Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 91–100
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 91–100
पृष्ठ 91
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् पुरुष की आंखों में अन्य पुरुष प्रतिविम्बित होता है, उस प्रकार शवशरीर की प्रांखों में प्रतिबिम्ब क्यों नहीं प्रतिष्ठित होता? इस प्रश्न के समाधान के लिए आपको शरीर से सर्वथा भिन्न प्रतिबिम्बग्राहक एक तत्त्व विशेष ( आत्मा ) मानना पड़ेगा । जब वह उत्क्रान्त हो जाता है, तो प्रतिबिम्ब का उदय नहीं होता । प्रतिबिम्बित पुरुष को आत्मा बतलाने का अभिप्राय यही था कि, जिस तत्त्व के आधार पर यह प्रतिबिम्ब स्वरूप में प्रतिष्ठित है वही ग्राहकतत्त्व आत्मा है । ' मरने के अनन्तर प्रतिबिम्ब क्यों नहीं रहता ' यदि इन्द्र यह विचार करते, तो उन्हें श्रात्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता । अपि च सर्वाङ्गशरीर में चक्षुरिन्द्रिय ही आत्मविकास का मुख्य द्वार है । शरीर की ' श्री ' ( कान्ति-शोभा ) चक्षुरिन्द्रिय पर ही निर्भर है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, एक चतुर शिल्पी के द्वारा बनाई गई पाषाणप्रतिमा के जब तक चक्षुर्गोलक में कृष्ण कनीनिका नहीं बना दी जाती, तब तक मूर्ति महा-भयावह प्रतीत होती है । विना चक्षुः सम्बन्ध के पाषाण - प्रतिमा शव समान दिखलाई पड़ती है । चक्षुः सम्बन्ध होते ही मूर्ति जीवित सी हो उठती है । ऐसा प्रतीत होता है, मानो मूर्ति अभी मुख से कुछ कहने वाली है । इस प्रकार एक जीवित मनुष्य का शरीर जहाँ अभयभाव से आक्रान्त रहता है, वहाँ वही शरीर आत्मा के निकल जाने पर भयावह प्रतीत होने लगता है । इस भय की मूल प्रतिष्ठा चक्षुर्गोलक ही है । शवशरीर की आँखें ही भय का कारण बनती हैं । क्यों? उत्तर वही ' आत्मश्री ' है । च ही सत्य आत्मा की प्रधान प्रतिष्ठा होने से ' सत्य ' कहलाया है । चक्षु ही आत्मयश की विकास भूमि होने से ' यश ' कहलाया है । जैसा कि - " एतद्ध वं मनुष्येषु सत्यं निहितं यच्चक्षु " ( ऐ ० ब्रा ० १।६ । ), " चक्षुव प्रतिष्ठा " ( शत ० १४ | ६ | २ | ३ | ) ( चक्षुरेव यशः " ( गो ० ब्रा ० पू ० भा ० ५।१५ । ) इत्यादि श्रोत वचनों से भी चाक्षुषपुरुष का आत्मत्त्व सिद्ध होता है । अपि च वास्तव में ' चाक्षुषपुरुष ' का ही नाम आत्मा है जो कि आत्मा ( विज्ञानात्मा ) उप-निषदों में ' दक्षिणा क्षिपुरुष ' नाम से प्रसिद्ध है । आत्मतत्त्व का अभिमानी देवता इन्द्र है । यह उक्था-त्मक विज्ञान, यह विज्ञानवन इन्द्रतत्त्व उक्थ रूप से हृदयस्थ प्रज्ञान मन पर प्रतिष्ठित रहता हुआ ग्रकं ( रश्मि ) रूप से दक्षिण नेत्र पर्य्यन्त वितत रहता है । इसीके लिए श्रुति कहती है-यदेतन्मण्डलं तपति, यश्चैष रुक्म इदं तच्छुक्लमक्षन् । अथ यदेतदच-र्दीप्यते, यच्चैतत् पुष्करपर्णमिदंतत् कृष्णमक्षन् । अथ य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः, यश्चैष हिरण्मयः पुरुषोऽयमेव स योऽयं दक्षिणेऽक्षन् पुरुषः " शत ० १०।५।२।६ इसी इन्द्रतत्त्व से कृतात्मा इन्द्र ने आत्मा का स्वरूप पूछा, प्रजापति ने प्रतिबिम्बित पुरुष के व्याज से इसी आत्मरूप चाक्षुपपुरुष को सामने रख दिया । इन्द्र की उधर दृष्टि न गई, यह दूसरी बात है, परन्तु प्रजापति के उत्तर में किसी प्रकार के क्षोदक्षेम का अवसर नहीं है । आगे जाकर प्रजापति ने उदशरावस्थ प्रतिविम्ब को मामने रक्खा । मिट्टी का पात्र है, उस में पानी भरा हुआ है, उस पर शरीर का प्रतिबिम्ब है । आत्मस्वरूपज्ञान के सम्बन्ध में इससे अन्य अनुरूप [ ८३ ]
पृष्ठ 92
