भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 651–660

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 651–660

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* ५२२ नाट्यशास्त्र ( ना ० शा ० ४।८३ ), नितम्ब ( ना ० शा ० ४।१४६ ), करिहस्त, उरोमण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ) तथा अन्त में कटिच्छिन्न करण को प्रस्तुत किया जाता है । ( ३१ ) अपसर्पित २४०-२४२. इस अङ्गहार के आरम्भ में अपक्रान्त क्रम के प्रदर्शित करने का आशय है अपक्रान्त करण ( ना ० शा ० ४।१४० ) का प्रयोग करना । इसके पश्चात् हाथों को वक्ष पर न्यस्त करते हुए व्यंसित करण ( ना ० शा ० ४१०६ को तथा हाथों को उद्वेष्टित प्रक्रिया में सचालित करते हुऐ करि-हस्त करण ( ना ० शा ० ४।१४८ ) को प्रस्तुत करना चाहिए । यहाँ इसके बाद क्रमशः अर्धसूची ( ना ० शा ० ४।१३८ ), विक्षिप्त ( ना ० शा ० ४।११६ ) एवं कटिच्छिन्न करण ( ना ० शा ० ४।७६ ) को प्रस्तुत करना चाहिए । यहाँ उद्वृत्त का अर्थ है उरूद्वृत्त करण ( ना ० शा ० ४।१५६ ) को प्रस्तुत करना । इसके पश्चात् अन्त में क्रमशः आक्षिप्त ( ना ० शा ० ४ १३८ ), करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रस्तुत किया जाता है । ( ३२ ) अर्धनिकुट्टक २४२-२४४. इस अङ्गहार के आरम्भ में नुपूरपादचारी ( ना ० शा ० ) में चरणों को न्यस्त कर नुपूर - करण ( ना ० शा ० ४।१७ ) को तथा हस्तपाद को आक्षिप्त करते हुए विवृत्त करण ( ना ० शा ० ४।१२२ ) को प्रस्तुत करना चाहिए । इसके पश्चात् चरणों की गति के अनुसार त्रिक को घुमाव देते हुए भ्रमरीचारी को प्रस्तुत किया जाए तथा हस्त एवं पादों को निकुट्टित प्रक्रिया में संचालित करते हुए निकुट्टक ( ना ० शा ० ४।६६ ) तथा अर्ध-निकुट्टक ( ना ० शा ० ४।७० ) करणों को प्रस्तुत करते हुए अन्त में उरो-मण्डल ( ना ० शा ० ४।११५ ), करिहस्त तथा कटिच्छिन्न करणों को प्रस्तुत किया जाए । इस प्रकार विभिन्न करणों से अङ्गहार निष्पन्न होते हैं जिसे बतलाया जा चुका है । इन प्रत्येक करणों के सम्पन्न करने में जो समय लगेगा उसका मिलाकर जो प्रमाणानुसार समय होगा वही एक अङ्गहार में लगने वाला समय माना जाएगा । ये अङ्गहार छः, बारह या चौबीस करणों से निष्पन्न होनेवाले होते हैं । इनमें सन्धिकाल के आधार पर मात्रा, ताल तथा कला के प्रमाणानुसार एक

