भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 161–170
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 161–170
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नाट्यशास्त्रम्
शिखरे-अस्यैव च यदा मुटेरूर्ध्वोऽङ्गुष्ठः प्रयुज्यते ।
हस्तः स शिखरो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ५६ ॥
यदि मुष्टि हस्त में अंगूठे को ऊपर सीधा उठा लिया जाए तो ' शिखर ' मुद्रा कहलाती है ॥ ५६ ॥
रश्मिकुशाङ्कुशधनुषां तोमरशक्तिप्रमोक्षणे चैव ।
अधरोष्ठपादरञ्जनमलर्कस्योत्क्षेपणे चैव ॥ ५७ ॥
योजना - ( धनुष की ) डोरी, दर्भ, अंकुश, धनुष इत्यादि धारण करने, शक्ति और तोमर अस्त्र को छोड़ने, ओष्ठ ( अधरोष्ठ ) तथा पैरों को रंगने तथा बालों को झाड़ने ( या कंघा करने ) का इस मुद्रा द्वारा अर्थ सूचित होता है ॥ ५७ ॥
कपित्थे—
अस्यैव शिखराख्यस्य द्वङ्गुष्ठकनिपीडिता ।
यदी प्रदेशिनी वक्रा स कपित्थस्तदा स्मृतः ॥ ५८ ॥
यदि शिखर हस्त में तर्जनी अंगुली को झुका कर अंगूठे पर दबा कर -रख दी ( मिला दी ) जाए तो ' कपित्थ ' मुद्रा कहलाती है ॥ ५८ ॥
असिचापचक्रतोमरकुन्तगदाशक्तिवज्रबाणानि ।
शस्त्राण्यभिनेयानि तु कार्य पथ्यश्च सत्यञ्च ॥ ५ ९ ॥
योजना – तलवार, धनुष, चक्र. तोमर, कुन्त ( भाला ), गदा, शक्ति, वज्र तथा बाण को छोड़ने और सत्य तथा हितकर ( पथ्य ) कार्य करने का अर्थ इस मुद्रा के द्वारा सूचित होता है ॥ ५ ९ ॥ १. शिखर ( उत्पत्ति कथा ) चन्द्रशेखर शिव द्वारा सुमेरुपर्वत को समुद्रमन्थन के लिए उखाड़ने में इसी हस्त का उपयोग किया था तभी से इसका प्रचलन हो गया । २. कपित्थ ( उत्पत्ति कथा ) समुद्रमन्थन के अवसर पर विष्णु के द्वारा मन्दारवृक्ष को खींचकर निकालने में इसी हस्त का उपयोग किया गया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ । १. प्रमोक्षणञ्चैव -- ख ० ग ० । २. अलक्तकोत्पीडने चैव --क ० । ३. मुखेऽङ्गुष्ठनिपीडिता --ख ० । ४. प्रदेशिनी च वा स्यादिति हस्तः कपित्थकः -- क ० । आ
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नवमोऽध्यायः ५१
कटकामुखः-उत्क्षिप्तवका तु यदानामिका सकनीयसी ।
अस्यैव तु कपित्थस्य तदासौक ( ख ) टकामुखः ॥। ६० ॥
यदि कपित्थ हस्त मुद्रा में अनामिका तथा कनिष्ठिका अंगुलियों को ( ऊपर ) उठाकर मोड़ा जाए तो ' कटकामुख ' मुद्रा कहलाती होत्रं हव्यं छत्रं प्रप्रहपरिकर्षणं व्यजनकञ्च आदर्शधारणं खण्डनं तथा पेषणञ्चैव आयतदण्डग्रहणं मुक्ताप्रालम्बसङ्ग्रहञ्चैव स्त्रग्दामपुष्पमाला वस्त्रान्तालम्बनश्चैव मन्थानशराकर्षणपुष्पार्वचयप्रतोदकार्याणि अङ्कुश - रज्ज्वाकर्षण स्त्रीदर्शनमेव कार्यश्च है ॥ ६० ॥
