भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 41–50

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 41–50

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( ३० ) ऊँचा कर तिरछा मोड़ते हुए ( आगे की ओर ) रखना । ( बैशाख स्थान में तथा इस स्थान में अतिशय साम्य है ) गारुड - दायाँ बायाँ पैर उलटा कर ऐसे सिकुड़ाते हुए रखना जिसमें दोनों एड़ियाँ जमीन का स्पर्श पंजे के अगले अंगूठों से करे । कूर्मासन — दाहिने पैर को आगे सिकुड़ा कर बैठे तथा पंजा सीधा रखे जिससे एड़ी ऊपर रहे तथा बायाँ पैर खड़ा जमीन पर टिकाना । नागबन्ध - उपर्युक्त मुद्रा में बायें पैर की जंघा पर दाहिने को तिरछी रख कर बैठना । वृषभासन — दोनों घुटने जमीन पर जुड़ा कर अन्तर से रखते हुए दोनों पंजों के बल बैठना । उपर्युक्त स्थान तथा आसनों की करणों में योजना का विवरण मिलता है । जैसे स्वस्तिककरण की स्वस्तिक, ऊर्धस्वस्तिक, वक्षःस्वस्तिकं, पृष्ठ स्वस्तिक जैसे स्वस्तिक करणों में योजना होती है । वर्धमानक ( इस ) स्थान की तलपुष्पपुट, रेचित निकुट्टक, छिन्न तथा अन्य करणों में योजित होता है । संहत को समनख तथा लीन करणों में संयुक्त किया जा सकता है । नद्यावर्त को अपविद्ध, अर्धरेचित, भुजङ्गत्रस्त, रेचित, जैसे करणों में संयोजित किया जाता है । चतुरस्र की मण्डलस्वस्तिक, स्वस्तिकरेचित, कटिसम तथा उन्नत जैसे करणों में योजित होता है । गरुड की कुवित में योजना होती है । इसी दिशा में अन्य स्थान की भी करणों में योजना हो सकती है यह ध्यान से देखने पर स्पष्ट हो सकता है । नाट्यशास्त्र के किसी उत्तरकालभव पाठ या कोहलादि प्रणीत स्थानक विवरण को लेकर ही सङ्गीतरत्नाकरादि ' में इनका विस्तार है जो नाट्यशास्त्र का ही है । क्योंकि अभिनयादि प्रयोग में आज भी इनका उपयोग हो रहा है । अतः ये जो स्थान अतिरिक्त है वे भी नाट्यशास्त्र के भरत प्रोक्त ही होना ( उचित ), लगता है, तथा इन्हें परम्परागत नाट्याचार्यों की परम्परा में आज प्रामाणिक संशोधनपूर्ण उत्तर अभी कारण प्रस्तुत संस्करण में कुछ ही ऐसे आशा है प्रमाणादि के साथ हम आगे उद्योग करेंगे - ( सम्पा ० ) १. ये २३ देशी स्थानक जिनको अड्यार सं ० में देखा जाए । माना भी जाता है ( परन्तु इनका शेष है । जो भी हो इसपर हमने इसी चित्र देकर विषय को रखा है । जिसे और भी संशोधित कर प्रस्तुत करने का संगी. रत्ना में नर्त ० पृ ० ३२६-३३५

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( ३१ ) आसन एवं शयन विधान - नाट्यशास्त्र में पात्रों के देश, काल, प्रकृति तथा चित्तवृत्ति आदि के अनुरूप उपयुक्त आसन तथा शयन विधान का निरूपण किया गया है । यह विधान राजसभा तथा समाज में प्रचलित व्यवहारों के आधार पर निर्धारित किया गया है । ये आसन स्वस्थ या विश्रामदशा में, विचार, चिन्ता, शोक, मूर्च्छा, लज्जा, मद, ग्लानि, रोग तथा निद्रा की अवस्था में विभिन्न स्वरूप वाले दिखलाये गये हैं । इसी प्रकार प्रियाप्रसादन, धार्मिकविधि सम्पादन एवं देववन्दना आदि के समय इनके विभिन्न स्वरूप रहते हैं । इन भावों के लिये विभिन्न शारीरिक भङ्गिमाओं के तथा मुद्राओं के प्रयोग का