श्रीगणेशाय नमः।

Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 121–130

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् पुराणकेमतानुसार श्रमरमतानुसार १८ – निमेषों की — १ काष्ठा १६ – निमेषों की - १ काष्ठा ३० - काष्ठाओं की - १ कला ३० -- कलायों का -१ क्षरण ३० – काष्ठा की - १ कला ३० – कला का - १ मुहूर्त्त ३० – मुहूर्तों का – १ अहोरात्र साधारण मतानुसार १५ - कला की -१२ –— क्षणों का -- १ मुहूर्त्त ३० – मुहूर्त्तो का – १ अहोरात्र ३० -- ग्रहोरात्रों का -१ मास १२ – मासों का - - १ संवत्सर २ - घड़ियों का -१ घड़ी १५ - मुहूर्ती का -१ दिन २ - दिन का -१५ – अहोरात्र का -१ -पक्ष २– पक्षों का— ६ – मासों का — १ अयन २- प्रयनों का -१ मुहूर्त्त १ दिन रात १ मास १ सम्बत्सर युगनाम सन्धिकाल मध्यकाल सन्ध्यांश संकलन १ सत्ययुग ४०० ४००० ४०० ४८०० २ त्रेतायुग ३०० ३००० ३०० ३६०० ३ द्वापरयुग २०० २००० २०० २४०० ४ कलियुग १०० १००० १०० १२०० दिनकल्प रात्रिकल्प [ ११३ ] १२००० १२०००००० १२०००००० युगमान से दिव्यवर्षो

पृष्ठ 122

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड मानुपवर्षो से युगमान सत्ययुग १७२८००० त्रेतायुग १२६६००० अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् द्वापरयुग ८६४००० कलियुग ४३२००० चतुर्युग ४३२०००० दिनकरूप ४३३२००००००० रात्रिकल्प ४३३२००००००० सत्रहलाख अठाईस हजार मानुपवर्ष, चार हजार आठसो दिव्यवर्ष - सत्ययुगमान । वारलाख छिनवें हजार मानुषवर्ष तीन हजार बस्सी आठलाख चौसठ हजार मानुपवर्ष, दोहजार चारसो चारलाख बत्तीस हजार मानुपवर्ष, एकहजार दोसी तियालीसलाख बीस हजार मानुषवर्ष बारहहजार नियालीस चर्च, वत्तीस करोड़ मानुपवर्ष, वार करोड़ 13 १ - एक मन्वन्तर के मानुषवर्ष - ३०६७३२००० २ – छः मन्वन्तर के मानुपवर्ष – १८४०२२०००० ३ – २७ दिव्ययुगों के मानुषवर्ष – ११६६४०००० ४ - सत्ययुग के मानुपवर्ण-५ - त्रेतायुग के मानुष वर्ष-६ - द्वापरयुग के मानुपवर्ष--७ - कलियुग के मुक्त मानुषवर्ष 1 ) दिव्यवर्ष - तायुगमान दिव्यवर्ष - द्वापरयुगमान । दिव्यवर्ष - कलियुगमान । दिव्यवर्ष - चतुर्युगमान । दिव्यवर्ष - दिनकरूपमान । - रात्रिकल्पमान । ( तीस करोड़ सड़सठलाख बत्तीस हजार ) ( एकअर्ज चौरासी करोड़ तीनलाख बीस हजार ) ( ग्यारह करोड़ छासठ लाख चालीस हजार ) १७२८००० ( सत्रह लाख ग्रट्ठाईस हजार ) १२६६००० ( बारह लाख छिन हजार ) ८६४००० ( आठ लाख चौसठ हजार ) ५००० पांच हजार ) [ ११४ ]

