भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 641–650

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 641 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१२ नाट्यशास्त्रम् ( २ ) पर्यस्तक १७३-१७५. इस अङ्गहार के आरम्भ में तलपुष्पपुट करण ( ना ० शा ० ४।६१ ) को और फिर क्रमशः अपविद्ध ( ना ० शा ० ४।५४ ), वर्तित ( ना ० शा ० ४।६२ ), निकुट्टक ( ना ० शा ० ४।६६ ), उरुद्धत्त ( ना ० शा ४।१५६ ) ( ना ० शा ० ४।११६ ), उरोमण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ), नितम्ब आक्षिप्त ) करिहस्त ( ना ० शा ० ४।१४८ ) तथा अन्त में कटि-( ना ० शा ० ४।१४६ च्छिन्न करण ( ना ० शा ० ४।७२ ) को प्रस्तुत करते हैं । तथा अपविद्ध करण के पश्चात् वर्तित करण के स्थान पर एक तलपुष्पपुट स्थान का प्रयोग कर निकुट्टित करण का पाठान्तर के अनुसार प्रत्यालीढ़ गया है । इस प्रकार इस अङ्गहार में दस सम्पादन करना निर्दिष्ट किया करणसमूह का प्रयोग रहता है । ( ३ ) सूचीविद्ध १७५-१७७. इस अङ्गहार के आरम्भ में अलपल्लव तथा सूचीहस्त को करने के निर्देश से अर्धसूची करण ( ना ० शा ० ४।१३७ ) प्रस्तुत करने प्रस्तुत पश्चात् क्रमशः विक्षिप्त करण ( ना ० शा ० ४।११ ) से का संकेत है । इसके का ( ना ० शा ० ४।१२०, ६६, १५६, ११६, लेकर मूल में निर्दिष्ट करणों ११५, १४५ तथा ७२ ) प्रयोग किया जाता है । ( ४ ) अपविद्ध अङ्गहार के आरम्भ में अपविद्ध करण ( ना ० शा ० १७७-१७९. इस करण ( ना ० शा ० ४ १३ ९ ) का ४।६४ ) का तथा इसके बाद में सूचीविद्ध को बद्धा-प्रयोग किया जाता है । इसके पश्चात् हाथों को उद्वेष्टित कर त्रिक चारी ( ना ० शा ० ११।२१ ) में स्थित कर ( एक ) घुमाव देते हैं तथा से प्रस्तुत होने वाले उरोमण्डल करण से हस्तों को वक्ष-उरोमण्डल हस्तमुद्रा अन्त में कटिछिन्न ( ना ० शा ० ४।७२ ) करण को सम्पन्न प्रदेश पर न्यस्त कर करते हैं । ( ५ ) आक्षिप्तक . इस अङ्गहार का आरम्भ नूपुरकरण ( ना ० शा ० ४।७७ ) १७ ९ -१८१ करण से लेकर नाट्यशास्त्रोक्त कटि-से होता है और फिर क्रमशः विक्षिप्त च्छिन्न तक के करणों को सम्पन्न करते हैं । विद्वानों के मत में जहां मूल में ' पुनः ' शब्द का प्रयोग हो वहाँ कुछ जाना मुनि को इष्ट है यह आशय लेना चाहिए । करणों का दुहराया

