भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ — पृष्ठ 681–690

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य १ · पृष्ठ 681–690

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५५२ G नाव्यशास्त्र को आवेग होकर भी धैर्य से दबता हुआ अपनी उचित दशा में आच्छादित सा रहता है न कि वह उत्पन्न ही नहीं होता । जैसा कि यही आगे स्वयं मुनि ने ही ' स्थैर्येणोत्तम मध्यानाम् ' ( ना ० शा ० ७१६३ ) से कहा भी है । इसके अति-रिक्त संचारी भावों के साहचर्य से रहित स्थायीभाव की कोई भी स्थिति नहीं है । इसी प्रकार स्थायीभाव की भित्ति से बन्ध्य या रहित संचारीभाव की भी विचित्राभरी स्थितियाँ नहीं रहेंगी । यहाँ ' अपसर्पण ' पद में प्रयुक्त बहुवचन इस क्रिया की अनेक स्थितियों के सूचनार्थ रखी गयी है, जिनमें पलायन आदि आते । इसके अतिरिक्त अग्नि तथा कुञ्जर आदि के उपद्रव के समय रहने वाले ' आवेग ' में यह ' अपसर्पण ' अनेक बार होगा । अप्रिय-निवेदन से जो आवेग होगा उसमें विषाद आदि अनुभाव होंगे यह बात कहने पर एक संचारी की दूसरे के बीच में यह स्थिति रहेगी यह बात भी इसी से दिख जाती है । इसे हमने आरम्भ में ही दर्शाया भी है । ६६. कार्य के विषय में प्रवृत्ति न होना ( अप्रतिपत्तिः ) इससे विवेका-भाव ही जडता है यह स्पष्ट है । प्रश्न के करने पर भी उत्तर में कुछ न कहना यह स्थिति सामान्य रूप में मित्रों के कथन में प्रवृत्ति न होना ही है । यह मोह के पूर्व में या बाद में भी हो सकती है यह भी लक्षण से स्पष्ट है । ६७-६८. जो पुरुष अपने जीवन के पूर्व भाग में विद्यादि से हीन होते हैं ऐसे नीच प्रकृति के पुरुषों को विद्यादि की बाद में प्राप्ति हो जाने पर उनमें ' गर्व ' हो ही जाएगा । ऐसी स्थिति में दृष्टि तथा अङ्गों की विविध विकारों से युक्त गति होगी । यह इनमें धारावाहिकरूप में रखी जाएगी परन्तु यही भाव उत्तमपुरुषों में बिजली की तरह क्षणमात्र के लिये आएगा । ६ ९ -७०. मूल लक्षण में दिये गये विवरण से आये हुये पदों में कार्य पद का अर्थ है उपायों के द्वारा किये या चलने वाले उद्यम का अनिस्तरण अर्थात् फल की सम्पत्ति से रहित होना ऐसी जो देवव्यापत्ति अर्थात् भाग्य की विषमता उससे ' विषाद ' होता है । ऐसा कहने से ये ही सूचित होता है कि देव के दोष से उत्पन्न जो फल की सम्पत्ति का क्षीण होना वह उत्तम उपायों के रहने पर भी हो सकती है । कुछ आचार्य इस भाव के क्रोध की दशा में न रहने की बात करते हैं परन्तु वह ठीक नहीं । क्योंकि रौद्रप्रकृति के व्यक्ति में भी ' विषाद ' मिलता है । जैसे ' रामाभ्युदय मैं -एतत्तु क्षतिमातनोति मनसो यद्वज्रधाराङ्किते । क्रौर्येच्छाप्रणयः प्लवङ्गनखरैः प्राप्तः प्रहस्तोरसि ॥