पृष्ठ 123

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् आज तक बीता हुआ सृष्टिकाल – १ ९ ६०८५३००० – एक अर्थ छिनवें करोड़ ग्राठ लाख त्रेपन हजार १ - कलियुग के बाकी भोग्यव – – ४२७००० ( चार लाख सत्ताइस हजार ) २ - ७१ चोयुगियों में से बाकी बची हुई ३४ चौबुगियों के भोग्यवर्णं ३ - उत्तर दिन के भोग्य सात मन्व-अन्तरों के वर्ष ४ - वोदह मन्वन्तरों के अन्त में भोग्य सन्धिकाल - १८५७६०००० ( अठारह करोड़ सत्ताबनलाख साठ हजार ) — २१४७०४०००० ( दो अर्व चौदह करोड़ सत्तर लाख: चालीस हजार ) - २५६२०००० ( दो करोड़ उनसठ लाख बीस हजार ) एक कल्प में बाकी बचा हुआ काल - २३५ ९१४००००-दो प्रर्व पैंतीस करोड़ इकानवें लाख चालीस हजार ) पूर्व में बतला दिया गया है कि, ब्राह्मयुग के मास में तिथिस्थानीय ३० कल्प होते हैं । इन कल्प-रूप तिथियों में से वर्त्तमान में शुक्लपक्ष के प्रतिपत्र ( पड़वा ) स्थानीय श्वेतवराह नाम के प्रथम कल्प का ( ब्रह्मा की आयु के प्रथम दिन का ) भोग चल रहा है । इसमें से ६ मन्वन्तरों का भोग समाप्त हो गया है, सातवाँ ' वैवस्वतमन्वन्तर ' चला रहा है । इसकी ७१ चौयुगियों से २७ चतुर्यु गियों का भोग हो चुका है । अट्ठाईसवीं चतुर्युगी चल रही है । इसमें से भी सत्य त्रेता द्वापर, इन तीन युगों का भोग हो चुका है | कलियुग चल रहा है । कलियुग के भी ५००० ( पाँच हजार वर्ष - मानुप मान के अनुसार ) समाप्त हो गए हैं । अभी ब्रह्मा के दिन के साढ़े ग्यारह ( ११॥ ) बजे हैं । इस शेष कलि के भुक्त हो जाने पर २६ वीं चतुर्युगी का प्रारम्भ होगा । इस प्रकार शेष चतुर्यु गियों के भोग के अनन्तर वैवस्वत मन्व-न्तर समाप्त हो जायगा । अनन्तर सात मन्वन्तरों का उक्त धारा क्रम से उपभोग होगा । जिस समय पूरे चौदह मन्वन्तर समाप्त हो जायँगे, प्रतिपत् तिथिरूप वराहकल्प समाप्त हो जायगा, सूर्य्य नष्ट हो जायगा । सर्वत्र प्प्रकृतिप्रधान घोरतम व्याप्त जायगा । इस रात्रिकल्प में रात्रि के चौदह मन्व-न्तरों का भोग होगा । अट्ठाईस की परिसमाप्ति पर नीललोहित नाम की द्वितीय कल्पस्थानीय द्वितीया तिथि का आरम्भ होगा । और इस प्रकार कालपुरुष की महामहनीय महत्ता हमें सदा प्राश्चर्यमुक्त बनाती रहेगी । चतुर्द्दशमन्वन्तरात्मक ब्राह्मकल्प का सम्बन्ध सूर्य्य से है । एक कल्प सूर्य्य की पूर्णायु है । कल्पान्त में चतुर्द्द शमन्वन्तराधिष्ठाता सूर्य्य स्वप्रभव परमेष्ठी में लीन हो जाता है । पुनः भृग्वङ्गिरोमूर्ति आपोमय परमेष्ठी से नवीन सूर्य्य उत्पन्न होता है । यह धाराक्रम परमेष्ठी के आधार पर ब्रह्मायुः पर्य्यन्त निरन्तर यों ही चलता रहता है । इस मन्वन्तरात्मिका खण्डसृष्टि, एवं खण्डप्रलय के अधिष्ठाता ग्रापोमय परमेष्ठी हैं, यही निष्क है । इसी अभिप्राय से भगवान् कहते हैं. मन्वन्तराण्यसंख्यानि सर्गः संहार एव च । क्रीडन्निवैतत् कुरुते परमेष्ठी पुनः पुनः ॥ ( मनुः १।८० ) [ ११५ ]

पृष्ठ 124

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अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड चतुर्द्दश ' मन्वन्तर ' एवं कल्प परिलेख -१ - श्वेतवराहः ( प्रतिपत् ) १ – १६ –— नारसिंह ( प्रतिपत् ) २- नीललोहितः ( द्वितीया ) २ – १७ – समानः ( द्वि ० ) ३- वामदेवः ( तृतीया ) ३ – १५ – प्राग्नेयः ( तृ ० ) ४ - रथन्तरः ( चतुर्थी ) ४ - १६ – सौम्य -( च ० ५- रौरवः ( पञ्चमी ) -० ५ - २० – मानवः पं ० ) ६- प्रारणः ( पष्ठी ) ६- २१ - तत्पुरुषः ( ब ० ) ७ - वृहत् ( सप्तमी ) ७—२२ — वैकुण्ठः ( स ० ) ८ – कन्दर्पः ( अष्टमी ) ८–२३ – लक्ष्मी ( प्र ० ) ६ - सत्यः ( नवमी ) १० - ईशानः ( दशमी ) ११ - व्यानः ( एकादशी १२- सारस्वत: ( द्वादशी ) ६ – २४ – सावित्री ( नव ० ) -० १० -- २५ – अघोरः द ० ) -—० ११–२६ — वराहः ( एका ० ) ० १२ – २७ – वैराजः ( द्वा ० ) -० १३ – २८ – गौरी ( त्रयो ० ) १३ - उदानः ( त्रयोदशी ) १४- गारुड: ( चतुर्दशी ) १४ – २ — महेश्वरः ( च ० ) १५ – कूर्म्मः ( पूर्णिमा ) १५ – ३० – पितृकल्पः ( श्रमावास्या ) शुक्लपक्षः -∞ कृष्णपक्षः त्रिंशत्कल्पास्त्रिशद्दिनान्येको – ब्राह्ममासः [ ११६ ]

