Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 131–140

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् के उत्पादक - पालक - संहारक हैं । तीनों में इन्द्र ज्ञानप्रधान हैं, विष्णु अर्थप्रधान हैं, ब्रह्मा क्रियाप्रधान हैं । सत्व - रज- स्तमोभेदभिन्ना प्रकृतिरूपा महाशक्ति के आश्रय से ही क्रियाशक्तिप्रधान ब्रह्मा, अर्थशक्तिप्रधान विष्णु, ज्ञानशक्तिप्रधान इन्द्र, किंवा महेश उत्पत्ति - स्थिति - नाश के कारण बनते हैं । ज्ञान उस व्यापक ब्रह्म का वास्तविक रूप है । इसका विकास विश्व में ' इन्द्र ' रूप से ही होता है । अतएव इसके लिए " इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठो ज्येष्ठः " ( कौषीतकि ब्रा ० ६ । १४ । ) यह कहा गया है । प्रतएव ब्रह्मादि इतर देवता, देवता हैं एवं इन्द्रापरपर्य्यायिक ज्ञानप्रद तत्त्व " महादेव " हैं- " ज्ञानमिच्छेन्महेश्वरात् " । ब्रह्मा, विष्णु क्रमशः क्रिया एवं अर्थमूर्ति हैं । दोनों का विकास कार्य - विश्व में ही होता है । विश्वातीत अवस्था में केवल ज्ञानशक्ति का ही विकास है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखते हुए केनोपनिषत् में बतलाया गया है कि " जब इन्द्र उस यक्ष के सामने गए तो यक्ष अन्तर्हित ( गायब ) हो गया " ( देखिए केनोप ० ३।२४ ) । इसका तात्पर्य यही है कि, पूर्व कथनानुसार इन्द्र ज्ञानशक्तिधन है, उधर यक्षमूर्ति ब्रह्म ज्ञानघन है । दोनों अभिन्न हैं । क्रियाप्रधान ब्रह्मा, अर्थप्रधान विष्णु, ज्ञानप्रधान इन्द्र ( महादेव ), इन तीनों में से ब्रह्मा विष्णु की तो वहाँ गति नहीं है, परन्तु ज्ञानमूर्ति इन्द्र वहाँ अवश्य ही पहुँच जाते हैं । दूसरे शब्दों में वह शब्दातीत होता हुआ भी ध्यानापरपर्य्यायिक ज्ञानगम्य अवश्य है । " तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति घीरा: " के अनुसार इन्द्ररूप विज्ञान ( बुद्धि ) से अवश्य ही तटस्थ लक्षण के द्वारा वहाँ गति हो जाती परन्तु अर्थप्रधान कर्मकाण्ड एवं क्रिपाप्रधान उपासना काण्ड, दोनों मार्ग वहाँ अवरुद्ध हैं । इसी गुहानि हित रहस्य को लक्ष्य में रख कर आचार्य कहते हैं— संविदन्ति न यं वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः । यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह || ( तै ० उ ० २२४ ) श्रुति विष्णु एवं विधि ( ब्रह्मा ) से उसकी अविज्ञेयता बतलाई है, विष्णु - विधि से नित्य सम्बद्ध है, किन्तु इन्द्र से नहीं है । कारण इसका यही है कि, ज्ञानमूत्ति इन्द्र ( विज्ञानात्मा ) वहाँ पहुंच सकता है । बतलाना यही है कि, विश्वातीत वह व्यापक तत्त्व शब्द - शास्त्र की दृष्टि से सर्वथा अविज्ञेय एवं अनिर्वचनीय है । सुप्रसिद्ध मायाबल के कारण आभू- अभ्वात्मक व्यापक ब्रह्म के विश्वातीत- विश्वचर विश्व ये तीन रूप हो जाते हैं । वही ब्रह्मतत्त्व अपने यत्किञ्चित् प्रदेश से ( अक्षरानुगृहीत क्षर भागसे ) विश्व बना हुआ है । अतएव - ' प्रात्मैवेदं सर्वम् ' ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् ' ' ब्रह्म'-ब्रह्म का त्रेधावितान वेदं सर्वम् ' ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किञ्च ' ' एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ' ' पुरुष एवेदं सर्वम् ' इत्यादि श्रोत वचन चरितार्थ हो रहे । इसी को लेकर ' ब्रह्म ही विश्व है ' इस कथन में कोई आपत्ति नहीं की जा सकती । अपने एकांश से सम्पूर्ण जगत् का निर्माण कर, दूसरे शब्दों में एक पाद से विश्वरूप में परिणत होकर ' तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' के अनुसार वह ब्रह्म अंशरूप से अपने सृष्टरूप इस विश्व में प्रविष्ट होकर विश्व का आत्मा बना हुआ है । विश्व उसका शरीर है, प्रविष्ट भाग विश्व शरीर का आत्मा है । इसी प्रविष्ट [ १२३ 1

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डं नैनमूर्ध्वं तिय्यंचं न मध्ये परिजग्रभत् । [ १२४ ] श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् श्वे ० उप ० ६८ श्वे ० उप ० ४। २० श्वे ० उप ० ४ । १६ रूप को ग्राधार मान कर - ' श्रात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् ' ' नवद्वारे पुरे देही ' ' सर्वस्य प्रभुमीशानम् ' ' यो विश्वं भुवनमानिवेश ' ' तेनेदं ( विश्वं ) पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ' ' विश्वस्यैकं परिवेष्टितारम् ' ' विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ' इत्यादि श्रोत वचनों का समन्वय हो रहा है । इसी दृष्टि को लक्ष्य में रख कर— " ब्रह्म विश्व में प्रविष्ट है " इस कथन में भी कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकती । वही जात ( उत्पन्न-विश्व ) है, वही उत्पन्न होने वाला है, वही गर्भ में प्रविष्ट रहने वाला आत्मा है । इन्हीं विश्व - विश्व-चर, दोनों श्रात्मविवर्तों का समष्टि रूप से निरूपण करते हुए महर्षि श्वेताश्वेतर कहते हैं—

