भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 481–490

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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३७० नाटयशास्त्रम्

प्रायो वीरे च रौद्रे च करौ प्रहरणाकुलौ ।

बीभत्से ' कुत्सितत्त्वाश्च भवतः कुञ्चितौ करौ ॥ ६३ ॥

हास्ये चोद्देशमात्रेण करुणे च प्रलम्बितौ ।

विस्मयात् स्तब्धौ भयाच्चैव भयानके ॥ ६४ ॥

अद्भुते इसी प्रकार रौद्र और वीर रस में हाथ शस्त्र प्रहार में व्यस्त रहते हैं । बीभत्स रस में कुत्सित वस्तु के अवलोकन आदि के कारण हाथ सिकुड़े रहते हैं । हास्य रस में हाथ किसी व्यक्ति या वस्तु की ओर लटकाए हुए या ढीले रखे जाते हैं और अद्भुत रस में आश्चर्य के कारण हाथ स्तब्ध ( निष्क्रिय ) हो जाते हैं ॥ ६३-६४ ॥

एवमादिषु चान्येषु प्रविचारेऽथ * हस्तयोः ।

अलङ्कारविरामाभ्यां साध्यते ह्यर्थनिश्चयः ॥ ६५ ॥

इसी प्रकार के अन्य अवसरों पर भी अलंकार और विरामों के द्वारा ही प्रदर्शित अर्थ स्पष्ट होता है ॥ ६५ ॥

ये विरामाः स्मृता वृत्ते " तेष्वलङ्कार दूष्यते ।

समाप्तेऽर्थे पदे वापि तथा प्राणवशेन वा ॥ ६६ ॥

पदवर्णसमासे च ते बह्वर्थसङ्कटे ।

कार्यों विरामः पादान्ते तथा प्राणवशेन वा ॥ ६७ ॥

शेषमर्थवशेनैव विरामं सम्प्रयोजयेत् । पद्यों में जो विराम रखे गए हैं उनमें अलंकारों भी अपेक्षा रहती है । की अर्थ समाप्ति पर या सांस लेने के कारण जैसी भी स्थिति हो-शब्द विराम अवश्य किया जाना चाहिए । इसी प्रकार जहाँ अक्षर और शब्द उसमें में समाविष्ट हों, या उनका उच्चारण शीघ्र गति से किया दीर्घ समासावली , या उनसे अनेक अर्थ प्रकट हो रहे हों तो इन सभी अवस्थाओं जा रहा हो या फिर सांस लेने के लिये जहाँ भी आवश्यक रूप में में पाद की समाप्ति रुकना होता हो तो वहाँ ' विराम ' रखे जाएँ । ( इसके स्थानों पर अर्थ के अनुसार ' विराम ' की योजना की जाए ॥ १. कुञ्चितत्वाच्च - क ० । २. विस्मयाविष्टे स्तब्धौ कार्यों - क ० । ३. सर्वेषु — ग ० । ४. प्रविचारेषु - ख ०; अधिकारेषु ५. नृत्ते – क ०; एते – ग ० । अतिरिक्त ) शेष ६६-६८ ॥ - - ग I ० ।

पृष्ठ 482

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एकोनविंशोऽध्यायः ३७१ अत्र च भावगतानि ' रसगतानि च कृष्याक्षराणि बोद्धव्यानि । तद्यथा-( वृत्ति ) - इसी प्रसंग में भाव तथा रस में होने वाले कृष्याक्षरों को भी जान लेना चाहिए ।

' कृप्याक्षर और उनका व्यवहार-' आकारैकारसंयुक्तमेकारौकारसंयुतम् ।

व्यञ्जनं यद्भवेद्दीर्घं कृष्यं तत्तु विधीयते ॥ ६८ ॥

जो व्यंजन आकार से युक्त या ए, ऐ, औ जैसे दीर्घाक्षर वाले स्वरूप के हों उन्हें कृष्याक्षर समझना चाहिए ॥ ६८ ॥

