श्रीगणेशाय नमः।

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 621–630

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 621–630

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४ ९ २ नाट्यशास्त्र ( ३० ) पादापविद्धक ९ ० - ९ १. इस करण में दोनों कटकामुख हस्त- ( ना ० शा ० ९ ६० ) उलट कर नाभिप्रदेश से आठ अंगुल की दूरी पर न्यस्त करते हैं, एक पैर दूसरे को सूची द्वारा आविद्ध करता है और फिर दूसरा पैर इसी प्रकार पहले को सूची से आविद्ध कर अपक्रान्ताचारी ( ना ० शा ११।३१ ) की दशा में न्यस्त होता है । पादापविद्धक की व्युत्पत्ति है- ' पादात् पादान्तरमपविद्धमपसारितं यत्र तत् पादापविद्धकम् ' अर्थात् जिसमें एक पैर दूसरे के द्वारा अपविद्ध अर्थात् हटाया जाता हो उसे ' पादापविद्धक ' करण कहा जाता है । ( ३१ ) बलित ९ १ - ९ २. इस करण में हाथ सर्पशीर्ष मुद्रा ( ना ० शा ० ६।१ ९ २ ) से आरम्भ कर सूचीमुख मुद्रा में ( ना ० शा ० ९ ६४ ) लाये जाएं तथा बाहर की ओर अपसृत किये जाते हैं । इसी समय साथ - साथ सूची चारी में न्यस्त पैरों को भ्रमरीचारी ( ना ० शा ० ११।४५ ) में लाकर त्रिक को एक घुमाव दिया जाता है । इसमें त्रिक के घुमाव लेने या वलित होने से इस करण को वलित कहा जाता है । एक भिन्न पाठ में इसे स्खलित करण भी माना जाता है । ( ३२ ) घूर्णित ९ २ - ९ ३ इस करण में दोलाहस्त मुद्रा में दोनों हाथ कलाई पर उलटी स्थिति में मिलाते हैं ( अर्थात् एक हाथ को ऊपर से घुमाव लेते हुये व्याव-तित तथा दूसरे को नीचे से परिवर्तित होकर लाते हैं ) तथा दूसरे बाजू से घुमाव लेकर जंघाएँ स्वस्तिक स्थिति में न्यस्त करते हुये उसी ओर से अप-क्रान्ताचारी ( ना ० शा ० ११।३१ ) में ( अर्थात् एक दूसरे से हटाते हुये ) चरण न्यस्त करते हैं । इसमें वाम हस्त ' दोला ' होता है । ( ३३ ) ललित ९ ३ - ९ ४. इस करण में वामहस्त लता मुद्रा ( ना ० शा ० ६।१६८ ) में और दक्षिण हस्त नितम्ब ( ना ० शा ० ६ १ ९ ६ ) तथा केश बन्ध मुद्रा में और फिर वाम हस्त करिहस्त ( ना ० शा ० ६ । १६६ ) मुद्रा में रखते हैं फिर एक लता हस्त और दूसरे त्रिपताक हस्त को कानों के पास ले जाकर दक्षिण हस्त को अपवर्तित कर ( अर्थात् दाहिनी बाजू के वक्ष और कोख को झुका-कर दाहिने हाथ को बायें हाथ की कोहनी के नीचे ले जाकर उसी ओर फैलाते हुये रख कर ) पैरों को हाथ की गति के अनुसार बार - बार अंग से निकुट्टित करते ( उद्घट्टित करते ) हुये रखते हैं ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४ ९ ३ निकुट्टित के स्थान पर शार्ङ्गदेव उद्घट्टित पाठ उचित मानते हैं । इसकी योजना विलासपूर्ण नृत्त में की जाती है । ( ३४ ) दण्डपक्ष ९ ४ - ९ ५. इस करण में ऊर्ध्वजानुचारी ( ना ० शा ० ११।३३ ) में स्थित होकर दोनों लताहस्त प्रदर्शित करे फिर एक बाजू का लता हस्त जानू पर रखे और दूसरी बाजू से फिर इसी प्रक्रिया को दोहरावे । इस प्रकार एक बाजू में पक्ष सीधा नाम हो गया है । ९ ५ - ९ ६. इस स्थित होकर दोनों कर वाम कुक्षि को ९ ६ - ९ ७. इस ( दण्डवत् ) स्थित रहने के कारण इस करण ( ३५ ) भुजङ्गत्रस्तरेचित करण में भुजङ्गत्रासिता चारी ( ना ० शा ० हंसपक्ष हस्तों को रेचित कर अर्थात् जोर से एक घुमाव देते हैं अर्थात् इन्हें बायीं बाजू में ( ३६ ) नूपूर करण में भ्रमरीचारी ( ना ० शा ० ११।