Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 101–110

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 101 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् " अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति, न स वेद । यथा पशु एवं स देवानाम् " 1 - बृ ० आ ० उप ० १।४।१० । जीवनपय्यन्त केवल इष्टादि कम्र्मों में ही रत रहने वाले ये जीवात्मा ज्ञानसमुच्चित मुक्तिप्रवत्तंक निष्काम कर्म्म से पराङ्मुख रहते हैं । इसी विशुद्ध कर्म के प्रभाव से इसकी श्रात्मविद्या प्रावृत हो जाती है । एतावता ही इन्हें गौणरूप से देवभोग्य अन्न मान लिया गया है । यह सब कुछ होने पर भी इनका भोक्तृत्त्व भी बना रहता है । श्रुति में स्पष्ट ही इनका भोक्तृत्त्व देखा जाता है, जैसा कि श्रुति कहती है— " थ ये शतं पितृणां जितलोकानामानन्दाः, स एकः कर्मदेवानामा-नन्दः । ये कर्म्मरणा देवत्त्वमभिसंजयन्ते । " " स सोमलोके विभूतिमनु-भूय पुनरावर्त्तते " इति । - बृ ० प्र ० उप ० ४ | ३ | ३३ । इस प्रकार अपशब्दोपात्त भूतसूक्ष्म एवं प्राणों से संपरिष्वक्त जीवात्मा का कर्मफल भोगने के लिए लोकान्तर में जाना उक्त ' आरोहोपक्रमाधिकरण ' से भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । प्राचीन व्याख्याताओं ने उक्त अधिकरण की जिस प्रकार से उत्थानिका मानी है एवं अधिकरण के सात सूत्रों के जो अर्थ किए हैं, उनका संक्षेप से दिग्दर्शन करा दिया गया । अब वैज्ञानिक दृष्टि से प्रकृत अधिकरण का विचार किया जाता है । वैज्ञानिक लोग प्राचीन मत में थोड़ा सा संशोधन ग्रावश्-यक समझते हैं । उनके मतानुसार उक्त अधिकरण की उत्थानिका भी दूसरी है एवं सूत्रार्थों में भी कहीं कहीं थोड़ा बहुत अन्तर है, जैसा कि निम्नलिखित प्रकरण से स्पष्ट हो रहा है । - आरम्भ के दो ग्रध्यायों में परमतनिराकरणपूर्वक ( सांख्यादिमत निराकरण ) भगवान् व्यास ने वेदान्ताभिमत ( प्रोपनिषद् ) ग्रात्मा का स्वरूप बतलाया है । बादरायण के मतानुसार भौतिक-शरीर के प्रारम्भक ' भूत - प्राण - इन्द्रियादि ' सबसे विलक्षण, विशुद्ध तत्त्व - विशेष ही आत्मा है । ऐसी स्थिति में प्रेत्यभाव के सम्बन्ध में “ शरीर छोड़ने के अनन्तर यह आत्मा शरीराम्भक भूतप्राणादि से पृथक् होकर ही परलोक में जाता है " यही मानना पड़ेगा । परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है, क्योंकि निरूपाधिक विशुद्ध आत्मा स्वस्वरूप से सर्वथा व्यापक है, एवं व्यापक तत्त्व का शरीर से निकल कर विशुद्धरूप से गमन बन नहीं सकता । उधर आत्मा की लोकान्तर में प्रतिपत्ति शास्त्र सम्मत है । ऐसी स्थिति में क्या माना जाय?, इसी प्रश्न का निराकरण करते हुए व्यास कहते हैं— " तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति - संपरिष्वक्तः, प्रश्ननिरूपणाभ्याम् " [ ६३ ]

