भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 631–640
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 631–640
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५०२ नाव्यशास्त्रम् मुद्रा वाले हस्त को गण्ड ( कपोल ) प्रदेश का स्पर्श करते दूसरे अलपल्लव हुए रखा जाता है । या सूच्यास्य ( ना ० शा ० २।१ ९ १, ६५ ) हस्त कुछ विद्वान् सूचीसुख हस्त अर्थात् ठुड्डी का स्पर्श करते हुए रखने के पक्ष में हैं और को कपोलप्रदेश गण्डप्रदेश का स्पर्श करते समय सूचीपाद में चरण न्यस्त करने अन्य विद्वान् का निर्देश करते हैं । कपोलों के अलङ्करण करने के अभिनय में इस करण की योजना की जाती है । ( ७२ ) परिवृत्त १३२-१३३. इस करण में दोनों हाथ ऊर्ध्वमण्डल मुद्रा ( ना ० शा ० ६।२०३ ) में चक्राकार घुमाये जाते हैं तथा सूचीपाद ( ना ० शा ० १०।५५ ) को बद्धाचारी ( ना ० शा ० ११।२१ ) में मिश्रितक्रम में दूसरे पाद की समीप-• वर्ति स्थिति ( ना ० शा ० ११।४५ ) में न्यस्त करते हैं । ' करु ' को परिवृत्त पीछे की ओर से घूमने वाले और त्रिक को भी भ्रमरी चारी में ( ना ० अर्थात् शा ० १११४४ ) घूमते हुए रखते हैं । ( ७३ ) पार्श्वजानु १३३-१३४. इस करण में एक समपाद चरण ( ना ० शा ० १०।४३-४४ ) के पार्श्व में दूसरे चरण को न्यस्त करते हैं, मुष्टि हस्त ( ना ० शा ० ३।५४ ) को वक्ष पर तथा अर्धचन्द्र हस्त ( ना ० शा ० ६१४२ ) को कटि पर न्यस्त करते हैं । चाहिए कि पार्श्व अर्थात् ऊरु का ' पार्श्वजानु ' शब्द से यही समझना पिछला भाग उसी से सम्बद्ध जानु के साथ जहाँ रहता हो उस ' करण ' का यह अन्वर्थं नाम है । इसकी योजना बाहुयुद्ध तथा युद्ध की दशा में की जाती है । ( ७४ ) गृध्रावलीनक १३४ - १३५. इस करण में पैर को पीछे की ओर अंगूठे की भूमि से श्लिष्ट करते हुए अश्चित चरण में रखा जाता है, जानु को झुका कर पाद आगे - पीछे जाकर न्यस्त होते रहते हैं साथ ही दोनों लताहस्त तथा पार्श्व भी प्रसारित स्थिति में न्यस्त करते हैं । इसकी योजना किसी बड़े पक्षी या गिद्ध आदि के युद्ध में की जाती है । ( ७५ ) सन्नत १३५-१३६. इस करण के आरम्भ में हरिणप्लुता चारी ( ना ० शा ० ११ ४३ ) में एक उछाल लेकर पैरों को स्वस्तिक स्थिति में सामने व्यस्त करते हैं तथा इसी के साथ दोनों ' सन्नत ' अर्थात् दोला हस्तों को रखा जाता है ।
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परिशिष्ठ: टिप्पणी, अध्याय ४ ५०३ इसकी योजना अधम पात्रके समीप ( या साथ - साथ ) चलने या धीरे - धीरे चलने के अभिनय में की जाती है । ( ७६ ) सूची १३६- १३७. इस करण में कुञ्चित पाद को ( ना ० शा ० १०१५३ ) सूची चारी ( ना ० शा ० ११।३४ ) की स्थिति के अनुसार उठाते हुए भूमि का स्पर्श न करते हुए न्यस्त करते हैं तथा उसी ओर का ( एक ) हाथ कटकामुख मुद्रा ( ना ० शा ० ९ ।