पृष्ठ 642

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 642 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५१३ ( ६ ) उदूघडित ९८१-१८३ १. इस अङ्गहार के आरम्भ में बारी - बारी से दोनों ओर हाथों को चक्राकार घुमाते हैं और फिर बाहर की ओर क्षिप्त करने के साथ ही चरणों को झुकाने के कार्य द्वारा निकुट्टक - करण को प्रस्तुत करने की सूचना दी गयी है । इस स्थिति में अपविद्ध या उरोमण्डल करण को भी ले सकते हैं पर उन्हें यहाँ अन्य चेष्टाओं में लिया जा सकता है । इसके पश्चात् क्रमशः नितम्ब, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को सम्पन्न किया जाता है । ( ७ ) विष्कम्भ १८४-१८७. इस अङ्गहार में पिछले करण के समान आरम्भ में हाथों को उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित एवं चरणों को निकुट्टित करते हैं और फिर हाथों और पैरों को क्रमशः कुंचित करते हुए दोनों पार्श्वों से अवित करण का प्रयोग करते हैं । इसके बाद निकुञ्चित ( ना ० ० शा ० ४।८७ ) एवं अर्धस्वस्तिक ( ना ० शा ० ४ ८३ ) करणों को प्रस्तुत कर अश्चित करण ( ना ० शा ० ४।८४ ) को प्रस्तुत किया जाए । इसके बाद निकुश्चित ( ४।८७ ) तथा अर्धस्वस्तिक ( ना ० शा ० ४।८३ ) करण के बाद अश्चित करण ( ना ० शा ० ४।८४ ) • और फिर उरूवृत्त करण ( ना ० शा ० ४।१५८-१५६ ) का प्रदर्शन कर हाथों को चतुरस्र स्थिति में न्यस्त कर चरणों से निकुट्टक करण प्रस्तुत करे । फिर भुजङ्गत्रासित करण ( ना ० शा ० ४१६४ ) को प्रस्तुत करते समय उनमें विशेष रूप में हाथों को उद्वेष्टित स्थिति में न्यस्त रखे । फिर इसके साथ ही भ्रमरक करण ( ना ० शा ० ४।६८ ) का प्रयोग करे तथा कटि प्रदेश को मध्यभाग से वलित कर छिन स्थिति में लाये और अन्त में करिहस्त ( ना ० शा ० ४।१४७-१४८ ) तथा कटिछिन ( ना ० शा ० ४।७१ ) करणों को प्रस्तुत कर इस अङ्ग-हार को सम्पन्न किया जाए । ( ८ ) अपराजित १८७-१८९. इस अङ्गहार के आरम्भ में दण्डपाद करण का ( ना ० शा ० ४।१४२ ) प्रयोग कर हाथों को बाहर की ओर झटके से फेंक कर ' विक्षिप्त ' तथा अन्दर की ओर खींच कर ' आक्षिप्त ' करे फिर व्यंसित करण ( ना ० शा ० ४।१०६ ) सम्पन्न करने के पश्चात् वाम हस्त एवं वाम चरण को एक साथ आगे सरकता हुआ रखते हुए प्रसर्पित करण ( ना ० शा ० ४।१४६ ) को प्रस्तुत किया जाए । इसके पश्चात् हाथों को चतुरस्र कर पैरों से दो निकुट्टक करणों अर्थात् निकुट्टक और अर्धनिकुट्टक करणों ( ना ० शा ० ४।६ ९ -७० ) ३३ ना ० शा ० प्र ०

पृष्ठ 643

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 643 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१४ नाट्यशास्त्र को प्रस्तुत कर क्रमशः आक्षिप्त ( ना ० शा ० ४।११६ ) उरोमण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ) और अन्त में करिहस्त ( ना ० शा ० ४।१४८ ) और कटिच्छिन्न करणों ( ना ० शा ० ४।७२ ) को प्रस्तुत करना चाहिए । ( ९ ) विष्कम्भापसृत १८ ९ -१ ९ १. इस अङ्गहार के आरम्भ में कुट्टित करण को प्रस्तुत करने का आशय है निकुट्टक तथा अर्धनिकुट्टक करणों को प्रस्तुत करना । इसके पश्चात् भुजङ्गवासित करण को ( ना ० शा ० ४।८४ ) प्रस्तुत कर हस्तों को रेचित कर पताक मुद्रा में ( ना ० शा ० २।१८ ) व्यस्त करे और फिर क्रमशः आक्षिप्तक ( ना ० शा ० ४।११६ ), उरोमण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ) तथा कटिछिन्न करण ( ना ० शा ० ४।७२ ) को प्रस्तुत करे । यहाँ विशेषता यह है कि कटिछिन्न करण में पर्यायशः एक लताहस्त रखा जाए । ( १० ) मत्ताक्रीड १ ९१-१९ ४. इस अङ्गहार के आरम्भ में त्रिक के वलन करने से भ्रमरक करण ( ना ० ४ ) प्रस्तुत करने का संकेत है । फिर नूपुर करण को ( ना ० शा ० ४।९ ७ ) प्रस्तुत कर कुञ्चित पाद करते हुए भुजङ्गत्रासित करण ( ना ० शा ० ४८४ ) का और सभ्य अर्थात् दक्षिण अंगप्रदेश से वैशाखरेचित करण ( ना ० शा ० ४।१८ ) का प्रयोग किया जाए । यहाँ परिच्छिन्न शब्द से ' छिन्न ' करण को प्रस्तुत करना इष्ट तथा बाह्यभ्रमरक का आशय है भ्रमरक करण को बायीं ओर से प्रस्तुत करना । इसके उपरान्त व्यंसित करण ( ना ० शा ० ४।१०६ ) को प्रस्तुत करे और फिर क्रमशः उरोमण्डल ( ना ० पा ० ४। ११५ ), नितम्ब ( ना ० शा ० ४।१४६ ), करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रस्तुत किया जाए । ( ११ ) स्वस्तिकरेचित १ ९४-१९ ६. इस अङ्गहार के आरम्भ में हाथ तथा पैरों को रेचित करने का आशय है वैशाखरेचित करण ( ना ० शा ० ४।६८ ) को प्रस्तुत करना । इसके पश्चात् वृश्चिककरण को प्रस्तुत करे और फिर एक बार वैशाखरेचित तथा वृश्चिककरणों को दोहरा दे और लताहस्तों के साथ निकुट्टककरण को और अन्त में दोनों पार्श्वों से कटि को छिन्न कर कटिच्छिन्न करण ( ना ० शा ० ४।७२ ) को प्रस्तुत करे । ( १२ ) पार्श्वस्वस्तिक १ ९६-१९९. इस अङ्गहार के आरम्भ में दोनों पावों से स्वस्तिक करने का आशय है दिक्स्वस्तिक करण ( ना ० शा ० ४।७७ ) का प्रयोग करना ।