पृष्ठ 102

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 102 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् " आत्मा शरीर से बाहर निकल कर लोकान्तर में जाता है " यह मान लेने पर दूसरे शब्दों में आत्मा का बहिमंण्डल के साथ सम्बन्ध मान लेने पर विशुद्ध रूप से इसका उत्क्रमण कथमपि संभव नहीं है | अतः मानना पड़ता है कि, यह आत्मा भूतसूक्ष्मों से संपरिष्वक्त होकर ही लोकान्तर में जाता है । " पूर्वशरीर के स्प्लट जाने पर भी शरीरारम्भक भूत - प्रारण- इन्द्रियादि कितने ही पदार्थों से संश्लिष्ट होकर ही प्रात्मा गमन करने में समर्थ होता है । " यह बात उद्दालक और प्रवाहण के प्रश्न प्रतिवचन से सिद्ध है | वहां पर पानी को बुरुष का उपादान बतलाया गया है । यदि शुद्ध जोबात्मा ही लोकान्तर में जाये, तो पुनः जन्म ग्रहण करता हुआ भी वह शुद्ध रूप से ही पृथिवी पर ग्राबे । ऐसी दशा में पानी को बुरुष का उपादान बतलाना सर्वथा प्रसङ्गत हो जाय । इन्हीं सब परिस्थितियों से यह सिद्ध हो जाता है कि, श्रात्मा भूतसूक्ष्मों से युक्त होकर ही जाता है । २-३-५-६-७ इत सूत्रार्थों के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य नहीं है । यदि कुछ है भी, तो वह विस्ता-रभय से छाड़ा जाता है । वक्तव्य है - " अग्न्यादिगतिश्रुतिरिति चेन्न - भाक्तत्त्वात् " इस चतुर्य सूत्र के सम्बन्ध में । “ शेषं कोपेन पूरयेत् " - ग्रशक्तास्तत् पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते " इत्यादि वचनों की आरा-घना छोड़कर विचार कीजिए । श्रोत वैज्ञानिक रहस्यों का निष्पक्षपातदृष्टि से अवलोकन कीजिए । शापको मानना पड़ेगा कि - " पुराणमित्येव न साधु सर्वम् " यह वचन वास्तव में बहुत सोच समझ कर कहा गया है । उक्त सूत्रार्थ के सम्बन्ध में आज हम एक ऐसे व्यक्ति की समालोचना करने चले हैं, जो विद्वत् समाज में मुद्धन्य माना जाता है । हमारे हृदय में भी उस महापुरुष के प्रति कम श्रद्धा नहीं है 1 फिर भी " शत्रोरपि गुणा त्राच्या दोषा वाच्या गुरोरपि " इस सूक्ति का हम निरादर नहीं कर सकते । पूर्व प्रकरण में चतुर्थ सूत्र का अर्थ बतलाते हुए हम कह आए हैं कि, भगवान् शङ्कराचार्य ' के मतानुसार " यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्नि वागप्येति " ( वृ ० ३।२।१३ | ) इत्यादि श्रुति उसी प्रकार गीगा है, जैसा कि- " श्रौषधीर्लोमानि, बनस्पतीन् केशाः " ( दृ ० ३।२१३ । ) इत्यादि श्रुति गौण अर्थ का प्रतिपादन कर रही है । अपने अभिप्राय का स्पष्टीकरण करते हुए आगे जाकर प्राचार्य कहते हैं— “ लोम और केशों का औषधि वनस्पतियों में समय नहीं देखा जाता । " तात्पर्य्यं इस कथन का यही है कि, जैसे श्रुति ने लोम - केशों का श्रौषधि - वनस्पतियों में लय बतलाया है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । केश लोमों को हम शव के साथ साथ प्रत्यक्ष में जलता हुआ देखते हैं । वस जिस प्रकार लोम केश का औषधि वनस्प-तियों में व्यय बतलाने वाली उक्त श्रुति गौल है । एवमेत्र " यत्रास्त्र बुरुरस्व ० " इत्यादि अग्न्यादिति श्रुति भी गौ अर्थ का ही प्रतिपादन कर रही है । ऐसी अवस्था में अग्न्यादि श्रुति का - " ग्रग्नि वायु प्रादित्यादि देवता वाक् प्राण चक्षु आदि इन्द्रिय प्रारूपों की अधिष्ठात्री देवता है, वागादि की उपकारि-काएं हैं " इस उपकार भाव को सूचित करने के लिए ही " वागादि अग्नि यादि की ओर जाते हैं " यह कह दिया गया है । " " वस्तुतः अग्न्यादि में वागादि का अप्यव नहीं है " - श्राचार्य की दृष्टि में यही अभि-प्राय है । प्राचार्य के मतानुसार उक्त ग्रन्यादि श्रुति एवं औषध्यादि श्रुति, दोनों गौण हैं एवं " तमुत्क्रा-मन्तं प्राणोऽनूतामति " इत्यादि उत्क्रमण श्रुति ही मुख्य है । इस प्रकार भगवान् शंकर के मतानुसार व्याससूत्र में बठित " भाक्तत्त्वात् " पद का गौण अर्थ है | वैज्ञानिक श्रुति के सम्बन्ध में उक्त अर्थ मानने में अणुमात्र भी सहमत नहीं हैं । श्रुतियों में गोल-[ ६४ ]

पृष्ठ 103

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 103 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् मुख्यभाव मानना सर्वथा अनुचित है । श्रुति कोई श्रलङ्कारशास्त्र नहीं है, जहां मिथ्याकल्पनाओं का यथाभिरुचि समावेश मान लिया जाय । अपितु श्रुति साक्षात्कृतधर्म्माऋषियों का आर्षदृष्टि से देखा हुआ निश्चित अर्थ है । " अमुक विषय गौण है, अमुक विषय मुख्य है, इसे सत्य समझो, इसे केवल कल्पना समझो " श्रीतशास्त्र के सम्बन्ध में ऐसी कल्पना करना भी अपने आपको प्रत्यवायी बनाना है । जब श्रुति ही गोमुख्यभाव का आश्रय लेगी, तो निःसंदिग्ध अर्थ का प्रतिपादन कौन करेगा? अपने इसी निःसंदिग्ध भाव को सूचित करती हुई, सर्वत्र मुख्यार्थ भावना को ही दृढ़मूल बनाती हुई स्वयं श्रुति ही एक स्थान पर कहती है ।