६० ) में वक्ष पर न्यस्त करते हैं और दूसरा हाथ अलपल्लव मुद्रा ( ना ० शा ० ८ ) में मस्तक पर न्यस्त करते हैं । इसी समय तदनु-रूप समपाद के पार्श्व को एक पैर का अंगूठा स्पर्श करता है । इसकी योजना विस्मय के अभिनय में की जाती है । ( ७७ ) अर्धसूची १३७-१३८. इस करण में सूची चारी ( ना ० शा ० भाग का प्रयोग किया जाता है । सूची चारी के एक से इस करण का नाम भी ' अर्धसूची ' हो गया । यहाँ मस्तक पर व्यस्त अलपल्लव हस्त । ( ७८ ) सूचीविद्ध ११।३४ ) के अन्तिम भाग का प्रयोग होने शिरोहस्त का अर्थ है १३८ - १३ ९. इस करण में ( भी ) सूची चारी ( ना ० शा ० ११।३४ ) के अन्तिम भाग को प्रयोगानुसार कुश्चित, दक्षिण पाद को अन्य पैर की एड़ी से विद्ध अर्थात् सटा हुआ रखते हैं तथा दक्षिण हस्त को अर्धचन्द्र मुद्रा ( ना ० शा ० ६।५२ ) में पक्षवश्चितक स्थिति में कटिप्रदेश पर न्यस्त कर वाम हस्त को कटकामुख मुद्रा में ( ना ० शा ० ६।६० ) वक्ष पर न्यस्त किया जाता है । चिन्ता के अभिनय में इस करण की योजना की जाती है । ( ७ ९ ) अपक्रान्त १३ ९ - १४०. इस करण के आरम्भ में अपक्रान्ता चारी ( ना ० शा ० ११।३१ ) में दोनों ऊरुओं को वलन क्रिया में संचालित कर बद्धाचारी ( ना ० शा ० ११।२१ ) द्वारा फिर दोनों को स्वस्तिक किया जाता है और दोनों हाथों को ( अर्थात् दक्षिण हस्त दोला मुद्रा में तथा वाम हस्त पताक मुद्रा में ) पैरों की स्थिति के अनुसार संचालित किया जाता है । ( ८० ) मयूरललित १४०-१४१. इस करण में वृश्चिक पाद रखते हुए दोनों रेचित हस्तों को हंसपक्ष मुद्रा में जोर से चक्कर लगाते हुए रखते हैं फिर पैर ( ऊरु प्रदेश ) सिकुड़ा कर भ्रमरी चारी ( ना ० शा ० १११४५ ) में न्यस्त करते हैं । यह
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५०४ नाट्यशास्त्रम् क्रिया कलाप मयूर नृत्य का अनुकरण करनेवाला हो जाने से इस करण का ' मयूरललित ' नामकरण हो गया है । ( ८१ ) सर्पित १४१-१४२. इस करण के आरम्भ में एक पाद को अञ्चित ( ना ० शा ० १०।५१ ) करते हुए न्यस्त करे और फिर उसे दूसरे से ' अपसृत ' अर्थात् अलग करते हैं, इसी के साथ मस्तक को ' परिवाहित ' स्थिति ( ना ० शा ० ८।२७ ) में नमाते हैं और तदनुसार दोनों हाथों को ' रेचित ' किया जाता है । फिर यही क्रम दूसरी ओर के पैर तथा हाथ आदि के द्वारा दोहराया जाता है । जिस ओर का हस्त पाद संचालित होता है उसी ओर ( बाजू ) मस्तक भी रखा जाता है इसीलिये लक्षण में ' परिवाहित ' स्थिति मस्तक की रखी गई है । में मदावस्था में पैरों की एक दूसरे के पास आने की स्थिति इस करण रहती है अतएव इसकी ' सर्पित ' संज्ञा अन्वर्थ है । ( ८२ ) दण्डपाद १४२-१४३. इस करण में नूपुरपाद चारी ( ना ० शा ० ११।३५ ) के पश्चात् दण्डपाद चारी में ( ना ० शा ० ११।४४ ) चरणों को फैला कर न्यस्त करते हैं तथा हाथों को ' आविद्ध ' अर्थात् अपविद्ध मुद्रा ( ना ० शा ० ९ ।