भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 501–510
भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 501–510
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नाट्यशास्त्र ३ ९ ० दिशा में जाने वाली हिलाकर किया जाता है । सामने और विरुद्ध जाता है । यह लियों को तर्जनी से दिन की समाप्ति को दिखलाया किया, दोनों हाथों की से महेश्वर और शक्र का अभिनय भी लोक में प्रचलन है कि मध्यमा शास्त्रानुमोदित है । ( अ ० किन्तु इसको ' तर्जनी ' से दिखलाना ही भरत सदृश विस्तीर्ण नहीं जाए में सूचीमुखहस्त का विवरण, परब्रह्म की भा ० ) अभिनयदर्पण की योजना एकार्थं बोध है । इसके अनुसार सूचीमुख हस्त, ' अच्छा है ' कहना, ' जो ' और ' वह ' भावना, शतार्थ बोध, सूर्य, नगरी, संसार, आश्चर्य, वेणी, छत्र, , ताड़न, दुर्बलता, सलाई, शरीर का चक्र, बतलाना, नीरवता, भेरी वाद्य वादन, कुम्भकार सामर्थ्य, दोनों हाथ, रोमावली की जाती है । ( अभि ० द ० विवेचन तथा सन्ध्याकाल में पहिया, विचार १२७ से १३१ ) में ' ऊर्ध्वा ' का अर्थ होगा ७८-८१. पद्मकोष हस्त: - लक्षण कारिका - अलग हुई हों और ऊपर की ओर उत्तान स्थिति में अलग विनत हो । चारों अंगुलियाँ तरह जिसका अभ्यन्तर स्थान सिकुड़ी हुई हों तथा पद्म की के ग्रहण में वे ही अंगुलियाँ पर्व अर्थात् हथेली में गड्ढा बन जाए । बिल्वादि हुई ) रखी जाती हैं । पुष्पप्रकर के अगले भाग में अतिशय कुञ्चित ( सिकुड़ी को विखेरना । अभिनय-होगा आगे आगे दो या तीन बार पुष्पों के गोल उरोज, का अर्थ की योजना बिल्वफल, युवतिजन दर्पण के अनुसार इस हस्त, आम्रफल, पुष्पस्तवक, भँवर या घुमाव, गेंद, पतीली, भोजन, पुष्पकली तथा अण्डे आदि भाव पुष्प, घण्टा, बाँबी ( बल्मीक ), कमल मंजरी, जपा है । ( अभि ० द ० १३४-१३७ ) प्रदर्शन में की जाती : - इसमें सभी अंगुलियाँ अंगूठे के साथ कुञ्चित ८२-८३- सर्पशीर्ष हस्त रखी हथेली विनत या हुई रहती हैं और सामने की ओर का आकार बनता या सिकुड़ी है, जिससे सर्प के फन जैसा हस्त गड्ढेवाली गहरी रहती हस्त अधोमुख रखा जाता है । आस्फोटन है । सर्प की गति के अभिनय में यह का अर्थ है मल्लयुद्ध में ताल ठोंकना । की योजना चन्दन, सर्प, मन्द स्वर, जल अभिनयदर्पण में इस हस्त देना, हाथी के कुम्भ , पोषण, ( देवताओं को ) तर्पण में जलाञ्जलि ठोंकना जैसे भाव छिड़कना या संचालन तथा मल्लों का ताल स्थल को थपथपाना है । ( अभि ० द ० १३७-१३६ ) प्रदर्शन में की गयी
