भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ — पृष्ठ 511–520

भरत नाट्यशास्त्र - प्रदीप हिन्दी भाष्य २ · पृष्ठ 511–520

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४०० नाट्यशास्त्र १४६ - १४७. मकरहस्त: - दोनों अंगूठों का मकर के कणों की तरह होने के कारण इसका ' मकर ' नाम है । अर्थयोगेन से आशय है कि रहना पीछे, अगल - बगल में, ऊपर - नीचे, ठहरने चलने, उठने - बैठने जैसे अनेक आगे के अनुसार इसका प्रयोग किया जाए । ' नाट्य शा ० सं ० ' कार्यों या प्रयोजन नदी के पूर को दिखलाने में इस हस्त की योजना की जाती है । के अनुसार अभि ० द ० में इसका लक्षण नहीं मिलता । १४८-१४६. गजदन्त हस्त: - इसमें वाम बाहु में दक्षिण तथा दक्षिण स्तम्भाकार वेष्टित होता है जो हाथी के दाँत के आकार बाहु में वाम हस्त है । वधू तथा वर के विवाह मण्डप में ले जाने के सम्बन्ध से गजदन्त कहलाता या शिला उखाड़ने जैसे अवसरों तथा कार्यों का इस हस्त को आते जाते रखकर अभिनय किया जाता है । १५० - १५१. अवहित्थ हस्त: - आकार गोपन की सूचना देने के कारण इस हस्त का अवहित्थ नाम करण सार्थक है । अवहित्थ हस्त के प्रयोग से हृदय को दबा लेने या उसका भेदन नहीं होने देने को बतलाया जाता है । के आशय १५२ - १५३. वर्धमान हस्त: - दो हस्त पराङ् मुख हो स्वस्तिकता से चलने से विस्तार युक्त हो जाते हैं अतः इनमें वर्धमानता रहती है जो रहित इसकी व्युत्पत्ति में निमित्त होती है ।. १४५. संक्षेप में बतलाने की भावना से यहाँ इनका निरूपण किया गया । आशय है — इन कथित अर्थों के अतिरिक्त अन्य अर्थों के अभिनय भी ' तु ' का में संयुतहस्त २३ योग्यतावश हस्तों से किये जा सकते हैं । अभिनयदर्पण बतलाये गये हैं जब कि भरतमुनि ने तेरह ही बतलाये जिनमें अभिनयदर्पण नाम से मिलते हैं । ऐसे अतिरिक्त हस्त हैं —१. शिवलिङ्ग, में & ही समान, ४. शंख, ५. चक्र ६. सम्पुट, ७. पाश, २. कर्तरी - स्वस्तिक, ३. शकट कीलक, ६. मत्स्य, १०. कूर्म, ११. वराह, १२. गरुड़, १३. नागबन्ध ८. १५. भेरुण्ड । विस्तार भय से इनके स्वरूप को यहाँ उद्धृत १४. खट्वा तथा में यथास्थान देखा जा सकता है । नहीं किया जा रहा है । इसे अभिनयदर्पण भी इसी में इसके अतिरिक्त देव - देवी - प्रतिमाओं के लिये हस्तमुद्राओं का प्रयोग में ) मिलता है । इनमें — ब्रह्महस्त, ईश्वर ( शिव ) हस्त, तथा अन्यत्र ( नासग्रन्थों, विनायक ( गणेश ) हस्त, विष्णुहस्त, सरस्वतीहस्त, पार्वतीहस्त, लक्ष्मीहस्त , इन्द्र हस्त, अग्निहस्त, यमहस्त, निर्ऋतिहस्त, वरुण-षण्मुखहस्त, मन्मथहस्त, मादि आते हैं । इनके अतिरिक्त दशावतारहस्त भी हस्त, वायुहस्त, कुबेरहस्त