पृष्ठ 644

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 644 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५१५ फिर एक ओर से निकुट्टक करते हुए अर्धनिकुट्टक करण ( ना ० शा ० ४।७० ) को और फिर दूसरी ओर से दिवस्वस्तिक करण को प्रस्तुत कर अर्थ- निकु-ट्टक करण दोहराया जाए । हाथों को व्यावृत्त करने से अपविद्ध करण ( ना ० शा ० ४।६४ ) का प्रयोग सूचित किया गया है । इसके बाद फिर क्रमशः करूवृत्त, आक्षिप्त, नितम्ब, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग करना चाहिए । ( १३ ) वृश्चिकासृत ) १ ९९ -२०१. इस अङ्गहार के आरम्भ में वृश्चिक करण के साथ लता-हस्त के प्रयोग से लता वृश्चिक करण का ( ना ० शा ० ४।१०५ ) प्रयोग सूचित किया गया है । हाथ को नासिका के अग्रभाग के समानान्तर ले जाकर झुकाते हुए निकुचित करण ( ना ० शा ० ४ ८७ ) का तथा हाथ को उद्वेष्टित करते हुए अर्ध मत्तल्लि करण ( ना ० शा ० ४।८ ९ ) का प्रयोग किया जाए । इसके पश्चात् हाथों को उद्वेष्टित कर नितम्ब करण ( ना ० शा ० ४ १४६ ) को प्रस्तुत करे और फिर क्रमशः करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रदर्शित करे । कुछ आचार्य नितम्ब के स्थान पर भ्रमरक करण का औचित्य इस अङ्ग-हार में स्वीकार करते हैं । उनके मत में नितम्ब परिवर्तन शब्द का अर्थ होगा नितम्ब भ्रमण जिसे भ्रमरक करण में किया जाता है । ( १४ ) भ्रमर २०१-२०३. इस अङ्गहार के आरम्भ में नूपुरपादिकाचारी ( ना ० शा ० ११।३५ ) के प्रयोग द्वारा नूपुर करण ( ना ० शा ० ४।६७ ) का प्रयोग इष्ट है । इसके उपरान्त आक्षिप्तक करण का प्रयोग करना चाहिए । ' कटिच्छिन्न ' को बीच में रखने से यहाँ परिच्छिन्न करण का ( ना ० शा ० ४।१०६ ) भी प्रयोग इष्ट है फिर सूचीपाद ( ना ० शा ० ४।१३ ९ ), नितम्ब ( ना ० शा ० ४१४६ ), करिहस्त ( ना ० शा ० ४।१४८ ), उरोमण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ) तथा कटिच्छिन्न करणों का क्रमशः प्रयोग किया जाए । ( १५ ) मत्तस्खलितक २०३-२०५. इस अङ्गहार के आरम्भ में मत्तल्लि करण ( ना ० शा ० ४८८ ) का प्रयोग करते हैं, फिर दक्षिण हस्त के आवर्तन और कपोल पर निकुञ्चन के द्वारा गण्डमुखी ( ना ० शा ० ४।१३२ ) तथा लीन करण ( ना ० शा ० ४।६६ ) का प्रयोग किया जाता है और फिर अपविद्ध ( ना ० शा ० ४।६४ ) तथा तलसंस्फोटित करण ( ना ० शा ० ४।१३० ) को क्षिप्रगति में प्रस्तुत करते हुए अन्त में करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करण को सम्पन्न करते हैं ।

