Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 141–150

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् दूसरे शब्दों में अव्ययपुरुष का पुरुषपना इन्हीं दोनों पर निर्भर है । कारण स्पष्ट है । हृदय ही प्रकृति का वास्तविक स्वरूप है एवं हृत्प्रतिष्ठ काममय मन ही आनन्दादि चितियों का कारण बनता हुआ इस चिदात्मा का स्वरूप समर्पक बनता है । अतएव प्रकृति को पुरुष मर्य्यादा से बहिर्भूत होने पर भी पुरुष -स्वरूप - समर्पकता के कारण - " द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ' ( गीता १५ । १६ ) इत्यादि रूप से पुरुष मान लिया जाता है । अक्षरतत्त्व अव्यय की पराप्रकृति है, क्षरतत्त्व अपराप्रकृति है । समष्टि अन्तरङ्गप्रकृति है, स्वभाव है । आनन्द - विज्ञानादि अव्यय की जिन पाँच कलाओं का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उनमें आनन्द - विज्ञान - मन को मुक्तिसाक्षी कहा गया है एवं मनः प्रारणवाक् समष्टि को सृष्टिसाक्षी बतलाया गया है । अभी हमें सृष्टिधारा का विचार करना है । प्रानन्द- विज्ञानादि सृष्टि में गौण है । सृष्टिप्रक्रिया में सर्वत्र सृष्टिसाक्षी मनः प्राणवाङ्मय अव्यय की ही प्रधानता है । इसी दृष्टि को प्रधान मान कर विचार कीजिए । अव्यय मनोमय ( मनोधन - मनरूप ) है, प्राणमय है, वाङ्मय है । ' सामान्ये सामान्याभाव: ' इस सिद्धान्त के अनुसार मन में मन नहीं, प्राण में प्राण नहीं, वाक् में वाक् नहीं । श्रतएव अव्यय अमना है, अप्रारण है, अतएव सृष्टि से बहिर्भूत है । मनस्वी - प्राणवान् - वाग्मी तत्त्व ही सृष्टि कर सकता है । ऐसा है पूर्वोक्त अक्षर । ग्रक्षरतत्त्व अव्यय के मन से सर्वज्ञ है, प्राण से सर्वशक्तिमान् है, वाक् में सर्ववित् है । एतल्लक्षण अक्षर ही विश्वकर्त्ता ( विश्व का निमित्त कारण ) माना गया है । यही अक्षर ' श्रव्यक्तोऽक्षर इत्याहु: ' इत्यादि रूप से अव्यक्त नाम से प्रसिद्ध है । अक्षर के इसी सृष्टिकर्तृत्व का निरू-पण करती हुई श्रुति स्मृति कहती है-यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । ( मुण्डकोपनिषत् २-१-१ ) तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते ॥ २ ॥

( मुण्डकोपनिषत् १-१ - ९ )

श्रव्यक्तादीनि भूतानि - व्यक्तमध्यानि भारत ।

अव्यक्तनिधनान्येव - तत्र का परिदेवना ॥ ३ ॥

अव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।

रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ ३ ॥

( गीता २-२८ ) ( गीता ८-१८ ) [ १३३ ]

पृष्ठ 142

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् मनोऽवच्छेदेन अव्यय ज्ञानशक्तिघन है, प्रारणावच्छेदेन क्रियाशक्तिघन है, वागवच्छेदेन अर्थशक्ति-घन है । इन तीनों का ही यद्यपि अक्षर के साथ सम्बन्ध बतलाया गया है, परन्तु और भी सूक्ष्म विचार करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि, ज्ञानशक्तिमूर्ति मन की पूर्ण विकास भूमि अव्यय ही है । क्रिया-शक्तिमूर्ति, श्रतएव गतिरूप प्राण की पूर्ण विकास भूमि अक्षर ही है, एवं अर्थशक्तिमूर्ति वाक्तत्त्व की पूर्ण विकास भूमि क्षर ही है । दूसरे शब्दों में अव्यय ज्ञानप्रधान है, अक्षर क्रियाप्रधान है एवं क्षर अर्थ-प्रधान है । ज्ञानमूर्ति अव्यय भी निष्क्रिय है, अर्थमूत्तिक्षर भी जड़धर्म्म के कारण निष्क्रिय ही है । सक्रिय है एकमात्र मध्यस्थित प्राणमूर्ति अक्षर सृष्टिव्यापार सापेक्ष है, व्यापार क्रिया है । क्रिया एकमात्र सक्रिय अक्षर का ही धर्म्म है | अतः तीनों पुरुषों में से ग्रव्यक्तमूर्ति अक्षर पुरुष का सृष्टिकर्तृत्व सिद्ध होता है । मध्यस्थित अक्षर उस ओर से ग्रव्यय की ज्ञानविभूति को लेकर सर्वज्ञ बना हुआ है, इस ओर से क्षर की अर्थविभूति को लेकर सर्ववित् बना हुआ है । स्वप्राणशक्ति से तपोमूत्ति बना हुआ है । इतर दोनों पुरुषविभूतियों का इसमें समन्वय हो रहा है । अतएव देहलीदीपकन्याय से मध्यस्थ अक्षरज्ञान से त्रिपुरुषज्ञान लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-गतार्थ जाता है । अक्षर की इसी सर्वता को