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ४०१ । यथा - १. मत्स्यावतारहस्त, २. कूर्मावतारहस्त, ३. वराहावतारहस्त, ४. नृसिंहावतारहस्त, ५. वामनावतारहस्त, ६. परशुरामावतारहस्त, ७. रामावतारहस्त, ८. बलरामावतारहस्त. ६. कृष्णावतारहस्त तथा १०. कल्कि अवतारहस्त । इसके अतिरिक्त विभिन्न जातियों एवं वर्णों की हस्तमुद्राओं का विवरण प्राप्त है । इनमें राक्षस हस्त, ब्राह्मणहस्त, वैश्यहस्त, शुद्रहस्त आते हैं । जातियों की उनके व्यवसाय, तथा विभिन्न देशों की परम्पराओं के अनुसार हस्तमुद्राएँ रहती हैं । इसी क्रम में सम्बन्धिजन की हस्तमुद्राओं का भी विवरण मिलता है । तदनुसार दम्पत्तिहस्त, मातृहस्त, पितृहस्त श्वश्रूहस्त, श्वशुरहंत्त, भर्तृ-भ्रातृहस्त, ननान्दहस्त, पुत्रहस्त, स्नुषाहस्त, तथा सपत्नीहस्त । इसके अतिरिक्त नवग्रहों के लिये भी हस्तमुद्राओं का स्वरूप इसी में दिया गया है । यथा -- ( १ ) सूर्यहस्त, ( २ ) चन्द्रहस्त, ( ३ ) कुज - ( भौम ) हस्त, ( ४ ) बुधहस्त, ( ५ ) गुरुहस्त, ( ६ ) शुक्रहस्त, ( ७ ) शनिहस्त, ( ८ ) राहुहस्त तथा ( ९ ) केतु हस्त । इन सभी के लक्षण तथा योजना आदि अभिनयदर्पण में देखना चाहिए । ' नाट्यशास्त्रसंग्रह ' में संयुक्त हस्तों के ६ अतिरिक्त प्रकार भी बतलाये गये हैं । यथा - ( १ ) कर्तरीस्वस्तिकहस्त, ( २ ) स्वस्तिकहस्त, ( ३ ) पताकस्वस्तिक, ( ४ ) कलश, ( ५ ) तिलक तथा ( ६ ) वैष्णव । इनके स्वरूपादि भी ( कारिका संख्या २१८ से २२५ तक ) नाट्यशास्त्रसंग्रह में देखना चाहिए । १५५ - १५६. बिना हस्त के कोई ' नाट्य ' नहीं होता है । यहाँ नाट्य शब्द का अर्थ है ' नाट्य ' के उपयोगी अभिनय में विभावादि, जिसका रूप जो दिखाई दिया है तथा जिसको बतलाया गया है ' वह ' । १५७. यहाँ ' अर्थ का आशय शोभातिशय और अभिनय - सामर्थ्य है । छन्दतः = नाट्याचार्य की इच्छा के तथा अनुभव के अनुसार रहने वाले प्रयोग । लोकधर्मी इतिकर्तव्यता को दिखलाने वाले अभिनय, रस तथा भाव के सूचक जो ' हस्त ' हो उन्हें । १५८. देश = क्षेत्रविशेष । प्रयोग = सुकुमार एवं उद्धत रूपकविशेष-अर्थयुक्ति = अभिधेय ( वाच्य ) गौण ( लाक्षणिक, लक्ष्य ) तथा प्रतीयमान या व्यङ्गय अर्थ की उपपत्ति । पुरुषों के आचार स्त्रियों की अपेक्षा सामान्य होते हैं अतः उनकी अपेक्षा स्त्रियों के विशेष रूप में हस्त प्रयुक्त किये जाएँ । १५६ - १६४. रस और भाव के अनुसार स्थायी एवं संचारी के भेद से तथा भिन्न - भिन्न विभाव भेद के कारण हस्तकर्म होते हैं । जैसे — विदूषक के २६ ना ० शा ० द्वि ०

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४०२ नाट्यशास्त्र प्रति केशों का आकर्षण खटकामुखहस्त से, प्रिया के प्रति अरालहस्त से, क्रीडा और कलह की दशा में मुष्टिहस्त के द्वारा । इस प्रकार क्रियाओं की स्थिति रस, भाव के अनुसार स्वयं कल्पना कर योजना की जाए । इस प्रकार इन हस्तप्रचारों को नेत्र, मुखराग एवं भ्रुकुटि के साथ उनके भावों को व्यक्त करते हुए रखना चाहिए । परोक्ष अभिनय में दृष्टियों को हस्त के अनुगत रखना चाहिए, प्रत्यक्ष अभिनय में हस्तों का अनुगम नहीं होगा वहाँ इसके विपर्यय अर्थात् प्रतिकूल क्रम रहेगा । १६५. करण का अर्थ है आवेष्टित आदि क्रियाएँ । कर्म = विधेय या कर्तव्य । स्थान- - ललाट आदि प्रदेश तथा उत्तान, अधोमुख, उर्ध्वमुख जैसी स्थिति । प्रचार = स्वल्प, मध्य एवं अधिक प्रमाण में हस्तों का चालन । मुक्ति 5 = अर्थ के विषय में गौण या