भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 671–680

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 671–680

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५४२ नाट्यशास्त्र: प्रकार के पूर्वरंग में लागू होगा । इसलिये यदि इन अंगों का अतिशय प्रयोग या प्रसंग रखा जाएगा तो यह प्रयोक्ता तथा प्रेक्षक दोनों को ही प्रभा-वित करेगा । इस प्रसंग में अभिनवभारती में पूर्ववणित अंगों को अवधानहेतु एक बार एकत्र कर दिखलाया । यथा- - उत्थापन, परिवर्तन, अवकृष्टा ध्रुवा, गीत, नान्दीपाठ, शुकावकृष्ट, जर्जरश्लोक ध्रुवा, रङ्गद्वार, अड्डिता, आर्या-पाठ, ध्रुवा, रौद्रश्लोकपाठ, नर्कटक, त्रिगत तथा प्ररोचना । त्र्यस्र में भी ये ही सोलह अंग होंगे तथा नान्दी पाठों के मध्य में ' नृत्त ' । इस प्रकार इसके अधिक प्रयोग से रस तथा भाव के अभिनय में स्पष्टता की स्थिति नहीं आती है और आरम्भ में ही प्रेक्षकों को पूर्वरंग में ही खिन्नता हो तो आगे किये जाने वाले नाट्यप्रयोग पर अच्छा प्रभाव नहीं होगा या प्रयोग रंजक नहीं रहेगा । अतः लोक एवं शास्त्रानुसारी लक्षणों के आधार पर परम्परा-नुगामी पाट्यप्रयोग उचित होता है । इस प्रकार त्र्यस्त्र या चतुरस्र मण्डप पर किये गये शुद्ध या चित्र में से किसी भी रूप को प्रस्तुत कर सूत्रधार अपने सभी दल के साथ रंग से निष्क्रमण करता १६५-१६९. ' देवपार्थिव ' इत्यादि से लेकर ' प्रस्तावनां ततः ' तक का अंश अतिरिक्त होने से अभिनवगुप्त ने इसकी व्याख्या नहीं की । ' स्थापक ' पद की व्याख्या है स्थापयति समस्तं रूपकवृत्तमिति ' स्थापकः ' अर्थात् रूपक के इतिवृत्त का जो समापन करता है । सूत्रधार के सौमनस्य, विस्मय, अद्भुत-दृष्टि, अदीर्घसूत्रता या क्षिप्रकारिता एवं रक्षा इत्यादि सूत्रधार गुण स्थापक में ही होते हैं । १७०-१७१. ‘ अर्थानुगा ' अर्थात् अर्थ की अनुसारी प्रावेशिकी नामक ध्रुवा को तथा उत्थापनी ध्रुवा के प्रकार को जो अर्थानुकूल हो - प्रयोग किया जाए । यह प्रावेशिकी मध्यलय से मुक्त होती है । इसके बाद ' चारी ' को किया जाए । १७२-१७६. सुवाक्य इत्यादि । वह फिर से प्ररोचना के द्वारा जय एवं आशीः के क्रम से सामाजिकों को प्रशन्न करने वाले श्लोक को देवता तथा द्विजों के उद्देश्य से पाठ करे तथा इसके पश्चात् कवि के नाम की उद्घोषणा करे । इसमें वह कवि के गुणों का भी ऐसा वर्णन कर सकता है जिससे कवि की प्रसिद्धि और आदरणीयता स्थापित हो । इसके बाद वह रूपक विशेष का प्रख्यापन करे जिसमें प्रस्तुत रूपक के अर्थ की उपक्षेप करने वाली ' प्रस्तावना ' की जाए । इससे आरम्भ से ही दर्शकों को संक्षेप में संस्कार होकर वे नाट-कीय वृत्त की जानकारी पा जाएं । प्रस्तावक के द्वारा उस बात की सूचना