* संपूषन् विदुषा नय यो प्रज्जसानुशासति ।

य एवेदमिति ब्रवत् ॥ १ ॥

समु पूष्णा गमेमहि यो गृहाँ अभिशासति ।

इम एवेति च ब्रवत् ॥ २ ॥

—ऋक्सं ० ६।५८।१-२ । श्रुति जो कुछ कहती है, अक्षरशः सत्य है । श्रुति का प्रत्येक प्रतिपाद्य विषय मुख्य अर्थ से ही सम्बन्ध रखता है । श्रौत वचनों में गौणभाव का, शून्यकल्पना का किश्वित् भी समावेश नहीं है । जिस औषध्यादि श्रुतिवचन को शङ्कराचार्य गौणभाव का प्रतिपादक समझते हैं, हमारी दृष्टि में वह मुख्यार्थं काही निरूपण कर रही है । हमारे शरीर में जितने भी रोमकूप हैं, उन सब का नाक्षत्रिक प्राणों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध हैं । चान्द्रमण्डल नक्षत्रयुक्त है । ग्रतएव चन्द्रमा को उडुपति माना गया है । जिस समय गर्भाशय में डिम्भ ' कलल ' रूप में परिणत रहता है, उसी समय नक्षत्रों की निराकार प्राणात्मिका रश्मियाँ इसमें प्रविष्ट होकर सुधिर ( छिद्र ) उत्पन्न कर देती हैं । वे ही छिद्र ' रोमगर्त ' किंवा ' रोमकूप ' नाम से प्रसिद्ध होते हैं । जितने भोग्य नक्षत्र हैं, हमारे शरीर में उतने ही रोमगर्त हैं । चान्द्र सौम्य प्रारणावच्छिन्न नक्षत्रों की रश्मियों से ही रोमकूपों का निर्माण होता है । इसी अर्थ का स्पष्टीकरण करती हुई वाजिश्रुति कहती है-* हे पूषा देवता मुझे ( जिज्ञासू को ) आप ऐसे विद्वान् से मिलाइये! जो बड़ी सरल रीति से समझाता है, एवं जो ( प्रत्येक विषय के लिए ) " यह ऐसा ही है " इस प्रकार निःसंदिग्ध रूप से प्रतिपा-दन करता है । [ ६५ ]

पृष्ठ 104

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 104 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम लण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् “ एभ्यो लोमगर्त्तेभ्य ऊर्ध्वानि ज्योतींष्यान् । तद्यानि तानि ज्योतींषिः एतानि तानि नक्षत्राणि । यावन्त्येतानि नक्षत्राणि तावन्तो लोमगर्त्ताः । यावन्तो लोम गर्त्तास्तावन्त: सहस्त्रसंवत्सरस्य मुहूर्त्ताः । " — शत ० ब्रा ० १० १४ । ४ । २ । इति रोमकूप नक्षत्रत्राणयुक्त चान्द्रप्रारण प्रधान होते हुए सीमाप्रधान हैं । ' सोमो वै राजा ओषधीनाम् ” ( तै ० ब्रा ० ३।६।१७ । १ । ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार सम्पूर्ण श्रौषधियों का उपादानकारण नक्षत्र-प्राणानि चान्द्रसोम ही है । प्रौषधियों में सौर रस ( आग्नेयर स ) न हो, यह बात तो नहीं है, परन्तु इनमें प्रधानता चन्द्रसोम की ही रहती है, ग्रतएव श्रौषधियों को सोमरस ही मान लिया जाता है । सौर ऊष्मा ( सौरअग्नि ) गर्भित चान्द्रसोम ही औषधियों का प्रारम्भक बनता है । औषधियों का स्थूल दृश्य भाग सोम्य है, इनके गर्भ में सौर अग्नि प्रतिष्ठित रहता है, अतएव " ओषं ( ऊष्मभावं सौराग्नि स्वगर्भ ) घत्ते ” इस व्युत्पत्ति से इन्हें ' औषधी ' कहा जाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-" ( प्रजापतिः ) तां ( आहुति ) व्यौक्षत् ( श्रावत्यजत् ) प्रोषधय-इति ( ब्रुवन् ), तत ओषधयः समभवन् । तस्मादोषधयो नाम । " - शत ० २ | २ | ४ | ५ | इति । इन प्रोपधियों की शारीराग्नि में प्राहुति होती है । इससे अग्नि प्रज्वलित हो जाता है । यह ग्रग्निगर्भित सोम ही सजातीय सम्बन्ध के कारण रोमकूपों से निरन्तर बाहर निकला करता है । बाहर से रुद्रवायु ( रूक्षवायु - यमवायु ) का श्राघात होता है । इस श्राघात से रोमद्वारों पर आया हुआ सोम-गुणक रुधिरमूर्ति वह अग्नि जम जाता है । इस प्रकार रोमकूपों से बाहर निकल कर रुद्रवायु की रूक्षता से जमने वाला, सौराग्निगर्भित औषधि नाम से प्रसिद्ध चान्द्ररस ही हमारी रोमावलियाँ हैं । प्रौषधिरस ही रोमावलियाँ बनता है । वास्तव में प्रौषधियाँ ही ( भुक्त औषधि लक्षण ग्रग्निगर्भित सोमरस ही ) लोमों का प्रभवस्थान है । जिस प्रकार औषधियों का निर्माण चान्द्रसोम से होता है, एवमेव वनस्पतियों में सौर- अग्नि की प्रधानता है । यहां सोम गर्भ में है । सोमगर्भित सौर अग्नि ही बनस्पतियों का उपादान कारण है । वन-स्पतियों की आहुति से शारीराग्नि प्रज्ज्वलित रहता है । अग्नि बाहर निकलता है, रुद्रवायु के प्राघात से जमकर वहीं केशरूप में परिणत हो जाता है । लोमों में जहाँ सौम्य प्राण की प्रधानता थी, अतएव लोम जहाँ अस्थिर, सूक्ष्म, मृदु थे, वहाँ इन केशों में अग्नितत्त्व प्रधान है एवं ये घन हैं, स्पर्श में कर्कश हैं । केश अग्नि का मलभाग है, अग्नि से निवारित है । इसी निवारण भाव से ( अग्नि से निवारित होने से ) इन्हें ' वार ' किंवा ' बाल ' कहा जाता है । जिस प्रकार मनुष्य अपने मलभाग से घृणा करता है । ग्रतएव जिसके शरीर पर जितने अधिक केश होते हैं, उसे उतनी ही कम बंद लगाती है । केशों से घृणा करने [ ९ ६

