवं पश्चात्ताप से संतप्त दशा के अभिनय में की जाती है । ( संगीत रत्नाकर के अनुसार अभुग्न वक्ष के न रखने पर भी इस करण की लज्जा और अनुताप के अभिनय में योजना हो सकती है ) । ( १४ ) उन्मत्त ७४-७५. इस करण में आविद्धचारी ( ना ० शा ० ११।३८ ) में स्थापित चरणों को पर्यायशः अंचित ( ना ० शा ० १० ५१ ) दशा में रखते हुये दोनों हाथों को रेचित करते हैं । इसकी योजना सौभाग्य आदि से उत्पन्न होने वाले गवं भाव में की जाती है । ( १५ ) स्वस्तिक ७५-७६. इस करण में बायें हाथ को उद्वेष्टित अर्थात् निकाल कर उसे गोलघुमाव ( अर्थात् वर्तन ) देते हुये व्यावर्तित करण के समय उछाला लेकर दोनों हाथ और पैरों को एक साथ स्वस्तिक बना लिया जाता है । इसकी योजना निषेध, शीघ्रता, ( दूसरों के ) अन्वेषण तथा सम्भाषण के वाक्यार्थाभिनय में की जाती है । ( १६ ) पृष्ठस्वस्तिक ७६-७७. इस करण में उद्वेष्टित कर्म के साथ बाहुओं के विक्षेप के समय पैरों को अपक्रान्ता चारी ( ना ० शा ० ११।३१ ) की स्थिति रख कर अपवेष्टित कर्म के साथ दूसरे चरण को अर्धसूची चारी ( ना ० शा ० १२१३४ ) के साथ रेचित करते हुये ( फिर ) दोनों हाथ और पैरों से स्वस्तिक करते हैं । इसमें त्रिक को चालित करने के साथ पीछे घूम कर दक्षिण पाद के पीछे वाम पाद को न्यस्त करते हुये ( दोनों से ) स्वस्तिक बनाते हैं । यहाँ अर्ध शब्द दुसरे पाद के सूची कार्य को बतलाने चाहिये उसके क्रमशः दुहराने को नहीं । स्वस्तिक के सभी की भी योजना करते हैं । अन्य आचार्यों का मत है कि युद्ध लेने के अवसर पर पृष्ठस्वस्तिक की योजना करना चाहिये ( १७ ) दिवस्वस्तिक ७७-७८. इस करण में स्वस्तिक करण की प्रक्रिया हेतु प्रयुक्त समझना अर्थों में इस करण की दशा में घुमाव । को पावों में आगे और पीछे चारों दिशाओं में त्रुटित अंगों से अंगश्लेष करते हैं ( त्रुटित अङ्गों के अंगश्लेष को कटि द्वारा करते हैं )

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४८८ नाव्यशास्त्र इसकी योजना गीत के परिवर्त में की जाती है । [ गीत परिवर्त को इसी अध्याय में आगे ४ । ३०६ पर बतलाया गया है जहाँ ' यदा गीतवशादङ्गं भूयो भूयो विवर्तते ' आदि मुनि ने कहा है । ] ( १८ ) अलातक कशम ७८-७९. इस करण में दक्षिण चरण से अलाता चारी ( ना ० शा ० ११।४१ ) को प्रस्तुत कर दक्षिण हस्त को नितम्ब हस्त ( ना ० शा ० ६।१६६ ) बना कर उसे चतुरस्र करते हैं । वाम चरण से उर्ध्वजानु चारी ( ना ० ना ० ११ । ३३ ) को और फिर इसी से अलात चारी को प्रयुक्त करे और दक्षिण हस्त को नितम्ब मुद्रा में रख कर चतुरस्र करे । इसके आरम्भ में दोनों हाथ कन्धों के बराबर और अन्त में नीचे की ओर फैले हुये रहते हैं । उर्ध्वजानु के प्रयोग के कारण जानुओं के ऊपर उठाने और उनके संचलन का क्रम महत्वपूर्ण रहने के एवं अलाता चारी के प्रयोग को दुहराने या दो बार होने के कारण इस करण का नाम ' अलातक ' रखा गया है । इसकी योजना ललितभाव के नृत्त में की जाती है । ( १ ९ ) कटीसम ७ ९ -८०. इस करण में स्वस्तिक के पश्चात् चरण को अपसृत करने का आशय है आक्षिप्ता चारी ( ना ० शा ० १२।३७ ) के पश्चात् अपक्रान्ता चारी ( ना ० शा ० ११।३१ ) का प्रयोग करना । इसमें चरणों के समान हस्तों को अपसृत करना चाहिये अर्थात् दोनों हाथों को पृथक् कर एक को कटकामुख मुद्रा में ( ना ० शा ० ९ ।६१ ) नाभिप्रदेश के समीप एवं दूसरे को अर्धचन्द्र मुद्रा ( ना ० शा ० ६।४३ ) में कटिप्रदेश पर रखते हैं । इसमें एक पार्श्व ' नत ' और दूसरा ' उद्वाहित ' स्थिति में रहता है । यह करण वैष्णवस्थान से युक्त माना जाता है [ ना ० शा ० ११।५२-५३ ] - इसकी योजना सूत्रधार द्वारा जर्जर के अभिमन्त्रण के समय की जाती है । ( २० ) आक्षिप्तरेचित ८०-८१. इस करण में हृदय के बराबर दोनों हाथों को व्यावर्तित एवं क्षिप्त कर एक हाथ से हंसपक्ष मुद्रा में चक्राकार घुमाव लेते हैं । इसके पश्चात् दूसरा वक्षप्रदेश पर आक्षिप्त करे और अश्चित मुद्रा में करते हुये उसे अपविद्ध किया जाए । इस प्रकार शरीर के भाग से दोनों हाथों को निकाल