पृष्ठ 645

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 645 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१६ नाव्यशास्त्र ( १६ ) मदविलसित २०५ -२०७. इस अङ्गहार के आरम्भ में दोला हस्तों के उल्लेख से मद-स्खलितक - करण ( ना ० शा ० ४।१५६ ) का प्रयोग इष्ट है एवं स्वस्तिक चरण के अपसरण द्वारा मत्तल्लिकरण ( ना ० शा ० ४८८ ), अश्वित एवं ललित हस्तों के संघट्टित करने ( ताली बजाने ) के द्वारा तलसंघट्टित करण के प्रयोग का संकेत दिया गया है । इसके उपरान्त क्रमशः निकुट्टक ( ना ० शा ० ४।६ ९ ), ऊरूदृवृत्त ( ना ० शा ० ४।१५६ ), करिहस्त एवं कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग करते हैं । कुछ आचार्य आरम्भ के तीन करणों को तीन बार दोहराते हुए इस अङ्गहार में तेरह करणों का प्रयोग तथा अन्य आचार्य इसी अङ्गहार के सात करणों के तीन बार प्रयोग को सम्पन्न करने वाले इस करण में इक्कीस करणों के प्रयोग को बतलाते हैं । ( १७ ) गतिमण्डल २०७-२०९. इस अङ्गहार के आरम्भ में मण्डलस्थान ( ना ० शा ११।६५-६७ ) के उल्लेख से मण्डलस्वस्तिक - करण ( ना ० शा ० ४।६६ ) तथा निवेश - करण ( ना ० शा ० ४।१५६ ) के प्रयोग का संकेत दिया गया है । और रेचितं हस्त के द्वारा उन्मत करण ( ना ० शा ० ४।७५ ) का इसी प्रकार उद्घट्टित चरण के प्रयोग से उद्घट्टितकरण का प्रयोग इष्ट है । इसके पश्चात् क्रमशः इसमें मत्तल्लि, आक्षिप्त, उरोमण्डल तथा कटिच्छिन्न करणों का प्रयोग किया जाता है । ( १८ ) परिच्छिन्न २० ९ -२११. इस अङ्गहार के आरम्भ में प्रस्तुत समपाद स्थान से ( ना ० शा ० १११५६-६१ ) समनखकरण ( ना ० शा ० ४।६५ ) का प्रयोग इष्ट है । परिच्छिन्न करण से छिन्न करण ( ना ० शा ० ४।१०६ ) का तथा पैरों से आविद्धाचारी के ( ना ० शा ० ११।३८ ) प्रदर्शन से सम्भ्रान्तकरण ( ना ० शा ० ४।१६१ ) का प्रयोग सूचित किया गया है । बाह्यभ्रमरक के प्रदर्शन का आशय है भ्रमरक करण का ( ना ० शा ० ४।६६ ) सम्पादन करना । इसके पश्चात् वामपाद से सूचीचारी के द्वारा अर्धसूची करण ( ना ० शा ० ४११३८ ) का प्रयोग करना और फिर क्रमशः अतिक्रान्त ( ना ० शा ० ४।१२७ ) भुजङ्गत्रासित ( ना ० शा ० ४ ८५ ) तथा करिहस्त एवं कटिच्छिन्न करणों को प्रयुक्त करना चाहिए । ( १ ९ ) परिवृत्तकरेचित २११-२१५ इस अङ्गहार के आरम्भ में हाथों को मस्तक पर स्वस्तिक