४५ एक सौष्टवपूर्ण घुमाव देकर एक पाद नूपुरपादिका चारी ( ना ० का दण्डपक्ष ११।४२ ) में चक्कर लगवा ले जाते हैं । ) में त्रिक को शा ० ११।३५ ) में न्यस्त कर उसी बाजू के हाथ को हंसपक्ष मुद्रा में रेचित कर दूसरी बाजू के हाथ को लता मुद्रा में व्यस्त किया जाता है । ( ३७ ) वैशाखरेचित ९ ७ - ९ ८. इस करण में हस्तों को हंसपक्ष मुद्रा में घुमाव देकर रेचित करते हैं तथा इसी के अनुसार पाद, ग्रीवा तथा कटि को भी रेचित करते हुये अर्थात् घुमाव देते हुये रख कर वैशाखस्थान ( ना ० शा ० ११६१, ६२ ) में स्थित हो जाते हैं राहुलाचार्य का मत है कि पाद, ग्रीवा और कटि का पृथक् भ्रमण या घुमाव ही ' रेचित ' है । इस करण का अंगों की रेचित चेष्टा तथा स्थिति के करण तथा वैशाख स्थान में स्थित होने के आधार पर ही ' वैशाख- रेचित ' नामकरण हुआ है । ( ३८ ) भ्रमर ९ ८ - ९९. इस करण में आक्षिप्ताचारी ( ना ० शा ० ११।३७ ) में एक बाजू के पैर को रखने के साथ उद्वेष्टित मुद्रा में ( ना ० शा ० ६।२१३ ) हस्तों को रखते हुये त्रिक को घुमाव देकर पैर से स्वस्तिक करते हैं । फिर इसी प्रकार दूसरी बाजू के पैर से इसी प्रक्रिया को दोहराया जाता है तथा पर्या-यशः यह प्रयोग होता है ।

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४ ९ ४ नाट्यशास्त्र इसके लक्षण में आये हुये ' च ' शब्द का आशय है पैरों को स्वस्तिक स्थिति में न्यस्त करना । पाद के एक वचन और हस्तों के द्विवचन से पर्यायशः प्रयोग करने की सूचना भी दी गयी है । इसकी योजना उद्धत परिक्रमण में की जाती है । ( ३ ९ ) चतुर ९९ -२००. इस करण में वक्षस्थल के सामने वाम हस्त की अलपल्लव मुद्रा ( ना ० शा ० ६६३ ) में रखते हैं । ' अश्चित ' का अर्थ है अलपल्लवहस्त । इसमें दक्षिण हस्त चतुर मुद्रा ( ना ० शा ० १ ३ ) में तथा पैर कुट्टित अर्थात् उद्घट्टित स्थिति ( ना ० शा ० १०।४२ में झुका कर रखा जाता है । इसकी योजना विदूषक के विस्मयकारक सूच्याभिनय में की जाती है । ( ४० ) भुजङ्गाश्चितक १००-१०१. इस करण में भुजङ्गत्रासिता चारी में ( ना ० शा ० ११।४२ ) कुंचित पाद रखते हैं, दक्षिणहस्त ' रेचित ' ( ना ० शा ० ९ ।१ ९ ३ ) अर्थात् हंसपक्ष मुद्रा में तथा वामहस्त लतामुद्रा में ( ना ० शा ० ६।१६८ ) रखा जाता है । ( ४१ ) दण्डकरेचित १०१-१०२. इस करण में पैरों को दण्डपादा चारी ( ना ० शा ० १११४४ ) में व्यस्त कर हाथों को दण्डपक्ष करते हुये ( ना ० शा ० ६।