।
॥ ६१ ॥
॥। ६२ ॥
।
॥ ६३ ॥
योजना – होत्र ( होम ) हुतद्रव्य, छत्र, रास का खींचना ( प्रग्रह - परि-कर्षण ), पंखा, दर्पण धारण, तोडना ( पंखों का ), पीसना, लम्बे दण्ड-काष्ठ का ग्रहण, मौक्तिक माला का ( मुक्ताप्रालम्ब ) सम्हालना, पुष्पमाला ( तथा अन्य मालाओं ) का धारण, वस्त्र का कोना थाम लेना ( खींचना-वस्त्रान्तालम्बनम् ), मथनी एवं बाण खींचना, पुष्प तोड़ना, चाबुक लगाना, अंकुश लगाना, रस्सी खींचना तथा स्त्री - चेष्टाओं का दर्शन इस मुद्रा के द्वारा सूचित किया जाता है ॥ ६१-६३ ॥
' सूचीमुख: -कटकोख्ये यदा हस्ते तर्जनी सम्प्रसारिता ।
हस्तस्सूचीमुखो नाम तदा ज्ञेयः प्रयोक्तृभिः ॥ ६४ ॥
१. कटका मुख ( उत्पत्तिकथा ) गुह ( कार्तिकेय ) ने भगवान शिव से शस्त्र विद्या ग्रहण करने के अवसर पर इसी हस्त का प्रयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हो गया । २. सूचीमुखः ( उत्पत्तिकथा ) ब्रह्मा ने ' एकोऽहं ' को समझाने के लिए इसी हस्त का प्रयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ । १. प्रग्रहपरिकर्षणञ्च व्यन्जनकम् — ख ० । २. स्रग्दामधारणं खलु वस्त्रा — ख ० । ३. मन्थनशरावकर्षण —क, ग । ४. पुष्पापचय — क ० । ५. खटका क ० ख ० ।
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५२ नाट्यशास्त्रम् यदि कटकामुख - मुद्रावाले हाथ की तर्जनी अंगुली फैला दी जाए तो ' सूचीमुख ' मुद्रा कहलाती है ॥ ६४ ॥
अस्यां विविधान् योगान् वक्ष्यामि समासतः प्रदेशिन्याः ।
ऊर्ध्व - नत - लोल - कम्पित - विजृम्भितो द्वाहित · चलायाः ॥६५ ॥
अब मैं संक्षेप से प्रदेशिनी ( तर्जनी ) अंगुली के ऊर्ध्व, नत, लोल ( एक ओर झुकने ), कम्पित ( हिलने ), विजृम्भित ( सिकुड़कर फैलने ); ऊपर तथा नीचे उठने ( उद्वाहित ) तथा ऊपर की ओर घूमने ( चलने ) की दशा के भेद से इस मुद्रा में होने वाले कार्य बतलाता हूँ ॥ ६५ ॥
चक्रं तटित्पताकामञ्जर्यः कर्णचूलिकाश्चैव ।
कुटिलगतयश्च सर्वे निर्देश्यास्साधुवादाश्च ॥ ६६ ॥
बालोर पल्लवधूपदीपवल्ली- लताशिखण्डाश्च 1 परिपतनवक्रमण्डलमभिनेयान्यूर्ध्वलोलितया ॥ ६७ ॥
इस मुद्रा में यदि तर्जनी को ऊपर ओर उठाकर घुमाया जाये तो इससे चक्र, बिजली, पताका, पुष्पमंजरी, कर्णपूर ( कर्णचूलिका ) सभी प्रकार की तिरछी रेखाएं ( कुटिलगति ), साधुवाद की ध्वनियां, बाल सर्प, लतांकुर, पल्लव, धूप, दीप, वल्ली, लता, शिखण्ड ( छोटे बालकों के मस्तक पर रखे जाने वाले काकपक्ष ); अधः पतन, तिरछा तथा गोल मण्डल बतलाया जाता है ॥ ६६, ६७ ॥
