Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 151–160
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 151–160
पृष्ठ 151
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् बतलाती है, परन्तु पूर्व में ब्रह्मादि देवताओं का आत्मकोटि में ही अन्तर्भाव बतलाया गया है । इस विरोध का परिहार कैसे सम्भव है? इस प्रश्न के सम्बन्ध में अभी हम केवल यही कहना पर्याप्त समझते हैं कि, श्रात्मस्वरूप सम्बन्ध में जिन ब्रह्मा - विष्णु आदि का उल्लेख किया गया है, इनके साथ उपास्य ब्रह्मादि देवताओं का कोई सम्बन्ध नहीं है । गीतोक्त देवता विश्व के भीतर उत्पन्न होने वाले क्षरपदार्थ हैं । " जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एवं देवताभ्यः " इस सिद्धान्त के अनुसार इन्हीं वैकारिक देवताओं की समष्टि भौतिक विश्व है । उधर षोडशीपुरुष के ब्रह्मादि अक्षर - प्रात्मक्षरमूत्ति होते हुए वैका-रिक देवसर्ग से सर्वथा बहिर्भूत हैं । वैसे इन्हें भी देवता कहा जाय, तो कोई विप्रतिपत्ति नहीं है । उपा-स्यतत्त्व ही देवता है । इसी आधार पर आत्मा को भी देवता कहा जाता है । जिन्हें सर्वसाधारण देवता समझते हैं, गीता में जिनकी उपासना का उल्लेख है, उनका जन्म तो बहुत आगे जाकर सौरसृष्टि में होता है, जैसा कि ग्रागे के तत्तत् प्रकरणों में स्पष्ट हो जायगा । श्रमृतात्मा के सम्बन्ध में इतना ही कह कर ' श्रव्यक्तात्मविज्ञान ' की ओर पाठकों का ध्यान श्राकर्षित किया जाता है । तदित्थं - - परात्पर, अव्यय, अक्षर, प्रात्मक्षरभेदेन चतुष्पात्-कलाभेदेन षोडशकलोऽयममृतात्मा षोडशी व्याख्यातो द्रष्टव्यः समाप्ता चेयं श्राद्धविज्ञानान्तर्गत ' आत्मविज्ञानोपनिषद ' प्रथमायां प्रथमखण्डात्मिकाय ' अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ' प्रथमा [ १४३ ]
पृष्ठ 152
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड ( २ ) १ - श्रधिदैवतम् स्वयम्भू: ( पूर्णमदः ) २ - श्रध्यात्मम् श्रव्यक्तम् ( पूर्णमिदम् ) → अथ श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् } " अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् " द्वितीया अव्यक्तात्मा - प्राकृतात्मा स्वयम्भूः १ - नियतिः सत्यम् ( श्रन्तर्यामी ) २ - सूत्रं सत्यम् ( सूत्रात्मा ) ३ – वेदाः सत्यम् ( वेदात्मा )
श्रव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञ के ॥१ ॥
श्रव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
श्रव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥२ ॥
- श्रीमद्भगवद्गीता ८ ० ११ । २०२८ । ( २ ) अव्यक्तात्मस्वरूपपरिचयः ( ब्रह्म - कर्म मयोऽव्यक्तात्मा )
तम श्रासीत्तमसा गूळहमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् ।
तुच्छ्रय नाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम् ॥१ ॥
- ऋक् ० १०।१२६ / ३
न मृत्युरासीदमृतं न तहि न रात्र्या अह्न श्रासीत् प्रकेतः ।