२०२ ) फैलाते हुये ( विक्षिप्त ) रहते हैं । इसके बाद इन्हें ' रेचित ' करते हैं । यहाँ हाथों के सीधे विक्षिप्त करने और रेचित करने का आशय है उन्हें दण्डपक्ष मुद्रा में - न्यस्त करना । इसी प्रकार पादों के विक्षेप करने का आशय है इन्हें दण्डपादा-चारी में न्यस्त करना । प्रसन्नता के भाव में इसकी योजना की जाती है कुछ अन्य आचार्य उद्धत विषयों में भी इसकी योजना मानते हैं । ( ४२ ) वृश्चिककुट्टित १०२-१०३. इस करण में एक पैर वृश्चिकचरण की स्थिति में न्यस्त करते हैं तथा दो अलपल्लव हस्तों को ( ना ० शा ० २२६३ ) बाहु और मस्तक के बराबर अर्थात् कन्धों के सामने क्रमशः निकुट्टित करते हुये रखा जाता है । इसकी योजना विस्मय, आकाशगमन तथा वाञ्छा करने आदि को ` प्रमुखता वाले वाक्यार्थाभिनय में की जाती है ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४ ९ ५ ( ४३ ) कटिभ्रान्त १०३-१०४. इस करण में सूची चारी का ( ना ० शा ० ११।३४ ) प्रयोग करते हुए वाम पाद को शीघ्रता से दक्षिण जानु तक उठा कर सामने ( आगे ) की ओर पटकते हैं और फिर इसी पाद को शीघ्रता से हटाते हुये दक्षिणपाद के पार्श्व में न्यस्त करते हैं । इसी समय त्रिक को गोल घुमाव दे कर कटि को रेचित किया जाता है । फिर भ्रमरी चारी ( ना ० शा ० ११।४४ ) का प्रयोग कर दोनों हाथों को प्रयोग के अनुसार संचालित करते हुए कटि के रेचन काल में व्यावृत्त तथा परिवृत्त करने के बाद चतुरस्र करते हुए रखते हैं । इसकी योजना गति परिक्रमण के मध्यवर्ती भागों या गतियों की पूर्ति के अवसर पर की जाती है । ( ४४ ) लतावृश्चिक १०४-१०५. इस करण के पथमार्ध का आशय यह है कि वृश्चिक चरण रखते हुये वाम हस्त लतामुद्रा ( ना ० शा ० ६।१६० ) में न्यस्त करना चाहिए । इसकी योजना आकाश से गिरने के अभिनय में की जाती है । ( ४५ ) छिन्न १०५-१०६. इस करण में दो अलपल्लव हस्तों ( ना ० शा ० ६६१ ) को क्रमशः कटिप्रदेश पर न्यस्त करते हैं तथा पैर की एड़ियों को वैशाखस्थान में ( ना ० शा ० ११।६१ ) क्रमशः ऊपर - नीचे उठाते हुये रख कर कटि को बीच घुमाव देकर छिन्न कर देते हैं । इसमें वैशाखस्थान में ( ना ० शा ० ११।६१ ) साढ़े तीन ताल के अन्तर से पैरों को रखते हुये स्थित होना पड़ता है । इसकी योजना अङ्ग भङ्ग या अंगों को बचाने या तालभंग होने में की जाती है । ( ४६ ) वृश्चिक- रेचित १०६-१०७. इस करण में दोनों वृश्चिक चरणों को घुमा कर पीछे ले जाते हैं तथा दो स्वस्तिक हस्तों ( ना ० शा ० २।१८७ ) को ' रेचित ' करते हैं अर्थात् इन्हें हंसपक्ष मुद्रा में शीघ्रता से ऊपर - नीचे घुमाव देते हुये रखते हैं और फिर अलग कर लेते हैं । इसकी योजना आकाशयान के निदर्श के अभिनय में रखी जाती है । ( ४७ ) वृश्चिक १०७-१०८. इस करण में दोनों हाथों को बाहु और मस्तक प्रदेश पर झुका कर रखने का आशय है उन्हें करिहस्त ( ना ० शा ० ६ १६ ९ ) स्थिति

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नाट्यशास्त्र ४ ९ ६ में रखना । इसमें बिच्छू की पुच्छ के समान पाद पीछे की पीठ नमाते हुये रखते हैं । एक पैर की वृश्चिक दशा में तथा दूसरा पैर भी झुका रहना चाहिये । वृश्चिककरण के प्रयोग में सदा दूर सन्नतपृष्ठ ( अर्थात् झुकी हुई रखना ) वाञ्छित होता है । ओर झुका हुआ स्थिति रहने पर पीठ को दूर तक या ऐरावत हाथी की आकाश में गति में इसकी योजना आकाशयान की जाती है । ( ४८ ) व्यंसित कारण में आलीढ़ स्थान ( ना ० शा ० ११।