श्रीगणेशाय नमः।

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 661–670

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 661–670

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५३२ नाटयशास्त्र ६३००-३०१. गुरु शब्द से दो मात्रा के बराबर काल तथा लघु या अल्प शब्द से एक मात्रिक काल का ग्रहण होता है परन्तु अर्धमात्रा का काल भी अल्प शब्द से ले लिया जाता है । ' मुख ' से यहाँ आशय है छन्दक के आरम्भ में किये जाने वाले उपोहन का वस्तु से सम्बद्ध गान । उपोहन में स्थायी स्वर के आधार पर आगे के स्वरों का स्थापन करते हैं । यहाँ मुख वस्तु से एवं पोहन को गान से सम्बद्ध माना जा सकता है । ३०१-३०२. जब मागधी, अर्धमागधी आदि गीतकों के प्रथम द्वितीय पादभागों के अंशों को दोहराया जाए तो उसके आरम्भिक अंश को अभिनय से एवं अवशिष्ट अङ्ग को नृत्त से व्यक्त या प्रदर्शित किया जाता है । आवर्तन किये जाने वाले शेष अङ्ग शुद्ध नृत्त के साथ प्रयोग में आते हैं अतः केवल वस्तु या अङ्ग आदि की समाप्ति पर ही नृत्त नहीं होता किन्तु मध्यवर्ती अङ्गों के समय भी इसका प्रयोग किया जा सकता है । ३०२-३०३. गीतक के प्रयोग में जब उनके अंश दोहराए जाएँ तो उसके साथ त्रिपाणि और त्रिविध लय के साथ वाद्यवादन रहना इष्ट है । तीन प्रकार के पाणि ताल में प्रयुक्त होते हैं । इसके नाम हैं — सम, अर्धपाणि तथा उपरिपाणि । संगीत एवं नृत्त के साथ चलने वाला ताल समपाणि, बाद में रखा गया अर्धपाणि या अवपाणि और पूर्व में प्रयुक्त उपरिपाणि कहलाता विस्तार से विवेचन तालाध्याय ( ना ० शा ० अध्या ० ३३ ) में है | इसका प्रकार छन्द, अक्षर तथा पदों की समता ' लय ' कहलाती किया गया है । इसी कला एवं कालान्तरभेद से द्रुत, मध्य तथा विलम्बित भेद होते हैं । है जिसके यही यति मार्ग आदि का भी बोधक होता है । प्रथम आवर्त में काव्य या गीत के अर्थानुसारी अभिनय के अनुसार अङ्गों को द्रुत आदि लय का उचित अनुसरण करते हुये रखा जाए । यहाँ कुछ आचार्यों का मत है कि त्रिपाणि एवं लय समन्वित वाद्यवादन के अनुसार ही गीत की लय रखी जानी चाहिये । ३०४-३०७. ये साढ़े तीन पद्य प्रक्षिप्त है । सप्त गीतों में से यहाँ आसारित, गीतक तथा छन्दक का ही विचार करते हुये उनका विधान क्रम बतलाया गया है । ३०८. इस पद्य की दूसरे प्रकार से भी व्याख्या की जा सकती है । छन्दक आदि गीतों के साथ सम्पन्न होने वाले लयानुसारी जिस नृत्तप्रयोग का पूर्व में वर्णन हुआ है. यह देवस्तुति का आश्रय लेकर प्रवृत्त होने वाला होता है । किन्तु जो अब बतलाया जा रहा है वह सुकुमार प्रयोग है । अर्थात् इसके पूर्व आसारित आदि के साथ किया जाने वाला नृत्त प्रयोग ' उद्धत ' था । अब