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ७ ५५३ यहाँ जो मानस क्षति है वही दौर्मनस्य भाव है और यही विषाद का अनुभाव है । ये पशुवृत्ति वानर जो सदा भागने की वृत्ति रखने वाले हैं उनकी कार्य भाव की इच्छा अनुचित है । किन्तु उनका जो प्रणय या अभीष्ट है वह समग्र अभिलषित पदार्थ की परिपूर्णता में है परन्तु यह भाग्य की प्रतिकूलता के कारण उत्तम उद्यम या उपायों के करने पर भी उनसे फल की सम्पत्ति या प्राप्ति को नहीं करवा सकता । इस प्रकार अनुभाव के द्वारा यह बात स्पष्ट दिखती है तथा इस रूप में विद्यमान विषाद का क्रोध व्यभि चारित्व किमी भी युक्ति या आगम या अनुभव से विरुद्ध पड़ेगा । ७०. उत्सुक का भाव ' औत्सुक्य ' है । इसमें ' वियोग ' पद के ग्रहण से इसकी विप्रलम्भ शृङ्गार में प्रमुखता की सूचना मिलती है । लक्षण में ' स्मरण ' पद से स्मृति से यह उद्दीप्त होता है तथा इसमें शयनाभिलाष बिना निद्रा के भी हो सकता है । यह बात पृथक् से बतलाने के लिये दोनों को अलग अलग दिखलाया है । ७१-७२. लक्षण में प्रयुक्त ' दौर्बल्य ' पद का अर्थ है व्याधि आदि के कारण शक्ति का क्षीण होना तथा क्लम अर्थात् स्वेद से होने वाला स्राव । ७३-७४. देवगण से लेकर पिशाच तक ग्रहों से जो अधिष्ठान के लिये स्मरण किया जाता है अथवा जो सत्वहीन है वह पुरुष इन देवादि का ध्यान या भय रख कर अपस्मार से ग्रसित हो जाता हैं । किसी अशुचि स्थिति में शरीर के हो जाने पर इन ग्रहों का चिरकाल तक अवस्थान हो जाता है । वात, पित्त तथा श्लेष्म धातुओं के वैषम्य तथा बुद्धिस्थान में जम जाने पर ' अपस्मार ' जो मानते हैं उनका आशय बुद्धितत्व के विकृत हो जाने से है । ७५- ७७ - लक्षण में सुप्त के लिये ' निद्रासमुत्य ' पद देने का आशय यही है कि जो प्रगाढ़ स्थिति है वही ' सुप्त ' है जो विषयों से उपरमण की स्थिति है । जब कोई स्वप्न दशा में किसी का अनुस्मरण करता है तो ऐसा प्रलाप सुनकर बाहर लोक में उसकी किसी स्मृति का अनुमान लगाया जाता है । ७७. निद्रा के अपनी नियत मर्यादा के वश या आहार के परिणाम आदि से या इनके बिना भी निद्रा का छेद हो जाने से ' निद्राच्छेद ' को पृथक् रूप में ' विवोध ' में दिखलाया गया । यह स्वप्न की परिसमाप्ति रूप होता है । शब्द, स्पर्श आदि विबोधगत ही होते हैं ऐसा श्री घण्टुक का मत है परन्तु ये शब्दादि बाह्य मानना उचित है । ७७-७९. प्रतिकार की इच्छा रूप यह ' अमर्ष ' क्रोध से भिन्न है । इसमें ध्यान बिना किसी लक्ष के अवस्थान है जो चिन्ता से यहाँ भिन्नता भी रखता

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५५४ नाव्यशास है । ' उत्साह सम्पन्न ' पद से यह सूचित होता है कि उत्साहहीन या प्राकृत जन में यह नहीं होता । लक्षण में उत्साह तथा अध्यवसाय पद से इनके अनु-भावों को समझना चाहिये । ८०. ' अवहित्य ' पद का निरुक्त है — ' न बहिस्थं चित्तं येन इति । ' यह पृषोदरादित्वात् सिद्ध होता है । अन्य व्याख्या है - ' आक्रियते बहिः प्रकाश्यते