२२० ) में संचालित करते हुए पैर के साथ सीधे न्यस्त करते हैं । क्रोधावेश में घूमने की स्थिति में इस करण की योजना की जाती है । ( ८३ ) हरिणप्लुत १४३-१४४. इस करण के आरम्भ में अतिक्रान्ता चारी ( ना ० शा ० ११।३० ) एवं उसके पश्चात् हरिणप्लुता चारी ( ना ० शा ० ११।४३ ) में पैरों न्यस्त करते हुए तदनुसार हाथ भी दोला ( ना ० शा ० ६।१४२ ) एवं को ( ना ० शा ० ९ ६० ) मुद्रा में न्यस्त हो कर पैरों की गति का कटकामुख अनुसरण करते हैं । ( ८४ ) प्रेङ्खोलित १४४-१४५. इस करण में कुञ्चित पाद को एक ओर से दूसरी ओर झुलाते हुए दोलपाद चारी ( ना ० शा ० ११।३६ ) को प्रस्तुत कर फिर एक पैर का दूसरे से उछाल लेकर घुमाव देते हुए भ्रमरी चारी ( ना ० शा ० ११।४५ ) को प्रदर्शित करते हैं तथा पार्श्व को विवर्तित स्थिति में व्यस्त रखते हैं । ( ८५ ) नितम्ब १४५-१४६. इस करण में ऊपर उठी हुई अंगुली वाले दो पताक हस्तों
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५०५ को व्यावर्तित करण द्वारा मस्तक के समीप तक ले जाते हैं और फिर पलट कर कन्धों के समानान्तर करते हुए वक्षप्रदेश से नीचे ले जाकर पताक करते हुए दक्षिण हस्त का पृष्ठ वक्ष से लगता हुआ और वाम हस्त उसी को देखते हुए सामने स्वस्त करते हैं और फिर देह की ओर अंगुली करते हुए दोनों हाथों से ' रेचित ' कर घूर्णित दशा में न्यस्त कर अन्त में नितम्ब मुद्रा ( ना ० शा ० ६।१६६ ) में हाथों को न्यस्त करते हैं । इस करण में अंगुलियों का अभिमुखीकरण तीन पात द्वारा सूचित किया गया है । ( ८६ ) स्खलित १४६-१४७. इस करण में दोलपादचारी में ( ना ० शा ० ११।३१ ) चरण न्यस्त होते हैं तथा हाथ इनकी गति के अनुसार आते - जाते हुए रखते हैं, फिर हंसपक्ष मुद्रा में जोर से घुमाव देते हुए बाहुओं को रेचित करते हैं । यही क्रम दूसरी बाजू के पैर और हाथों से भी दोहराया जाता है । ( ८७ ) करिहस्त १४७-१४८. इस करण में वाम हस्त कटकामुख मुद्रा ( ना ० शा ० २।६० ) में वक्ष पर न्यस्त करते हैं तथा दक्षिण हस्त त्रिपताक मुद्रा में ( ना ० शा ० ६।२७ ) कान के समीप । इसके साथ ही एक उद्वेष्टित पाद को शीघ्रता से अञ्चित करते हुए निकाला जाता है । यह अंश करिहस्त नृत्तहस्त ( ना ० शा ० ९ ।१६६ ) की सदृशता लिये हुए होने से इस करण का नाम ' करि-हस्त ' रखा गया । यह अङ्गहारों में आवश्यक रूप से न्यस्त किया जाता है । ( ८८ ) प्रसर्पितक १४८-१४९. इस करण में एक हाथ को हंसपक्ष मुद्रा में शीघ्रता से घुमाव देकर ' रेचित ' करते हैं और दूसरे को लता मुद्रा में रखते हैं तथा उसी ओर दोनों पैरों को ले जाकर पृथ्वी पर रखते हुए घर्षण करते हुए मन्द गति में आगे चलते हैं । इसका प्रयोग आकाशगामी पात्रों की गति में किया जाता है । ( ८ ९ ) सिंह - विक्रीडित १४ ९ -१५०. इस करण में अलातचारी में ( ना ० शा ० ११।४१ ) द्रुत गति में चरण को आगे रखते हुए इसी के अनुसार उसी ओर चपेट देते हुए हाथ को भी रखते हैं और फिर यही प्रक्रिया दूसरी ओर से भी दोहरायी जाती है!