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५२३ या दो करणों को प्रविष्ट करवाने का प्रयोग रखा जाए जो सोलह मात्रा तक के प्रमाण का हो सकता है । इसके अतिरिक्त पूर्व अभिहित कुछ अङ्गहार सोलह करणों वाले होने से बड़े आकार वाले हैं । इसकी चतुरस्र ताल रखी जाती है । इनकी संख्या सोलह है । इनमें किसी एक के न्यून होने पर किसी अन्य से ताल क्रिया लेते हुए ताल प्रमाण की पूर्ति की जाती है । इस अङ्गहारों में अपविद्ध, उद्घट्टित, विष्कम्भ, विष्कम्भापसृत, स्वस्तिक-रेचित, वृश्चिकापसृत, मत्तस्खलित, गतिमण्डल, परिवृत्तकरेचित, परावृत्त, अलातक, उद्वृत्तक, रेचित, आक्षिप्तरेचित, सम्भ्रान्त तथा अर्धनिकुट्टक त्र्यत्र ताल वाले होते हैं । ये सोलह हैं । इसी प्रकार अवशिष्ट सोलह अङ्गहार चतुरस्रताल वाले होंगे जो मिलकर बत्तीस हो जाएंगे । इसी प्रकार स्थूल दो विभागों ( चतुरस्र तथा त्र्यत्र ) एवं अवान्तर सोलह विभागों में विभक्त इन अङ्गहारों का पूर्वरङ्ग बहिर्यवनिकागत उत्थापना से प्ररोचना पर्यन्त अङ्गों में प्रयोग होने के कारण भी बत्तीस प्रकार हो जाते हैं । यह कुछ आचार्यों का मत है । अन्य आचार्यों का मत है कि चार नर्तकियों के प्रत्येक के प्रयोगों से चार प्रकार बनकर फिर पिण्डीबन्ध, रेचक, न्यास तथा अपन्यास प्रकारों से युक्त होने पर ( अन्त में ) बत्तीस प्रकार बन जाते हैं । इसके अतिरिक्त दूसरे आचार्यों का मत है कि अङ्ग तथा वस्तु से निबद्ध गीतों की वस्तु तीन प्रकार की होती है । वर्धमानक के नौ, आसारित के चार एवं पाणिका का एक प्रकार है । इस प्रकार ब्रह्मगीति की विचित्रता बत्तीस प्रकार से सुशोभित होती है तथा उन्हीं के प्रयोगों को अपने स्वरूप में रखने वाले होने के कारण अङ्गहारों की संख्या भी बत्तीस ही मानी गयी है । रेचक करणों तथा अङ्गहारों में अंगरूप में रेचकों के प्रयोग को बतलाया जा चुका है पर नृत्त तथा नृत्य के अनेक प्रयोगों में भी इनकी योजना रखी जाती है । इसके अतिरिक्त सुकुमारगति तथा वाद्यगत प्रधानता रखने वाले प्रयोग भी ' रेचक ' से युक्त रहते हैं । इस कारणों से ' रेचकों ' का स्वतन्त्र महत्त्व भी . है । रेचन या रेचित - प्रक्रिया अङ्गों के पृथक् - पृथक् व्यवस्थित स्वरूप में वलन को ( चक्राकार घुमाव ) कहा जाता है । अतएव इसकी वैशाखमण्डलस्थान या वैशाखरेचितकरण और चारी से भिन्नता स्पष्ट है, यद्यपि इन करणों, मण्डलों तथा चारियों में भी अङ्गरूप में इनका प्रयोग किया जाता है । इसके अतिरिक्त यह भी नहीं समझ लेना चाहिए कि करण अङ्गहार एवं रेचकों का केवल पूर्वरङ्ग के अजों में ही प्रयोग होता है किन्तु ये अन्यत्र किये जाने-

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५२४ नाव्यशास्त्र वाले नृत्यादि प्रयोग में भी उपयोगी होते हैं । इसके अतिरिक्त देवगण के प्रीत्यर्थं भी अङ्गहार, करण एवं रेचकों का प्रयोग किया जाता है । इनके रेचक होने का कारण मुनि ने स्वयं ही निर्देशित कर दिया है । इनके चार प्रकार ये हैं: ( १ ) पादरेचक, ( २ ) कटिरेचक, ( ३ ) हस्त-रेचक तथा ( ४ ) ग्रीवा रेचक । पाद- रेचक - इसमें विविध प्रकम्पित या स्खलित गति में पैरों को अलग-अलग एक के पास दूसरे को एक बाजू से दूसरी बाजू में संचालित करना होता है । कटि - रेचक — इसमें त्रिक को ऊपर उठाना, घुमाव देना, पीछे हटाना ( अपसर्पण ) तथा चक्राकार गति में संचालित करना होता है । कर - रेचक — इसमें हाथों का ऊपर उठाना, फेंकना ( परिक्षेप ), आगे की ओर करना, फैलाना तथा गोल घुमाव में संचालित करना होता है । ग्रीवा रेचक — इसमें ग्रीवा को ऊपर की ओर उठाना, तानना, तीचे झुकाना, एक बाजू में झुकाना तथा गोल घुमाव में संचालित करना होता है । २५२-२५४. मुनि ने पुराकथा के साथ तहाँ पिण्डीबन्ध के अवतरण को निदर्शित किया है । पिण्डीबन्ध नृत्य की एक आकृति विशेष है जिसमें करण तथा अङ्गहार विनियोजित होते हैं । अभिनवगुप्तपाद ने आकार सादृश्य को पिण्डीबन्ध कहा है । उनका मत है कि इस आकरगत वैशिष्ट्य को ही ध्यान में रख कर प्रयोगानुसार इसमें स्वरूप रखे गये हैं । इस प्रकार ये पिण्डीबन्ध आधार, अङ्ग, प्रयोग तथा साधनगत विभिन्नता के कारण अनेक प्रकार के हो सकते हैं । आधार से आशय है स्थानगत विभेद । यह विभेद पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल आदि लोकों के कारण सात प्रकार का होता है । इसी तरह दो हाथ, दो पैर, दो नेत्र तथा एक मस्तक इस प्रकार अङ्गगत सात विभेद हैं । एक या एकाधिक प्रयोक्ता होने से प्रयोक्तागत विभेद हो जाते हैं जो सम एवं विषम प्रयोग भेद से युक्त होकर चार प्रकार के हो जाते हैं । ये चार विभेद करणों तथा अङ्गहारों से सम्पादित होकर अनन्त भेद धारण कर लेते हैं । इस प्रकार अनन्तभेद बनने पर भी प्रधान देवगण के नाम पर होनेवाले पिण्डीबन्धों का ही भरतमुनि ने उल्लेख किया है । २५५-२६१. इन पिण्डीबन्धों के द्वारा देवगण का परितोष भी होता है । तथा इनके मध्य इन्हीं देवताओं के आयुध, वाहन, कर्म तथा भावों का अङ्गों द्वारा अभिनय भी प्रस्तुत किया जाता है । उदाहरणार्थं तलपुष्पपुट - करण के