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ' ष्टान्त नहीं मिल सकता । यदि इस दृष्टान्त के वास्तविक रहस्य को समझ लिया जाता है, तो निःस-न्देह आत्मस्वरूप परिज्ञात हो जाता है । हमारा शरीर पार्थिवभाग प्रधान है, मृण्मय है, दूसरे शब्दों में मिट्टी का उदशरात्र है | लोम- केश नखाग्रों को छोड़ कर सर्वाङ्ग शरीर में रस रूप पानी भरा हुआ है । पारमेष्ट्य ' महान् ' आपोमय है, रसमय है । ' पोडशी - पुरुष ' नाम से प्रसिद्ध चिदात्मा का प्रतिबिम्ब ( चिदा-भास ) इसी महद्ब्रह्म पर प्रतिष्ठित होता है, जैसा कि - " मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् ” ( गी ० १४ | ३ ) इत्यादि स्मृतिवचन से स्पष्ट है । मृण्मयशरीररूप पात्रस्थ ग्रव्रूप महद्रस जहां तक व्याप्त है, " यावानु वै रसस्तानात्मा " ( शत ० प्रा ० ७ २०, ५ ० १ ब्रा ० 1१ कं ० 1 ) के अनुसार वहाँ तक चिदंश ( आत्मा ) व्याप्त रहता है । इसी चिदाभास का नाम जीवात्मा है । दूसरे शब्दों में उदशरावरूप शरीर में चिद्रूप पुरुष प्रतिबिम्बित है । इन्द्र यदि इस परिस्थिति को समझ लेते, तो उन्हें मागे सन्देह करने का अवसर न मिलता । इस प्रकार इस उपदेश की सत्यता भी अक्षुण्ण ही माननी पड़ती है । तीसरा उपदेश स्वप्नद्रष्टा से सम्बन्ध रखता है । प्रज्ञानमन पर प्रतिष्ठित सौर विज्ञानात्मा ही ही ( मनोऽवच्छेदेन ) स्वप्नद्रष्टा है । इन्द्रियों के द्वारा मन पर आए वासनारूप सांस्कारिक विषयों को विज्ञानात्मा स्वप्नावस्था में देखा करता है । मन चान्द्र है, विज्ञान सौर है । दोनों ही जड़ हैं । विज्ञान ( बुद्धि ) का विज्ञानत्त्व उसी चिज्ज्योति पर निर्भर है । विज्ञान ज्योति से प्रज्ञानमन प्रकाशित रहता है | चिदात्मा से विज्ञान प्रकाशित रहता है । विज्ञानात्मा द्रष्टा नहीं है, अपितु विज्ञानप्रतिष्ठ चित्त्रकाश द्रष्टा है । चिदाभासलक्षण आत्मा ही बास्तव में स्वप्नद्रष्टा है, किंवा सर्वद्रष्टा है— ' तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । ' ( मुण्डकोपनिषद २।२ | १० | ) ऐसी अवस्था में द्रष्टा को आत्मा बतलाना यथार्थ ही है । इन्द्र ने शुद्ध द्रष्टा पर लक्ष्य न देकर मनोवृत्यवच्छित दृष्टि डाली । ' भय - शोक-मृत्यु- क्षुधा - पिपासा - मोह ' आदि मन के लक्षण है, न कि द्रष्टा के । यदि इन्द्र शुद्ध द्रष्टा भाव पर दृष्टि डालते, तो उन्हें वास्तव में आत्मबोध हो जाता । उसी द्रष्टा अंश को सबसे पृथक् छाँट कर बतलाते हुए प्रजापति ने अन्त में कहा है कि - " जो सुप्तावस्था में जाकर किसी प्रकार का स्वप्न नहीं देखता, वही आत्मा है । " विज्ञानात्मा जव प्रज्ञानात्मा को साथ लेकर ' पुरीतनि नाड़ी ' में चला जाता है, तो उस श्रवस्था में स्वप्न का भी अभाव हो जाता है । उस समय केवल शुद्ध द्रष्टा का साम्राज्य रहता है । इन्द्र नेशङ्खा की थी कि, ' यह तो उसकी विनाशावस्था है, उस समय उसे अपना स्वरूपज्ञान ही नहीं रहता । ' परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । " यद्व तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुं दृष्टेविपरि लोपो विद्यते, अविनाशित्त्वात् । न तु तद्वितीयमस्ति - ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् । ” - प्र ० भ ० उप ० ४१३१२३ इत्यादि के अनुसार द्रष्टा त्रिकालाबाधित है । भौतिक विषय हो तो देखने की वस्तु हैं । जब इस अवस्था में विषय ही नहीं, तो फिर देखे किसे । इस अवस्था में तो यह आत्मतत्त्व अपने विशुद्धरूप [ ८४ ]
पृष्ठ 93
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् से अपने आप में ही डूबा हुआ रहता है । ग्रतएव ' स्वमपीतो भवति ' ( छान्दोग्य उप ० ६ | ८ | १ | ) के अनुसार इस अवस्था के लिए ' स्वपिति ' कहा गया है - ( प्रश्नोपनिषत् ४। २ ) । ' द्वितीयाद्वं भवं भवति ' ( वृ०-आ ० उप ० १।४।२ । ) " यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते ग्रथ भयं भवति " ( तंत्ति ० उप ० २।७ ) इत्यादि प्रोपनिषद् सिद्धांतों के अनुसार जब तक द्वैत बना रहता है, तब तक अवश्य ही भय का सञ्चार रहता । इन्द्रदेव शरीरदृष्टि से ही उसे देख रहे थे । क्योंकि शरीरावच्छिन्न, किंवा विषयावच्छिन्न आत्मतत्त्व शरीर के सभय होने से भयाक्रान्त सा ही दिखलाई पड़ता है । सुषुप्ति में इन सब विप्रतिप-त्तियों का प्रभाव है । इसी शोकातिग प्रात्मस्वरूप का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है-" स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्यासुप्तः सुप्तानभिचाकशीति । शुक्रमादाय पुनरैति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एक हंसः ॥ १ ॥