भूयश्चोर्ध्वविरचिता तारा घोणैकदण्डयष्टिषु च ।
विनता च तथा कार्या दंष्ट्रिषु च तथास्ययोगेन ॥ ६८ ॥
पुनरपि मण्डलगतया सर्वग्रहणं तथैव लोकस्य ।
प्रणतोन्नते च कार्ये ह्याद्ये दीर्घे च दिवसे च ॥ ६ ९ ॥
वदनाभ्याशे कुञ्चितविजृम्भिता वाक्यरूपणे कार्या ।
श्रवणाभ्याशे वका विजृम्भणे वाक्यरूपणावसरे ॥ ७० ॥
यदि ( इसी मुद्रा में ) तर्जनी को ऊपर की ओर उठाया जाए तो इससे तारे, नासिका, एक की संख्या, दण्ड देना ( तर्जन ) तथा लकड़ी ( धारण ) का अर्थ सूचित होता है, ( यदि ) इसी अंगुली को झुकाया जाए
१. अस्य विविधान् प्रयोगान् - क ० । २. भिनेयं चोलोलितया - ग ० ।
३. मण्डलगतयः - ख । ४. श्रवणाभ्यासे - ख ०, ग ० ॥
५. वाक्यरूपणे च मुखे - ख ०, ग ० ।
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नवमोऽध्यायः ५३ तो इससे डाढ़वाले प्राणीजन का, यदि इसी अंगुली को गोल घुमाया जाए तो उससे ( किसी व्यक्ति द्वारा ) सभी वस्तु का ग्रहण करना, यदि झुका कर फिर इसी अंगुली को ऊपर उठाली जाए तो इससे दीर्घ अभ्यास तथा दिवस का तथा यदि यही मुंह के समीप ले जाकर मोड़ी तथा ऊपर नीचे ले जाई जाए तो उससे वाक्यों का अर्थ बोध प्रदर्शित किया जाता है ॥ ६८-७० ॥
मेति वदेति च योज्या प्रसारितोत्कम्पितोत्ताना ।
कार्या प्रकम्पिता रोषदर्शने स्वेदंरूपणे चैव ॥ ७१ ॥
इसी प्रकार यदि निषेध एवं सम्भाषण का अर्थ प्रदर्शित करना होतो इस मुद्रा में तर्जनी उंगली को फैलाकर हिलाते हुए ऊपर की ओर उठा लेना चाहिए ॥ ७१ ॥
कुन्तलककुण्डलाङ्गदगण्डाश्रयसंश्रयेऽभिनये ।
गर्वेऽहमिति ललाटे रिपुनिर्देशे तथैव च क्रोधे ॥ ७२ ॥
इसी मुद्राको यदि कम्पित रखा जाए तो उससे क्रोध, स्वेद, केश ( कुन्तल ), कुण्डल, अङ्गद तथा गण्डस्थल का सजाना बतलाया जाता है तथा ललाट पर रखने से गर्व क्रोध तथा शत्रु का निर्देश सूचित होता है ॥ ७२ ॥
कोऽसाविति निर्देशे च कर्णकण्डूयने चैव ।
संयुक्ता संयोगे कार्या विश्लेषिता वियोगे च ॥ ७३ ॥
कलहे स्वस्तिकयुक्ता परस्परोत्पीडिता बन्धे ।
द्वाभ्यान्तु वा पार्श्वे दक्षिणतो दिननिशावसानानि ॥ ७४ ॥