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५२५ कर्म से भगवती का, निस्तम्भित करण से भगवान शिव का निकुट्टक करण के प्रयोग से उनके त्रिशूलाकृति शस्त्र का, गरुडप्लुतक से ताक्ष्यंगति का तथा गंगावतरण करण से धारापिण्डी का, नागापसर्गित करण से भोगिपिण्डी तथा स्थिरहस्त अङ्गहार से वैसे आकारवाले त्रिशूल, शिवलिङ्ग आदि विभिन्न पिण्डीबन्धों का अभिनय किया जा सकता है तथा रेचित अङ्गहारों के प्रयोग से सभी कथित आधारों के अनन्त प्रकारों का अभिनय होता है । नन्दिकेश्वर ने कहा भी है ।

रेचिताख्योऽङ्गहारो यो द्विधा तेन ह्यशेषतः ।

तुष्यन्ति देवतास्तेन ताण्डवे तं नियोजयेत् ॥

[ रेचित नामक जो दो अंगहार ( रेचित तथा आक्षिप्तरेचित ) हैं उनके प्रयोग से देवगण प्रसन्न होते हैं अतएव ताण्डव में इनकी योजना की जाए । ] और इस प्रकार यह तथ्य संक्षेप में आगमोक्तसिद्धान्त के संरक्षण हेतु यहाँ भी संकेतित किया गया है । २६१-२६३. भगवान महेश्वर द्वारा रेचक, अंगहार तथा पिण्डीबन्धों की सृष्टि कर उन्हें तण्डु को प्रदान करने का आशय है करणों का प्रयोग तथा स्वरूप दिखलाना । नृत्य के इस आरम्भिक उपकरण के प्राप्त हो जाने पर तण्डु ने गीत तथा वाद्ययन्त्र के सम्मिश्रण या सहकार से ताण्डव नृत्य प्रयोग का निर्माण किया अतएव इस करणाश्रित प्रयोग का तण्डु के नाम पर ताण्डव नामकरण भी हो गया । इस प्रयोग में नृत्त ( या नृत्य ) के साथ गीत एवं वाद्य मिल कर चलते हैं । इसी कारण वैयाकरणों ने इसकी ' तण्डोरयं ताण्डव: ' व्युत्पत्ति की । भाण्ड शब्द का अर्थ है वाद्ययन्त्र । इसकी व्युत्पत्ति है- ' भणति शब्द करोतीति भाण्डम् ' । अर्थात् जो शब्द करता हो ऐसा अवनद्ध वाद्ययन्त्र भाण्ड कहलाता है । २६३ - २६४. आत्रेय आदि मुनियों ने यहाँ भरत मुनि के समक्ष आवश्यक प्रश्न उपस्थापित किया है कि नृत्त नाट्य से भिन्न है या अभिन्न । यदि भिन्न है तो इसके पृथक् प्रयोजन कौन होंगे? या यह प्रयोजन - विहीन है । ये दोनों भिन्न नहीं हैं क्योंकि अंगविक्षेप रूप नृत्त एवं गतिगत साम्य दोनों में विद्य मान है । अभिनय प्रयोग ( नाट्य ) में गाये गये गीत वाक्यों के अर्थों की अभिव्यक्ति की जाती है एवं रस से संयुक्त भावों का अविकल दर्शन होता है