भी भरतमुनि ने निर्देश किया है, ' तदनुसार शोक की दशा के अभिनय में दोनों हाथों के सहारे चिबुक को रखा जाता है, मस्तक गर्दन पर झुकाया जाता है तथा इन्द्रिय एवं मन की निष्क्रियता दिखलाई जाती है । इसी प्रकार प्रिया के प्रसादन में दोनों घुटनों को पृथ्वी पर रख कर नीचे मुख किये हुए रहते हैं तथा देववन्दना में भी यही आसन रखा जाता है । इस प्रकार पात्रों के उत्तम, मध्यम आदि सामाजिक आधारों पर अनेक प्रकार के आसनों का विधान दिखलाया गया है । तदनुसार राजा एवं महारानी के लिये सिंहासन, पुरोहित, अमात्य एवं उनकी पत्नियों के लिये वेत्रासन, सेनापति एवं युवराज के लिये मुण्डासन, ब्राह्मणों के लिये काष्ठासन, वैश्याओं के लिये मसूरक आसन तथा शेष स्त्रियों एवं सेवकों आदि के लिये भूम्यासन का विधान बतलाया गया है । शयन - इसी प्रकार शयनदशा में शरीर की स्थिति एवं भङ्गिमा के आधार पर छः प्रकार के शयन का विवरण नाट्यशास्त्र में दिया गया है । यह विधान अतिसङ्क्षिप्त है क्योंकि नाट्यप्रयोग में इसका उपयोग अधिक नहीं होता । ये छः प्रकार हैं: - ( १ ) आकुञ्चित, ( २ ) सम, ( ३ ) प्रसारित, ( ४ ) विवर्तित, ( ५ ) उद्वाहित तथा ( ६ ) नत । ' आकुञ्चित ' में समस्त अङ्ग सिकुड़े हुए तथा दोनों घुटने शयन से सटे हुए रखते हैं । इसकी योजना ठण्ड से ठिठुरते हुए पात्र के लिये रखी ' जाती है । ' सम ' में मुँह ऊपर तथा दोनों हाथ शिथिल रहते हैं । इसे सोए हुए व्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाता है । ' प्रसारित ' में एक भुजा को सिरहाना बना कर जंघाओं को फैला कर लेटा जाता है । सुख से निश्चिन्त होकर नींद लेने की दशा में इसकी योजना रहती है । बिवर्तित ' में पात्र नीचा मुँह रख कर सोता है । शस्त्र से क्षत या मृत, उन्मत्त या

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( ३२ ) मद्यपान कर मस्त पड़े हुए पात्र की दशा बतलाने में इसका प्रयोग किया जाता है । ' उद्वाहित ' में पात्र अपने मस्तक को हाथ या कलाई पर रख कर सोता है । इसकी योजना लीला या स्वामी के आने आदि में रखी जाती है । ' नत ' में जंधाएँ फैला कर तथा दोनों हाथों को ठीले रखते हुए शयन करते हैं । इसकी योजना आलस्य, श्रम तथा थकावट की स्थिति में की जाती है । इस प्रकार नाट्यशास्त्र में गतिविधान के अन्तर्गत हस्त - पाद - प्रचार, आसन एवं शयन की विधियों का सभी पक्षों को ध्यान में रख कर यथाशक्य पूर्ण विवरण दिया गया है । ( इसके अतिरिक्त ) मुनि ने इतने विस्तीर्ण इस विषय पर विवरण देकर भी जो कि सूक्ष्म तथा प्रयोगात्मकता से सम्पन्न है - नाटयार्थ की अपेक्षा होने पर अन्य विधियों की भी स्वतन्त्रता पूर्वक परिकल्पना करने की छूट नाट्याचार्यों को दे दी है तथा नाट्यप्रयोग के सभी उपादेय तत्त्वों को इस क्रम में व्यायकता के साम्य संगृहीत किया है । जो अपने आप में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है, यह निस्सन्दिग्ध है । परिशेष - ( विचार एवं विवरण ) अङ्गभङ्ग - नाट्यशास्त्र में आङ्गिक अभिनय के अन्तर्गत शरीर के द्वारा होनेवाली क्रियाओं एवं करणों, स्थानकों आदि शरीर रचनाओं ( Postures ) तथा नृत्य में