मुख्य की उपपत्ति या बारीकी से विचार कर तदनुसारी अभिनय करना । यदि ब्राह्मण गौ है ( बैल या मूर्ख है ) तो उसके मृग ( पशू ) रूप अर्थ को स्वरूप मान कर कर्तरीमुख या मृगशीर्ष बहुल हरिण ( पशु ) का अभिनय उपयुक्त नहीं किन्तु ऐसे समय मूर्खता के अभिनय में चतुर, शुकतुण्ड, शिखर एवं निषध हस्तों का प्रयोग प्रायः उपयुक्त होता है । इसी प्रकार विशेषणविशेष्यभाव का विचार करना भी युक्ति कहलाता है । जैसे लम्बकर्ण में लम्बे कानों का या जिसके लम्बे कान हों उसका भी अभिनय किया जाता है । क्रिया यह तीन प्रकार की होती है, विधिरूपा, निषेधरूपा तथा अनुभयरूपा ( विधि एवं निषेध से रहित ) । ' जाओ मत जाओ ' इत्यादि विधि में प्रत्ययार्थ का ही अभिनय होता है, निषेध में केवल नर्थ का और अनुभय में केवल प्रकृत्यर्थ का ही अभिनय होता है । इन सभी का व्यापक कारण लोकोपचार ( लोकव्यवहार ) है । १६६. हस्तों के निरूपण के बाद अब उनके ' स्थान ' बतलाते हैं । स्थान अर्थात् करण तथा कर्म । यहाँ हस्तों के विभागपूर्वक वर्णन को दिया गया है । कि- उत्तम पात्र का सन्निकृष्ट प्रदेश में, मध्यम पात्र का मध्यम प्रदेश में तथा अधम पात्र का विप्रकृष्ट प्रदेश में अभिनय किया जाए । यहाँ ललाटादि शब्द उपलक्षणार्थक हैं । इन क्षेत्रों में वर्तना के नियोजन के साथ - साथ उत्तमपात्र ( राजा आदि ) अपने स्वरूप के उपयुक्त स्थानों पर अभिनय करें । इससे यह भी सूचित किया गया है कि देव, गुरु, नृप आदि उत्तम पात्र ललाट क्षेत्रस्थ अञ्जलि हस्त से, अमात्य, विदूषक आदि मध्यमपात्र वक्षःस्थ चतुरादिहस्तों से तथा चर आदि अधमपात्र शुकतुण्ड आदि हस्तों से अपना अभिनय करें ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ४०३ १६७. अभिनय के विषय में अन्य तथ्य भी बतलाते हैं — ज्येष्ठ इत्यादि से । ज्येष्ठ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के चतुर्वर्ग के उपदेश प्रदाता उत्तम नाटकादि के प्रयोग में प्रत्यक्ष की प्रधानता है अतः हस्त का स्वल्प अभिनय रहना चाहिए । भाण आदि हास्य प्रधान भाण प्रहसन आदि रूपकों के प्रयोग में मध्यम हस्त प्रयोग रखना चाहिये क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष की प्रधानता के साथ आकाशभाषितादि की भी बहुलता रहती है । नृत्त षिद्गकादि अधम में प्रकीर्ण हस्तों का अभिनय किया जाए । १८. लक्षण अर्थात् वर्तना के क्रम से योजित ' सौष्ठव ' अर्थात् वर्णित स्वरूप के अनुगत | अधमपात्रों के हस्त लक्षणों के अनुगत नहीं रहते वे केवल लोक क्रिया के अनुगत रहते हैं । १६६. अन्य आचार्यों के मत को अथवा के द्वारा यहाँ दिखलाया जा रहा है । जैसा समय हो —अर्थात् भय, जुगुप्सा, आदि में तथा शीत, वर्षा या आतप के योग में हस्तों की अस्फुट या अटपटी स्थिति ही सौष्ठव है । विपरीत या भिन्न स्वरूप का आशय है कि अवहित्यादि में सौष्ठव की योजना न करना ही सौष्ठव है ( तथा यही वैपरीत्य है ) । १७० - १७३. विहस्त = हस्त में विकलता रहना । मद्यपान से युक्त ' मदमत्त ' तथा प्रमाद करने वाला व्यक्ति ' उन्मत्त ' कहलाता