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ४ ५३३ ' मसृण ' या सुकुमार बतलाते हैं । यह प्रयोग श्रृंगाररस से उत्पन्न होता है तथा शृङ्गार रस से समन्वित भी । सुकुमार काव्य के आश्रय पर सुकुमार गीत एवं तदन्तर्गत नृत्त प्रयोग का भी विधान रहता है । ३१०. जब गीत क्रिया के विस्तार करने वाले स्थायी आदि वर्णों की-जो गीत के आलंकारिक अंश हैं - निवृत्ति अर्थात् समीपतर स्थिति हो तो ऐसी अवस्था में नृत्त का प्रयोग करना चाहिये । अङ्ग, वस्तु तथा वर्ण के परिवर्तन आदि के साथ वाद्यगत वैचित्र्य की उद्भावना करते हुये यहाँ नृत्तप्रयोग सम्पन्न करना इष्ट है । अंग वस्तु का आशय यह है कि जहाँ गीत के अङ्ग की अर्थात् पाद की निवृत्ति हो तो ऐसी दशा में नृत्तप्रयोग सम्पन्न किया जाए । अङ्ग-वस्तु के भिन्न क्रम के अवधारण में भी नृत्त प्रयोग करना चाहिये । ३११-३१२. नायक एवं नायिका की प्रणयाश्रित स्थितियों में जैसे आशा बँधने वाले दूती के वचन, दम्पत्ति के कामजन्य पारस्परिक प्रणयारोप तथा प्रहर्ष के अनुरूप उल्लासपूर्ण अन्य आन्तरिक प्रवृत्तियों के अवसर पर ' नृत्त ' का प्रयोग करना चाहिये । इसी प्रकार गीयमान काव्य में कान्ता का सामीप्य, वसन्त ऋतु तथा चन्द्रोदय आदि का अनुकूल समय हो तो ऐसे प्रसंग पर भी ' नृत्त ' का प्रयोग किया जाए । ३१३. ' अङ्ग ' शब्द का यहाँ आशय है गीत का आधरभूत पद्यखण्ड या नाटकीय कथा का एक अंश । इन अवस्थाओं में नृत्त प्रयोग नहीं रखा जाता है । ३१४. नायिका के समीप प्रिय के न रहने से उनकी दशा विरहोत्कण्ठिता या वासकसज्जा की सूचित की गयी है । सखीजन से वार्तालाप का आशय है नायिका का अपने वियुक्त या विदूर प्रियतम से मिलन हेतु अभिलाषा या संकल्प की भावना में सखी के साथ स्थित रहना । ऐसी परिस्थितियों में भी ' नृत्त ' की योजना नहीं की जाती है । ३१६. प्रिय के असन्निहित रहने पर भी नायिका को हर्षोपलब्धि सम्भव है । जैसे मिलन की सम्भावना होना, प्रिय के प्रवास से लौटने के समाचार मिलना, या शुभशकुन दिखलाई देना । यहाँ भी ' अंग ' शब्द से गीत का अंश तथा नाटकीय कथावस्तु का एक अंश प्रसंगानुसार समझना चाहिये । ३१७. यहाँ ' अङ्ग ' का अर्थ है छन्दक गीत का अंश विशेष । इस अंश में जब देवस्तुति विषयक आख्यान रहता हो तो नृत्त प्रयोग किया जाना चाहिये । इसका कारण यह भी है कि यह महेश्वर प्रयुक्त ( प्रोक्त भी ) ताण्डव नृत्त के

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५३४ नाट्यशास्त्र अन्तर्गत होता है, अतएव इसमें उद्धृत नृत्त को विद्युद्भान्त, गरुडप्लुत जैसे करणों से सम्पन्न अङ्गहारों की प्रमुखता लिये हुये प्रस्तुत करना चाहिये । ३१८. इसी उद्धत के समानान्तर देवी पार्वती के द्वारा ललित अंगहारों से सम्पन्न वृत्त की सर्जना की गयी है । अतएव जिन अंशों में प्रणय या शृंगार-मय कोमल प्रसंग उपस्थित होते हों वहाँ तलपुष्यपुट, लीन तथा नितम्ब जैसे करणों से सम्पन्न अंगहारों की प्रमुखता लिये हुये ललित नृत्त प्रस्तुत चरना चाहिये । ३१ ९ -३२०. चतुष्पदा ध्रुवा आदि शुष्क गीत कहलाते हैं । जिनके गीत रूप में प्रस्तुत करते समय होनेवाले वाद्यवादन का विधान बतलाया जा रहा है । चतुष्पाद ध्रुवा गान के अवसर पर पाद के अन्तिम अंशस्वर के आने पर ताल • भाण्डवाद्य पर पहली थाप लगा कर