विषादे च वितर्के च प्रश्नेऽथामर्ष एव च ।

कलाकालप्रमाणेन पाठ्यं कार्य प्रयोक्तृभिः ॥ ६ ९ ॥

विषाद, वितर्क, प्रश्न और क्रोध की अवस्था में ऐसे वर्णों के ( संवाद में ) आने पर उन पर एक कला का विराम ( प्रमाणानुसार ) रखा जाए ॥ ६ ९ ॥

शेषाणामर्थ योगेन विरामे विरमेदिह ।

एकद्वित्रिचतुःपञ्च षट्कलञ्च विलम्बितम् ॥ ७० ॥

( इसके अतिरिक्त ) शेष ( अक्षरों के होने पर ) उनके अर्थों के १. कृष्यतीति कृष्यो = विलम्बितो लयः तत्र साधूनि कृष्याक्षराणि सन्ध्यक्षराणीत्यर्थः । ( अभि ० भार ० voll II. पृ ० ४०२ ) अर्थात् विलम्बित लय के उपयुक्त सन्ध्यक्षर कृष्याक्षर समझना चाहिए । ( जैसे आ ई ऊ जैसे दीर्घ अक्षर एवं सन्ध्यक्षर कृष्याक्षर हैं ) । १. अथ — क ०, ख ०; अत्रानुगतानि चत्वार्यक्षराणि निकृष्टाप्यक्षराणि चोद्बोध्यानि – ग ० । २. रसजातानि - ख ० । ३. कृष्याण्यक्षराणि - ख ० ४. एका रैकारसंयुक्तमोकारोकारसंयुतम् - ख ०; आकारे कारसंयुतम् —ग ० । ५. भवेदिह - ख ०; ग ० । ६. चामर्षणे - ख ०; वामर्षणे - ग ० । ७. योज्यं - क ० । ८. विरमेद्बुधः - क ० । रसभावानुगतानि । करसंयुक्तमेकारे

पृष्ठ 483

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३७२ नाट्यशास्त्रम् • अनुसार जो विराम रखे जाएं वे एक, दो, तीन, चार या पांच कलाओं के समय के प्रमाण वाले हों ॥ ७० ॥

' विलम्बिते विरामे हि सदा गुर्वक्षरं भवेत् ।

षण्णां कलानां परतो विलम्बो ' न विधीयते ॥ ७१ ॥

जो सबसे अधिक समय लेने वाले ( अर्थात् लम्बे ) विराम हों वहाँ गुरु अक्षर रहने चाहिए किन्तु छः कला से अधिक समय तक होने वाले विराम नहीं हो ॥ ७१ ॥

अथवा कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च ।

समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः ॥ ७२ ॥

या फिर किसी कार्य या अन्य आवश्यकता आ जाने पर और अधिक समय लेने वाले ' विराम ' रखे जा सकते हैं पर इन्हें रस तथा भावों की स्थिति को देखते हुए ही रखना चाहिए ॥ ७२ ॥

ये विरामाः स्मृताः पाठ्ये ' वृत्तपादसमुद्भवाः ।

उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्तेऽर्थवशानुगाः ॥ ७३ ॥

काव्य रचना में ‘ पादों ' के विभाजन से ही ' विरामों ' की सृष्टि होती है पर रंगमंच पर उनके अर्थ को प्रकट करने के लिये चतुर जन परिवर्तन कर विरामों को रख सकते हैं ॥ ७३ ॥