पृष्ठ 125

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् तिथिरूपकल्प में १४ मन्वन्तर - प्र १ – स्वायंभुव र- प्रतिमन्वन्तर में दिव्ययुग → ७१–७१ २ - स्वारोचिष -७१ – १४२ ३ – उत्तम —-७१२१३ ४ - तामस ——७१ २८४ ५ – रंवत-→ ७१ – – ३५५ ६- चाक्षुप ---- → ७१–४२६ ७ — वैवस्वत —७१४६७ ८- इन्द्रसारण ७१ – ५६८ ६ - देवसावर्णि ७१६३६ १० - रुद्रसावण -७१–७१० ११ – धर्मसावरिण ७१–७८१ १२ – ब्रह्मसावरिंण-७१८५२ १३ – दक्ष सार्वारण -- → ७१——६२३ १४ - सूर्य्यसार्वारण-७१६६४ सन्ध्या— ~ → ६ -- १००० पूर्वोक्त कालपुरुष का परिमाण साधारण मनुष्यों की दृष्टि में केवल कल्पना है, परन्तु वैज्ञानिकों की दृष्टि में यह सब कुछ वेदसिद्ध है । पाश्चात्य जगत् की भौतिक समुन्नति को ही वास्तविक उन्नति सम-झने वाले, पाश्र्चात्यशिक्षादीक्षित स्वधर्म्मविमुख भारतीयों के धर्म्मविरोधी आन्दोलन को ही राष्ट्र समृद्धि का कारण मानने वाले, वैदिक विज्ञान की गहनाटवी से सर्वथा अपरिचित, अपने आपको विद्वान समझने वाले कतिपय भारतीय सज्जन भी पूर्वोक्त युग परिमाण को कल्पना समझते हुए सत्ययुग का स्वप्न देख रहे हैं । उनके मतानुसार शास्त्रसिद्ध - " श्रष्टविशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे, ब्रह्मणो द्वितीय प्रह रार्द्धे ० " इत्यादि संकल्प आज मिथ्या हो चुका है । सुप्रसिद्ध ज्योतिर्वित् जयपुर राज्य निवासी ( वर्त्तमान में इन्दौर निवासी ) श्री दीनानाथजी शास्त्री ने कुछ समयपूर्व हमारे पास ' वेदकाल निर्णय - युगपरिवर्तन ' नाम की दो पुस्तकें भेजने का अनुग्रह किया था । युगपरिवर्तन में शास्त्रीजी ने सुपर्णचिति के आधार पर वेदकालीन पञ्चाङ्ग निर्माण पद्धति का जो दिग्दर्शन कराया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी है | वास्तव में उक्त विषय की खोज प्रपूर्व एवं विद्वानों को ऋणी बनाने वाली है । परन्तु उसी पुस्तक में— [ ११७ ।