एष ह देवः प्रविशोऽनु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः ।

स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥

ब्रह्म का यही दूसरा रूप विश्वेश्वर - विश्वाध्यक्ष- विश्वात्मा - जगदीश्वर, ग्रादि विविध नामों से प्रसिद्ध हुआ है जो भाग विश्व एवं विश्वेश्वर से पृथक् विशुद्ध बच जाता है, वही तीसरा सर्वव्यापक भाव विश्वातीत नाम से प्रसिद्ध है । यही ब्रह्म का निरुपाधिक रूप । न यह जन्म लेता, न इसकी मृत्यु होती । न यह किसी का श्रात्मा ( विश्वेश्वर ) बनता, न किसी का शरीर ( विश्व ) बनता । इसी तीसरे विश्वातीत विवर्त को को लक्ष्य में रख कर ऋषि कहते हैं-न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिविविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ १ ॥

न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्च नैनम् ।

हृदा हृदिस्थं मनसा य एनमेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥

न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥ ३ ॥

इसी विश्वातीत दृष्टि से ' न ब्रह्म विश्व बनता, न विश्वात्मा बनता, यह सब प्रपञ्च केवल मायिक है ' इस कथन में कोई आपत्ति नहीं की जा सकती । ये ही तीनों विवर्त्त ' प्रविविक्तब्रह्म - प्रविष्ट-ब्रह्म - सृष्टब्रह्म इन नामों से भी व्यवहृत किए जा सकते हैं । इनमें प्रविविक्त ( विश्वातीत ) एवं प्रविष्ट ( विश्वचर ), ये दो विवर्त्त तो अमृतप्रधान हैं । तीसरा सृष्टरूप ( विश्व ) मृत्युप्रधान है । दूसरे शब्दों में उक्त दोनों रूप ग्राभूत्रधान ( रसप्रधान ) हैं, तीसरा रूप अभ्वप्रधान ( बलप्रधान ) है | कुछ भी