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।

एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १ ॥

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । ( कठोपनिषत् १ - २ - १६ ) क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ २ ॥

( मुण्डकोपनिषत् २-२ - ८ ) " ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध क्षर भी यही अक्षर है, पर नाम से प्रसिद्ध श्रव्यय भी यही ग्रक्षर है । ब्रह्म-पर ( क्षराव्यय ) की विभूति से युक्त परावर नाम से प्रसिद्ध ऐसे अक्षर ज्ञान से सब कुछ विज्ञात हो जाता है - " एकेन विज्ञातेन सर्वमिदं विज्ञातं भवति । " जिस प्रकार अव्यय अक्षर से परे होने के कारण ' पर ' नाम से, क्षरपुरुष ग्रक्षर से इस ओर ( अवरकक्षा में ) प्रतिष्ठित रहने के कारण ' अवर ' नाम से प्रसिद्ध है । एवमेव प्रवरक्षर की अपेक्षा से पर एवं पर व्यय की अपेक्षा से प्रवर होने के कारण मध्य-स्थित यह अक्षर “ परावर " नाम से प्रसिद्ध है । इस परावरमूर्ति ग्रतएव त्रिमूर्ति प्रतएवच सर्वमूर्ति अक्षर के यथार्थ परिज्ञान से हृद्ग्रन्थि टूट जाती है, सारे सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, सम्पूर्ण कर्म्मबन्धन विलीन हो जाते हैं ' उक्त दोनों श्रुतिवचनों का यही तात्पर्य्य है । * द्वार की देहली में यदि दीपक रख दिया जाता है, तो द्वार के भीतर भी प्रकाश रहता है, द्वार के बाहर भी प्रकाश रहता है । इसीको ' देहलीदीपकन्याय ' कहा जाता है । [ १३४ ]

पृष्ठ 143

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् पञ्चकल अव्ययपुरुष सृष्टि का, किंवा सृष्टब्रह्म ( विश्व ) का श्रालम्बन ( अधिष्ठान - आवपन ) कारण है, पञ्चकल अक्षर निमित्तकारण है एवं पञ्चकल आत्मक्षर उपादानकाररण है । दूसरे शब्दों में आनन्दविज्ञानमनोमय मुक्तिसाक्षी विद्यात्मक अव्यय स्थिर धरातल है, सृष्टि के लिए मूलप्रतिष्ठा है । मनप्राणवाङ्मय सृष्टिसाक्षी कामात्मगर्भित कम्र्मात्मक अव्यय गतिस्थितिमत् कुलालचक्र ( कुम्हार का घूमता हुआ चक्र ) है । अक्षर कुम्भकार है, क्षर मिट्टी है । इस प्रकार ' मुक्तिसाक्षीरूप स्थिर धरातल पर, सृष्टिसाक्षीरूप चलाचलचक्र पर, अक्षर रूप कुम्भकार, क्षररूप मिट्टी से विश्वरूप घटादि पात्रों का निर्माण किया करता है । मानों त्रिभुवन विधाता प्रजापति घटनिर्माता कुम्भकार के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर रहा है । इस प्रकार उस महामाया के गर्भ में रस - बल के तारतम्य से वह मायीमहेश्वर ' पुरुष - प्रकृति ' इन दो विवत्तों में परिणत होता हुआ ' श्रव्यय- श्रक्षर - प्रात्मक्षर ' भेद से त्रिमूर्ति बन कर स्व - स्व कला-भेद से पञ्चदशकल ( १५ ) बन रहा है । इन पन्द्रहों के साथ उस मायातीत षोडशकलश्रमृतब्रह्म अखण्ड परात्पर कला का भी समन्वय स्वतः सिद्ध मानना पड़ता है । इस परा-त्पर के सम्बन्ध से ही पञ्चदशकल पुरुष ' षोडशकल ' बन जाता है । इन्हीं सोलह कलाओं के सम्बन्ध से इसे ' षोडशोपुरुष ' किंवा ' षोडशीप्रजापति ' कहा गया है । इन सोलह कलानों को १ - परात्पर - २ श्रव्यय -३ अक्षर - ४ प्रात्मक्षर, इन चार स्थूल विभागों में विभक्त किया जा सकता है । इसी आत्मचतुष्टयी के आधार पर " षोडशकलं वा इवं सर्वम् " ( कौषीतकि ब्रा ० ८ - १ ), चतुष्टयं वा इदं सर्वम् " ( कौषीतकि ब्रा ० २-१ ), षोडशकलं वं ब्रह्म " ( जै ० उ०३-३८-८ ) -- षोडश-कलः प्रजापतिः ' ( शत ० ७-७ - २-२७ ) इत्यादि अनुगम - निगम वचन प्रतिष्ठित हैं । संसार में सब से बड़ा मृत्युबन्धन है । बन्धन ही मृत्यु देवता का प्रधान पाश है । भक्तों के हृदय को दुखाते हुए हमें विवश होकर कहना पड़ता है कि, सम्पूर्ण विश्व प्रजा को मृत्युपाश में बद्ध रखने वाला स्वयं मायीमहेश्वर किंवा विश्वेश्वर भी मृत्युपाश से पृथक् नहीं है । प्रारब्रह्म के चार पाद महामाया का महाबन्धन ही उस का महतो महीयान् मृत्युपाश है । इसी मायामय मृत्युपाश से उस अखण्ड प्रमात्र को ' अव्यय - अक्षर - क्षर ' इन तीन मृत्युमात्रात्रों में परिणत होना पड़ रहा है । एक आत्मा का यह त्रित्त्व भाव ही इसके लिए पर्याप्त प्रमाण है कि, सृष्टिकाल में वह अवश्य ' मृत्युभाव से आक्रान्त है । जब तक वह महामाया शबलित है, तब तक वह अवश्य ही उक्त तीन मृत्युमात्राओं से युक्त रहता है । मायाबल के तिरोहित होने पर ही वह पुन: अपने उस अखण्ड परात्पररूप में आता है । इन्हीं दोनों अवस्थाओं के लिए - ' आत्मा उ एक: सन्नेतत् त्रयं, त्रयं सदेकमयमात्मा ' ( शत ० १४-४-४-३ - ) यह कहा गया है । जिस श्रमात्र अखण्ड तत्त्व की ये ( अव्यय - अक्षर - क्षर ) तीन मृत्युमती मात्राएँ हैं, वही चौथा परात्पर है । अर्द्धप्रदेश में ये तीन मर्त्यमात्राएँ हैं, अर्द्ध में वह एक है अतएव उसे ( परात्परको ) श्रर्द्धमात्रा कहा जाता है । यह अर्द्धमात्रिक तत्त्व माया विरहित ( किन्तु त्रिपुरुषदृष्ट्या मायासाक्षी ) होने से व्यापक होता हुआ सर्वथा नित्य है, अनुच्चार्य है । अर्द्धमात्रिक का यह अर्थ नहीं है कि, उसकी आधी [ १३५ ]