प्रारणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा ।
सईयतेऽमृतो यत्र कामं हिरण्मयः पुरुष एक हंसः ॥ २ ॥
स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरूते बहूनि ।
उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ ३ ॥
– बृ ० प्रा ० उप ० ४।३।११,१२,१३ । तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा, अपहतपाप्माऽभयं रूपम् । तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरं, एवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्य किञ्चन वेद, नान्तरम् । तद्वा अस्यैतदाप्तकाम-मात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् । ” - वृ ० प्रा ० उप ० ४।३।२१ ।, इसी विशुद्ध रूप को लक्ष्य में रखकर प्रजापति ने श्रागे जाकर कहा है कि, " जब तक तुम्हारी दृष्टि शरीर पर है, तब तक भय है, तभी तक प्रियाप्रिय का सम्बन्ध है | शरीररूप बल भाग से दृष्टि हटाओ, आत्मरूप रस भाग पर दृष्टि डालो । तभी तुम्हें प्रभयपद प्राप्त होगा । ' उक्त आख्यान से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि, आत्मा अवश्य ही शरीर से अतिरिक्त नित्य पदार्थ है, एवं वह शुभाशुभ फल भोगने के लिए प्रतिवाहिक शरीर धारण कर लोकान्तर में गमन करता है । वेदान्त वचनों ( उपनिषद्वचनों ) का समन्वय करने वाले ' अक्षरब्रह्म ' - प्रतिपादक ' शारीरक दर्शन ' के आरम्भ के दो अध्यायों में परमतनिरूपण, एवं तन्निराकरण पुरःसर ' जात्म - अनात्म भाव ' के विवेक [ ८५ ]
पृष्ठ 94
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डं श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् का ' व्यासभगवान् ' ने विशद् रूप से निरूपण किया है । वहाँ यह सिद्ध व्यासाभिमत श्रात्मतत्त्व किया गया है कि, “ आत्मा शरीर से भिन्न पदार्थ है । नाम - रूप - कर्म्म की परीक्षा समष्टि शरीर हैं, यह सर्वथा असत् है । एवं अस्ति भाति प्रिय ( सत्ता-चेतना - प्रानन्द ) की समष्टि आत्मा है, यह सर्वथा सत् है । यह सदात्मा यथाविद्य, यथाकर्म्म नवीन शरीर धारण करता रहता है । " इस प्रकार वहाँ यह भलीभाँति सिद्ध कर दिया गया है कि, पूर्व शरीर को छोड़ने के अनन्तर यह आत्मा अवश्य ही दूसरा शरीर धारण करता है, एवं इस सूक्ष्मशरीर को धारण कर आत्मा लोकान्तर में गमन करता है । इसी ' आत्मगति ' का निरूपण करते हुए निम्नलिखित व्याससूत्र हमारे सामने जाते हैं । १ - " तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् । " २ – “ त्र्यात्मकत्त्वात्तु भूयस्त्वात् । ” ३ – “ प्रारणगतेश्च । " ४ - " अग्न्यादिगतिश्रुतिरिति चेन्न, भाक्तत्त्वात् । ” ५ - " प्रथमेऽश्रवरणादिति चेन्न, ता एव पपत्तेः । " ६ -- " श्रुतत्त्वादिति चेन्न, दृष्टादिकारिणां प्रतीतेः । ” ७ – “ भाक्तं वानात्मवित्त्वात्तथाहि दर्शयति । ” - शारीरकदर्शन ३० । १ पा ० । १-२-३-४-५-६-७ - सूत्र प्राचीन व्याख्याताओं ने उक्त ' आरोहोपक्रमाधिकरण ' का जो अर्थ किया है, पहले हम उसीकी श्रोर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं । १ —— अर्थनमेते प्राणा अभिसमायन्ति " ( बृ ० प्रा ० उप ० ४ | ४ | १ | ) यहा से आरम्भ होकर " ग्रन्यन्न-वतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते " ( वृ ० प्र ० उप ० ४ | ४ | ४ | ) इस वाक्य पर समाप्त होने वाली बृहदारण्यक -श्रुति से यह भली - भांति सिद्ध हो जाता है कि, सेन्द्रिय समनस्क, मुख्यप्राणयुक्त, विद्याकर्म्म पूर्वप्रज्ञा-आदि परिग्रहों से युक्त यह जीवात्मा ( कर्म्मभोक्ता भोक्तात्मा ) पूर्व देह को छोड़ने के अनन्तर अवश्य ही देहान्तर धारण करता है । द्वितीय देह धारण करने वाला बतलाने वाली उक्त बृहदारण्यक - श्रुति ने-“ स एतास्तेजोमात्राः समभ्यादधानः " ( बृ ० ग्रा ० उप ० ४ | ४ | १ | ) इत्यादि रूप से जाते हुए जीवात्मा के साथ तेजोमात्रा ही सम्बन्ध बतलाया है । उक्त वाक्य में भूतभाग का गमन अश्रुत है । अतः सिद्ध होता है कि द्वितीय देह धारण करने वाला जीवात्मा इस पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर को छोड़ता हुआ भूतमात्रा से अपरिष्वक्त ( पृथक् ) होता हुआ ही लोकांतर में गमन करता है । इस पर बादरायण कहते हैं कि, ऐसा [ ८६ ]