पृष्ठ 646

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 646 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ कर शिथिल - क्रम में रखने से क्रमशः नितम्ब ( ना ० शा ० ४। १४६ ) तथा स्वस्तिक चेष्टा से स्वस्तिकरेचित करण ( ना ० शा ० ४।६७ ) का प्रयोग सूचित किया गया है । इसके पश्चात् शरीर को झुकाने के क्रिया - कलाप से विक्षिप्ताक्षिकरण ( ना ० शा ० ४१८१ ) का तथा शरीर को उन्नत स्थिति में न्यस्त कर हस्तों को रेचित एवं लता चेष्टा में सञ्चालित करने के द्वारा लतावृश्चिक करण ( ना ० शा ० ४।१०५ ) का प्रयोग सूचित किया गया है । हस्तों के रेचित प्रयोग द्वारा उन्मत्त करण ( ना ० शा ० ४।७४ ) का प्रयोग समझना चाहिए । इसके पश्चात् करिहस्त एवं भुजङ्गत्रासित करण को प्रस्तुत किया जाता है और फिर आक्षिप्तक करण ( ना ० शा ० ४।११६ ) को सम्पन्न किया जाता है । इसके पश्चात् पैरों की स्वस्तिक क्रिया करते हुए बंद्धाचारी ( ना ० शा ० ११।२१ ) के प्रयोग से नितम्ब करण ( ना ० शा ० ४। १४६ ) का सम्पादन किया जाता है । अन्तिम दो करणों को छोड़ कर सभी करणों को फिर से उलटे घुमाव या चारों ओर मुँह फिरा कर दुहराना इष्ट है और इन उल्लिखित करणों के विधिवत् प्रस्तुत करने के पश्चात् ( ही ) अन्त में करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणी को प्रस्तुत करना चाहिए 159-555 ( २० ) वैशाख - रेचित २१५-२१८. इस अङ्गहार के आरम्भ में शरीर के साथ हाथों को रेचित एवं अपविद्ध करने के द्वारा दोनों बाजुओं से वैशाखरेचित करण ( न ० शा ० ४६८ ) का प्रयोग इष्ट है । फिर इसी क्रम को दुहराना चाहिए और नूपुर तथा भुजङ्गवासित करणों को क्रमशः प्रयुक्त करना चाहिये । ' रेचित ' से आशय है उन्मत करण ( ना ० शा ० ४।७४ ) का प्रयोग करना । इसके पश्चात् मण्डलस्वस्तिक करण को प्रस्तुत करके बाहु और मस्तक को निकुश्चित करते हुए निकुट्टित करण ( ना ० शा ० ४।५६ ) को प्रस्तुत करना चाहिए । इसके पश्चात् क्रमशः करूवृत्त, आक्षिप्तक, उरोमण्डल, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रस्तुत करना चाहिए । ( २१ ) परावृत्त २१८-२२०. इस अङ्गहार के आरम्भ में दाहिने बाजू से जनित करण ( ना ० शा ० ४।१५५ ) को प्रस्तुत कर एक पैर फैला कर शकटास्य करण ( ना ० शा ० ४।१६८ ) को प्रस्तुत करते हैं । इसके पश्चात् अलात करण ( ना ० शा ० ४१७८ ) को प्रस्तुत कर त्रिक को घुमाव देते हुए भ्रमरक करण ( ना ० शा ० ४।९ ८ ) प्रस्तुत किया जाता है । फिर वाम हस्त को अति