बादन आरम्भ करना चाहिये । यहाँ ' ग्रह ' का अर्थ है भाण्डवाद्य पर ताल देना अर्थात् नियमानुसार थाप देकर वाद्यवादन आरम्भ करना । ३२१. समपादा ध्रुवा का अर्थ है चतुष्पदा ध्रुवा जिसमें समसंख्याक अक्षरों वाले चार पाद का छन्द रहता है । उसके एक पाद के गान की समाप्ति के समय प्रदेशिनी उंगली से भाण्डवाद्य पर थाप मारते हुये वाद्यवादन प्रारम्भ करना चाहिये । ३२२. जिस ध्रुवा का का मान गान साथ फिर से आवृत्ति ( परिवर्त प्रयोग के साथ दोहराया जाए अन्तिम पाद के गान होने के वादन आरम्भ करना चाहिये । ३२३, एक वस्तु या समग्र होने का यहाँ अर्थ है परावर्तन हो हो रहा रहा हो हो उसके उसके एक पाद की वाद्यवादन के ) की जाती है । फिर जब यही गीत अभिनय तो दूसरी बार होने वाले गान में गीत के समय ताल या थाप देकर नियमानुसार वाद्य-ध्रुवाक ' के स्थायी आदि विशेष अंगों के निवृत्त या उनकी आवृत्ति करना । ' निवृत्ति ' का अर्थ समाप्ति है । ' वर्ण ' से आशय है वर्णवृत्त । इनकी समाप्ति पर जब फिर से दोहराने के लिये इन्हीं का आरम्भ हो या उपोहन - क्रिया होती हो तभी भाण्ड वाद्य का वादन रखना चाहिये । आ कप कि A क ( क ) का

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FIRST कि पंचम अध्याय II १. पूर्व अध्याय के साथ पश्चम अध्याय की संगति को सम्पन्न करने हेतु पुराकल्प के द्वारा कथन प्रारम्भ करते हैं— ' भरतस्य ' इत्यादि । पूर्व में चतुर्थ अध्याय में ' नृत्त ' का विवरण करणादि के साथ बतलाया जा चुका था जिसे ' महाफल ' कहा गया जो कि नाट्यविषयक प्रश्न के अन्तर्गत उसी के क्रम या सन्तान के हेतु के रूप में कहा गया । इसका प्रयोजन है नृत्त और नाट्य का विभेद से ज्ञान करना क्योंकि नृत्त से अनुषक्त ही नाट्य हृदयावर्जक होता है अतः प्रश्नकर्त्ता शिष्यों ने भी यह सब जान कर प्रसन्न होते हुये ही प्रश्न किया । २४. कारिका में प्रयुक्त ' महातेजा ' पद गुरु की आचार्य प्रशस्ति तथा अध्यापन में अपेक्षित गंभीर ज्ञान की क्षमता को संकेतित करते हुये है । यह आदरपूर्वक आमन्त्रण है जो गुरु को तत्वकथन के प्रोत्साहनार्थ भी है । ५ नाटकादि में पूर्वरंग आवश्यक है जिसका प्रयोग ठीक करूप में होने की शिक्षा हेतु यहाँ जिज्ञासा की गयी । ६-७. यहाँ ' गदत ' इत्यादि पद से यहाँ प्रसंगवश शाब्दिक निरूपण तो. कर रहा हूँ और आश्रावणा आदि का स्वरूपादि का निरूपण गेयाधिकार प्रकरण में ( अध्याय २ ९ से ३३ तक ) में पुनः विस्तार से होगा । यद्यपि अभी दूर है पर अर्थवश उसे यहाँ भी थोड़ा बतलाना अपेक्षित है । ' पाद-भागाः ' इत्यादि से पूर्वरंग की व्याख्या करते हैं । यहाँ ' यवनिका ' के अन्दर बहिर्गीत को ही पूर्वरंग समझना चाहिये जो गीतकोत्थापनादि ध्रुवारूप हो । विशिष्ट गीतों में स्थित जो जो चच्चत्पुट तथा चाचपुट ताल है तथा उनमें जो गीतकाल का सोलहवां हिस्सा है उससे मात्रा का निर्माण होता है तथा G मात्रा से वस्तु का और वस्तु से गीयमान का । द्विकल एवं चतुष्कल तालों के ' संग से मात्रा का भाग बनता है । अक्षरों के अनुसार द्विकल एवं चतुष्कल सभी गीत वर्धमानक आदि गेय से संग्रहीत हो जाते हैं । कला शब्द से द्विकल आदि सप्तविध ताल कलाएँ कही जाती हैं । अतः गीत, ताल, वाद्य, नृत्त एवं नाट्य के समन्वित प्रयोग को पूर्वरंग समझना चाहिये । ९ -१० पूर्वरंग में आरम्भ आदि होते हैं जिन्हें पूर्वरंग के सम्बन्धी के रूप में समझना चाहिये । THE F