पृष्ठ 126

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिपत्

यदा चन्द्रश्च सूर्य्यश्च तथा तिष्यबृहस्पतिः ।

एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् ॥

( महाभारत, वनपर्व१८८० ) इत्यादि कतिपय प्रमाणों का रहस्यार्थ न समझते हुए सत्ययुग मानने का साहस कर डाला है । क्या ही उत्तम हो, यदि अब भी शास्त्रीजी अपने अभिनिवेश को छोड़कर उक्त कल्पना का संशोधन प्रका-शित कर श्रार्य जाति को इस मिथ्या कलङ्क से वचालें । इसी प्रकार बाबा - राजनारायणजी षट्शास्त्री ने अपनी ' चेतावनी ' नाम की पुस्तक में इसी प्रकार अनर्गल प्रलाप किया है । हाल ही में गणितरत्न पं ० श्री हरदेवजी त्रिवेदी ज्योतिःशास्त्री ( मेवाड़ी ) ने " चेतावनी समीक्षा " नाम से उक्त प्रशास्त्रीय मत का गणित के आधार पर खण्डन करने का स्तुत्य प्रयास किया है । प्रकृत में हमें ग्रात्मस्वरूप का दिग्दर्शन कराना है, अतः यहाँ उक्त मत की समालोचना का अवसर नहीं है । इन सब विषयों का सोपपत्तिक निरूपण करते हुए, युगपरिवर्तन का सशास्त्र सयुक्ति निराकरण करते हुए मन्वन्तर का स्वरूप स्वतन्त्र रूप से निरूपित हुआ है । विशेष जिज्ञासुत्रों को उसीके प्रकाशन की प्रतीक्षा करनी चाहिए । उक्त कालगणना से यहाँ हमें केवल यही बतलाना कि लोकसाक्षी सूर्य की उत्पत्ति, स्थिति, भङ्ग, तीनों काल निश्चित हैं । जिस समय सूर्य्य उत्पन्न होता है, वह काल पुण्याह ( पवित्र दिन ) का आरम्भकाल माना गया है । सातवें मन्वन्तर का संधिकाल मध्याह्न माना जाता है, एवं चौदहवें मन्वन्तर के अन्त में त्रस्त हो जाता है । उदयास्तभावापन्न यह सूर्य्यं यद्यपि अस्मदादि साधारण मनुष्यों की दृष्टि में सदा ही दिखलाई देता है, परन्तु वास्तव में सूर्य प्रतिक्षण बदल रहा है । इस सूर्य्यदृष्टान्त से प्रकृत में केवल यह क्षणिक भाव ही हमें सिद्ध करना है, जैसा कि आगे के प्रकरण से स्पष्ट हो जायगा । पूर्व के कालस्वरूप - दिग्दर्शन से यह भली भाँति सिद्ध हो जाता है कि, सूर्य्य किसी दिन उत्पन्न हुआ था, ग्राज वह वर्तमान है, किसी दिन न रहेगा । " किसी समय उत्पन्न लयकाल मीमांसा सूर्य का विनाश होगा " यह निश्चित है - " संयोगा विप्रयोगान्ताः । " इस सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या प्रत्यक्ष दृष्ट सूर्य का यह महा-गोल सहसा एक क्षण में ही नष्ट हो जायगा? वैज्ञानिक उत्तर देते हैं कि, सूर्य के नाश के लिए चिर-काल अपेक्षित है । प्रतिक्षण सूर्य्य पुराना पड़ रहा है । इस क्षणिक विनाश की धारा ही किसी युग में ( चौदहवें मन्वन्तर के अन्त में ) सूर्य्य विनाश का कारण बनती है । यद्यपि स्थूल दृष्टि से यह क्षणिक परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता, तथापि विज्ञान दृष्टि से ऐसा ही मानना पड़ता हैं । इस प्रकार सूर्य में प्रतिक्षण विलक्षणता का होना सर्वथा सिद्ध हो जाता है । जो सूर्य्य पूर्वक्षण में था, उत्तरक्षण में उसका सर्वथा अभाव है । इस क्षणिक परिवर्तन के कारण यद्यपि सूर्य्य सर्वथा विनाशी ही है, तथापि साथ-साथ ही एक नित्य परिवर्तनीय भाव भी हम प्रत्यक्ष में देख रहे हैं । प्रतिदिन हम उसी सूर्य्य के दर्शन कर रहे है । सूर्य्यं कल भी था, ग्राज भी है, कल भी रहेगा । सूर्य्य प्रतिक्षण बदलता हैं, परन्तु सत्तातत्त्व कभी नहीं बदलता । सत्ता एक है, नित्य है । सत्तातत्त्व के आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाला क्षणिक-[ ११८ ]