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५०६ नाटयशास्त्रम् इस करण में चेष्टाओं की सिंहगति से समानता होने के कारण इसका अन्वर्थं नाम है । इसकी रौद्रगति में योजना की जाती है । ( ९ ० ) सिंहाकर्षितक १५० - १५१. इस करण में वृश्चिक चरण को एक ओर रख कर उसे स्वस्तिक करते हैं तथा हाथों को पद्मकोश मुद्रा ( ना ० शा ० ६६२ ) में न्यस्त कर ऊर्णनाभमुद्रा में ( ना ० शा ० ६।२० ) ले जाकर निकुञ्चित करते हुए ऊपर नीचे फैलाते । फिर दूसरी बाजू से वृश्चिक चरण को पीछे की ओर रखते हुए इसी प्रक्रिया को दोहराते हैं और बाहुओं को निकुञ्चित कर पूर्व स्थिति के विपरीत दिशा में ले जाते हैं । सिंहसदृश चेष्टाओं के अभिनय में इस करण की योजना करते हैं । ( ९ १ ) उद्वृत्त १५१-१५२. इस करण के आरम्भ में हाथ और पैरों को आक्षिप्त करते हैं । जिससे सारे शरीर की आक्षिप्त स्थिति हो जाती है । इसके पश्चात् उद्वृत्ता चारी में ( ना ० शा ० ११।३६ ) स्थित होकर कुञ्चितपाद को आविद्धा चारी में ( ना ० शा ० ११०३८ ) स्वस्तिक स्थिति से लपेटते हुए चक्कर लगा कर ऊपर उठाते हैं और झटके से नीचे पटका जाता है, फिर एक चक्कर लगा कर दूसरे कुञ्चिपाद से भी यही क्रम दोहराते हैं । ( ९ २ ) उपसृतक १५२ - १५३. इस करण में कुञ्चितपाद को ऊपर उठाकर आक्षिप्ता चारी ( ना ० शा ० ११।३७ ) में रखते हुए वाम हस्त को व्यावृत्त एवं परि-वृत्त कर शरीर को लगाते हुए दक्षिण हस्त को अरालमुद्रा में ( ना ० शा ० ४५ ) न्यस्त करते हैं । इसकी योजना विनयपूर्वक निवेदन करने के अभिनय में की जाती है । ( ९ ३ ) तलसंघट्टित १५३ - १५४. इस करण में कुञ्चितपाद को दोलपाद चारी की ( ना ० शा ० ११।३६ ) स्थिति में एक ओर से दूसरी ओर झुलाते हुए रखते हैं, दोनों हाथों को पताक मुद्रा में ( ना ० शा ० १।१८ ) एक दूसरे के तलों को श्लिष्ट करते हुए रखे और वैष्णवस्थान ( ना ० शा ० ११।५२ ) में स्थित होकर दक्षिणहस्त कटि प्रदेश पर न्यस्त करते हुए वाम हस्त को हंसपक्ष मुद्रा में द्रुतगति से घुमाव देते हुए ' रेचित ' करते हैं ।
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५०७ [ तलों के श्लिष्ट होने से आशय है ताली बजाना । रेचित करने पर दोनों हाथ अलग हो जाते हैं । यहाँ वैष्णवस्थान में स्थित रहने की दशा में पैरों की दूरी दो ताल के अन्तर पर रखी जाती है । अनुकम्पाप्रधान वाक्यार्थाभिनय में इस करण की योजना करते हैं । ( ९ ४ ) जनित १५४. इस करण में जनिता चारी ( ना ० शा ० ११।