है । ( परन्तु ) जो हस्त आन्तरिक चित्तवृत्तियों को सूचित करे उनको अवश्य प्रस्तुत किया जाए । जैसे कपोतहस्त भय को, मदन हेतुक जृंभा ( जंभाई ) को कर्कटक-हस्त, कपोतहस्तजैसे शोक को और शुकतुण्डहस्त ईर्ष्या को सूचित करता है तो ऐसे हस्तों का अवश्य प्रयोग द्वारा किया जाए । १७४. यहाँ हस्ताभिनय प्रयोग के सभी निषेध स्थल बतलाये गये हैं । जैसे सारथि के द्वारा घोड़ों की रस्सी सम्हालने के कारण दोनों हाथों के व्यस्त रहने की स्थिति में हस्ताभिनय संभव नहीं होता । विलोकनै पद से चित्तवृत्ति के मालूम हो जाने पर कि यह कैसा है इसे देखने से मुखराग आदि के द्वारा स्फुटरूप से अभिनय करे । १७५. अब दिशाओं के मेद से हस्तप्रचार को कहते हैं - उत्तान इत्यादि के द्वारा | जैसे ' पृथ्वी पर निर्माण किया ' के अभिनय में किया जाने वाला पताकहस्त उत्तान रहता है या आगे की ओर जाने वाला त्रिपताक भी । पार्श्व में— जैसे धनुष चलाने के अभिनय में मुष्टि हस्त का प्रयोग । अधो-मुख — जैसे समुद्र के अभिनय में स्वस्तिक पताक हस्त का ललाटक्षेत्र गत प्रयोग करना ।

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४०४ नाट्यशास्त्र १७६-१७७. हस्तों को व्यवथित रूप में निष्पादित कर ( लक्षणानु-सारी ) प्रस्तुत करना ही अभिनय की ' वस्तु ' है । इनमें अनुभावात्मक ' करण ' होते हैं तथा इनका सञ्चय अङ्गहार हो जाता है जिनका विवरण ना ० शा ० ४ अध्याय में दिया जा चुका है । स्थान, चारी तथा नृत्तहस्तों में अब नृत्तहस्तों का निरूपण प्रसङ्ग प्राप्त । इसके बाद क्रमशः स्थान एवं चारी का विवरण कहा जायगा । नृतहस्त-१७८. चतुरस्र नृत्तहस्त: - वक्षःस्थल से हटकर जो अष्टाङ्गुल प्रदेश हो उस पर रहने वाले दो हाथ । आशय यही है कि एक हाथ जब वक्षः पर हाथ आठ अंगुल से हटे हुए स्थान पर हो तो दोनों हाथों में हो और दूसरा रहेगा । इस प्रकार के अन्तर रहने से हाथों में चातुरस्र आठ अंगुल का अन्तर सम्मुख होगा उसी के रहता है । प्राङ्मुख से आशय है कि प्रयोक्ता जिसके तरह चतुरस्र हस्त हों । कूर्पर तथा अंसों में तराजू की डंडी की सम्मुख अभिनय आकर्षण विशेष में किया जाता है । समता रखी जाए । इसका १७६. उदवृत्तहस्त: - ( आशय यही कि ) ' हस्त पहिले चतुरस्र होकर में उद्वेष्टित ( व्यावृत्त ) वर्त्तना प्रचार से हंसपक्ष कर दिये जाते 1 बाद ऊपर की ओर आवर्तन करने से ' उद्धत्त ' हैं । इसी की अन्य आवर्तन के समय संज्ञा ' तालवृन्तक ' भी है । १८०. तलमुख हस्त: - यहाँ ' तथा ' पद का अर्थ है कि व्यावृत्त तथा उद्वृत्त पूर्व में कर लिये जाएँ फिर इसको प्रस्तुत करे । इसमें समाप्ति के समय हंसपक्ष हस्त रखे जाए । इसके तलमुख नाम का हेतु है दोनों हथेलियों का एक दूसरे के सम्मुख हो जाना । मर्दल आदि अवनद्ध वाद्य वादन में इसकी योजना रखी जाती है । १८१. स्वस्तिक तथा विप्रकीर्णहस्त: - तावेव = अर्थात् ' तलमुख ' हस्त ही । ' स्वस्तिक ' = स्वस्तिकाकार में । विप्रकीर्णहस्त पूर्व में कहे गये चारों नृत्तहस्तों का आधार लेकर प्रवृत्त होता है यही यहाँ समझना चाहिए । १८२. अरालकटकामुखहस्त: - अराल के प्रचार द्वारा एक हस्त को अराल तथा द्वितीय को कटकामुख चातुरस्र के संस्थान के साथ प्रस्तुत किया जाता है । अन्य लक्षण से स्वस्तिक संस्थान से अराल एवं कटकामुख हस्तों की रखा जाए । इसका अभिनय वणिक् या सचिव पात्र के वितर्क में किया जाता है ।