पृष्ठ 105

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 105 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् वाला अग्नि शरीर से बाहर नहीं निकलता । अतएव शीत का सामना करने के लिए जितना अग्नि चाहिए, केशों से अवरुद्ध उतना अग्नि शरीर में प्रतिष्ठित रह जाता है । केशादि से विनिम्मित जिस कम्बल को लोकभाषा में गरम कहा जाता है, विज्ञानदृष्टि से वह केशनिम्मित कम्बल महाठंडा है, अग्नि का उच्छिष्ट है । फिर भी जो इसे गरम कहा जाता है, इसका कारण यही है कि, कम्बल के आवरण से स्वमलसे घृणा करने वाला अग्नि अन्तर्मुख बन जाता है । फलतः शीत का अनुभव नहीं होता । कहना यही कि, वनस्पतिरस केशों का एवं श्रौषधिरस लोगों का प्रभवस्थान है । पृथिवी के गर्भ में प्रज्वलित रहने वाला प्रक्षाग्नि पृथिवी का आत्मा है । सम्पूर्ण भूपिण्ड इस श्रात्मा का शरीर है । भूपिण्ड में इतस्ततः व्याप्त रहने वाली प्रौषधि वनस्पतियाँ इस पार्थिव प्रजापति के केश - लोम हैं । वनस्पतियाँ केश हैं, ग्रौषधियाँ लोग हैं । यही स्थिति अध्यात्मसंस्था की है । ' अग्नि-वायु - इन्द्र प्रधान वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ ' की समष्टि जीवात्मा है । पाञ्चभौतिक पार्थिव पिण्ड इसका शरीर है । लोम ओषधियाँ हैं, केश वनस्पतियाँ हैं । शरीर परित्यागानन्तर ये केश - लोम अग्नि सम्बन्ध से विश-कलित होकर भूपिण्ड में सर्वत्र व्याप्त ग्रौषधि - वनस्पति - प्राणों में चले जाते हैं । दोनों का स्वप्रभवस्थानों में विलयन हो जाता है । पार्थिव प्रजापति के रोमगतों से प्रवधियाँ निकलती हैं, इन औपधियों से हमारे लोम बने हैं । इसी लोमविज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है— " प्रजापतेवित्रस्तस्य यानि लोमान्यशीयन्त, ता इमा श्रौषधयोऽभवन् ” - शत ० ७।४।२।११ । पूर्व कथनानुसार औषधियों में वनस्पतिप्रभव सौर अग्नि गर्भ में प्रतिष्ठित रहता है, अतएव — " औषधिवनस्पतयो वै लोमसु श्रिताः " ( तै ० व्रा ० ३ | १० | ८ | ७ | ) इत्यादि से कहीं - कहीं लोम के साथ औषधि वनस्पति, दोनों का सम्बन्ध मान लिया जाता है । हम कह आए हैं कि, लोम में सोम की प्रधा-नता है, एवं केशों में अग्नि की प्रधानता है । उधर - ' पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते " ( ऋक ० सं ० ६।८।३।१ । ) के अनुसार गाङ्गेयस्वरूप संपादक सोमतत्त्व को पवित्र माना गया है । यद्यपि केशवत् लोम भी अग्नि का ही मल है, तथापि सोम की प्रधानता के कारण लोम भाग उस प्रकार दोषसंक्रान्त नहीं बनते, जैसे कि अग्निबलप्रधान केश श्रात्मा को प्रमेध्य अशुचि बना डालते हैं । शरीरगत प्रशुचिभाव का दृढ़ सम्बन्ध इन केशों के साथ ही होता है । इसी विज्ञान के आधार पर दीक्षित केवल केश श्मश्रु ही कटवाता है । अतएव च ग्राशौच शुद्धि के लिए केश मुण्डन का ही विधान है । उक्त विवेचन से विज्ञ पाठकों को यह विदित हो गया होगा कि केग और लोम वास्तव में प्राणा-पेक्षया स्वप्रभवभूतधि वनस्पति - प्राणों में ही लीन होते हैं । इस प्रकार " श्रधि नमानि वनस्पतीन्-* उपवास में फलाहार का विधान, अन्न का निषेध क्यों किया गया? ग्रौषधि मन का, वनस्पति वुद्धि का आरम्भ कैसे बनती है? इन सब विषयों का विशद वैज्ञानिक विवेचन शतपथ विज्ञानभाष्यान्तर्गत व्रतोपनमीमांसा प्रकरण में देखना चाहिए । [ ६७