२५ ) में स्थित होते हुए एक मुष्टिहस्त वक्ष पर तथा दूसरा लताहस्त झूलता हुआ रखते हुए पैर को अग्रतलसंचर के लक्षण में न्यस्त करते हैं । क्रियारम्भ के अभिनय में इस करण की योजना की जाती है । ( ९ ५ ) अवद्दित्थ १५४-१५५. इस करण में जनिता चारी में ( ना ० शा ० होकर हाथों को अराल तथा अलपल्लव मुद्रा में ललाट एवं चक्राकार गति में घेरा लगाते हैं और फिर नीचे ऊपर करते में लाकर इन्हीं अराल एवं अलपल्लव हस्तों द्वारा उद्वेष्टित प्रक्रिया करवायी जाकर इन्हें एक दूसरे के सामने रखते हुए करते हैं । गोपनप्रधान वाक्यार्थाभिनय में इसकी योजना की जाती है ११।२५ ) स्थित वक्ष के समीप हुए एक पार्श्व एवं परिवर्तित वक्ष पर न्यस्त । दूसरे आचार्य अवहित्थ हस्तमुद्रा ( ना ० शा ० ६।१५६ ) के द्वारा इस करण का सम्पादन उचित समझते हैं जिसमें मस्तक से वक्ष तक लाये गये हस्तों की गति की प्रमुख स्थिति रहती हो और इसी कारण इसका ' अवहित्य ' नामकरण का भी औचित्य प्रतिपादित करते हैं । इनके मत में चिन्ता एवं दुर्बलता के भाव में इस करण की योजना की जाती है । ( ९ ६ ) निवेश १५६-१५७. इस करण में मण्डलस्थान ( ना ० शा ० ११।५५-६६ ) के लक्षणानुसार चार ताल के अन्तर से पैरों को स्थापित कर स्थित होते हैं तथा निर्भग्न वक्ष ( ना ० शा ० ६।२२६ ) रखते हुए दोनों हाथों को कटकामुख मुद्रा में ( ना ० शा ० ६/६० ) वक्ष पर न्यस्त करते हैं । हाथी और घोड़े जैसे वाहन पर सवारी करने के भाव में इस करण की योजना की जाती है । ( ९ ७ ) एलकाक्रीडित १५७ - १५८. इस करण में एलकाक्रीडिता चारी ( ना ० शा ० ११।२० )
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५०८ नाट्यशास्त्रम् में अग्रतलसंचर पैरों को ऊपर - नीचे उछाल लेकर नीचे लाने के समय शरीर को झुकाते और ऊपर ले जाते समय शरीर को सिकुड़ा कर रखते हुए घुमाव लेते हुए दोनों हाथ दोल तथा कटकामुख मुद्रा में न्यस्त करते हैं । इसकी योजना मृग आदि प्राणियों तथा अधम पात्रों की गति प्रस्तुत करने में की जाती है । ( ९ ८ ) ऊरुवृत्त १५८-१५९. इस करण में ऊरुद्धृता चारी ( ना ० शा ० ११।३८ ) में तलसंचार की एड़ी बाहर की ओर करते हैं एवं जंघाएँ झुकी हुई रखते हैं, इसके साथ ही हाथों को चक्राकार घुमाते हुए ( व्यावर्तित ) क्रमशः अराल तथा कटकामुख मुद्रा ( ना ० शा ० ६१६० ) में रखते हुए क्रमशः ऊरु प्रदेश एवं पृष्ठ की ओर झुकाकर रखते हैं । इसकी योजना प्रणयावस्था में होने वाले क्रोध, ईर्ष्या, प्रणय एवं प्रार्थना के भावाभिनय में की जाती है । ( ९९ ) मदस्खलित १५ ९ -१६०. इस करण में आविद्ध चारी ( ना ० शा ० ११।