भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 491–500
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 491–500
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३८० नाट्यशास्त्र १०६ - ११६. यहाँ मुनि ने पलकों के ९ प्रभेद दिखलाते हुए उनकी अभिनय योजना दिखलाई । ११७-१२७. इसी क्रम में भ्रुकुटी की क्रियाओं को दिखलाते हुए उसके सात प्रभेद दिखला कर उसके लक्षण दिखलाये तथा अभिनय योजना भी । १२८ - १३४. नासा ( नासिका ) के कर्म को दिखलाते हुए उसके छः प्रकार, उनके स्वरूप तथा अभिनय योजना को दिखलाया गया है । १३४-१३६. कपोल कर्म के छः प्रकार, उनके लक्षण तथा उनकी अभिनय योजना है । १३६-१४४. अधर के छः कर्म तथा उनके लक्षण एवं अभिनय योजना । १४५ - १५१. चिबुक के सात कर्म, उनके लक्षणों के साथ - साथ मुखस्थ दाँतों की क्रियाओं का विवरण एवं इनकी अभिनय योजना को भी बतलाया गया है । १५१ - १५६. मुखज कर्म के छः प्रभेद दिखला कर उनके लक्षण एवं अभिनय योजना बतलायी गयी है । १५६ - १६४. मुखज कर्म के विवरण से लगे हुए ' मुखराग ' का विवरण दिया गया है । मुखराग का अभिनय के अन्तर्गत विशेष महत्व होता है तथा भाव एवं रस के सन्दर्भ में अभिनेता के लिये मुखराग का प्रदर्शन अत्यन्त आवश्यक रहता है । आङ्गिक अभिनय का मुखराग द्वार माना जाता है । वेमपाल ने भरतोक्त मुखराग के चार प्रभेदों के अतिरिक्त विकस्वर, अरुण, मलिन तथा पाण्डु नामक अन्य चार प्रभेद भी बतलाये हैं ( द्रष्ट - भरतकोष पृ ० ४ ९ ६ ) | नेत्रादि के अभिनय के साथ साथ मुखराग की योजना नाट्यप्रयोग की स्थिति में आधार रहती है तथा यही प्रयोग की सिद्धि का मूल माना जाता है क्यों कि मुखराग ही दर्शक को पात्र की सुख, दुःखमयी स्थिति प्रकट करता है । १६८ - १७६. मुनि ने अन्त में ग्रीवा के नौ कर्म, उनके स्वरूप तथा अभिनय योजना के दिखला कर ' उपाङ्गविधान ' को सम्पूर्ण किया । ग्रीवा कर्म शिर के आधार होते हैं परन्तु समग्र उपांग विवरण में सभी अंगों का सन्निवेश रहने से यथावश्यक सभी का विवरण पूर्णतः रखकर मुनि ने अगले अध्याय में प्रस्तुत किये जाने वाले अंगों का संकेत भी दिया ।
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नवम अध्याय ( हस्ताभिनय ) १-२ हस्त आदि शरीर अवयवों का कर्म इस अध्याय का प्रतिपाद्य है | यहाँ ( २ ) कारिका अर्थ होगा इन अंगों का उपयोग या योजना जिससे हो वह ' विनियोग ' कहलाता है । जैसे पताक हस्त का अग्निधारा ( ज्वाला ) के दर्शनार्थ प्रयोग करना । इसी प्रकार ' तत्वत: ' शब्द का आशय नाट्य-वस्तु के अनुसार या अनुरूप । ३. हस्त आदि कर्मों की पीठिका बतलाते हुए उनके ठीक उपयुक्त अभिनयादि का विवरण देने की मुनि उद्देश्य कथनार्थं सूचना देते हैं । अभिनवगुप्तपाद ने कारिकास्थ अभिनय की इति कर्तव्यता पर विचार किया । अभिनय की इस इतिकर्तव्यता के आरम्भ में दो प्रभेद होते हैं-लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी । इनमें प्रथम ( लोकधर्मी ) इतिकर्तव्यता के भी दो प्रभेद हो जाते हैं । जैसे