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५३६ नाट्यशास्त्र ११-१५. रंगपीठ तथा रंगशीर्ष के भाग के मध्य ही यवनिका संयुक्त करते हैं क्योंकि इसी के अन्दर नट तथा वादक गण प्रत्याहारादि अंगों का प्रयोग करेंगे । इसके अतिरिक्त यवनिका को हटा कर बाद में मद्रक या वर्ध-मानक में से कोई गीत का प्रयोग किया जाता है जिसे ' गीतानां मद्रकादीनाम् ' से बतलाया है । अन्य आचार्य ' वर्धमानमथापीह ' के ' अथापि ' के स्थान पर ' अतोऽपि ' पाठ मान कर कहते हैं कि मद्रक तथा वर्धमानक ये दोनों ही गीत यहाँ किये जा सकते हैं । किन्तु ऐसी बात ' एतान्यङ्गानि कार्याणि ' जैसे अङ्ग पदार्थ के निरूपण के विपरीत हो जाता है क्योंकि निर्देश किसी एक अंग का ही होता है दो का नहीं । अन्य कुछ दोनों की एक ही अंग बतला-कर ' अथापि ' के ' अपि ' शब्द से किसी अङ्ग को भी लेने का आशय निकालते हैं । १६. इस प्रकार पूर्वरंग के अङ्गों का चयन कर ' एतानि ' इत्यादि से क्रम पूर्वक उद्देश कथन संकेतित है यह दिखलाते हैं । तथा ' एतेषाम् ' इत्यादि से उद्देश के अनुसारी लक्षण का उपक्रम मुनि ने बतलाया है । १७. उसी क्रम से ' कुतपस्य ' इत्यादि से लक्षण कह रहे हैं । नेपथ्यगृह के हारों के मध्यवर्ती प्रदेश में पूर्वाभिमुख मृदंग वादक तथा उसी के बाजू में बाँयी ओर पणव वादक को, रंगपीठ की दक्षिण दिशा में उत्तराभिमुख गायक को तथा इसी के सामने उत्तरदिशा में दक्षिणाभिमुखी गायिकाओं की गायक के बाँयी ओर वीणा वादक तथा उसी की बाजू में बाँसुरी वादक को बिठाया जाता है । यही एक स्थान में बिठलाया ' कुतपन्यास ' है । इस प्रकार अवतरण पर्यन्त एक ही अंग माना गया है । अवतरण को कुछ आचार्य गायकादि निवेशन अर्थ न मानकर गायकादि के स्थान स्वरादि निवेशन को लेते हैं । यहाँ षड्जादि स्वरों का परिग्रह अवतरण है जहाँ जाति, साधारण स्वर, गान आदि सात अंगों वाले शुद्ध सप्तक से शुद्ध सप्तक गीति प्रयोज्य होती है । १८. परिगीत - मनोरञ्जक गीत का बिम्ब शारीर स्वर है क्योंकि यही मूल होता है । उस स्वर के अनुसन्धानार्थ जो आलाप है वही ' आरम्भ कह-लाता है । इसके पश्चात् मान रूप ताल को प्रमुखता वाले आतोद्य का अनु-सन्धान करना जहाँ गायक गाता हो तो वह ' आश्रावणा ' होगी । १ ९ -२२. वक्त्रपाणि का अर्थ है वक्त्र अर्थात् आरंभ में हाथ की उँगलियों का व्यापार संचालन करना । इसमें दक्षिणादि वृत्तियों का विभागों का अनु-सन्धान रहता है । वृत्तियों के विभागपूर्वक शुष्कप्रयोग के लिये वीणा के तारों