३८ ) में स्वस्तिक किये गये कुश्चित पाद को फैला कर शीघ्रता से ' अश्वित ' कर नीचे पटकते हैं, दोनों हाथ दोलामुद्रा में नीचे हिलाते हुए न्यस्त करते हैं और मस्तक परिवाहित दशा में ( ना ० शा ० ८।२७ ) क्रमशः एक ओर से दूसरी ओर घूमने वाला रखा जाता है । इसकी योजना मद की मध्यावस्था में रखी जाती है । ( १०० ) विष्णुक्रान्त १६०-१६१. इस करण में कुश्चित पाद को भूमि से ऊपर की ओर दण्ड-पाद चारी की ( ना ० शा ० ११।४३ ) स्थिति में बढ़ाते हैं तथा दोनों हंसपक्ष हस्तों को घूमते हुए रख कर ' रेचित ' करते हैं । विष्णुक्रान्त शब्द से आशय है विष्णु सदृश पादोत्क्रमण निदर्शित करना । इसका अभिनय ऐसे ही अवसर पर होता है । ( १०१ ) सम्भ्रान्त १६१-१६२. इस करण में आविद्धा चारी में ( ना ० शा ० ११।३८ ) पैरों को चक्राकार घूमनेवाले रखते हैं और हाथों को व्यावर्तित तथा परिवर्तित करते हुए ' अलपल्लव ' मुद्रा • में संचालित करते हुए ऊरू पर न्यस्त करते हैं । इसकी योजना घबड़ाहट की दशा में चलने के अभिनय में की जाती है ।
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५० ९ ( १०२ ) विष्कम्भ १६२-१६३. इस करण में सूचीपाद चारी में ( ना ० शा ० ११-३४ ) स्थित वामपाद को निकुट्टित करते हैं, इसके साथ ही सूचीमुख मुद्रा में ( ना ० शा ० ६।१ ९ १ ) न्यस्त वाम हस्त को अलपल्लव मुद्रा में न्यस्त दक्षिण हस्त से अलग करते हुए ' विद्ध ' करते हैं और फिर वक्ष पर न्यस्त करते हैं । फिर इसी प्रक्रिया को दुहराते हुए दक्षिण पाद एवं दक्षिण हस्त से विद्ध करते हुए दक्षिण पाद को निकुट्टित किया जाता है । इस प्रकार इस करण में एक ही प्रक्रिया के बार - बार ' विष्कम्भ ' करने अर्थात् दुहराने के कारण इसका नाम ' विष्कम्भ ' रखा गया है । ( १०३ ) उदूघट्टित १६३-१६४. इस करण में उद्घट्टित ( चरण की ) स्थिति में पंजे के बल पर खड़े होकर एड़ी से भूमि को छूते हैं और इसी के साथ एक हाथ से दूसरे हाथ पर ताल देते हैं । इसके साथ ही पार्श्व को नत करते हैं । फिर दूसरी बाजू से इसी प्रक्रिया को दोहराया जाता है । प्रसन्नता के भावाभिनय में इस करण की योजना की जाती है । ( १०४ ) वृषभक्रीडित १६४-१६५. इस करण में अलाता चारी ( ना ० शा ० ११।४१ ) में पैरों को न्यस्त करते हुए दोनों हाथों को ' रेचित ' अर्थात् चक्राकार घुमा कर कुचित करते हैं और पुनः बाहु एवं शीर्ष प्रदेश पर अलपल्लव मुद्रा में अति करते हुए अर्थात् वृत्ताकार मोड़ कर उन्हें न्यस्त करते हैं । ( १०५ ) लोलित १६५-१६६. इस करण में वैष्णवस्थान ( ना ० शा ० ११।