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ३ ९ १ ८४-८५. मृगशीर्ष हस्त: - कुट्टमित = स्त्रियों का एक चेष्टालंकार । इसका लक्षण है — ' केशस्तनाधरादीनां ग्रहे हर्षेऽपि सम्भ्रमात् । आहुः कुट्टमितं नाम शिरः करविधूननम् ' [ केश, स्तन, अधर आदि के ग्रहण करने से हर्ष होने पर भी घबराहट के साथ मस्तक एवं हाथों का विशेष परिचालन ' कुट्टमित ' भाव होता है । ] अभिनवदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना — स्त्रियों के कपोलचक्र, सीमा, भय, कलह, नेपथ्य, आह्वान, त्रिपुण्ड, मृगमुख, वीणा, पाद संवाहन धनापहरण, मिलन, छत्रधारण, संचरण, प्रियाह्वान तथा योनि के अर्थ प्रदर्शन में की जाती है । ( अभि ० द ० १३ ९ -१४२ ) ८६-८७. काजुल हस्तः - कगु का अर्थ है प्रियंगु लता, उसे जो लेता है वह ' काङ्गल ' । अन्य मत में कांगुल का अर्थ बिच्छू भी होता है । अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना लकुचफल, बच्चों के पैरों के घुंघरू घंटियां, चकोर, सुपारी के वृक्ष, बाला के उरोज, श्वेतकमल, चातक तथा नारिकेल फल के अर्थ प्रदर्शन में की जाती है । ( अभि ० द ० १४४-१४६ ) - अलपल्लव ( अलपद्मक ) हस्त: - ' आत्मोपन्यास ' का अन्य अर्थ है स्त्रियों के अपने उपन्यास अर्थात् विस्मय दिखलाने में । उपन्यास का अर्थ है विस्मय । इस स्थिति में इस हस्त का बार - बार अभिनय प्रस्तुत किया जाए । अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना — विकसित कमल, कपित्थफल, चक्राकार पदार्थ, उरोज, वियोग, दर्पण, पूर्णचन्द्र, सौन्दर्य, कुसुमाचित वेणी, छत के ऊपर का कमरा ( चन्द्रशाला ), गाँव, ऊँचाई, क्रोध, सरोवर, गाड़ी, चक्रवाक पक्षी, कलकल ध्वनि तथा कीर्ति के भाव को प्रदर्शित करने में की जाती है । ( अभि ० दर्प ० १४६-१७ ) ६०-६८. चतुर- हस्त: - चतुर शब्द की ' चतस्रोऽगुलयोऽङ्गुष्ठश्लिष्ट-त्वेन सन्त्यस्मिन् ' इस प्रकार अर्थ में ' अच् ' प्रत्यय से निष्पन्न चतुर शब्द है । इसमें चार अंगुलियों का अभिनय रहने से ' चतुर ' कहलाता है । विभव का एक बाजू से दूसरी बाजू में जाते हुए तथा अविभव का न जाते हुए बतला कर अभिनय किया जाये । दारा ( गृह पत्नी ) को संयुक्तहस्तों से और सम्मुखस्थ स्वस्तिक हस्त से दिखलाया जाये । इस प्रकार शरीर के वक्षः से शिरः पर्यन्त क्षेत्रविशेष में संयुत और असंयुत, चञ्चल और स्थिर, सम्मुख और पराङ्मुख उत्तान और अधोमुख, व्यस्त और चतुरस्र करते हुए चतुर हस्तों को युक्ति के अनुसार उत्प्रेक्षित कर विशिष्ट अभिनय प्रस्तुत करना चाहिए । अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना कस्तूरी,
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३ ९ २ नाट्यशास्त्र अल्पार्थ, स्वर्ण, ताम्र, लोह, गीलापन, दुःख, रसास्वादन, नेत्र, वर्णभेद, प्रमाण, माधुर्य, मन्दगति, खण्ड खण्ड करना, मुख, घृत तथा तैल के भावो को प्रदर्शन करने में की जाती है । ( अभि ० द ० १४६-१५२ ) ' नाट्यशास्त्र संग्रह ' में चतुर का स्वरूप इस प्रकार है: -यदि सर्पशीर्ष हस्त में कनिष्ठिका अंगुली टेढ़ी होकर झुके तथा अंगूठे को मध्यमा के मूल टेड़ा कर स्पर्श करते हुए