Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 111–120
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 111–120
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ईश्वर शरीर में ' स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी ' में पाँच मुख्य प्राकृतात्मा हैं । इन पांचों का ‘ ३-२-२-३-५ ' यह क्रम है । १ ' प्राण ' - प्रकृतिप्रधान ' स्वयम्भू ' की ' १ ग्रन्तर्यामी, ' ' २ सूत्र, ' ' ३ वेद, ' ये तीन कलाएं हैं । २ ' अप्'- प्रकृतिप्रधान ' परमेष्ठी ' की ' १ चित् ' ' २ यज्ञ, ' ये दो कलाएं हैं । ३ ‘ वाक् ’ आत्मवंशावली-मूलाधारः सर्वव्यापको विश्वव्यापकः पुरुषः षोडशी अमृतात्मा ( प्राणः ) ( आप ) ( वाक् ) ( अन्नम् ) ( अन्नादः ) अव्यक्तात्मा स्वायम्भूः यज्ञात्मा विज्ञानात्मा महानात्मा शारीरात्मा परमेष्ठी सूर्य्यः चन्द्रमाः पृथिवी ११ - अन्तर्यामी ११ - चिदात्मा ११ - विज्ञानात्मा १ - प्राकृति महान् ११- शरीरम् २- हंसात्मा २- सूत्रात्मा १२- प्रकृति महान् ३- वै ० प्रा ० २- यज्ञात्मा २- दैवात्मा ६४ - ते ० प्रा ० ३- वेदात्मा ३ - अहंकृतिमहान् ५ - प्रा ० प्रा ० ३ २ २ ३ ५ -" अध्यात्मसंस्था ” [ १०३. ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् प्रकृतिप्रधान ' सूर्य्य ' की ' १ विज्ञान ' २ प्राणदेवता ' ये दो कलाएं हैं । ४ ' अन्न ' - प्रकृतिप्रधान ' चन्द्रमा ' में ' १ प्राकृति ' २ प्रकृति ' ' ३ ग्रहंकृति ' भेदभिन्न महत्सोम का साम्राज्य है, एवं ५ ' अन्नाद् ' प्रकृतिप्रधान ' पृथिवी ' में १ ' चित्याग्नि, ' २ वायु, ' ' ३ वैश्वानगर, ' ' ४ हिरण्यगर्भ, ' ' ५ सर्वज्ञ, ' इन पाँच कलायों की प्रतिष्ठा है । इस प्रकार संभूय पाँच विवर्त्तो के पन्द्रह विवर्त हो जाते हैं । ईश्वरसंस्था की स्वयम्भू आदि पाँच प्रधान कलाएं अध्यात्मसंस्था में क्रमशः ' ग्रव्यक्तात्मा यज्ञात्मा - विज्ञानात्मा महानात्मा - शारीरात्मा ( प्राणात्मा ) ' इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ' १ ग्रन्तर्यामी, २- सूत्रात्मा ' इन तीनों खण्डात्माओं की समष्टि प्राणप्रकृतिप्रघान स्वायम्भुव १ अव्यक्तात्मा है । प्राकृतात्मा धिकरण का यही पहला १ ' अव्यक्तात्मा-धिकरण ' है । ' १ चिदात्मा ' २ यज्ञात्मा ' की समष्टि - प्रप्प्रकृतिप्रधान पारमेष्ठ्य २ ' यज्ञात्मा ' है । यही दूसरा २ ' यज्ञात्माधिकरण ' है । १ - विज्ञानात्मा, २ दैवात्मा की समष्टि वाक्प्रकृतिप्रधान सौर ३ - ' विज्ञा-नात्मा ' । यही तीसरा ' ३ विज्ञानात्माधिकररण ' है । १ प्राकृति - २ प्रकृति - ३ अहंकृति की समष्टि अन्नप्रकृतिप्रधान चान्द्र ' ४ महानात्मा ' है । यही चौथा ४ ' महदात्माधिकरण ' है । १ - बाह्यात्मा - २ हंसात्मा ३ - वैश्वानरात्मा - ४ तैजसात्मा - ५ - प्राज्ञात्मा, इन पांचों की समष्टि अन्नादप्रकृतिप्रधान पार्थिव ५ शारीरात्मा है । यही पांचवाँ ५ शारीरात्माधिकरण है, जैसा कि तत्तदधिकरणों में स्पष्ट हो जायगा । इन सब खण्डात्माओं का ग्राधार ( इनकी अपेक्षा से अखण्ड ) सोलहवाँ षोडशी पुरुष ही ' अमृतात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है । क्रमप्राप्त सर्वप्रथम इसी की ओर विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है ।
अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यावमृतमाहितम् ।