पृष्ठ 106

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 106 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् केशाः " इत्यादि जिस श्रुति की गोणता का प्रतिपादन करते हुए प्राचार्य इसके आधार पर अग्न्यादि श्रुति की गोणता सिद्ध कर रहे हैं ' वह कैसे श्रुतिसम्मत मानी जा सकती है? अब हमारे लिए केवल प्रश्न यह बच जाता है कि, " यदि श्रोषध्यादिश्रुति गौरण अर्थ का निरूपण न कर मुख्यार्थ का ही प्रतिपादन करती है, तो अग्न्यादिश्रुति में पढ़े हुए भाक्तत्वात् ' का क्या अर्थ है? उत्तर में हम यही निवेदन करेंगे कि— ' तस्य वा एतस्य हृदयस्य देवसुषयः " ( छा ० उप ० ३ | १३ | १ | ) इस छान्दोग्य श्रुति के अनुसार हृदय में ' अग्नि ' - ' वायु'- ' आदित्य ' - ' दिक् - सोम ' ये पाँच प्राण देवता नित्य प्रतिष्ठित रहते हैं । इन पाँचों मौलिक प्राण-देवताओं के आधार पर ' भक्ति ( भाग - ग्रंश - अबयव रूप से क्रमशः ' वाक् प्राण - चक्षुः-: - श्रोत्र मन ये पाँच इन्द्रप्राण प्रतिष्ठित रहते हैं । दूसरे शब्दों में इन्द्रियप्रारण भाक्त संबन्ध से उन देवताओं के प्राश्रित है । जब आत्मा शरीर से उत्क्रान्त होता है, तो पाँचों इन्द्रियप्रारण भी भूतसूक्ष्मों से मुक्त रहते हुए उक्त पाँचों देवताओं की भक्ति ( श्रवयव ) बने हुए ही आत्मा के साथ साथ उत्क्रान्त होते हैं । " पाँचों प्राण अपने पाँचों देवताओं की भक्तियाँ हैं, इसी भक्तिभाव का स्पष्टीकरण करती हुई – “ यत्रास्यपुरुषस्याग्निं वागप्येति ” इत्यादि अग्निश्रुति हमारे सामने आती है । इसका तात्पर्य्य यह नहीं कि इन वागादि का उत्क्रान्त आत्मा के साथ कोई सम्बन्ध कहीं रहता, किंवा बागादि का अपने प्रभव में ग्रप्यय हो जाता है, अपितु उक्त श्रुति का तात्पर्य यही है कि जिस प्रकार उत्क्रान्त प्रात्मा के साथ भूतसूक्ष्मों का सम्बन्ध रहता है, भूता-धिष्ठाता इन्द्रियप्राणों का समन्वय रहता है, एवमेव इन प्राणों के आधारभूत देवता भी संपरिष्वक्त रहते हैं । ‘ देवता, प्रारण, भूतसूक्ष्म, विद्या, कर्म्म, पूर्वप्रज्ञा ' आदि सारी सामग्रियों से संपरिष्वक्त होकर ही श्रात्मा ' रंहति ' कहा गया है । यही कारण है कि, अन्य श्रुति ने भूतप्राणवत् उक्त देवताओं का भी ग्रात्मा के साथ गमन बतलाया है, जैसा कि महर्षि पिप्पलाद कहते हैं—

" विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः, प्रारणा, भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र ।

तदक्षरं वेदयते यस्तु सौम्य स सर्वज्ञः सर्शमाविवेश " ॥

— प्रश्नोपनिषत् ४।११ इस प्रकार उक्त प्रकरण से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि, " भूतसूक्ष्म, मुख्यप्राणानुगृहीत इन्द्रियप्राण, इन्द्रियाणाधिष्ठाता अग्निवाय्वादि देवता, इन सबसे युक्त होकर ही आत्मा लोकान्तर में जाता है । " पूर्व प्रतिपादित ' श्रारोहोपक्रमाधिकरण से बतलाना हमें यही था कि, आर्यसाहित्य का सर्वमान्यदर्शन ( वेदान्त दर्शन ) आत्मा को शरीर से भिन्न तत्त्व मानता है, एवं स्थूल शरीर परित्याग के अनन्तर वह इसे * " जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् " इस स्मार्त सिद्धांत के अनुसार ' पराप्रकृति ' नाम से प्रसिद्ध ' अक्षर ' ही जीवात्मा है । इस अक्षर रूप जीवात्मा के साथ प्रज्ञानसंपरिष्ववत विज्ञान, भूत, प्राण, देवता आदि का नित्य सम्बन्ध रहता है । इस विषय का विशद विवेचन " प्रश्नोपनिपद्विज्ञानभाष्य " में देखना चाहिए | [ ६८ ]