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषद् कहिए, तीनों ही रूपों में आभू - श्रम्वात्मक रस - बल का ही साम्राज्य मानना पड़ेगा । अतएव श्रुति को ' ब्रह्म वेदं सर्वम्, इस कथन में जरा भी संकोच नहीं होता । ब्रह्म के प्रभू - श्रभ्व लक्षण रस बल नाम के दो रूप हैं ' यह सुन कर ' ब्रह्म वेदं सर्व एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किञ्चन ' इस अद्वैत सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाले अद्वैतभक्तों को विरोध बतलाने का अवसर मिल जाता है । हम उन्हें बता देना चाहते हैं कि, रस - बल, इन दो भावों के मान लेने पर भी अद्वैत सिद्धान्त पर किसी प्रकार की आपत्ति नहीं आती है । सजातीय - विजातीय - स्वगत, इन तीनों भेदों का निराकरण करने के लिए श्रुति में ' एकं -एव श्रद्वितीयम् ' ये तीन पद प्रयुक्त हुए हैं । इनमें श्रद्वितीयं पद विजातीयभेद का, एकं पद सजातीय भेद का एवं एव पद स्वगत भेद का निराकरण कर रहा है । आम का वृक्ष केले के वृक्ष से भिन्न है, यह दोनों का विजातीय भेद है । एक आम का वृक्ष दूसरे आम्रवृक्ष से भिन्न है, यह दोनों का सजातीय भेद • है । एक ही आम्रवृक्ष में आम्रफल, आम्रमञ्जरी, आम्रपत्र, शाखा, मूलस्तम्भ, आदि अनेक अवयव हैं । सभी अवयव परस्पर में भिन्न होते हुए एक आम्रवृक्ष के आश्रित हैं, यही भेद तीसरा स्वगतभेद है, अपने श्राप में रहने वाला भेद है । मनुष्य - पशु का भेद विजातीय है, मनुष्य मनुष्य का भेद सजातीय है, हस्त-पाद - मस्तक — उदर - हृदय - आदि अवयव भेद स्वगतभेद है । हमारा ब्रह्मतत्त्व उक्त तीनों भेदों से पृथक् है । ब्रह्म के अतिरिक्त कोई दूसरा भिन्न स्वरूप दाला ब्रह्म नहीं है, इसलिए ब्रह्म विजातीय भेदशून्य है । ' सर्वत्र इस श्रद्वितीय का साम्राज्य है । ' इस ब्रह्म के जैसा कोई अन्य ब्रह्म नहीं है, अतएव यह सजातीय-भेद शून्य है । ' सर्वत्र इस अद्वितीय एक का साम्राज्य है । ' साथ ही में ग्राम्रवृक्षादि की तरह उसमें अवयव भेद भी नहीं है, नीचे - ऊपर - प्रागे - पीछे -सामने - सब और वही एक है, अतः वह स्वगतभेद से बहिर्भूत है । इस प्रकार ' भेदत्रयशून्य उस अद्वितीय एक ही ( एकमेवाद्वितीयं ) ब्रह्म का साम्राज्य है । ' ऐसी परिस्थिति में अद्वैतवादियों की ओर से प्रश्न उपस्थित होता कि " ब्रह्म के रस - बल, ये दो विवर्त्त मान लेने पर सजातीय - विजातीय भेद को तो अवसर नहीं मिलता, परन्तु स्वगतभेद बना रह जाता है । तुम्हारे कथनानुसार स्वगतभेद उत्पन्न करने वाला रस - बलात्मक कलाभेद रह जाता है । फलतः विशुद्ध अद्वैतवाद सुरक्षित नहीं रहते पाता । " प्रश्न यथार्थ है । अवश्य ही हम दो कला मानते हैं । फिर भी उक्त प्रश्न का हमारी दृष्टि में कोई महत्त्व नहीं है । हम दो कला मानते हुए भी उन दोनों की पृथक् पृथक् दो सत्ता स्वीकार नहीं करते । मानना दूसरी बात है । जिसे प्राप मानना कहते हैं, वह मानने से भी सम्बन्ध रखता है, एवं सत्ता से भी मानने का सम्बन्ध है । सर्वसाधारण ने आकाश को नीला मान रक्खा है, क्योंकि उसका उसी रूप से भान हो रहा है । परन्तु कोई भी वैज्ञानिक आकाश के नील वर्ण की सत्ता स्वीकार करने के लिए तय्यार नहीं है । भावात्मक एकत्त्व को छोड़ कर २–३–४–५ आदि सब संख्याएं केवल मानी हुई हैं । सत्ता केवल एक ही संख्या की है । जिसे आप २ - ३–४–५ कहते हैं, सर्वत्र २–३–४–५ इस क्रम से एक संख्या का ही प्रभुत्त्व है । " प्रयमेकः - श्रयमेकः " की समष्टि ही तो दो है । विज्ञानदृष्टि से उत्तर दिशा ऊंचा स्थान है, दक्षिण दिशा अवाची ( नीचा स्थान ) है, परन्तु साधारण मनुष्य अपने मस्तक के ऊपर के भाग को ऊंचा मानते हैं, पैरों के नीचे के स्थान को नीचा कहते हैं । इसी प्रकार पृथक्त्व - संयोग - विभाग- परत्व- श्रपरस्त्व- पूर्व - पश्चिम उत्तर - दक्षिण यादि सहस्रों [ १२५ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् पदार्थ ( जो कि अहोरात्र हमारे व्यवहार में प्राते हैं, जिनके न मानने से लौकिक व्यवहारों का एका-न्ततः उच्छेद हो जाता है ) ऐसे हैं, जिनको आप, हम, सभी केवल मानते ही मानते हैं, किन्तु उनकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार नहीं करते । यही परिस्थिति रस बल की भाति के सम्बन्ध में समझिए । द्वत व्यवहार का मूलकारण सत्ताभेद है, न कि भातिभेद । भातिभेद से प्रतीत होता हुआ भी द्वंत परमार्थतः ' त नहीं माना जाता । पुरोऽवस्थित एक घट का आपको भान हो रहा है, साथ ही में जिस मिट्टी से से घट बना है, उसे भी आप देख रहे हैं । इस प्रकार प्रत्यक्ष दृष्ट इन दो भातिभावों को देखते हुए भी भातित से घट के लिए - " यह घड़ा है और मिट्टी है " ऐसा द्वैतव्यवहार नहीं करते । कारण? भान वास्तव में दो हैं, परन्तु “ वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् " के अनुसार सत्ता एक है | मिट्टी की सत्ता से ही घट सत्तावान् बन रहा है । ठीक इसी प्रकार उस ब्रह्म तत्त्व में भी रस - बल भेद से भाति दो हैं, सत्ता एक है । अतएव स्वगतभेद को अवसर नहीं मिलता । यदि इस समाधान से श्रापका सन्तोष नहीं होता, तो हम आप से पूछते हैं कि - " आप ब्रह्म की सच्चिदानन्दता में कोई सन्देह नहीं करते, ' सत्ता - चेतना मानन्द ' – ये तीन कलाएं आप भी मानते हैं । रस- बल, इन दो भातिभेदों के कारण इस पक्ष में जो स्वगतभेद प्रयुक्त दोष आप बतलाते हैं, वह दोष आप के पक्ष भी समान है । जिस अभिन्ना श्रद्वितीया सत्ता को आगे कर श्राप स्वगतभेद हटाते हैं, वही सत्तात्मक अद्वैत हमारे रस - बला-मक अद्वैतवाद का भी समर्थक बन रहा है । उपर्युक्त रसबलात्मक सर्वव्यापक यही विश्वातीत ब्रह्म " प्रखण्डब्रह्म " नाम से प्रसिद्ध है । यह ब्रह्मभाव सोपाधिक अहंभाव से सर्वथा पृथक् है । यह सब में समान है । चेतन - प्रचेतन- विश्व - विश्वात्मा विश्व के बाहर सर्वत्र समानरूप से व्याप्त है । मायोपाधिशून्य, अतएव – सर्वव्यापक, परात्पर, प्रवि-विक्त, विश्वातीत, निर्धम्र्मक, निरञ्जन, श्रद्वय, श्रखण्ड, प्रसोम, भादि अनेक नामों से प्रसिद्ध, पूर्व कथ-नानुसार शास्त्रानधिकृत वाङ्मनसपथातीत इस अविज्ञेय अनिर्वचनीय विलक्षण ब्रह्मतत्त्व का इस श्राद्ध-प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है । श्राद्धप्रकरण से ही क्या, वह तो सभी शास्त्रीय कम्मों से एकान्ततः हिर्भूत है । हमारे आचार, व्यवहार, पुण्य - पाप, जन्म - मरण, स्वर्ग - नरक, संस्कार, आदि किसी से भी उसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है । ऐसी स्थिति में जो महानुभाव " श्रात्मा तो व्यापक है, अखण्ड है । उसकी गति श्रागति कैसी? गति नहीं तो श्राद्ध कैसा? " ऐसे ऐसे कुतर्कों के द्वारा श्राद्ध की इतिकर्त्त-व्यता पर, उसकी शास्त्रीयता पर आक्षेप करने का साहस करते हैं, उन्हें पूर्व प्रतिपादित अखण्ड ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप समझते हुए आज से अपना भ्रम छोड़ देना चाहिए । उन्हें ये विश्वास कर लेना चाहिए कि, अखण्ड श्रात्मा को हम शास्त्रों में प्रतिपादित श्रात्मा कहने के लिए तय्यार नहीं हैं । शास्त्रीय आत्मा कोई दूसरा ' सखण्ड श्रात्मा है । वह भी एक नहीं, अनेक हैं । पूर्व में हमने अमृतात्मा के प्रविविक्त प्रविष्ट भेद से दो रूप बतलाए हैं । इन दोनों में से पहले प्रविविक्त ब्रह्म की चर्चा हम छोड़ते हैं । उसके विषय में केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि -' सर्वबत विशिष्ट रसप्रधान सर्वव्यापक एक तत्व विशेष हो प्रविविक्त ब्रह्म है वह शास्त्रानधिकृत है । व्यापक होनेसे अनुपास्य | गतिशून्य होने से जन्म - मरण रहित होता हुश्रा श्राद्धमर्थ्यावा से बहिर्भूत है । " [ १२६ ]