नापशब्दं पठेत्तज्ज्ञो ' भिन्नवृत्तं तथैव हि ।

विश्रमेन्नाविरामेषु ' दैन्ये " काकुं न दीपयेत् ॥

कोई भी पात्र अशुद्ध शब्द और लक्षणहीन छन्दों का निर्दिष्ट विराम स्थल के अलावा अन्य स्थानों पर देर तक न पूर्ण अवस्था में संवादों को बोलते हुए काकु को दीप्त न करे ॥ १. विरामे च विलम्बे च यदा - ख ०; ग ० । २. लम्बनं - ख ०, ग ० । ३. करणोपेतं - ग ० । ४. कर्त्तव्या विरामा रसभावतः - क ० । ५. काव्ये - ख ०, ग ० । ६. वृत्ते – क ० । ७. रसाश्रयाः - क ०; तेऽर्थवशास्तदा - ग ० । ८. भिन्नवृत्तेन चैव हि - ख ०; ग ० । ९. विश्रमेणाविरामेषु - ख ०; ग ० । 200 PER १०. न काकुरसहीनकम् - ख ०; ग ० । निर्दिष्ट क्रम में ७४ ॥ पाठ न करें । रुके और दैन्य ७४ ॥

पृष्ठ 484

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एकोनविंशोऽध्यायः ३७३

' वर्जितं काव्यदोषैस्तु लक्षणाढ्यं गुणान्वितम् ।

स्वरालङ्कारसंयुक्तं पठेत् पाठ्यं यथाविधिः ॥ ७५ ॥

जिस काव्य रचना का अभिनेता द्वारा मंच पर पाठ किया जाए वह काव्य के दोषों से युक्त नहीं रहना चाहिए, वह लक्षण तथा गुणों से और स्वर तथा अलंकारों से युक्त ही होना चाहिए ॥ ७५ ॥

अलङ्कारा विरामाश्च ये पाठ्ये संस्कृते मताः ।

तएव सर्वे कर्तव्याः स्त्रीणां पाठ्ये त्वसंस्कृते ॥ ७६ ॥

संस्कृत पाठ्य के लिए जिन अलंकार तथा विरामों को हमने बतलाया स्त्री पात्रों के द्वारा कहे जाने वाले प्राकृत पाठ्य में भी उन्हीं का अनुसरण किया जाए ॥ ७६ ॥

एवमेतत्स्वरकृतं कलाकाललयान्वितम् ।

दशरूपविधाने तु पाठ्यं योज्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ७७ ॥

नाट्यप्रयोक्ता या निर्देशक दश रूपकों को मंच पर प्रदर्शित करने के अवसर पर इन पाठ्य संवादों को उचित प्रकार से स्वर, कला, ताल और लय से युक्त रखकर विचारपूर्वक प्रस्तुत करे ॥ ७७ ॥

उक्तं काविधान्तु यथावदनुपूर्वशः ।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दशरूपविकल्पनम् ॥ ७८ ॥

॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वागभिनये काकुस्वरव्यञ्जनो नाम एकोनविंशोऽध्यायः ॥ इस प्रकार मैंने उचित प्रकार से क्रमशः काकु स्वर आदि के विषय में १. व्यपेतं वाक्यशेषैस्तु- -ग ० । २. काव्यं - ख ० । ३. अलङ्कारविशेषा ये पाठ्यसंस्कृत संश्रयाः - ख ०; ग ० । -४. ते सर्वे सम्प्रकर्त्तव्याः स्त्रीणां पाठ्ये तु संस्कृते । - ख ०; ग ० । ५. युतं - ख ०, ग ० । ६. ताल - ख ०; ग ० । ७. यथा- ख ० । ८. सप्तदशोऽध्यायः - क ०; ख ० ।

पृष्ठ 485

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३७४ नाट्यशास्त्रम् आपको बतलाया । अब मैं दस रूपकों के स्वरूप को ( अगले अध्याय में ) बतलाता हूँ ॥ ७८ ॥

प्रदीप व्याख्या में भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का ' काकु ' स्वर - व्यंजन सम्बोधन आदि निरूपण नामक उन्नीसवां अध्याय समाप्त । समाप्तश्चायं द्वितीयो भागः । भरत नाट्यशास्त्र का द्वितीयखण्ड समाप्त ।