पृष्ठ 144

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् मात्रा है । जितने धरातल पर तीन मनुष्य प्रतिष्ठित रहते हैं, उतने घरातल पर एक प्रतिष्ठित है, अर्द्धमा-त्रिक का यही तात्पर्य्य है । जितने प्रदेश में तीन पुरुष प्रतिष्ठित हैं, उस सारे प्रदेश में वह व्याप्त हो रहा है | अमात्रिक ही प्रकृत में अर्द्धमात्रिक शब्द से व्यवहृत हुआ है । यहाँ सारा प्रपञ्च उपशान्त है । यही वस्तुतत्त्व है । इसी त्रिमात्रविज्ञान को लक्ष्य में रखकर महर्षि पिप्पलाद कहते हैं—

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योऽन्यसक्ता अनुविप्रयुक्ताः ।

क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ १

( प्रश्नोपनिषत् ५-६ ) इसी अमात्रिक, व्यवहार के लिए अर्द्धमात्रिक, विश्वातीत कला का स्पष्टीकरण करता हुआ रहस्यशास्त्र कहता है— श्रर्द्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः । त्वमेव सा त्वं सावित्री त्वं देवी जननी परा ॥ ( सप्तशती ) उक्त चतुष्कल आत्मब्रह्म की उपासना का मुख्य आधार है - ' प्रणव ' । मायीमहेश्वर का वाचक प्ररणव ' ओङ्कार ' ही है । शब्दब्रह्मप्रपञ्च में जो स्वरूप ओङ्कार का है, परब्रह्म विवर्त में वही स्वरूप " मायी-महेश्वर ' ' का है । इसी अभिप्राय से ' ओमित्येवं ध्यायथ श्रात्मानम् ' ( मुण्डकोपनिषत् २-२ - ६ ) यह कहा गया है | प्रोङ्कार में १ श्रर्द्धमात्रा - २ प्रकार - ३ ऊकार -४ मकार ' ये चार विभाग हैं । कितने ही श्रवैज्ञानिकों ने श्रर्द्धमात्रा से प्रोङ्कार के ऊपर लगने वाले — इस चिन्ह का ग्रहण किया है । विज्ञान न जानने के कारण उनका यह अपराध क्षम्य है अर्द्धमात्रा को अनुच्चार्य बतलाया है, उधर - इस चिन्ह का उच्चारण से सम्बन्ध है । फलतः श्रर्द्ध मात्रा किसी अनिर्वचनीय व्यापक ब्रह्म की निरूपिका बन जाती है । यह अर्द्धमात्रा विशुद्ध प्रमृतभाग है । ' ग्रकार उकार - मकार, ' ये तीनों शब्दसृष्टि के आदि - मध्य - श्रव-सान स्थान हैं । ग्रस्पृष्ट - स्पृष्टास्पृष्ट - स्पृष्ट - इन तीनों भावों का क्रमशः प्रकार - उकार - मकार से सम्बन्ध । अकार मूलस्थानीय है, उकार मध्यस्थानीय है, मकार अन्तस्थानीय है । अकारोच्चारण में कण्ठ-तात्वादि का किञ्चित् भी ससर्ग नहीं है । यह सर्वथा अस्पृष्ट रहता हुआ ही उच्चारण का विषय बनता है । बस जो स्थान शब्दब्रह्म में ' अकार ' का है, परब्रह्म सस्था में वही स्थान ' अव्यय ' का है । अव्यय विश्व में प्रतिष्ठित रहता हुआ भी प्रसंग है, असंस्पृष्ट है । इसी समानधर्म्म के कारण अकार को अध्यय का वाचक माना गया है । आप