रखा जाए तो ' चतुर - हस्त ' होता है । में योजना – यदि नय या आदर व्यक्त करना हो तो मुख के सामने चतुर हस्त को रखा जाता है । इसी प्रकार कलाई में स्वस्तिक कर दो चतुर हस्त एक दूसरे को पार करते हैं तो उससे विनय या सहिष्णुता दिखलाई जाती है । किसी प्रश्न पर विचार दिखलाने के लिए एक बाजू चतुर हस्त को रखते हैं तथा किसी छानबीन या विकल्प युक्त विचार में इसी हस्त को के पास रखते हैं । लीला विलास में दोनों हस्त उद्वेष्टित दशा में हृदय रखे जाते हैं । ऊपर की ओर समतल चतुर हस्त से कैतव तथा अक्ष कीड़ा की प्रेरणा, मृदुता बतलाना हो तो अंगुष्ठ और मध्यमा के परस्पर मर्दन के द्वारा तथा चतुराई दिखलाने में दो चतुर हस्तों को मिला कर ऊपर जाते हुए रखा जाता है ( ना ० शा ० सं १४८ - १५२ ) ६६-१०१. भ्रमर - हस्त: - सन्दष्ट का अर्थ है अग्रभाग से श्लिष्टता या संयोग रहना । इनकी भ्रमर जैसी आकृति रहने के कारण ' भ्रमर ' नाम | अभिनयदर्पण के अनुसार भ्रमर, शुक, पखना ( पक्ष ), करण हुआ कोकिल तथा अन्य ऐसे ही पक्षियों के भाव को व्यक्त करने में भ्रमर, सारस, हस्त की योजना रहती है ( अभि ० द ० ५२-१४५ ) ' नाट्यशास्त्रसंग्रह ' के अनुसार इस हस्त की योजना — कमलनाल को ग्रहण करने में, पुण्य को लेने या कर्णपूर बनाने, तालपत्र लेने और कांटा निकालने में की जाती है ( ना ० शा ० सं ० – १६१-१६२ ) । १०२-१०३. हंसास्य- हस्त: तर्जनी, मध्यमा और अंगुष्ठ ये तीनों ‘ निरन्तर ' अर्थात् अलग - अलग रहने का इसमें निषेध है । ( अन्तर = व्यवधान या दूरी ) । अभिनयदर्पण ' में इस हस्त की योजना - मांगलिक कार्य, मंगल -सूत्र या सूत्र बांधने, उपदेश, विवाद निर्णय, रोमाञ्च, मौक्तिकादि माला, - दीपक की बत्ती आगे सरकाने, कसौटी, चमेली, चित्र, चित्ररचना, दशन और जल के बांध ( जलबन्ध ) को दर्शाने में की जाती है ।
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परिशिष्ट: टिपण्णी, अध्याय ९ ३ ९ ३ १०४ - १०७. हंसपक्ष हस्त: - प्रत्यक्ष और परोक्ष को स्वस्तिकाकार हाथों से अभिनीत करते है । आलिङ्गन और महास्तम्भ के अभिनय को संयुक्त हस्त द्वारा एक कन्धे से दूसरे कन्धे पर हाथों को रख कर किया जाता है । ' यथारसम, का आशय है कि शृङ्गार, हास्य, अद्भुत तथा करुणादि में व्यभिचारी विशेष के योग से दृष्टिविशेष रूप जो अनुभाव हैं उनसे स्पष्ट होने वाले ( ऐसे ) हस्त प्रयोग विशेष स्वरूप के हस्तों से समझकर प्रस्तुत किये जाना चाहिए । यह ध्यान सभी हस्तों के प्रयोग के समय रखा जाना चाहिए । ' अभिनयदर्पण ' के अनुसार छः की संख्या, सेतुबन्ध, नखों से रेखा बनाने या कुरेदने या टँकने के भाव दिखलाने में भी इस हस्त की योजना की जाती है । ( अभि ० द ० १५७ - १५६ ) १०८-११४ सन्दंश - हस्त: - पुष्पों के चयन और छोटे कांटों के निकालने में अग्रसन्दंश