५२-५३ ) में स्थित होकर दक्षिण- हस्त को रेचित ( अर्थात् हंसपक्ष मुद्रा में शीघ्र घुमाव देते हुए ) रखते हैं और वाम- हस्त को ' अश्वित ' अर्थात् अलपल्लव मुद्रा में वक्ष पर न्यस्त करते हैं तथा मस्तक को लोलित ( ८।३५ ) स्थिति में दोनों पार्श्व में विश्राम लेते या रुकते हुए रखते हैं । ( १०६ ) नागापसर्पित १६६-१६७. इस करण में दोनों चरण स्वस्तिक करते हुए अलग हटाते हैं, हाथ ' रेचित ' कर घूमते हुए रखते हैं और मस्तक कुटिलगति से, क्रमशः एक पार्श्व में परिवाहित स्थिति ( ना ० शा ० ८।२७ ) में घुमाया जाता है । इस करण का कुटिलगति के कारण नागापसर्पित नाम अन्वर्थ है ।
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५१० नाट्यशास्त्रम् ( १०७ ) शकटास्य १६७-१६८. इस करण में शकटास्या चारी में ( ना ० शा ० ११।१६ ) पाद को अग्रतलसञ्चर स्थिति में न्यस्त करते हैं, अङ्गों को स्थिर दशा में ( निषण्ण ) रखते हुए एक हाथ को फैलाया जाता है । उर को उद्वाहित स्थिति में रख कर दूसरे हाथ को कटकामुख मुद्रा में वक्ष पर न्यस्त करते हैं । इस शब्द की व्युत्पत्ति है- -- शकटस्य असनं क्षेपः ' अर्थात् शकट का स्थापन ही ' शकटास्य ' करण होता है । भाणिका जैसे उपरूपक में उपयुक्त बालक्रीडा के अवसर पर इस करण की अभिनय - प्रदर्शनार्थ योजना की जाती है । ( १०८ ) गङ्गावतरण १६८ - १६ ९ इस करण में दोनों चरणों को उत्क्षेप तथा निक्षेप के पश्चात् उन्नत एवं सन्नत करते हैं और उन्हें पीछे की ओर इस प्रकार उठाते हैं, कि उनके तलवे और उङ्गलियाँ ऊपर की ओर रहें, इसके साथ - साथ दोनों पिताकहस्तों को हथेलियों के बल पृथ्वी पर टिका कर शरीर ( के बल ) को सन्तुलित करते हैं और ग्रीवा को सन्नत मुद्रा में ( ना ० शा ० ८।१७० ) झुका कर रखते हैं । इसमें त्रिविक्रम की स्थिति में पैरों को फैला कर नीचे उतरने के प्रयोग के द्वारा गङ्गादेवी के अवतरण जैसी स्थिति का भान करवाया जाता है । नामानुसार ही स्थिति के अनुरूप अभिनय उपस्थित होने पर इस करण की योजना करनी चाहिए । १६ ९ - १७०. बम्बई संस्करण में पद्य १६६ तथा १७० के मध्य चार पद्य प्राप्त होते हैं जिन्हें वहीं मूलपाठ में भी संयुक्त किया गया है । बड़ौदा संस्करण में इनकी क्रम संख्या न देकर इन्हें इसी स्थान में रखा गया है । ये पद्य नाट्यशास्त्र में थोड़े पाठान्तर के साथ अलग - अलग प्रसंगों में प्राप्त होते हैं तथा वहीं इनके अर्थ को भी प्राप्त किया जा सकता है । अभिनवगुप्त आचार्य ने इसी कारण इस स्थान पर इनकी व्याख्या नहीं की । पाठकों के बोधार्थ उन्हें यहाँ भी सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है
यानि स्थानानि याचार्यो व्यायामे कथितानि तु ।