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५२६ नाटयशास्त्र नृत्त केवल आंगिक हस्तचलन मात्र होता है । अतएव इसकी वास्तविक प्रकृति किन्तु क्या हो सकती है । क्योंकि वार्तिककर ने कहा भी है । ' वाच्यानुगतेऽभिनये प्रतिपाद्येऽर्थे च गात्र वक्षेपैः । उभयोरपि हि समाने को भेदो नृत्तनाट्यगनियोः ॥ ' [ अभिनय में वाणी का अनुसरण करते हुए अर्थ को अभिव्यक्ति करने में विक्षेप होता है तथा नृत्त में भी अंगसञ्चालन किया जाता है. अतएव मात्र में जब समानता है तो फिर नृत्त एवं नाट्य में भेद क्या होगा? ] इतनी दोनों इस प्रश्न का सार यह है कि नाट्यकला में अभिनय की महत्वपूर्ण स्थिति निश्चित है तो फिर उसी के साथ नृत्त प्रयोग की विशेष होगी? और यदि नृत्त प्रयोग केवल अंगसंचालन मात्र है तो कैसे बनेगी? क्योंकि यह अर्थों का भावक होता है, प्रापक २६५-२६८. भरत मुनि ने इसके उत्तर में बतलाया होने के कारण नृत्त प्रयोगयोग्य है । यद्यपि इसमें अर्थ की किन्तु जब यह प्रवृत्त होता है तो अपने आंगिक विक्षेपों एवं आवश्यकता क्यों यहाँ इसकी संगति नहीं । कि शोभाघायक अपेक्षा नहीं होती विलासपूर्ण चेष्टाओं के समृद्ध प्रयोग के द्वारा विचित्रता एवं सौन्दर्य की विशिष्ट उद्भावना करता गेयपदों या भावादि के वाचिक कथात्मक अभिनय से है । यह उद्भावना विलक्षण है जिसमें गीत के पदों के अर्थों की व्यञ्जना सम्पन्न नाट्य की अपेक्षा अपेक्षित नहीं होती । इसी कारण नृत्त की पृथक् प्रवृत्ति मानी जाती है । इसके अतिरिक्त नृत्त में रञ्जकता एवं लोकप्रियता भी होती है और प्रायः भी इसमें सहजभाव से रुचि लेता है तथा इसे देखने को लालायित समाज विशिष्ट सामाजिक उत्सवों आदि के अवसर पर इसका रहता है । अतएव नृत्त भी विनोद या मनोरञ्जन का उप-स्वतन्त्र प्रयोग होने से नाट्य के समान पादक होकर प्रवृत्त हुआ है यह स्पष्ट हो जाता है । २६ ९ –२७१. ' देव ' शब्द यहाँ विशेष अर्थ के संकेतार्थ प्रयुक्त हुआ है । इसका अर्थ है वे भगवान् शिव जिसके द्वारा तण्डु को गति प्रयोग का आश्रय निष्ठा से नृत्त में प्रवृत्त का उपदेश दिया गया । गीत का अर्थ है काव्य । लेकर नृत्त में काव्य या गीत के अभिनय का आधार लेकर क्योंकि अंगविक्षेपात्मक और सुन्दर बन पड़ेगा । आचार्य कोहल ने कहा है कि-प्रवृत्त होने पर प्रयोग ' नाट्योक्त्याभिनयेनेदं वत्स योजय ताण्डवम् ' । [ ' अर्थात् भगवान् शिव ने तण्डु को नाव्यगत वर्णादि कथन के अभिनय के साथ ताण्डव की योजना करने का आदेश दिया । ' ]