का प्रयोग होता है । धनुष में जो गुण है उसमें संयुत करण केवल संश्लेष नहीं है वह दोनों हाथों का आधार मात्र है । यह दोनों बाजुओं में प्राप्य रूप में समझना चाहिए । पत्ररचना से अलंकृत व्यक्ति के ललाट पर पल्लवादि स्थापन में सन्देश हस्त का प्रयोग करते हैं । अभिनयदर्पण के अनुसार इसकी योजना उदर, बलिदान, घाव, कीट, महाभय, पूजा तथा पांच की संख्या बतलाने में की जाती है । ( अभि ० द ० १५६-१६१ ) ११५-११७. मुकुल- हस्त: - यह मुकुल के आकार का हस्त बन जाता है अतः ' मुकुल ' है । ' विटचुम्बन ' से आशय है कि विट का अपने ही मुकुल हस्त को चुम्बन देकर किसी प्रमदा को यह दर्शाना कि मैं तुम्हारा चुम्बन चाहता हूँ । अथवा कामसूत्र में वर्णित ' आच्छुरितक ' यही है, जिसमें प्रमदा के उरोज एवं चिबुक को एक साथ पांचों अंगुलियों से नख - स्पर्श द्वारा कुरेदना या क्षत देना होता है । यही आच्छुरितक यहाँ विट चुम्बन द्वारा दर्शाया गया है । ' अभिनयदर्पण ' के अनुसार कुमुद, भोजन, कामदेव, मुद्राधारण, नाभि, कदली तथा कुसुम का भाव दर्शाने में इसी हस्त की योजना की जाती है । ( अभि ० द ० १६१-१६३ ) ११८ - ११६. ऊर्णनाभ - हस्त: - ऊर्णनाभ का अर्थ है मकड़ी जो जाल बुनती है । चिबुक क्षेत्र में स्वस्तिक हाथ को ले जाकर सिंह व्याघ्र का अभिनय किया जाए । सिंह व्याघ्र आदि स्वस्तिकाकार हाथों को रख बैठते हैं जिससे आसन पर उनके नख रखे दिखाई देते हैं । प्रस्तर का अर्थ पाषाण भी तथा कसौटी का पत्थर भी होता है । अन्य विद्वान् प्रस्तर का दर्भच्छटा
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३ ९ ४ नाट्य भी अर्थ लेते हैं । नाट्यशास्त्र संग्रह के अनुसार नाट्यशास्त्र के विवरण के अतिरिक्त भी चोरी को पड़कने तथा केशों को पकड़ने में इसी हस्त की योजना की जाती है । १२०-१२४. ताम्रचूड - हस्त: - जिसकी मस्तक की शिखा खुली हुई या फैली हुई हो ऐसे कुक्कुट पक्षी के आकार का है रहने से हस्त ताम्रचूड कह-लाता है । ताल संगीत में काल का मानक होती है । संज्ञित का अर्थ है नाम लेकर किसी बालक को बुलाना । ताम्रचूड का अन्य लक्षण भी है । जिसमें निष्ठिका फैली हो ऐसी मुष्टि इसका आशय है । क्षिप्रमुक्ताङ्गुलीभिः का अर्थ है शीघ्रता से खोली हुई या खुली हुई अंगुलियों के द्वारा । अभिनयदर्पण में इसकी योजना मुर्गा, बगुला, कौआ, ऊँट, बछडा और लेखनी का भाव दिखलाने में की जाती है । ( द्र ० अभि ० द ० १६३ - १६४ ) नाट्यशास्त्र - संग्रह ने बतलाया कि शार्ङ्गदेव के मत में नाट्यशास्त्र के ताम्रचूड के अन्य लक्षण की लक्ष्य में प्राप्ति अधिक नहीं होने से इसका प्रथम लक्षण ही ग्राह्य ( रखना ) है । १२५. असंयुत ' हस्त इतने ही नहीं और न ही ये ही असंयुत हस्त हैं क्योंकि कोहल आदि नाट्यशास्त्र के अन्य आचार्यों ने अन्य असंयुक्त