चित्तवृत्ति यस्तेषाम् भूविकाराणाम् आच्छादनकारि यत् चित्तवृत्तिरूपम् तत् ' अवहित्थम ' अर्थात् बाहर व्यक्त होने वाले भ्रूविकारों के आच्छादन से जिस चित्तवृत्ति का प्रकट होना लक्षित हो वह ' अवहित्थ ' है । जो आच्छादनकारि चित्तवृत्तिरूप है । प्रगल्भ पुरुष अपने आकार का संवरण समझता है इसी कारण उससे एक ' घाष्टर्य ' और लगाया गया । लज्जायुक्त अप्रगल्भ इन कार्य को नहीं कर सकता या जानता इसलिये इसके सभी विभावादि में ' धाष्टर्य ' ही अनुगत रहता है यह समझना चाहिए । ८१. अकार्य का चौर्य कर्म उपलक्षण है क्योंकि यही अनेक अकार्यों का कारण बनता है तथा इसी कारण जब राजादि के द्वारा मनुष्य को पकड़ा जाता है तो उस अपराधी के प्रति उग्रता तथा निर्दयभाव उनका रहता है । यही बात राजा के प्रति अपराध करने वाले तथा असत्प्रलाप या मिथ्यादोष-वादी के प्रति भी होती है । ८२. अपूर्व प्रतिभान रूप ' मति ' होती है । अनेक शास्त्रों का अर्थ ( आशय ) या प्रयोजन है विवेक का लाभ होना उससे यह उद्धत होती है । इसलिये शिष्य को उपदेश देने वाले भाव से या प्रयोजन से जो क्षेपादि देह विकार होते हैं उन्हीं अनुभावों में ' मति ' का अभिनय दिखलाया गया है । ८३. ज्वर की सभी व्याधियों में प्रधानता रहने के कारण ' ग्रहण ' किया गया । मदनविकार में भी ज्वर की सम्भावना रहती ही है । व्याधि के रहने पर उस समय जो किसी आतुर की चित्तवृत्ति होगी वही यहाँ व्याधिशब्द से अभीष्ट है क्योकि व्याधि की दशा में आतुर का चित्त अपने स्वाभाविक रूप में स्थित नहीं रहता है । ८४-८५. इष्टजन से वियोग की दशा में ( विप्रलम्भ शृङ्गार की स्थिति में ) उत्तम पक्ष को भी पुरुरवा की तरह ' उन्माद ' होता है । उत्तमपात्र न होने की दशा में यह विभवनाश से भी होता है । अतएव इसमें प्रकृति के औचित्य के आधार पर विभावादि को विभागपूर्वक रखना होता है । कुछ टीकाकार इसमें ' चित्तविकार ' पद की व्याख्या ' चित्रां विकरोतीति विकारः ' करते हैं । परन्तु यहाँ भट्टतोत - चित्त का जो विकार अर्थात् विकीर्णता या

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ७ ५५५ बिखराव है जो किसी एक के निश्चय न होने से एक स्थान पर स्थित न रहना है जो ' उन्माद ' रूप है । जैसे विक्रमोर्वशीय में प्रिया को न देखने पर तथा अन्य कुछ न प्राप्त रहने पर नायक का शीघ्र उन्माद युक्त हो जाना । यही बात कविकुलचक्रवर्ती कालिदास ने प्रतिबोधित भी की - ' तिष्ठेत् कोपवशात् ' ( वि ० ० ) इत्यादि से । अनिमित्तता का अर्थ है किसी प्रसिद्ध कारण का न रहना । व्याधि के अन्तर्गत उन्माद भी एक है किन्तु विप्रलम्भ आदि में विचित्र चेष्टाओं आदि से प्रयोग में सुन्दरता लाने के कारण इसे व्याधि से पृथक् रूप में रखा गया । इसी प्रकार अपस्मार में भी समझना चाहिये । क्योंकि वह बीभत्स, भयानक आदि में इसी प्रकार विचित्रता