श्रानीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥२ ॥
[ १४५ ] —ऋक् ० १०।१२६।२
पृष्ठ 153
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत्
स वेदैतत् परमं ब्रह्मधाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्त्तन्ति धीराः ॥३ ॥
-मुण्डक ३।३।१
एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्व्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः ।
स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङं जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥४ ॥
- श्वे ० उ ० २।१६
छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति ।
अस्मान् मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः ॥ ५ ॥
श्रनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ ६ ॥
- श्वे ० ४१६ - श्वे ० उ ० ५।१३
प्रादिः स संयोगनिमित्तहेतुः परत्रिकालादकलोऽपि दृष्टः ।
तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वस्थचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥७ ॥
- श्वे ० उ ० ६५
स वृक्षकाला कृतिभिः परोऽन्यो यस्मात् प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम् ।
धर्मावहं पापनुदं भवेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥८ ॥
- श्वे ० उ ० ६ | ६
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् ।
पति पतीनां परमं परस्तात् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥९ ॥
– श्वे ० उ ० ६।७
एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः ।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १० ॥
- श्वे ० उ ० ४।१७ [ १४६ |
पृष्ठ 154
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अव्यक्तात्मब्रह्मणे नमः अव्यक्तात्मा - स्वयम्भूः * ' अव्यक्तं ब्रह्म ' ' त्युपास्व जे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः । शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा न ये धामानि दिव्यानि तस्थुः || ( श्वे ० उ ० २।५ ) गुह्योपनिषत्सु गूढं तद् ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् । ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदुस्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ( श्वे ० उ ० ५।६ ) स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ ( श्वे ० उ ० ६।१ ) येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः । तेशितं कर्म विवर्तते ह पृथिव्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ ( श्वे ० उ ० ६।२ ) नमः शान्तात्मने तुभ्यं नमो गुह्यतमाय च । अचिन्त्याप्रमेयाय अनादिनिधनाय च ॥ — मंत्रायण्युपनिषत् ( ४ । १५ । ) | -* त्रिकल अव्यक्तात्मा, द्विकल यज्ञात्मा, त्रिकल महानात्मा, द्विकल विज्ञानात्मा, पञ्चकल शारी-रकात्मा ' भेदभिन्न इन १५ सखण्डात्माओं का ' ईशविज्ञानभाष्य ' तथा ' गीताभूमिका - प्रात्मपरीक्षाखण्ड ' में विस्तार से निरूपण हुआ है । अतः यहाँ संक्षेप से ही ( दृष्टिकोणभेद से ) इनका स्पष्टीकरण किया जाता है । [ १४७ ]