हस्त भी संश्लेषण या योग से संयुत हस्त होते हैं । अतः उन्हें स्वयं समझ लेना चाहिए । ऐसे विशेष अभिनय आगे नाट्यशास्त्र के २६ वें अध्याय ' चित्राभिनयाध्याय में बतलाये जायेंगे । कुछ अभिनय इन्हीं हाथों के द्वारा अपने अनुभव तथा उत्प्रेक्षण के आधार पर भी होते हैं । भरत के इन असंयुत हस्तों के अतिरिक्त अभिनयदर्पण में दिये हुए असंयुक्त गये हस्तो को भी यहाँ दिया जा रहा । क्रमशः ये हैं – ( १ ) अर्धपताक, ( २ ) मयूर, ( चन्द्रकला, ( ४ ) सिंहमुख, ( ५ ) त्रिशूल, व्याघ्र, ( ७ ) अर्धसूची, ( ८ ) कटक तथा ( 8 ) पल्ली । इनके लक्षण का क्रमशः योजनादि विवरण इस प्रकार है अर्धपताक: -त्रिपताके कनिष्ठा चेद् वक्रितार्धपताकिका । यदि त्रिपताक हस्त में कनिष्ठका अंगुली को टेढ़ी कर के झुका दिया जाए तो ' अर्धपता किका ' हस्त कहलाता है । पल्लवे फलके तीरे उभयोरिति वाचके । क्रकचे छुरिकायाञ्च ध्वजे गोपुरशृङ्गयोः । युज्यतेऽर्धताकोऽयं तत्तत्कर्मप्रयोगके ॥ ( १०३-१०४ )
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ३ ९ ५ योजना -पल्लव, चित्रफलक लेखन आधार, नदी तट, ' दोनो ' के कथन के लिये, आरा, छुरी, गोपुर तथा शिखर का भाव दिखलाने में अर्धपताक हस्त की योजना की जाती है । मयूर: -अस्मिन्ननामिकांगुष्ठौ श्लिष्टौ चान्याः प्रसारिताः । मयूरहस्तः कथितः करटीकाविचक्षणैः । यदि ( कर्तरीमुख की ) अनामिका को अंगूठे से मिला कर शेष अङ्गलियों को बाहर की ओर फैला दिया जाए तो उसे विद्वान् ' मयूर हस्त ' कहते हैं । मयूरास्ये लतायाञ्च शकुने वमने तथा । अलकस्यापनयने ललाटतिलकेषु च । नद्युदकस्य निक्षेपे शास्त्रवादे प्रसिद्धके । एवमर्थेषु युज्यन्ते मयूरकरभावनाः ॥ ( १०८ - ११० ) योजना - मयूरमुख, लता, शकुन, वमन, केशों को फैलाने या उठाने, ललाट पर तिलक लगाने, नदी जल को उछालने, शास्त्रार्थं करने तथा प्रसिद्ध वस्तु के निर्देश करने में ' मयूरहस्त ' की योजना की जाती है । चन्द्रकला: -सूच्यामङ्गुष्ठमोक्षे तु करश्चन्द्रकला भवेत् । यदि सूचीहस्त में अंगूठे को खोल कर आगे तान दिया जाए तो उसे ' चन्द्रकला ' हस्त कहते हैं । चन्द्रे मुखे च प्रादेशे तन्मात्राकारवस्तुनि ।
शिवस्य मुकुटे गङ्गानद्यां च लगुडेऽपि च ।
एषा चन्द्रकला चैव विनियोज्या विधीयते ॥
( १३२, १३३ ) योजना - चन्द्र, मुख, हाथ की बालिश्त ( प्रादेश ), अर्धचन्द्राकार वस्तु, शिव का मुकुट, गङ्गा नदी और लकड़ी या डंडा आदि के निर्देश में ' चन्द्रकला - हस्त ' की योजना की जाती है ।
सिंहमुख: -मध्यमानामिकाग्राभ्यामगुष्ठो मिश्रितो यदि ।
शेषौ प्रसारितौ यत्र स सिंहास्यकरो भवेत् ॥