उत्पन्न कर देता है । ८६ - ९ ०. जब व्याधि के शरीर में अधिक गहराई से जम जाने के कारण ऐसी चित्तवृत्ति बने कि अब इससे निपटना अशक्य है तो यही चित्तवृत्ति अभिनय में, ' मरण ' है अर्थात् प्राणों का त्याग करना । इसलिये म्रियमाण दशा की चित्तवृत्ति ही यहाँ भरत ने मरण रूप संचारी माना है मृतावस्था को नहीं । क्योंकि उसमें किन्हीं अनुभावों की स्थिति नहीं होती । यहाँ इन्द्रियों से वर्जित अभिनय रहने के कारण ' सर्वेन्द्रियसम्मोह ' भी कहा गया है । ९ १. ' भैरव ' का अर्थ है जो भीरुजन को त्रास देता हो ऐसा । शीघ्र ही विधूननकारी चमत्कार करने वाला ' त्रास ' भय से पूर्वापर विचार के कारण भिन्न है यह बात ' अक्षिनिमेषः ' पद तथा उसमें प्रयुक्त बहुवचन के द्वारा संकेतित की गयी है । ९ २. ' वितर्क ' के लक्षणगत रूप में ' सन्देह ' सदा उभयावलम्बी ज्ञान होता है जिसे संशय भी कहते हैं । विमर्श का अर्थ है विशेष प्रतीति की आकांक्षा रूप इच्छा की स्थिति रहना । कुछ विद्वान् धर्मी में सन्देह तथा धर्म में विमर्श इस प्रकार स्थित भ्रान्ति ज्ञान को ' विप्रत्यय ' कहते हैं । इसमें ' विहृत या ' चली गयी जैसी बुद्धि से कार्यकलापों का परित्याग तथा प्राप्ति दोनों विवक्षित रहती हैं ( किसी मन्त्र या मन्त्रों ( गुप्त सलाह को ग्रहण करने के कारण इसकी अवहित्य से समान स्थिति रहती । । विचारणा का अर्थ है पूर्व पर का विचार | नय अर्थात् षाड्गुण्य का प्रयोग ही जिसकी आत्मा है ऐसा, क्योंकि अन्य पक्ष में रहने वाले बल की सम्भावना के ज्ञान से ही सभी नीति प्रयोग होते हैं । आचार्य चाणक्य ने ' दैवमचिन्त्यं पुरुषकारस्तु चिन्त्यः ' कहकर तर्कपूर्वक सभी नीति व्यवहार को करने की बात कही है । जैसा कि आचार्य भट्टतोत ने भी कहा-' सम्भावनाप्रमाणो हि तीक्ष्णप्रज्ञोऽपि यद् वदेत् । "

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५५६ G नाट्यशास्त्र अर्थात् तीक्ष्णबुद्धि चतुर जन भी सम्भावना या तर्क करके ही कहते हैं । इत्यादि । त्रयस्त्रिंशद व्यभिचारिणो भावा इति । संचारी भाव तैंतीस ही होते जैसे - दम्भ का अवहित्थ में, उद्वेग का निर्वेद में, क्षुत् तृष्णा का ग्लानि में अन्तर्भाव हो जाता है । कुछ आचार्य कहते हैं कि चित्तवृत्तियों की गिनती करने में कौन सक्षम है और गणना तार्किक गुणन के द्वारा या सांख्य दर्शन के द्वारा संख्या प्रत्यय की सरणि से सभी का संग्रह भी हो तो उसकी सीमा क्या होगी । इसके अतिरिक्त यदि कवि तथा अभिनेता के शिक्षार्थ इतने संचारी का निरूपण हो तो फिर अन्य भावों को भी दिखलाना उचिते है इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि सामान्याभिनयाध्याय में मुनि ने पुरुष तथा स्त्रियों के भाव चेष्टाओं तथा अलङ्कारों का विवरण दे ही दिया है जो संचारी से भिन्न है । यहाँ विभाव, अनुभाव के अतिरिक्त संचारी का मात्र