निर्वेद प्रभृति चित्तवृत्तियों ( भावों ) को व्यक्त करने वाले अनुभावों की इतिकर्तव्यता - जैसे गर्व के अभिनय में पताक हस्त को ललाट पर उठाते हुए स्थित करना । दूसरी है केवल बाह्य अवयव-गत इतिकर्तव्यता -जैसे पद्मकोश हस्त के द्वारा किसी पदार्थ को दिखलाने का कार्य । इन सभी का नाट्य में प्रयोग होता है । हस्तमुद्राओं के विषय में विस्तार से भरतमुनि ने सभी तथ्यों को दिखलाया है जिनका यथावसर आगे आशय स्पष्ट किया जाएगा । ४ -०. आङ्गिक अभिनय में हस्ताभिनय का महत्व अतिशय एवं सर्वोपरि है । इसी कारण इस पर नाट्यशास्त्र में एक स्वतन्त्र अध्याय ही रखा गया है । यही वह माध्यम है जो आन्तरिक भावों को स्वरूप प्रदान कर उन्हें रसभूमि तक पहुँचाता है । अतएव प्रत्येक मुद्रा अपने मूल में भाव तथा रस की प्रेरणा लिये रहती है तथा हस्ताभिनय का विशिष्ट आधार लेकर प्रस्तुत नाट्य-प्रयोग को सफल बनाती है । इसी कारण भरतमुनि ने हस्तमुद्राओं का विशद विवरण दिया है । असंयुक्त हस्तों के चौबीस प्रभेद होते हैं जिनका भरतमुनि ने यहाँ उल्लेख किया । आचार्य नन्दिकेश्वर ने अभिनय दर्पण में असंयुत हस्त मुद्राएँ २८ बतलाई हैं । इनके स्वरूप तथा इनकी योजना आदि के विशिष्ट तत्वों को यथास्थान हम यहाँ संक्ष ेप में देने का उद्योग करेंगे जहाँ
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३८२ नाट्यशास्त्र भरत मुनि से विशिष्ट या विभिन्न स्वरूप हों । [ संक्षिप्त टिप्पणी पृष्ठ ३७, ३८ तथा ३६ पर दी ही जा चुकी है । ] ८-१०. अञ्जलि आदि हस्त संयुक्त ही होते हैं परन्तु कभी कभी पताकादि का प्रयोग भी संयुतत्व युक्त रखा जाता है । आशय यह कि अञ्जलि आदि हस्तमुद्राएँ बिना संयुत हुए अपने स्वरूप तथा अर्थ की ही बोधक नहीं हो सकतीं । ११-१६. अभिनय के उपयोगी संयुत तथा असंयुक्त हस्तों के साथ ही नृत्तहस्तों का भी विवरण अपेक्षित है । ये अभिनेय अर्थ में विश्रान्ति को अधिक फैलाकर प्रभावी बनाते हैं तथा शाखा एवं अंकुर के अभिनय की पूर्ति करते हैं । ये कभी संयुक्त रूप तथा कभी असंयुक्त रूप का उपजीवन रखते है तथा इनमें से किसी एक का भी प्रयोग किया जा सकता है । मोटे तौर पर इनका प्रयोग नृत्त में रहता है परन्तु मुनि ने इनकी नाट्य अभिनय में भी योजना रखने की सहमति दी है । १७-१८. पताक ( हस्त ): कारिका में प्रयुक्त ' कुञ्चित ' शब्द का यहाँ अंगूठे से सम्बन्ध है । कुञ्चित पाद का आगे लक्षण दिया गया है उसी की क्रिया के अनुसार अंगूठे को कुञ्चित अर्थात् तिरछा कर देना चाहिए । इस हस्त को ' पताक ' इसी लिये कहा गया कि यह पताका ( ध्वज ) के आकार जैसा रहता है । जैसी अपेक्षा हो तदनुसार इनका विनियोग रखा जाता है । हस्तमुद्रा में प्रथम एवं महत्वपूर्ण यही पताक हस्त माना जाता उपयोग व्यापक रूप में होता है । अभिनयदर्पण में ' पताक ' के है जिसका स्वरूप में अंगुलियाँ सटा कर रखते हुए फैलायी जाती है तथा अंगूठा मोड़ कर तर्जनी के मूल में लगाया जाता है १६-२७. भरतमुनि ने ' पताक ' हस्त की योजना का विशद विवरण दिया है । ' पताक ' हस्त