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४८ ९ कर उनके चक्रकार संचलन ( अपविद्ध दशा में ) करने से यह करण आक्षित रेचित कहलाता है । इसमें दोनों पाद प्रयोगानुसार ' अति ' तथा ' सूची ', हस्त ' रेचित् ' तथा जानु ' क्षिप्त ' रखी जाती है । इसकी योजना त्याग, उपादान एवं परम्परा निदर्शन के वाक्यार्थाभिनय में की जाती है । ) विक्षिप्ताक्षिप्त ८१-८२. इस करण में हाथ और पैर को विक्षेप किया जाता है । विक्षेप का लक्षण है – ' एक हाथ का — व्यावृत्त करण के समय व्यावर्तन कर पैर द्वारा बाहर निकालने का कार्य करना । इसमें अन्य हाथ चतुरस्र स्थिति में रखते हैं और फिर परिवर्तित कर दूसरे हाथ और पैर से विक्षेप करते हैं । इसकी योजना आने - जाने के भाव को प्रकट करने वाले वाक्यार्थाभिनय में की जाती है । इस करण के विषय में भट्टतोत का मत भिन्नता रखता है । उनका मत कि इस करण को उपर्युक्त स्थिति में केवल संयोजित नहीं किया जाए क्योंकि जहाँ अभिनय के लिये हस्तमुद्राओं का प्रयोग होता है वहीं वाक्या-भिनय माना गया है । करण नृत्तमात्र के लिये उपयोगी होते हैं, क्योंकि इनमें वर्तना की प्रमुखता या नृत्तहस्तों की प्रमुखता रहती है । अतएव प्रधानतः नृत्त में इस करण का प्रयोग होना चाहिये । इसके अतिरिक्त अन्य आचार्यों का मत है कि कदाचित् योजनानुसार शस्त्र मोक्षण आदि अभिनय प्रस्तुत करने के अवसर पर बीच में गति, परि-क्रमण, युद्ध, नियुद्ध, चारी एवं स्थान के प्रस्तुत करने के अवसर आते हैं; अतः ताल के विचारानुसार वहीं ऐसे करणों की योजना करनी चाहिये । ( २२ ) अर्धस्वस्तिक ८२-८३. इस करण में दोनों पैर स्वस्तिक स्थिति में न्यस्त कर दक्षिण हस्त को करिहस्त ( ना ० शा ० २।१६१ ) मुद्रा में और वाम हस्त कटकामुख ( ना ० शा ० ९ ।६० ) मुद्रा में वक्ष पर स्थित करते हैं । जो करिहस्त के स्थान ' पर ' कटिहस्त ' पाठ मानते हैं उनके मत से वाम हस्त को अर्धचन्द्र ( ना ० शा ० ९ ४२ ) स्थिति में कटि पर न्यस्त किया जाता है । इस ( करण ) में दोनों पैरों से स्वस्तिक करने के कारण इसका नाम अर्धस्वस्तिक रखा गया क्योंकि अभिनय हस्तों का इसमें प्रयोग नहीं होता । अन्य आचार्यों के मत में पक्षवश्चितक तथा पक्षप्रद्योतक ( ना ० शा ० १२, १ ९ ३ ) नृत्तहस्तों के साथ अर्धचन्द्र हस्त को कटि पर न्यस्त करना - इसमें इष्ट होता है

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४ ९ ० नाव्यशास्त्र ( २३ ) अञ्चित ८३-८४. इस करण में अर्धस्वस्तिक करण ( २२ ) से करिहस्त को व्याव तित कर अलपल्लव हस्त को ( ना ० शा ० ६।२०० ) अश्चित करते हैं । अर्थात् अर्धस्वस्तिक करण का करिहस्त व्यावृत्त होकर नासिका के अग्रभाग के सामने या बराबर पर अलपल्लव किया जाए और फिर विवर्तित स्थिति में संचलित हो कर झुकाते हुये न्यस्त किया जाता है तो अश्चित करण हो जाता है । इसकी योजना सामने की ओर देखने एवं कौतुक दिखलाने के वाक्यार्था-भिनय में की जाती है । ( २४ ) भुजङ्गत्रासित ८४-८५. इस करण में चरण के प्रयोग के अनुरूप ( अर्थात् चरणों की गति का अनुसरण करने वाले ) हस्त व्यावृत्त और परिवृत्त किये जाते हैं और फिर क्रमशः एक को दोलाहस्त ( ना ० शा ० ६।