पृष्ठ 95
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् नहीं है । तेजोमात्रा के साथ - साथ ही जीवात्मा के साथ भूतमात्रा का भी सम्बन्ध रहता है । इसी सिद्धांत को दृढ़ करते हुए व्यास कहते हैं— " तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्वक्तः - प्रश्ननिरूपणाभ्याम् " " पूर्व शरीर छोड़ने के अनन्तर जीवात्मा प्रवश्यमेव नवीन शरीर धारण करता है " जब ( पूर्व-के दो अध्यायों से ) यह सिद्ध हो गया है - तो मानना पड़ेगा कि, जीवात्मा भूतमात्राओं से संपरिष्वक्त होकर ही लोकान्तर में रहण करता है - ( जाता है ) । क्योंकि ताण्ड्यश्रुति में पञ्चाग्निविद्याप्रकरण में ‘ उद्दालक ' और ‘ प्रवाहण ' के परस्पर में होने वाले आत्मगति - सम्बन्धी प्रश्नोत्तरों से यही सिद्ध होता है । इस प्रश्नोत्तरी के सम्बन्ध में निम्नलिखित श्लोक सुप्रसिद्ध हैं-" तदन्तरेत्यादिकसूत्रमेतद् ब्रह्य ेतदर्थं यदि वेत्थ किञ्चित् । स प्राह जीवः कररणावसादे संवेष्टितो गच्छति भूतसूक्ष्मैः ॥ ताण्ड्यश्रुतौ गोतमजैविलीयप्रश्नोत्तराभ्यां प्रथितोऽयमर्थः ॥ ” उद्दालक प्रवाहण से प्रश्न करते है - " वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति " ( छान्दो ० उप ० ५ | ३ | ३ | ) ( यदि जानते तो बतलाओ! पानी पांचवीं आहुति में कैसे पुरुष बन जाता है? ) | श्रुति उत्तर देती है - " चान्द्रमण्डल में श्रद्धा नाम का पानी व्याप्त हो रहा हैं । “ चन्द्रमा अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि " ( यजुःसं ० ३४ । ९ ०1 ) के अनुसार उसी श्रद्धासमुद्र चन्द्रमा परिभ्र-मण किया करता है । इस अब्रूप ' श्रद्धातत्त्व की द्य रूप ' आदित्याग्नि ' ( दिव्याग्नि ) में आहुति होती है, इससे ' सोम ' उत्पन्न होता है । सोम की ' पर्जन्याग्नि ' में ग्राहुति होती है, इससे ' वृष्टि ' ( स्थूलपानी ) उत्पन्न होती है । वृष्टि की ' पार्थिव अग्नि में प्राहुति होती है, इससे ' अन्न ' उत्पन्न होता है । अन्न की ' वैश्वानर पुरुष ' में ( मानवशरीर में व्याप्त पुरुष नाम से प्रसिद्ध वैश्वानर अग्नि में ) आहुति होती है, इससे ' रेत ' ( शुक्र ) उत्पन्न होता है । रेत की ' योषाग्नि ' ( स्त्री के गर्भाशय में प्रतिष्ठित प्राग्नेय शोणित ) हुति होती है, इसी प्राहुति से ' पुरुष ' उत्पन्न होता है । इस प्रकार ' - पर्जन्य - पृथिवी - पुरुष - योपा ' इन पाँच अग्नियों में क्रमश: ' श्रद्धा - सोम - वृष्टि - अन्न - रेत ' इन पाँच प्राहुतिद्रव्यों की आहुति होती है । इसमें पाँचवीं रेत - आहुति में वही श्रद्धारूप प्रापः क्रमशः रेतोरूप में परिणत होकर पुरुष का प्रारम्भक ( उपादान ) बनता है । " ( छाँ ० उ ० ५। ३ | ) ( पानी पाँचवीं आहुति में कैसे पुरुष बन जाता है? ' इस प्रश्न का यही संक्षिप्त उत्तर है । उक्त प्रश्नोत्तर - प्रकररण से अवरोहक्रम में ( ऊपर से नीचे की ओर आने में ) पानी को पुरुष का उपादान बतलाया गया है । ऐसी अवस्था में यदि आरोहक्रम में ( नीचे से ऊपर की ओर जाने में ) पानी का जीवात्मा के साथ गमन न माना जायगा, तो अवरोहक्रम में पानी से पुरुष की उत्पत्ति मानना सर्वथा असंगत हो जायगा । कारण स्पष्ट है । उक्त श्रुति के अनुसार पुरुषसृष्टि का उपादान बनते - बनते सारा पानी यहाँ आ गया । यहाँ से प्राप पानी का ऊर्ध्वगमन मानते नहीं । ऐसी परिस्थिति में प्रथमा सृष्टि [ ८७ ]
पृष्ठ 96
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डं मृतात्मविज्ञानोपनिषद के अनन्तर आगे पुरुषसृष्टि का मार्ग अवरुद्ध हो जाना चाहिए । परन्तु ऐसा नहीं होता । सृष्टि- प्रलय-प्रवाह नित्य है । इससे सिद्ध हो जाता है कि, जिस प्रकार ग्रवशेहक्रम में पानी उपादान बनता है, एव-मेव आरोहक्रम में भी पानी जीवात्मा के साथ लोकान्तर में जाता है । पानी भौतिक पदार्थ है । अतएव हम कह सकते हैं कि, जीवात्मा भूतसूक्ष्मों से संपरिष्वक्त होकर ही लोकान्तर में जाता है । " प्रथम सूत्र का यही संक्षिप्त अर्थ है ॥ १ ॥