पृष्ठ 127

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् बलसंघातरूप सूर्य्य निरन्तर बदलता ही रहता है । सर्वथा बदलने वाला सूर्य्य न बदलने वाले सत्तातत्त्व पर प्रतिष्ठित है । अतएव वह बदलता सा नहीं दिखलाई देता । उदयकाल से प्रस्तकाल पर्य्यन्त सूर्य्यं की " " हंकार प्रस्ताव आदि उद्गीथ प्रतिहार- उपद्रव - निधन " ये सात स्थूल अवस्थाएँ मानी गई हैं । अव-स्थाएं सात हैं, सूक्ष्मदृष्टि से अनन्त हैं, परन्तु सूर्य्य एक है । यह एकत्त्व उसी सत्तात्तत्त्व की महिमा है । इस प्रकार हम सूर्य्य में प्रतिक्षण बदलने वाले नानाभाव का भी प्रत्यक्ष कर रहे हैं एवं साथ ही में क्षण अपरिर्तनीय एकत्त्वभाव भी उपलब्ध हो रहा है । तमःप्रकाशवत् अत्यन्त विरुद्ध एकत्त्व - ग्रनेक-त्त्वभावों का एक ही सूर्य्य में उसी प्रकार समन्वय हो रहा है, जैसे कि परस्पर में सर्वथा विरुद्ध ' पृथिवी-जल — श्रग्नि — वायु - आकाश ' इन पाँचों भूतों का एक ही पाश्वभौतिक शरीर में समन्वय देखा जाता है । इन दोनों विरुद्ध भावों में एकत्त्वधर्म अविचाली है, शाश्वत है । अनेकत्त्वधर्म्म विचाली है, अनित्य है । नित्यानित्य - शान्ताशान्त की समष्टि सूर्य्य है । उत्पत्ति क्षण से लयक्षण पर्य्यन्त एक ही प्राणी की दस अवस्थाएं होती हैं, जैसा कि प्रस्तावना में बतलाया जा चुका है । एक नूतन काष्ट में लोहकील भी सरलता से प्रविष्ट नहीं हो सकती । परन्तु १०० वर्ष पश्चात् वही काष्ठखण्ड ऐसा जीर्ण हो जाता है कि, बिना बल - प्रयोग के जहाँ उसका स्पर्श किया जाता है, वही भाग गिर पड़ता है । इस. स्थिति से मानना पड़ेगा कि, किसी नियत क्षण में ही काष्ठ की यह दशा नहीं हुई है, अपितु प्रतिक्षण में होने वाले परिवर्तन से ही काष्ठ उक्त दशा में परिणत हुआ है । यह सब कुछ है, परन्तु काष्ठ अब भी । काष्ठरूप एकत्त्व सर्वथा अक्षुण्ण है । निदर्शन मात्र है । संसार में स्थिर चर जितने भी पदार्थ हैं, सब में समानरूप से परमाणु संगठन के तारतम्य से आपको एक परिवर्तनशील तत्त्व मिलेगा एवं एक. अपरिवर्तनीय तत्त्व उपलब्ध होगा । इन्हीं दो भावों के कारण संसार को “ द्विनियति ' ( दो नियत भावों का समुच्चय ) कहा जाता है । " दुनियां " शब्द द्विनियति का अपभ्रंश है । दुनियां को दुरङ्गी कहा जाता है । उक्त दोनों तत्त्वों में परिवर्तित होने वाला तत्त्व ' नाम रूप कर्म ' की समष्टि है, यही वस्तु है । न बदलने वाला तत्त्व ' अस्ति ' ( है ) है । यह ' मन: - प्राण - वाक् ' का समुच्चित रूप है । मनःप्राणवाङ्मय अमृतलक्षण अस्तितत्त्व पर नामरूपकर्म्ममय मृत्युलक्षण पदार्थ प्रतिष्ठित हैं । नित्यानित्य विवर्त जब तक वस्तु है, तब तक तो उस सत्ता ने उस वस्तु को पकड़ रक्खा है, वस्तु के नष्ट हो जाने पर वही सत्तातत्त्व वस्तु के प्रभाव का अनुग्राहक बन जाता है । " देवदत्त है " इस वाक्य में भी सत्ता लक्षण " है " विद्यमान है एवं " देवदत्त नहीं है " इस प्रभावा-त्मक वाक्य के अन्त में भी ( नहीं है - इसके अन्त में भी ) " है " विद्यमान है । " है " ( ग्रस्ति ) नहीं है, यह बात नहीं है । ग्रपितु " है नहीं है " इस प्रकार के " अस्ति " - " नास्ति " दोनों भावाभावात्मक व्यवहारों में अस्तितत्त्व अक्षुण्ण है । जिसे ग्राप " नास्ति " कहते हैं, उसमें भी " न- अस्ति " इस विवेक से अस्ति - भाव विद्यमान है । नामरूपकम्र्मात्मक वलसमुच्चय बदलता है, मनः प्राणवाङ्मय प्रस्तित्त्व कभी नहीं बदलता । इस प्रकार कारणभूत ईश्वर प्रजापति से उत्पन्न कार्यरूप इस विश्व में समष्टि व्यष्टि रूप से उभयथा पूर्वोक्त दोनों विरुद्ध भावों को हम देख रहे हैं । " कारणगुणाः कार्यगुणानारभन्ते " [ ११६ ]