अभिमुखपराङ्मुखीभ्यां विश्लिष्टाभ्यां प्रयुञ्जीत । इसी मुद्रा से कौन हैं? इस प्रश्न को करने तथा कानों के खुजलाने का अर्थ सूचित करना हो तो ललाट प्रदेश के समीप तर्जनी को रखना चाहिए । दोनों हाथों को सूचीमुख मुद्रा में मिलाने से संयोग तथा हटा लेने पर वियोग सूचित होता है । यदि दोनों हाथों को ' स्वस्तिक ' कर ले तो उससे पारस्परिक कलह तथा दोनों सूचीमुख हाथ एक दूसरे के सम्मुख रखकर फिर बायीं ओर ( अलग ) ले जाए तो उससे रात्रि की समाप्ति ( शयन से उठना ) सूचित होती है ॥ ७३-७४ ॥ १. सेति वादति - ख ० ग ० । २. स्वेदमार्जने - ख ० । ३. कुन्तलकुण्डल - ग ० । ४. गण्डाश्रयमण्डनाभिनये - ग ० । ५. निर्देशेऽथ ख ० ग ० । ६. वामगमनं -- ग ० ।
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५४ नाट्यशास्त्रम्
द्वाभ्यां प्रदर्शयेन्नित्यं सम्पूर्ण चन्द्रमण्डलम् ।
श्लिष्टा ललाटे शक्रस्य कार्या त्तानसंश्रया ॥ ७५ ॥
यदि दो सूचीमुख हस्त हो तो उससे सम्पूर्ण चन्द्रमण्डल का तथा यदि ललाट के समीप खड़ी स्थित हो तो उससे इन्द्र का उत्कर्ष बतलाया जाता है ॥ ७५ ॥
पुनरपि च भ्रमिताग्रा रूपशिलावर्तयन्त्रशैलेषु ।
परिवेषणे तथैव हि कार्या चाधोमुखी नित्यम् ॥ ७६ ॥
यदि सूचीमुख हस्त को गोल घुमाव दे दिया जाए तो इससे स्वरूप, शिला, भँवर ( आवर्त्त ), यन्त्र तथा शैल ( शिखर ) बतलाए जाते हैं, यदि इसी मुद्रा में हाथों को नीचे मुँह किये रखा जाए तो उससे भोजन परोसना प्रदर्शित होता है ॥ ७७ ॥
श्लिष्टा ललाटपट्टेष्वधोमुखी शम्भुंरूपणे कार्या ।
शक्रस्याप्युताना तज्ज्ञैस्तिर्यक् स्थिता कार्या ॥ ७७ ॥
यदि ललाट के पास नीचा मुँह रखते हुए इसी मुद्रावाले हाथ को रखा जाए तो उससे ‘ शिव ' का ( त्रिनेत्र- ) स्वरूप तथा यदि ऊपर की ओर मुँह रखकर तिरछा कर लिया जाए तो ' इन्द्र ' का ( सहस्र नेत्रोंवाला ) स्वरूप प्रदर्शित हो जाता है ॥ ७७ ॥
' पद्मकोषः -यस्याङ्गुल्यस्तु विरलाः सहाङ्गुष्ठेन कुञ्चिताः ।
ऊर्ध्वा ह्यसङ्गताप्राश्च स भवेत् पद्मकोषकः ॥ ७८ ॥
यदि अंगूठे सहित सभी उंगलियां ऊपर की ओर मुँह वाली अलग-अलग तथा सिकुड़ी हुई रखी जाए तो ' पद्मकोष ' हस्त हो जाता है ॥७८ ॥
बिल्वकपित्थफलानां ग्रहणं कुच दर्शनश्च नारीणाम् ।
ग्रहणे ह्यामिषलाभे भवन्ति ताः कुञ्चिताग्रास्तु ॥७ ९ ॥
[ बहुजातिबीजपूरकमामिषखण्डञ्च निर्देश्यम् । ] १. पद्मकोषः ( उत्पत्ति कथा ) भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र की प्राप्ति के लिए भगवान शिव की स्तुति तथा पद्म पुष्पों के अर्पण हेतु इसी हस्त का उपयोग किया । तभी से इसका प्रचलन हुआ । १. द्वाभ्यां सन्दशंये - ख ० ग ० । २. चाधोमुखी नित्या — ख ० ग ० । ३. शम्भुरूपेण — ग ० । ४. शक्रस्याभ्युत्थानात् ख ० ग ० ।