६७ ) का प्रयोग १०८-१०९. इस विप्रकीर्ण स्थिति में चक्राकार कर एक करते हैं, तर्जनी को उद्वेष्ठित करण द्वारा पर न्यस्त नीचे घुमाव लेता है और दूसरा इसी प्रकार लेकर वक्षःस्थल हस्त हस्तों में एक की हथेली ऊपर और दूसरे की उलटी किया जाता है । रेचित समय कम्पित स्थिति में रहते हैं । रखी जाती है और ये क्रमशः ऊपर - नीचे जाते महावीर के पराक्रम प्रदर्शन में की जाती है । इसकी योजना हनुमान जैसे ( ४ ९ ) पार्श्वनिकुडक करण में हाथों को स्वस्तिक स्थिति में न्यस्त करते हैं १० ९ - ९ १०. इस किये हुए और दूसरा ऊपर जिसमें एक हाथ वक्षः के नीचे बाजू में नीचा मुख हैं अर्थात् हुए न्यस्त करते हैं । पैर के तलभाग को निकुट्टित करते मुख रखते को ऊपर उठा कर पटकते हैं और फिर इसी पार्श्वगत हस्त के साथ एक पाद उठाकर पटकते हैं । यह दूसरे पार्श्वगत हस्त के साथ एक पाद को प्रकार दोहराया जाता है । ( यहाँ निकुट्टन का लक्षण आचार्य क्रम दोनों पाश्वों से कोहल प्रोक्त ही समझना चाहिए । ) प्रकाश, सञ्चार एवं अभ्यास में की जाती है । इसकी योजना ( ५० ) ललाट तिलक वृश्चिकचरण को घुमा कर पीछे की ओर से लेते हुए ११०-१११. इसमें ले जाते हैं कि पैर के अंगूठे का वहाँ ऊपर उठा कर ललाट तक इस प्रकार ( ना ० शा ० २1१८ ) में तथा हस्त स्पर्श हो जाए । इसमें एक हस्त पताकमुद्रा जाता है । तक ऊपर उठे हुए पैर के अंगूठे को धारण करते हुए रखा विद्याधर ( यक्ष ) जैसे पात्रों की आकाशगति बतलाने में इसकी योजना की जाती है ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४ ९ ७ ( ५१ ) क्रान्तक १११-११२. इस करण में अतिक्रान्ता चारी ( ना ० शा ० ११।३० ) में स्थित हो कर कुश्चित पाद को उठाकर आगे ( सामने की ) भूमि पर पटका जाता है । इसके साथ ही हस्तों को व्यावर्तित ( ना ० शा ० ६।२१७ ) कर देह के भाग से निकाल कर तथा परिवर्तित कर आक्षिप्त करते हुए बाद में कटकामुख मुद्रा में वक्ष पर स्थापित करना चाहिए । इसी प्रकार दूसरी बाजू से भी इसी प्रकार पाद तथा हस्त की क्षिप्तता सञ्चालित कर हस्तों को वक्ष पर व्यस्त किया जाए । इसकी योजना उद्धत परिक्रमण में की जाती है । ( ५२ ) कुञ्चित ११२-११३. इस करण में एक पैर नत अर्थात् झुक कर पीछे की ओर मोड़ते हुए रखा जाता है, जानु भूमि का स्पर्श करती हुई तथा पिडली उठी हुई । रखी जाती है । दूसरा पैर समपाद दशा में ( अर्थात् अग्रतलसश्वर पाद की ( ना ० शा ० १०१४८-४९ ) स्थिति में ) आगे बढ़ कर झुका हुआ रखा जाता है । दक्षिण हस्त अलपल्लव मुद्रा ( ना ० शा ० ६/६३ ) में ऊपर की ओर हथेली रखते हुए बायीं कोख की ओर रखते हैं । इसकी योजना उल्लास में व्याप्त देवगण के अभिनय में की जाती है । ( ५३ ) चक्रमण्डल ११३ - ११४. इस करण में अपविद्ध पाद करने का आशय है अडितर चारी ( ना ० शा ० ११।२३ ) का प्रयोग करना । इसके साथ ही दोला हस्तों ( ना ० शा ० ६।१४२ ) से चक्राकार घुमाव लेते हुए शरीर के मध्यभाग को नमाया जाता है । इसकी योजना उद्धत परिक्रमण एवं देवगण की परिक्रमा करने के अभि-नय के अवसर पर की जाती है । ( ५४ ) उरोमण्डल ११४-११५. इस करण के आरम्भ में स्थितावर्ता चारी ( ना ० शा ० ११।