२ — उक्त कथन के सम्बन्ध में एक प्रश्न उपस्थित होता है । पूर्व की प्रश्नोत्तर - श्रुति से केवल अब्भूत का ही गमन सिद्ध होता है । परन्तु अर्थ किया जाता है - " भूतसूक्ष्मैः सह संपरिष्वक्तो गच्छति " यह अर्थ कैसे संगत हुआ?, इस विप्रतिपत्ति का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— " त्र्यात्मकत्वात्तु " पुरुषदेह के प्रारम्भक पानी व्यात्मक हैं । " तासां त्रिवृतं त्रिवृतं - एकैकां करवाणि " ( छा ० उप ० ६। ३। ३। ) इस छान्दोग्य - श्रुति के अनुसार पानी त्रिवृद्भावापन्न है । इस त्रिवृत्करण प्रक्रिया के कारण केवल पानी में भी सब भूतों का समावेशन है । वेदान्तदर्शन की पश्वीकरण - प्रक्रिया ही उपनिषदों में त्रिवृत्करण नाम से प्रसिद्ध है । मार्ग - भिन्न है, फलितार्थ समान है । ' तेज - प्रप् - अन्न ' - इन तीनों के त्रिवृत्-करण से ' पृथिवी - जल - तेज- वायु आकाश ' इन पाँच महाभूतों का जन्म हुआ है, जैसा कि आगे के परिलेख से स्पष्ट हो रहा है । १ – तेजः २ - ग्रापः सत्यम् ( १ ) १ तेजः तपः ( २ ) - आकाशः ( १ ) J ( ३ – अन्नम् २- आपः १- तेजः जनत् ( ३ ) वायुः ( २ ) २- ग्रापः महः ( ४ ) ( ३- प्रन्नम्ः १ - तेजः स्वः ( ५ ) तेजः ( ३ ) ३ – अन्नम् – २- आपः भुव: ( ६ ) जलम् ( ४ ) ३ - ग्रन्नम् भूः ( ७ ) पृथिवी ( ५ ) उक्त प्रक्रिया के अनुसार ग्रप्त्तत्त्व में तेज भी है, अन्न भी है । शुद्ध आपः रसमात्रा नाम से प्रसिद्ध ' गुणभूत ' है, यही ' तन्मात्रा ' है । गुणभूत नाम से प्रसिद्ध इन तन्मात्राओं से ' ग्रणुभूतों ' का विकास हुआ * इस त्रिवृत्करण प्रक्रिया का विशद विवेचन मनः प्राण - वाक् रूप से ईशोपनिषद् विज्ञानभाष्य में देखना चाहिए । [ ८८ ]
पृष्ठ 97
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् है । अणुभूतों के समन्वय से ' रेणुभूतों ' का विकास हुआ है, एवं रेणुभूतों के यौगिक सम्मिश्रण से महा-भूत उत्पन्न हुए हैं । महाभूतों से सत्त्व ( श्रस्मदादि प्राणी ) उत्पन्न हुए हैं । प्रत्येक महाभूत पञ्चीकृत है । प्रत्येक महाभूत में इतर चारों भूतों का गौणरूप से समन्वय रहता है । ऐसी स्थिति मेंपुरुष- सत्त्वोपादा-न भूत श्रापः नाम के महाभूत को हम पाँचों भूतों की समष्टि मानने के लिए तय्यार हैं । इस प्रकार पानी के त्र्यात्मक होने से केवल पानी का ही आरोह - अवरोह यह सूचित करता है कि, आत्मा पाँचों सूक्ष्म भूतों से युक्त होकर ही प्रारोहावरोहक्रम का भोक्ता बनता है । एक प्रश्न और उपस्थित होता है । यदि पाँचों ही भूत पुरुषशरीर के प्रारम्भक हैं, तो फिर " ग्रापः पुरुषवचसां भवन्ति " इत्यादि रूप से केवल पानी को ही पुरुष का आरम्भक क्यों माना गया? ' फिर तो " महाभूतानि पुरुषवचसो भवन्ति " यह कहना चाहिए था । " इस प्रश्न का समाधान करते हुए व्यास कहते हैं — " भूयस्त्वात् " । यद्यपि देहारम्भक द्रव्य सार्वभौतिक ( पाञ्चभौतिक ) है, तथापि पुरुष की उत्पत्ति में पानी ही प्रधान, एवं अधिक मात्रा में रहता है । शुक्रशोणित के मिथुनभाव से पुरुष उत्पन्न हुआ है । शुक्र भी तरल पदार्थ है, शोणित भी तरल पदार्थ है । बीजरूप शुक्र- शोणित में द्रवभाग ही अधिक है । एवं - " आपो द्रवाः स्निग्धाः " ( वै ० द ० २१ २ ) इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार यह द्रवता पानी का ही धर्म है । अपि च सौम्यशुक्र ' भृगु ' है, आग्नेय शोणित ' अङ्गिरा ' है । एवं - " आपो भृग्वङ्गिरो रूपमापो मृग्वङ्गिरोमयम् " ( गोपथ ब्रा ० पू ० २३ ९ ) इस प्राथर्वण सिद्धान्त के अनुसार दोनों ही अप्प्रधान हैं । अतएव अपप्रधान शुक्र शोणित के समन्वय से उत्पन्न पुरुष - शरीर में अन्य भूतों की अपेक्षा पानी ही अधिकमात्रा में उपलब्ध होता है । इस प्रकार सब भूतों के रहने पर भी — वैशेष्यात्तु-तद्वादस्तद्वादः ' ( शा ० द ० २।४।२२ सू ० ) के अनुसार इतर भूतों का नाम निर्देश न कर ' आप: पुरुष-वचसो भवति ' यही कह दिया गया " - द्वितीय सूत्र का यही संक्षिप्त अर्थ है ॥ २ ॥