निरूपण हुआ है । इसी कारण ग्लानि में क्षुततृष्णा जैसी दशा का विभावत्वेन प्रसिद्ध होने से लक्षण में उल्लेख हुआ है । प्रत्येक भाव का कवि तथा अभिनेता के उपयोगी लक्षण देना अधिक उपयुक्त भी नहीं है केवल शास्त्र की दृष्टि से ही भावों का विवरण उपयुक्त है । कुछ आचार्य कहते हैं कि मुख्यरूप से तैंतीस भावों का यदि ज्ञान रहेगा तो अनुभावों का बोध सरलता से हो सकता है । आचार्यों का मत है कि इन्हीं संचारी के प्रयोग से सौन्दर्य की सृष्टि होती है तथा ये ही स्थाथी की चर्वणाभूमि को प्रस्तुत करते हैं जिससे आगे चलकर स्थायी रसत्व प्राप्त कर सके ।

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परिशिष्ट २ पद्यार्घानुक्रमणिका पद्य अ अंशभागैर्भवद्भिस्तु अंशांशैर्भावितान् भावान् अक्षराणां कलायास्तु अक्षिनिमीलोच्नैः अग्निकुण्डाज्यकुण्डौ च अग्नौ होमं ततः कुर्यात् अङ्गनेपथ्यवाक्यैश्व अङ्गवस्तुनिवृत्तौ तु अङ्गहारप्रयोगे तु अङ्गहारेषु वच्यामि अङ्गनारैश्व देव्यस्ताः अङ्गानान्तु परावृत्तौ अङ्गुलञ्च तथा हस्तः अङ्गुलानि तथा हस्तः अचलचाप्यकरण्यच अचितं वामहस्तञ्च अञ्चितः पृष्ठतः पादः विवरण अच्चितः स्यात् करो वामः अचितेन तु पादेन अञ्चितैर्वलितैर्हस्तैः अचितो नासिकाग्रे तु चितौ बाहुशिरसि अड्डिता चात्र कर्त्तव्या अड्डितायाः प्रयोगज्ञः अणवोऽष्टौ रजः प्रोक्तं अणू रजश्व बालच अत ऊर्ध्वं न कर्त्तव्यः अत ऊर्ध्व प्रवच्यामि पृष्ठ २१ १७ | २०५ ४१७ ९ ७७ ३४७ | १४६, १४ ९ १३ ९ ८८ १ ९ ५ १४५ ३७ ३७ ४७ १२३ १०३ १११ १०२ ११ ९ ९ ७ १२३ ९९ ९ ६ १८४ २० ९ ३७ ३७ ३७ ३३६ पद्य पृष्ठ अतः परं प्रवच्यामि ५ ९, ११६, १५८, १६२, २०३, २०४, २१०, २२८ अतश्चैव प्रतिक्षेपात् १३७ अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा १०७, ११० अतिक्रान्तैः सललितैः १८७ अतोऽन्यत् परिवर्तायाः २०६ अत्र विघ्नविनाशार्थम् १०७ अत्र शुष्काचरैरेव १६० अत्रेयदानीमयं वेदः १५ अत्रोच्यते न खल्वर्थ १३६ अथ परिजने तु रोषः ३८६ अथवा या क्रियास्तत्र ३३ अथापश्यत् सदो विन्नैः १८ अथाह मां सुरगुरुः ११ अधमान पहसितं ३२० अधस्ताद् रङ्गपीठस्य २४ अध्यर्धहस्तोत्सेधेन ४ ९ अनध्याये कदाचित्तं २ अनभिमत दर्शनेन च ३४४ अनिमित्तरुदितहसितः ४१३ अनिमेषप्रेक्षणतः ४३१ अनिस्सरणधर्मत्वात् ३८ अनुभावा विभावाश्च ३७६ अनेन यस्मात्तेनायम् ३७४ अनेन हि प्रमाणेन १ ९ २ अनेनैव प्रमा ३७ अनेनैव विधानेन ६६, ६८, १३ ९ अन्तर्यवनिका संस्थः १ ९ ७ अन्याश्चानुक्रमेणाथ ४१० अन्येऽपि ये देवगणाः ७४ | अन्यैश्व विकारकृतैः ४२३