१५ ) में स्वस्तिक चरणों को आगे बढ़ा कर फिर अपविद्ध स्थिति से हटा कर स्थापित करते हैं । इसके बाद बद्धाचारी ( ना ० शा ० ११।२१ ) में स्थित होकर दोनों हाथ उरोमण्डल मुद्रा ( ना ० शा ० २।२०४ ) में न्यस्त करते हैं । इसकी योजना उद्धत गति में परिक्रमा करने में की जाती है । ( ५५ ) आक्षिप्त ११५-११६. इस करण में आक्षिप्ताचारी ( ना ० शा ० १११३७ ) में हाथ ३२ ना ० शा ० प्र ०

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४ ९ ८ नाट्यशास्त्रम् पैरों को कुचित स्थिति में न्यस्त करते हैं फिर एक पार्श्व हुए चतुरस्र हस्तों को वेग से झटके के साथ कटकामुख मुद्रा इसकी योजना विदूषक की गति में की जाती है । ( ५६ ) तलविलसित . इस करण में ऊपर की ओर उठाये गये को थोड़ा झुकाते में रखा जाता है । पैर की उंगलियाँ ११६-११७ उसका तलवा सामने मुड़ा हुआ रखा जाता है । इसी ऊपर की ओर तथा जाए और इसी के साथ - साथ क्रम को दूसरे पैर के द्वारा ( भी ) दोहराया पताक हस्तों ( ना ० शा ० ६१८ ) को एक दूसरे से संश्लिष्ट हो कर दो सञ्चालित करते हुए एक दूसरे से मिलते एवं अलग होते हुए रखे ऊपर - नीचे जाते हैं । के तलभाग का आकाश के विस्तीर्ण भाग में इस प्रकार पैर और हाथों सुन्दरता के साथ मिलन करवाने के कारण इस करण को जाता है [ पादलस्य हस्ततलस्य च विकुष्टे देशे विलसितं विलसितम् अ ० भा ० ] इसकी योजना पूर्वरङ्ग के समय सूत्रधार द्वारा स्थिति में की जाती है । ( ५७ ) अर्गल . इस करण में वाम पाद की कनिष्ठ ' तलविलसित ' कहा श्लेषणं यत्र तत्तल-उठाये गये पैरों की अंगुली के भार पर ११७-११८ जाता है जो शरीर को पीछे की ओर फैला कर पैर को दाहिना पैर टिकाया सम्पादित करते हैं । इसी समय हाथों को ढ़ाई ताल के अन्तर पर रख कर को निय-मुद्रा में ( ना ० शा ० ६।२०० ) रखते हुए शरीर के भाग अलपल्लव करने के साथ - साथ दोनों हाथ - पैरों को भी इसी क्रम में झुकाते हैं । न्त्रित सदृश पात्र के घूमने आदि की स्थिति में करते हैं । इसकी योजना अङ्गद ( ५८ ) विक्षिप्त ११८-११९. इस करण में दोनों पैरों को क्रमशः विद्युद्भ्रान्ता चारी शा ० ११।४० ) तथा दण्डपाद चारी ( ना ० शा ० ११।४४ ) में न्यस्त ( ना ० घुमाव में उद्वेष्टित, अपवेष्टित तथा रेचित करते हुए दोनों हाथों को चक्राकार से फेंका जाता है । ( आशय यह करते हुए सामने, पीछे तथा बगल में झटके ' विक्षिप्त ' कि पाद, हस्त तथा जानु को क्षिप्त करने के कारण इस करण को कहते हैं । ) इसकी योजना उद्धत परिक्रमण में की जाती है । ( ५ ९ ) आवर्त्त करण में पैरों से चाषगति चारी का ( ना ० शा ० ११ ९ -१२०. इस