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ५ ५३७ का परिचालन ' परिघट्टना ' है । इस प्रकार ये सभी परिवर्तन पर्यन्त ये अंग हैं जिनका विवेचन अधो टिप्पणियों में है । ( वहीं द्रष्टव्य भी ) २४. ' नान्दी ' जो आवश्यक अंग है तथा जिसमें प्रार्थना भी होती है तथा अभ्यर्थना भी । जब - जब भी नाट्य प्रयोग होगा नान्दी अवश्य होगी क्योंकि यह नित्यविधि है । अन्य पाठ्य उत्थापन आदि को प्रयोग के अनुसार अन्यथा उपपन्न किया जा सकता है किन्तु नान्दी नहीं । नान्दी का भारती वृत्ति के अंगों के निरूपण ( अध्याय - २२ में ) के प्रसंग में प्ररोचना के रूप में भी होता है जो जयाभ्युदयिनी होती है । २५. यहाँ शुष्कावकृष्टा का ही विधान कहा है तथा मुनि ने इसी का लक्षण भी दिया है । यह शुष्का वकृष्टा जर्जर या विघ्ननाशक देवता की यशोदर्शिका है इस कारण इसका प्रयोग करने के उपरान्त ही नाट्याभिनय प्रस्तुत होता है । २६-२९. रंगद्वार, चारी, महाचारी, त्रिगत तथा प्ररोचना का क्रमिक विवरण यहाँ किया गया है । ( द्र०—- टिप्पणी भी । ) ३१-४०. अब इसी तथ्य को पुराकल्प या इतिहास को ' चित्र ' इत्यादि दस श्लोकों में कहा जा रहा है । ४१-४२. इसका प्रयोग सप्तरूप में अर्थात् ध्रुवाओं में करना अभीष्ट है इसी तथ्य को — ' धातुभि ' इत्यादि से बतलाते हैं । चित्रा नामक वीणा जो अंगुलि से सारित होती है उसके साथ - साथ अवनद्ध या भाण्डवाद्य को अन्ति करते हुये प्रयुक्त किया जावे तथा बड़ी कुशलता या सावधानी के साथ ही यह किया जावें । ४३. इसकी जो पूर्वकाल में निर्गीत - संज्ञा रखी गयी या उसका कारण बतलाने के लिये कहते हैं— ' निर्गीत ' इत्यादि से । पद का अर्थ है अर्थ के प्रत्यायक तथा झण्टु आदि वर्ण मात्र होते हैं । सार्थक एवं गीयमान पदों से भिन्न हों वे ही बहिर्गीत या निर्गीत हैं यही समझना चाहिये । ४४-५३. निर्गीत सप्तरूप ध्रुवा से युक्त होते हैं । बहिर्यवनिका के उत्था-पनादि अंग होते हैं— उनके कारण को आगे ' आश्रावणायाम् ' इत्यादि से अगली आठ कारिकाओं से दिखलाया है । इस प्रकार सभी को बतलाकर उपसंहार में कहते हैं— ' आभाषणादि ' इत्यादि से । ५४. उसी की प्रशंसा में भी दिखलाते हैं- ' देवस्तुष्यति ' - इत्यादि से । इसमें हेतु है देवताओं की पूजा अतः यह प्रेक्षाकर्ता, सूत्रधार या प्रयोक्ता पात्रों का कर्तव्य है कि इसे सम्पादन करें ।

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५३८ नाट्यशास्त्र ५७-५९. यहाँ नाट्य के उपरञ्जक तत्वों में जो गीत को कहा गया उनमें ध्रुवागान महत्वशाली है, ज्येष्ट है तथा इसके प्रकृति भूत गान्धर्व को जानना चाहिये परन्तु इसे विस्तार से आगे आस्तोद्य विधान तथा तालाध्याय में दिख-लाया जा रहा है अतः यहाँ पूर्वरंग के प्रकृति प्रसंग में उत्थापनादि के लक्षण ही दिये जा रहे हैं विषय की दृष्टि से ६०-६३. ' आदौ द्वे ' इत्यादि से उत्थापना ध्रुवा के स्वरूप को कहते हैं । यह ध्रुवा विश्लोका जाति के अन्तगंत होती है जिसका ना ० शा ३२ ॥ १४६ पर लक्षण है । चतुरस्र ताल में उसकी योजना की जाए इसे ' शम्या च ' इत्यादि से मुनि ने बतलाया ६४-६६. यहाँ चार सन्निपात कहने से चारों पात्रों का परिवर्त दिख-लाया है । तृतीय कहने का अर्थ है अन्त्य कला से रहित तीन पादों का तन्त्री गान से समन्वित प्रयोग कर उसमें अन्तिम तृतीय कला से आरम्भ कर चतुर्थ पाद की समाप्ति तक पुष्कर ( मृदंग भेद ) वाद्य के प्रयोग के साथ मध्यलय में गान चलता है । इसी समय सूत्रधार का प्रवेश होता है । यहाँ सूत्रधार पद के साहचर्य से दोनों पारिपार्श्वको का भी ग्रहण समझना चाहिये अर्थात् के सूत्रधार के साथ ही प्रवेश करें । ६७-६९. सूत्रधार एवं पारिपार्श्वकों की इतिकर्तव्यता को दिखलाते हैं-' पुष्पांजलि ' इत्यादि से । इनमें सर्वप्रथम सूत्रधार पुष्पाञ्जलि अर्पण करेगा, शेष दो में से एक भृङ्गार पात्र को धारण करता है और दूसरा जर्जर को । शुद्धि के लिये जिसमें जल भरा हो ऐसा पात्र ' भृङ्गार ' या झारी तथा विघ्नों की शान्ति के लिये वंशादि निर्मित जर्जर है । दोनों पावों में स्थित रहने के कारण ये पारिपार्श्विक हैं जिसके मध्य में सूत्रधार रहता है इस प्रकार ये तीनों ही पाँच पर आगे बढ़ाते हैं । ७२. जिस कार्य के लिये पाँच पर आगे बढ़ाते हैं उस पुष्पाञ्जलि की विधि कहते हैं - ' सूचीमित्यादि ' से । ७५. यहाँ यही बात है कि ३६ कलाओं के मध्यवर्ती समय में सूत्रधार के प्रवेश, पांच पैर आगे चलना, पुष्पाञ्जलि अर्पण और अभिवादन का तीन बार, होना - यह कार्य रहता है । इनमें पश्चपदी जितनी कलाओं में हो जाए उससे बची हुई कलाओं में करण तथा नृत्तहस्तों का अवलंबन कर वह तीन अभिवादन करे | ७६. द्वितीय परिवर्त के तीन कर्म को दिखला कर द्रुतलय में सम्पन्न तृतीय परिवर्त के कर्म को दिखलाते हैं- ' ततः परम् ' इत्यादि से ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ५ ५३ ९ ८०-८१. यहाँ ' आडूय ' पद से भृङ्गार धारी पात्र के भ्रमण के समय मौनभाव की स्थिति होती है । शौच को दिखलाते है ' प्रयत्न ' इत्यादि से । यहाँ तृतीय कर्म है । ८२. इसी तीसरे कर्म को दिखलाते हुये बतलाया कि पैरों के चतुर्थ परि वर्त के अन्तिम सन्निपात के समय ही जर्जर को ग्रहण करते हैं । ८३. चतुर्थ परिवर्त में दो कर्म दिखलाये गये हैं जर्जर ग्रहण तथा आठ कला में जप्य कार्य सम्पन्न करना । यह विघ्नों के उच्छेद हेतु होता है । ‘ अत्र विघ्नविनाश ' ( ३।७८ ) इत्यादि चार श्लोकों का उच्चारण किया जाता है । ८४-८६. पश्वपदी में अपेक्षित काल जो जर्जर ग्रहण से लेकर होगा वह है चौबीस कला का समय जो कुतप गमन पर्यन्त क्रिया में रहेगा । ' षोडश ' का अर्थ है दो कलाओं के हिसाब से एक पतन होना । ८७-८८. व्यस्त्र - इत्यादि । यह प्रसंग के कारण कहा गया है द्वादश पात इत्यादि बात । उत्थापनं कार्यम् — इत्यादि । यहाँ नाट्याभिनय के प्रयोग के उत्थापन का ध्रुवाभिनयरूपता से अधिक उचित अर्थ द्वारा आक्षेप है तथा ' यत्तु काव्येन ' इत्यादि से ध्रुवागान में परिवर्ती की अदृष्टफलार्थं इतिकर्तव्यता नहीं पर कवि के द्वारा चार अपेक्षा वाली ध्रुवा का उपयोग हो