मृत्युविवस्वन्तं वस्ते मृत्योरात्मा विवस्वति ॥
- शत ० ब्रा ० १० १५ | १ | ४ | यदस्ति किञ्चित् तदिदं प्रतीमोऽविचालि शश्वत्स्थमनाद्यनन्तम् । प्रतिक्षणान्यान्य - विकार- सृष्टि प्रवाहवत्तद् द्विविरुद्धभावम् ॥ - श्रीगुरुप्रणीत संशयत दुच्छेदवाद १।१ । श्राद्ध विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले निरूपणीय आत्मतत्त्व के सम्बन्ध में उपस्थित होने वाले १५ आत्मविवर्त्तो में से मूलाधार, सर्वव्यापक, विश्वव्यापक, ' अमृत ' सज्ञक पोडशीप्रजापति का ही सर्वप्रथम दिग्दर्शन कराया जाता है । ' यदस्ति किञ्चित् ० ' इत्यादि वचन के अनुसार सृष्टयनुगता श्रागमद्वयी अमृत - मृत्युलक्षण, स्थिति - गतिलक्षण, ज्योतिस्तमोलक्षण, अनिरुक्त - निरुक्तलक्षण, इत्यादि दृष्टिभेद से विविधभावापन्न इस महाविश्व की और यदि हम दृष्टि डालते हैं, तो वहां हमें दो भावों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त है । ग्राप समष्टिरूप से विश्व को देखिए, अथत्रा व्यष्टिरूप से प्रत्येक पदार्थ पर भिन्न - भिन्न रूप से दृष्टि डालिए, उभयथा आपको परस्परा-त्यन्त विरुद्ध दो भावों के दर्शन होंगे । साक्षी के लिए लोकसाक्षी, जगच्चक्षुः सूय्यं को सामने रख लीजिए । सूर्य्य ने अपनी.ज्योति से त्रैलोक्य को प्रकाशित कर रखा है । सृष्टिविद्या के ज्ञाता वैज्ञानिक महर्षियों के [ १०४ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् मतानुसार सूर्य्य * की उत्पत्ति विश्व की उत्पत्ति है, सूर्य की स्थिति विश्व की स्थिति है, एवं सूर्य का विनाश विश्व का विनाश है । सूर्य्यस्थिति - काल ' अहःकाल हैं, यही ' अहरागम ' नाम से प्रसिद्ध है । सूर्य्यविनाश-काल रात्रिकाल है, यही ' रात्र्यागम ' नाम से प्रसिद्ध है । सृष्टिलक्षण महा अहःकाल ही श्रुतियों में “ पुण्याह ” नाम से व्यवहृत हुआ है । यही ' ब्रह्मदिन ' नाम से प्रसिद्ध है । सर्वसाधारण के समझे हुए अहः ( दिन ) का, एव उस महाकालात्मक पुण्याह का स्वरूप समान हैं, अपने ( मनुष्य ) अहः के स्वरूप-ज्ञान से पुण्याह का स्वरूपज्ञान गतार्थ हो जाता है केवल काल परिमाण में तारतम्य है । अहोरात्र की ( दिन रात की ) षष्टि ( ६० ) घटिका ( घड़ी ) मानी गई हैं, एवं ' मुहूर्तो घटिकाद्वयम् ' इस सिद्धान्त के अनुसार दो घड़ी का एक मुहूर्त्त माना गया है । इस व्यवस्था से अहोरात्र के त्रिंशत् ( ३० ) मुहूर्त्त हो जाते हैं । १५ मुहुर्त्त ग्रहः काल है, १५ मुहूर्त्त रात्रिकाल है । इन एक मुहूर्त्त का भोग प्रातःसन्ध्या हो जाता है, एवं एक मुहूर्त्त का भोग सायंसंध्या में हो जाता है । इस प्रकार दो मुहूर्त्त दोनों सन्ध्या-कालों में चले जाते हैं । शेष २८ मुहूर्त्त रह जाते हैं । इन में १४ मुहूर्त का दिन है, १४ मुहूर्त्त की रात्रि है । चौदह मुहूर्त्तात्मक ग्रहः काल में सूर्य्यं प्रकाशित रहता है, एवं चतुद्दश मुहूर्तात्मक रात्रिकाल में सूर्य हम से पृथक् जाता है । अहः एवं रात्रि क्या पदार्थ है? इस प्रश्न का उत्तर है – ' इन्द्रगर्भित सौरसावित्राग्नि ', एवं ' पार्थिवसोम ' । दिन में सौर अग्नि की प्रधानता रहती है, एवं रात्रि में पार्थिव कृष्णसोम का साम्राज्य रहता है । सोम दाह्य पदार्थ है, अग्निदाहक है । दिन में इस दाहक अग्नि के अहोरात्रस्वरूपदिग्दर्शन सम्बन्ध से विशाल अन्तरिक्ष में व्याप्त सोम जलने लगता है । " त्वं ज्योतिषा वितमो ववर्थ ” ( ऋक् सं ० १।