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ५ ५४३ भी मिल जाए कि प्रस्तोतव्य रूपक दिव्य या मानवीय चरित्रों वाला है । यहाँ ऐसी स्थितियों के लिये भिन्न भिन्न आश्रय या रूप भी वह ग्रहण करे इस प्रकार यहाँ प्रस्तावक को रूपकीय इतिवृत्त के अनुरूप ही अपने को प्रस्तुत करना चाहिये जिससे सामाजिकों को कथावस्तु के ग्रहण में अनकूलता हो । १७७-१७९. अब पूर्वरंग का फलकथन करते हैं— ' य इमम् ' इत्यादि से । यथाविधि प्रयोग करने से ' अभ्युदय ' होता है । यहाँ शुभ का अर्थ है दृष्ट अभ्युदय की प्राप्ति । यहाँ प्रयुक्त अपचय पद दृष्ट प्रत्यक्ष प्रत्यवाय बोधक तथा तिर्यक् योनि पद अदृष्ट परोक्ष प्रत्यवाय बोधक समझना चाहिये । १८० - १८१. जिस प्रकार की भी प्रवृत्तिविशेष में नियत रूपक नायक होता है वैसी ही प्रवृत्ति के उपयुक्त वेषभूषा, भाषा, आचार तथा अभिनय का अनुगमन करने वाले सूत्रधारादि स्थापक पर्यन्त पात्रों को व्यस्त्र या च -रत्र भेद के पूर्वरंग को प्रस्तुत करना चाहिये । ** FEIP एफए फ 4 Perf [ श

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डी p ि षष्ठ अध्याय १. पूर्वरङ्ग के विधान के पश्चात् नाट्यप्रयोग के प्रमुखतः लक्ष्य तत्वों के सिंहावलोकन न्याय से पुनः प्रश्न स्थापन करने से अध्याय संगति होगी । यहाँ मुनियों ने प्रथम अध्याय में उत्थापित प्रश्नों के बाद पुनः पाँच प्रश्न पूछे हैं जिनका समाधान अगले अध्यायों में किया गया । आचार्य अभिनवगुप्तपाद इन्हें पूर्व में पूछे गये प्रश्नों का ही विस्तार भी माना है । २. पाठ्यम् ( १।१७ ) इत्यादि में नाट्य के अंगों तथा अभिनय के अन्त-वर्ती रस की प्रधानता के कारण यहाँ रस के विषय में पुनः प्रश्न पूछा जा रहा है क्योंकि तभी ' एतदाख्यातुमर्हसि ' कथन संगत होगा तथा इसी से यह भी प्रतीत होता है कि इससे पूर्व जब रस के विषय में कुछ भी नहीं बतलाया गया था अतः अब इसे पूरी तरह से बतलाने की कृपा करें । ४. मुनिजन के प्रश्नों के उत्तर में भरतमुनि ने पुनः रस तथा भावों का विकल्प अर्थात् विशेष रूप से निश्चयात्मक विवरण को बतलाने वाले ( रस-भावविकल्पन ) वाक्य कहे । ५. ' यथाक्रमम् ' का अर्थ है संग्रह, कारिका आदि के क्रम से सब का प्रति पादन करते हुये । ६. यहाँ शक्य पद सामान्याभिप्राय से माध्यस्थ दिखलाने के लिये प्रयुक्त हुआ है । इस विषय को प्रतिपद रूप में निरूपित करना संभव नहीं है केवल लक्षण ही सरलता से कर देता है । अतः रसभावादि के प्रतिपद निरूपण के स्थान पर लक्षण तथा उसके अंग उद्देश एवं परीक्षा को किया जा रहा है । इसका कारण है ' बहुत्वात् ' अनन्त होने से । ७. अर्थ अर्थात् प्रतिपाद्य विषय के ' तत्वत: ' अर्थात् विकार के कारण अङ्ग अर्थात् जो नाट्य के मुख्य अङ्ग के भी अङ्गभूत विषय हैं उन सभी अवा-न्तर अङ्गों का । १०. ' रसा भावा ' इत्यादि से संग्रह दिखलाते हैं । यहाँ अभिनय पद से आंगिक आदि तीनों अभिनय का ग्रहण समझना चाहिये [ आहार्य को छोड़ कर ] जो गीत तथा वाद्य से मिलकर पश्चांग हो जाते हैं । १५. ' संग्रह ' इत्यादि । उद्देश का ही विस्तार होना ' विभाग ' है यह शास्त्रप्रवृत्ति का अलग अङ्ग न होकर उद्देश के ही अन्तर्गत होता है तथा