से सूचित शेष अर्थ एवं कार्य को चित्राभिनय ' में ( अध्याय २६ ) भी दर्शाया गया है । इतना होने पर भी इसके नाट्याचार्यो की परम्परा में अनेक स्थिति में विविध प्रयोग होते हैं । भरतमुनि ने इसके एक हाथ को तथा दोनों को शरीर के विभिन्न अवयवों के साथ रखते हुए तथा अन्य क्रियाओं के द्वारा अभिनेय वस्तु एवं अर्थों की सूचकता को दिखलाया । अभिनयदर्पणकार ने इसके द्वारा किये जाने वाले अभिनय से सूचित या अभिव्यक्ति वस्तु एवं कार्यों को विशदरूप में दिखलाया है । तदनुसार इसका उपयोग अभिनय - प्रयोग के आरम्भ में किया जाता है । इसके अतिरिक्त
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय २ ३४३ जल से भरे मेघ, वन, वस्तु के निषेध, कुचस्थल, रात्रि, नदी, स्वर्गलोक, अश्व, वस्तु के विभाजन, वायु की गति शयन जाने के लिये प्रयत्न करना, साहस, प्रसन्नता, चाँदनी, कड़ीधूप, दरवाजा खोलना, लहरें, सातों विभक्तियों का संकेत, मार्गगमन, समानता, अंगराग का सेवन या रचना करना, आत्म - प्रकाश, शपथ ग्रहण, चित्त को शान्तरूप में रखना, तालयन्त्र, ढाल, तरल वस्तु का स्पर्श करना, आशीर्वाद, राजरुचि का प्रदर्शन, ' यहाँ ' ' वहाँ ' का कथन, समुद्र, दान या पुण्य करना, सम्बोधन, आगे बढ़ना, तलवार रखना, सम्मार्जनी से सफाई करना तथा मास दिन और वर्ष को दर्शाने जैसे भावों में भी ' पताक ' हस्त का प्रयोग किया जाता है ( अभि ० द ० ९४-१०० ) ' नाट्यशास्त्रसंग्रह ' में पताक हस्त की योजना इस प्रकार है-किसी वस्तु के स्पर्श करने, किसी को चाँटा लगाने, ध्वज जैसी वस्तु को दिखलाने या ताली बजाकर ( गीतादि की ) ताल देने ऊपर उठनेवाली ज्वालाओं को दिखलाने के लिये अंगुलियों को हिलाते हुए ऊपर उठा कर तथा इसी प्रकार उँगलियों को नीचे की ओर रख कर ' पताक ' हस्त को आन्दोलित कर जलधारा या पानी की लहर या तरल पदार्थ को दिखलाया जाता है । कटिप्रदेश पर ' पताक ' हस्त रख कर पक्षियों के पक्षों को दिखलाया जाता है. ' पताक ' हस्त को ऊपर उठाकर किसी पदार्थ की ऊँचाई पर स्थिति दिखलाई जाती है तथा नीचे कर ( एक दूसरे के सम्मुख ) आन्दोलित करते हुए ' मृदंगवादन ' दिखलाया जाता है, किसी पदार्थ के ऊपर उठाने या फेंकने को दर्शाने के लिये कटि प्रदेश से ' पताक ' हस्त को ऊपर उठाया जाता है । अपने मुख के सामने पताक हस्त को सामने की बाजू से उठाकर रखते हुए किसी मनुष्य या पदार्थ को जो वक्ता का सामना कर रहा हो दिखलाया जाता है तथा पताक को एक ओर रखकर हिलाते हुए किसी वस्तु या कार्य का निषेध दिखलाया जाता है । पताक हस्तों को एक दूसरे से शीघ्रता से रगड़ते हुए रख कर तथा एक दूसरे के ऊपर रख कर किसी वस्तु का प्रक्षालन या धोना दर्शाया जाता है तथा सामने की ओर धीरे - धीरे घर्षण कर इसी मुद्रा के द्वारा किसी वस्तु का साफ करना या पीटना बतलाया जाता है । इसी प्रकार पताक हस्त को एक दूसरे के ठीक सामने रख कर फिर उन्हें दूर हटाकर किसी शिला के उखाड़ने या किसी भारी ( वजनदार वस्तु को उठाने का कार्य दिखलाया जाता है । इसी प्रकार पताक हस्त को ऊपर उठा कर अंगुलियों को हिलाते हुए रखकर इसके द्वारा वायु तथा लहरों के वेग को दिखलाया जाता है ( द्रष्ट ना ० शा ० सं ० - का ० ६६-१०५ ) ।