पृष्ठ 155
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत - मृतात्मा नाम से प्रसिद्ध षोडशी - पुरुष के मनःप्राणवाङ्मय सृष्टिसाक्षी कर्मात्मभाग की अबलप्रधान सिसृक्षा से सम्बन्ध रखने वाले मनोमय - काम, प्राणमय - तप, तथा वाङ्मय - श्रम, नामक सृष्टिकम्मों के सामान्य तोन अनुबन्धों के व्यापार से सर्वप्रथम जिस ब्रह्म की विकारसृष्टि ' बल्शेश्वरात्मा ' का विकास होता है, वही प्राकृतात्मा ' श्रव्यक्तात्मा ' कहलाया है, जो मानव - परिभाषा में ' शान्तात्मा ' नाम से भी प्रसिद्ध है । अमृतात्मा का उपादानकारण लक्षण - प्रात्मक्षर ही अपरलक्षण विश्व का प्रभव ( उपादान ) बनता हुआ ' श्रपराप्र-कृति ' नाम से प्रसिद्ध है । उपादानकारण संकेतभाषानुसार ' ब्रह्म ' कहलाया है । आत्मक्षर ही स्व - विकारों से विश्व का उपादान बनता है, अतः इसे भी अवश्य ही ' ब्रह्म ' नाम से व्यवहृत किया जा सकता है । निमित्तकारणात्मक, ' पराप्रकृति ' नामक ग्रक्षर ही इस क्षर की विकासभूमि है, इसी ग्राधार पर ' ब्रह्मा-क्षरसमुद्भवम् ' ( गीता ३ । १५ ) यह कहना अन्वर्थ बनता है । ' ब्रह्मन्द्रविष्वग्निसोम ' जो पाँच अमृ-तकलाएँ अक्षर की हैं, वे ही पाँचों मर्त्यकलाएँ इस आत्मक्षर की हैं । अन्तर दोनों के पश्चक में यही है कि, अक्षरकलापञ्चक अपने अविकृत ( अपरिणामी ) भाव से जहाँ एकरस है, वहाँ क्षरकलापञ्चक स्व- विकृत ( परिणामी ) भाव से भिन्नरस है । क्षर की इन ब्रह्मादि पांचों मर्त्यकलाओं से निरन्तर विकार उत्पन्न होते रहते हैं । क्षर का मूलरूप ( अव्यक्तरूप ) अक्षर सहयोग से सर्वथा प्रविकृत रहता है एवं तूलरूप ( व्यक्तरूप ) विकृत रहता है । विकृतावस्थापन क्षर का विश्व में अन्तर्भाव माना जाता है एवं मूला-त्मक अव्यक्तात्मक ), अतएव अविकृतावस्थापन क्षर को आत्मकोटि में माना जाता है । इस प्रकार श्रात्मक्षर का आत्मा से भी ( प्रविष्ट - विश्व चरब्रह्म से भी ) सम्बन्ध है एवं विश्व ( सृष्टब्रह्म ) से भी सम्बन्ध है । इसी उभयधर्म्म के कारण इसे ' प्रारमक्षर ' नाम से व्यवहृत करना चरितार्थ होता है अविकृतदृष्टि से वही " आत्मा " है, विकारदृष्टि से वही " क्षर " है । समष्टिरूप से वही ' आत्मक्षर ' है । ग्रात्मभूत इसकी ब्रह्मकला से जो विकार उत्पन्न होता है, वह १ - ' प्राण ' नाम से, विष्णुकला का विकार २ - ' प्राप: ' नाम से, इन्द्र का विकार ३- ' वाक् ' नाम से, अग्नि का विकार ४- ' श्रन्नाद ' नाम से एवं सोम का विकार ५ - ' अन्न ' नाम से प्रसिद्ध है । इन्हीं विकारों के सम्बन्ध से आत्मरूप यह पराप्रकृतितत्त्व क्षर वन जाता है । पाठकों को इतना ध्यान रखना चाहिए कि एक ही नामों से निद्दिष्ट प्राण - वागादि-तात्त्विक दृष्टि से सर्वथा