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ६ ५४५ भरतमुनि तथा इनके व्याख्याकार अभिनवगुप्तपाद दोनों ही इस तथ्य से सह-मत हैं । दर्शनशास्त्र की अनेक शाखाओं में इसी मान्यता को एक परम्परा के साथ लिया जाता है । १७- यह पद्य कुछ प्रतियों में नहीं रखा गया है । आठ रसों की मान्यता ब्रह्मा से सम्बन्ध रखती है जिनसे भरत को नाट्य का आगम हुआ । इसी कारण इस पर अभिनवभारती भी नहीं मिलती है । १ ९ -२२. अब ' निर्वेद - लामि ' इत्यादि से संचारी भावों को बतलाते हैं । यहाँ ये ही व्यभिचारी भाव हैं इस तथ्य को तैंतीस की संख्या के नियमार्थं भी दिया गया है । २३. सात्विक भाव व्यभिचारीभावत्व तथा अभिनयोपयोगित्व दोनों धर्मों से युक्त होते इसी कारण इन्हें सचारी भावों के पश्चात् दिखलाते हैं-' स्तम्भ ' इत्यादि से । | ये अभिनय के धर्म तो हैं किन्तु अभिनय से भिन्नता भी रखते हैं । २४. अब तृतीय संग्रहभूत नाट्यांग के रूप में अभिनय को उसके चार प्रकारों के साथ दिखलाते हैं – ' आङ्गिक ' इत्यादि से । यहाँ कारिका में ' चत्वारः ' पद से आहार्य अभिनय की साक्षात्कार बुद्धि के उपयोग में अन्तर-गता को ( उपयोगिता को ) सूचित किया गया है । इसी कारण रस तथा भाव के बाद अभिनय का क्रमिक रूप में विवरण दिया गया । २५. लौकिक धर्म एवं तन्मूलक उपयोगी सामाजिक धर्म का अभिनय अनुगमन करते हैं इसी कारण इनके बाद ही ' धर्मी ' का कथन करते हैं— ' लोकधर्मी ' इत्यादि से । २५-२६. रूपकों की उपकारक होने से तथा अभिनय के बिना अभि-नेतव्य के सम्भव न होने के कारण वृत्तियों का भी यहाँ लोकधर्मी आदि के बाद विवरण है । यहाँ चार संख्या इनके आधिक्य के निराकरणार्थं दी गयी है । २६-२७. ये वृत्तियाँ देशों के आधार पर रहने के कारण वृत्ति के बाद प्रवृत्तियाँ दिखलाई गईं । २७. अभिनय की परिणति सिद्धि में होने से दोनों सिद्धियों को बतलाया गया ' दैविकी ' इत्यादि से । २८. यहाँ पाठ्य एवं गान में ही स्वरों का अन्तर्भाव रहने पर भी उनके महत्व को देखते हुये पृथक् उल्लेख किया गया । इनमें केवल स्वरों से भी नाट्य का उपरञ्जन या शोभा होती है जो अन्तरालाप है उसी के ग्रहणार्थं स्वरों का पृथक् ग्रहण यहाँ है । ३५ ना ० शा ० प्र ०

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५४६ नाव्यशास्त्र २८-२९. लक्षणों से समन्वित वाद्यों के चार ही वर्णभेद होते हैं इससे अधिक नहीं । ३०-३१. गीत के आधारभूत निश्चित पद समूह को ' ध्रुवा ' कहते हैं । उसमें योग अर्थात् सम्बन्ध से युक्त होने के कारण एवं उसकी प्रधानता से युक्त गान का साधारणगान से पार्थक्य स्वतः हो जाता है । ३१. ' मण्डप ' भी त्रिविध है जिसे द्वितीय अध्याय में विस्तार से