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नवमोऽध्यायः ५५ योजना – इसके द्वारा बिल्व तथा कैथा ( कपित्थ ) फल तथा स्त्रियों के उरोजों का अर्थ सूचित होता है । यदि इन अंगुलियों के अग्रभाग सिकुड़े हुए रखे जाए तो ( इससे ) ( किसी वस्तु के ) ग्रहण तथा मांस की प्राप्ति तथा अनेकविध फल, ( बिल्व तथा कपित्थ के अतिरिक्त ) बीजपूर ( बिजौरा ) तथा मांसखण्ड की सूचना दी जाती है ॥ ७ ९ ॥
देवार्चन बलिहरणे समुद्रके साग्रपिण्डदाने च ।
कार्यः पुष्पप्रकरश्च पद्मकोशेन हस्तेन ॥ ८० ॥
इस पद्मकोश मुद्रा के द्वारा देवार्चन, बलिप्रदान, डलिया ( समुद्गक ), प्रथम पिण्ड प्रदान तथा पुष्पों का विकीर्ण करना प्रदर्शित किया जाता है ॥ ८० ॥
मणिबंन्धनविश्लिष्टप्रविरल चलिताङ्गलिकराभ्याम् ।
कौय विवर्त्तिताभ्यां विकसितकमलोत्पलाभिनयः ॥ ८१ ॥
यदि पद्मकोष मुद्रावाले दोनों हाथों को कलाई से मिलाते हुए पीछे की ओर ले जाए तथा अंगुलियों की हिलती हुई रखे तो उससे विकसितकमल तथा कुमुदिनी का अर्थ प्रदर्शित होता है ॥ ८१ ॥
सर्पशीर्ष- '
अङ्गुल्यस्संहतास्सर्वाः सहाङ्गुष्ठेन यस्य तु ।
तथा निम्नतलश्चैव स तु सर्पशिराः करः ॥ ८२ ॥
यदि सभी अंगुलियां अंगूठे सहित एक दूसरे से मिली हुई हों और हथेली झुकी ( या गहरी ) रखी जाए तो ( सर्प के फन के समान हो जाने के कारण ) सर्पशीर्ष हस्त बन जाता है ॥ ८२ ॥
एष सलिलप्रदाने भुजगगतौ तोयसेचने चैव ।
आस्फोटने च योज्यः करिकुम्भास्फालनाद्येषु ॥। ८३ ॥
योजना – पितरों को जलांजलि देने, सर्पगति, जल सिंचन, मल्लयुद्ध १. सर्पशीषं ( उत्पत्तिकथा ) भगवान विष्णु ने वामन अवतार में बलि को बन्धन तथा देवगण की रक्षार्थं वचन देते हुए उन कार्यों का इसी हस्त द्वारा संकेत किया था । तभी से इस मुद्रा का प्रचलन हुआ । १. सङ्क्रहे चात्र – ग ० । २. मणिबन्धन श्लिष्टाभ्याम विरलचलिताङ्गुलीयुत कराभ्याम् — ख ० ग ० । ३. कार्योपवर्तिताभ्यां - ख ग ० । ४. सहिताः - ग ० । ५. सर्वशिराः - ख ० ग ० । ि
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५६ नाट्यशास्त्रम् में जंघा तथा भुजाओं के ठोकने और हाथी के कुम्भस्थल को थपथपाने का इस मुद्रा से प्रदर्शन किया जाता है ॥ ८३ ॥
' मृगशीर्ष-अधोमुखीनां सर्वासामङ्गुलीनां समागमः ।
कनिष्ठाङ्गुष्ठ arara स भवेन्मृगशीर्षकः ॥ ८४ ॥
यदि कनिष्ठिका अंगुली तथा अंगूठे को सीधा और शेष अंगुलियाँ झुके हुए मुंह वाली रखी जाएँ तो ' मृगशीर्ष ' हस्त होता है ॥ ८४ ॥