पृष्ठ 107

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 107 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् सूक्ष्मशरीर धारण कर कर्म्मफल भोगने के लिए लोकान्तर में गमन करने वाला हमारी अध्यात्मसंस्था मानता है । ऐसी अवस्था में त्रास्तिक कहलाने वाले किसी भी प्रार्ष व्यक्ति को आत्मा की नित्यता, उसके परलोक गमन एवं वहां पर शुभाशुभ फल भोगने के सम्बन्ध में अविश्वास नहीं हो सकता । लोकान्तर में जाने वाले ' प्रेत ' मंज्ञक ग्रात्मा को श्रद्धासूत्र द्वारा अन्नादि से तृप्त करना हीं श्राद्धकर्म्म है । श्राद्ध का शरीर के साथ सम्बन्ध नहीं है अपितु आत्मा के साथ सम्बन्ध है । सुतरां श्राद्धकर्म्म पर निष्ठा प्राप्त करने से पहिले आत्मा को शरीर से पृथक् मान लेना, साथ ही में उसकी लोकान्तर गति में विश्वास कर लेना आवश्यक हो जाता है । हमारा यह निबन्ध नास्तिकों के बुद्धिदोष का सम्यक् रूप से परिमार्जन करता हुग्रा आस्तिकों की श्रद्धा को दृढ़मूल करने में पर्याप्त रूप से सहायक सिद्ध होगा । " आत्मा अखण्ड है, व्यापक है । न उसकी आगति है, न गति है । न कभी वह जन्म लेता, न कभी मरता । जिस स्थान पर चिद्ग्राहक वीध ( स्वच्छ स्निग्ध ) पदार्थ रहता है, उसी स्थान पर प्रति-बिम्बित होकर वह चमक पड़ता है । सम्पूर्ण रोदसी त्रैलोक्य में सूर्य्य व्यापक है । यह सब कुछ होने पर भी सभी स्थानों में, सभी काल में वह प्रकट नहीं होता । आप पानी का पात्र रख दीजिए, वहीं प्रतिबिम्ब रूप से सूर्य्य प्रकट हो जायगा । पात्र तोड़ दीजिए, प्रतिबिम्बित सूर्य्यं जहां का तहाँ विलीन हो जायगा । ठीक यही स्थिति ' ईश्वर एवं तदंशभूत जीवों की समझिए । सम्पूर्ण विश्व में ' परमात्मा ' नाम से प्रसिद्ध ईश्वरतत्त्व समानरूप से व्याप्त हो रहा है । " तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् । " जहाँ-जहाँ उसे वीघ्र महतूसोम मिलता है, प्रतिबिम्बरूप से वहाँ वहाँ वह प्रकट हो जाता है । महत् सोमावच्छिन्न इसी प्रतिबिम्बभाव का नाम जीव है । महद्भेद से जीवों में भेद है । जिस प्रकार एक पात्र के टूट जाने से केवल तत्पात्रस्थ प्रतिविम्बित सूर्य्यं का ही परज्योति में लय होता है, अन्य प्रतिबिम्बों पर इस दशा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, एवमेव एक महत् पात्र के विच्छिन्न होने से केवल उसी संस्था का लय होता । अन्य जीव संस्थाएँ ज्यों की त्यों सुरक्षित रहती हैं । अपिच जिस प्रकार प्रतिबिम्बित सूर्य कोई पू-र्वभाव नहीं है, न वह कहीं से आया है, न वह कहीं जायेगा, उद्बोधक, किंवा अभिव्यञ्जक सामग्री के उपस्थित हो जाने पर वह उसी स्थान पर प्रकट हो जाता है एवं आधार के नष्ट हो जाने पर वहीं उन्मु-ग्धावस्था में परिणत हो जाता है । एवमेव त्रैलोक्य व्यापक आत्मा का प्रतिबिम्बभूत जीव न कहीं से आता है, न कहीं जाता है । महत् के ग्रा जाने से वह वहीं प्रकट हो जाता है, अन्यथा वहीं विलीन हो जाता है - " इहैव समवलीयन्ते । " व्यापक प्रात्मा का गमनागमन का अभाव, श्राद्धकर्म्म की मूलभित्ति ( जड़ ) को कम्पित करने के लिए पर्याप्त नहीं है? जब न वह कहीं जाता, न कहीं से जाता तो फिर किस का जन्म?, विसका मरण?, किसका लोकान्तर में गमन?, किसका श्राद्ध?, सभी मत्तप्रलाप-कोटि में आ जाते हैं । यदि अभ्युपगमवाद से, किंवा तुष्यदुर्जनन्याय से थोड़ी देर के लिए आत्मा का लोकान्तर में गमन मान भी लिया जाता है, तब भी श्राद्धभक्तों का समाधान नहीं हो सकता । ग्रात्मगति का स्वरूप बत-लाते हुए, उस समय की अवस्था का चित्रण करते हुए भगवान् व्यास ने एक स्थान पर कहा है-— [ ६६ ]