पृथक् पृथक् पदार्थ हैं । उदाहरण के लिए वाक्तत्त्व को ही सामने रख लीजिए । पञ्चकल अव्यय में भी पांचवीं वाक्कला है प्राणादि पाँचों विकारों में भी अन्त की वाक्कला है । एक तीसरा वाक्तत्त्व शुक्र से सम्बन्ध रखता है । चौथी वाक् सूर्य्य में उत्पन्न होती है । इस प्रकार वाक् के अनेक विवर्त्त हैं । नाम सादृश्य मात्र से इन्हें प्रभिन्न नहीं समझना चाहिए । अव्ययवाक् पुरुषवाक् है । इस का सृष्टि के उपादान से कोई सम्बन्ध नहीं है । प्रानन्दविज्ञानघन मनोमयप्राणगर्भिता यह वाक् केवल विश्व का प्रालम्बन है । प्राणादि वाली दूसरी वाक् प्रकृतिवाक् है । शुक्रवाक् विकृतिवाक् है । चौथी सोवाक् ( जो कि वाक् बृहती - गौरीविता- ऐन्द्री - स्वर - प्रादि विविध नामों से प्रसिद्ध है ) देवताओं की जननी है । देवपात्ररूप वषट्कार ( वाक् का षट्कार - वाक् के ६ विभाग स्तोम ) का सम्बन्ध इसी सौरी-वाक् से है । इसीको “ इन्द्रपत्नी " कहा जाता है । आगे जाकर वाक्तत्त्व का भिन्न भिन्न कार्यों में उपयोग बतलाया जाने वाला है । इनके नामसादृश्य से पदार्थतत्व में भ्रान्ति न हो जाय, ग्रतः पहले से इन भेदों को ध्यान में रखना चाहिए । [ १४८ ]
पृष्ठ 156
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिपत् पुरुषवाक् के आधार पर प्रतिष्ठित अक्षर के व्यापार से क्षर की पाँचों कलाओं से क्रमशः प्राणादि उपर्युक्त पाँच विकार उत्पन्न हुए । ये पाँचों ही वैकारिक विश्व के मौलिक वाङ्मय अव्यक्तात्म तत्त्व हैं | इन्हीं के रासायनिक संयोग से यौगिक विश्व उत्पन्न होने वाला है । विज्ञानतत्त्वानुयायी दार्शनिक जिन्हें " गुरणभूत " कहते हैं, प्राधानिक समय ( साँख्य ) में जो तत्त्व " तन्मात्रा " नाम से प्रसिद्ध है, विज्ञानकाण्ड में वे ही हमारे प्राणादि पाँच विका-रक्षर हैं । इन्हीं से आगे जाकर अणु भूत - भौतिक- सत्त्वादि विविधभावों का विकार होता है । अस्तु. दार्शनिक क्रम का वैज्ञानिक क्रम के साथ समन्वय करने का यहाँ अवसर नहीं है । " ईक्षतेर्नाशब्दम् ” ( शा०-सू ० १ पा ० १ अ ० ३ सू ० ) इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार दर्शनशास्त्र को अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए इस स्वतः प्रमाण वैदिक विज्ञान का आश्रय लेना आवश्यक है । इसकी प्रामाणिकता के लिए अन्य प्रमाण सर्वथा अनपेक्षित है । अतः सब मर्य्यादाओं को एक ओर रख कर आपको मानना चाहिए कि, विकारक्षर ही विश्व के मौलिक उपादान हैं । इन्हीं से विश्व उत्पन्न होता है, अतएव इनकी समष्टि को विज्ञानभाषा में " विश्वसृट् " कहा जाता है । पाँचों ही विकारक्षर विशुद्ध रूप से कभी उप-लब्ध नहीं होते । पाँचों क्षर पाँचों में नित्य संश्लिष्ट होकर ही अपनी स्वरूपसत्ता रखने में समर्थ होते हैं | संकेतभाषानुसार जिस तत्त्व में आहुति होती है, प्राहुति ग्रहण करने वाला, आहुति की प्रतिष्ठारूप वह तत्त्व " अग्नि " कहलाता है एवं प्राहुत होने