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५२७ इस ताण्डव का संयोजन देवताओं की स्तुति के प्रसंग में होना है पर नृत्त के सुकुमार प्रयोगों को लेकर श्रृंगाररस की भी इसमें अवतारणा की जा सकती है । ऐसे प्रभूत नृत्तात्मक प्रबन्ध हैं जिनमें अभिनय या नाट्यात्मकता नहीं होती परन्तु इनमें सुकुमार, मसृण एवं उद्धत नृत्तों का प्रयोग सम्भव है । शृङ्गाररस से पूर्णतः अथवा अंशतः उद्भुत होने से मसृण नृत्त का प्रयोग होता है । यद्यपि रस की स्थिति नाट्य के बिना सम्भव नहीं मानी गयी है । तथापि काव्य से अभिनय की निष्पत्ति होने से रस की स्थिति सम्भव होगी । मसृण नृत्त इसी कारण शृङ्गाररस से पूर्ण है क्योंकि इसमें जो अभिनयात्मक नाट्यप्रयोग होते हैं वे रसों के अंश हैं । शुद्ध नृत्त में गीत की संयोजना भी की जाती है तथा ऐसा प्रयोग रागकाव्य कहलाता है जिसमें सुन्दरता से कथा का निर्वाह रहता है । यही अभिनेय नाट्यप्रयोग ' काव्य ' ( कहलाता ) है । जैसा कि आचार्य कोहल ने बतलाया भी है: -' लयान्तरप्रयोगेण रागैश्वापि प्रयोजितम् । नानारसं सुनिर्वाह्यरसं काव्यमिति स्मृतम् ॥ ' [ अर्थात् जिसके अन्तर्गत गीत के साथ लय एवं ताल का प्रयोग होता हो तथा जिसमें रसों का निर्वाह करते हुए कथा का निवेश करते हुए प्रयोग होता हो तो उसे ' रागकाव्य ' समझना चाहिए । ] ' राग ' गीत्यात्मक होने से स्वर का आधार ग्रहण करता है पर काव्य जब इसी राग का आधार ग्रहण करेगा तो यही ' रागकाव्य ' कहलाएगा । इस प्रकार वृत्त का शुद्ध स्वरूप है रेचक एवं अङ्गहारों से निर्मित होना एवं पुनः गीत एवं अभिनय के प्रति उन्मुख होना । इसके उपरान्त गान क्रिया एवं वाद्यादि का अनुसरण करने वाला भी ' नृत्त ' होगा । इस प्रकार भगवान् शिवजी के द्वारा उपदिष्ट इस ' नृत्त ' का जो पर्याप्त विकास एवं स्वरूप विस्तार हुआ वही ' ताण्डव ' है जिसे पूर्व में निर्देशित किया जा चुका है । २७२. अङ्गहारों का प्रयोग पूर्वरङ्ग में होता है तथा पिण्डीबन्ध एवं रेचकों से युक्त अङ्गहार होते हैं यह पूर्व में बतलाया गया है । इसके अति-रिक्त अङ्गहारों के अंगभूत करण एवं नृत्त का भी इसी क्रम में स्वरूपादि निदर्शित किया गया । अब यहाँ प्रकृत विचार यही उपस्थित होता है कि इन अङ्गहारों का कैसे प्रयोग हो । हम यह बतला आये हैं कि इसका प्रयोग पूर्व-रङ्ग के अवसर पर होता है तथा यहीं ताण्डवनृत्त की भी योजना की जाती है । अङ्गहारों से युक्त इसी ताण्डवनृत्त का जब प्रयोग होता है तो उसमें वर्ध-