पृष्ठ 108

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 108 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड व्रजंस्तिष्ठन् पर्दकेन यथैवैकेन गच्छति । अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् यथा तृरणजलौकेयं देही कर्मगतिं गतः ॥ - श्रीमद्भागवत जलौका ( चातुर्मास्य में उत्पन्न होने वाला, प्रान्तीय भाषा में ' केंचुग्रा ' नाम से प्रसिद्ध जन्तु -विशेष ) जब आगे के भाग से आगे की भूमि पकड़ लेता है, तब वह पिछली ज़मीन छोड़ता है । ठीक इसी प्रकार जीवात्मा तभी अपने पूर्वशरीर को छोड़ता है, जबकि वह अपनी स्वरूप रक्षा के लिए पहले नवीन शरीर ग्रहण कर लेता है । तात्पर्य्य इसका यही है कि, पूर्वशरीर से निकलते निकलते वह नवीन शरीर में प्रविष्ट हो जाता है । दूसरा शरीर इस के लिए पहले से तय्यार रहता है । पहले को छोड़ता जाता है, दूसरे में प्रविष्ट होता जाता है । पूर्वशरीर का परित्याग, उत्तर - शरीर का ग्रहण, दोनों काम समान काल में होते हैं । " प्रथम शरीर धारण करते ही द्वितीय शरीर धारण कर लेता है " इसका तात्पर्य यही मानना पड़ता है कि, वह जीवात्मा पूर्व योनि को छोड़ कर अन्य योनि में चला जाता है । इस प्रकार तृणजलोका - त्याय से योन्यन्तर में गए हुए उस जीव के साथ इसके पुत्रादि का कोई सम्बन्ध नहीं रहता । ऐसी अवस्था में उसे श्राद्ध द्वारा हम किसी प्रकार की सहायता पहुंचावें, यह सर्वथा असंगत है! मान लीजिए, कर्म्मविधान के वैचित्र्य से किसी का ग्रात्मा श्व - शूकरादि किसी योनिविशेष प्रविष्ट हो गया । क्या पुत्रादि द्वारा प्रदत्त श्राद्धान्न इस पशु को मिलेगा? क्या हमारा श्राद्धकर्म्म पशुयोनि में प्रविष्ट प्रश्वादि पशुओं की तृप्ति का कारण बनता है?, भला एक प्रमत्त के अतिरिक्त कौन विचारशील ऐसे श्रवज्ञानिक, युक्तिविरुद्ध श्राद्धकर्म पर विश्वास करेगा । अच्छा, हम थोड़ी देर के लिए यह भी मान लेते हैं कि, ग्रात्मा स्थूलशरीर छोड़ने के ग्रनन्तर पश्वादि योनियों में न जाकर सूक्ष्म ( प्रतिवाहिक ) शरीर धारण कर लोकान्तर में जाता है, एवं यह भी मान लेने में हम कोई आपत्ति नहीं समझते कि, परलोकगत आत्मा के साथ इसके वंशधरों का श्रद्धा-सूत्र द्वारा सम्बन्ध बना रहता है । यह सब कुछ मान लेने पर भी श्राद्धकर्म्म तो सर्वथा अप्रतिष्ठित ही रहता है । कारण स्पष्ट है । स्वस्वरूप से व्यापक आत्मा को स्वकर्म्मवश परिच्छिन्न होना पड़ता है । कर्म्मो के तारतम्य से ही इसे यथावसर सुख दुःख का भागी बनना पड़ता है । साथ ही में प्रत्येक जीवात्मा अपने अपने शुभ अशुभ कर्मों का अपने श्राप उत्तरदायी है । " एक कर्म्म करे, दूसरा उसका फल भोगे ” कर्म्मसिद्धान्त की दृष्टि से यह सर्वथा असंभव है । कर्म्म की इसी नियत एवं वैयक्तिक व्यवस्था को लक्ष्य में रख कर " देही कर्म्मगति गतः " यह कहा गया है । इसी आधार पर निम्नलिखित मुक्ति प्रचलित है—

सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेषा ।

स्वकर्मसूत्रग्रथितो हि लोकः ॥

जब यह बात है, तो अपने कर्म्मभोग से परलोक गए हुए, कम्र्मानुसार सुख दुःख भोगते हुए प्राणी को एक तटस्थ व्यक्ति श्राद्धादि से तृप्त करने का क्या अधिकार रखता है? यदि पुत्रादि द्वारा प्रदत्त अन्न से प्राणी तृप्त हो जाता है, तो कर्म्मसिद्धान्त छिन्न भिन्न हो जाता है । यदि उसने बुरे कर्म किए होंगे, तो श्रवश्यमेव उसे क्षुधा पिपासा -यामीगातना आदि जनित दुःख भोगने पड़ेंगे । यदि शुभ [ १०० ]

पृष्ठ 109

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 109 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् कर्म किए होंगे, तो विधि विधान उसे स्वयं सुखी बना देगा । फलतः उक्त कर्म सिद्धान्त के आधार पर भी श्राद्धकर्म की निःसारता सिद्ध हो जाती है । अपिच, श्राद्धकर्म का फल बतलाने वाले आचार्यों ने कहा है कि, जो मनुष्य विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, उस का वंश कभी नष्ट नहीं होता । उसकी सम्पति, श्रायु, कीर्ति, सब कुछ समृद्ध रहते हैं । बिलकुल मिथ्या! सर्वथा कल्पना!! श्राद्ध करने वाले थोड़े, न कर वाले बहुत । श्राद्ध करने वाले भी निःसन्तान, दुःखी, अल्पायु देखे जाते हैं, न करने वाले भी बहु - सन्तानयुक्त, सुखी, दीर्घायु होते हैं । इस वैषम्य का क्या कारण? इस प्रकार आत्म - सम्बन्धी इस श्राद्ध कर्म के सम्बन्ध में अनेक संदेह उपस्थित होते हैं । इन सब सन्देहों का मूल कारण है - श्रात्मा का यथावत् न जानना । यदि ग्रात्मा के वास्तविक स्वरूप को जान लिया जाता है, तो पूर्वोक्त सन्देहों का कोई मूल्य नहीं रहता । यद्यपि उपनिपदादि शास्त्रों में ग्रात्म का स्वरूप सर्वथा निर्णीत है, परन्तु जैसा कि हम प्राक्कथन में निबेदन कर चुके हैं, वेदार्थपरिशीलन के अभाव से, साथ ही में साम्प्रदायिक मताभिनिवेश से ग्राज उन सद्ग्रन्थों का सदाशय सर्वथा विलुप्त - सा हो गया ' है । एक ही शास्त्र का चिन्तन करने वाले भारतीय विद्वानों ने अनेक प्रकार की भ्रान्तियाँ फैला रखी हैं । सब अपने अपने मताभिनिवेश में पड़ कर धर्म का स्वरूप विकृत कर देश का सर्वनाश करने पर तुले हुए हैं । वर्त्तमान युग की इसी क्षुद्रस्वार्थमयी मनोवृत्ति का दिग्दर्शन कराते हुए महात्मा तुलसीदास