ऐसा वृद्ध आचार्यों का परामर्श है । १०४-१०५. यहाँ ' तत्र ' पद का अर्थ है अपकृष्टा ध्रुवा गान के होने पर जिसमें मध्य स्वर की योजना रहती है जिसका मधमांश नान्दीपाठ में प्राप्त है । इसी का उपजीवन कर काश्यपाचार्य ने कहा कि ' पूर्वरङ्गे षाडव ' ( पूर्व-रंग में षाडव स्वर को योजित किया जाता है ) । यहाँ ' अपि ' से चतुरस्र पूर्वरंग में चतुष्पदा अष्ट या षोडशपदा नान्दी को तथा त्र्यत्र पूर्वरंग में त्रिपदा और षट्पदा नान्दी को रखा जाए यह भी सूचित होता है । अब ' नमोस्तु ' इत्यादि से ' देवता इति ' तक नान्दी पाठ है उदाहरणार्थं ११०-१११. यहाँ यहाँ प्रयुक्त प्रयुक्त ' ' पद पबु ' ' शब्द शब्द से प्रसंगवश ' वाक्य ' का ग्रहण सम-झना चाहिये । ‘ एवं ’ अर्थात् चतुर्थकार के प्रवेश में यही विधि होगी । नान्दी के बाद ' शुष्कावकृष्टा ध्रुवा अंग की पूर्ति करने के लिये है- ' ततः ' इत्यादि से उसे भी यहाँ दिखलाया है । सूत्रधार द्वारा जर्जरस्तुति के पाठ में ' जयति ' पद के अर्थ को दिखलाने के लिये ' नान्दी ' को उसी से लगी हुई रखी गयी है । FIP TRIPPE 6 IP ay fat Pesh FPTE

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५४० नाट्यशास्त्र ११४-११६. यहाँ ' ततः श्लोकम् ' इत्यादि से रंगद्वार नामक अंग को दिखलाते हैं । इसमें देव स्तोत्र का पाठ कर फिर जिस देवता के उद्देश्य से या उन्हीं के उत्सववश नाट्य का प्रयोग हो तो उस देवता की भी स्तुति की जावे । अथवा जो नाट्याभिनय करवाता हो उस नाट्य के प्रस्तोता अर्थपति की अथवा स्तुति के प्रति इसके उदासीन दिखने पर ब्रह्मा की स्तुति की जावे । इस प्रकार जर्जर विषयक श्लोक को और रंगद्वार विषय श्लोक पाठ कर जर्जर झुकाया जाता है । ११७. तब पीछे की ओर लौटने वाले पैरों से पूर्वाभिमुख ही अपसर्पण करते हैं । यहाँ सूत्रधार से प्रयोज्य चारी और महाचारी सूचित की गयी है । रंगद्वार और चारी में अड्डिता ध्रुवा का प्रयोग किया जाता है । ' अड्डिता ' को ही कुछ अवकृष्टा ही सन्दर्भवश लेते हैं । कुछ अन्य आचार्य बिना ध्रुवा के भी रंगद्वार को प्रस्तुत करने के मत में हैं । १२५. अब महाचारी के प्रयोग को अवतारणा करते हैं- ' पारिपार्श्विक इस्ते ' इत्यादि से । १२६-१२८. महाचारी में चतुरस्रा ध्रुवा को संगीतशास्त्रानुसारी द्रुतलय में रखते हैं । ध्रुवागान का सम्बन्ध छन्द से रखा गया है जैसा कि यहाँ त्रिष्टुप् छन्द रखा गया । १२ ९. यह चतुरस्रा ध्रुवा के त्रिष्टुप् छन्द का उदाहरण है १३१-१३३. चतुरस्रा ध्रुवा के पश्चात् सूत्रधार वाद्ययन्त्रों की ओर संचरण करता है इसमें सूची चारी के बाद पादविक्षेप किया जाता है । यहाँ पचपदी का जो पूर्व में उल्लेख किया था वहीं पादविक्षेप एक ताल के अन्तर से विहित था पर यहाँ जब द्रुतलय से उत्क्षेप कहा गया तो इसका आशय तीन ताल के अन्तर से पादविक्षेप करना होगा । १३४. ' ततो रौद्र ' इत्यादि से महाचारी की सूचना करते हुये कहते हैं । यहाँ ' रुद्रस्यायं रौद्रो रसः ऐसी व्याख्या के अनुसार जहाँ रौद्र रस है वहीं पादों के संहरण से ओज की प्रमुखता को संकेत किया गया है । यहाँ ध्रुवा के अन्य रूप का उल्लेख न करने से ' अडिता ' धवा को ही समझना चाहिये जो पूर्व में कही गयी थी । * १३५. ' तयो ' इत्यादि से आगे ' त्रिगत ' को दिखलाते हैं । नर्कुटक से छन्दोगत आठ मूल जातियों को समझना चाहिये जिनमें रथोद्धता, बुदबुदक, वंशपत्र आदि हैं इनमें किसी एक ध्रुवा से उपलक्षित गान ' नर्कुटक ' है । तीनों

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ५ ५४१ पात्रों का वार्तालाप ' वाणीगत ' रूप के कारण भारतीवृत्ति के अन्तर्गत होगा । ( यह सूत्रधार तथा विदूषक और पारिपाश्विक के बीच का वार्तालाप है जो ' त्रिगत ' के अन्तर्गत है जिसका स्वरूप चल रहा है । ) १३ ९ -१४०. नाटकीय कथा या इतिवृत्त की ओर सामाजिकों का ध्यान आकृष्ट करना या उसकी ओर ध्यान देने के ' आमन्त्रण ' को ' प्ररोचना ' माना जाता है । प्ररोचना के पश्चात् सूची चारी के प्रयोग के बाद आविद्धचारी के प्रयोग के साथ ही तोनों एक साथ रंगमञ्च से प्रस्थान करते हैं । १४१. द्वितीय अध्याय में वर्णित त्रिविध नाट्य मण्डपों में चतुरस्र मण्डप पर किया जाने वाला पूर्वरंग प्रयोग अभी तक बतलाया गया । अब आगे ‘ त्र्यस्त्र ’ पर होने वाले ' पूर्वरंग ' को बतलाते हैं । १४७. यहाँ पूर्वरंग के दो प्रकारों का पुनः संकेत कर दिखलाया है कि इनमें चतुरस्र विस्तीर्यता तथा त्रयस्त्र संक्षिप्तता वाला होता है । प्रयोग में इसके प्रमाण को ध्यान में रखने के लिये यह बात दोहरायी गयी । १५३. पूर्वरंग के शुद्ध प्रभेद को दिखला कर अब ' चित्र ' का निरूपण ' एवं तावद् ' इत्यादि से किया । इनमें निद्दिष्ट प्रयोग विधान में कुछ मिश्रित कर ' चित्रत्व ' की अवतारणा रखी गयी है । १५५. चतुर्थकार के पश्चात् यहाँ गान्धवों ( कुशल संगीत विदों ) के द्वारा उदात्तगान में अवकृष्टा शुष्कावकृष्टा ध्रुवागीत का गान करना अभीष्ट है । यह प्रयोगपद्धतिगत नवीनता ' चित्रत्व ' में लानी पड़ती है । १५६ - १५ ९. यहाँ ' शुद्धा ' के स्थान पर ' सिद्धः ' पाठ भी है जिसका अर्थ होगा सिद्धगण पुष्पमाला विकीर्ण करें । यहाँ देवांगनाओं के द्वारा नृत्य प्रयोग को दिखलाया है जो चारी तथा महाचारी के स्थान पर प्रतीत होता है । इस प्रकार किञ्चित् भिन्नता के लिये नाट्याचार्य कुशलता से नान्दी के एक एक चरणों के मध्य ताण्डव का प्रयोग करें । यहाँ नान्दी के बीच ' ताण्डव ' का नियोजन अभीष्ट है । यह भरत ने नाट्याचार्यों को स्वतन्त्रता दी है कि वे शुद्ध या चित्र में से किसी को भी प्रस्तुत करें परन्तु पूर्वरंग को आवश्यक रूप में प्रस्तुत करने के बाद ही नाट्यप्रयोग आरम्भ होना चाहिए । १६०-१६५. पूर्व में नान्दी के अन्तर्गत ' ताण्डव ' की योजना कही गयी थी उन नर्तकियों के प्रयोगप्रदर्शन के बाद रंगमच से चले जाने के बाद अगले पूर्वरंग के अंगों की यहाँ योजनाविधि या निर्देश है । इनमें नृत्त और गीत का प्रयोग अतिशय न होकर सम्तुलित रहना चाहिये तथा यह दोनों