पृष्ठ 486

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परिशिष्ट ( नाट्यशास्त्र: अध्याय ८-१९ ) अतिरिक्त टिप्पणियाँ अष्टम अध्याय ( उपाङ्गविधान ) ( संकेत - टिप्पणियों के आरम्भ में दी गयी संख्या अध्यायगत

श्लोकों की है । )

१-३. यहाँ ऋषिगण ने रस तथा भावों के विवरण के प्राप्त हो जाने पर रसानुभूति के साधन एवं काव्यार्थ को हृदय तक ले जाने के विषय में भरतमुनि से प्रश्न किया जो इस अध्याय दिखलाते हुए ' अभिनय ' के विवरण को आरम्भ करने के में आधार बनाकर उपस्थापित ) किया गया है । प्रेक्षकों प्रयोग का उपस्थापन ' अभिनय ' ही करता है जो दृश्यमानता पात्रों की शारीरिक एवं मानसी स्थितियों का अनुकरण होता हो । ४ - ५ महामुनि ने ऋषिकों को आरम्भ में अभिनय के बतला कर फिर अभिनय के स्वरूपादि का विवरण देना इस प्रकार प्रश्न के अनुरूप ही समग्र एवं साङ्ग अभिनय का वाले ' अभिनय ' की संगति को लिये ( प्रश्न रूप... के लिये नाट्य-के साथ नाट्यगत होकर दृश्यमान चारों प्रभेदों को आरम्भ किया । स्वरूप दिखलाने की प्रतिज्ञा के साथ साथ अभिनय शब्द की यौगिकी व्याख्या तथा स्वरूप को भी मुनि ने दर्शाया । ६. अभिनय का उपयोग नाट्यप्रयोग के लिये होता है इसी कारण इस प्रयोगात्मा विज्ञान को ' अभिनय ' संज्ञा प्रदान की गयी है । अभिनय काव्यार्थ को दृश्यमानता देता है या यह उन्हें रूपायित करने का एक प्रकार है जिससे सामाजिक रसानुभव प्राप्त कर सकें । इस प्रकार इस अनुकृतिपरक तत्व के साथ सौन्दर्यवत्ता भी लगी हुई है, क्योंकि इसके बिना परमध्येय ' रसवत्ता ' सम्भव नहीं है । इसी कारण रस भाव को व्यञ्जित करने वाली शारीरादि चेष्टाओं को अभिनय संज्ञा दी गयी है । संगीत रत्नाकर ने अभिनय का स्वरूप इस प्रकार दिया है ।