कार को प्रोष्ठ ( होठ ) से उच्चारण कीजिए, परन्तु होठों को बिल-कुल न मिलाइये, केवल उनको सिकोड़ लीजिए, वही प्रकार उकार रूप में परिणत हो जायगा । ग्रकार का विकास कम हो जाना ही उकार की स्वरूप निप्पत्ति है । सर्वथा विकास, सर्वथा संसर्ग न होने से उकार स्पृष्टास्पृष्ट है | यही स्थिति ग्रापको ग्रक्षर में मिलेगी । ज्ञानमूत्ति अव्यय सर्वथा विकासरूप है । उसका क्रियाभाव ही अक्षर है । क्रिया में सर्वथा जड़ता भी नहीं है एवं ज्ञानवत् पूर्ण विकास भी नहीं है । जो स्थिति शब्दब्रह्म में उकार की हैं, परब्रह्म संस्था में वही स्थिति मध्यस्थ अक्षर की है । ग्रतएव उकार [ १३६ ]

पृष्ठ 145

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् को अक्षरपुरुष का वाचक माना गया है दोनों होठों को मिलाकर जिस समय आप उकारोच्चारण करने का प्रयास करेंगे, उस समय वह उकार ही मकार रूप में परिणत हो जायगा । यहाँ स्पर्श की पराकाष्ठा है । यद्यपि प - फ - ब - भ - ये भी प्रोष्ठ से ही सम्बन्ध रखते हैं, परन्तु मकार में पूर्ण स्पर्श की प्रतीति होती है । इधर क्रियामूर्ति अक्षर ही अर्थरूप में आकर सर्वथा स्पृष्ट बनता हुआ क्षररूप में परिणत हो जाता है । " ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् " शब्दसृष्टि में जो स्थिति मकार की है, परब्रह्म संस्था में वही स्थिति अर्थमूर्ति, अतएव सर्वथा स्पृष्ट क्षर की है । श्रतएव मकार को क्षर का वाचक माना गया है । ' वाग्ब्रह्म ' के परा - पश्यन्ती - मध्यमा - वैखरी ये चार विवर्त माने गए हैं । इन चारों में परा का सम्बन्ध प्रर्द्धमात्रिक परात्पर से है, पश्यन्ती का प्रकारसधर्म्मा अव्यय से, मध्यमा का उकारसधर्म्मा अक्षर से एवं वैखरी का मकारसधर्म्मा क्षर से सम्बन्ध है । इन चारों में जिस प्रकार वैखरीवाक् का सब समा-नरूप से व्यवहार करते हैं एवमेव श्रात्मा की चारों संस्थाओं में से हमें पूर्णज्ञान वैखरीवाक्स्थानीय विश्वरूप क्षर का ही है । वाक्प्रपञ्च के ' परा - पश्यन्ती- मध्यमा ' ये तीन विवर्त जैसे गुहानिहित हैं, एवमेव आत्मप्रपञ्च के ' परात्पर - अव्यय - अक्षर ' ये तीनों विवर्त अस्मदादि साधारण मनुष्यों के लिए गुहा ही हैं । इसी वाग्विज्ञान से आत्मविज्ञान की ओर सङ्केत करती हुई श्रुति कहती है-चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ शब्दब्रह्म + ~~~~ → १ - १ - श्रर्द्ध मात्रा →→ परावाक् → परब्रह्म -- + ( ऋक्सं ० १-१६४-४५ ) परात्परः २ - १ - प्रकार: -पश्यन्तीवाक् →→ अव्ययः ३- २ - उकारः → मध्यमावाक्-+ अक्षरः ४-३- मकारः-वैखरीवाक्-आत्मक्षरः