होने वाले विविध अङ्ग परिचालनों का विवरण दिया है किन्तु ये रचेगये है अङ्गभङ्ग या शरीर के मरोड़ने की क्रियाओं के आधार पर ही । अतः अङ्गभङ्ग की सुन्दरता पर नृत्यादि अभिनय की सुन्दरता से प्रस्तुति निर्भर करती है तथा इसी कारण नृत्यादि में ' अङ्गभङ्ग ' का भी अपना स्वन्त्र महत्व है ही । नाट्यशास्त्र में ऐसे ' अङ्गभङ्ग ' का पृथक से उल्लेख तथा विवरण नहीं दिया गया है परन्तु शरीर की सुन्दरता भङ्गिमाओं के प्रसङ्ग में इसका विवरण अभिनय में आवश्यक एवं अपेक्षित अवश्य है क्योंकि अङ्गसौष्ठव का निखार ही अङ्गभङ्ग से आता है । अन्य शास्त्रीयग्रन्थों में इस विषय का विवरण मिलता है तदनुसार अङ्गभङ्ग के चार प्रभेद होते हैं । ये है: - ( १ ) अभङ्ग, ( २ ) समभङ्ग, ( ३ ) त्रिभङ्ग तथा ( ४ ) अतिभङ्ग । अभङ्ग - शरीर की सम एवं स्थाभाविक दशा में यह ' भङ्ग ' सौष्ठवपूर्ण भाव लिये हुए होता है । इसमें शरीर बिना किसी मरोड़ या मोड़ के पूर्ण सीधे भाव में खड़ा रखा जाता है । इस स्थिति को प्राचीन शिल्प में श्री विष्णु

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( ३३ ) की सीधी खड़ी प्रतिमा में देखा जा सकता है । इसे अभङ्ग या अन्य विद्वान ' सहजभङ्ग ' भी कहते हैं । समभङ्ग — सहज भाव की स्थिति एवं सौन्दर्य पूर्ण भङ्गिमा में शरीर को एक ओर किञ्चित् झुकाना ' समभङ्ग ' होता है । इसमें सम्पूर्ण शरीर को अन्यूनानतिरिक्त समान मुद्रा में एक ओर थोडा तिरछा रखते हुए खड़ा रखा जाता है । इसे ' समभङ्ग ' भी इसी कारण कहते हैं कि इसमें तिरछापन एक समान स्थिति में रहता है । नाट्य में समभङ्ग का प्रचुर प्रयोग रहता है । और शिल्प में इस स्थिति में अवस्थित अनेक प्रतिमाएँ देखी जा सकती है । त्रिभङ्ग — मुख, शरीर तथा पाद इन तीनों को मरोड़ने या तिरछा करते हुए खड़े रहना ' त्रिभङ्ग ' कहलाता है । शरीर की ऐसी दशा अति सामान्य होने के कारण प्राचीन शिल्पादि आकृतियों में यह प्रचुर मात्रा में मिलती है विशेषकर श्रीकृष्ण की बाँसुरीवादन करती हुई प्रतिमा ' त्रिभङ्ग ' का उत्तम निदर्शन है । अतिभङ्ग — शरीर को अतिशय ( या अधिक मात्रा में ) मरोड़ते हुए ओजपूर्ण एवं उग्रभाव में खड़ा रहना ' अतिभङ्ग ' कहलाता है । इसकी योजना ' ताण्डव ' जैसे नृत्य में रहती ही है तथा इसका निदर्शन ' नटराज ' की प्रतिमा है; जिसमें हस्त, पाद, कटि तथा ग्रीवा अतिशय भङ्गिमा के साथ भङ्गता के ओज भरे पाद प्रचार को लिये हुए दिखलाई पड़ती है । अभिनय में ' सौष्ठव ' का स्थान - यदि आङ्गिक क्रियाकलापों के शास्त्रानुकूल प्रस्तुतीकरण को एक ' कला ' कहा जाए तो इसका आधार स्तम्भ मानना पड़ेगा ' सौष्ठव ' को, जिस पर नृत्य का समग्र प्रासाद खड़ा किया जाता । इसी कारण अङ्गभङ्ग का आधार भी अङ्गसौष्ठव ही है जो लावण्य एवं सौन्दर्य का आधायक है भी । अङ्गों की सप्राणता के बिना नृत्य में अपेक्षित स्वरूप दिया जाना सम्भव नहीं रहता तथा बिना शरीर सन्तुलन के आङ्गिक क्रियाएँ बेडोल हो जाती हैं । अतएव जैसे गायन के लिये उत्तम कण्ठ की अनिवार्यता होती है इसी तरह नृत्य के लिये सप्रमाण शरीर की भी । अङ्गसौष्ठव नाट्यशास्त्र में वर्णित सौष्ठव ही है, जो नृत्य अपेक्षित बाह्य स्वरूप को सुन्दर बनाता है परन्तु इसके साथ प्रस्तोता का आन्तरिक भावसौन्दर्य भी यहाँ कार्य करता है; जिसके बिना बाह्य प्रदर्शन भी मनोरम पद्धति में व्यक्त नहीं किया जा सकता । हृदय में सौन्दर्य का सुप्त भाव यदि पहिले से विद्यमान रहेगा तो अभ्यास से कलाकार की सुप्त ३ ना ० भू ० द्वि ०