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३ ९ ६ नाट्यशास्त्र यदि मध्यमा और अनामिका दोनों उङ्गलियों के अग्रभागों को अङ्गूठे से मिला दिया जाए और शेष दोनों उङ्गलियों के अग्रभागों को सीधे ताना या फैला दिया जाए तो उसे ' सिंहमुख ' हस्त कहते हैं । होमे शशे गजे दर्भचलने पद्मदामनि । सिंहासने वैद्यपाके शोधने सम्प्रयुज्यते ॥ ( १४२-१४४ ) योजना — हवनकर्म, खरहा, हाथी, लहराती कुशाएँ, कमल की माला, सिंह का मुख, वैद्य द्वारा निर्मित पाक तथा उसके शोधन को सिंहमुख हस्त के द्वारा दिखलाया जाता है । त्रिशूल: -निकुञ्चनयुताङ्गुष्ठकनिष्ठस्तु त्रिशूलकः । यदि कनिष्ठा और अँगूठे को झुका कर मिला दिया जाए और तीनों अँगुलियाँ अलग - अलग सीधी फैली हुई रहें ) तो त्रिशूल हस्त कहलाता है । बिल्वपत्रे त्रित्वयुक्ते त्रिशूलकर ईरितः । ( १६५ ) योजना -तीन पत्रों वाले बिल्वपत्र या तीन पदार्थों के निर्देश में त्रिशूल हस्त की योजना की जाती है ।
व्याघ्र: -कनिष्ठाङ्गुष्ठनमने मृगशीर्षकरे तथा ।
व्याघ्रहस्तः स विज्ञेयो भरतागमकोविदैः ॥
यदि मृगशीर्ष हस्त में कनिष्ठा और अँगूठे को झुका लिया जाए तो वह ' व्याघ्रहस्त ' कहलाता है । व्याघ्रे भेके मर्कटे च शुक्ती संयुज्यते करः । ( १६६-१६७ ) योजना – व्याघ्र, मेंढक, बन्दर, सीप ( शुक्ति ) के भाव को बतलाने में ' व्याघ्र - हस्त ' की योजना की जाती है । अर्धसूची: -कपित्थे तर्जनी ऊर्ध्वसारणे त्वर्धसूचिकः । यदि कपित्थहस्त में तर्जनी ऊपर सीधी फैला कर रखी जाए तो ' अर्धसूची ' हस्त कहलाता है । अङ्कुरे पक्षिशावादी बृहत्कीटे निद्युज्यते । ( १६७-१६८ हुँ योजना -बीज के अङ्कर, चिड़ियो के बच्चे, बड़े कीड़े मकोड़े को बतलाने में ' अर्धसूची ' हस्त की योजना की जाती है ।
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ३ ९ ७ कटक: --सन्दंशेऽप्यूर्ध्वभागे तु कटको हस्त उच्यते ॥ यदि सन्देश हस्त में मध्यमा मिला दिया जाए तो ' कटकहस्त ' एतस्य विनियोगस्तु " आह्वानभावचलने मध्यमानामिकान्वया और अनामिका के हो जाता है । * दर्शने । 11 योजना - देखने ' बुलाने तथा चलने आदि हस्त की योजना की जाती है ।
पल्ली हस्त: -मयूरे तर्जनीपृष्ठ मध्यमेन युतो यदि ।
पल्लिहस्तः स विज्ञेयः पत्यर्थे विनियुज्यते ॥
यदि मयूरहस्त में मध्यमा अङ्गुली को तर्जनी के भाग से लगाया जाए तो ' पल्ली हस्त ' हो जाता है । गाँव की झुग्गी - झोपड़ियों को दर्शाने में रखी जाती है । संयुक्त हस्तमुद्राएँ: -। अग्रभागों को अँगूठे से को दिखलाने में कटक पीछे मोड़ कर अगले इसकी योजना बस्ती, १२६-१२८. अञ्जलिहस्तः- यहाँ लक्षण में ' तु ' शब्द के द्वारा अन्य -हस्तों के संश्लेषण में नामान्तर के होने की स्थिति बन जाती है यह दिखलाया है जैसे सूचीमुख के सम्बन्धों का अभिनय करते हैं । मुद्राओं में असंयुतमुद्राओं का अधिक महत्त्व एवं उपयोग है क्योंकि इन्हीं से संयुत हस्तों का निर्माण भी होता है । जैसे संयुक्त हस्त अञ्जलि से नमस्कार दिखलाया जाता है. वही दो पताक