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५२८ नाट्यशास्त्र मानक अवश्य रहता है । इस वर्धमानक के ज्ञान के बिना ताण्डव का प्रयोग सम्भव नहीं होता, इसलिए सर्वप्रथम वर्धमानक का स्वरूप बतलाना उचित है । इसके बाद गतिविधि बतलायी जा सकती है । वर्धमानक में कलाओं की वृद्धि का उल्लेख मुनि ने किया है । तदनुसार सत्रह कलाओं का कनिष्ठ, तैतीस कलाओं का मध्यम एवं पैसठ कलाओं का ज्येष्ठ वर्धमानक समझना चाहिए । इन कलाओं की संख्यावृद्धि से लय में वृद्धि होती है और कला एवं अक्षरों को वृद्धि के अनुसार नर्तकियों की संख्यावृद्धि भी की जाती है । उदाहरणार्थं प्रथम आसारित में एक नर्तकी प्रयोग प्रस्तुत करती है तो द्वितीय में दो नर्तकियाँ और आगे भी इसी क्रम से वृद्धि होती जाती है । २७३ - २७४. कुतुप का अर्थ है चारों प्रकार के वाद्य यन्त्र के एवं उनके । इनका विशेषतः न्यास अर्थात् यथायोग्य स्वर, ताल, लय तथा कला वादक आदि में सन्निवेश ही ' कुतुपविन्यास ' कहलाएगा । यह प्रत्याहार, अवतरण आदि से लेकर आसारित तक चलता है । जब यह सुनियोजित एवं पूर्ण हो जाता है तभी प्रयोक्तागण के द्वारा आसारित एवं नृत्त का सम्पादन सम्भव होता है । . आसारित के पश्चात् उपोहन विधि सम्पादित की जाती है । कनिष्ठा २७४-२७५ - सारित में पांच कलाओं के प्रमाणवाला शुष्काक्षर प्रयोग ' उपो-है । यह उपोहन तन्त्री पर गान के साथ सम्पन्न होता है । यहाँ हन ' कहलाता वीणा पर बजायी जा सकती हो ऐसी धुन । गान से आशय है जो बांसुरी एवं तथा इस प्रवेश इस उपोहन क्रिया की समाप्ति पर नर्तकी का प्रवेश होता है के साथ ( ही ) भाण्डवाद्य का वादन ( आरम्भ ) किया जाता है । . वाद्यों पर जिन विशुद्ध करण एवं जातियों के प्रयोग का २७५-२७६ यहाँ किया गया है उनका ना ० शा ० ३४।१३६-१३८ पर विशद निर्देश निरूपण किया गया है । यहाँ वाद्यों के अनुसार चलने वाली तलानुसार गति से चारी के प्रयोग का संकेत दिया गया है । वैशाखस्थानक का अर्थ है वैशाख-करण का प्रयोग करना, पुष्पाञ्जलि लेकर प्रविष्ट नर्तकी के द्वारा प्रवेश रेचित के समय तलपुष्पपुट करण का प्रयोग करना चाहिए । . यह नर्तकी रंगपीठ पर चारों ओर घूमते हुए पुष्पों को २७७-२७८ एवं देवगण को प्रणाम करे । इसके पश्चात् आङ्गिक चेष्टाओं के द्वारा बिखेरे को प्रस्तुत किया जाए । यह प्रयोग भक्ति प्रदर्शन के लिये सम्पादित अभिनय पद से आशय है आसारित का पदार्थ वाक्यार्थ किया जाता है । यहाँ अभिनय

पृष्ठ 658

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५२ ९ विषयक वह भावप्रदर्शन जो स्वयं के अभिमुखीनयन हेतु सम्पन्न होता है । यह अभिनय सामाजिकों के रञ्जनार्थ प्रस्तुत नहीं किया जाता । २७८-२७९. अङ्गहारों के प्रयोग के अवसर पर भाण्डवाद्यों का प्रयोग अर्थात् वादन करने से आशय है केवल अङ्गहारों के प्रयोग के समय वाद्यवादनं सुन्दर होना चाहिए क्योंकि अङ्गहार अभिनयशून्य होते हैं । ऐसी दशा में नृत्त की प्रमुखता रहती है और तदनुसार रहने वाले वाद्यवादन को विशेष सावधानी से रखना आवश्यक हो जाता है । २७ ९ -२८०. वाद्यों का एवं इनके वादन विधान का नाट्यशास्त्र के ३१ वें अध्याय में विस्तार से निरूपण किया गया है । तदनुसार सम का अर्थ है वाद्ययन्त्र में प्रयुक्त अक्षर, अंग, ताल, लय, यति, पाणि, ग्रह तथा न्यास नामक आठ प्रकारों से काल एवं देश की समता रखना । इसी योग के कारण होने-वाली वाद्यगत हृद्यता ' रक्त ' कहलाती है, जो मायूरी आदि त्रिविध मार्जनाओं के योग से होती है । वर्णं तथा पाणि का विस्पष्ट विभाजन ' विभक्त ' कहलाता है । वादन के समय ककारादि वर्णों की स्पष्टता को ' स्फुट ' कहते हैं जिसमें नृत्त के ( अंगहार तथा करणादि के ) अंगों का सुस्पष्ट अनुसरण या अनुहरण होता है । मृदङ्गवादन के समय इन सभी की अपेक्षा होती है । इनका सलक्षण विवेचन ना ० शा ० के ३३ वें अध्याय में विस्तारपूर्वक प्राप्त है । २८० - २८२. यहाँ ' पृथक् ' शब्द से प्रत्येक नर्तकी का क्रमिक प्रवेश संके-तित किया गया है अर्थात् क्रमशः प्रविष्ट होकर नर्तकियाँ आसारित प्रयोग को सम्पन्न करें । आसारित के कनिष्ठ आदि चार प्रकारों का संख्या के अनुसार चार नर्तकियों द्वारा भिन्न क्रम में प्रयोग रहना चाहिए । यह प्रयोग जब पृथक् या भिन्न क्रम में वाद्यानुसारी किया जाता है तो ' पर्यस्तक ' कहलाता है । इसमें पूर्व प्रविष्ट नर्तकी दूसरी नर्तकी के आने पर हट जाती है तथा इस प्रकार क्रमशः पृथक् पृथक् चारों नर्तकियाँ अपना नृत्त प्रयोग प्रस्तुत करती हैं । पर्यस्तक में अभिनयशून्य स्थिति होती है किन्तु पिण्डीबन्ध में वस्तु या भाव का अभिनय आ जाता है तथा पिण्डीबन्ध के पश्चात् नर्तकियों को मश्च से निष्क्रमण करना आवश्यक होता है । २८३ - २८५. ' चित्र ' का अर्थ है अनेक प्रकार से एवं विचित्रता लिये हुए । ' ओघ ' का लक्षण है – ' ओघो विलम्बित - लये मुख्ये एको द्रुतो लयः । ' ( ना ० शा ० अभि ० भा ० vol iv पृष्ठ ४२ ९ ) अर्थात् विलम्बित लय के मुख्य रूप में रहते हुये जिसमें एक बार द्रुत लय में वाद्यवादन का सम्पादन होता हो उसे ' ओघ ' समझना चाहिये । यह नदी के वेग की तरह सभी भाण्ड-३४ ना ० शा ० प्र ०