वाला तत्त्व " सोम " नाम से प्रसिद्ध है । अग्नि में सोम का आहुत होना ही यज्ञ है । पहले प्राणतत्त्व में आपः - वाक् - अन्न - अन्नाद, इन चारों मौलिक क्षरों की आहुति होती है । यहाँ उक्त परिभाषा के अनुसार प्रारण को अग्नि समझिए एवं शेष चारों को सोम सम-भिए । समन्वय को यज्ञ समझिए । इसी प्रकार श्रापः वाक् प्रश्न- श्रन्नाद, — इन चारों को आधार मानकर शेष चारों की क्रमशः प्रत्येक में प्राहुति होती है । इस पश्वीकरण प्रक्रिया से जो इन पाँचों पञ्चीकृतों का अपूर्वस्वरूप निष्पन्न होता है, वही " पञ्चजन " नाम से प्रसिद्ध है । " वैशेष्यात्तुतद्वादस्तद्वादः " इस दार्श-निक सिद्धान्त के अनुसार इन पाँचों के नामों में कोई अन्तर नहीं होता । दूसरे शब्दों में ये भी प्राण-आपः वाक् आदि नामों से ही व्यवहृत होते हैं । इन प्राणः प्रापः - वागादि - प्रत्येक में प्राण - प्रापः - वागादि पाँचों विद्यमान हैं । अर्द्धभाग में प्राण है, अर्द्धभाग में शेष चारों हैं । अर्द्धभाग में आप है अर्द्धभाग में प्रारणादि शेष चारों हैं । यही क्रम सर्वत्र समझिए । आगे जाकर इन पाँचों पञ्चीकृतों का पुनः समन्वय होता है, यह दूसरी पञ्चीकरण प्रक्रिया है । पञ्चीकृतप्रारण में पञ्चीकृत प्रापः वागादि शेष चारों की आहुति होती है । इससे " प्राण " नाम के " पञ्चपञ्चजन " का विकास होता है । यही क्रम शेष चारों में सम-भिए । पञ्चजनों में प्राणादि का वैषम्य न था, परन्तु इन पञ्चपञ्चजनों के संस्थान में वैषम्य उत्पन्न हो जाता है । इसी विषमता के कारण इनके नामों में भी अन्तर हो जाता है । पञ्चीकृत पञ्चजनों की यह द्वितीयावस्था ही विषमभाव के कारण पुरभाव ( पिण्डभाव ) की उत्पादिका बनती है, अतएव इसे “ पुर-ञ्जन ' शब्द से व्यवहृत किया जाता है । पश्वीकृत प्रारण से विकसित होने वाला पुरञ्जन ' वेद ' नाम से, आपः सम्बन्धी “ लोक ' ' नाम से, वाक् सम्बन्धी ' देव ' नाम से, अन्नसम्बन्धी ' पशु ' नाम से एवं अन्नाद सम्बन्धी ' भूत ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रत्येक पुरञ्जन में पखीकृतपञ्चजनों के समन्वय से २५-२५ कलाएं हैं । इतना अवश्य मानना पड़ेगा कि, प्रत्येक पुरञ्जन में २५ - २५ कलाओं के रहने पर भी प्रधानता मूलभूत प्राणः-[ १४६ ]
पृष्ठ 157
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् आपः - वागादि - स्व - स्व कलाओं की ही रहती है । वेदपुरञ्जन की २५ सों कलाएं प्राणमयी हैं, अप् पुरञ्जन की २५ सों कला श्रापोमयी हैं । यही व्यवस्था शेष तीनों में समझिए । प्राणात्मक वेदपुरञ्जन से स्वयम्भू-पुरका निर्माण होता है । प्राणतत्त्व नित्य है, अतएव प्राण का विवर्तभूत ' ब्रह्म निश्वसित ' नाम से प्रसिद्ध अपौरुषेय वेद भी नित्य ही है । यह स्वयं उत्पन्न है, स्वयं उद्भूत है । अतएव तद्रूप पहला पुर ' स्वयमेव-भवति ' इस निर्वचन ' स्वयम्भू ' नाम से व्यवहृत होता है । यद्यपि अमृतात्मा ( षोडशीपुरुप ) की अपेक्षा से यह प्राणमृत्ति, किंवा वेदमूत्ति स्वयम्भू व्यक्त है, तथापि पाङ्क्त ( पञ्चावयव ) विश्व के इतर चारों पर्वों की अपेक्षा हम इसे अव्यक्त ही कहेंगे । इस ' ब्रह्मा ' नाम के अव्यक्त स्वयम्भू के चार मुखों से ही आगे की सम्पूर्ण सृष्टियाँ होती हैं । हमने बतलाया है कि पञ्चजन- श्रारण से समन्वय द्वारा वेदपुरञ्जन प्रादुर्भूत होता है एवं वेदपुर-ञ्जन से स्वयम्भू का विकास हुआ है । ऐसी अवस्था में स्वयम्भू में पवीकृत प्राण - प्रापः- वाक् - अन्न अन्नाद, इन पाँचों प्राकृतप्राणों की सत्ता सिद्ध ' जाती है । स्वयम्भू ब्रह्मा प्रारणमुख है, प्रापोमुख है, वाङ्मुख है, श्रन्नादमुख है, अन्नमुख है । अग्नितत्त्व ही अन्नाद है, सोमतत्त्व ही अन्न है । एवं- " प्रग्निर्वा रुद्र: तस्यैते द्वे तन्वे घोरान्या च शिवन्या च " ( शत ० ५ । ३ । १ । १० ) इस सिद्धान्त के अनुसार अग्नि-तत्त्व ही ' रुद्र ' है । इस अग्निमय, अतएव अन्नादमय रुद्रदेवता की कृपा से सोमान्नरूप एक मुख कट जाता है | सोम के अग्निगर्भ में आहुत होते ही इसकी स्वतन्त्र सत्ता उच्छिन्न हो जाती है । अग्निगर्भित सोम स्वस्वरूप को खोता हुआ अग्निमय ही वन जाता है । दूसरे शब्दों में ग्राद्य ( अन्नरूप सोम ) जब अत्ता ( भोक्ता अग्नि ) में चला जाता है, तो अत्तारूप में परिणत होता हुआ वह श्राद्य अपने स्वतन्त्र व्यव-हार को छोड़ कर सत्ता ही कहलाने लगता है, जैसा कि वाजिश्रुति कहती है— " तद्यदोभयं समागच्छति, प्रत्तैवाख्यायते नाद्यम् । स वै यः सोऽत्ता
अग्निरेव सः " – शत ० १० । ६ । ३ । १ । २ । इति ॥
इस प्रकार अन्नाद - अन्न के पारस्परिक हिति ( बाहुति ) सम्बन्ध से ब्रह्म के चार ही मुख रह जाते हैं । इन चारों मुखों में पहला प्राणमुख है, इससे वेदसृष्टि होती है । दूसरे आपोमुख से लोक-सृष्टि होती है । तीसरे वाङ्मुख से देवसृष्टि होती है । प्रन्नगर्भित चौथे अन्नादमुख से पशुसमन्विता भूत-सृष्टि होती है । महाभारत के मतानुसार वाङ्मुख से प्रजासृष्टि होती है एवं अन्न - प्रन्नादमुख से धर्म्म-सृष्टि होती है । चतुर्विधसृष्टिप्रवर्तक प्राणप्रधान यही ब्रह्मा बाधिदैविक संस्था में स्वयम्भू नाम से प्रसिद्ध हैं एवं अध्यात्मसस्था में यही ' शान्तात्मा ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । श्रव्यक्तात्मा इन दोनों का साधारण नाम है | इस अव्यक्तात्मा के अन्तर्यामी, सूत्रात्मा, वेदात्मा, भेद से तीन प्रधान विवर्त हैं । तीनों का सक्षिप्त स्वरूप बतला देना भी अप्रासङ्गिक न होगा । प्रत्येक पदार्थ के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहकर उसका नियत रूप से सञ्चालन करना इस अव्यक्तात्मा का प्रधान कर्म्म है । सर्वप्रथम प्राधिदैविक संस्था का ही विचार कीजिए । श्रव्यक्तात्मा के तीन विवर्त [ १५० ]
पृष्ठ 158