ने कहा है: -हरित भूमि बृरण संकुल, समुझि परं नहीं पन्थ ।

जिमि पाखण्ड विवाद तें, लुप्त भए सद ग्रन्थ ॥

- ० रा ० कि ० कां ० २२ दो ० । इन्हीं सब विधम समस्याओं को श्राद्धविज्ञान में विघ्नभूत देखकर सर्वप्रथम हमने ' आत्म - विज्ञानो-पनिषत् ' लिखना ग्रावश्यक समझा है । आत्मस्वरूप परिज्ञान के बिना श्राद्धसम्बन्धी उक्त सन्देहों का निराकरण कठिन ही नहीं, प्रपितु असम्भव है । व्याख्याताओं के मताभिनिवेश की कृपा से आज दिन विद्वानों ने ग्रात्मशब्द से किसी ग्रखण्ड-तत्त्व का ग्रहण कर रक्खा है । उनका विश्वास है कि, आत्म अखण्ड बनता हुआ भी चिदाभासरूप से सखण्ड दिखलाई पड़ता है । इधर वैज्ञानिकों का कहना है कि, ग्रखण्डतत्त्व को तो आत्मा कहना ही अशुद्ध है । ' अहं ' शब्द वाच्य आत्मा सर्वथा सखण्ड है । वह भी एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, अपितु प्रति शरीर में संख्या में १५-१५ हैं । हम ' आत्मा ' नहीं हैं, अपितु ' आत्मग्राम ' हैं । " पन्द्रह आत्माओं की समष्टि अहं पदार्थ है " यह सुनकर सम्भव हैं, ग्राजकल के कल्पना रसिक विद्वान् हमारे उक्त सिद्ध अर्थ को केबल कल्पना ही समझने लगें । परन्तु हमारा दृढ़ निश्चय कि, जिन १५ सखण्ड श्रात्माओं का इस प्रकरण में हम दिग्दर्शन कराने वाले हैं, उनकी प्रामाणिकता में अणु मात्र संदेह का अवसर नहीं है । [ १०१ ]

पृष्ठ 110

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 110 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् साथ ही हमें यह भी विश्वास है कि, यदि उन्होंने आद्योपान्त इस ' आत्मविज्ञानोपनिपत् ' को पढ़ने का कष्ट किया, तो चिरकाल से चली आने वाली वेदविरुद्ध एकात्मवाद की भावना ( ' कर्म - उपासना श्राद्ध ' आदि की अपेक्षा से ) सर्वथा छिन्न - भिन्न हो जायगी, एवं उन्हें बाध्य होकर अनेकात्मवादानुगृहीत एकात्मवाद पर विश्वास करना पड़ेगा । वैज्ञानिकों ने आत्मा के १ – ' अखण्डात्मा, २ – ' परात्परात्मा ' ३ – ' षोडशीपुरुषात्मा ' ४ - यज्ञ-पुरुषात्मा ' ५ - ' विराट्पुरुषात्मा ' ये पाँच प्रधान विवर्त माने हैं । इन पाँचों का ही निरूपण आगे होने वाला है । प्रकृत में केवल इनके विवर्त्तभावों को जान लेना ही पर्य्याप्त होगा । उक्त पाँचों प्रात्मविवत्त में पाँचवां ' विराट्पुरुषात्मा ' ' ईश्वर ' एवं ' जीव ' भेद से दो प्रकार का है । दोनों में प्रत्येक के १५-१५ विवर्त्त हैं । इन पन्द्रहों आत्माओं की समष्टि " प्राकृतात्मा " नाम से प्रसिद्ध है । पन्द्रह ग्रात्माओं की समष्टि ' ईश्वरविराट् ' ( महाविराट् ) है एवं पन्द्रह आत्माओं की समष्टि ही ' जीवविराट् ' ( क्षुद्रविराट् ) है । इनकी प्रतिष्ठा ‘ यज्ञ - पुरुषात्मा ' है । यज्ञात्मा की सत्ता ' पोडशीपुरुषात्मा ' पर निर्भर है । पुरुषसत्ता परात्परात्मा पर प्रतिष्ठित है । सब की परमप्रतिष्ठारूप ' अखण्डात्मा ' किंवा प्रखण्डब्रह्म है । यज्ञात्मा पर प्रतिष्ठित रहने वाले, प्राकृतात्मा नाम से प्रसिद्ध पन्द्रह सखण्डात्मा वेद में निम्नलिखित नामों से प्रसिद्ध हैं । इनके सम्यक् परिज्ञान से सब सन्देह मिट जाते हैं, इसी अक्षरानुगृहीत खण्डात्मविज्ञानज्ञान-जनित फल का दिग्दर्शन कराती हुई उपनिषच्छ ति कहती है-५

भिद्यते हृदयग्रन्थिरिच्छद्यन्ते सर्वसंशयाः ।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरें ॥

. प्राकृतात्मविवर्त्तपरिलेख ५ १ - विज्ञानात्मा - मुण्डकोपनिषत् २।२।८ ५ १ - अन्तर्यामी २- सूत्रात्मा . ३ - वेदात्मा ( ४- चिदात्मा ३ स्वायम्भूवाः २ पारमेष्ठ्यो -५ - यज्ञात्मा परमेष्ठी स्वयम्भूः चान्द्राः २ सोरौ चन्द्रमाः | १ सूयः भीमः १ वायव्यः ३ पार्थिवाः . २ - देवात्मा ३ - प्राकृति महान् ४- प्रकृतिमहान् . ५ - प्रकृति महान् १५ [ १०२ ] १- बाह्यात्मा भूपिण्ड: २ - हंसात्मा भूवायुः ३- वैश्वानरात्मा ४- तैजसात्मा - उख्या पृथिवी ५- प्राज्ञात्मा