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ४ ९९ ११।२८ ) प्रयोग करते हुए दोनों हाथों को उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित स्थिति सञ्चालित करते हैं फिर उन्हें दोला हस्तमुद्रा में रखते हैं और पैरों से गोल घुमाव तेजी से लिया जाता है । इसकी योजना भयत्रस्त दशा में नायिका की नायक के समीप जाने ( के अभिनय ) के अवसर पर की जाती है । ( ६० ) दोलापाद १२०-१२१. इस करण में ऊर्ध्वजानु चारी ( ना ० शा ० ११।३३ ) के पश्चात् दोलापाद चारी ( ना ० शा ० ११।३६ ) को प्रयुक्त करते हैं [ अर्थात् कुश्चित पाद को ऊपर फेंककर एक बाजू से दूसरी बाजू की ओर झुलाया जाता है ] और पैरों की गति के अनुसार दोनों दोलाहस्तों ( ना ० शा ० १४२ ) को सञ्चालित करते हैं । ( ६१ ) विवृत्त १२१-१२२. इस करण में आक्षिप्ताचारी ( ना ० शा ० ११।३७ ) में वामपाद को उछाल देकर हाथों को ( देह की सीमा से ) बाहर फैला कर चक्राकार गति में व्यावृत्त तथा परिवृत्त करते हुए आक्षिप्त क्रम में सञ्चालित करते हैं । फिर भ्रमरी चारी ( ना ० शा ० ११।३७ ) द्वारा त्रिक को घुमाव देकर दोनों हाथों को रेचित अर्थात् हंसपक्ष मुद्रा ( ना ० शा ० ६।१ ९ ३ ) में शीघ्रता से गोल घुमाव देते हुए संचालित करते हैं । त्रिक को विवर्तित अर्थात् घुमाव देकर संचालित करने के कारण इस करण को ' विवृत्त ' कहा जाता है । इसकी योजना उद्धतगति से परिक्रमण करने के अभिनय में की जाती है । ( ६२ ) विनिवृत्त १२२-१२३. इस करण के आरम्भ में सूची चारी ( ना ० शा ० १११३४ ) में पैरों को व्यस्त कर फिर बद्धाचारी ( ना ० शा ० ११।२१ ) द्वारा एक पैर के पिछले भाग को दूसरे पैर के पीछे ले जाकर स्वस्तिक स्थिति में व्यस्त करते हैं और एडी पर दक्षिण पाद को विद्ध करते हैं । फिर ' त्रिक ' को घुमाव • देते हुए पार्श्व का गोल घुमाव लगाते है और साथ - साथ दोनों हंसपक्ष हस्तों ( ना ० शा ० ६।१ ९ ३ ) को रेचित अर्थात् शीघ्रता से गोल घुमाव देते हुए संचालित करते हैं । इसकी योजना भी पूर्वकरण की स्थिति में की जाती है । ( ६३ ) पार्श्वक्रान्तम् १२३-१२४. इस करण में पार्श्वक्रान्ता चारी ( ना ० शा ० ११।३२ ) में पैरों को व्यस्त कर कुंचित पाद को ऊपर उछाला देकर पार्श्व के समीप न्यस्त करते हैं और फिर सामने की ओर एक चरण को पटका जाता है तथा

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नाट्यशास्त्रम् ५०० के संचालन क्रम के अनुसार रखते हुए क्रमशः आगे फैला दोनों हाथों के पैरों है गतिप्रचार या युद्धादि के अवसर कर रखते हैं । यहाँ ' प्रयोग ' का अर्थ होता पैर तथा हाथों का एक क्रम में संचालन करना । पर प्रकृति के रौद्ररस प्रधान पात्र की गति इसकी योजना भीम सदृश उद्धत में की जाती 1 ( ६४ ) निस्तम्भित . इस करण में एक पैर को कुश्चित कर १२४-१२५ हैं; वक्ष को निर्भुग्न ( ना ० शा ० १०१४ - ५ न्यस्त करते कटकामुख मुद्रा ( ना ० शा ० उन्नत स्थिति में रखते हुए दूसरे पैर के पीछे ) तथा पार्श्व को २।६० ) वाले हस्त करते हैं । अंगुली से ललाट पर तिलक करने का भाव सम्पन्न • की मध्यमा रखने का आशय है वृश्चिक चरण कुछ विद्वानों के मत में कुश्चित पाद का प्रयोग करना । इस करण में करण की शिवजी १२५-१२६ इस करण का अन्य नाम ' निशुम्भित ' पैर से पृथ्वी पर आघात करने का के नृत्याभिनय में योजना की जाती है ( ६५ ) विद्युद्भ्रान्त . इस करण में विद्युद्भ्रान्ता चारी ( में स्थित होते हुए तेजी से एक पैर पिछे ले जाकर भी पाया जाता है । प्रयोग रखने से ऐसे । ना ० शा ० ११।