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३८४ नाट्यशास्त्र २७-३७. त्रिपताक ( हस्त ): इस हस्त का लक्षण सभी नाट्य-शास्त्रीय ग्रन्थों में प्रायः समान मिलता है । भरत मुनि ने इससे सूचित भाव तथा कार्यों को विस्तार से दर्शाये हैं । ' अभिनय - दर्पण ' में त्रिपताक की योजना या विनियोग का विवरण अल्पमात्रा में प्राप्त है । यथा इस हस्त के उपयोग के द्वारा मुकुट, वृक्ष, वज्र, इन्द्रदेवता, केतकीपुष्प, दीपक, अग्नि की ज्वालाएँ, जम्हाई लेना, कपोत, पत्रलेखा, बाण तथा परिवर्तन ( पीछे मुड़ने ) के भावादि को दिखलाया जाता है | ' नाट्यशास्त्रसंग्रह ' में भरतोक्त संकेतित पदार्थ तथा कार्यादि को दिखलाने के लिये त्रिपताक हस्त के प्रदेश एवं क्रियाओं का विवरण भी दिया गया है जो अधिकांश नाट्यशास्त्र के विवरण से समानता लिये हुए हैं । यथा — इस त्रिपताक हस्त से दधि तथा अन्य मांगलिक वस्तु का स्पर्श दिखलाया जाता है । इसी प्रकार किसी का बुलाना बतलाने के लिये त्रिपताक हस्त की दोनों अंगुलियों को पीछे हटा सिकुड़ा कर एक दूसरे के सम्मुख झुका देना चाहिए । किसी बात की उपेक्षा या विचार भेद दिखलाने के लिये या किसी पदार्थ को दूर फेंकने ( के भाव को दिखलाने ) की स्थिति में दोनों उगुलियों को सामने की ओर फेंक कर हस्त तल को एक ओर रखना चाहिए । किसी पूज्यजन को नमस्कार करने का भाव दिखलाने के लिये त्रिपताक हस्त के सामने की बाजू में एक दूसरे को सामने रख मस्तक पर रखा जाता है । किसी दूसरे के चेहरे को ऊपर उठाने में कर अंगुलियों को ऊपर फैला कर ' त्रिपताक ' का प्रयोग किया जाता है । दोनों को क्रमशः झुका कर और ऊपर उठाते हुए ' सन्देह ' परन्तु दोनों अंगुलियों दिखलाया जाता है । इसी प्रकार मस्तक पर पगड़ी या मुकुट के धारण करने में ' त्रिपताक ' हस्त को मस्तक पर हस्ततलों को नीचे की ओर घुमाते हुए दिखलाया जाता है किन्तु मुकुट की स्थिति में केवल उसकी मस्तक पर स्थिति ही रखी जाती है । त्रिपताक हस्त को नासिका, मुख या कान पर रख कर क्रमशः अनिष्ट गन्ध, अनिष्ट वचन या अनिष्ट शब्द को दिखलाया जाता है । छोटे पक्षियों, बहती जलधारा तथा हवा को दिखलाने में त्रिपतोक को कटि प्रदेश के बराबर ऊपर नीचे तथा बाजू में अंगुलियों को हुए रखना चाहिए । आँसुओं के निकलने और उन्हें पोछने में आँख चलाते को लेजाकर नीचे की ओर जाती हुई अनामिका के समीप त्रिपताकहस्त पर तिलक लगाने की स्थिति दिखलाने के लिये दिखलाई जाती है । मस्तक त्रिपताक हस्त को ललाट पर ला कर वहाँ अनामिका से स्पर्शकरवाया जाता