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५५८ अपक्रान्तश्च सम्प्रोक्तमू अपक्रान्तक्रमं कृत्वा अपक्रान्तार्धसूचीभ्याम् अपविद्धं तु करणम् अपविद्धं दुतं चैव अपविद्धं समनखं अपविद्धः करः सूच्या अपविद्धोऽङ्गहारश्च अपविद्धो भवेद्धस्तः अपसर्पस्तु विज्ञेयः अपस्मारस्तथोन्मादः अपूजयित्वा रङ्गं तु अपूपैर्लोपिकामिश्रैः अप्राप्तैश्च न शोकः अप्राप्ते प्राप्ये वा लब्धेऽर्थे अप्रियनिवेदनाद्यः अप्रियनिवेदनादिश्रवणाद् अबुधं बुधसेन अबुधानां विबोधश्व अभवन् चुभिताः सर्वे अभिद्योत्य सहातोद्यैः अभिनेतव्या चिन्ता अभिनेयः करुणरसः अभिनेतु भवेत् कुम्भे अभिमन्ध्य यथान्याय्यम् अभ्यन्तरापविद्धः स्यात् अभ्युदयसुखैर्वाक्यैः अयं ध्वजमहः श्रीमान् अयमेव प्रयोगः स्यात् अर्गलमपि विक्षिप्तम् अर्चयेद् भूतसङ्घाश्च अर्थोपजीविनामर्थ-अर्धच्छ भवेत् सूत्रे अर्धरेचितकं चैव अर्धसूची च विक्षिप्तम् अर्धसचीति करणम् अर्धस्वस्तिक मुद्दिष्टम् नाट्यशास्त्र ९ १ | अलं वो मन्युना दैत्या १३० अलक्षितद्दिजं धीरम् ९ ७ अलपद्मः कटीदेशे ११८ अलपद्मः शिरोहस्तः १२३ | अलपल्लवसूचीं च ८ ९ अलातञ्च पुरस्कृत्वा ९ ६, ११४ अलातं चरणं कृत्वा ११८ अलातकं प्रयुञ्जीत १०० अल्पतरः प्रविचारः ८८ अल्पाभिधानेनार्थो यः ४३६ अवकृष्टं पुनः कार्यम् ३०, ३०, ८१ अवकृष्टाऽडिता चैव ६६ अवकृष्टामिदानीं तु ४७५ अविनिश्वितकारित्वात् ४०७ अविमृश्य तु यः कार्यम् ४१० अवृष्टिरुक्ता चलने ४१० अव्यक्तपादपतनैः ९ अव्यक्तोल्वणचेष्टो २७ अशक्ता भगवन् देवाः १८, १३ अशक्या पुरुषः सा तु ७८ अष्टषष्टिगणैः पातैः ४०२ अष्टहस्तं तु कर्त्तव्यम् ३२६ | अष्टाङ्गपदसंयुक्ता -७ ९ अष्टाधिकं शतं ज्येष्ठम् ४८ अष्टावेव तु कार्याणि १०५ अष्टोत्तरशतं ह्येतत् ३ ९ ८ अष्टौ स्तम्भान् पुनश्चैव -१५ असम्बद्ध कथाप्रायाम् १ ९ १ असम्मोहस्तथोत्साहः ९ ० असम्मोहादिभिर्व्यक्तः ६७ असुरान् नाव्यविघ्नश्च २७ असूयया च देवानाम् ४१ अस्थानहसितं यत्तु ९ ० अस्थाने तस्करान् दृष्ट्वा १२६ अस्थिकीलकपालानि -९ १ अस्मिन्नाव्ये समेतानि ९. अस्य रक्षाविधिं सम्यक २६ ३२१ १०३ १० ९ ११७ ११२ ९ ८ १२६ ३८५ २१६ २०४ २०२ २०७ _४०६ ४०६ ४७ ३४४ ३४५ ७ १२ २०८ ५ ९ १५ ३५ २०७ ९ १, ११६ ५७ १८८ ४३६ ३८६ ६२ १६५ ३२२ ४०३ ३० २८ २०

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अस्याः प्रयोगं वच्यामि अस्याङ्गानि तु कार्याणि अस्यास्तूपोहनं कार्यम् अहं कः कथयिष्यामि अहीनाङ्गेश्व वोढव्या अहो नाव्यमिदं सम्यक् अहो प्रहरणं दिव्यम् अ आकुचिताक्षि गण्डं यत् आक्षिप्तं करणं चै आक्षिप्तं नाम करणम् आक्षिप्तं हस्तपादञ्च १०५, आक्षिप्तः स्वस्तिकः पादः आक्षिप्तकं ततः कृत्वा आक्षिप्तकं प्रयुञ्जीत आक्षिप्तस्तु विज्ञेयः आक्षितक स विज्ञेयो आक्षिप्त रेचितश्चैव आक्षिप्तरेधितो शेष आचिप्तवरणको आचितं स्वस्तिकं कृत्वा आक्षिप्तहस्तमाक्षिप्तदेह आक्षिप्तानां सभामध्ये आक्षिप्तौ च करौ कार्यों आगतस्त्वरितो द्रष्टुम् आङ्गिको वाचिकश्चैव आचम्य तु यथान्यायम् आचार्य कर्त्तव्या आचार्ये तु युक्तेन अचार्येण सुयुक्तेन आज्ञापय विभो चिप्रम् आज्ञापितो विदित्वाऽहम् आतोथरञ्जनार्थ तु आतोद्यानि तु III सर्वाणि आत्मप्रोक्षणमद्भिश्व