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परिशिष्ट: टिपप्णी, अध्याय ९ ४०५ १८३. आविद्धवत्रहस्त: - इस हस्त की योजना भय से कम्पित होने तथा तिरछे होकर खिसकने में की जाती है । १८४. सूचीमुखहस्त: - चतुरस्र स्थान स्थित दोनों सर्पशीर्ष हस्तों को जब तर्जनी के अग्र से तिरछा कर बगल में ले जाकर फैलाते हुए रखे और बाहर फैला कर क्रमशः प्रस्तुत करते रहें ( पर्यायशः ) तो बाहर की ओर फैलाने से इसका सूची सदृश आकार होने से ' सूचीमुख ' है । अन्य पाठ के अनुसार सूचीमुखहस्त वे होते हैं जिनके अंगूठे हथेली के मध्य में फैलाते हुए रहें अतः वे स्वस्तिक आकार में होने वाले सर्पशीर्ष होते हैं तो । १८५. रेचितहस्त: - तेजी से घूमने वाले बिना कुछ बदले हुए हंसपक्ष ही ' रेचित ' होगें तथा हथेलियों को ऊपर फैला देने से विकृत हुए भी ' रेचित ' कहलाएँगे । इसकी योजना नृसिंहावतार में दैत्य के वक्षःस्थल के फाड़ने जैसे कार्य में रखी जाती है । १८६. अर्धरेचितहस्त: - रेचित हस्तों में एक को ' चतुरस्र ' स्थिति में रखना ' अर्धरेचित ' हो जाता है । इसे पर्यायशः भीं प्रस्तुत करना होता है । १८७. उत्तानवश्चितहस्त: - त्रिपताकहस्तों को अंस, कपोल तथा ललाट में से किसी एक स्थान में अंचन क्रिया से युक्त करते हुए परस्पर सामने और तिरछे करें तथा अंसों और कूर्परों में किञ्चित् चलन हो तो इस अंचन के समय उत्तानता की प्राप्ति होने पर पुनः अश्वन में उद्गमन क्रिया का योग होता है अतः ये मृदु रूप में उत्तान तथा अश्चित होने से ' उत्तान-चित ' हैं । १८८. पल्लव तथा नितम्बहस्त: - इसमें दो पताक हस्तों को ऊपर बाहुओं को फैलाकर व्यावर्तित तथा परिवर्तित क्रिया से स्वस्तिक आकार में रखे जाते हैं । ये पल्लव के आकार में होने से ' पल्लव ' कहलाते हैं । अन्य आचार्य शिथिल त्रिपताक हस्त को यदि कलाई ' पल्लव ' बतलाते हैं । यदि दो पताक हस्त प्रथम कन्धों के बराबर को एक दूसरे के सामने रखते हुए अधोमुख किये तक ले जाए जाएँ जहाँ वे पर्यायशः अर्थात् क्रमशः ' नितम्ब हस्त ' हैं । १८६. केशबन्धहस्त: - पहिले एक बाजू से में घूमते हुए रखे जाए तो रखते हुए तथा दोनों तलों जाए तथा नितम्ब प्रदेश रेचक को करते हों तो वे दूसरी बाजू में दो पताक हस्त परिवर्तन करते हुए ऊपर उठे हुए अर्थात् मस्तक के क्षेत्र को प्राप्त करने