पृष्ठ 487

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३७६ नाट्यशास्त्र “ सर्वत्राभिनयो भवेत् । काव्यबद्धं विभावादि व्यञ्जयन् यो नटे स्थितः । सामाजिकानां जनयन्निविघ्नां रससंविदम् ॥ " ( सं. र. ७ १८ १ ९ ) [ अर्थात् जो काव्य में निबद्ध विभावादि को अभिव्यंजित करते हुए सामाजिकों में बिना किसी विघ्न या रुकावट के रससंविद् की उत्पत्ति करते अवस्थित हो जाता है वही अभिनय कहलाता है ] हुए ७. दर्शकों के सम्मुख होने वाला नाट्यगत पात्रों की मानसिक तथा... शारीरिक स्थितियों का अनुकरण ' अभिनय ' कहलाता है । यहाँ शाखा, अङ्ग तथा उपाङ्ग शब्द से आगे व्याख्यान में शरीर के विभिन्न अङ्गों के द्वारा सम्पन्न होने वाले अभिनय का विवरण देने का संकेत भी किया गया है । क्योंकि दर्शकों के समक्ष नाट्य प्रयोगगत रंजक तत्वों को प्रकट कर रसानुभूति का साधक हो जाता है । ८- १. भरतमुनि ने नोट्याश्रित अभिनय के ( इस कारिका में ) उद्देश्य क्रम द्वारा चारों भेद दिखलाकर उनको नाट्य का साधन उसी के सहारे नाट्य की स्थिति ( होनी ) दिखलायी है । अभिनय कला की रसाभि-को पूर्णरूप से हृदयंगम करने के लिये अभिनय के भेदोपभेदों व्यञ्जकता का समग्ररूप में ज्ञान अपेक्षित होता है । प्राचीन नाट्य एक अतिशय उन्नत ललितकलाओं का रूप था जिसकी आङ्गिक चेष्टाएँ नृत्य के सन्निकट तर होती थी । अभिनेतृगण के अंग संचालन लयात्मकता के साथ होते थे तथा इसी कारण उनसे सौन्दर्य की भी पर्याप्त अभिव्यञ्जना हो जाती थी और रस की भी । १०. भावों के अध्याय ( ना ० शा ० अध्याय ७ ) में सात्विक भावों का विवरण दिया जा चुका है अतः उनके साथ रखा जाने वाला अभिनय सात्विक अभिनय कहलाता है । स्वरभेदादि अनुभावों का प्रदर्शन ही सात्विक अभिनय कहलाता है । जिसका लक्षण है- ' सात्विकः स्वरभेदादेः अनुभावस्य दर्शनम् ' । ( इसका आवश्यक विवेचन प्रस्तावना में तथा नाट्यशास्त्र तृतीय भाग अध्याय २२ तथा २३ पर दृष्टव्य ) । ११. अंगाभिनय के तीन प्रभेद मुनि ने बतला कर अभिनय निरूपण का विवरण विस्तार से देना आरम्भ किया । सर्वप्रथम मुनि ने शारीर ( या आङ्गिक ) अभिनय के तीन भेद किये । ' शारीर ' अभिनय शाखा, अंग,

पृष्ठ 488

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ३७७ उपांग तथा प्रत्यंगों से प्रदर्शित किया जाता है । इनमें केवल उपांगों से होने वाला अभिनय ' मुखज ' कहलाता है तथा स्थान आसन आदि चेष्टाओं के द्वारा होने वाला ' चेष्टा कृत ' । नाट्यप्रयोग अपनी समग्रता के लिये शारीरिक अवयवों से सम्बद्ध रखा जाता है । इन शरीर के अवयवों के तीन प्रभेद होते हैं तथा इन्हीं से युक्त अभिनय रहता है जिसका विवरण अगली कारिकाओं में ( ८- १२, १३ ) दिया गया है । इन छः अङ्गों से युक्त ' नाट्य ' होता है । १२. कारिका में छः अंगों का मुनि ने विवरण दिया । अन्य मत ( अभि ० दर्प ० ) के अनुसार ग्रीवा को भी अतिरिक्त रूप में अंग माना गया है । १३. प्रत्यंग अर्थात् सहायक अवयव जो अंगों के जोड़ने वाले होते हैं – छः प्रकार होते हैं । इसके अतिरिक्त दोनों कलाइयाँ, दोनों कुहनियाँ, दोनों घुटने तथा ग्रीवा को भी प्रत्यंगों में परिगणित किया जाता है । उपांग अर्थात् अंगों के छोटे - छोटे भाग । ये प्रत्येक अंग में पृथक् पृथक् हैं । जैसे शिर के उपांग ( बारह ) हैं नेत्र, पलकें, पुतलियाँ, भौंह, कपोल, नासिका, हनु ( जबड़ा ) ओष्ठ, दन्त, जिह्वा, चिबुक तथा मुख ( चेहरा । अन्य मत से कन्धों को भी उपांग माना गया है । हाथों के उपांग है-कोहनी, कलाई तथा अंगुलियाँ । इसी प्रकार पैर के उपांग होते हैं-टखने, एडियाँ, अंगुलियाँ पैरों के तले आदि । मुनि ने अगली कारिकाओं के द्वारा इस समग्र अध्याय में अंग, उपांगों के अभिनय को विस्तार से समझाया है । १४. शाखा अंकुर, तथा नृत्त ये तीनों भी अभिनय ही होते हैं । इनमें आङ्गिक अभिनय को ' शाखा ' कहते हैं । शाखा में हस्तों की चमत्कार पूर्ण गति रखी जाती है कथित अर्थानुसारी ( या भावों के अभिव्यञ्जक ) उपयुक्त अभिनय के प्रस्तुतीकरण को अंकुर तथा शारीर अभिनय के अंकुर के द्वारा प्रदर्शित अर्थों को बतला कर आगे प्रस्तुत अर्थ की कल्पना करवा देना अर्थात् ' अंकुर ' के द्वारा प्रस्तुत अर्थ को आगे विस्तार देकर अगले अर्थों को भी प्रस्तुत करने का आधार बनाना ' सूची ' है । यही मत संगीतरत्नाकर का है जिसकी मूल कारिका टिप्पणी पृष्ठ ६ पर उद्धृत है । ( भरतानुमत शाखा, अंकुर तथा नृत्त का लक्षण इसी अध्याय की कारिका १५ पर है ) । १५. मुनि ने प्रस्तुत कारिका में शाखा, अंकुर तथा नृत्त का आंगिक अभिनय में रहने वाला स्वरूप बतलाया ।