पचानुक्रमणिका १८५ | आत्मप्रोक्षणमेवाद्भिः १५३ | आदावुत्थापनी कार्या २०६, २०७ | आदित्याचैव रुद्राश्च २१३ आदी दिग्ले द्विरुक्तस्तु ५१ आदौ द्वे च चतुर्थच ८५ आदौ निवेश्यो भगवान् १ ९ | आयं चतुर्थ दशमम् आर्थ चतुर्थमन्त् आद्यन्तु जनितं कृत्वा ३२१ आद्यः पादो नतः काय्र्यः १२४ आद्यमन्त्यं चतुर्थञ्च १०५ आनतन तथा गात्रम् १०६, १०७ आनन्दामर्षाभ्याम् १०२ आयसं तत्र दातव्यम् १२१ आर्द्रायां वा मघायां वा १२०, १२५ – आलस्यञ्चैव दैन्यश्च ८७ आलस्यं त्वभिनेयम् ११८ आलस्याद्दौर्बल्यात् ९ ० आलस्यौ प्रथ- जुगुप्साख्यैः ८७ आलिन्मण्डलं पूर्वम् १३० आलीढ स्थानके यत्र ११५ आलीढव्यंसितौ हस्तौ १२७ आवन्ती दाक्षिणात्या च ११२ आवर्त्तितं ततः कुर्यात् ४१८ आवर्त्य शुकतुण्डाख्यम् १०४ आविद्धेन तु पादेन २१ आवेगो जडता हर्षः २२३ आशीर्वचनसंयुक्ता '६४ आश्रावणायां युक्तायाम् १ ९ ३, २११ आश्रावणा वक्त्रपाणिः ६४ आश्रावणावसाने च ४५ आश्लेषामूलयोर्वापि ८३ आसारितप्रयोगस्तु ८ आसारितविधौ स स्यात् १५६ आसारित समाप्ते तु ७६ | आस्वादयन्ति भुञ्जानाः १७६ | आस्वादयन्ति मनसा ५५ ९ १७३ २०२ १२ २०६ १६ ९ ६५ १ ९ २ १८६ १२६ १०४ १८४ ११२ ४३१ ५० ६४ २२२ ४०० ४१४ ४३४ ६५ १०४ १२८ २२५ ११७ ९ ५ १२४ ४३६ १५ ९ १६६ १५३ १ ९ ७ ६४ १३८ १४३ १४१ २८६ २८६

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५६० आहारवर्जितानाम् आहारविपरिणामात् इ इज्यया चानया नित्यम् इति रौद्ररसो दृष्टः इतिहासो मया सृष्टः इत्यनेन प्रकारेण. इत्ययं यो विधिर्दृष्टः इत्यर्थं रङ्गमध्ये इत्येवं मरणं ज्ञेयम् इत्येषोऽवन्ति पाञ्चाल इत्येष स्वरसमुत्थः इमं मे प्रतिगृहीताम् इष्टं वाऽनिष्टं वा इष्टकादारुभिः कार्य्यम् इष्टजनविभवनाशात् दृष्टजनस्य वियोगात् इष्टवदर्शनाद् वा इष्टार्थविषया इह प्रेक्षागृहं दृष्ट्वा इहादिर्नाट्ययोगस्य ईश्वरस्येश्वरी पिण्डी ईश्वराणां विलासश्च ईर्ष्या क्रोधादिसम्मूढ़े ईषद्विकसितैः उ उत्कम्पितांसकशिरः उत्क्रम्यापि हि काय्यः उत्तमसत्वः शेते उत्तमाधममध्यानाम् उत्तरस्यां दिशि तथा उत्तानो वामपार्श्वस्थः उत्थापनस्याष्टकलम् उत्थापनादिकं यच्च उत्थापन्यां प्रयोगेऽस्मिन् उत्थाय स्वरितं शक्रः नाव्यशास्त्र ४०० उत्थाय मण्डलात्तर्ण ४१८ उत्पद्यते हासूया उत्पाद्य नाव्यवेदं तु उत्प्लुत्य चरणौ काय्य १८१ उत्फुल्लनासिकं यत्तु ३२५ उत्फुल्लानननेत्रन्तु ७ उत्सार्याणि त्वनिष्टानि १७३ उत्साहस्त्वभिनेयः स्यात् ८३ उत्साहोऽध्यवसायात् २४ उत्साहाध्यवसायाभ्याम् ४२७ उत्सेधेन तयोस्तुल्यम् २०१ उदात्तगानैर्गन्धर्वैः ३२३ उहितेन पादेन ७३ उद्घास्य कादि कर्त्तव्यम् ४११ उद्भावयन्ति शृङ्गारम् ५७ उद्वर्त्तनं परिक्षेपः ४२५ उद्वाहनं सन्नमनं ३ ९ २.