१।२२ ) के अनुसार अग्नि में बहुत प्रज्ज्व-लित सोम ही प्रकाश का कारण बनता है । रात्रि में दाहक सौर अग्नि का अभाव रहता है, अतएव रात्रि में प्रकाश नहीं होने पाता । इस से यह भी सिद्ध हो जाता है कि, ग्रहः आग्नेय है, रात्रि सौम्या है । अहः काल में पितृस्थानीय सूर्य अपनी प्राणप्रधान रश्मियों से हमारे रस को जितनी मात्रा में आकर्षित कर लेता है, रात्रिकाल में सोम द्वारा उतना रसभाग हमें पुनः प्राप्त हो जाता है । अत एव इसे ' रात्रि ' कहा जाता है । रात्रि क्या है, दात्री है । वर्त्तमान में विद्वत्समाज में ' अहोरात्र पक्ष- मास चातुर्मास्य प्रयन-संवत्सर ' ग्रादि शब्द काल के वाचक माने जा रहे हैं । विद्वानों का यह व्यवहार सर्वथा अवैज्ञानिक है । उक्त सभी शब्द अग्नि - सोम की तत्तद्विशेष अवस्थाओं के ही नाम हैं । श्रग्नितत्त्व ही ग्रहः शुक्लपक्ष-उत्तरायण संवत्सर है । सोमतत्त्व ही रात्रि - कृष्णपक्ष - दक्षिणायन है । १२ घन्टे १५ दिन - ६ मास- १ वर्ष में अग्नि का भोग होता है, अतएव ग्रहःपक्षादि शब्द आगे जाकर गौण विधि से काल के वाचक बन गए हैं । * शिरःप्रधान स्वयम्भूमूलासृष्टि, हृदयप्रधान सूर्य्यमूला सृष्टि, पादप्रधान पृथिवीमूलासृष्टि, भेद से ऋषियों ने सृष्टिविद्या को तीन भागों में विभक्त मान रक्खा है । इन तीनों में हिरण्यगर्भ महर्षि के मतानुसार सूर्य्य ही विश्व का प्रभव प्रतिष्ठा परायण है । इन तीनों मतों का विशद विवेचन ' मुण्डकोपनि-षद्विज्ञानभाष्य ' में देखना चाहिए । [ १०५ ]
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्डं श्रमृतात्मविज्ञानोपनिपत् अग्नि, एवं सोम, इन दोनो में अग्नितत्त्व विशुद्धरूप से उपलब्ध नहीं होता । ' इन्द्र प्रजापति-परोरजाप्राण ' श्रादि कतिपय तत्त्वों से यह नित्य युक्त रहता है । इनसे युक्त होकर ही यह ग्रहः स्वरूप में परिणत होता है । दूसरे शब्दों में सूर्य्यकेन्द्र से उक्त विभूतियों को मनुःस्वरूप दिग्दर्शन लेकर चारों ओर व्याप्त होता हुआ अग्नि ही ग्रह: स्वरूप में परिणत होता है । सूर्य्यकेन्द्रस्थ ऋपिप्राणप्रवर्तक इन्द्र प्राजापत्यप्राण- परोरजाप्राणादियुक्त यह सौर नभ्य अग्नितत्त्व ही पुराणभाषा में ' मनु ' नाम से व्यवहृत हुआ है । केन्द्रावस्थापन यही अग्नि-तत्त्व ' मनु ' है । महिमामण्डल में आकार वही ' अग्नि ' कहलाने लगता है । इन्द्रप्राणमय होने से यही ' इन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध है । प्राजापत्यप्राण के सम्बन्ध से ' प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्य: " ( प्रश्नोपनिषद-१1८ ) " नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता: " ( ऋक् सं ० ७।६२।४ ) ' सूर्य्यं श्रात्मा जगतस्तस्युषश्च ' ( ऋक् सं ०-१।१४५।१ ) इत्यादि श्रौत सिद्धान्तों के अनुसार सम्पूर्ण प्रजा का उपादान होने से वही हिरण्मय मनु ' प्रजापति ' कहलाने लगता है । सौरमण्डलस्थ परोरजाप्राणमूर्ति षोडषीपुरुष नाम से प्रसिद्ध अमृतात्मा के सम्बन्ध से वही ' शाश्वतब्रह्म ' नाम से भी प्रसिद्ध हो जाता है । इस प्रकार अवस्थाभेदमूलक दृष्टिकोणभेद से अहःस्वरूप निर्माता एक ही सौरतत्त्व श्रग्नि- मनु- इन्द्र प्रजापति - प्रारण - शाश्वतब्रह्म आदि अनेक नाम धारण किए हुए हैं । इसी अग्निप्रधान मनुविज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् मनु कहते हैं—