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( ३४ ) कला अवश्य जाग्रत हो जाएगी । इसी जाग्रति के लिये कलाकार को प्रशिक्षण देने का प्रावधान है भी । रङ्गमञ्च की कक्ष्या - परिधि - नाट्यशास्त्र के चतुर्दशअध्याय में नाट्य-मण्डप पर प्रस्तुत दृश्यविधान का विवरण है । इस विवरण का एक अंश रङ्गमञ्च के स्वरूप एवं साजसज्जा को दिखलाते हुए नाट्यशास्त्र के द्वितीय अध्याय में दिया जा चुका था, किन्तु नाटकीय इतिवृत्त के अनुरोध पर शेष तत्त्वों का इसी अध्याय में विवेचन हुआ है । इतिवृत्त के अनुरोध पर रङ्गमञ्च पर अनेक दृश्यों की योजना करनी पड़ती है । भरत मुनि ने ऐसे दृश्यों को प्रस्तुत करने के लिये अनेक उपयोगी विधियाँ बतलाईं जिससे दृश्यविधान अधिकाधिक यथार्थ या लोकानुरूपता-शाली बन सके । दृश्यविधान की विधियों का आहार्यअभिनय के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में विचार हुआ है जिसका कुछ और विचार उसी प्रसङ्ग में नाट्यशास्त्र की प्रस्तुत इसी व्याख्या के तृतीय भाग में किया जा रहा है । इसी के लिये कक्ष्याविभाग की महत्त्वपूर्ण प्रथा ( रूढि ) की ( जिसमें प्रतीकात्मक नाट्यप्रयोग विधान है ) उद्भावना की गयी थी; यह थी दृश्यविधान में रंगमञ्च पर स्थापित कक्ष्याविभाग पद्धति । कक्ष्याविभाग का यह प्रयोग परम्परा तथा कल्पना पर आधृत रख कर किया गया है । कक्ष्याविभाग का सामान्यतः आशय यही है कि कथानक के अनुरूप रंगमञ्च पर स्थान या देश की कल्पना करना जो नाट्यधर्मी रूढ़ियों आदि पर आश्रित रखते हुए दिखलाई जाए । भरत के द्वारा किये गये ऐसे कक्ष्याविभाग निरूपण का उद्देश्य यही है कि नाट्यप्रयोग अधिकाधिक प्रकृत एवं अनुरूपता पर आधारित हो सके, क्योंकि अनुरूपता ही यथार्थ के समीप नाट्यविधान को लाने में सक्षम होती है । इन कक्ष्याओं का विभाजन रंगमञ्च पर इस प्रकार कर लिया जाता था कि एक विभाग से दूसरे विभाग पर आ जाने पर समझा जाता था कि पात्र एक स्थान या देश से दूसरे में प्रवेश कर रहा है । मुनि ने कक्ष्या-विभाग के अन्तर्गत आभ्यन्तर, बाह्य तथा मध्यम भाग की रङ्गमञ्च पर ही परिकल्पना की तथा रंगमश्व की परिधि में चलने से ही इनके विभाग सूचित हो जाते थे । ये कक्ष्यायें या इनके स्थान कितनी दूर पर निर्दिष्ट हो — इसका विनिश्चय पात्रों के परिक्रमण की संख्या या स्थिति से होता था । यदि दूर का स्थान निर्दिष्ट करना हो तो पात्र देर तक परिक्रमण