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ३८५ है तथा केशों के संस्कार को दिखलाने के भाव में त्रिपताक हस्त को स्थान पर अनामिका के साथ रखा जाता है । ३८-४१. कर्तरीमुख ( हस्त ): - कर्तरीमुख के लक्षण में मूल कारिका में प्रयुक्त ' पृष्ठावलोकिनी शब्द का आशय है कि तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलियाँ परस्पर संश्लिष्ट नहीं होना चाहिए तथा मध्यमा के पीछे तर्जनी दिखलाई पड़ना चाहिए । ' कर्तरीमुख ' का कैची के जैसा ही रूप अभिनय द्वारा दिखलाया जाता है । इसकी योजना के प्रसंग में आवश्यकता-नुसार कर्तरीमुख को अधोगमन या नीचे मुँहवाला और पृष्ठावलोकनशील रख कर उसके चलन हलन को सूचित किया गया है । जैसे तर्जनी का मध्यमा के पीछे फैलाना पृष्ठावलोकन होता है, उसके विपरीत मध्यमा का तर्जनी के पीछे जाना रूप चलन भी और फिर अपने स्वरूप की प्राप्ति करना अर्थात् मध्यमा के पीछे तर्जनी का फैल जाना । यह क्रिया भी इसी के द्वारा अभिनीत की जा सकती है, परन्तु अर्थानुसार ही । आशय यही है कि युक्ति के द्वारा कभी मिलना, फिर दूर हटना, कभी उलटे हो जाना और कभी एक दो बार या तीन बार भी किसी ' हस्त का प्रयोग किया जा सकता है । ' अभिनयदर्पण ' में कर्तरीमुख का लक्षण भिन्न है तदनुसार त्रिपताक हस्त में कनिष्टिका को टेढ़ी झुका कर तर्जनी और कनिष्टिका को बाहर की और सीधे फैला दिया जाए तो कर्तरीमुख हस्त हो जाता है । इसकी योजना स्त्री पुरुष के वियोग या विवाद, परिवर्तन या प्रतिकूलता, लूटखसोट, नेत्र का कोना, मृत्यु, भेदभाव, बिजली की चमक, विरहावस्था में अकेले शयन, गिरना तथा लता आदि के भावों को दिखलाने में की जाती है । ( अभि ० द ० १०५ - १०७ ) नाट्यशास्त्र संग्रह में ' कर्तरीमुख ' का भरतोक्त लक्षण से थोड़ा मिलता हुआ लक्षण है । तदनुसार महावर से पैरों को रंगने, किसी वस्तु के गिरने को दिखलाने के लिये इसी हस्त को तर्जनी के स्थान पर मध्यमा तथा मध्यमा के स्थान पर तर्जनी को रखते हुए की जाती है । इसके अतिरिक्त अधोगत हस्त को ऊपर की ओर उठा कर देखा जाए तो लेख, पत्र या किसी पुस्तक के पढ़ने का भाव दिखलाया जा सकता है । ( ना ० शा ० सं ० ११६-११७ ) ४२-४४. अर्धचन्द्र ( हस्त ): - इसमें अंगूठा धनुष जैसा झुका हुआ रहता है किन्तु अंगूठा बाहर सीधा फैल जाने से उसका मिलकर छोटा रहना नहीं हो सकता । यहाँ योजना की कारिका ४३ में “ मध्यौपम्य " शब्द है-२५ ना ० शा ० द्वि ०
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३८६ नाट्यशास्त्र है कटिप्रदेश की कृशता । ' पीन ' के स्थान पर कहीं ' पान ' पाठ उसका अर्थ होगा चषकादि पानपात्र । ' अभिनयदर्पण ' माना गया है । तब ' पान ' का अर्थ पर ' अर्धचन्द्र ' ' पताक हस्त मुद्रा में अंगूठे कों बाहर सीधे फैलाने के अनुसार कृष्णपक्ष की अष्टमी का अर्धचन्द्र, हाथ से हस्त हो जाता है । इसके द्वारा, देवता का किसी के गले को ढकेलना ( गलहस्त ), भाले से युद्ध करना , पान, उद्भव, कटि, चिन्ता, मननं, ध्यान, प्रार्थना, अभिषेक, भोजन का भाव प्रदर्शित किया जाता है । अंगस्पर्श तथा प्राकृतजन को नमस्कार में दिया है । में अर्धचन्द्र के स्वरूप को दूसरी शब्दावली नाट्यशास्त्रसंग्रह एक दूसरे के साथ मिली हों और अंगूठा तदनुसार — ' यदि चारों अँगुलियाँ बना ले तो अर्धचन्द्र ' दूसरी ओर गोलाकार बनाते हुए चन्द्रलेखा का आकार दिखलाने में की