दिखलाया जा चुका है तथा जिसका पात्रों के गमनागमन तथा वादकों के उपवेशन आदि के लिये आधारभूत उपयोगिता होती है । ३२. इस प्रकार उद्देशकथन के बाद अब रसादि की क्रमशः लक्षण मीमांसा आरम्भ करते हैं- ' एवमेष ' इत्यादि से । इसमें सूत्ररूप में रस का स्वरूप दिखलाते हैं – ' तत्रेति ' इत्यादि से । रसनिष्पत्ति सूत्र कहते हैं - तत्रेति से । इसकी अभिनवभारती के साथ सार्थक व्याख्या दी जा चुकी है ( अतः टिप्पणियाँ छोटी हैं ) । ४४-४६. यहाँ वर्णं और अधिकारी देवता आगमानुसारी हैं, इनकी उत्पत्ति का विवरण भी युक्तिसंगत है जैसा कि पादटिप्पणियों से स्पष्ट है । ५८. यहाँ ' जिह्म दृष्टि निरीक्षण ' इत्यादि ( का ५८ ) पद की व्याख्या है वक्र कही जाने वाली भाव भरी दृष्टि से जिसमें निरीक्षण किया जाता है ऐसे [ जिह्मदृष्टि का लक्षण ना ० शा ० ८।३१ पर दिया गया है । ] ७४-७५. वीभत्स रस में गन्ध, रस, स्पर्श एवं शब्दगत विकारों से जो घृणा का भाव या उससे हटने की क्रियाएं हैं उनके द्वारा । ७८-८३. रसों के वचन, वेष एवं क्रियागत विकार से सांख्यदर्शन के आधार पर त्रिगुणगत विभेदों को ध्यान में रख कर प्रत्येक रस की त्रिविधता बन जाती है । इस प्रकार कारणीभूत विभावों के तीन विकारों से कार्य में भी त्रिविधता आती है इसी तथ्य को मुनि ने यहाँ दिखलाया है । केवल अद्भुत रस के दो ही प्रभेद होते हैं । ८४-८८. यहां मूल की कारिकासंख्या शान्तरस के विवरण में केवल उद्धरणों की सुविधा से लगाई है क्योंकि शान्तरस की कारिकाएं नाट्यशास्त्र की मूलप्रतियों में कही नहीं भी है तथा जहाँ हैं भी वहाँ भी इन्हें मूलानुगत संख्या से पृथक् रखा गया है । अतएव इन्हें यहाँ औचित्यवश ही हमने संख्या लगा कर ही सम्पादित किया है । →→ -

पृष्ठ 676

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सप्तम अध्याय ( भावाध्याय ) १. जब षष्ठ अध्याय के अन्त में भावों के लक्षण निरूपण की सूचना दी. जा चुकी थी तो फिर यहाँ उनका यह कथन उनमें प्रधानतः स्थायी एवं सवारी भावगत भेदों के साथ लक्षण दिखलाने के लिये हुआ है जिसकी यहाँ प्रतिज्ञा भी की गयी है । इसके अतिरिक्त रसाध्याय में नाट्य के अङ्गों के बीच में उद्देश्य - संकीर्तन के रूप में भावों का उल्लेख था और वहाँ रस - निरूपण के प्रसंग में ही भावों की चर्चा रखी गयी थी परन्तु यहाँ प्रधानतः स्थायी, संचारी आदि भावों के ही लक्षण बतलाना अभीष्ट है तथा यही अध्याय-संगति भी है । इसी कारण मुनि ने विषय का आरम्भ करते हुये कहा है-' विभावै ' इत्यादि से । ३-४. प्रथम कारिका में यद्यपि प्रकरण से चित्तवृत्ति के उद्भव का हेतु जो विषय है उसे ' विभाव ' कहा गया तथापि विभाव के विषय में पुनः स्पष्टी-करणार्थं प्रश्न करते हैं - ' विभाव ' इत्यादि गद्यभाग से । इसी का उत्तर भी मुनि ने ' विभाव्यन्ते ' इत्यादि गद्यभाग से दिया है । जिन स्थायी एवं व्यभि-चारियों