प्रशासितारं सर्वेषामरणीयांसमणोरपि ।
रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं तं विद्यात् पुरुषं परम् ॥१ ॥
एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्मशाश्वतम् ॥ २॥ ( मनुः१२।१२२-१२३ )
केन्द्रस्थ तत्त्व सूक्ष्मातिसूक्ष्म होता है, वही मनु है । अतएव इसके लिए - " श्ररणीयांसमणोरपि 11 ' यह कहा गया है । वहाँ इन्द्रियों की गति नहीं है । जिस प्रकार स्वप्नजगत् में इन्द्रियज्ञान अवरुद्ध हो जाता है, केवल मन के अन्तर्जगत् का व्यापार रहता है, एवमेव वह केवल मनु और मन्वन्तर मनोगम्य है । ग्रतएव " स्वप्नधोगम्यम् " कहा गया है । केन्द्र में उक्थ रूप से प्रतिष्ठित होता हुआ यह प्राणमूर्ति मनु - ग्रग्नि ही अर्करूप से ग्रहोरूप में परिणत होता है । यह मनु - अग्नि, किंवा मनु - ग्रग्निरूप महा श्रहः सृष्टिविद्या के क्रम की अपेक्षा से चौदह भागों में विभक्त है । मनुतत्त्व के यह चौदह अन्तर ही " मन्वन्तर " नाम से प्रसिद्ध हैं । हम अपने छोटे ग्रह: के जिन चौदह विभागों के लिए " मूहूर्त ' शब्द प्रयुक्त करते हैं, महा अहः के इन्हीं विभागों के लिए में " मन्वन्तर " शब्द प्रयुक्त हुआ पुराण है । मन्वन्तर की उक्त व्याख्या के आधार पर ही ग्रहः- मास - वर्ष, ये तीनों शब्द विचाली माने गये हैं । कर्म्ममीमांसा ( पूर्वमीमांसा ) के ६ ठे अध्याय के १३ वें अधिकरण में महर्षि जैमिनि ने उक्त [ १०६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिपत् सिद्धान्त को ही दृढ़ किया है । ब्राह्मणग्रन्थों में सहस्र सम्वत्सरात्मक सत्र-काल के विचालीभाव यज्ञ का विधान मिलता है । " स्वर्गप्राप्ति के लिए यजमान को सहस्रवर्षा-त्मक सत्रयज्ञ करना चाहिए " -" - इस विधि में प्रश्न उपस्थित होता है कि “ शतायुर्वै पुरुषः ” ( शत ० ४ | ३ | ४ | ३ ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य की आयु सौ वर्ष की मानी गई है । विज्ञानदृष्टि से यही सिद्धान्त ठीक भी है । कारण, हमारा श्रायुःसूत्र विश्वामित्रप्राण के आधार पर प्रतिष्ठित है । विष्वद्वृत्त नाम से प्रसिद्ध बृहतीछन्द पर सूर्ख स्थिर रूप से प्रतिष्ठित है— ' सूर्य्यो बृहती मध्यूढस्तपति । ' ' षट् त्रिंशदक्षरा बृहती ' ( शत ० ८ | ३ | ३८ ) इत्यादि छन्दोविज्ञान के आधार पर बृहतीछन्द ३६ अक्षर का माना गया है । सूर्य्य में ज्योतिः गौः श्रायुः - नाम के तीन मनोता माने गये हैं । ये ही तीनों मनोता क्रमशः ज्योतिष्टोम – गोष्टोम - प्रायुष्टोम यज्ञों के प्रवर्त्तक हैं । इन्द्रप्राणात्मक आयु प्राण छन्दोऽक्षर भेद से ३६ भागों में विभक्त हो जाता है । आगे जाकर साहस्रीविद्या की कृपा से प्रत्येक प्रायुःप्राण सहस्र - सहस्र भागों में विभक्त हो जाता है । इस प्रकार मनःप्राणवाङ्मय ( ज्ञानक्रि-यार्थमय ) आयुः प्रवर्त्तक विश्वामित्रप्राणावच्छिन्न सौर इन्द्रात्मक बृहतीप्राण ३६००० ( छत्तीस हजार ) भागों में विभक्त हो जाता है - ( देखिए शत ० ब्रा ० १० | ५ | ३ ब्रा ० । ) हम प्रतिदिन मनः प्राणवाङ्मय एक एक आयुः - सूत्र का भोग करने में समर्थ होते हैं । इस प्रकार यह