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् इस संस्था में भूः भुवः स्वः नाम के तीन प्रधान लोक हैं । " त्रयो वा इमे त्रिवृतो लोकाः " इस श्रौतसि-द्धान्त के अनुसार उक्त तीनों लोकों में प्रत्येक लोक त्रिवृत् ( त्रिगुणित ) है । महाव्याहृति नाम से प्रसिद्ध तीनों अवान्तर ‘ भूः - भुवः स्वः ' ये तीन भेद हैं । यद्यपि इस त्रिवृद्भाव के कारण ६ लोक होने चाहिएँ, परन्तु दो लोकों का भूः स्वः, इन दोनों के साथ सम्बन्ध हो जाने से सात ही लोक रह जाते हैं । जिसे आप पृथिवी कहते हैं, उसे भूलोक समझिए । प्रत्यक्षदृष्ट सूर्य्य को स्वर्लोक समझिए, सूर्य्य और पृथिवी का मध्यस्थान ग्रन्तरिक्ष समझिए । इन तीनों की समष्टि को " भूः " नाम की पहली महाव्याहृति समझिए । लोकत्रयात्मिका यही ' भू ' नाम की पहली रोदसीत्रिलोकी है । इस त्रिलोकी को पृथिवी समझिए, परमेष्ठी को स्वर्लोक समझिए, मध्यस्थान को अन्तरिक्ष समझिए । इन तीनों की समष्टि को " भुवः " नाम की दूसरी महाव्याहृति समझिए । लोकत्रयात्मिका ' भुवः ' नाम की यही दूसरी क्रन्दसीत्रिलोकी है । इस क्रन्दसी की समष्टि को भूः समझिए, स्वयम्भू को स्वर्लोक समझिए । मध्यस्थान को अन्तरिक्ष समझिए । तीनों की समष्टि को “ स्वः " नाम की महाव्याहृति समझिए, लोकत्रयात्मिका स्वः नाम की यही तीसरी संयतत्रिलोकी है । इस प्रकार इस त्रैलोक्यत्रिलोकी के क्रम में निम्नलिखित रूप से सात लोक हो जाते हैं-३ - स्वः — भुवः १ – भूः संयतत्रैलोक्य १३ – स्वः २- भुवः सोलोक्य ऋन्द्र .... ' ' ' ' सत्यलीकः ३ ——— स्वयम्भूः ( ७ ) ... ' तपोलोक: २ + अन्तरिक्षम् ( ६ ) ३ - स्वः.... .... ' ' ' ' जनल्लोकः३-१ --- → परमेष्ठी ( ५ ) २- भुवः .... महर्लोकः २ ---अन्तरिक्षम् ( ४ ) .१ – भूः रोदसीत्रैलोक्य ' ३ – स्वः स्वर्लोक: ३ – १ – →+ सूर्य्यः ( ३ ) २ – भुवः ” मुवर्लोकः२– अन्तरिक्षम् ( २ ) " भूलोकः १-- पृथिवी ( १ ) उक्त सातों लोकों में संयतीत्रलोक्य का स्वर्लोकस्थानीय स्वयम्भू सत्यलोक है । इधर ६ नों लोक विचाली हैं, अस्थिर हैं, परिभ्रमणशील हैं । सातवाँ सत्यस्वयम्भू अविचाली है, एक स्थान पर स्थिररूप प्रतिष्ठित है । अपने अन्तरिक्ष ( भुवर्लोक ) के साथ पृथिवी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगा रही है । सान्तरिक्ष पृथिवी को अपने उदर में ( महिमामण्डल में ) प्रतिष्ठित किए हुए अपने अन्तरिक्ष ( महर्लोक ) के साथ स्वर्लोकाधिष्ठाता सूर्य परमेष्ठी के चारों ओर परिक्रमा लगा रहा है । सान्तरिक्ष सूर्य्य को अपने उदर में प्रतिष्ठित किए हुए अपने अन्तरिक्ष ( तपोलोक ) के साथ जनल्लोकाधिष्ठाता परमेष्ठी सत्यस्व-यम्भूके चारों ओर परिक्रमा लगा रहा है । इन ६ त्रों रजों को स्वोदर में प्रतिष्ठित रखने वाले, अपनी प्राणशक्ति से ६ ओं का विधारण करने वाले स्वयम्भू इनके भार से कभी खिन्न नहीं होते । षड्जोधि-ष्ठाता, ' परोरजा ' नाम से प्रसिद्ध इसी स्वयम्भूव सत्य तत्त्व का निरूपण करते हुए वेद भगवान् कहते हैं-[ १५१ ]
पृष्ठ 159
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत्