४१२ उद्वाहनात् पृथग्भावात् ३२६ उद्वाहितमुरः कृत्वा ३८० उद्वृत्तगात्रमित्येतत् ३४ उद्वृत्ताक्षिप्तके चैव ३३ उजनैश्च बहुभिः १३४ उद्वेजनैः सहल्लेखैः २७ उद्वेष्टितापविद्धस्तु ४ उद्वेष्टितापविद्धैश्व ३२१ | उद्वेष्टितेन हस्तेन उन्मत्तं करणं तत्तु ३२२ उन्मत्तं स्वस्तिकं चैव ३ ९ २ उपक्षेपेण काव्यस्य ३ ९ ७ [ उपचारस्तथा विप्राः २७.३२२ उपवनगमनविहारः ६६ उपस्थितोऽहं ब्रह्माणं १०४ उपोहनक्रियायां तु २०३ उभयोः पार्श्वयोर्यत्र १६५ उमया सहितम् २०५ उरः पृष्ठोदरोपेतम् -१ ९ | उरोमण्डलको हस्तौ १७३ ३ ९ ६ ७ १० ९ ३२१ ३२१ ४३ ३८६ ३३८ ४१ ९ ४ ९ १ ९ ५ १२४ २०० ४३४ १३२ १३३ १३२ ११५ ११२ १२ ९ ३४४ ३८ ९ ११८ ९९ ११८ ९ ७ ९ ० १६१ ] २१४ ३१५ १४.२० २०४ ११५ २० ९ ९ ३ १०५, ११८, १२७

पृष्ठ 690

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उरोमण्डलमाक्षिप्तम् ऊरूश्चैव तथाविद्धः ऊरू च वलितौ यस्मिन् ऊरूदवृत्तं ततः कुर्यात् ऊरूवृत्तं तथाक्षिप्तम् ऊरूद्वृत्तस्तथा चैव ऊर्ध्वजानुक्रमं चैव ऊर्ध्वजानुं विधायाथ ऊर्ध्वाङ्गुलितलः पादः ऊर्ध्वाङ्गुलितौ पादौ ऊर्ध्वाधो विप्रकीर्णौ च ऊर्ध्वापवेष्टितौ हस्तौ ऊहप्रत्यूहसंयुक्तम् ॠ ऋजुकं मण्डकं चैव ऋतुमाल्यालङ्कारैः ऋद्धिं परस्य दृष्ट्वा ए एकः समस्थितः पादः एकमार्गगतं यत्र एकस्तुरेचितो हस्तो एकस्मिन् परिवर्त्त तु एकस्यापि न वै शक्यः एका तु प्रथमं योज्या एकैकस्यां दिशि तथा एकोनपञ्चाशदिमे एको वक्षः स्थितो हस्तः एतत्तु वचनं श्रुत्वा एतत्प्रमाणं विज्ञेयम् एतत्स्वभावजं स्यात् एतदुत्साहजननं एतद्वसेषु भावेषु एतस्मिन्नन्तरे देवान् एतस्मिन्नन्तरे देवैः एतानि तु बहिर्गीतानि एतान्यङ्गानि कार्याणि एतान्येवाधिदैवानि ३६ ना ० शा ० प्र ० पद्यार्धानुक्रमणिका ९ ० | एताश्चान्यश्च राजर्षीन् ११४ एते तुष्यन्ति निर्गीते ९ ४ एतेषां तु प्रवच्यामि ११६, १२२ एतेषां लशणमहम् ११७, १२५ एतेषामिह वच्यामि .८७ एतेऽस्य ग्रहणे शक्ताः ९ ८ एते ह्यष्टौ रसाः प्रोक्ताः १०१ एतैर्द्रव्यैर्युतः कुर्यात् १०५ एभिर्भावविशेषः ११६ एभिर्विमिश्रितश्चायम् १०४ एभिश्वार्थविशेषैः १०८ एवं काष्ठविधिं कृत्वा ५२ एवं कृत्वा यथान्यायम् एवं तावदयं शुद्धः ९ एवं तु पूजनं कृत्वा ३१५ एवं तु स्थापनं कृत्वा ३ ९ २ एवं तेनास्म्यभिहितः एवं नवरसा दृष्टा १०८ एवं नाव्यमिदं सम्यक् १०६ एवं नान्दी विधातव्या १११ एवं निर्गीतमेतत्त १७० एवं पञ्च ध्रुवा ज्ञेया २१४ एवं पञ्च पदीं कृत्वा १४१ एवं पदे पदे कार्यः १७६ एवं प्रयोगः कर्त्तव्यः ४३४ एवं प्रयोगे प्रारब्धे १११, ११३ एवं भगवता सृष्टः १५ एवं भावा भावयन्ति १ ९ ३ एवं भावा रसाचैव ३४१ | एवं रङ्गशिरः कृत्वा ८३ एवं रसाश्च भावाश्च २८ एवं वः कथितं सम्यक ३० एवं वस्तुनिबद्धानाम् २५ एवं विकृष्टं कर्त्तव्यम् १५३ एवं विघ्नविनाशाय १५५ एवं विधि पुरस्कारैः ४२ | एवंविधः प्रकर्त्तव्यम् ५६१ ६२ १६४ ८८ १५५ ८ ९ 6 २२० ६४ ३२६, ३ ९ ८ ८६ ३३४ ५३. ६३, १ ९ ५ १ ९ ४ ८३ ४५ ११ ३६४ १४ १८२ १६५ २०३ १७२ १४१ १४२ १८ ६ २ ९ ० २ ९ १ ५२ ४३ ९ २११ १४३ ५६ २३ ५० ५१