इह साम्प्रतमस्त्यद्य च शक्तेश्वोल्लासनेऽक्षपाते च ।
स्वेदापमार्जनेषु च कुट्टमिते प्रचलितस्तु भवेत् ॥८५ ॥
योजना — इसके द्वारा यहां, अभी, यह है, आज जैसे अर्थ का सूचन, शक्ति के उठाने तथा पासों के फेंकने को प्रदर्शित करते हैं । यदि इसी मुद्रा में हाथ धूजता हुए रखा जाए तो उससे पसीने का पोंछना तथा स्त्रियों की कुट्टमित चेष्टा को बतलाया जाता है ॥ ८५ ॥
कंगुल -त्रेताग्निसंस्थिता मध्यातर्जन्यङ्गुष्ठका यदा ।
his नामिका वा तथा चोर्ध्वा कनीयसी ॥ ८६ ॥
यदि मध्या, तर्जनी तथा अंगूठे पृथक् - पृथक् रहें, अनामिका उंगली टेढ़ी तथा कनिष्ठिका खड़ी रहे तो ' कंगुल ' हस्त मुद्रा होती है ॥ ८६ ॥
एतेन तरुणफलरूपणानि नानाविधानि च लंघूनि ।
कार्याणि रोषजानि स्त्रीवचनान्यङ्गुलिक्षेपैः ॥८७ ॥
१. मृगशीर्ष ( उत्पत्तिकथा ) भगवान शिव की प्राप्ति के लिए पार्वती ने तपस्या करते हुए अपने ललाट पर तीन चन्दन रेखाओं का त्रिपुण्ड्र इसी हस्त द्वारा धारण किया । तभी से इसका प्रचलन हुआ । २. कंगुल ( उत्पत्तिकथा ) भगवान शिव ने क्षीरसागरमन्थन के अवसर पर उसमें से निकले हुए कालकूट विष की गुटिका बनाकर पीने के लिए इसी हस्त का उपयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ । १. शक्यश्चेलालने - ख ० ग ० । २. प्रचलिते तु - ख ० ग ० । ३. अङ्गुले – ख ० ग ० । ४. लघूनि कार्याणि - ग ० । ५. रोषजातिस्त्री — ग ० ।
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नवमोऽध्यायः ५७ योजना – इसके द्वारा अनेकविध छोटे - छोटे ( सुपारी, बेर इत्यादि ) फलों तथा स्त्रियों के रोषपूर्णवचनों को अंगुली के आक्षेप ( घुमाने ) के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है ॥ ८७ ॥
[ मरकतवैडूर्यादेः प्रदर्शनं सुमनसाञ्च कर्तव्यम् । ग्राह्यं विडालपदमिति तज्ज्ञैरेवं प्रयोगेषु ॥ ] ( प्रक्षिप्त - मरकत वैडूर्य आदि मणि, पुष्पों का ग्रहण तथा बिल्ली का बैठने आदि का स्थान भी इसी के द्वारा प्रदर्शित किया आए । ) ' अलपल्लव ( अलपद्मक )
आवर्तिताः करतले यस्याङ्गुल्यो भवन्ति हि ।
पार्श्वगत - विकीर्णाश्च स भवेदलपल्लवः ॥ ८८ ॥
यदि सारी अंगुलियां हथेली में गोल आकार में सिकुड़ी हुई तथा बिखरी हुई रखी जाए तो ' अलपल्लव ' मुद्रा कहलाती है ॥ ८८ ॥
प्रतिषेधकृते योज्यः कस्य त्वं नास्ति शून्यवचनेषु ।
पुनरात्मोपन्यासः स्त्रीणामेतेन कर्त्तव्यः ॥ ८ ९ ॥