पृष्ठ 135

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् दूसरा है प्रविष्टब्रह्म नामक अमृतात्मा । इस प्रकरण के शीर्षक में जिसे हमने अमृतात्मा कहा है, जिसके प्रतिपादन की प्रकरणारम्भ में प्रतिज्ञा की गई है, वह यही प्रविष्टब्रह्म है । थोड़े शब्दों में इसीका दिग्द-र्शन कराते हुए इस प्रकरण को समाप्त किया जाता है । रस - बलात्मक जिस अखण्ड ब्रह्म का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उसके रस भाग को हमने संख्या से ( भावात्मिका एकत्त्व संख्या से ) एक बतलाया है, साथ में उसे दिग् देशकाल से अनन्त कहा है । दूसरे बलतत्त्व को संख्या से अनन्त, एवं दिग्देशकाल से रसबलात्मकब्रह्म की अनन्त विभूति सादि सान्त कहा है | दिग्देशकालावच्छिन्न अभ्वरूप यह अनन्त बल सृष्टिविकास के पूर्व जिन महाबलों में अन्तः प्रविष्ट रहते हैं एवं सृष्टिकाल में जिनमें से अनन्त बल उद्भूत होते रहते हैं, आधार रूप उन महावलों को शास्त्र में - ' कोश-बल ' नाम से व्यवहृत किया गया गया है । वे कोशवल संख्या में कुल १६ हैं । इन सोलह बलकोशों में इतर सारे अनन्त बल समाए हुए हैं । इन सब बलकोशों का विशद निरूपण ' ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' के प्रथम खण्ड में निरूपित हो चुका है । प्रकरण संगति के लिए यहाँ उनके नाम मात्र उद्धृत कर दिए जाते हैं । इन सोलहों में एक बलकोश विद्यात्मक है, शेष १५ बलकोश अविद्यात्मक हैं । विद्यात्मक बलकोश मुक्ति का अधिष्ठाता है, शेष सृष्टि के प्रवर्त्तक हैं । वे बलकोश १ - विद्या, २ - माया, ३ - जाया, ४ – धारा, ५ - श्राप:, ६– हृदय, ७- भूति, ८- यज्ञ, ε- सूत्र, १० - सत्य, ११ - यक्ष, १२ - प्रभ्व, १३ - मोह, १४ - वय, १५ - वयोनाध, १६ - वधुन, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । विद्याबल उसका स्वाभाविक बल है, यह हृद्ग्रन्थि-विमोकपूर्वक मुक्ति का कारण बनता है । शेष पन्द्रहों ग्रागन्तुक हैं । हृद्ग्रन्थि प्रवृत्तिपूर्वक ये ही सृष्टि के प्रवर्तक हैं । इनमें प्रधानता मायाबल की ही है । अपरिमित को परिमित बना कर उसे सकेन्द्र बनाते हुए, उस अशनाया शून्यतत्त्व में अशनाया उत्पन्न कर देना मायाबल का मुख्य कर्म है । विश्वमर्यादा से सर्वथा पृथक् रहने वाला, स्व - स्वरूप से सर्वथा निरञ्जन वह तत्त्व अपने ही प्रत्यंश से कैसे साञ्जन विश्व बन गया?, इस आश्चर्य्यमूलक प्रश्न का उत्तर एकमात्र इसी मायास्वरूपविज्ञान पर अवलम्बित हैं । सम्पूर्ण संसार माया की क्रीड़ा ( खेल ) मात्र है । हाँ, एक बात पर विशेष ध्यान रखिए । माय नामरूपकमयी बन कर ही विश्व में व्याप्त होती है । रसबलात्मक सत्यब्रह्म की अंशभूता वलात्मिका नामरूपमश्री माया भी अवश्य ही सत्य है । ऐसी अवस्था में नामरूपात्मक सत्यविश्व को मिध्या कना-सत्यमप्रतिष्ठन्ते जगदाहुरनीश्वरम् " ( गीता ० १६।८ ) भगवान् के उक्त शब्दों में गुप्तरूप से अनीश्वरवाद का प्रचार करना है । जवकि – “ नामरूपे सत्यम् ” ( शत ० ब्रा ० १४ । ४ । ४ । ३ ) इत्यादि श्रुतियाँ स्पष्ट ही मायिक विश्व को सत्य बतला रही हैं, तो ऐसी दशा में इसे असत्य मानना प्रौढिवादमात्र है । यह बात सच है कि, मायिक विश्व का यथार्थ ज्ञान हमें नहीं होता । अनन्तब्रह्म की तरह उससे नित्यसम्बद्धा वह महामाया भी अनन्तरूपा ही है । जो आद्या उस अनन्तब्रह्म की अनन्तता हटा कर उसे विश्वप्राङ्गण में लाकर उसे लीलामय बना डालती है-( लोकवत्त्वलीलाकैवल्यम् — या ० सू ), उसके यथार्थस्वरूप को यह क्षुद्रजीव जान जाय, यह ग्रसम्भव है | माता के प्रभव - प्रतिष्ठालय का स्वरूप पुत्र जान सकता है क्या? असम्भव । माना कि वह बल-[ १२७ ]