से सम्बद्ध वागादि अभिनय है उन स्थायी एवं व्यभिचारियों को वागादि अभिनयों के साथ जिनसे विभावित या विशिष्ट रूप में जाने जानेवाले जो हैं उन्हें ' विभाव ' समझना चाहिये । क्योंकि अभिनय में अनेक कारणीभूत रहते हैं जैसे हर्ष से हास की उत्पत्ति, घाम, धुआ, रोग आदि के कारण आंखों से अश्रु प्रवाह का बहना यहाँ केवल वाष्पपद के प्रयोग मात्र से कुछ नहीं प्रतीत होता है तो वह ' विभाव ' शब्द से शीघ्र निश्चित होकर प्रतीत हो सकता है । ५. वागङ्गाभिनयेन — इसमें जो ' ग ' पाठ है उसकी पारम्परिक व्याख्या के आधार पर योजना होगी -वाणी अङ्ग तथा सत्व के अभिनयों से अर्थात् त्रिविध अभिनय प्रभेदों के कारण जिस अर्थ की अनुभावना या प्रतीति कर-वायी जाती है ऐसा वाणी, अङ्ग तथा उपाङ्गों के द्वारा प्रस्तुत वह वाचिकादि अभिनय का रूप ' अनुभाव ' होता है । ' वागङ्गोपाङ्गसंयुक्तः ' ' ग ' सम्मत पाठ लिया गया है जो यहाँ संगत है । ८. विभावादि से उपचित ' स्थायी ' ही रसत्व प्राप्त करता है परन्तु जब " वह संयुक्त या व्यवस्थित रूप में योगप्राप्त नहीं करे तो स्वतन्त्र या पृथक्

पृष्ठ 677

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नाट्यशास्त्र ५४८ की दशा में ' स्थायी ' है । वह उसकी संयोग के पूर्व की स्थिति या भाव सकता है । अतः अनुपचित स्थायी ही स्थायी है इसलिये प्रत्येक लिङ्ग भी हो अपेक्षित होगा जिसे क्रमश: अब मुनि स्थायी का पृथक् पृथक् विवरण भी देते हैं । ( स्थायी का विवरण मूल तथा वहीं टिप्पणी में द्रष्टव्य ) २८-३०. संचारीभावों का विवरण आरम्भ करते हुए मुनि क्रमशः उनके के प्रसङ्ग में सर्वप्रथम ' निर्वेद ' का स्वरूप देते हैं- ' तत्र निर्वेद ' इत्यादि से लक्षण । अतः जो दारिद्र्य, व्याधि आदि कारणों से उत्पन्न होने वाला और रुदित निश्वसित आदि दशा का कारण होने वाला ऐसा मनोविकार जो दुःखरूपी विशेषभाव है वह ' निर्वेद ' है । चिरकाल तक विद्यमान भ्रान्ति के हान तथा उपादान की गणना के बाद जो तत्वज्ञान होकर भ्रमनिवारण हो जाता है तो स्वयं को जो ' धिक् मैं व्यर्थ ही भ्रमित रहा ' जैसा बोध ' निर्वेद ' को व्यक्ति है । जैसे - वृथा दुग्धोऽनड्वान् ' इत्यादि पद्य ( ना ० शा ० भाग उत्पन्न करता १, पृ ० ३५३ टिप्पणी पर ) है । ' सम्प्रधारणादि ' पद से यह भी समझना चाहिये कि यद्यपि सम्प्रधारण वितर्क या अन्य भाव के रूप में होता है फिर भी वह अनुभावों के रूप में ही है संचारी के रूप में नहीं । ' निर्वेदवान् पुरुषः ' में मतुप् प्रत्यय से यह भी दिखलाया गया है कि ये निर्वेद आदि घटादि की तरह ' इदं ' रूप में अव-भासित नहीं होते किन्तु ' अहं निर्विण्ण ' इत्यादि के रूप में आश्रय पारतन्त्रेण अवभासित होते हैं । इसलिये ' निर्वेद ' यह आन्तर विकार है । यह ' निर्वेद ' ही स्वयं पुरुषार्थ सिद्धि के लिये उत्साह रति आदि के समान अत्यन्त अनुरञ्जन के लिये