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५३० नाट्यशास्त्र वाद्यों पर होता है एवं यह वाद्यवादन किसी एक करण पर आश्रित नहीं उपरिपाणि प्रहत होता है । ओघ की अन्य संज्ञा ' चतुष्क ' है । होता तथा ' भूयः ' पद से यह भी संकेतित किया गया है कि यहाँ उपवहन का प्रयोग कनिष्ठासारित से अधिक प्रमाणवाला रहने से षट्कला प्रमाण वाला रखा जाता है तथा प्रसङ्गवश अधिक लय एवं गति भी रहती है । . इसके उपरान्त तृतीय एवं चतुर्थं आसारित का प्रयोग करते २८६-२८७ पूर्ववत् नर्तकी प्रवेश कर पूर्ववर्णित विधि से नृत्तप्रयोग सम्पन्न करती हैं जिसमें तथा गीत के साथ साथ पद - पद पर आसारित है । इस समय भाण्डवाद्यवादन प्रथम पाद एक बार, ( नृत्तप्रयोग ) होता है । गीत की वस्तु का क्रमशः दूसरे का दो बार, तीसरे का तीन बार एवं चौथे का चार बार गान करते इसका गीत के चार पाद या खण्ड भी अर्थ लिया जा सकता है ' । अतएव, शरीर तथा संहरण । इनका आश्रय लेकर वर्धमानक ये हैं — मुख, प्रतिमुख करते हैं । यहाँ वस्तु का अर्थ में आसारित का चार बार प्रयोग या आवर्तन है अङ्ग । २८ ९. पिण्डीबन्ध के प्रकार या भेदों का क्रमिकता लिये हुये आसारित प्रयोग किया जाता है यह बतला चुके हैं । जिनमें सर्वप्रथम भेद सामान्य-में कारण इसका ' पिण्डी ' नाम रखा गया है । यह विशेषता प्रकार का होने के होता है क्योंकि इसमें नर्तकियाँ हीन एवं एकजूट होकर प्रयोग करने योग्य नृत्त सम्पन्न करती हैं, ये जब एक दूसरे का हाथ ग्रहण कर वृत्त सम्मिलित का प्रकार बन जाता है, एक दूसरे की करती हैं तो ( यही ) शृङ्खलिका प्रकार तथा को लतावत् जकड़ कर नृत्त करने पर लताबन्ध नामक भुजाओं या हट कर नृत्त प्रस्तुत करने पर भेद्यक नामक चतुर्थ प्रकार अलग बिखर कर ने यही पिण्डीबन्धों का स्वरूप बन जाता है । भावप्रकाशन में शारदातनय कर इस माना है । आचार्य अभिनवगुप्त ने भी इस नृत्त को सामूहिक मान एवं विजातीय स्थिति में विभक्त किया है । इनके मत में प्रयोग को सजातीय वाला सजातीय तथा हंस के द्वारा मुख में एक नाल में आबद्ध कमल सदृश स्वरूप जाल के समान पकड़े गये सनाल कमल सदृश नृत्त विजातीय है, तीसरा प्रकार ( या बुनावट ) लिये हुये होने से सजातीय तथा फिर इसी स्थिति विचित्रता विजातीय होकर चतुर्थ प्रकार बनाता है । से बिखर जाना या हटना भेद से आसारित में निष्पन्न १ ९०-२९ १. इस पिण्डीबन्ध को आधार, इसी में लय भेद से करते हैं । तदनुसार कनिष्ठ आसारित में पिण्डीबन्ध का में भेद्यक का, मध्यम आसारित में लताबन्ध का तथा ज्येष्ठ आसारित • शृङ्खला का प्रयोग किया जाता है । OR OF ४६ OR