४० ) इस प्रकार फैलाते हैं स्थिति में को छूने लगता है तथा दूसरे पैर को समपाद कि वह मस्तक भार स्थापित करते हैं, इसके साथ ही न्यस्त करते हुए उस पर शरीर का देने ) के पश्चात् आविद्ध दोनों बहुओं को मण्डल ( अर्थात् चक्राकार घुमाव करते हुए चतुरस्र स्थिति में घुमाते हैं । के समान ऊपर को ओर घुमाव लेने के तथा इस करण में बिजली इस करण का अन्वर्थ अभि-चारी के मूलतः प्रयोग के कारण विद्युतभ्रान्ता धान है ' विद्युद्भ्रान्त ' । तथा उद्धतगति में इस करण की योजना की पात्रों के उद्धत परिक्रम जाती है । ( ६६ ) अतिक्रान्त . इस करण के आरम्भ में अतिक्रान्ता चारी ( ना ० शा ० १२६-१२७ ११।३० ) का प्रयोग कर अन्त में एक चरण को आगे की ओर फैलाते हैं तथा पैरों की गति के अनुसार हाथों का ( संचालन या ) अनुगमन किया जाता है ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५०१ जहाँ अन्यथा निद्दिष्ट न हो ऐसे गति तथा परिक्रमण के सभी अवसरों ( अभिनय के अवसर ) पर इस करण की योजना की जाती है । ( ६७ ) विवर्तिक १२७-१२८. इस करण में एक पैर और एक हाथ को आक्षिप्त स्थिति में व्यस्त करने के साथ दूसरे हाथ को हंसपक्ष मुद्रा में ' रेचित ' करते हुए ( जोर से चक्कर लगाते हुए ) रखते हैं तथा त्रिक को घुमाव देते हैं । ( ६८ ) गजक्रीडितक १२८- १२ ९. इस करण में दक्षिण हस्त को करिहस्त मुद्रा ( ना ० शा ० ११ ) तथा वामहस्त को त्रिपताक मुद्रा ( ना ० शा ० ६।२७ ) में कानों के बराबर ( समीप ) लाकर ' अश्वित ' करते हैं, पैरों को दोलपाद चारी ( ना ० शा ० ११।३६ ) में न्यस्त करते है तथा पैरों के संचालन का क्रम हाथों द्वारा अनुसृत होता है । इस करण का प्रयोग अपने नामानुसारी कार्यों एवं क्रियाओं के अभि-नयादि में किया जाता है । ( ६ ९ ) तलसंस्फोटित १२ ९ - १३०. इस करण में अतिक्रान्ता चारी ( ना ० शा ० ११।३० ) अथता दण्डपाद चारी ( ना ० शा ० १११४४ ) में चरणों को न्यस्त कर फिर शीघ्रता से चरण उठाते हुए घुटने को क्षिप्त स्थिति में आगे की ओर स्थापित करते हैं, इसी समय दो पताक - हस्तों ( ना ० शा ० ६१८ ) को संश्लिष्ट कर शब्द निकालते हैं । यह शब्द तालानुसार अनेक बार किया जाता है तथा विषयानुरूप प्रयोगों में इसकी योजना की जाती है । ( ७० ) गरुडप्लुतक १३०-१३१. इस करण में वृश्चिक चरण को पीछे की ओर ( मोड़ कर ) फैलाते हैं अर्थात् उठे हुए पैर का घुटना मुड़ा हुआ रखा जाता है और दूसरे पैर की तिरछी एडी पर शरीर का भार सन्तुलित करते हुए दोनों हाथों को लतामुद्रा में ( ना ० शा ० ६।१६८ ) न्यस्त कर ' रेचित ' करते हैं । ( ७१ ) गण्डसूची १३१-१३२. इस करण में एक सूचीपाद ( ना ० शा ० १०।५५ ) तथा दूसरा समपाद ( ना ० शा ० १०।४३ - ४४ ) रखते हैं, एक पार्श्व को झुका हुआ रखने के साथ अश्वित, अलपल्लव या सूचीमुख ( ना ० शा ० १ १११ ) मुद्राओं में से एक में हस्त को संचालित कर वक्ष पर न्यस्त करते हैं और