पृष्ठ 128

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् यह न्याय सुप्रसिद्ध है । इस सर्वसम्मत सिद्धान्त के अनुसार मानना पड़ता है कि, भावद्वययुक्त कार्यात्मक विश्व में जब अस्ति नास्ति लक्षण दो विरुद्ध भावों की हमें निर्भ्रान्ति रूप से उपलब्धि होती है, तो अवश्य ही उस ग्रहष्ट कारण रूप ईश्वर प्रजापति में भी उक्त दोनों विरुद्ध भावों का समन्वय होगा । यदि वहां ( कारण में ) ये दोनों न होते, तो यहाँ ( कार्य में ) उनकी उपलब्धि कथमपि नहीं हो सकती थी ही दोनों तत्त्व श्रुतियों में अपेक्षा से भिन्न - भिन्न प्रकरणों में भिन्न - भिन्न नामों से प्रसिद्ध हुए हैं । रस - प्रमृत, प्रभू - सत्, ज्योति - विद्या, इत्यादि नामों से नित्मतत्त्व प्रसिद्ध है एवं बल - मृत्यु, श्रभ्व-श्रसत्, वीय्यं - श्रविद्या, इत्यादि नामों से श्रनित्य सत्त्व व्यवहृत हुआ है । पूर्व कथनानुसार बदलने वाला तत्त्व सर्वधा विनश्वर है । " नास्ति ( अव्यक्त ) - २ - प्रस्ति ( व्यक्त ), ३ - नास्ति अव्यक्त ) ” इन तीन क्षणों से नित्य प्राक्रान्त है । मध्य का अस्ति क्षण भी परमार्थतः बदलता हुआ होने से नास्तिरूप ही है | अतएव इसे भी हम सर्वथा अस्थिर ही मानने के लिए तय्यार हैं । इसी क्षणिक भाव के कारण वह तत्त्व नास्तिसार है, “ कुछ नहीं है " के समान है । परन्तु सदसद्विलक्षण मायावत के प्रभाव से रस-रूष नित्म तत्त्व से अनुगृहीत होकर वह कुछ न होता हुआ भी, सम्भूति - भाव को प्राप्त होता हुआ " सब कुछ " बन रहा है, अस्तिवत् प्रतीत हो रहा है । सच पूछिए तो सम्पूर्ण विश्व में नामरूपकम्र्मात्मक वह असत् तत्त्व ही ग्राज सर्वत्र प्रभु बन रहा है । इस प्रकार यह तत्त्व - स्व - स्वरूप से कुछ न होता हुआ भी रसानुग्रह से सब कुछ बन रहा है । इसके इसी स्वरूप - धर्म को लक्षण में रख कर - " प्रभूत्वा भवति ” " प्रभूत्वा भाति, प्रतीयते सर्वत्र " " प्रभवन् भवति " इत्यादि निर्वचनों के अनुसार वैज्ञानिकों ने इस नास्ति-सार तत्त्व को " श्रभ्व " नाम से व्यवहृत किया है । लोक - प्रसिद्ध " हाबू " ( हौश्रा ) शब्द इसी अभ्व शब्द का अपभ्रंश है | छोटा बालक जब उपद्रव करने लगता है, तो माता " अरे हाबू प्राता है, चुप हो जा " यह कहती है । ' हाबू ' नाम का कोई सत्तासिद्ध पदार्थ नहीं है, कुछ नहीं है, परन्तु बालक डर जाता है । इसी प्रकार कुछ नहीं होता हुआ भी वह अभ्व | हाभूरूप महाविश्व के सामने हम सब बच्चे हैं । इन विश्वविभीषिकाओं से जगज्जननी महामाया हम सबको डरा रही है । ऐसा यह अभ्व क्षणिक होने से ही स्वलक्षण है । एक क्षणिक ग्रभ्व दूसरे क्षणिक ग्रभ्व का लक्षण नहीं बन सकता । " अमुक अभ्व अमुक अभ्व जैसा है " यह बोलने का अवसर ही नहीं मिलता । क्योंकि जिस समय एक अभ्व को हम अन्य अम्व का लक्षण बतलाते हैं, उसी समय दोनों विनष्ट हो जाते हैं । अतः हम इसे अवश्य ही " स्वलक्षण ' कह सकते हैं । जब यह क्षणस्थायी भी नहीं, तो मानना पड़ेगा कि यह कुछ नहीं है । इसी स्वलक्षण भाव के कारण हम इसे " शून्य " कह कहते हैं । स्थिरता में शान्ति है, शान्ति में सुख है, किंवा शान्ति ही सुख है । सर्वथा अस्थिर क्षोभरूप उस ग्रभ्व में स्थिति मूलक शान्ति - सुख का नितान्त अभाव है । अपि च " यो वं भूमा तब सुखं, नाल सुम्नमस्ति " इस औषनिषद सिद्धान्त के अनुसार भूमा सुख है, अल्पता दुःख है । क्षणिक अभ्त्र सर्वथा शून्य होता हुआ अल्पतम है । इन्हीं सब कारणों से हम इसे " दुःखरूप " कह सकते हैं । इस प्रकार इस प्रभ्व तत्त्व की १ भांति सिद्ध हो जाती है । यह श्रभ्व तत्त्व क्षणिकता, २ - स्वलक्षणता ३ - शून्यता, ४ - दुःखरूपता भली-दिग्- देश - काल से सबंधा परिच्छिन्न होता हुआ ससीम है, । १२० ।