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४०६ नाव्यशास्त्र वाले हो पुनः नितम्ब हस्त से क्रमशः आवर्तन प्रत्यावर्तनकारी होतें हों वे हस्त केशो के सम्बन्ध से ' केशबन्ध ' कहलाते हैं । ये शोभाधायक होते हैं तथा आचार्य गण को अतिइष्ट होते हैं । १६०. लताबन्धहस्त: यदि दो पताक हस्त तिरछे फैलाते हुए नीचे बाजुओं में अर्थात् नितम्ब से लताहस्त पर्यन्त त्रिपताकों के रूप में अनुगमन करते हैं तो ' लताबन्ध ' हस्त होता है । १६१. करिहस्त - हस्त: - समुन्नत = अर्थात् जिस क्रम से संश्लेष किया उसी क्रम से ऊँचा उठाते हुए । विलोलित पद से दोला की तरह झुलाते रहने का संकेत मिलता है । यहाँ ' हस्त ' पद का एकवचन में उपन्यास इसलिये किया है कि करी को एक ही हस्त ( सूंड ) होता है । अतः इसका चतुरस्र की तरह न तो सजातीय होकर आरम्भ होता है और न खटकामुख की तरह के अभ्यास के व्यपदेश से विजातीय आरम्भ ही होता है । अतएव नृत का यहाँ उपन्यास नहीं किया गया है । इसका आकार ' करिहस्त ' -द्विवचन का होने से यथार्थ नाम है । १६२. पक्षवचितक हस्त: - यदि कटि के शीर्ष या नोक के आसपास में दो त्रिपताकहस्त रखे जाए तो इससे बाजू अश्चित हो जाती है । बाजू १६३. पक्षप्रद्योतक हस्त: - इसमें बाजू में एक के सम्मुख दूसरा होकर स्वरूप को द्योतित करते हैं । लक्षण में ' एव ' पद से प्रतीत होता है कि अपने इनके व्यामिश्रण या मिलान से प्रयोग में शोभा होती है । गरुडपक्षहस्त: यदि दो पताक हस्त नितम्ब क्षेत्र में अधोमुख होकर हथेली के झटके से ऊपर जाने वाले गरुडपक्ष के आकार को प्राप्त करें तो ' हस्त होते हैं । यहाँ दोनों पताकहस्त ही इष्ट हैं क्योंकि त्रिपताक से ' गरुडपक्ष बाधा मानी गयी है । वक्षःस्थल की एक बाजू १६४. दण्डपक्ष हस्त: - इसमें एक हंसपक्षहस्त से वर्तन या चालू हो तथा उसी समय द्वितीय हंसपक्ष का भुज के प्रसारण पर्यन्त वर्तन होता हो । फिर दूसरे अंग से दोनो ही भुजाएँ प्रसारित, व्या-वर्तित तथा परिवर्तित होती हों । इसमें एक बाजू में बगल से या दूसरी बाजू दण्ड के आकार में रहती है अतः इसका नाम ' दण्डपक्ष ' है । से भुजाएँ एक साथ प्रसारण रहता है किन्तु व्यावर्तन एवं परि-इसमें दोनों हाथों का वर्तन क्रमशः रहते हैं । कर ललाट क्षेत्र १६५. ऊर्ध्वमण्डल - हस्त: - वक्षःस्थल से व्यावर्तित के जरिये से उन्हें पार्श्वों में ले जाकर पुनः वहाँ से मण्डलाकार घुमाव देकर

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ४०७ फैला देने पर ' उर्ध्व मण्डल ' हस्त हो जाते हैं । ललाट प्रदेश तक ऊपर ले जाना ही इसका मुख्यतः ' लक्षण ' है । पार्श्वमण्डल- हस्त: - ऊर्ध्वमण्डल हस्त ही जब पताका के आकार में ( गोल घूमते हुए ) परस्पर सम्मुख एक पार्श्वगत हो जाते हैं तो ' पार्श्वमण्डल ' कहलाते हैं । अन्य आचार्यों का कहना है कि वक्षःस्थल के बराबर अपने ही बाजू या पक्ष में परस्पर आहत भुजों का ताल देकर घुमाते हुए वर्तना क्रम से प्रचार करना ही इस हस्त का स्वरूप है । १६६. उरोमण्डलीहस्त -- इसमें उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित हस्तों का एक साथ योग रखा जाता है तथा ये वक्षःस्थल के समीप या सामने से रहनेवाले होते हैं । इसमें हस्तक्रम ऐसा रखा जाता है कि एक के आगमन से दूसरे का गमन या गोल घुमाना बना रहे ( ऐसी वर्तना रहती है ).. उद्वेष्टित तथा अपवेष्टित क्रिया ' पताक ' हस्तों की होती है । अन्य आचार्यो के मत में यह ' हंसपक्ष ' हस्त में रखे जाने की बात कहीं गयी है । १६७. उरः पाश्र्वार्धमण्डलहस्त: - इसमें वक्षः प्रदेश में उत्तान हस्त को ठहरा कर फिर अलपल्लव हस्त को व्यावर्तित करण से निकाले तथा बाजू में भुजा को फैला दे । यह एक हस्त की प्रक्रिया हुई । तब दूसरे हाथ की अंगुलियों को अराल हस्त में उद्वेष्टित कर लावे । इसके नाम का भी यहाँ यही कारण है कि इसमें एक हाथ से वक्षःस्थल के आवे भाग को और दूसरा हाथ पार्श्व ( बाजू ) में मण्डल की तरह क्रमशः गतागत करते हैं । १६८. मुष्टिकस्वस्तिकहस्त: - इसमें कलाई के समीप में दोनों हाथों में से एक हस्त को अराल वर्तना से कुश्चित रूप से तथा दूसरे हस्त को अलपल्लव वर्तन से अश्चित रूप से बार बार आवागमन करवाने के पश्चात् खटकामुख हस्तों से स्वस्तिक करते हैं । इस प्रकार खटकामुखों की मुष्टि ( हस्त ) से उत्पत्ति होने के कारण इसका ' मुष्टिकस्वस्तिक ' नामकरण सार्थक है । १६. नलिनीपद्मकोशहस्त: - इस हस्त का विभिन्न आचार्यों ने पृथक् २ वर्णन तथा स्वरूप बतलाया है । इसमें मुष्टिक युक्त स्वस्तिक के क्षेत्र में जब दोनों कलाइयों को व्यावर्तित करण से कनिष्ठिका अंगुली एवं अंगूठों का परिर्तन कर देते हैं तब दोनों कलाइयाँ परस्पर पराङ्मुख हो जाती हैं जिससे दो पद्मकोश बन जाते हैं । इस प्रकार इसके नाम के अनुरूप ही एक कमलिनी में अनेक कमलों की उत्पत्ति हो जाने से इसका ' नलिनीपद्म-कोश ' नाम हो जाता है ।

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४०८ नाट्यशास्त्र २००. अलपल्लव या अलपद्महस्त: - जब अलपल्लव हस्तों को वक्षः प्रदेश से उद्वेष्टित क्रिया में रख कर कन्धे के पास तक ऊपर ले जाकर फैला दिया जाए तो ' अलपल्लव ' हस्त होता है । इसका अन्य नाम है ' अलपद्म ' । उल्त्रणहस्त: - इसमें दो अलपल्लव हस्तों को वक्षः क्षेत्र से उद्वेष्टित कर स्कन्ध के पास ऊपर फैलाए हुए एक हस्त से आबिद्ध तथा दूसरे से पल्लव रूप को प्रदर्शित करे तो ' उल्वण ' हस्त होता है । इसकी हर्षभरित मनोवस्था में योजना रखी जाती है । २०१. ललितहस्त: - इसमें दो अलपल्लव हस्तों को मस्तक पर ले जाते हैं । इसमें चतुरस्र से अङ्गों का लालित्य दिखलाया जाता है । अतः इसका नाम भी ' ललित ' है । वलितहस्त: - इसमें कलाई प्रदेश पर लताहस्त स्वस्तिकाकार में चलित या घुमाव लेते हैं । इसमें बाहुओं का वलन होता है अतः इसका नाम ' वलित ' है जो भिन्न - भिन्न वर्तनाओं का संकेत देता है । अन्य आचार्य मुष्टिक स्वस्तिकहस्त को मस्तक पर फैलाने को ( घुमाने को ' बलित ' मानते हैं तथा कुछ अन्य दो कटकामुख हस्तों को एक दूसरे के साथ अग्र भाग लगाते हुए मिला कर ऊपर उठाते हैं जब तक कि वे पृष्ठ तक पहुँच कर कलाई पर झुकाये न जाएँ तो ' वलित ' होता है । नृतहस्तों की संख्या भरतमुनि ने तीस बतलाई है जो केवल उपलक्षण-मात्र हैं । इन नृतहस्तों के अतिरिक्त कुछ अन्य नृतहस्त भी प्राप्त हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं – १. निकुञ्चकहस्त, २. द्विशिखरहस्त, ३. वरदाभयहस्त, ४. सूचीविद्धहस्त, ५. ज्ञानहस्त, ६. मुद्रहस्त