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( ३५ ) करता था तथा समीप की स्थिति में थोड़ा परिक्रमण होता था । इनमें रङ्गमञ्च का मुख भाग रङ्गपीठ होता है तथा यही आभ्यन्तर भाग कहलाता है जहाँ पात्र नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करते हैं । इनमें नेपथ्यगृह से लगी हुई कक्ष्या आभ्यन्तर - कक्ष्या, रंगपीठ से लगी कक्ष्या बाह्य कक्षा तथा इन दोनों की मध्यवर्ती कक्ष्या मध्यम होती थी । ये कक्ष्यायें रङ्गमंच के दोनों ओर होती थीं, ये ही बाहर से आड़ या पक्ष ( पखवाई ) का भी कार्य सम्पन्न करती थी तथा इन्हीं से पार्श्व की ओर आगम एवं निर्गम होता था और इन्हीं कक्ष्याओं में विभिन्न दृश्यों की अवतारणा कर ली जाती थी । इस कक्ष्या-विभाग की परिधि में ( जो पात्र के विशेष भाग में स्थित होने से जानी जाए तथा जहाँ दृश्य निरूपण कथावस्तु के कारण इष्ट हो तो वहीं पर ) ऐसे सभी प्रदेश, नगर, वन, पर्वत आदि आ जाते हैं जो प्रस्तुत दृश्य में प्रदर्शित होने चाहिए थे । इस प्रकार ये सभी प्रदेश- फिर चाहे वे अन्दर, बाहर, मध्य, दूर या समीपवर्ती प्रदेश हों— कथावस्तु के कारण परस्पर सम्बद्ध हो जाते थे । इन कक्ष्या विभागों की विधि या रूढ़ि के अनुसार जो पात्र रंगमंच पर प्रथम प्रवेश करें वे आभ्यन्तरपात्र मञ्च के अन्तः स्थान ( गृह, प्रासाद ) में स्थित रहते हैं तथा आभ्यन्तर प्रकृति कहलाते हैं । इसके बाद जो पात्र रंगमञ्च पर प्रवेश करते हैं वे बाह्य होते हैं तथा जिस मार्ग से वे प्रवेश करेंगें वह भाग मध्यम कहलाता है, क्योंकि इसी से वे अन्दर प्रवेश करते हैं । रंगमंच के आभ्यान्तर भाग से जो पात्र इन पूर्व प्रविष्ट पात्रों को देखने या मिलने के लिए आए वह अपनी बात दाहिनी ओर ( दक्षिण दिशा की ओर ) होकर कहते हैं । यहाँ रङ्गमञ्च पर दिशा का भी संकेत रखा गया है, इसका आधार है नेपथ्यगृह तथा वाद्ययन्त्रों के लिये निर्मित द्वार का मुख; क्योंकि यह मुख जिस ओर रहेगा उसे नाटयप्रदर्शन के विधानानुसार पूर्व दिशा मानी जाती है । इसी पूर्वद्वार से पात्रों का प्रवेश या आवागमन भी किया जाता है, अतः जो पात्र इन निर्दिष्ट द्वारों में से जिस द्वार से निकलता है । उसे उसी द्वार से प्रवेश करना होता है । बाह्य पात्र का प्रवेश तथा निर्गम एक ही द्वार से होता है । आभ्यन्तरपात्र भी कार्यवश यदि बाह्यपात्र के साथ निकलता है तो जिस द्वार से बाह्यपात्र आया था उसी द्वार से निकलेगा । कोई पात्र एकाकी या किसी अन्य पात्र के साथ प्रवेश करता है तो उसे निद्दिष्ट द्वार से ही प्रवेश करना होता है । किसी कार्यवश बाहर

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( ३६ ) निकल जाने पर यदि वही पात्र पुनः लौटे तो वह उसी मार्ग तथा द्वार से प्रवेश करता है जिससे वह बाहर गया था । पात्रों के प्रवेश के समय अन्य कक्ष्या की सूचना के लिये रंगमञ्च पर एक या अनेक बार आवश्यकतानुसार परिक्रमा करने से दूसरी कक्ष्या सूचित हो जाती है । यदि समानस्थिति के पात्र हों तो साथ - साथ तथा अधम पात्र से युक्त रहने पर उनसे घिरे हुए चलने वाले नृपपात्र के प्रवेश की स्थिति में प्रतीहारी का उसके आगे चलना बतलाया जाए । इसके अतिरिक्त प्रेक्षागृह के बाहर खुले स्थान या रंगमञ्च पर नाट्य - प्रयोग की दशा में वाद्ययन्त्रों की ओर पीठ कर प्रयोक्ता या पात्र जिस दिशा में मुख रख कर खड़े होते हों उसे भी रूढ़ि के अनुसार पूर्वदिशा मानकर कार्य सम्पन्न किया जाता है । # इसी प्रकार इसी कक्ष्याविभाग में दूरी या निकटता के देश