पादप्रचारस्तेषान्तु करणानामयं भवेत् ॥ क ॥
ये चापि नृत्तहस्तास्तु गदिता नृत्तकर्मणि । तेषां समासतो योगः करणेषु विभाव्यते ॥ ख ॥। '
प्रायेण करणे कार्यों वामो वक्षःस्थितः करः ।
चरणश्चा ( स्या ) नुगचापि दक्षिणस्तु भवेत् करः ॥ ग ॥
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५११
चार्यश्चैव तु याः प्रोक्ता नृत्तहस्तास्तस्थैव च ।
सा मातृकेति विज्ञेया तद्भेदात् करणानि ॥ घ ॥
[ नृत्त ( सम्बन्धी व्यायाम ) के प्रसंग में यहाँ जिन स्थान एवं चारियों का उल्लेख किया गया है ये नृत्त करणों में होने वाले पादप्रचारों अथवा गति के उपयोगी होने के कारण प्रसङ्गवश यहां बतलाये गये हैं । ( क ) और नृत्तकर्म में जिन नृत्तहस्तों का विधान बतलाया गया उन्हें भी करणों में अनेकविध रूप में सहयोग करने या प्रयोग होने के कारण ही निर्दिष्ट किया गया है । ( ख ) जहाँ अन्यथा निद्दिष्ट न हो तो वहाँ प्रायः वाम हस्त को वक्ष पर न्यस्त करते हैं और दक्षिण हस्त को चरण की गति के अनुरूप क्रियाशील रखा जाता है । ( ग ) इस प्रसङ्ग में जिन चारियों एवं नृत्तहस्तों का उल्लेख हुआ है उन्हें उत्पादक होने के कारण नृत्तकरणों की मातृका माना जाता है क्योंकि इनके भेदों ( या विभागों ) से ही नृत्तकरणों की रचना होती है । ( घ ) ]. अङ्गहार-( १ ) स्थिरहस्त १७०-१७३. अङ्गहार के आरम्भ में दोनों हाथों को ऊपर फैला कर उत्क्षिप्त करने का आशय है लीन - करण ( ना ० शा ० ४।६६ ) का सम्पादन करना, फिर सम्पादनस्थान में चरणों को न्यस्त करते हुए समनख - करण ( ना ० शा ० ४।६५ ) को प्रस्तुत करते हैं । फिर व्यंसितकरण ( ना ० शा ० ४।१०८ ) को प्रस्तुत कर अपसृत एवं विप्रकीर्ण हस्तों को ऊपर की ओर उठाते हुए आलीढ़ स्थान में ( ना ० शा ० ११।६७-६८ ) स्थित होते हैं और फिर परिवर्तन कर प्रत्यालीढ़ स्थान ( ना ० शा ० ११।७०-७१ ) में स्थित हो जाते हैं । इसके पश्चात् फिर क्रमशः निकुट्टित ( ना ० शा ० ४१६ ९ ), ऊरु-वृत्त ( ना ० शा ० ४।१५६ ), आक्षिप्त ( ना ० शा ० ४।७५ ), स्वस्तिक ( ना ० शा ० ४।११५ ), नितम्ब ( ना ० शा ० ४।१४६ ), करिहस्त ( ना ० शा ० ४।१४३ ) तथा अन्त में कटिच्छिन्न करण ( ना ० शा ० ४।७२ ) को प्रस्तुत करते हैं । इस प्रकार इस अङ्गहार में एकादश करण समूह का प्रयोग होता है । कुछ आचार्यगण ( इन ) अङ्गहारों में अभिहित अङ्ग एवं करणों का चारों दिशाओं में प्रस्तुतीकरण करने का निर्देश करते हैं क्योंकि मुनि ने स्वयं परिवृत्तक- रेचित अङ्गहार के लक्षण - प्रसङ्ग में ' पराङ्मुख विधिर्भूय एवमेव भवेत् पुनः ' के द्वारा इसी तथ्य की ओर संकेत किया है ।