पृष्ठ 647

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 647 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५१८ 15 नाट्यशास्त्र करते हुए कपोल पर कुट्टन करते हुए करिहस्त करण को प्रस्तुत करते हुए अन्त में कटिच्छिन्न करण को प्रस्तुत करते हैं । ( २२ ) अलातक २२०-२२२. इस अङ्गहार के आरम्भ में स्वस्तिक करण ( ना ० शा ० ४।६८ ) को प्रस्तुत कर दोनों हाथों को व्यंसितकरण ( ना ० शा ० ४ १०६ ) की प्रक्रिया में न्यस्त रखा जाता है । यहाँ ' व्यंसितो करो ' शब्द को द्विवचन में प्रयुक्त करने का आशय है इस करण को दोहराया जाना । इसके पश्चात् क्रमशः अलातक ( ना ० शा ० ४ ७८ ), ऊर्ध्वजानु ( ना ० शा ० ४।८६ ), निकुचित ( ना ० शा ० ४।८७ ), अर्धसूची ( ना ० शा ० ४।१३८ ), विक्षिप्त ( ना ० शा ० ४।११६ ), उद्वृत्त ( ना ० शा ० ४।१५२ ), आक्षिप्तक ( ना ० शा ० ४।११६ ) तथा अन्त में करिहस्त एवं कटिच्छिन्न करणों को प्रस्तुत करना चाहिए । ( २३ ) पार्श्वच्छेद २२२–२२४. इस अङ्गहार के आरम्भ में वक्ष पर हाथों को निकुट्टित करने के द्वारा वृश्चिक- कुट्टिक करण ( ना ० शा ० ४।१०३ ) का प्रयोग सूचित किया गया है । इसके उपरान्त ऊर्ध्वजानु करण ( ना ० शा ० ४।८६ ) को रखते हुए प्रस्तुत करना चाहिए । फिर आक्षिप्तक ( ना ० शा ० कुचित पाद ) तथा स्वस्तिक करण ( ना ० शा ० ४।७५ ) को प्रस्तुत कर त्रिक ४ | ११६ को उरोमण्डल स्थिति में न्यस्त कर को घुमाव देते हैं । इसके पश्चात् हाथों उरोमण्डल- करण ( ना ० शा ० ४।११५ ) को प्रस्तुत करते हैं तथा फिर क्रमशः नितम्ब, करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रस्तुत करते हैं । ( २४ ) विद्युद्भ्रान्त २२४-२२६. इस अङ्गहार के आरम्भ में वामचरण से सूचीचारी के प्रस्तुत करने का आशय है बायी ओर से अर्धसूची - करण ( ना ० शा ० ४।१३८ ) का तथा दाहिनी ओर से विद्युद्भ्रान्त करण ( ना ० शा ० ४।१२६ ) का प्रयोग करना । फिर इन्हीं दोनों करणों को विपरीत दिशा से ( अर्थात् दक्षिण चरण से अर्धसूची और वामचरण से विद्युद्भ्रान्त करण का ) सम्पादन किया जाए और बाद में छिन्न अर्थात् परिच्छिन्नकरण ( ना ० शा ० ४।१०६ ) को प्रस्तुत कर त्रिक को घुमाव देते हैं । अभिनवगुप्तपादाचार्य के अनुसार परिच्छिन्न करण के बाद अतिक्रान्त करण का प्रयोग करना चाहिए । इसके पश्चात् लता-हस्त के साथ लता वृश्चिक करण ( ना ० शा ० ४।१०५ ) को प्रस्तुत कर अन्त में कटिच्छिन्न करण का प्रयोग किया जाए ।

पृष्ठ 648

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 648 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५१ ९ ( २५ ) उद्वृत्तक २२६-२२८. इस अङ्गहार के आरम्भ में नूपुरपादिकाचारी ( ना ० शा ११।३५ ) को प्रस्तुत करने का आशय है नूपुर करण ( ना ० शा ० ४।१८ ) को प्रस्तुत करना । इसके पश्चात् दक्षिण एवं वाम हस्त को झुलाते हुए रखने के द्वारा भुजङ्गाश्चित करण ( ना ० शा ० ४।१०१ ) तथा पार्श्व में करने ( इत्यादि ) से गृद्धबलीनक करण ( ना ० शा ० ४ १३५ ) का प्रयोग सूचित होता है । ' करी सव्यवामी ' में प्रयुक्त द्विवचन से इन दोनों को एक साथ प्रस्तुत करने की भी स्थिति सूचित की गयी है । इसके पश्चात् विक्षिप्त करण ( ना ० शा ० ४।११६ ) को प्रस्तुत करते हुए इसी हस्तमुद्रा से सूचीकरण को सम्पादित कर त्रिक को परिवर्तित कर बद्धाचारी में चरण को न्यस्त कर नितम्ब करण ( ना ० शा ० ४।१४५ ) को प्रस्तुत करे । फिर लता वृश्चिक-करण ( ना ० शा ० ४।१०५ ) को प्रस्तुत कर अन्त में कटिच्छिन्न करण का प्रयोग किया जाए । ( २६ ) आलीढ़ २२८ - २३०. इस अङ्गहार के आरम्भ में आलीढ़ स्थान ( ना ० शा ० ११।६७ ) में स्थित होकर फिर व्यंसितकरण ( ना ० शा ० ४।१०६ ) को प्रस्तुत करते हैं । फिर इसी स्थान में रखी जाने वाली हस्तमुद्रा वाले हाथों को बाहुओं के कोनों अर्थात् कन्धों पर निकुट्टित करते हुए निकुट्टित करण ( ना ० शा ० ४।६ ९ ) को प्रस्तुत किया जाए । इसके उपरान्त वामचरण से नूपुर-करण ( ना ० शा ० ४।६८ ) और दक्षिण चरण से अलातकरण ( ना ० शा ० ४।७८ ) को प्रस्तुत किया जाए । फिर दक्षिण भाग से आक्षिप्त करण ( ना ० शा ० ४।११६ ) को प्रस्तुत कर इसी में आगे दोनों हाथों से उरोमण्डल करण ( ना ० शा ० ४।१२५ ) को प्रस्तुत कर अन्त में करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रस्तुत किया जाए । ( २७ ) रेचित २३० - २३२. इस अङ्गहार का आरम्भ रेचित् हस्तों से होता है तथा इसमें रेचित प्रक्रिया वाले सभी करणों का समावेश किया जाता है जिसे अन्त में कहे गये – ' रेचितं करणं कार्यम् ' द्वारा सूचित समझना चाहिए । ' कार्यम् ' पद से सभी रेचित प्रक्रिया वाले करणों को अङ्गों सहित व्यावहारिक बुद्धि से संयुक्त करते हुए प्रयोग में विचित्रता उत्पन्न करना अभीष्ट है । अतएव अङ्गों के विचित्र प्रभेदों से मिश्रित स्वरूप वाला यह अङ्गहार माना जाता है । रेचित प्रक्रिया बड़ी उलझी हुई है फिर भी इसका क्रम इस प्रकार रहता