अथवा हास, विस्मय आदि के समान अन्य मुखप्रेक्षित रहने के कारण संचारी है । ३१-३२. ' ग्लानि ' के विवरण में प्रयुक्त वान्त तथा विरिक्त पद में भाव में क्तप्रत्यय हुआ है । ' क्षामवाक्य ' में वाक्य की क्षीणता स्वर के नीचे रहने से होगी । मन्द भाव से पैरों को उठाने तथा उसी के साथ साथ विपरीत दशा में इन्हें नीचे रखने के कार्य से । वान्त इत्यादि में निमित्त सप्तमी है । यहाँ का रिकारूप मुहुर्मुहुः पद से मुनि ने यह भी दिखलाया कि सजातीय तथा विजातीय चित्तवृत्ति के प्रवाहमात्र संचारियों के रहने पर कभी कभी किसी एक की चिर स्थिति नहीं होती या कभी थोड़ी हो भी सकती है । ३३-३५. ‘ शङ्का ' के विवरण में ' चोर्यग्रहण ' पद अनुचित कार्यों का उप-लक्षण है । अतः इसी के समान जो अनुचित कार्य है उनके मध्य में किसी एक के करने या वैसे कार्य के करने वाले को न जाने की आशङ्का रहने से ' शङ्का '

पृष्ठ 678

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परिशिष्ट टिप्पणी, अध्याय ७ ५४ ९-हो जाती है । इसी को आगे नृपापराधादि प्रदर्शन से विस्तारपूर्वक कहा भी गया है । ' स्त्रीनीचानाम् ' इति । यहाँ यद्यपि उत्तम स्वभाव तथा प्रकृति वाली स्त्री से किसी अकार्य की स्थिति नहीं होती और अधम प्रकृति की स्त्री का ' नीच ' पद से संग्रह हो भी जाता है परन्तु फिर भी यहाँ जो ' स्त्रीपद ' दिया गया है उससे यह समझना चाहिये कि जो अपाप भी है किन्तु जी किसी अपराध में लगा दी जाए तो ऐसी स्त्रियों के चित्त में ' शङ्का ' होती ही है क्योंकि स्त्री का स्वभाव भीरु या डरपोक रहता है । अतः जो अन्यगतत्वेन ' शङ्का ' है जैसी वेणीसंहार नाटक में दुर्योधन की भानुमती के प्रति थी तो यह भी इससे गृहीत हो जाती है । यहाँ केवल प्रतिनायकभूत दुर्योधन का ऐसा कार्य ' अनौचित्य ' होकर आया है जो वर्णनानोचित्य जैसा कार्य बन गया है । आकार संवरणमपीति यहाँ प्रयुक्त ' अपि ' शब्द से जो ' अवहित्य ' में बाहुल्येन दिखलाई देते हों वे कार्य यहाँ भी रखे जा सकते हैं । केचित् पद से यह भो दिखलाया गया है कि वस्तुतः यह शङ्का का अनुभाव नहीं अवहित्य भाव का भी है । आकारसंवरण शङ्का को किस प्रकार उत्पन्न कर सकता है ऐसी आशङ्का के उत्तर में ' तच्च ' इत्यादि से कहा गया । उपाधि का अर्थ होगा आकार संवरण का उपाय जैसे अपने कथन को बन्द कर देना तथा अतिष्य बातचीत करने लगना आदि । इंगित अर्थात् अङ्गों के और उपाङ्गों के ऐसे स्पन्दनमय कार्य जो दबाये न जा सकते हों । द्विविधेति - यहाँ आत्मपद से स्वात्मगतता अपराध तथा पर शब्द से परगत अपराध समझना चाहिये । इनमें परगत अपराध के सम्भाव्यमान न रहने पर जो ' शङ्का ' है वह ' परोत्थ है । - इतना रहने पर भी परत्र चौर्यादि की आशङ्का क्यों होगी ऐसी आशङ्का को दिखलाने के लिये ' दृष्टिचेष्टाभिः ' से कहते हैं । वह जब दूसरे के अपराध किये जाने पर देखना या चेष्टा