तथा ७ प्रकीर्णहस्त । इनके लक्षण तथा योजना नाट्यशास्त्र संग्रह में कारिका संख्या २८६ से २ ९ ५ तक देखना चाहिए । विस्तारभय से यहाँ नृतहस्तों के शेष विवरण भी नहीं दिये जा रहे हैं । २०२-२०३. पताकहस्त सब हस्तों की प्रकृति या कारण माना जाता है । अतः सभी वर्तनाओं में कार्य करने से ' पताक ' सर्वसाधारण होता है तथा शब्द से भी रखता है । यहाँ नाट्यशब्द से अभिनयोपयोगी हस्त और नृत्त प्रमुखता नृत्त के उपयोगी हस्तों की सूचना दी गयी है । २०४ - २०६. जिस अंगुलितुलन रूप क्रिया से अभिनय विशेष का सम्पादन किया जाये उसे ' करण ' कहते हैं । किन्तु जहाँ अभिनय की समाप्ति नहीं होती हो वहाँ ' वर्तना ' की आंकाक्षा रहती है जिसका ' अंगत्रोटन ' के नाम से बुधजन व्यवहार करते हैं ।

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परिशिष्ट: टिप्पणी, अध्याय ९ ४० ९ २०७-२१०. अभ्यन्तरेण इत्यादि । अभ्यन्तर अर्थात् हथेली के सम्मुख बाह्यप्रदेश से लेकर वक्षःस्थल के क्षेत्र तक पहुँचना । इसकी अपेक्षा विपरीत वक्षःस्थल के क्षेत्र विरुद्ध दिशा में कनिष्ठादि का आवर्तन या घुमाव । बहिर्मुखत्व पद से वक्षःक्षेत्र से बहिर्गमन तथा अभ्यन्तरत्व से तलसम्मुखत्व समझना चाहिए । अभ्यन्तरत्व के विपर्यास से बाह्यता यहाँ समझना चाहिए । २११. नृत्त तथा अभिनय में करणों का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाना इष्ट है जो हाथों से होता है । क्योंकि उनसे ही वर्तना उत्पन्न की जाती है । नृत्त तथा नाट्य में उपयोगी हस्त - पाणि हैं । इन्हें मुख, नेत्र, भ्रुकुटि से युक्त या अनुगत ही रखा जाये इसका आशय यही कि जिधर वर्तना चले उधर हो मुखादि रहें । प्रश्न- जब नेत्र, मुखादि का राग वर्तना से व्यक्त होता हो तो उन्हें मुख, नेत्र से युक्त कैसे रखें । उत्तर अभिनय की पूर्ति के लिये यह वर्तना में रहने वाली प्रक्रिया है अतः इसमें पुनरुक्ति नहीं आती । २१२-२१४. क्योंकि अंगुलियाँ बाहु से संलग्न हैं अतः उनकी क्रियाएँ भी बाहु से संलग्न होगी ही जिनके प्रभेद का ज्ञान अपेक्षित होने से उन्हें बतलाते हैं । ये दस प्रभेद हैं । तिर्यक् का आशय है कि उसकी गति पार्श्व में रहती है । उर्ध्व = मस्तक के ऊपर जाता है । अधोमुख = पृथ्वी को छूने वाला । अश्चित = वक्षःस्थल से निकल कर ऊपर शिरःप्रदेश से लौटना । अपविद्ध = चक्राकार गति में चारों ओर घूमना । पृष्ठानुसारी = शरीर के पृष्ठभाग का अनुगमन करने वाला । उद्वेष्टित = जो मणिबन्ध ( कलाई ) से सम्बद्ध वर्तना से निष्क्रामण करे । प्रसारित = जो कलाई के अग्रदेश का अनुधावन करे । इस प्रकार के करणों में द्रुत, मध्य तथा विलम्बित के वैचित्र्य से तथा बाहुओं के पर्याय से उक्त करणों की जब योजना हो तो उसमें अनेक वर्तनाएँ अन्तर्निहित होती हैं । अतः करणों में होने वाली विशेषताओं को अवश्य जान लेना चाहिए । नित्य कहने से यही बात यहाँ संकेतित की गयी हैं क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य कोई इसका प्रयोजन यहाँ नहीं है ।