पृष्ठ 129

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् खण्ड - खण्ड है, तमोरूप है, संख्या में ग्रनन्त है, ( इसी ग्रानन्त्य से प्रभ्वरूप विश्व में वैचित्र्य उपलब्ध होता है ) आवरणधर्म्मा है, साजन है, पाप्मा है । दूसरा है अपरिवर्तनीय नित्य तत्त्व । यह एकरूप से सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है, अतएव " श्रा ( समन्तात् - सर्वतः ) भवति " " प्रा - श्रभवत् " इत्यादि निर्वचनों से इस व्यापक नित्य तत्त्व को " श्रभू ” कहा जाता है | व्यापक होने से ही यह सर्वथा निष्क्रिय, अतएव शान्त है । अतएवच नित्य है । नित्यता एवं व्यापकता ही इसे पूर्ण कहने को बाध्य करती है । पूर्णता में शान्ति है । पूर्णता ही भूमाभाव है । भूमा ही सुख है । अतएव यह श्रानन्द रूप है - ' श्रानन्दमयोऽभ्यासात् ' ( व्या ० सू ० । ) बल के द्वारा इसका विश्व में विकास होता है । दूसरे शब्दों में बल ही ( अभ्व ही ) इस आभू ( रस ) की उपलब्धि का कारण है । यह अपने विशुद्ध रूप से सर्वथा निर्धर्मक - निराकार बनता हुआ अनुपलब्ध है । अतएव हम इसे बललक्षण मानने के लिए तय्यार हैं । यह ग्राभू दिग् देश - काल संख्या से परिच्छिन्न होता हुआ असीम है, ग्रखण्ड है, ज्योति - ( ज्ञानज्योति ) मय है, संख्या से एक है ( इसी एकत्त्व भाव से भिन्नों में भिन्नता की प्रतीति होती है ), निरावरण है, निरञ्जन है, विशुद्ध है । हमने इसे एक कहा है । यह एकत्त्व भावात्मक समझना चाहिए । एकत्त्व संख्या द्वित्त्वादि संख्या सापेक्ष है । इसी को प्रयुतसिद्ध एकत्त्व कहते हैं । द्वित्त्वादि संख्या की अपेक्षा रखने वाले प्रयुतसिद्ध इस एकत्त्व का उसमें प्रभाव है । जब वहाँ कोई संख्या नहीं, तो समझने मात्र के लिये उसमें एकत्त्व व्यवहार हो जाता है । यह समझना भाव, किंवा, भावना है । इन्हीं सब कारणों से हम इसे भावरूप एकत्त्व से ही युक्त मानने के लिए तय्यार हैं । विशुद्ध अभ्व तत्त्व के उपासक नास्तिक लोग जहाँ - " क्षणिक क्षणिकं श्रतएव स्वलक्षणं स्वल-क्षणं श्रतएव शून्यं शून्यं श्रतएव दुःखं दुःखम् " यह कह कर सर्वप्रपञ्च को दुःखरूप बतलाते हैं, वहां आभू तत्त्व के उपासक ग्रास्तिक ' नित्यं नित्यं श्रतएव बल- लक्षणं बललक्षणं, श्रतएव पूर्ण पूर्ण श्रानन्दम् ” कहते हुए ब्रह्म को आनन्दघन बतला रहे हैं । जीवनसत्ता वास्तव में आनन्द पर ही निर्भर है । हम जब तक जीते हैं - आनन्द से एवं आनन्द की आशाप्रतीक्षा से ही जीते हैं । जिस दिन आनन्द की मात्रा एकान्ततः निःशेष हो जाती है, तत्काल जीवनलीला समाप्त हो जाती है । इसी सर्वानुभूत लोकसिद्ध अर्थ का स्पष्टी-करण करती हुई उपनिषच्छ ुति कहती है— " श्रानन्दाद्धये व खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन— जातानि जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति ' ( तै ० उप ० ३।६ ) उक्त प्रभ्व - ग्राभू विवेचन से कहना यही है कि, इन दोनों विरुद्ध तत्त्वों की समष्टि ही विरुद्ध-भावद्वयापन्न विश्व का मूल है । विश्व में प्रतीयमान कार्यरूप क्षणिकभाव का मूलकारण विश्वातीत अभ्व है, एवं कार्यरूप से प्रतीयमान नित्यभाव का मूल विश्वातीत आभू है । लौकिक दृष्टि से समझने के लिए हम इन दोनों को द्रष्टा एवं दृश्य कह सकते हैं । विश्वविद्या को प्राप इन्हीं दो भागों में विभक्त कर डालिए, विश्वातीत प्रभू और अभ्व के इस विश्व में ही ( द्रष्टा एवं दृश्यरूप से ) साक्षात् दर्शन हो [ १२१ ]