योजना – इसके द्वारा प्रतिषेध, ' तुम कौन हो ' जैसे प्रश्नवाक्य, नहीं हैं, शून्यवचन ( मिथ्याधिक्षेप - जैसे मूर्ख, इत्यादिवचन ) तथा स्त्रियों के अहम् का आपादन ( स्थापना ) या विस्मय का प्रदर्शन किया जाए ॥ ८ ९ ॥
' चतुर-तिस्रः प्रसारिता यत्र तथा चोर्ध्वा कनीयसी ।
तासां मध्ये स्थितोऽङ्गुष्ठः स करश्चतुरः स्मृतः ॥ ९ ० ॥
जिसमें तीनों उंगुलियों को सामने फैलाकर तथा कनिष्ठिका को सीधा १. अलपल्लव ( उत्पत्तिकथा ) भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा माखन चोरी करते समय इसी हस्त का उपयोग करने पर इसका प्रचलन हो गया । २. चतुर ( उत्पत्तिकथा ) काश्यप ऋषि ने इस हस्त का उपयोग अमृत लाने के लिए जाने वाले गरुड़ को मार्ग - दर्शन करने के अवसर पर किया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ । १. मरकतवैडूर्यादीनां निदर्शनं कार्यम् - ख ० ग ० । २. आवर्तिन्यः - ख ० ग ० । ३. दलपद्मकः — ग ० । ४. मध्यस्तथाङ्गुष्ठः - ग ० ।
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५८ नाट्यशास्त्रम् उठाया जाय और उनके मूल में अंगूठे को रखे तो ' चतुर ' हस्त हो जाता है ॥ ९ ० ॥
नयविनयनियम सुनिपुण बालातुरसत्त्व कैतवार्थेषु ।
वाक्ये युक्ते पथ्ये सत्ये प्रशंमे च विनियोज्यः ॥९ १ ॥
योजनाः – नीति, विनय, नियम - चातुर्य ( सुनिपुण ), बाला ( कन्या ), रोगी, बल ( सत्व ) कैतवयुक्त प्रयोजन या बात एवं पथ्यवचन, सत्य तथा प्रशम का अर्थ इस हस्तमुद्रा के द्वारा बतलाया जाता है ॥ ९ १ ॥
एकेन द्वाभ्यां वा किश्चिन्मण्डलकृतेन हस्तेन ।
विवृतविचारितचरितं वितर्कितं लज्जितञ्चैव ॥९ २ ॥
एक या दो ' चतुर ' मुद्रा वाले हस्तों के थोड़े घुमाव द्वारा - प्रकट करना ( विवृत ), विचारकरना, आचरणकरना ( चलना - हिलना ) आशंका करना तथा लज्जाकरना बतलाया जाता है ।
नयनौपम्यं पद्मदलरूपणं हरिणकर्णनिर्देशः ।
संयुत करणेनैव तु चतुरेणैतानि कुर्वीत ॥ ९ ३ ॥
दो संयुक्त चतुर - हस्तों द्वारा कमल दलों की नयनों से उपमा देना तथा हरिणों के कानों को बतलाया जाता है ॥ ६३ ॥
लीला - रती रुचिश्च स्मृतिबुद्धिविभावनाः क्षमा पुष्टिम् ।
संज्ञामात्र प्रणयं विचारणं सङ्गतं शौचम् ॥९ ४ ॥
चातुर्य माधुर्य दाक्षिण्यं मार्दवं सुखं शीलम् ।
प्रश्नं वार्तायुक्तिं वेषं मृदुशाईलं स्तोकम् ॥ ९ ६ ॥
विभवाविभवौ सुरतं गुणागुणौ यौवनं गृहं दारान् ।
नानावर्णाश्च तथा चतुरेणैवं प्रयुञ्जीत ॥ ९ ७ ॥