हो जाता है ' । इसकी योजना ऊपर स्थित ' बालचन्द्र ' को हस्त को बतलाना हो तो हाथ को ऊपर की ओर ले जाया जाए । यदि छोटे वृक्ष तथा मध्यभाग की कृशता खेद में इसी हस्त को कपोल पर रख कर जाय, को सामने की ओर मिला कर हटाते हुए दर्शाया जा को बतलाने में हस्तों सकता है । ( ना. शा. सं. ११४- ११५ ) । ( हस्त ) - कारिकास्थ " आद्य " शब्द का अर्थ है प्रथम ४५-५१. अराल लेकर शेष अँगुलियाँ पूर्व अंगुली के साथ या तर्जनी अंगुली । इसमें मध्यमा से क्योंकि ' अराल - पक्ष्मणः ' पीछे लगी हुई रहती हैं । अराल का अर्थ है ' कुटिल ' अराल का अर्थ वक्र होता है । कारिकास्थ गांभीर्य वह पदार्थ है इत्यादि में एवं भय प्रभृति भावों की दशा में भी आकार पर जिसके प्रभाव से हर्ष, शोक का हृदय, बाजू, आगे उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखती हो । अरालहस्त से घूमते हुए आने या चलने का प्रयोग युक्ति के साथ की ओर चंचलता चाहिए । संग्रह पद का अर्थ है केशों ( नाट्याचार्य के द्वारा करवाया जाना देना । ' सर्वाङ्गिक ' शब्द का बाँधना तथा उत्कर्ष का अर्थ है उन्हे खोलकर जमा । ' सम्प्रयोग ' से आशय है कि उसे उस बाजू से अपनी ओर लाना या प्रत्यागमन के संश्लेष होना, जो अंगुलियों के अगले भाग में स्वस्तिक का अर्थ है मात्र एक बाजू से दूसरी बाजू घूमते हुए वर्तुलाकार योग से होता है । परिमण्डल = में बाहर की । आह्वान में अंगुलियाँ नीचे गिरती हुई और निवारण में भ्रमण रखनी चाहिए । त्रिपताक हस्त से जो आवाहन, ओर फेंकी जाने वाली हस्त से भी दिखलाये जा अवतरण आदि भाव अभिनीत होते हैं वे अराल प्रयोग से जिन हस्तों या अंगों के द्वारा प्रयोग में सौन्दर्य सम्पत्ति सकते हैं । जिस
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ३८७ आती हो तो स्त्रियों के द्वारा उनकी वैसी योजना अवश्य करनी चाहिए । इसका आशय यह नहीं कि स्त्रियों के द्वारा प्रस्तुत अभिनय में त्रिपताक हस्त न हो और ऐसी दशा में अराल हस्त रहे । परन्तु परम्परा यह है कि पुरुषों के द्वारा प्रस्तुत अभिनय में त्रिपताक के स्थान पर सर्वत्र अराल हस्त के प्रयोग नहीं किये जाएँ । अभिनयदर्पण में अराल का अल्प विवरण ही प्राप्त होता है । तदनुसार यदि पताकहस्त में तर्जनी मोड़ दी जाए तो अरालहस्त हो जाता है । जिसकी योजना विषपान, अमृत - पान, प्रचण्ड पवन के चलने जैसे भावों को प्रदर्शित करने में की जाती है । नाट्यशास्त्र संग्रह में तथा अन्यत्र विवरण भरत प्रदर्शित ही रखे गये हैं, विशेष कुछ भी नहीं । ५२-५३ शुकतुण्ड हस्त: - कारिका में स्थित ' तु ' शब्द अरालहस्त की तर्जनी से इस हस्त की विशेषता दर्शाने की भावना से रखा गया है तथा दूसरी बार ' तु ' का अर्थ ' अपि ' होगा । ' न तुम न मैं ' इत्यादि निषेध में इस हस्त का अभिनय होता नहीं है किन्तु अर्थना, ईर्ष्या, प्रणयकलह में जब ' तुम नहीं, मैं इसे ' नहीं ' जैसे भाव को दर्शाना हो तो इस हस्त का प्रयोग होना चाहिए । सावज्ञ तिरस्कार या विसर्ग ( बिदाई ) की दशा में प्रयोग के अनुसार एक या दो बार इस