का संकेत विधान भी रखा गया है । पात्र की दूर या निकट प्रदेश की यात्रा का भान उसके अधिक चलने या घूमने की गति से दूर का प्रदेश तथा कम चलने से मध्यम व्यवधान वाले अथवा निकट प्रदेश को दिखलाया जाता है । यह क्रम यद्यपि नाट्यविधान के अन्तर्गत रहता है किन्तु यह नियम लोकपरम्परा से प्रभावित नियम है । लोकव्यवहार में अधिक दूरी की यात्रा करने में अधिक चरणसंचार तथा कम दूरी में कम चरणसंचार रहता है यहीं इस नियम का आधार था यह स्पष्ट प्रतीत होता है । दिव्यपात्रों का कक्षावस्तु की अपेक्षा के अनुसार नगर, वन, पर्वत, सागर, वर्ष, द्वीप आदि सभी प्रदेशों पर आकाश, विमान या अपने से उद्भावित माया के द्वारा पहुँचना बतलाया जाता है; क्योंकि दिव्य पात्रों की शक्ति असीम होती है । पात्रों का संचार प्रयोजनवश यदि प्रच्छन्नस्वरूप में रखा जाए तो उसको पृथ्वी पर ही बतलाया जाए क्योंकि यहाँ वे मनुष्य रूप में दिखलाई दे सकते हैं । दिव्य तथा दिव्या दिव्य पात्र जम्बूद्वीप आदि सभी वर्षो में अपनी इच्छानुसार आ जा सकते हैं परन्तु पात्र केवल भारतवर्ष में घूमने वाले ही रखना चाहिये । यदि किसी पात्र का कार्यवश दूर देश में प्रस्थान बतलाना ही हो तो अङ्क को वहीं समाप्त करते हुए दूसरे अङ्क के आरम्भ में प्रवेशक के द्वारा यह दिखलाना चाहिए । इस प्रकार पात्रों की अपनी स्थिति, सामर्थ्य तथा पहुँच के साथ - साथ प्रयोग के अनुसार कक्ष्या-विभाग में प्रदेश दिखलाये जाते हैं । इसी प्रसंग में भरतमुनि ने दिव्यजातियों के निवास भूत विशिष्ट पर्वत

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( ३७ ) तथा प्रदेशों का भी उल्लेख किया है ( जिनका विवरण नाट्यशास्त्र में यथास्थान प्राप्य है ) । नियमवश इन पात्रों का निवास इन्ही प्रदेशों पर दिखलाना चाहिए । तदनुसार यक्ष, गृह्यक तथा कुबेर के अनुचरों के लिए शुभ्रकूट या कैलास, गन्धर्व एवं अप्सराओं के लिये हेमकूट, वासुकी, तक्षक तथा अन्य नागों के लिये निषध, तैतीस कोटि देवताओं के लिये महामेरु, ब्रह्मषि एवं सिद्धों के लिये वैदूर्यमणिरञ्जित नीलाचल तथा दैत्य, दानव एवं पितरों के लिये श्वेतपर्वत पर आवास दिखलाना चाहिए । इस पर आचार्य अभिनवगुप्तपाद का मत है कि कथावस्तु से सम्बद्ध स्थानों के रहने पर ही प्रसंगानुसार कक्ष्याविभाग की परिकल्पना से इनका प्रदर्शन करना चाहिए । तथा यह प्रदर्शन कक्ष्याविधान के द्वारा रंगमञ्च पर अवस्थित एक भाग पर ( काल्पनिकता के साथ ) प्रस्तुत करना चाहिए । इन पात्रों के कार्य, भाव एवं चेष्टाएँ मानवीय रहनी चाहिए तथा यहाँ देवताओं की दृष्टि अनिमेष नहीं होती । क्योंकि नाट्यप्रदर्शन में सभी भाव दृष्टि पर टिके रहते हैं । भाव सभी दृष्टि द्वारा ही सर्वप्रथम अभिव्यक्त होकर बाद में अङ्गावयवों से अभिनीत होते हैं । यह कक्ष्याविभागगत सभी विधान नाट्यधर्मी प्रथा की रूढ़ि से सम्पन्न होता है तथा इन्हीं नाटयरूढ़ियों के आधिक्य के कारण प्राचीन संस्कृत रूपक में आधुनिक नाटकों की तरह दृश्यों का स्पष्ट विभाजन जैसा प्रावधान नहीं दिखलाई देता है । यहाँ तो पात्र अपनी उदात्त काव्यशैली में नाटकीय घटना की स्थिति की कल्पना दर्शकों में