पृष्ठ 136

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् रूपा है, बलत्रधाना है, परन्तु वल असत् है । सद्विश्व में हम उसीका प्राधान्य देख रहे हैं, दूसरे शब्दों में विश्व का सद्भाव उसी पर निर्भर है । ऐसी अवस्था में उसे असत् क्योंकर माना जा सकता है । साथ ही में बल के विद्यमान असत् स्वरूप को भी तो तिरोहित नहीं किया जा सकता । फलतः उसे सत् भी नहीं कहा जा सकता । सत् - ग्रसत् का पारस्परिक विरोध उसे ' सदसती ' न कहने के लिए भी बाध्य कर रहा है । ऐसी स्थिति में-न सती सा नासती सा नोभयात्मा विरोधतः । काचिद्विलक्षणा माया वस्तुप्रकृतिरिष्यते ॥ " यह अभियुक्तोक्ति माया के यथार्थ स्वरूपज्ञान के सम्बन्ध में हमारी सब इन्द्रियों का द्वार बन्द कर देती है । वात सच है । वह माया ही क्या हुई, जिसका स्वरूप माया के क्रोड में पले हुए हम जान जाँय । हम उसके यथार्थ स्वरूप को जानने में असमर्थ हैं, एतावता ही क्या उसे मिथ्या कहने का अक्षम्य अपराध करना उचित है? कदापि नहीं । अस्तु मायिक जगत् मिथ्या है, अथवा सत्य?, इन सब प्रश्नों का विशद विवेचन ईशोपनिषद् -भाष्य में हो चुका है । ग्रतः प्रकृत में माया के सम्बन्ध में केवल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि, माया एक ऐसा बल है, जो रसबलात्मक असीम ब्रह्म को ( आंशिकरूप से ) ससीम बना डालता है । परात्पर ब्रह्म असीम था, व्यापक था, प्रतएव हृदयशून्य था, अतएव मनः शून्य था, अतएव च कामना रहित था । कामनाएँ मन से प्रादुर्भूत होती हैं, यह निश्चित सिद्धान्त है । " हृत्प्रतिष्ठं यद जिरं विष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु " इस यजुःश्रुति के अनुसार मन का आधार हृदय है । इधर व्यापक में हृदयभाव ( केन्द्र ) का सर्वथा अभाव है । अतएव मन का प्रतएवच कामना का प्रभाव सिद्ध हो जाता है । अपिच, प्राप्त वस्तु की प्राप्ति के लिए ही कामना हुआ करती है । उधर व्यापक परात्पर में कोई वस्तु प्राप्त नहीं है । सब कुछ उसके उदर में प्रतिष्ठित है, सब में वह है, सब वही है । फिर उस आत्मकाम, श्रतएव श्राप्तकाम, अतएवच निष्काम में कामना कैसी । विना कामना के सृष्टि नहीं । अतएव इसे ' विश्वातीत ' शब्द से व्यवहृत करना समन्वित हो जाता 1 ऐसे कामना रहित विश्वातीत ब्रह्म के किसी एक प्रदेश में उसी पूर्वपरिचित मायाबल का उदय होता है । जितने प्रदेश में मायाबल उदित होता है, तदवच्छिन्न रसबलात्मक परात्पर-ब्रह्म परिच्छिन्न होता हुआ हृदयबल से युक्त हो जाता है । हृदय बलाव -पञ्चकल मायोपाधिक ब्रह्म च्छिन्न मायिक रसवलात्मक इसी तत्त्व को वैज्ञानिक महाषियों ने ' श्वोव-सीयस्ब्रह्म ' नाम से व्यवहृत किया है । अभी ( विकार सृष्टि की उत्पति से पहले ) मनोमय इस मायिक ब्रह्म में अन्य किसी प्रावरण का प्रभाव है, अतएव उपनिषदों ने इसे " भारूप " माना है । उस परमाकाश में भारूप - मनोमय - प्राकाशात्मा - पुरुप व्याप्त है । अब तक वह पुर-( घेरा सीमा- ग्रवच्छेद ) - मर्यादा से बहिर्भूत था, परन्तु ग्राज वह मायापुर से वेष्टित हो गया है, प्रत एव वह ' पुरुष ' नाम से प्रसिद्ध हो गया है । परस्पर में सर्वथा विभिन्न स्त्री - पुरुष नपुंसक - भेदभिन्न विश्वा-तर्गत यच्चयावत् पदार्थों में वह समानरूप से व्याप्त रहता है, कोई प्रदेश उससे विरहित नहीं है । विवि-[ १२८ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् धभावों में परिवर्तित होने वाले पदार्थों में वह एक रूप से व्याप्त रहता है, ग्रतएव उक्त मनोमय पुरुष को ऋषियों ने ' अव्यय ' नाम से व्यवहृत किया है, जैसा कि गोपथश्रुति कहती है-सदृशं त्रिषु लिङगेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥ ( गो ० ब्रा ० पू ० १ । २६ ) रसबलात्मक मनोमय इस अव्यय पुरुष से सर्वप्रथम ' एकोऽहं बहुस्याम् ' इस कामना का उदय होता है । कामना मन को पहला रेत है । इसको हमने प्रसंग एवं बल को ससंग कहा है । रस हटना चाहता है, बल मिलना चाहता है । संसर्ग सृष्टि है, विसर्ग मुक्ति है, अबसान का द्योतक है । इसीलिए तो शब्दब्रह्म मर्यादा में भी रामः - - हरिः इत्यादि रूप से शब्दात्मक विसर्ग (: ) पद - वाक्यादि के अवसान का स्वरूप समर्पक बन रहा है । रसबल के सम्बन्ध से मन में दोनों वृत्तियाँ हैं— ' उभयात्मकं मनः । ' अतएव उभयात्मक मन से निकलने वाली कामना भी दो ही भागों में विभक्त हो जाती है । बलगभिता रसानुग्रहिणी कामना बन्धनविमोक का कारण बनती हुई " मुमुक्षा " ( मुक्ति की इच्छा ) नाम से व्यव-हृत होती है एवं रसगर्भिता बलानुग्रहिणी कामना सृष्टिबन्धन का कारण बनती हुई - " सिसृक्षा " ( सृष्टि की इच्छा ) नाम धारण कर लेती है । इस प्रकार उस पुरुष में " बनाऊं - बिगाडू " प्रधानरूप से इन दो कामनाओं का ही समावेश, रहता है । सम्पूर्ण विश्व के प्राणी भी उक्त दोनों कामनाओं से अतिरिक्त तीसरी कामना नहीं कर सकते । क्योंकि जिसके ये प्रश हैं, उस अशी में ही तीसरी कामना का सर्वथा अभाव है । मन ने इच्छा की, परन्तु रसबल के अतिरिक्त और वहाँ है क्या । फलतः कामुक पुरुष इच्छा द्वारा इन्हीं का अपने ऊपर चयन करने लगता है । रसानुग्राहिणी कामना से इस पर ' रसचिति ' होती है, बलानुग्राहिणी कामना से ' बलचिति ' होती है । रसचिति में बल गौरण है, बलचिति में रस गौण है । रसचिति में उत्तरोत्तर रस की