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आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् जायँगे । दृश्य ग्रभ्व है । आप इसे निरन्तर बदलता हुआ देखेंगे एवं द्रष्टा ग्राभू है, इसे सर्वथा एक रस देखेंगे । उदाहरण के लिए दर्पण ( काँच - ग्राइना ) को दृष्टान्त समझिए । एक स्थान पर काँच सर्वथा स्थिर रूप से रक्खा हुआ है । उस पर मार्ग में आते जाते मनुष्य - पशु - पक्षी ग्रादि दृश्यों का प्रतिम्बिम्ब पड़ता रहता है । दृश्य वदल रहे हैं, द्रष्टा काँच सर्वथा स्थिर है । नए नए दृश्यों को लेता जाता है, छोड़ता जाता है । इसी प्रकार शरीराकाशगर्भित हृदयाकाशस्थ दभ्राकाश में प्रतिष्ठित ज्ञानज्योतिर्धन हमारा ग्रात्मा द्रष्टा है | हम इन्द्रियों द्वारा जिन विषयों को देखा करते हैं, वे सब दृश्य हैं । ग्रहंभाव एक है, दृश्य नाना हैं । इस प्रकार द्रष्टा- दृश्य के विवेक से ग्राप सर्वत्र इसी विश्व में भू- अभ्व का साक्षात्कार कर सकते इस रहस्य का प्रतिपादन करते हुए रहस्यवेत्ता वैज्ञानिक कहते हैं—

यदस्ति किञ्चित्तदिमं प्रतीमोऽविचालि- शश्वत्स्थमनाद्यनन्तम् ।

प्रतिक्षरणान्यान्य - विकार - सृष्टि - प्रवाहवत् तद्विरुद्धभावम् । १ ॥

विरुद्धभावद्वयसंनिवेशात् संभाव्यते विश्वमिदं द्विमूलम् ।

श्रभ्वभ्व - संज्ञेस्त इमे च मूले द्रष्टाभु दृश्यं तु मतं तदभ्वम् ॥ २ ॥

यद् द्रष्टृ तज्ज्ञानमिति प्रसिद्धं ज्ञाने प्रतीतो विषयस्तु कर्म्म ।

ज्ञानं प्रकाशोऽस्त्यविचालिभावस्तत्रान्यदन्यद् भवदस्ति कर्म्म ॥ ३ ॥

दिग्देशकालैरमितं तु यत् तज्ज्ञानं हि तद् द्रष्टृ तदाभु विद्यात् ।

दिग्देशकालैः प्रमितं त्वसद्वत् तत्कर्म्म तद् दृश्यमिदं तदभ्वम् ॥ ४ ॥

( श्रीगुरुप्रणीत संशयतदुच्छेदबाद, सच्चिदानन्दखण्ड ) ग्राभू तत्त्व एक है, अभ्व अनेकधा विभक्त है । दोनों ही अविनाभूत हैं, नित्यसम्बद्ध हैं । इन दोनों तत्त्वों की उन्मुग्धावस्था का नाम " निर्गुणब्रह्म " है, एवं ये ही दोनों अंशरूप से किसी कारण विशेष की प्रेरणा से उद्धावस्था में ग्राकर " सगुणब्रह्म " नाम धारण कर लेते हैं । योगमायावच्छिन्न अस्मदादि मायिक जीवों का उपास्य एकमात्र यही सगुणब्रह्म है । निर्गुणब्रह्म विश्वातीत होने से व्यापक होता हुआ श्रवाङ्मनसगोचर है । शब्दातीत होने से शास्त्रानधिकृत होता हुग्रा एकान्ततः अनुपस्य है | प्रत्येक शब्द की " यत्किचित्पदार्थतावच्छेदकावच्छिन्न " में ही शक्ति रहती है । घट शब्द की घटत्वाव-च्छेदकावच्छिन्न में शक्ति है । वह घटत्त्व घट शब्द की पटादि इतर पदार्थों से व्यावृत्ति ( पृथक्करण छांट ) करवाता है । उस व्यापक ब्रह्म में सब कुछ प्रतिष्ठित है, वह सब में अनुस्यूत है, अतएव उसकी किसी शब्द से किसी में से व्यावृत्ति नही कराई जा सकती । अतएव प्रवच्छेदकावच्छिन्न में शक्त शब्द - जाल उसका निरूपण करने में सर्वथा असमर्थ हो जाता है । विश्व की उत्पत्ति - स्थिति - भंग, तीनों ब्रह्मलक्षण ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - ( पुराणमतानुसार महेश ) भेदभिन्ना देवत्रयी पर ही निर्भर है । तीनों क्रमश: विश्व [ १२२ ]