देवाव ब्रह्मणो रूपे शब्दब्रह्म - परं च यत् ।

शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

[ १३७ ] श्रोङ्कारः

पृष्ठ 146

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ग्रमृतात्मविज्ञानोपनिषत् शब्दब्रह्म एवं परब्रह्म के इसी तादात्म्य को लक्ष्य में रखकर निम्नलिखित उपनिषच्छ ुतियाँ हमारे सामने आती हैं । तस्मै स होवाच — एतद्वै सत्यकाम! परं चापरं च ब्रह्म, यदोङ्कारः । तस्माद्विद्वानेते नैवायतनेन कतरमन्वेति । स यद्येकमात्रामभिध्यायीत, स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते । स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संपन्नो महिमानमनुभवति । अथ यदि द्विमा-त्रेरण मनसि सम्पद्यते, सोऽन्तरिक्षं यजुभिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्त्तते । यः पुनरेतं त्रिमात्रेणैवोमित्येतनैवाक्षरेण परं पुरुष-मभिध्यायीत, स तेजसि सूर्ये संपन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यते एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् । स एतस्माज्जीवघनात् परा-त्परं पुरियं पुरुषमीक्षते । तदेतौ श्लोकौ भवतः—

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।

क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥१ ॥

ऋग्भिरेतं यजुभिरन्तरिक्षं स सामभिर्यत्तत् कवयो वेदयन्ते ।

तमोङ्कारेणैवायतदेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥२ ॥

( प्रश्नोपनिषत् ५ - ३–६ ) " ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं, तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एवं । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं - तदप्योङ्कार एव । सर्वं ह्येतद् ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् | जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंश-तिमुखः । स्थूलभुक् वैश्वानर: प्रथमः पादः । स्वप्नस्थानोऽन्तः प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक् तैजसो द्वितीयः पादः । यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते, न कञ्चन स्वप्नं पश्यति, तत् सुषुप्तम्, सुषुप्तस्थान एकीभूत: प्रज्ञानघन एवानन्दघनो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीय पादः । एष सर्वेश्वरः, एष सर्व्वज्ञः, एषोऽन्तर्यामी, एष योनिः सर्वस्य । प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् । [ १३८ ]

पृष्ठ 147

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् नान्तः प्रज्ञं, न बहिः प्रज्ञं, नोभयतःप्रज्ञं, न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं, नाप्रज्ञं, श्रदृष्टं, अव्यवहार्यं, अग्राह्यं, अलक्षणं, अचिन्त्यं श्रव्यपदेश्यं, एकास्मप्रत्ययसारं, प्रप-ञ्चोपशमं शान्तं, शिवं श्रद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते -- स आत्मा विज्ञेयः । सोऽय -मात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्राः, मात्राश्च पादा प्रकार - उकार— मकार इति । प्रकार: प्रथमा मात्रा, उकारो द्वितीया मात्रा, मकारस्तृतीया मात्रा । श्रमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैतः । एवमोङ्कार श्रात्मैव संविशत्यात्मानाऽऽत्मानं - य एवं वेद । ” – माण्डूक्योपनिषत् शैव्य सत्यकाम ने महर्षि पिप्पलाद से प्रश्न किया है कि, भगवन्! प्रोङ्कार के श्रभिध्यान से मनुष्य किस प्रकार लोकविजय करने में समर्थ हो जाता है? इसी प्रश्न का समा-श्रमृतात्मस्वरूपपरिचय धान करते हुए ऋषि कहते है - हे सत्यकाम! यह ओङ्कार ही परब्रह्म है, ओङ्कार ही अपरब्रह्म है । इस रहस्य को जानने वाला इन्हीं मार्गों में से किसी एक मार्ग का आश्रय लेता है । ' परात्पर श्रव्यय - अक्षर - आत्मक्षर ' – इन चारों की प्राप्ति के क्रमशः ' अर्द्ध-मात्रा - श्रकार - उकार - मकार ' ये चार साधन हैं । इनमें तीन पुरुषों का क्रमशः ' मनुष्यलोक, सोमलोक ( पितृलोक ), ब्रह्मलोक ' इन तीनों से सम्बन्ध है । क्षरप्रधान ऋति पृथिवीलोक मनुष्यलोक है, यह वाक्प्रधान होता हुआ अर्थप्रधान है । अक्षरप्रधान यजुर्मूर्ति अन्तरिक्षलोक ( जो कि चन्द्रमा के सम्बन्ध से सोमलोक कहलाता है ) पितृलोक है, यह प्रारणप्रधान होता हुत्रा क्रियामूर्ति है । अव्ययप्रधान साम - ( अव-सान- अन्तिम प्रतिष्ठारूप ) - मूर्ति दिव्यलोक ( सूर्य्यलोक ) ब्रह्मलोक है । यह मनःप्रधान होता हुआ ज्ञान-मूर्ति है | चौथा परात्पर लोक वेदातीत है । एक एक कला की उपासना करने वाला उपासक एक एक लोक विभूति का उपासक बनता है । मकार पर प्रधान लक्ष्य रखता हुआ कर्मठ तत्सम आत्मक्षर का साक्षात्कार करता हुत्रा तपो- ब्रह्मचर्य - श्रद्धा से युक्त होकर भौतिक संपत्ति से पूर्ण समृद्ध हो जाता है । क्योंकि भूत की योनि मकारस्थानीय ऋङ्मय आत्मक्षर ही है । उसका भौतिक जगत् पर पूर्ण आधिपत्य हो जाता है । जिसका लक्ष्य मकार उकार, इन दो मात्राओं पर रहता है, वह उपासक तत्सम अक्षर का साक्षात्कार करता हुत्रा चान्द्रविभूतियों का भोग करने में समर्थ होता है । विभूतिभोगानन्तर पुनः उसे जन्म लेना पड़ता । जो महापुरुष समष्टि की उपासना करता है, वह ज्ञानी, किंवा ज्ञानयोगी तत्सम अव्ययपुरुष को प्राप्त करता हुआ सारे पाप्माओं से ( जन्ममरणचक्र से ) उसी प्रकार विमुक्त हो जाता हैं, जैसे कि एक पादोदर ( सर्प ) अपनी त्वचा ( कञ्चुकी ) से विनिर्मुक्त हो जाता है । इस समष्टिरूपा ज्ञानमयी उपासना के प्रभाव से यह अपनी जीवसंस्था से निकल कर उस परात्पर ( ईश्वराव्ययपुरुष ) संस्था का साक्षात्कार कर लेत है । परात्पर की उपासना स्वतन्त्ररूप से नहीं हो सकती, कारण वह अर्द्ध-मात्रिक होता हुआ श्रमात्र है । समष्टि की उपासना से ही वहाँ पर दृष्टि चली जाती है । कर्मकाण्डका मकारकला से सम्बन्ध है, उपासनाकाण्ड का उकारकला से सम्बन्ध है एवं ज्ञानकाण्ड का समष्टि से सम्ब-[ १३ ९ ]