३ – प्रश्न होता है कि, परलोक जाते हुए आत्मा के साथ सूक्ष्मभूत भी रहते हैं, इसमें क्या प्रमाण है?, किस आधार पर यह अनुमान लगाया गया?, उत्तर देते हैं ' प्राणगतेश्वतमुत्क्रामन्तं प्राणोऽ-नूत्त्क्रामति, प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूक्रामन्ति " ( बृ ० प्रा ० उप ० ४ | ४ | २ | ) इत्यादि श्रुतियाँ शरीर से उत्क्रान्त जीवात्मा के साथ मुख्यप्राण एवं इतर अनूचीन प्राणों की भी उत्क्रान्ति बतला रही हैं । दूसरे शब्दों में जीवात्मा के साथ प्राणों का गमन बतलाया जा रहा है । प्राणतत्त्व बिना भूत के कभी भी प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । प्राण एवं भूत का परम्पर में अविनाभाव सम्बन्ध है । जीवित दशा में हम प्राणों को भूतों के साथ नित्ययुक्त देखते हैं, साथ ही में उत्क्रान्तिकाल में प्राणगति सुनी जाती है, फलतः प्राणगति ही भूतगति के अनुमान के लिए पर्याप्त कारण बन जाती है, तीसरे सूत्र का यही संक्षिप्त अर्थ है ॥ ३ ॥
४. - " प्राणगति के कारण भूतगति का अनुमान किया जाता है " यह पूर्वसूत्र से सिद्ध किया गया । इस अनुमान के सम्बन्ध में थोड़ीसी विप्रतिपत्ति है । उक्त अनुमान तभी अन्वर्थ बन सकता है, जबकि प्राण, एवं प्राणों की जीवात्मा के साथ गति सिद्ध हो जाती है । परन्तु ऐसा नहीं है । " यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्नि वागप्येति, वातं प्राणः, चक्षुरादित्यः " ( ३२ | १३ | ) के अनुसार जब पुरुष मर जाता [ ८६ ]
पृष्ठ 98
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिपत् है, तो इस की वागिन्द्रिय स्वप्रभव अग्नि न प्राणेन्द्रिय वायु में चक्षुरिन्द्रिय आदित्य में लीन हो जाती है । इस प्रकार तत्तत् प्राणों ( इन्द्रियों ) की स्वप्रभव - रूप अग्नि वायु - आदित्यादि प्रभवदेवताओं में अपीति ( लय ) सुनी जाती है । जब प्राण स्वप्रभवों में लीन हो जाते हैं, तो ऐसी अवस्था में जीवात्मा के साथ प्राणों का गमन सिद्ध नहीं होता । फलतः " प्राणगतेश्व ", यह पूर्वोक्त अनुमान नहीं बन सकता । " भूतगति के सम्बन्ध में उक्त विप्रतिपत्ति एवं उसके निराकरण का दिग्दर्शन कराते हुए सूत्र -कार कहते हैं-“ अग्न्यादिगतिश्रुतिरिति चेन्न, भाक्तत्वात् ” श्रुति वचनों में भी परस्पर गौण मुख्य भाव का समादर करने वाले व्याख्याता उक्त सूत्र का अर्थ करते हुए कहते हैं कि " यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्य वागग्निमप्येति " यह अग्न्यादिश्रुति यद्यपि तत्तत् प्राणों की तत्तत् प्रभव अग्न्यादि देवताओं में अपीति बतला रही है, परन्तु इस अग्न्यादि श्रुति को ' भाक्त ( गौण ) ' समझना चाहिए । " प्रोपधिर्लोमानि ' वनस्पतीन् केशाः ( वृ ० प्रा ० उप ० ३।२।१३ ) यह श्रुति भी उसी प्रकरण में पढ़ी हुई है । इस श्रुति का तात्पर्य यही है कि, पुरुष के लोभ मरने के अनन्तर औषधियों में एवं केश वनस्पतियों में लीन हो जाते हैं । क्या यह कथन ठीक है? । अग्नि सम्बन्ध से से प्रत्यक्ष में दग्धकेश- लोमों का प्रौषधि वनस्पतियों में लय मानना कैसे संगत हो सकता है । देखते - देखते भस्मीभूत हो जाने वाले केशः लोमों का ग्रौषधि वनस्पतियों के साथ क्या सम्बन्ध । केवलश्रुति ने कह दिया है । जिस प्रकार यह श्रुति गौण है, एवमेव " यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्य ० " यह भी केवल कहना ही कहना है । जिस प्रकार औषधि वनस्पतियाँ केश- लोमों की उपकारक मात्र हैं, एवमेव अग्नि वायु आदि देवता वाक् प्राणादि इन्द्रियप्राणों के उपकारक मात्र हैं । दोनों श्रुतियाँ उपकारभाव का ही प्रतिपादन कर रही हैं । अग्न्यादिश्रुति गौण है, " तमुत्क्रामन्तंप्राणोऽनूत्क्रामति " इत्यादि उत्क्रमणश्रुति ही मुख्य है । श्रुति में " अनु " शब्द पढ़ा हैं । इसका " अनुलक्ष्य " यही अर्थ हो सकता है । फलतः प्राणगतिप्रतिपादका श्रुति की मुख्यता से ही पूर्वोक्त “ प्राणगतेश्व " यह अनुमान ठीक बन जाता है " । चतुर्थ सूत्र का यही संक्षिप्त अर्थ है ॥ ४ ॥