करता है ( और अपने अप्रगल्भ या भीरु स्वभाव के कारण जब स्वयं भी अपराध युक्त हो जाए ) तो ( भी ) वहाँ चौर्यादि अपराध विषयक शङ्का हो जाती है । • पार्श्वादि को शङ्का की दशा में देखना जिसे बगले झांकना कहा जाता है वह कौए की तरह आशङ्कित होकर करना चाहिये । ३६-३७ गुणनाशन - येन वचनेन गुणो नाश्येत अर्थात् जिस कथन से गुण को समाप्त करते हुये विद्वेष आदि से कहते हुये रहा जाता हो । जैसे किसी सात्विक ब्राह्मण को तप से निरत देखकर ढोंगी बतलाना आदि । ३८-४६. ‘ करणं ' पद का यहाँ अर्थ होगा चेष्टा अतः जहाँ पञ्चविध चेष्टाएँ हैं वही ' मद ' का अभिनय भी समझना चाहिये । यही सूत्र में भाव शब्द

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५५० नाव्यशास्त्र से दिखलाया गया है । ये पांच चेष्टाएँ ' कचिन्मत्त ' इत्यादि कारिका से कहते हैं । प्रकृति के भेद से उत्तमपात्र को तरुण मद तथा मध्यमपात्र को मध्यम मद ही हो ऐसा नियम नहीं है अतः सभी को तरुण मद, मध्यम तथा नीच पात्र को मध्यममंद तथा नीचपात्र को उत्कृष्ट या गहरा मद भी हो जाता । यहाँ यही बात कवि तथा नट के उपदेशाथं ' रङ्गे पिबतः ' इत्यदि से बतलाया है । प्रसङ्गवश इसी प्रकार के अन्य रूप को भी ' अभ्युदयसुखैः ' इत्यादि से दिखलाते हैं । अभ्युदय के वाच्य या शब्द द्वारा बतलाने वाले वाक्य के द्वारा अर्थात् प्रीति या सुखप्रद कथन से । ५०-५१. यहां कारिका में प्रयुक्त ऐश्वर्यभ्रंश पद से तात्कालिक दशा और ' दारिद्रय ' से कुल क्रमागत की स्थिति समझना चाहिये यहीं इनमें विशेष या भेदक है । इस विवरण से संकेत मिलता है कि चिन्ता के पूर्व तथा उत्तर कक्ष में अर्थात् पहिले और अन्त में वितर्क होता ही है । ५२-५३. मोह में होने वाले ' देवोपधात ' पद का अर्थ है अग्नि तथा जल का उपद्रव होना । ' तत्प्रतीकारशून्यस्य ' पद से मोह की पूर्वावस्था किंकर्तव्यता मूढ़ता को मोह शब्द से दिखलाया गया है । इसकी स्थिति ' सर्वेन्द्रियसम्मोह ' इत्यादि से इस प्रकार दिखलायी गयी है जिससे आन्तरिक संवेदना की मोह में समाप्ति नहीं होती है तथा इसी से मोह चित्तवृत्ति रूप भाव होता है यह भी संकेतित हो जाता है । ५४-५५. ‘ सुखदुःखकृतानां ' पद की सुखदुःखयोः कृतं निष्पत्तिर्यंतः तेषाम् व्याख्या है । इस प्रकार स्मृति सभी विषयों में व्यापक रहती है यह स्पष्ट हो जाता है । यहाँ ' जघन्य ' पद का अर्थ है रात्रि का पश्चिम या चरमभाग । ५६-५७. कारिकास्थ ' विज्ञान ' पद का अर्थ है विवेक ज्ञान, शोच या तप सेवादि का आचरण रूप अधिक अर्थ अर्थात् जो इष्ट मनोरथ से अधिक हो ऐसे अर्थ का लाभ हो जाना । यहाँ कुछ की तो विषयता है जिससे ईप्सित लाभ होकर ' धृति ' होती है और किन्हीं की करणता है जैसे क्रीड़ा के विनोद से दुखित होकर ' धृति ' पाता है । किसी की उभयरूपता ( विषयता और करणता दोनों ) होती है जैसे प्राप्त विषयादि का उपभोग पाकर अप्राप्त के विषय में अनुशोचन ही तो ऐसे विभावों से ' धृति ' होगी । उपहृत पद का अर्थ है जीर्णादि रूप को प्राप्त तथा विनष्ट अर्थात् ध्वस्त होना । ५८-५९. अकार्य करण शब्द से उसका ज्ञान कहा गया है । ' जो किया न जाना था ऐसा मैंने कर डाला ' इस प्रकार की विशेष समझ का आना । इसी