१४२ ) और दूसरे को कटका-मुख ( ना ० शा ० ९ ।६० ) मुद्रा में न्यस्त करते हैं । इसी प्रकार अर्थानुसारी हस्तपादप्रयोग की समता के कारण चारी का नाम भी भुजङ्गत्रासिता ( ना ० शा ० १२।४२ ) रखा गया है । [ इस करण का आरम्भ भुजङ्गत्रासिता चारी में कुश्चित पाद को ऊपर उठाते हुये करते हैं, फिर पाद, ऊरू, कटि एवं जानु को तिरछा घुमाव देकर बाद में हाथों को पैरों की गति के अनुसार व्यावृत्त और परिवृत्त करते हैं और तब फिर एक हस्त दोला और दूसरा कटकामुख मुद्रा में रखते हुये करण समाप्त करते हैं - सं ० रत्ना ० ] इस करण की अपने नाम के अनुसार सर्प से डरने के भाव के अभिनय में योजना की जाती है । ( २५ ) ऊर्ध्वजानु ८५-८६. इस करण में चरण को कुश्चित करने ( ना ० शा ० १०।५३ ) के समय उसी ओर के एक हस्त को भी कुश्चित कर स्तनप्रदेश पर उसके सामने या जानु के ऊपर अलपल्लव मुद्रा ( ना ० शा ० ) ऊपर की ओर हथेली करते हुये या अराल मुद्रा ( ना ० शा ९ १४५ ) में इसी तरह न्यस्त करते हैं । जानु को पक्षवश्चितक के द्वारा छाती के बराबर फैलाकर ऊपर उठाते हैं और अन्त में दूसरे हस्त को कटकामुख मुद्रा ( ना ० शा ० ६।६० ) में वक्ष पर स्थापित करते हैं । ( २६ ) निकुञ्चित ८६-८७. इन करण में वृश्चिककरण की ( ना ० शा ० ४।१०८ ) स्थिति

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४. ४ ९ १ में पैर को रखते हैं और फिर एक हाथ को मस्तक के पार्श्व भाग तक ले जाकर अराल मुद्रा ( ना ० शा ० ६२४५ ) में और दूससे हाथ को नासिका के सामने के भाग तक ले जाकर अराल मुद्रा में न्यस्त करते हैं । कुछ आचार्य नासिका के अग्रभाग तक एक हस्त पताक ( ना ० शा ० ६१८ ) एवं दूसरा हस्त सूचीमुख ( ना ० शा ० ९ ६४ ) मुद्रा में रखने का निर्देश करते हैं । इसकी योजना आकाशगमन, मुँह उठाकर विचार करने, वितर्क तथा ध्यान करने के वाक्यार्थाभिनय में की जाती है । ( २७ ) मत्तल्लि ८७-८८. इस करण में इसी के नाम की ( मत्तल्लि चारी ना ० शा ० ११/२८ ) चारी में स्थित रहते हैं जिसमें घूमने वाले पैरों से चक्कर लगाकर एक पैर दूसरे की टखनी के पास स्वस्तिक होकर रखते हैं । इस समय दोनों हाथ नितम्ब मुद्रा में गोल चक्कर लेकर निकट आने पर झटके से उछाले जाते हैं । यह क्रम अनेक बार ( या बार - बार ) दोहराया जाता है जिसमें एक साथ नितम्बहस्तमुद्रा में दोनों हाथ उद्वेष्टित कर अपविद्ध गति में संचालित होते हैं । मत्तल्लि शब्द की व्युत्पत्ति है - ' मत्तं मदनं तनोतीति मत्तल्लि ' अर्थात् जो मद अर्थात् मदन का विस्तार करता हो, उस करण को ' मत्तल्लि कहते हैं । इसकी योजना ( नागानन्द नाटक के शेखरक जैसे ) मदमत्त पात्र के अभिनय में करते हैं । ( २८ ) अर्धमत्तल्लि ८८-८९. इस करण में स्खलित चरणों को पीछे हटाते हैं ( अर्थात् पीछे सिकुड़ाते हुये हटाते हैं ) वाम हस्त हंसपक्ष मुद्रा में जोर से घुमाते हुये रेचित और दक्षिण हस्त कटि पर न्यस्त करते हैं । यह मत्तल्लिकरण से उत्पन्न होता है जिसमें पैरों का प्रसारण तथा संकोच विशिष्टता लिये रहता है । इसकी तरुण मद में योजना की जाती है । ( २ ९ ) रेचित - निकुट्टक ८ ९ - ९ ०. इस करण में दक्षिण हस्त रेचित ( अर्थात् हंसपक्ष मुद्रा में तेजी से चक्कर लगाते हुये ) रखते हैं और दक्षिण पाद उद्धहित क्रिया में ( अर्थात् पंजे के बल खड़ा होकर पृथ्वी पर पटकाते हुये ) रखते हैं, वाम हस्त दोलान मुद्रा में ( ना ० शा ० ६ । १४२ ) झूले की तरह आने - जाने की क्रिया में संचा-लित करते हैं ।