५ – “ प्रथमसूत्रार्थ - प्रकरण में प्रतिपादित पञ्चाग्निविद्या में रूप ( श्रादित्यरूप ) प्रथमाग्नि में श्रद्धा की आहुति बतलाई गई है । इसी श्रद्धा - शब्द के आधार पर पानी से पुरुष का उपादान मान लिया गया है । वस्तुतः देखा जाय, तो पानी से पुरुष की उत्पत्ति कथमपि सिद्ध नहीं होती । कारण स्पष्ट है । प्रथमाग्नि में आहुति होने वाले द्रव्य को " श्रद्धा " कहा गया है, न कि आप ( पानी ) । ग्रापः शब्द प्रथमा-ग्निसम्बन्ध में सर्वथा अश्रुत है । ऐसी दशा में श्रद्धा शब्द से प्रश्रुत पानी का ग्रहण कैसे किया जा सकता है? जब पानी का ग्रहण अनुपपन्न है, तो भूतसूक्ष्मों का सम्वन्ध भी सर्वथा अनुपपन्न है " इसी आशका का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— " प्रथमेऽश्रवरणादिति चेन्न, ता एवह्य ुपपत्तेः " [ ९ ० ]
पृष्ठ 99
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड " अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् यद्यपि रूप प्रथमाग्नि के सम्बन्ध में ' आप ' शब्द सर्वथा अश्रुत है, वहाँ श्रापः न कहकर श्रद्धा का ही उल्लेख हुआ है, तथापि वहाँ के श्रद्धा शब्द को पानी का ही वाचक मानना न्यायसंगत होता है । क्योंकि गोतम का — “ आपः पुरुषवचसो भवन्ति " यह प्रश्न था । उत्तरश्रुति ने इसी प्रश्न का समाधान किया है । उक्त प्रश्न की संगति तभी बन सकती है, जब कि उत्तरश्रुति के श्रद्धा शब्द को ' अप् ' परक मान लिया जाय । अपिच श्रद्धा को अप्परक मानते हुए ही पञ्चाग्निविद्या का उपसंहार करते हुए श्रुति ने — " इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति " इत्यादि रूप से स्पष्ट शब्दों में यह सिद्ध कर दिया गया है कि प्रकृत का श्रद्धा शब्द पानी का ही वाचक है । अपि च सामान्यदृष्टि से लौकिक व्यवहार में यद्यपि श्रद्धा - शब्द का प्रत्ययविशेष के साथ ही सम्बन्ध देखा जाता है " हम आप पर श्रद्धा करते हैं " इससे सेवकत्त्व प्रकट किया जाता है, तथापि श्रद्धा शब्द से प्रापः का ग्रहरण भी उपपन्न माना जा सकता है । “ आपो हास्मै श्रद्धां संनमन्ते पुण्याय कर्म्मणे " - " ग्रपः प्रणयति " ( शत ० ब्रा ० १।१।१।१।२ ) श्रद्धा वा आपः ” ( तै ० ब्रा ०३।२।४।१ ) इत्यादि श्रुतियाँ स्पष्ट ही श्रद्धातत्त्व को ' आपः शब्द ' से व्यवहृत कर रहीं हैं । इन्हीं सब कारणों से हम प्रकृत श्रद्धा शब्द से अवश्य ही ' आप ' का ग्रहण कर सकते हैं । " पाँचवें सूत्र का यही संक्षिप्त अर्थ है ॥ ५ ॥
६ – ' ' श्रद्धा शब्द से पानी का ग्रहण पूर्वसूत्र से यद्यपि सिद्ध हो जाता है, परन्तु पुनः एक महा-विप्रतिपत्ति उपस्थित होती है । पञ्चाग्निविद्या प्रकरण से केवल यही सिद्ध होता है कि, श्रद्धा नामका पानी पाँचवी प्राहुति में पुरुषशरीर का उपादान बनता है, एवं प्रतिसंचर क्रम में वह पानी पुनः श्रद्धारूप में परिणत हो जाता है । इस प्रकार उक्त श्रुतिप्रकरण से तो केवल पानी का ही अवरोह - आरोह सिद्ध होता है । ' जीवात्मा पानी को साथ लेकर ( भूतसूक्ष्मों से युक्त होकर ) लोकान्तर में जाता है " यह सर्वथा अश्रु है । अर्थात् श्रुति में यह कहीं निर्दिष्ट नहीं है कि, पानी के साथ जीवात्मा भी जाता है । ऐसी दशा में जीवात्मा की गति ही जब अश्रुत है, तो फिर " भूतसूक्ष्मों से युक्त होकर जीवात्मा लोकान्तर में जाता है " यह सिद्ध करने के लिए पञ्चाग्निविद्या का उल्लेख करना सर्वथा व्यर्थ हो जाता है । " इस विप्रतिपत्ति का निराकरण करते हुए आगे जाकर सूत्रकार कहते हैं-" श्रुतत्वादिति चेन्न, इष्टादिकारिणां प्रतीतेः ” अप्तत्त्व ही श्रद्धादि क्रम से पुरुषरूप में परिणत होता है । तत्संपरिष्वक्त जीवगमन नहीं करते हैं, यही मानना ठीक है, क्योंकि आपोवत् उक्त श्रुति में जीव का श्रवण नहीं है " कदाचित् कोई यह कहे, तो उसका यह कहना ठीक नहीं है । इष्टादि कर्म्म करने वाले जीवों का गमनागमन इतर श्रुतियों से स्पष्ट प्रतीत हो रहा है । तात्पर्य यह है कि – “ अथ य इमे ग्रामे इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते, ते धूममभिसंभवन्ति ” इस रूप से उपक्रम कर पितृयाणमार्ग से श्रुति जीवात्मा की - पितृलोकादाकाशं, आकाश-च्चन्द्रमसं, एष सोमोराजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति तस्मिन् यावत् संपातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं पुनर्नवर्त्तन्ते यथेतम्, ( छा ० उ ० ५६ । ) इत्यादि रूप से चन्द्रलोक में गति, एवं वहां से पुनरावृत्ति बतला रही है । " तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति, तस्या प्राहुतेः सोमो राजा संभवति " ( छां ० ५।४।२ ) [ ६१ ]