पृष्ठ 489

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३७८ नाट्यशास्त्र १६-१८. उपांगों से होने वाले मुखज अभिनय में सर्वप्रथम ' शिरोभिनय ' का भरत मुनि विवरण देकर अभिनय निरूपण आरम्भ करते हैं । इसके तेरह प्रभेद होते हैं भरतमुनि सम्मत किन्तु आचार्य नन्दिकेश्वर ने मस्तक के नौ अन्य भेद भी बतलाये । यथा — सम, उद्वाहित, अधोमुख, आलोलित, धुत, कम्पित, परावृत्त, उत्क्षिप्त तथा परिवाहित । नाट्यशास्त्रसंग्रह में उद्वाहित नामक एक अतिरिक्त प्रभेद दिखलाते हुए मस्तकाभिनय के १४ प्रकार माने हैं । यहाँ नन्दिकेश्वर सम्मत मस्तकाभिनय के नौ प्रभदों के स्वरूप ( नाट्यशास्त्र से भिन्न होने के कारण ) विवरणसहित दिये जा रहे हैं । सममुद्वाहितमघोमुखमालोलितं धुतम् । कम्पितञ्च परावृत्तमुत्क्षिप्तं परिवाहितम् । नवां कथितं शीर्ष नाट्यशास्त्र - विशारदैः ॥ ( अ ० द ० ४६, ५० ) [ नाट्यशास्त्र के ( विज्ञाता ) आचार्यों ने मस्तकाभिनय के 8 प्रकार माने हैं । यथा १ सम, ( २ ) उद्वाहित, ( ३ ) अधोमुख, ( ४ ) आलोलित, ( ५ ) धुत, ( ६ ) कम्पित, ( ७ ) परावृत्त, ( ८ ) उत्क्षिप्त तथा ( ६ ) परिवाहित । ] इनके लक्षण तथा योजना भी ग्रन्थकार ने दी है जिसे अभिनयदर्पण ( के कारिका ४६ से ६५ तक के ग्रन्थ भाग में ) देखा जा सकता है । इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र संग्रह में भरतोक्त ' उद्वाहित ' माना है जिसका उल्लेख नन्दिकेश्वर ने भी किया था । किन्तु इसका लक्षण है " सकृदूर्ध्वं शिरोनीतमुद्वा हितमुदीरितम् ' " [ अर्थात् मस्तक के एक बार ऊपर उठाने या तान लेने को ' उद्वाहित ' शिर समझना चाहिये । ] योजना- " शक्तोऽहमिह कार्येऽस्मीत्यभिमाने प्रयुज्यते ” ॥ ( ना ० शा ० संग्र ० पृ ० ५१ ) [ इसका प्रयोग व्यक्ति के कार्य में समर्थ होने के साभिमान सामर्थ्य ख्यापन में किया जाता है ] अभिनयदर्पण में उद्वाहित का स्वरूप इसी से मिलता हुआ है । यथा— ' उद्वाहितं शिरो ज्ञेयमूर्ध्व भागोन्नताननम् " ( का ०५२ ) [ मुख को ऊपर उठाये हुए मस्तक को ऊँचा करते हुए रखना ' उद्वाहित ' कहलाता है ] योजना –'ध्वजे चन्द्रे च गगने पर्वते व्योमगामिषु । तुङ्गवस्तुनि संयोज्यमुद्रा हितशिरो बुधैः ॥ ( ५३ )