वृद्धि है । एक स्थिति ऐसी है, जिसमें बल सर्वथा तिरोहित हो रहा है, वहाँ समात्र की प्रतीति है । इसी प्रकार बलचिति में उत्तरोत्तर बल की वृद्धि है । स्थिति विशेष में रस सर्वथा तिरोहित है, वहाँ वलमात्र की प्रतीति है । इस प्रकार रसबल की चिति के तारतम्ब से १ - बल-गर्भितारस चिति, २ - बल तिरोभावलक्षणा रसचिति, ३ - रसगभिताबलचिति, ४ - रसतिरोभावलक्षरणा बल-चिति भेद से उस कामना केन्द्रस्थ मन पर चार चितियाँ हो जाती हैं । मन के रस भाग पर दोनों रस-चितियाँ प्रतिष्ठित रहती हैं, इन पर मुमुक्षा बल का ग्रनुग्रह रहता है । मन के बलभाग पर दोनों बल-चितियाँ प्रतिष्ठित रहती हैं, इन पर सिसृक्षा बल का अनुग्रह रहता है । पहली रसचिति ' विज्ञान ' नाम से प्रसिद्ध है । विज्ञान में वल भी है, परन्तु रस की प्रधानता है । दूसरी रसचिति ' आनन्द ' नाम से प्रसिद्ध है । इसमें बल एकान्ततः सुप्त है । संसार में इन दोनों चितियों की अप्रधानता है, विश्व में ये दोनों अन्तर्मुख रहती हैं, अतएव इन दोनों चितियों की समष्टि को ' ग्रन्तश्चिति ' कहा जाता है । तीसरी बलचिति " प्राण " नाम से प्रसिद्ध है । यही पहली वलचिति है । प्राण में बल के साथ रस भी है, ग्रत-एव यहाँ क्रियाभाव का उदय रहता है । चौथी बलचिति ' वाक् ' नाम से प्रसिद्ध है । यही दूसरी बलचिति है | यहाँ रस सर्वथा सुप्त है, अतएव वाक्तत्त्व अर्थशक्ति का अधिष्ठाता बनता हुआ जड़कोटि में मान लिया जाता है । विश्वरचना में इन्हीं दोनों बलचितियों की प्रधानता है । दोनों बहिर्मुख हैं । श्रतएव इन [ १२ ९ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् दोनों की समष्टि को ' बहिश्विति ' कहा जाता है । आनन्दविज्ञानमयी अन्तश्चिति मनोमय. अव्यय का विद्या-भाग है, इसीसे आगे जाकर पराविद्यालक्षण अक्षर तत्त्व का विकास होता है । इस विद्याभाग में रस की ही प्रधानता रहती है । प्राणवाङ्मयी बहिश्चिति अव्यय का कर्म्मभाग है, किंवा अविद्याभाग है । इसीसे आगे जाकर अपराविद्यालक्षण क्षरतत्त्व का विकास होता है । इस कर्म्मभाग में बल की ही प्रधानता है । विद्याभाग प्रमृतप्रधान ( रसप्रधान ) होता हुआ सत् है, कर्म्मभाग मृत्युप्रधान होता हुआ असत् है । अमृतमृत्युलक्षण सदसत् की समष्टिरूप विद्याकर्म्म - समुच्चय ही अव्ययपुरुष का वास्तविक स्वरूप है— ' श्रमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ' ( गी ० ६ । १६ ) । मध्यस्थित स्वयं मन काममय है । इस प्रकार रस बलके तारतम्य से वह प्रविष्टब्रह्म ' विद्यात्मा - कामात्मा - कर्मात्मा ' इन तीन कलाओं में परिणत होता हुआ १ - श्रानन्द २ - विज्ञान, ३- मन ४ - प्रारण, ५ - वाक् ' भेद से पञ्चकल बनजाता है । चिति सम्बन्ध से ही यह पञ्चकल अव्यय पुरुष शारीरकदर्शनादि में ' चिदात्मा ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । मध्यस्थित उभया-त्मक मन मुमुक्षाबल की प्रधानता से विज्ञान की ओर जाता हुआ आनन्दप्राप्ति का कारण बन कर मुक्ति का अधिष्ठाता बन जाता है एवं सिसृक्षावल की प्रधानता से प्रारण की ओर जाता हुआ वाक् प्राप्ति का कारण बनकर सृष्टिबन्धन का हेतु बन जाता है । मन ही बन्धन का कारण है, मन ही मुक्ति का कारणं है । इसी अभिप्राय से अभियुक्त कहते हैं-न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप! मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ श्रव्यय पुरुष की उक्त पाँचो कलाएँ उपनिषदों में ' कोशब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध हैं - ( देखिए त०-उप ० व्रा ० २ ) मोद - प्रमोद - हर्ष उल्लास - स्मितभाव - आदि संसार के सम्पूर्ण आनन्द अव्यय के ' श्रान-न्दमयकोश ' में प्रतिष्ठित हैं । मति धिषरणा - प्रज्ञा - धी - आदि जितने भी विज्ञान हैं, सबकी प्रतिष्ठा ' विज्ञान-मयकोश ' है । प्रज्ञानमन- इन्द्रियमन - सत्त्वमन - चित्त- यदि जितने मन हैं, सब की प्रतिष्ठा ' मनोमयकोश ' है । परोरजा - श्रसत् - बालखिल्या प्रवकाश - स्पृत् - एकषि - द्वषि सप्तर्षि - साकञ्ज आदि भेद भिन्न सब प्राणों की मूलप्रतिष्ठा ' प्राणमयकोश ' है । यच्चयावत् अन्नों की प्रतिष्ठा ' वाङ्मयकोश ' है । उपनिषत् ने इस पाँचवें कोश को ही ' अन्नमयकोश ' कहा है । इन पाँचों कोशों में, किंवा विज्ञानभाषानुसार पाँचों चितियों में अव्मयात्मा एक रूप से व्याप्त रहता है, जैसा कि - " तस्यैष एव शारीरात्मा यः पूर्वस्य ' ( तै ० उप०-ब्रा ० २ ) इत्यादिरूप से उपनिषत् में ही स्पष्ट कर दिया गया है । यह हैं अमृतसंस्था के मूलस्तम्भरूप पकल अन्यय पुरुष का संक्षिप्त निदर्शन । अव्यय पुरुष है । " प्रकृति पुरुषं चैव विद्वघनादी उभावपि " ( गी ० १३।