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ७ ५५१ कारण स्त्री तथा बालक आदि के सम्मुख किसी अपूर्वं पुरुष के आने पर लज्जा देखी जाती है, बिना किसी अकार्य के किये जाने पर भी 1 । ' मैंने पूर्व तथा पर का विचार नहीं रखा इसी बात को लोग समझ रहे हैं ' ऐसी बात होने पर भूमि लेखन आदि होते हैं । ' शुचिभिः ' का अर्थ है उचित कार्य करने वालों के द्वारा । क्योंकि अकार्य करने वालों के बीच किसी को भी अपने अकार्य की बुद्धि नहीं आती है । परन्तु जब इसका बाद में मन में ' विवेक ' जागृत होता है तो पश्चात्ताप का भाव उदित होता है और वह फिर पिछले दोष के न हटने के कारण सन्तप्त करता ही है । ६०. कारिकास्थ ' बधताडनम् ' से पाप रूप तथा सहसा करने के अयोग्य जो भी कार्य हों उन अनुचित कार्य का इसी से संकेत मिल जाता है । इसी से यह भी कि विमर्श के बिना शीघ्रता से जो कार्य किया जाता है वही ' चापल्य ' है । ६१-६२. पुत्रादिगत हर्षकारणत्व को बतलाकर मुनि ने यह दिखलाया कि अन्यगत सजातीय भाव भी भाव का कारण हो जाता है । जैसे रामगत निर्वेद चिन्ता आदि लक्ष्मण के निर्वेद चिन्तादि की उत्पत्ति में कारण होते हैं । अप्राप्य का अर्थ है असम्भवनीय की प्राप्ति । हृदय जहाँ जिस वस्तु को सारभूत मान ले तो उसकी प्राप्ति से हर्ष उत्पन्न हो ही जाता है । जैसे सुवर्ण प्राप्ति के लिये दूर देशों में भ्रमण करने वाले को अनन्त मूल्यवान् सुवर्ण तथा रत्न का लाभ होना । यहाँ मनोरथ के हृदय के द्वारा ग्रहण करने से उसकी आङ्गिक व्यापारों से विभिन्नता दिखलाई गयी है । ६३-६५. प्रयोगगत योग्यता के कारण आविष्टहृदयवालों में ही ' आवेग ' रहने के कारण प्रतिविभाव तथा अनुभावों के भेदों से होने वाले प्रयोग वैचित्र्य को लक्षण में विस्तार से मुनि ने दिखलाया है । ' उत्पातकृत ' के स्वरूप में अतिक्रान्ता और अपक्रान्ता चारी के द्वारा अपसर्पण किया जाना चाहिये । उद्भ्रमण जहाँ सीमा को लङ्घन कर भ्रमण हो । अप्रिय श्रवण में किसी सामान्य-जनक आवेग हो तो वहाँ शोक के अनुभावों को एक के बाद एक शीघ्रगति में रखने चाहिये तथा बाद में ' शोक ' को रखा जाए और धीरप्रकृति के जन में प्रथम शोक तथा बाद में अनुभावों को रखे - यह श्री शङ्कुक का मत है । परन्तु ऐसा मानना समीचीन नहीं क्योंकि यदि ऐसा मान भी ले तो आवेग स्थायीभाव हो जाएगा और शोक व्यभिचारीभाव बन जाएगा । अतः यदि अधीर प्रकृति को प्रथम क्षण में शोक उत्पन्न ही हो गया हो तो वह द्वितीय क्षण में आवेग से अभिभूत होगा या बढ़ा दिया जाएगा । परन्तु धीरप्रकृत्ति