पृष्ठ 148

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् न्ध है | ज्ञानयोग से त्रात्मक्षर की पाँचों कलाओं का अक्षर में लय होता है, ग्रक्षर की पाँचों कलाओं का अव्यय में लय होता है । इन पन्द्रह कलाओं की समष्टिरूप जीवाव्यय का उस ईश्वराव्यय में लय हो जाता है । ईश्वराव्ययद्वारा इस प्रोङ्कार की सहायता से ही यह त्रिकालातीत बनता हुआ उस शान्त-अभय - परात्पर नाम के अखण्ड ब्रह्म में विलीन होता हुआ ' समवलय ' नाम से प्रसिद्ध परामुक्ति का अधि-ष्ठाता बन जाता है । ' परात्परं पुरिशयं पुरुषम् ' में परात्पर शब्द उस अखण्ड परात्पर का वाचक नहीं है, अपितु ईश्वराव्यय का ही वाचक है । इसीलिए ' पुरिशयं पुरुषम् ' कहा है । अव्यय का ' पर ' यह साधा-रण नाम है | जीवपर ( जीवाव्यय ) की अपेक्षा से ईश्वरपर ( ईश्वराव्यय ) परे है, अतः " परात्-( जीवाव्ययात् ) पर: " इस निर्वचन से ईश्वराव्ययपुरुष को परात्पर कह दिया है । इस प्रकार ' परा-त्परं पुरुषमुपैतिदिव्यम् " इन अन्य श्रुतियों के आधार पर यहाँ का परात्पर शब्द भी ईश्वराव्यय ( ससीम -मायी महेश्वर ) का ही वाचक है । पहले जीवकलाओं का जीवाव्यय में अप्यय होता है । इससे जीववि-भूति समृद्ध बन जाती है । यही बतलाने के लिए श्रुतिने– “ स एतस्माज्जीवघनात् " यह कहा है । आगे जाकर इसका स्वप्रभव परात्परपुरुष में प्रप्यय हो जाता है । इसी अर्थ का स्पष्टीकरण करती हुई अन्य