१६ ) इस स्मार्त्त सिद्धान्त के अनुसार पुरुष अपनी स्वभावभूता प्रकृति के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता । अन्तरङ्ग - बहिरङ्ग भेद से प्रकृतितत्त्व दो भागों में विभक्त है । इन दोनों में से अन्तरङ्ग प्रकृति के दशकला - प्रकृतिब्रह्म साथ ही पुरुष का नित्यसाहचर्य्यं उक्त वचन से बतलाया गया है । यही अन्त-रङ्गप्रकृति अव्ययपुरुष का " स्व " - भाव है । बहिरङ्गप्रकृति वदली जा सकती [ १३० ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् है, स्वयं भी बदल जाती है, परन्तु स्वभावभूता ग्रन्तरङ्गप्रकृति का विपर्य्यय कथमपि सम्भव नहीं है । इसी प्रकृतिविज्ञान को लक्ष्य में रख भगवान कहते हैं— सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृति यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ( गी ० ३ । ३३ ) पूर्वोक्त सोलह बलकोशों में एक " हृदय " नाम के बलकोश का भी उल्लेख हुआ है । साथ ही में यह भी कहा गया है कि, मायाबलोदय के अव्यवहितोत्तरकाल में ही मायावच्छिन्न, अतएव परिच्छिन्न उस रसबलमूर्ति ब्रह्म में हृदय ( केन्द्र ) भाव का उदय हो जाता है । इस प्रकार केन्द्रबल तथा मायापुर सम्बन्ध से पुरुष नाम से प्रसिद्ध अव्यय ब्रह्म, दोनों का विकास एक ही काल में होता है । दोनों के पूर्वा-परभाव की चर्चा ही ग्रवज्ञानिक है । इसी सहोदित केन्द्रबल को, किंवा हृच्छक्ति को महर्षियों ने " प्रकृति " नाम से व्यवहृत किया है । जिस प्रकार अव्ययपुरुष में रसबल के तारतम्य से आगे जाकर पाँच कलाओं का उदय हो जाता है, एवमेव रसबल के ही तारतम्य से इस हृदयरूपा प्रकृति के भी पांच विवर्त हो जाते हैं । हृदयबल बल है, क्रियारूप है, गतिस्वरूप है । इस गति की ही ' स्थिति प्रागति - गति - स्थिति-गभितागति- स्थितिगभिता - श्रागति ' ये पाँच अवस्थाएँ हो जाती हैं । उक्थरूप से हृच्छक्ति स्वस्थान में प्रतिष्ठित रहती है । अर्करूप से हृच्छक्ति के दो विकास होते हैं । एक शक्ति निरन्तर इस प्रतिष्ठाको उच्छिन्न करने में प्रयत्नशील बनी रहती है, एक शक्ति निरन्तर प्रतिष्ठित रखने का प्रयास करती रहती है । आगे जाकर इन दोनों स्वतन्त्र विकासों का उसी मूलप्रतिष्ठा के साथ ग्रन्थिबन्धन हो जाता है । एक शक्ति प्रतिष्ठा से बद्ध होकर निरन्तर बाहर निकला करती है एवं एक शक्ति प्रतिष्ठायुक्त बनी हुई निरन्तर भीतर की ओर प्राया करती । ये ही पाँचों शक्तिविभाग ' गतिसमुच्चय-( स्थिति ), विशुद्धप्रागति, विशुद्धगति, स्थितिगर्भिता - श्रागति, स्थितिगर्भितागति इन नामों से व्यवहृत किए जा सकते हैं । जिसे ग्राप स्थिति कहते हैं, वह गतिसमुच्चयमात्र है । सर्वतो दिग्गति, किंवा समान-बलानुयायिनी विरुद्ध दिग्द्वयगति ही स्थितिरूप में परिणत होती है । इसी स्थितितत्त्व को, किंवा प्रतिष्ठा-तत्त्व को " ब्रह्मा " कहा जाता है । प्रगतितत्त्व " विष्णु " है, गतितत्त्व " इन्द्र " है, स्थितिगभिता " सोम " है एवं स्थितिगर्भिता गति " अग्नि " है । इस प्रकार गतितारतम्य से गतिरूप हृदयभावमयी एक ही प्रकृति पाँच रूप धारण कर लेती है । " प्रकृति स्वामधिष्ठाय संभवाम्यामायया " ( गी ० ४। ६ ) के अनुसार पञ्चधा विभक्त स्वभावभूता इसी प्रकृति के द्वारा सर्वथा ग्राज अव्यय को विश्वका श्रालम्वन बनना पड़ रहा है । पूर्व में कहा जाचुका है कि, सर्वत्र अमृत मृत्यु लक्षणा रस बल का ही साम्राज्य है । दो से भिन्न तीसरे तत्त्व का सर्वथा प्रभाव है । साथ ही में दोनों सर्वत्र प्रभिन्न रूप से ही प्रतिष्ठित रहते हैं । फलतः उक्त प्रकृति में भी इन्हीं दोनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । प्रकृति में प्रमृत भी है, मृत्यु भी है । अमृत मृत्यु की प्रधानता अप्रधानता के कारण इस एक ही प्रकृति के दो रूप हो जाते हैं । बलगर्भिता रसप्रधाना प्रकृति " श्रमृत " है । रसगर्भिता बलप्रधाना प्रकृति " मृत्यु " है । प्रमृतभाग प्रविकुर्वाण है, मृत्युभाग विकु-[ १३१ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् र्वारण है । प्रकृति का प्रमृतभाग, प्रकृति का मर्त्यभाग, दोनों अविनाभूत हैं । ग्रतएव दोनों में ही ब्रह्मादि उक्त पाँचों कलानों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । अमृता प्रकृति किंवा प्रकृति का अमृतभाग अपनी ब्रह्मादि पाँचों अमृत - कलाओं से विश्व का निर्माण करता है एवं मर्त्या प्रकृति, किंवा उस एक ही प्रकृति का मृत्यु भाग अपनी ब्रह्मादि पाँचों मर्त्य - कलाओं से विश्वरूप में परिणत होता है । प्रकृति का उक्त पञ्चकल अमृ-भाग ही अविकुर्वारण होने से अक्षर ( क्षीण न होने वाला ) नाम से एवं पञ्चकल मृत्युभाग ही विकु-र्वाण होने से " क्षर " ( क्षीण होने वाला ) नाम से प्रसिद्ध । उक्त कथनानुसार ग्रक्षर अमृत है, क्षर मर्त्य है । वस्तुतस्तु क्षर को भी मर्त्य मानना एक दृष्टि से सङ्गत ही है । थोड़ी देर के लिए अक्षर की दृष्टि से क्षर को भले ही मर्त्य मान लिया जाय, परन्तु विकारक्षररूप वैकारिक विश्व की अपेक्षा से तो अन्तरङ्गत्रकृतिभूत यह क्षर भी एक प्रकार से " अक्षर " ही है । विश्व में जितने भी उपादान कारण हैं, वे कार्यरूप में परिणत होकर अपने कारण स्वरूप को खो बैठते हैं । लोह जंग का कारण है, दुग्ध शर ( थर - मलाई ) का कारण है, शुक्रशोणित की समष्टि प्रजोत्पत्ति का कारण है । किसी समय सारा लोह जंग बन जाता है, सारा दुग्ध थर रूप में परि-गत ' जाता है, प्रजोत्पत्ति के अनन्तर तत्कारणभूत शुक्रशोणित सदा के लिए स्मृतिगर्भ में विलीन हो जाते हैं | अब ग्राप प्रयास करने पर भी लौह- दुग्ध शुक्रशोणित को कारणस्वरूप में प्राप्त नहीं कर सकते । उक्त क्षर उपादान कारण अवश्य है, परन्तु इसकी उपादान कारणता ऐसी नहीं है । क्षर से अनन्त विकार उत्पन्न हो जाते हैं, परन्तु वह उसी स्वरूप से प्रक्षुण्ण बना रहता है । इसी को दर्शन भाषा में ' अवि-कृतपरिणामवाद ' कहा गया है । क्षर की इसी श्रविकृत उपादानता को लक्ष्य में रख कर ही श्रुति