पृष्ठ 490

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय १ ३७ ९ [ ध्वज, चक्र, आकाश, पर्वत, आकाश स्थित तारागण एवं ऊपर स्थित वस्तु को देखने के भाव को दिखलाने के लिये ' उद्वाहित ' शिर की योजना की जाती है । ] १६- ३७. मुनि ने मस्तकाभिनय के अन्तर्गत उनके तेरह प्रभेद, लक्षण तथा उनकी योजना या विनियोग बतलाया । यद्यपि मस्तक द्वारा की जाने वाली क्रियाओं की कोई निश्चित संख्या या उनका अन्त नहीं है, इसी कारण इसके विषय में विभिन्न आचार्यों के मतों में विभिन्नता भी प्राप्त होती है । स्वयं मुनि ने भी सामान्य लोकप्रचलित क्रियाओं के अनुसार मस्तक की अन्य गतियों को भी प्रस्तुत करने में अपनी सहमति दिखलाई । ( द्रष्ट ० च ० ३६ पर ) ३८-४२. यहाँ मुनि ने रस की संख्या के अनुरूप ८ रसदृष्टियाँ तथा स्थायी भावों की संख्या के अनुरूप ८ स्थायी दृष्टियाँ बतला कर शेष बीस संचारी दृष्टियों का विवरण किया है, जो सब मिल कर ( 5 + 5 + २० = ३६ ) छत्तीस होती हैं । इन सभी दृष्टियों के स्वरूप तथा उनकी योजना ( या प्रयोगविधि ) भी साथ साथ दिखलाई गयी है । अभिनयदर्पण में दृष्टियों के केवल आठ प्रकार ही बतलाये हैं । ४३-६५. रसादि दृष्टियों के साथ साथ भाव एवं सञ्चारीभाव जन्य दृष्टियों का सलक्षण निरूपण किया गया जिसमें सभी के लक्षण तथा योजना भी ( दिखलायी गयी ) है । अंगोपाङ्गों में दृष्टि का महत्व असाधारण होता है इसी कारण दृष्टि का विवरण बारीकी से देकर उसकी विस्तृत पर्यालोचना भी की गयी है । दृष्टि मनुष्य के आन्तरिक भावों की सूचक होने से भाषा * भी है तथा भावभङ्गिमाओं की अभिव्यक्ति का द्वार भी जिनसे रसाभिव्यक्ति संभव होती है । ६५-६६. मुनि ने दृष्टि के विवरण के साथ साथ ताराकर्म को भी बतलाया जो पुतलियों की क्रियाएँ होती हैं । इनके नौ कार्य के उल्लेख के -साथ ( उनकी क्रियाओं के ) लक्षण तथा योजना भी दी गयी । ६७-१०३. इस क्रम में ताराकर्म के प्रत्येक प्रभेद के स्वरूप विवरण तथा उनकी रस एवं भावादि में अभिनय योजना भी दी गयी है । १०४ - १०८. मुनि ने दर्शन विधान भी दिया है जिसमें नेत्रपुटों के हलन चलन के द्वारा अवलोकन के आठ प्रकार दिखला कर उनके स्वरूप दिखलाये ।