भोगकाल छत्तीस हजार दिन में समाप्त हो जाता है । छत्तीस हजार दिन की समष्टि ही १०० वर्ष है । यह आयु का साधारण मान है । ' छन्दोमा ' यज्ञादि के सम्बन्ध से १२० वर्ष की भी आयु हो जाती है - ( देखिए ऐ ० ब्रा ० ५। १६ । ) कहना यही है कि उक्त आयुर्विज्ञान के अनुसार मनुष्य की आयु १०० - १५० - वर्षों से अधिक नहीं हो सकती । ऐसा स्थिति में इसके लिए एक सहस्त्र ( १००० ) वर्ष में पूरे होने वाले सत्र यज्ञ का विधान कैसे किया गया? यही विप्रतिपत्ति उठाते हुए ऋषि कहते हैं-" सहस्रसम्वत्सरं तदायुषामसंभवान्मनुष्येषु " ( पूर्व मी ० ६।७।१३ ३१ ) आगे जाकर अन्त में - ' सम्वत्सरो विचालित्वात् ' - ( पू ० मी ० ६ | ७ | १३ | ३८ | ) ( अहानि वाऽभिसंख्यत्वात् ' ( पू ० ६ | ७ | १३ | ४० ) इत्यादि रूप से सम्वत्सरादि शब्दों को विचाली मानते हुए वर्ष को ग्रहः का वाचक मानते हुए उक्त श्रुतिविधान का समन्वय किया गया है । देखना यह है कि ' वर्ष ' कहते किसे | अग्नि की एक परिक्रमा का नाम ही वर्ष, किवा सम्व सर है । किसी एक बिन्दु से चलकर अग्नि अपने उसी स्थान पर जितने काल में ग्राजाता है, वह काल-समष्टि ही ' वर्ष ' कहलाया है । भूपिण्ड अपने अक्ष पर परिक्रमा लगाता हुआ क्रान्तिवृत्त पर घूम रहा है | स्वाक्षपरिभ्रमण से अहोरात्रसम्पादिक दैनंदिनगति का एवं क्रान्तिपरिभ्रमण से उत्तर - दक्षिणायन त्रिभाजका साम्वत्सरिकगति का स्वरूप निष्पन्न होता है । स्वाक्षपरिभ्रमण से होने वाली अग्निपरिक्रमा २४ घण्टे में ही समाप्त हो जाती है । फलतः स्वाक्षगति से सम्बन्ध रखने वाला वर्ष पूर्व परिभाषा के अनुसार २४ बण्टे में ही समाप्त हो जाता है । इस वर्ष का मनुष्यायु के साथ सम्बन्ध है । क्योंकि मनुष्य पार्थिव प्राणी है | मनुष्य- पितर देवता, भेद से प्रजा तीन भागों में विभक्त है । मनुष्य प्रजा का पृथिवी [ १०७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् से सम्बन्ध है, पितर प्रजा का चन्द्रमा से सम्बन्ध है एवं देवप्रजा का सूर्य्य के साथ सम्बन्ध है । चन्द्रमा २७ दिन कुछ काल में अपनी एक परिक्रमा लगाता है । फलतः चान्द्र अहोरात्र इतने दिन में ही समाप्त मन्वन्तरपरिलेख --प्रातः कालः + -१ - स्वायम्भुवः सूर्य्यः २- स्वारोचिषो दक्षः ३ - उत्तमो ब्रह्म ४ - तामसो धर्मः ५ - रंवतो रुद्रः ६- चाक्षुषो देवः ७ - वैवस्वतो इन्द्रः * * . मध्याह्न कालः र्वा ह्र का लः अ का ल रा पा + सायङ्कालः १४- सूय्यं सार्वारण: - * १३ - दक्षसावर्णिः * १२ – ब्रह्मसावणिः * ११ - धर्मसावरिणः * १० - रुद्रसावर्णिः E - देवसावणिः ८- इन्द्रसावणिः पुण्याहः -: ब्राह्मदिन मुहूर्त्तापरपर्य्यायकश्चतुर्द्दशमन्वन्तरात्मक सोऽयं + मध्यान्हसमाप्तिः V मध्याह्नकालः अपराह्नापक्रमः [ १०८ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषद् माना जाता है । पार्थिव प्रजा की अपेक्षा चन्द्रवृत्त मासात्मक है, परन्तु चान्द्रप्रजा की अपेक्षा से तो यह एकमास एक ग्रहोरात्र ही है । इसी प्रकार पार्थिव प्रजा की अपेक्षा से जो सम्वत्सर ३६० दिन का है, सौर देवताओं की अपेक्षा से तो वह एक ग्रहोरात्र ही है । इसी को दिव्य ग्रहोरात्र कहते हैं । इस विज्ञान-सिद्ध परिभाषा के अनुसार वर्ष देवताओं का अहोरात्र एक वर्ष है । वर्ष - प्रहः दोनों विचाली हैं । फलतः सहस्रवर्ष