कहती है-एष नित्यो महिमा ब्रह्मणो न कर्म्मणा वर्द्धते नो कनीयान् ।

तस्यैव स्यात् पदवित्तं विदित्वा न कर्म्मरणा लिप्यते पापकेन ॥

- शत ० १४ । ७ । २ । २८ जिस प्रकार श्रव्यय, अक्षर, नित्य हैं, विश्व विकारों से जैसे ये दोनों असंस्पृष्ट रहते हैं, एवमेव यह क्षर ( आत्मक्षर ) विकार उत्पन्न करता हुआ भी विकारों से प्रसंस्पृष्ट रहता हुआ ग्रात्मकोटि में प्रविष्ट होता हुग्रा अव्ययाक्षरकोटि में ग्राजाता है । अतएव वैज्ञानिकों ने अन्तरङ्ग प्रकृतिभूत क्षर को ' श्रात्मक्षर ' नाम से व्यवहृत किया है । अक्षर एवं प्रात्मक्षर पूर्वकथनानुसार अव्ययपुरुष से ग्रविनाभूत है । * विज्ञान परिभाषा के अनुसार जैसे अव्यय ' पर ' नाम से, अक्षर ' अमृत ' नाम से प्रसिद्ध है, एव-मेव कुछ एक विशेष स्थलों को छोड़कर सर्वत्र ' ब्रह्म ' शब्द क्षर का ही वाचक है । क्षर का विकास अक्षर से हुआ है, क्षर ब्रह्म है, अतएव " ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् " ( गीता ३ । १५ ) यह कहा गया है । अपिच, इसीलिए “ ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च " ( गीता १४ । २७ ) यहाँ पर अक्षर के लिए अमृत शब्द, क्षर के लिए ब्रह्म शब्द प्रयुक्त हुआ है । उक्त श्रुति का " ब्रह्म " शब्द भी इसी क्षर का वाचक है । [ १३२ ]