हस्त का प्रयोग किया जाता है । कभी - कभी निन्द्रा ( आत्म धिक्कार ) के अर्थ में भी इसी हस्त की योजना रखी जाती है । अभिनयदर्पण में इस हस्त की योजना बाण चलाने, बर्फी, भाला मारने अपने निवास स्थान का स्मरण, मार्मिक या रहस्य भरी बात कहने तथा उग्र भाव के प्रदर्शन में की जाती है । नाट्यशास्त्रसंग्रह के अनुसार नाट्य-शास्त्र के विवरण का ही अनुमोदन है । केवल उपर्युक्त अर्थों के अतिरिक्त द्यूत और अक्ष फेंकने में भी इसी हस्त की योजना का विशेष उल्लेख है । ५४ - ५५. मुष्टि हस्त: -लक्षण कारिका के ' संज्ञित शब्द से आशय यह है कि लोक में भी इसी प्रकार मुष्टि प्रसिद्ध है । व्यायाम पद के द्वारा कुश्ती के समय, खङ्गयुद्ध के अवसर पर मुष्टि हस्त का प्रयोग किया जाता है । ' निर्गम ' शब्द से गीली वस्तु या गीले कपड़े को निचोड़ने में, ' पीडन ' अर्थात् गौ, महिषी जैसे पशुओं के दोहन में, असियष्टि शब्द का आशय तलवार आदि से लेकर छुरी आदि मूठवाले शस्त्र ग्रहण का इसी के द्वारा अभिनय किया जा सकता है । आदि शब्द से किसी के मारने या मार्जन ( सफाई करने ) में भी इसी हस्त का प्रयोग किया जाता है । नाट्यशास्त्र संग्रह में इस के द्वारा दौड़ना तथा विभिन्न युद्धों के करतब दिखलाने की
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३८८ नाटयशास्त्र का विशेष उल्लेख है । मल्लयुद्ध की स्थिति में दोनों हाथों के द्वारा योजना मुष्टि हस्त का प्रयोग होना चाहिए । . शिखर हस्त: -धनुष की डोरी आदि धारण करने की ५६-५७ हस्त को उत्तान और पार्श्वगामी हस्त को अधोमुख स्थिति में इस उर्ध्वगामी हुए और अधोमुख को बाजू में करते हुए या उत्तान हस्त को ऊपर ले जाते अभिनय किया जाए । ' आलक्तकोत्पीडने चैव ' के अनुसार अर्थ ले जाकर करने में । बालकों के कपोल को मुष्टि है— महावर लगाने तथा उत्पीडन पर ' उत्पीडन ' दर्शाया जा हस्त के हाथ के अंगूठे और तर्जनी से दबाने की योजना-सकता है । ( अभि ० आ ० ) ' अभिनयदर्पण ' में इस हस्त , स्तम्भ, निश्चय, पितृकर्म, ओठ पर दाँत गड़ाने, शिव कामातुरता, धनुष, स्मरण, अभिनय कर्म की समाप्ति, करधनी लिंग पूजन, निषेध वाक्य कथन के भाव व्यक्त करने में की खींचने, आलिङ्गन करने तथा घण्टानाद करने जाती है । ( अभि ० द ० ११८-१२१ ) . कपित्थ हस्त: इस हस्त में अंगुष्ठ तथा तर्जनी का कार्य ५८-४६ प्रदर्शन में । कार्य पद से ' सत्कर्म ' अर्थ लिया जा सकता रहता है अभिनय इसी से सूचित होते हैं । अभिनय दर्पण है तथा चुटकी बजाने के कार्य भी ताल धारण, गौदोहन, अंजन में इसकी योजना - लक्ष्मी, सरस्वती, नटों द्वारा कौतुकादि के अवसर पर पुष्पधारण, कंचुकी या आंचल लगाना, क्रीडा से अर्चन करने के भाव में — की जाती पकड़ने, घूंघट निकालने और धूपदीप है । ( अभि ० द ० १२१-१२४ ) का हस्त: - कारिका में प्रयुक्त ' सकनीयसी ' पद ६०-६३. कटकामुख में थोड़ी दूरी रहनी चाहिए, अर्थात् आशय है कि अनामिका और कनिष्ठिका धातु है जिसमें भूख, दोनों संश्लिष्ट न रहें । खट् कांक्षायाम् भ्वादिगणीय अर्थ में वुन् प्रत्यय