जागृत कर देता है, क्योंकि जब प्रेक्षक रसज्ञ हो तो उन्हें नाटकीय सौन्दर्यबोध के लिये अतिरिक्त या अधिक अपेक्षित ही नहीं था । यह सही है कि नाट्य का उपयोगी अङ्ग कक्ष्याविधान है जिसका नाट्यप्रदर्शन के लिये उपयोग अनिवार्य है । इसी कारण नाटकादि में इसका विधान रखा गया है । यह नाट्यप्रयोग का विषय होने के साथ - साथ आवश्यक भी है केवल कल्पनामात्र नहीं है । यह विधान भी सिद्धान्त तथा स्वरूप की सीमाओं में आवद्ध है । तथा इससे अति व्यापक अपेक्षाएँ नहीं रखी जा सकती । प्रवृत्ति - नाट्यप्रयोग को रसानुग्राहक स्वरूप प्रदान करने के लिए ' प्रवृत्ति ' का विधान है । प्रवृत्ति शब्द अपनी व्युत्पत्ति के ( प्र + / वृत् + क्तिन् ) साथ - साथ अनेक अर्थ प्रकट करता है । यह बुद्धि तथा कर्मेन्द्रिय की चेष्टाएँ, शरीर के लीला विलास आदि व्यापार, उनके हाव हेला आदि विकार तथा आलाप एवं विलाप आदि वाग् व्यापार, मनुष्य की पाप - पुण्य TSP वृत्ति आदि ये सभी प्रवृत्ति के अर्थ है । प्रवृत्ति का यहाँ नाट्यप्रयोग के सन्दर्भ

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( ३८ ) में व्यापक अर्थ में विधान भी है । भरतमुनि के अनुसार जो वृत्ति भारतवर्ष के देशों में प्रचलित विभिन्न वेष, भाषा, आचार एवं वार्ता को स्थापन करती हो वही ' प्रवृत्ति ' है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने प्रवृत्ति शब्द की व्यापक व्याख्या की है । उनके अनुसार प्रवृत्ति शब्द सूचना या प्रख्यापन के अर्थ में यहाँ प्रयुक्त हुआ है । अतः जो सम्पूर्ण लोक में प्रचलित मानव की जीवन की प्रवृत्तियों का ज्ञान करवाती हो वही ' प्रवृत्ति ' है । यह मानवीय सभ्यता को जतलाने का एक सशक्त साधन होती है जो बाह्य या ऊपरी ( अर्थ या ) स्वरूप का पूर्णतः ज्ञान करवाती है । " देश, वेष भाषा एवं आचार से मुख्यतः प्रवृत्ति का सम्बन्ध रहता है । जो इनका आधार भी है, परन्तु इनकी विभिन्नताओं के कारण प्रवृत्तियों के अनेक प्रभद नहीं हुए वे केवल चार ही रखे गये हैं । इसका कारण भी अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि ' नाट्य चित्तवृत्ति प्रधान होता है, जिसमें अनेक मानवीय मनोदशाओं को नाटयरूप प्रदान करना पड़ता है तथा जिनमें देश, भाषा, वेष एवं आचार सहायक होते है, परन्तु यदि इन असंख्य प्रवृत्तियों के वर्गीकरण से व्यवस्थित रूप में इनकी शिक्षा तथा अभ्यास सम्भव नहीं होगा । इसी कारण विभिन्नता के मध्य भी समान लक्षणों के आधार पर वर्गीकरण में प्रधानतः प्रवृत्तियों के चार प्रभेद ही रखे गये है । उत्तरकालीन नाट्य एवं साहित्य के आचार्यों ने भी प्रवृत्ति के स्वरूपादि पर विचार किये हैं । राजशेखर तथा महाराजाधिराज भोज ने वेषविन्यास-क्रम को ' प्रवृत्ति ' माना जब कि धनञ्जय तथा शारदातनय ने देश, वेष, भाषा तथा व्यवहारों को प्रवृत्ति के अन्तर्गत मान्य किया । इस विवेचन से भरतमुनि के व्यापक विवरण को प्रगति नहीं मिली । आचार्य विश्वनाथ कविराज ने स्वतन्त्र रूप में प्रवृत्ति का विवेचन न देकर उसे भाषाविधान कह कर ही अपना विवरण पूर्ण कर डाला । इस प्रकार भरतमुनि ने जिस प्रवृत्तिविवेचन को परम्परा के मूलपीठगत आधार के कारण संकेतित किया था उसे उत्तरवर्त्ती शास्त्रकारों ने केवल उसका संकेत करते हुए ही विवरण दिया तथा उसकी उपयोगिता एवं महत्त्व पर अधिक ध्यान नहीं दिया यही प्रतीत होता है । परन्तु प्रवृत्ति की उपयोगिता एवं महत्व की नाट्यप्रयोग के क्षेत्र में स्थिति वही है जो भरत मुनि ने बतलायी है । पात्रों की वेषभूषा, भाष, व्यवहार १. द्रष्ट- अभि ० भा ० Vol II B O. S. E. Page 205207 202