पृष्ठ 649

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 649 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

५२० नाट्यशास्त्र है । इसमें आरम्भ में स्वस्तिकरेचितकरण ( ना ० शा ० ४।६७ ) को और फिर क्रमशः ) अर्धरेचित ( ना ० शा ० ४।८० ), आक्षिप्तरेचित ( ना ० शा ० ४८ ), अर्धमसल्लि ( ना ० शा ० ४।१८ ) रेचकनिकुट्टक ( ना ० शा ० ४।६० ), भुजङ्गत्रस्तरेचित ( ना ० शा ० ४।६६ ), नूपुर ( ना ० शा ० ४।६७ ), वैशाखरेचित ( ना ० शा ० ४ ९ ८ ), भुजङ्गाखितक ( ना ० शा ० ४।१०१ ), दण्डरेचित ( ना ० शा ० ४।१०२ ), वृश्चिकरेचित ( ना ० शा ० ४।१०७ ), व्यंसित ( ना ० शा ० ४।१०६ ), निवृत्त ( ना ० शा ० ४।१२२ ), विनिवृत्त ( ना ० शा ० ४।११३ ), विवर्तितक ( ना ० शां ० ४।१२८ ), गरुडप्लुत ( ना ० शा ० ४।१३१ ), मयूरललित ( ना ० शा ० ४।१४१ ), सर्पितक ( ना ० शा ० ४।१४२ ) स्खलित ( ना ० शा ० ४।१४७ ), प्रसर्पितक ( ना ० शा ० ४।१४ ९ ), तलसंघट्टित ( ना ० शा ० ४।१५४ ), वृषभक्रीडित ( ना ० शा ० ४ १६५ ) तथा लोलित ( ना ० शा ० ४।१६६ ) करणों का प्रयोग होता है । यहाँ मूल में ' पुनस्तेनैव योगेन ' इत्यादि से पाश्वं तथा अङ्गों को आनत करने का आशय है एक करण के प्रयोग के बाद विचित्रता के लिए चक्रमण्डलकरण ( ना ० शा ० ४।११४ ) को प्रस्तुत कर फिर दूसरे करणों को प्रस्तुत करना । करणों का विचित्रतासम्पन्न यह क्रम चक्रमण्डल करण से व्यवहित होते हुए चलना चाहिए । इस प्रकार निर्दिष्ट करणों का जब क्रमिक पूर्ण हो जाए तो अन्त में उरोमण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ) तथा कटिच्छिन्न करण को प्रस्तुत कर अङ्गहार को पूर्ण किया जाए । ( २८ ) आच्छुरित २३२-२३४. इस अङ्गहार के आरम्भ में नूपुर करण ( ना ० शा ० ४।६७ ) को प्रस्तुत करते हैं । यहाँ त्रिक को घुमाव देने का आशय है भ्रमरक - करण ( ना ० शा ० ४।६६ ) को प्रस्तुत करना । इसके पश्चात् व्यंसित करण ( ना ० शा ० ४।१०६ ) को प्रस्तुत करते हुए त्रिक को विवर्तक कर नितम्ब करण ( ना ० शा ० ४।१४६ ) को प्रस्तुत करते हैं फिर वाम चरण से अलातक करण ( ना ० शा ० ४।७८ ) को और इसी के साथ लगातार सूची करण ( ना ० शा ० ४।१३७ ) को प्रस्तुत कर अन्त में करिहस्त एवं कटिच्छिन्न करण को प्रस्तुत किया जाता है । ( २ ९ ) आक्षिप्त रेचित २३३ - २३७. इस अङ्गहार में हस्त तथा चरण के स्वस्तिक प्रयोग के साथ रेचित होने वाले सभी करणों का प्रयोग ग्रहण किया गया है । तदनु-सार स्वस्तिक पादों के रेचन से होने वाले स्वस्तिक- रेचित ( ना ० शा ४।६७ )