होकर ' खटक ' ( या कटक ) शब्द बनता तृषा या पिपासा है । अग्नि में हव्य जिस पात्र से है । यह ' खटकामुख ' हस्त की व्युत्पत्ति किया जाता है । छोड़ते हैं उस स्रुक् स्रुवादि का अभिनय उत्तान हस्त के द्वारा से हव्य, आज्य आदि का अभिनय होता है । लगाम खींचना अभिमुख हस्त नियंत्रण करने में उपयुक्त होती है और इसका अश्व की गति रोकने या से किया जाता है तथा अभिनय परिकर्षण या खींचने वाले इसी हस्त रखे गये हिलते हुए हाथों को रखा जाता है । आदर्श का धारण सम्मुख है । नर्तकी इसके द्वारा ' मैं सुन्दर हैं इस प्रकार की आकृति हस्त से होता
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ३८ ९ देखने का अभिनय करती है । चन्दन पीसने का अभिनय दोनों भागों में गोलाकार या चक्राकार हस्त को घुमाते हुए होता है । इस हस्त से विवाह में वधू के वस्त्र प्रान्त को सम्हालने या उसके आलम्बन का अभिनय किया जाता है । प्रायः कुपिता नायिका के प्रसादन में अनुसरण के समय इसी हस्त द्वारा उसके आंचल के कोने को पकड़ा जाता है । क्रीडाकाल में केश के आकर्षण का भी तथा पुरुषों के उत्तरीय थामने या पकड़ने का भी इसी हस्त के द्वारा अभिनय होता है, परन्तु स्त्रियों के उत्तरीय पकड़ने का अभिनय सहज होगा । इस प्रकार इस हस्त का चतुरस्र या सभी दशाओं में उपयुक्त अभिनय संयोजित हो सकता है । अभिनयदर्पण के अनुसार इसका लक्षण है— जिसमें उठी हुई तर्जनी और मध्यमा अंगूठे के अग्रभाग को छूती हो तो ' खटकामुख ' हस्त होता है । इसकी योजना – फूल चुनने, मोतियों की या पुष्पों की माला धारण करने, धनुष को मध्य भाग से पकड़ कर खींचने, ताम्बूलादि प्रदान करने, कस्तूरी, चंदन आदि को पीसने, वस्तु सुगन्धित करने, बोलने या देखने के भाव में की जाती है । ( अभि ० द ० १२४-१२७ ) ६४ -७७. सूचीमुख हस्त: - इस हस्त का मुख सूची के आकार का होने से ' सूचीमुख ' नाम सार्थक है । प्रदेशिनी का अर्थ है ' तर्जनी ' । इस की विविध दशाओं के कारण इसके अभिनय भी विविधता सम्पन्न होते हैं । लोला का अर्थ है एक बाजू से दूसरी बाजू में जाने वाली । ' कम्पिता ' वह है जो उसी स्थान पर हिलती हुई रहे । अभिनय के अनुसार चलने वाली ' चला ' चक्र के अभिनय में प्रदेशिनी को ऊर्ध्वमुख रख एक बाजू से दूसरे बाजू तक चक्कर लेती हुई ले जाना चाहिए । मीन के अति बालोरग का उपादान यह सूचित करता है कि मीन तथा बाल सर्प की गति एक दूसरे से विलक्षण है । इसी प्रकार वल्ली, लता और मञ्जरी के अवान्तर भेदों की बारीकी भी ध्यान में रखी जाए । जैसे — ककडी, लौकी की वल्ली, अंगूर दाख आदि की लता, आम की मञ्जरी होती है । ' प्रणता ' और ' उन्नता ' का आशय है पहिले झुकी हुई और फिर ऊपर को जाती हुई तथा लम्बाई में ऊँची होने वाली । रोष दिखाने में और पसीना पोंछने में या मस्तक से पसीना हटाने में तर्जनी को फैलाई हुई रखते हैं । अहंकार के अभिनय में ललाट पर तर्जनी को करना चाहिए । प्रत्यक्ष शत्रु के निर्देश में तर्जनी अग्रभाग में नत रखी जाती है । शत्र के अनुसन्धान या खोजने का अभिनय तीन अंगु