हस्तों से मिला कर भी दिखलाया जा सकता है परन्तु व्यवहारोपयोगी होने से संयुतमुद्राओं का अलग से दिखलाना परमावश्यक है । १२६ - १३१. कपोतहस्तः -- कपोत शब्द की व्युत्पत्ति है ' कम्पते इति कपोतः भीरुः पक्षी कांपता है इसलिये कपोत अर्थात् डरपोक पक्षी । इसी स्वभाव से अन्य भीरु भी प्रकृति से गृहीत होने से ' कपोत ' नाम से भीरुता ली जाती है । इस हस्त की भीत व्यक्ति के अतिरिक्त कम्पित के अभिनय में भी योजना रहती है । स्त्रियों के उरोज कम्पन के भयजन्य होने से इसका प्रधानतः अभिनय रहता है । इसका कूर्मवत् आकार होने से इसे ' कूर्मक ' भी समझा जा सकता है ।
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नाट्यशास्त्र ३ ९ ८ . कर्कट - हस्तः — केंकड़ों की दाढ़ के आकार में अँगुलियाँ १३२-१३३ ' कर्कट ' संज्ञा हुई । मदन के विकार एक दूसरे के सामने रहने से इसकी में तथा सोकर उठने के में अङ्गों से अङ्गों के मर्दन या मरोड़ने के अभिनय हस्त का उपयोग या अन्य किसी समय आने वाली जम्भाई में इसी कर इस समय देह के फैलाने में पेट पर हथेलियों को सामने होता है । बृहदाकार में अंगुलियों पर हनु को रखा जाता हस्त को रखा जाता है । हनु के धारण काल में प्रयोग करने अर्थात् अभिनेय वस्तु के तत्व को अभिनय । है । अर्थतत्व हस्त के प्रयोग स्वविवेक पूर्वक किये जाएँ में समर्थ आचार्यों के द्वारा ऐसे होता है एक . स्वतिक हस्तः - स्वस्तिक दो प्रकार का १३४-१३५ रूप विशिष्टस्वस्तिक । जहाँ शुद्ध स्वस्तिक तथा दूसरा मुष्टिकास्वस्तिक मणिबन्धन्यास सन्निवेश पद का उपादान होता है वहाँ ऐसा शुद्ध स्वस्तिक में । अर्थ एवं प्रकरणादि के आधार मानना चाहिए- जैसे चिन्ता के अभिनय । जैसे- ' स्वस्तिकविच्युति ' पर अन्य प्रदेशों में भी यही प्रवृत्ति रखनी चाहिए है । कलाई पर सामने के साथ भी इस हस्त का प्रयोग किया जाता से पताक कुछ विद्वान् मानते हैं । स्वस्तिक के लक्षण की ओर रखना ही इसका लक्षण वाला होने से इसे ' स्वस्तिक ' कहते भी हैं । तथा स्वरूप हस्तः - जहाँ परस्पर अभिमुख दो खटक हो वह १३६. खटकावर्धमानक । इसका खटक इसका रूप है | खटक पर खटक को रखने से खटकावर्धमानक नाम - करण के चारों ओर योग या सम्बन्ध रहने से खटकावर्धमानक सार्थक कार्यं जैसे अर्थात् श्रृंगार के प्रयोजन वाले समझना चाहिए । शृंगारार्थ में कहा भी है- ' खट-ताम्बूल ग्रहण आदि में । जैसा कि आगे गतिप्रचार हस्तों विटगति व्रजेत् ' ( १३-१२० ) [ ' खटकावर्धमान कावर्धमानौ तु कृत्वा स्वामिनी को प्रसन्न करने के को रख कर विट की चाल में चले ' ] । अपनी हस्त का प्रयोग करने में भी तथा ऐसे प्रयोजन के समय भी इसी लिये प्रणाम किया जाता है । - हस्तः - ' विपर्यस्तत्व ' का आशय है स्वस्तिका-१३०-१३८. उत्सङ्ग के दायरे में रखना, जिससे प्रकोष्ठ-कार । अर्थात् दाहिना हाथ बाँये कन्धे की दक्षिण पार्श्व संकेतित होता है । अन्य के मत में स्वस्तिक स्वस्तिकत्व अन्य इसे अधोमुखत्व भी मानते है । अभि-में स्थिति ही विपर्यस्तत्व है तथा बतलाया कि ऐसा प्रतीत नवगुप्त पाद ने इस पर युक्तियुक्तता से विचार रख रहित स्थान से है कि जब कूर्परों को स्वस्तिकाकार रख प्रवेश होता