पृष्ठ 100
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् इस श्रुति सामान्य से प्रकृत में अवश्य ही श्रद्धा के साथ जीवात्मा का गमन सिद्ध हो जाता है । तात्पर्थ्य यही है कि, अग्निहोत्रादि करने वाले कम्मं ग्राहवनीयाग्नि में सोम की आहुति देते हैं । यही सोमाहुति सूक्ष्मरूप में परिणत होकर इन कर्म्मठों के आश्रित रहती है । दूसरे शब्दों में श्रद्धा - युक्त ग्राहुतिमय श्रापः जीवों से परिवेष्टित होकर ही लोकान्तर में जाती हैं । फलतः श्रद्धा के साथ जीव की गति सिद्ध हो जाती है । ७ - जीवात्मा लोकान्तर में भूतसूक्ष्मों से युक्त होकर जाता है, यह तो सिद्ध हो गया । परन्तु लोकान्तर में जाकर यह शुभाशुभ कम्मों का फल भोगता है, इस सम्बन्ध में थोड़ी सी विप्रतिपत्ति है । अथवा यों कहिए कि, कर्मफल भोगने के लिए ही तो जीवात्मा की परलोक में गति बतलाई जाती है । जब निम्नलिखित श्रोत वचन के अनुसार जीवात्मा का फल भोगना ही सिद्ध नहीं होता, तो उसकी गतिमानना ही व्यर्थ हो जाता है । " एक सोमो राजा, तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति " ( छा ० ५1१०1-४ ) इत्यादि श्रुति सोम को देवताओं का प्रन्न बतलाती है । उक्त छान्दोग्य श्रुति के साथ " तें चन्द्र ं प्राप्यानं भवन्ति, तांस्तत्र देवा यथा सोमं राजानमाप्यायस्वापक्षीय स्वेत्येवमनांस्तत्र भक्षयन्ति " ( वृ०-आ ० ६।२।१६ ) इस वृहदारण्यक श्रुति की समानता है । उक्त श्रुति से यही सिद्ध होता है कि जिस प्रकार सोमतत्त्व को ग्राकाशस्थ, किंवा परलोकस्थ देवता खाया करते हैं, तथैव परलोकगत जीव भी सोमसाहचर्य से इन देवतानों के प्रश्न बन जाते हैं । जब जीब स्वयं देवताओं के भोग्य हैं, तो ऐसी अवस्था में ये भोक्ता ( कम्फल भोक्ता ) कैसे बन सकते हैं? इस विप्रतिपत्ति का निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— " भाक्त ' वानात्मवित्त्वात्तथाहि दर्मयति " उक्त वृहदारण्यक श्रुति ने सोमवत् यद्यपि इन जीवों को भी देवताओं का ग्रन्न बतलाया है, परन्तु इनका यह ग्रन्नत्त्व भाक्त ( गण ) समझना चाहिए । खाने पीने की वस्तुनों को ही यन्न नहीं कहा जाता, अपितु सामान्य भोगमात्र को ' अन्न ' शब्द से व्यवहृत किया जाता है । उदाहरण के लिए प्रजा राजा का अन्न कहलाती है, पशु, अस्मदादि मनुष्यप्रजा के अन्न माने गए हैं । इस अन्नभाव का राजा को करादि ग्रहण द्वारा सुख मिलता तात्पर्य यही है कि, प्रजा पर राजा का अधिकार है । प्रजा से है । हम पशुओं से लाभ उठाते हैं । पशु स्वतन्त्र नहीं रह सकते । इस प्रकार प्रजा, और पशुश्नों का अनत्त्व पारतन्त्र्य लक्षण हो है । चर्वण - निगरणादि लक्षण ग्रन्नत्व का यहाँ सर्वया प्रभाव है । एवमेव परलोकगत जीवात्मा वहाँ के अधिष्ठाता प्राण - देवताओं द्वारा शासित होते हैं । एतावता ही राजा प्रजा-वत् बृहदारण्यकश्रुति ने जीवों को इनका अन्न बतला दिया है । अपि च- " न वं देवा अश्निन्ति न पिवन्ति, एतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति " ( छा ० उप ० ३ ६ १ ) इत्यादि श्रुतियाँ स्पष्ट ही देवताओं को चर्वण-निगरण लक्षण अन्न मर्य्यादा से भी बहिर्भूत मान रही हैं । जिन्हें आत्मा का परिज्ञान नहीं होता, ऐसे अनात्मवित् जीव ही परलोक में जाते हैं, एवं इस अनात्मभाव के कारण इन्हें देवताओं का भोग्य बनना पड़ता है, जैसे कि आत्मस्वरूप न जानने वाले गौ - प्रश्वादि पणु हमारे भोग्य बने रहते हैं । जीवात्मा के इसी पारतन्त्र्य प्रवर्तक अनात्मलक्षण पशुभाव को दिखलाती हुई श्रुति कहती है-[ ६२ ]