का अर्थ सहस्र दिन हो जाता है एवं सत्रयज्ञ का विधान चरितार्थ हो जाता है । इसी परि-भाषा के आधार पर आपको यह विश्वास कर लेना चाहिए कि, पुराण में मनुष्यायुः सम्बन्ध में, एवं तपश्चर्याकालादि के सम्बन्ध में जहाँ भी कहीं सहस्रवर्षादि शब्द प्रयुक्त हुए हैं, उन सबको ग्रहः परक मानते हुए ही काल की व्यवस्था करनी चाहिए । मन्वन्तर प्रकरण चल रहा है । सृष्टिकाल ग्रहःकाल बतलाया गया है, साथ ही इसमें १४ मन्व-न्तरों का भोग बतलाया गया है । इन १४ मन्वन्तरों में से सात मन्वन्तरों तक उद्ग्राभ ( चढ़ाव ) है, सात मन्वन्तरपर्यन्त निग्राभ ( उतार ) है । जैसी स्थिति पहिले मन्वन्तर की है, मन्वन्तर विज्ञान ठीक वैसी ही स्थिति चौदहवें मन्वन्तर की है । इसी प्रकार २ - १३,३-१२, ४-११, ५-१०, ६-६, ७-८ यह क्रम है । इसी क्रम के कारण उत्तर के सात मन्व-न्तरों को ' सारण ' ( सवर्ण समानधर्म्मवाले ) कहा जाता है । सूर्य्य, किंवा सूर्य्यकेन्द्रस्थ प्राणतत्त्व ही इन सब मन्वन्तरों की जन्मभूमि है, अतएव ये मन्वन्तर पुराण में ' सूर्य्यपुत्र ' कहलाए हैं । पार्थिव स्वाक्षपरिभ्रमण के कारण मानुष अहोरात्र २४ घन्टे का होता है । पत्रग्रहोरात्र चान्द्र-परिभ्रमण की पेक्षा से ३० मानुष ग्रहोरात्रों का होता है, जैसाकि " मासेन स्यादहोरात्रः चैत्रः " इत्यादि वचनों से स्पष्ट है, एवं उत्तरायण दक्षिणायन भेद से हमारा एक वर्ष " वर्षेरण दैवतः " के अनुसार सौर देवताओं का एक दिन है । ऐसे ३० दिव्य ग्रहोरात्रों को समष्टि देवताओं का एक मास है । ऐसे दिव्य १२ मास की समष्टि वर्ष है । दूसरे शब्दों में हमारे ३६६ वर्षों का देवताओं का एक वर्ष होता है । ऐसे ४००० चार हजार दिव्यवर्षों का सत्ययुग, ३००० तीन हजार दिव्य वर्षों का त्रेतायुग, २००० दो हजार दिव्य वर्षों का द्वापरयुग, एवं एक हजार दिव्यवर्षों का कलियुग होता है । इन चारों युगों के आदि में क्रमशः ४००–३०० - २०० - १०० इन दिव्य वर्षों का सन्ध्याकाल है, एवं ४०० – ३००–२००– १०० ये सन्ध्यांश हैं | इस प्रकार ४८०० वर्ष का द्वापरयुग, एवं १२०० वर्ष का कलियुग हो जाता है । इन सबका संकलन किया जाता है तो १२००० ( बारह हजार ) दिव्य वर्ष हो जाते हैं । यही एक " देवयुग " कहलाता है । इस एक देवयुग में सूर्य की देव प्राणमयी एक रश्मि का भोग हो जाता है । सूर्य्य में ऐसी सहस्र रश्मियाँ हैं । इन्ही रश्मियों के सम्बन्ध से सूर्य को " सहस्रांशु सहस्रदोधिति " इत्यादि नामों से व्यवहृत किया जाता है । एकसहस्र दिव्य युगों में सूर्य्य का सर्वाप्मना भोग हो जाता है । यही सूर्य का जीवनकाल है, यही सौर ग्रहःकाल है, यही पुराणभाषा के अनुसार ब्रह्मा का ग्रहः कल्प है, एवं ऐसे दिव्य सहस्रयुगों की समष्टि ही रात्रिकल्प है । दूसरे शब्दों में १००० दिव्ययुगात्मक काल ब्रह्मा का * इन सब विषयों का विशद विवेचन " पौराणिक मन्वन्तर रहस्स नाम के निबन्ध में देखना चाहिए | [ १०६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् एक दिन है एव १००० दिव्ययुगात्मक काल ही ब्रह्मा की एक रात्रि है । सूर्य्यं का नष्ट होजाना खण्ड-प्रलय है । सहस्र दिव्ययुगों में सहस्रांशु की सहस्रकलाओं का जब भोग हो जाता है, तो वह उसी स्व-प्रभव अव्यक्त में बिलीन हो जाता है । जैसा कि स्मृति कहती है-यदा स देवो जागत तदेदं चेष्टते जगत् । यदा स्वपितिशान्तात्मा ( श्रव्यक्तात्मा ) तदा सर्व निमीलति ॥
अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥।
— मनुः १।५२ । - गीता ८ | १८ | पूर्वोक्त ग्रहः कल्प में १४ मन्वन्तरों में से प्रत्येक मन्वन्तर में ७१ दिव्य चतुर्युगी का भोग होता है । इस क्रम से १४ मन्वन्तरों की ६६४ चतुर्युगियाँ हो जातीं हैं । शेष ६ चतुर्युगी सन्ध्या सन्ध्यांश में अन्तर्भूत मानली जाती हैं । संकलन से पूरी १००० चतुर्युगी हो जाती हैं । यही ब्रह्म का एक कल्प है । जिस प्रकार लोकभाषा का मुहूर्त्त शब्द पुराण में मन्वन्तर नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव लोक - प्रसिद्ध तिथि शब्द के स्थान में पुराण में " कल्प " शब्द प्रयुक्त हुआ है । जिस प्रकार हमारी ३० तिथियों का एक मास होता है, एवमेव ३० कल्पों का एक ब्राह्म मास होता है । ऐसे १२ मासों का एक ब्राह्म वर्ष होता है । ऐसे १०० वर्षों का एक ब्रह्मयुग होता । सौ वर्षों में ब्रह्मा की आयु समाप्त होजाती हैं । इसी ब्रह्मतत्त्व को कहा ' श्रव्यक्त ' जाता है । १०० वर्ष समाप्त होने पर बल्शेश्वर नाम से प्रसिद्ध एक विश्वेश्वर का पुरुष में लय होजाता है । लयभाव को " प्रलय " ( अव्यक्त नाम से प्रसिद्ध प्रकृति का लय ) कहा जाता है । ध्यान रहे, महामायावच्छिन्न अश्वत्थमूत्ति पांडशी पुरुष में ऐसी एक सहस्त्र ग्रव्यवतधाराएं हैं । प्रत्येक धारा में ' स्वयं-“ परमेष्ठी – सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवी ' ये पाँच - पाँच पर्व हैं । इसीको विज्ञान भाषा में ' पञ्चपुण्डीरा - प्राजापत्य-बत्शा ' कहा गया है । इन पाँचों में स्वयम्भु ब्रह्मा है, परमेष्ठी विष्णु है, सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी ( पृथिव्यु-( पलक्षित ग्रग्नि ) की समष्टि त्रिनेत्र महादेव हैं । ब्रह्मा प्राणपति हैं, विष्णु देवपति हैं, महादेव भूतपति हैं । ब्रह्मा अव्यक्त हैं, विष्णु व्यक्ताव्यक्त महादेव व्यक्त हैं । जिस क्रम में सर्ग ( सृष्टि ) होता है, उसी क्रम से प्रतिसर्ग ( प्रलय ) होता है । पहले सचन्द्र, सपृथिवी सूर्य्य का ग्रापोमय परमेष्ठी में लय होता है । यह पहला खण्ड प्रलय है । क्योंकि इसमें विश्वखण्डभूत पृथिवी चन्द्र - सूर्य्य का ही लय होता है । इनका ग्रायुःकाल ही दिव्यसहस्त्रयुगकाल है । ग्रागे जाकर ब्राह्मयुगसमाप्ति पर सविष्णु ब्रह्माका स्वप्रभव उसी अश्वत्थपुरुष में लय होजाता है । ब्रह्मा अपनी बल्शा की प्रकृति है । अतएव इस लय भाव को प्रकृति-सम्बन्ध से " प्रलय ” कहा जाता है । कोई समय ऐसा भी आता है, जिसमें पुरुष की सहस्त्रों बल्शाओं का भी लय हो जाता है । उस समय पुरुषस्वरूपसमर्पक - पुरभाव सम्पादक महामाया का बन्धन टूट जाता है । सखण्ड पुरुष महामाया के तिरोहित होते ही स्वप्रतिष्ठा रूप ' परात्पर ' नाम से प्रसिद्ध अखण्ड पर -मेश्वर में लीन होजाता है । यही विश्वेश्वर की मृत्यु है, महाविश्व का लय है । इसमें महामाया का बन्धन [ ११० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् टूटता है, अतएव इस लयभाव को " महाप्रलय " कहाजाता है । इस प्रकार ' महामायी महेश्वर ' ( सहस्त्र-बल्शेश्वर ), पञ्चपुण्डीरात्मकबल्शेश्वर ( अव्यक्त ब्रह्म ), ' त्रिकल उपेश्वर ' ( सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवीरूप ), इन तीन संस्थाओं के भेद से लयभाव भी महाप्रलय, प्रलय, खण्डप्रलय, भेद से तीन भागों में विभक्त है । इन तीनों में से मनुष्यसर्ग का प्रधान सम्बन्ध बल्शेश्वर के साथ है । अतएव उपेश्वर - बल्शेश्वर की आयु का समय तो दिव्ययुग - ब्राह्मयुग भेद से शास्त्रकारों ने निश्चित कर दिया है । परन्तु मायी महेश्वर का कालनिर्णय नहीं हुआ है । इसके सम्बन्ध में महर्षियों का -( १ ) " अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केरण योजयेत् । प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् । " यही समाधान है । विज्ञेय - १ - सर्वाधिष्ठाता श्रखण्डपरात्पर दुर्विज्ञेय - १ - सहस्रबत्शावच्छिन्न, अश्वत्थमूत्तिमहामायी विश्वेश्वर - महा-प्रलयाधिष्ठाता विज्ञेय - २ - पञ्चपुण्डीरावच्छिन्न, एकबल्शेश्वरयोगमायी बल्शेश्वर - प्रलया-धिष्ठाता सुविज्ञेय - ३ - त्रिपर्वावच्छिन्न प्रलयाधिष्ठाता सू. चं. पृ. मूर्ति योगमायी उपेश्वर - खण्ड-* २४ – घण्टों का ——- १ मानुष ग्रहोरात्र ३० – अहोरात्रोंका – १ मानुप मास १२ – मासों का —–१ मानुष वर्ष १०० वर्षों का -१ मनुष्ययुग -- मानुषयुग ( नित्यप्रलय ) जीवसंस्था १ – मानुपका – १ दिव्य दिन ३० - दिव्य दिनों का -१ दिव्यमास ( २ ) १२ – दिव्य मासों का -१ दिव्यवर्ष ( - दिव्ययुग ( खण्डप्रलय ) उपेश्वर संस्था १२००० - दिव्यवर्षों का -१ खण्डदिव्ययुग १००० - दिव्ययुगों का -१ [ १११ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १ - महादिव्ययुगका - १ ब्राह्मदिन ' अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ३० – ब्राह्मदिनोंका —–१ ब्राह्ममास ( ३ ) -- ब्राह्मयुग ( प्रलय ) बल्शेश्वर संस्था १२ – ब्राह्ममासों का – १ ब्राह्मवर्षं १०० — ब्राह्मवर्षों का -१ ब्राह्मयुग ( ४ ) सहस्रब्रह्मयुगों की समष्टि - १ विश्वेश्वरयुग ] - ईश्वरयुग ( महाप्रलय ) महेश्वरसस्था ग्रहोरात्र इस व्यवस्था का स्थूल उपक्रम है । वस्तुतः कालगणना स्वेदायन से श्रारम्भ करनी चाहिए । १५ स्वेदायनों का १ लोमगर्त है, १५ लोमगत का १ निमेष है, १५ निमेवों का १ अन है, १५ अनों का १ प्राण है, १५ प्राणों का १ इदम् है, १५ इदं का १ इदानि है । १५ इदानि का १ एतहि है । १५ एतर्हिका १ एतर्हीरिण है । १५ एतहरिएका १ क्षिप्रं है, १५ क्षिप्रका एक क्षिप्राणि है । १५ क्षिप्रारिण का १ मुहूर्त्त है । ३० मुहूतों का १ अहोरात्र है । यह कालविभाग बार्कलि नाम के महर्षि के मतानुसार है । पुराण - श्रमरकोप साधारण भेद से अन्य प्रकारों से भी इन भेदों का उपबृंहण किया जा सकता है । इन सब विषयों का सोपपत्तिक निरूपण हमने ' मन्वन्तर रहस्य ' नाम के निबन्ध में कर दिया है । ग्रतः प्रकृत में अधिक विस्तार न कर प्रकरण सङ्गति के लिए केवल तालिकायों द्वारा काल का स्वरूप दिग्द-र्शन करा दिया जाता है । बार्कलिऋषि के मतानुसार कालपरिमाण १५ – स्वेदायनों का – १ – लोमगर्त १५ - लोमगर्त का – १ – निमेष १५ – निमेष का – १ – अन १५ - अनों का - १ - प्राण १५ - प्राणों का – १ – इदम् १५ – इदम् का- - १ – इदानि १५ – इदानि का – – १ – एतहि १५ – एहि का - १ - एतहरिण १५ – एत का – – १ – क्षित्र १५ – क्षित्रों का – १ –– मुहूर्त्त ३० - मुहूर्ती का – १ – ग्रहोरात्र [ ११२ ]