पृष्ठ 650

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १, पृष्ठ 650 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५२१ करण से आरम्भ होकर क्रमशः पृष्ठस्वस्तिक ( ना ० शा ० ४।७६ ), दिवस्व-स्तिक ( ना ० शा ० ४।७७ ) कटीसम ( ना ० शा ० ४।७६ ), घूर्णित ( ना ० शा ० ४११३ ), भ्रमर ( ना ० शा ० ४।६६ ), वृश्चिकरेचित ( ना ० शा ४१०७ ), पार्श्व निकुट्टक ( ना ० शा ० ४।११० ), उरोमण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ), सन्नत ( ना ० शा ० ४ १३६ ), सिंहाकर्षित ( ना ० शा ० ४।१५१ ) तथा नागापसर्पित करणों ( ना ० शा ० ४।१६७ ) को सम्पन्न करते हैं । इसमें वक्षःस्वस्तिक ( ना ० शा ० ४।७४ ) करण को रेचन क्रिया से रहित होने के कारण मुनि ने समाविष्ट नहीं किया परन्तु कुछ आचार्य परिवर्तन क्रम में इस करण में भी रेचन प्रक्रिया मानते हैं और वक्षःस्वस्तिक को भी इस करण क्रम में रखने का समर्थन करते हैं । इसी प्रकार रेचित हस्त पादों के उत्क्षेपण को बतलाकर हस्त पादों की उत्क्षेपण क्रिया वाले सभी करणों का समावेश ( भी ) यहाँ सूचित किया गया है । तदनुसार उत्क्षेपण क्रिया वाले इन कारणों का क्रमशः प्रयोग करना चाहिये । ये हैं- दण्डपक्ष ( ना ० शा ० ४।१५ ), ललाटतिलक, ( ना ० शा ० ४।१११ ), तलविलसित ( ना ० शा ० ४।११७ ), निसुम्भित ( ना ० शा ० ४।१२५ ), विद्युद्भ्रान्त ( ना ० शा ० ४ १२६ ), गजक्रीडित ( ना ० शा ० ४१२६ ), नितम्ब ( ना ० शा ० ४।१४६ ), विष्णुक्रान्त ETTO ११ ), उरूद्वृत्त ( ना ० शा ० ४।१५६ ), आक्षिप्त ( ना ० मण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ) और फिर अन्त में ४।१४६ ), करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को को पूर्ण करना चाहिए । ( ३० ) सम्भ्रान्त २३७-२४०. इस अङ्गहार के आरम्भ में ४।११६ ) को प्रस्तुत कर हस्त एवं पादों को मुख शा ० तथा उरो-पुनः नितम्ब ( ना ० शा ० प्रस्तुत कर ( इस ) अङ्गहार विक्षिप्त करण ( ना ० शा ० के अनुसार संचालित करते हुए रखने का आशय है अवित ( ना ० शा ० ४।८३ ), गण्डसूची ( ना ० शा ० ४।१३२ ) तथा गंगावतरण ( ना ० शा ० ४ १६ ९ ) करणों का क्रमशः सम्पा-दन करना । इसी प्रकार वाम हस्त से सूची के प्रयोग द्वारा अर्धसूची करण ( ना ० शा ० ४।१३८ ) का तथा विक्षेप से दण्डसूची करण ( ना ० शा ० ४। १४३ ) का संकेत समझना चाहिए । दक्षिण हस्त को वक्ष पर व्यस्त रखने से चतुर करण ( ना ० शा ० ४।३६ ) तथा त्रिक के घुमाव के भ्रमरक करण ( ना ० शा ० ४।६६ ) का प्रयोग सूचित किया है । इसके उपरान्त क्रमशः नुपूर ( ना ० शा ० ४ ६७ ) आक्षिप्तक ( ना ० शा ० ४।११६ ), अर्धस्वस्तिक