श्रुति कहती है-गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।

कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥

- मुण्डकोपनिषत् ३-२-७ इसी अर्थ का स्पष्टीकरण माण्डूक्य ने किया है । वहाँ लोकसम्बन्ध को प्रधान न मान कर कर्म्मा-त्मा द्वारा आत्मतत्त्व का बोध कराया गया । क्षरपुरुष भूतकाल का ग्रक्षरपुरुष भवत् ( वर्तमान ) का, अव्ययपुरुष भविप्य का अधिष्ठाता है । इसका तात्पर्य यही है कि, क्षणिक भौतिक विश्व अपने क्षरण-कभाव के कारण नास्तिभाव में परिणत होता हुआ प्रतीतकोटि में प्रविष्ट है । उसका कभी इदंत्वेन ( वर्तमानत्वेन ) भान नहीं होता । वह सदा विनष्टप्राय है । पदार्थों में जो अस्तिप्रतीति है, यह कूटस्थ अक्षर की महिमा है | यही वर्त्तमानकाल है । यह दोनों धाराएँ उसी तटस्थ अव्यय पर अवलम्बित हैं । विश्व इसी प्रकार बनता रहेगा एवं बिगड़ता रहेगा - इस भविष्यमयी आशा का एकमात्र प्रालम्बन अव्य-यपुरुष ही है । अतएव इसे भविष्यत् का अध्यक्ष मानना उचित हो जाता है । इस प्रकार तीनों पुरुष कालिक हैं, चौथा परात्पर त्रिकालातीत, किंवा सर्वातीत है । चतुष्पाद ओङ्कार इन चारों का अनुग्राहक है । खण्डात्माओं की अपेक्षा से क्षर के आधार पर वैश्वानरात्मा का अक्षराधार पर तैजसात्मा का, एवं अव्ययाधार पर प्राज्ञात्मा का विकास होता है । इन तीनों की समष्टि ही ' कर्मात्मा ' है । यही ‘ कर्म्मभोक्ता - जीवात्मा - भोक्तासुपर्ण- मध्वद ' आदि विविध नामों से व्यवहृत हुआ है । वैश्वानर क्षरमूत्ति है । प्राज्ञतैजसयुक्त क्षरप्रधान वैश्वानर ही जाग्रदवस्था का अधिष्ठाता है । सप्तधातु इसके सात ग्रङ्ग हैं । प्रकारान्तर से ‘ चत्वार श्रात्मा, द्वौ पक्षौ, पुच्छं प्रतिष्ठा ' रूप में सप्तर्षिप्रारण सम्बन्ध से भी यह सप्ताङ्ग है | ५ - ज्ञानेन्द्रियाँ, ५- कम्मे न्द्रियाँ, ५ प्रारण ( प्राण उदान व्यान प्रपान - समान ), १ - मन, १- बुद्धि, १-चित्त, १ - अहंकार, नामों से प्रसिद्ध अन्तःकरण चतुष्टयी, ये १६ इसके विनिर्गम के द्वार है । इन्हीं के [ १४० ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् सम्बन्ध से यह ‘ एकोनविंशतिमुख ' है । यह आत्मा का पहला पाद है । तैजस अक्षरमूर्ति है । प्राज्ञयुक्त तैजसात्मा ही स्वप्नावस्था का सञ्चालक है । यह अन्तर्मुख है, अन्तःप्रज्ञ है । प्राज्ञ अव्यय प्रधान है । विशुद्ध रूप से यही सुषुप्ति का अधिष्ठाता है । यह ग्रानन्दघन ग्रानन्द ही तो ग्रव्यय का वास्तविक रूप है । इसमें अक्षर - क्षर दोनों अपीत हैं । दूसरे शब्दों में तेजस - वैश्वानर दोनों का लय है । क्षरदृष्टया यह भूतों की योनि है, भूतों का प्रभवाप्यय है । अक्षरदृष्टया यही सर्वज्ञ एवं अन्तर्यामी है । अव्ययदृष्टया यही सर्वेश्वर है - ' यो लोकत्रयमाविश्य विभत्यंव्यय ईश्वरः ' ( गी ० १५-१७ । ) इन तीनों से अतिरिक्त चौथा वही प्रखण्ड परात्पर है यही चतुर्थ पाद वस्तुतः प्रपाद है । यही चतुष्पादब्रह्म है । ओङ्कार द्वारा इसीका अभिनय किया जाता है । चतुर्मात्र प्रोङ्कार शब्दब्रह्म है, चतुष्पादब्रह्म परब्रह्म है । दोनों का तादा-त्म्य है । इसी रहस्य को बतलाने के लिए श्रुतिने प्रोङ्कार की चारों मात्राओं को ' पाद ' नाम से व्यवहृत किया है एवं परब्रह्म के चारों पादों को ' मात्रा ' नाम से व्यवहृत किया है । इसी श्रोतविज्ञान को लक्ष्य में रखकर महर्षि पतञ्जलि ने " तस्य वाचकः प्रणवः " यह कहा है । इस चतुष्कल, किंवा षोडशकल अमृतात्मा के आत्मक्षरभाग से विकार उत्पन्न होते हैं । इन्हीं विकारों से वैकारिक विश्व का स्वरूप निष्पन्न होता है, जैसा कि प्रकरण के प्रारम्भ में ही बतलाया जाचुका है । पोडशी पुरुष वैकारिक विश्व में सर्वत्र समानरूप से व्याप्त रहता हुग्रा भी पुष्करपलाशवन्निर्लिप्त रहता है । विश्व मृत्युमय है, विश्वापेक्षया विश्वप्रविष्ट षोडशी