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( ३६ ) आदि की स्थानीय विशेतायें नाटय में दिखलाना अभीष्ट होता है, जिससे नाट्याभिनय में यथार्थता आ सके । यद्यपि प्रवृति को अन्य विद्वान् आहार्य-अभिनय के अन्तर्गत भी ( इसमें स्थित वेष के कारण ) मानते हैं तथा उसके अन्तर्गत स्थानीय संस्कार, व्यवहार एवं भाषा का समावेश करते हैं, जो नाट्यकार के सूक्ष्म निरीक्षण के कारण अभिनय में समायोजित करना नाट्याचार्य के द्वारा आवश्यक भी होता है । क्योंकि नाटयकार अपनी कृति में विभिन्न प्रदेश के पात्रों की सहज प्रवृत्ति रखता है । यदि नाटयकार सभी पात्रों को एक समान रूप में अङ्कित करें तो उसे सामाजिक सहृदय ठीक से नहीं देखते न ही उनकी रुचि उसमें आ पाएगी । नाट्यप्रयोक्ताजन एवं शास्त्रपरम्परा की मान्यता के अनुरोध पर भरत-मुनि प्रतिपादित प्रवृत्ति के चार भेदों का संकेत पूर्व में दिया जा चुका है । ये चार प्रभेद हैं- ( १ ) आवन्ती, ( २ ) दाक्षिणात्या, ( ३ ) पाञ्चाल मध्यमा तथा ( ४ ) औढ़मागधी । भोज ने बाद में एक पाञ्चाली प्रवृत्ति को जोड़ कर प्रवृत्तियों की संख्या पांच मानी थी । यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि प्रवृत्ति का यह विभाजन भरतकालीन भारत के भौगौलिक विभाजन तथा वेषभूषा से सम्बद्ध लोकव्यवहारों पर निर्भर था । इसलिये कई जनपदों को मिला कर बनाए गये एक बड़े भूभाग के लिये एक प्रवृत्ति का प्रधानतः उपयोग होता था जो उसकी प्रधानता को सूचक भी हो जाती थी । जैसे यदि किसी विस्तीर्ण भूभाग में शृङ्गार की प्रधानता है तो किसी में अन्य | अतएव इन विविध विशेषताओं से युक्त एवं प्रसाधित होकर ही पात्र अपना नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करते थे परन्तु उनकी वेषभूषा, भाषा तथा व्यवहार उन्हें अन्म पात्रों से विशिष्ट बना देते थे । वेष और भाषा तो वास्तविक रूप में अवान्तर कारण थे किन्तु यहाँ देशभेद एवं स्वभाव की भिन्नता भी प्रवृत्ति भेद में भिन्नता का संकेत देते ही हैं । दाक्षिणात्या प्रवृत्ति - यह प्रवृत्ति शृंगारप्रधान होती है । इसका कारण है दक्षिणदेशवासियों की नृत्य, गीत एवं वाद्यप्रियता रहना । इसी कारण उनके अभिनय चतुर, मधुर तथा ललित रहते हैं । दाक्षिणात्य देश के अन्तर्गत दक्षिण के सभी प्रदेशों का समावेश समझना चाहिए । महेन्द्र, मलय, सह्य, मेकल तथा पालमंजर पर्वतों के मध्य स्थित प्रदेश दाक्षिणात्य माने जाते हैं । इनके वेष, भाषा तथा आचार में परस्पर अतिशय साम्य रहता है । दाक्षिणात्य प्रवृत्ति सुकुमारता लिये रहने से वैदर्भी रीति से भी साम्य रखती है, क्योंकि विदर्भ दाक्षिणात्य देश के रूप में भी प्रसिद्ध है ही । दाक्षिणात्यों