इसके अतिरिक्त चतुर - हस्त के द्वारा क्रीडा ( लीला ), अनुराग १. नयननिपुणसमसुनिपुणबाला तुरशट्य कैतवार्थेषु - ग ० । २. प्रथमे - ख ० । ३. हस्तदण्डेन - ग ० । ४. विवृतविचारितरचितं ख, विधृतविचरितचरितं - ग ० । ५. विवर्जितं - ग ० । ६. कर्णनिर्देशम् — ख ० । ७. संयुक्तकरेणैव च – ख ० ग ० । ८. लीलां रति- ख ० ग ० । ९. संज्ञामाशां - ख ० ग ० । १०. प्रशमं वार्तायुक्ति ग ० । ११. शाड्वलं – ख ० ग ० । १२. गृहान् दारान् ग ० ।
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नवमोऽध्यायः ५ ९ ( रति ), प्रभा ( रुचि ), स्मृति, बुद्धि, तर्क ( ऊहापोहात्मक - कार्य - विभावन ) क्षमा, पुष्टि, संकेत ( संज्ञामात्र ), प्रणय, विचार, मिलन, पवित्रता, चातुर्य, माधुर्य, दाक्षिण्य, मार्दव, सुख, चरित्र ( शील ), प्रश्न, वार्ता ( कथा या अर्थशास्त्र ), युक्ति, बेशस्थान या वेशरचना, कोमलघास, अल्पपरिमाण, समृद्धिशालिता तथा समृद्धिहीनता, सुरतकर्म, गुण तथा अवगुण, यौवन, गृह पत्नी तथा अनेकविध रंगों को भी बतलाया जाता है ॥ ९ ४ - ९ ७ ॥
सितमूर्ध्वेन तु कुर्याद्रक्तं पीतञ्च मण्डलंकृतेन ।
परिमृदितेन तु नीलं वर्णाश्चतुरेण हस्तेन ॥ ९ ८ ॥
इस चतुरहस्त द्वारा रंगों को बतलाने में — ऊपर की ओर हाथ को उठाकर श्वेत वर्ण, गोल घुमाव द्वारा रक्त और पीत वर्ण तथा एक हाथ से दूसरे हाथ को दबाकर ( परिमृदित ) नीलवर्ण बतलाया जाए ॥ ९ ८ ॥
भ्रमरः -मध्यमाङ्गुष्ठसन्दष्टो वक्री चैव प्रदेशिनी ।
ऊर्ध्वमन्ये प्रकीर्णे च द्व्यङ्गुल्यौ भ्रमरे करे ॥ ९९ ॥
यदि मध्यमा उंगली और अंगूठे को एक दूसरे से मिलाकर उंगली को टेढ़ी कर ले तथा शेष दो उंगलियां ऊपर की ओर फैला दी जाएँ तो ' भ्रमर ' हस्त कहलाता है ॥ ९९ ॥
पद्मोत्पल कुमुदानामन्येषाञ्चैव दीर्घवृन्तानाम् ।
पुष्पाणां ग्रहणविधिः कर्त्तव्यः कर्णपूरश्च ॥ १०० ॥
योजना – इसके द्वारा कमल, कुमुदिनी तथा अन्य लम्बे डण्ठल या टहनी वाले पुष्पों का चयन और कर्ण कुण्डल को बतलाया जाता है ॥१०० ॥
विच्युतश्च सशब्दश्च कार्यो निर्भर्त्सनादिषु ।
बलालापे च शीघ्रं च ताले विश्वासने तथा ॥ १०१ ॥
इस हस्त - मुद्रा वाले हाथ को कुछ शब्द करते हुए नीचे झुकाया जाए तो डांटना ( निर्भत्सन ) बलशीलता का गर्व ( बलालाप ) बतलाना, शीघ्रता, ताल देना तथा विश्वास करने का अर्थ प्रकट होता है ॥ १०१ ॥
१. भ्रमरः ( उत्पत्तिकथा ) देवों की माता अदिति के कर्णकुण्डल बनाने के लिए काश्यप ऋषि ने इस मुद्रा का प्रयोग किया था । तभी से इसका प्रचलन हुआ । १. मण्डलकरेण - ग ० । २. वक्रे - ग ० । ३. द्वाङ्गुलौ - ग ० । ४. विद्युतश्च सहजश्च – ग ० ।