पुरुष सर्वथा अमृत है । अतएव हम इसे अवश्य ही " श्रमृतात्मा " कह सकते हैं । अपने क्षर भाग से वैकारिक विश्व का निर्माण कर यह अन्तः बहिः, सब ओर विश्व में प्रविष्ट रहता है, ' ग्रतएव इसे " प्रविष्टब्रह्म " " विश्वचर " " विश्वेश्वर " " विश्वात्मा " इत्यादि नामों से व्यवहृत करना अन्वर्थ होजाता है । अखण्ड परात्पर सर्वथा व्यापक है, तो यह विश्व व्यापक है | परा-त्पर की भाँति यह भी सम्पूर्ण विश्व में समानरूप से व्याप्त है । यह जड़ - चेतन सब में समान है । इससे कोई स्थान रिक्त नहीं है । यह वृक्षवत् स्तब्ध है, अविचाली है । यह जन्म - मृत्यु से परे है । जन्म - मृत्यु का अधिष्ठाता ग्रात्मा तो कोई अन्य ही है । पञ्चदशभेदभिन्न विराडात्मा की एक अन्यतम कला विशेष का ही कर्म्मभोग से सम्बन्ध है, जैसा कि श्रागे जाकर स्पष्ट हो जायगा । प्रकरण के आरम्भ में बतलाए हुए अखण्ड - परात्पर षोडशी - यज्ञ - विराट्, इन नामों का प्रकरण के अन्त में एक बार और स्मरण कर लीजिए । सर्वबलविशिष्ट रस को हमने परा-पर कहा है एवं इसी को प्रखण्डात्मा वतलाया है । रसवल के विवेक से इस अखण्ड ब्रह्म के दो विवर्त हो जाते हैं । यदि बलसमुच्चित रसभाग पर दृष्टि डाली जाती है, तो इस प्रखण्ड का अखण्डपना कुछ देर के लिए खण्ड - खण्ड हो जाता है । कारणवल खण्ड - खण्ड हैं, नाना हैं । एकान्ततः खण्ड तो विशुद्ध रस ही है । इसी पहिले विवर्त को " १ - निविशेष " कहा जाता है । यदि खण्डखण्डात्मक यच्चयावत् बलों से युक्त रस पर दृष्टि डाली जाती है, तो सर्वबलविशिष्टरसमूर्ति " २ - परात्पर " के दर्शन होते हैं । अख-ण्डरूप निर्विशेष ( शुद्धरस ) एवं परात्पर ( बलविशिष्टरस ), दोनों की समष्टि ही " विश्वातीत " ब्रह्म * इस विषय का विशद विवेचन माण्डूक्योपनिषद्विज्ञानभाष्य में देखना चाहिए । [ १४१ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिपत्र है । यही तुरीय विज्ञेय प्रर्द्धमात्रिक पाद है । इस तुरीय परात्पर के उदर में मायाबलोदय से उक्तलक्षण पोडशीपुरुष नाम से प्रसिद्ध ३ - " अमृतात्मा " का उदय हुआ है । इससे ४ - यज्ञात्मा का विकास होगा । सर्वान्त में ५ - विराटपुरुष उत्पन्न होगा एवं विराट् पर सृष्टिधारा समाप्त हो जायगी । जिस प्रकार विश्वातीत सर्वव्यापक परात्पर के साथ श्राद्ध का कोई सम्बन्ध नहीं है, एवमेव विश्व-व्यापक इस अमृतात्मा के साथ भी श्राद्ध का कोई सम्बन्ध नहीं है । गति श्रागति, प्रकररणोपसंहार विश्वसीमा के भीतर होती है । जो विश्वव्यापक है, उसकी विश्वसीमा में गति -ग्रागति असम्भव है । प्रसङ्गोपात्त एक बात और ध्यान में रखिए । पूर्व में जिसे पोडशी श्रात्मा का दिग्दर्शन कराया गया है, उसके अक्षर - क्षर भागों की अवान्तर कलानों को ब्रह्म - विष्णु-इन्द्रादि नामों से व्यवहृत किया है । साथ ही में समष्टि को " श्रात्मा " कहा है । उधर गीताशास्त्र ने श्रात्मा और देवताओं का पार्थक्य माना है । " जो उपासक ब्रह्मादि देवताओं का यजन करते हैं, वे भी परम्परया मेरी ( षोडशी पुरुष लक्षरण श्रात्मा की ) ही उपासना करते हैं " ( गी ० | २३ ) यह व्यवस्था की गई है | ऐसी स्थिति में प्रश्न उपस्थित होता है कि, गीता तो आत्मा एवं ब्रह्मादि देवताओं का भेद प्रखण्डब्रह्म विशुद्धरसः परात्परब्रह्म सर्वबलविशिष्टो रसः परात्परः — श्रर्द्धमात्रा उकारः - अक्षरः विश्वातीतब्रह्म मकारः — त्रात्मक्षरः प्रकारः - अव्ययः मुक्तिसाक्षी – ४- प्राणः सृष्टिसाक्षी १ - आनन्दः २ - विज्ञानम् ३- मन: ५ - वाक् } : पञ्चकल : पुरुष १ - अमृतब्रह्मा २- मृत विष्णुः ३ - अमृतइन्द्रः ४ - अमृतग्रग्निः ५ - श्रमृतसोमः पश्वकला प्रकृतिः परा १- मर्त्यब्रह्मा २- मविष्णुः ३- मर्त्य इन्द्रः ४- मर्त्य अग्निः ५- मर्त्य सोमः श्रमतात्माषोड़शी - ' तस्य वाचकः प्ररणवः ' [ १४२ ] पचकला अपराप्रकृतिः पडशी -ब्रह्म विश्वात्मा