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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ३ ९९ अँगुलियाँ बाहर की और हों और हस्तों का पृष्ठभाग बहिर्मुह हो तो यही ' विपर्यस्तत्व ' है । उत्सङ्ग में लेने की योग्यता के होने से इसका ' उत्सङ्ग ' सार्थक नाम है । स्पर्शस्य अर्थात् जो परोक्षभूत वस्तु है उसके स्पर्श करने के अभिनय में ऐसे ही उत्सङ्ग हस्त का प्रयोग किया जाता है । ' निष्पीडितः पुनः ' के स्थान पर ' सिंहावलोकिते ' पाठ भी है । सिंहने देखा या सिंह को देखा इन दोनों अर्थों को यहाँ लिया जा सकता है । एक बार कर्त्ता में तथा दूसरी बार में षष्टी का विधान कर यहाँ अर्थ समझना चाहिए । अभिनयदर्पण के अनुसार आलिंगन करने, लज्जा का अनुभव करने, भुजबन्ध को दिखलाने और बालकों को शिक्षण देने के अर्थ बतलाने में इस हस्त का प्रयोग किया जाता है । अभि ० द ० १५४-१८५ ) १३६-१४१ निषध - हस्तः- कपित्थ हस्त से वेष्टित मुकुलहस्त का धारण करना ' निषध ' है । ' निषण्णं धत्ते इति निषधः ' यह इसकी व्युत्पत्ति है । संग्रह का अर्थ है शास्त्र का सम्यक् ग्रहण या समझना । संक्षिप्त के अभिनय से यह बतलाया कि संक्षेपवत् द्रव्य का अभिनय इसी हस्त के द्वारा किया जाए । अथवा संक्षिप्त का अर्थ है सम्यक् क्षिप्त अर्थात् ठीक से स्थापित । अभिनय-दर्पण में निषधहस्त का स्वरूप नहीं मिलता है । १४२-१४३. दोलाहस्त: -- हाथों के पूरे लम्बे करने पर ही कन्धों में शिथिलता होती है । या पताक हस्त की अँगुलियों के अवष्टम्भ के आधार को उद्धार या हटाने में अँगुलियों के शिथिल करने पर दोला के आकार का हस्त हो जाने से यह ' दोला ' कहलाता है । भिन्न - भिन्न अभिनेय वस्तुओ में इस बाजू से उस बाजू में जाना, निपतन तथा स्तब्धत्व आदि को समझना चाहिए । अभिघात का अर्थ है शीत, वर्षा या आतप के चारो ओर से आने पर दोष या अकुलाहट होना । अभिनयदर्पण के अनुसार अभिनय के आरम्भ में इस हस्त का प्रयोग किया जाता है । ( अभि ० द ० १८१-१८२ ) १४४-१४५. पुष्पपुट हस्त: - सर्पशीर्ष हाथों के पुट से अर्थात् दोने के आकार ( द्रोणाकार ) में बनाए हस्तों से पुष्पों को लेना होने से इसे ' पुष्पपुट ' कहा जाता है । ' अभिनयदर्पण ' के अनुसार आरती उतारने, पानी या फल के ग्रहण करने, सन्ध्या करने, अर्घ्यदान करने तथा मन्त्रशक्ति युक्त पुष्प के अर्थ को प्रकट करने में इस हस्त की योजना की जाती है । ( अभि ० द ० १८२ - १८३ )