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५३१ २ ९२-२९ ३. यह एक तो वाद्ययन्त्र के प्रयोग के आधार पर और दूसरे भद्रासन अर्थात् पैरों से ताल देने की स्थिति के आधार पर निष्पन्न होता है । अतएव यह विधिवत् प्रशिक्षण तथा सुदीर्घ अभ्यास के बिना प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिये अतएव गीत, अङ्ग, वाद्य, नर्तकी एवं पिण्डीबन्ध आदि के अनुशीलन से यह स्पष्ट हो जायगा कि नाट्य, नृत्य एवं नृत्त प्रयोगाश्रित एवं आश्रित से हैं और व्यवस्थित शिक्षण एवं अभ्यास होने पर ही उत्तमता से प्रस्तुत किये जा सकते हैं । २ ९४-२९ ७. यहाँ प्रधानतया गीतकों का विधान एवं गीतकाश्रित छन्दकों की भी विधि निर्देशित की गयी है । गीतक में विद्यमान वस्तु तथा अङ्गों का जिसमें स्वेच्छापूर्वक एक या दो के नियम को न देखते हुये यदि प्रयोग किया जाए तो वे छन्दक कहलाते हैं । ये नृत्त तालात्मक स्वरूप वाले होते हैं । गीत के खण्ड को वस्तु एवं उसके स्वल्प अंशों को अङ्ग कहते हैं । वस्तु निबद्ध गीतक के तीन प्रकार माने जाते हैं - ( १ ) मद्रक, ( २ ) परान्तक तथा ( ३ ) प्रकरी । अङ्गकृत या अङ्गनिबद्ध गीतक हैं— उल्लोप्यक, रोविन्दक, ओवेणक तथा उत्तर । अब हम इनकी प्रयोगगत अर्थात् नृत्त एवं वादयन्त्रों में योजना का विधान बतलाते हैं । प्रथम वस्तु आदि से गीतक के प्रयोग में उपोहन करना ' क्षेप ' कहलाता है तथा द्वितीय वस्तु से गीतक के प्रयोग में प्रत्युपोहन करना ' प्रतिक्षेप ' होता है । प्रथम वस्तु में आक्षिप्तिका एवं उपोहन का प्रयोग करते हैं तदनन्तर नर्तकी का प्रवेश होता है और फिर द्वितीय वस्तु में प्रत्युपोन विधि सम्पन्न की जाती है । नर्तकी के अवतरण के समय सभी वाद्ययन्त्रों से वादन रहना चाहिये । २ ९ ७ - २ ९ ८. यहाँ आसारित में होनेवाले नृत्त, अभिनय एवं वादन की पूर्वकथित विधि को सम्पन्न करते हैं । तदनुसार जैसे आसारित में नियमतः नर्तकियों की संख्या वृद्धि का क्रम रहता है और इसमें एक नर्तकी का अभिनय प्रयोग रखते हैं । यहाँ नृत्त के साथ भाण्ड आदि वाद्ययन्त्रों का वादन एवं गीतक के प्रयोग में वस्तु की प्रथम द्वितीय संख्या के अनुसार नर्तकियों की संख्या वृद्धि का क्रम रखा जाता है । वस्तु निबद्ध गीतों की यही विधि मानी गयी है २ ९८-३००. अङ्गों से निबद्ध होने वाले छन्दक गीतों में गीतक के अनुरूप प्रयोग - विधान इष्ट होता है तथा नृत्त, अभिनय एवं वाद्यवादन की यही शैली अभिमत है ।