श्रचिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्वान् ।
वि यस्तस्तम्भ षळिमा रजांसि अजस्य रूपे किमपि स्विदेकम ॥ १ ॥
तिस्रो मातृस्त्रीन् पितृन् बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति ।
मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वमिदं वाचमविश्वमिन्वाम् ॥ २ ॥
- ऋक्सं ० १ । १६४ । ६ मं ० १० । सत्यलोकाधिष्ठात्री, किंवा सर्वलोकाधिष्ठात्री उक्त स्वायम्भुवी शक्ति का १ - नियति- २ - विष्टम्भम-३ - उपलब्धि, भेद से तीन प्रकार से विकास होता है । ये ही तीनों विज्ञानभाषानुसार स्वयम्भू के मनोता कहलाये हैं । अव्यक्त स्वयम्भू की दृष्टि से तीनों मनोता एकरूप हैं, अव्यक्तात्मरूप हैं एवं परस्पर की अपेक्षा से तीनों सर्वथा पृथक् कर्म्मा, पृथक् धर्मा हैं । इन्हीं गुणभूत अवयवों के सम्बन्ध से एक ही स्वायम्भुव श्रव्यक्तात्मा के ' अन्तर्यामी, सूत्रात्मा, वेदात्मा ' ये तीन विवर्त हो जाते हैं । इन तीनों में वेदा-त्मा मकार स्थानीय हैं, सूत्रात्मा उकार स्थानीय है, अन्तर्य्यामी प्रकार स्थानीय है । तीनों खण्डों में समान रूप से व्याप्त श्रखण्ड अव्यक्त अर्द्ध मात्रा - स्थानीय है । समष्टि " श्रोङ्कार " है । जिस प्रकार सर्वतः पाणिपाद षोडशीपुरुष प्रणवमूर्ति है, एवमेव यह वृत्तौजा अव्यक्तात्मा भी प्रणवमूत्ति ही है - " यदेवेह तद-मुत्र । " इसके तीनों विवर्त्तो में से पहले नियति विवर्त की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । सूर्य्य - चन्द्रमा - नक्षत्र - ग्रह - पृथिवी - प्रादि आधिदैविक पदार्थों, पुरुष - पशु - पक्षी - कृमी - कीटादि चेतना पदार्थों, प्रोपधि - वनस्पति- पुष्प - पल्लव - वल्लरी - प्रादि अर्द्धचेतन पदार्थों, सुवर्ण रजत - ताम्र-सीसक - लौह - पापाण- प्रादि प्रचेतन पदार्थों के स्वभाव वैचित्र्य पर जब नियतिर्वभरणः प्रन्तर्यामी हमारी दृष्टि जाती है, तो हमें आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है । चेतना-र्द्धचेतनाचेतन तत्तत् पदार्थों का निर्माण बड़े ही विचित्र शिल्प ( कारी -गरी ) से हुआ है । ऐसा विदित होता है कि, मानों कोई चतुर शिल्पी बड़ी ही सावधानी से इन सब पदार्थों का निर्माण कर रहा हो । स्थान स्थान पर किसी अलौकिक शिल्पी के बुद्धि वैभव का विकास प्रतीत हो रहा है । सब काम नपा तुला, कहीं अणुमात्र भी अव्यवस्था नहीं । एक शरीर की रचना पर ध्यान दीजिए । मस्तक - चक्षुः - नासिका - श्रोत्र - उदर - मुख - पाद - अंगुली -नख- केश - लोम प्रादि प्रत्येक अव-यव यथास्थान प्रतिष्ठित हैं । क्या बिना किसी चेतन - देवता के इस प्रकार का शिल्प सम्भव है? कदापि नहीं । एक मृग के उन दो शृङ्गों ( सींगों ) की उस विचित्रता को देख कर कहना पड़ता है कि, यह कृति किसी उत्कृष्ट देवता की प्रेरणा से सम्बन्ध रखती है । दोनो सींग जहां से निकले हैं, वहाँ दोनों का समा-नान्तर, समान स्वरूप । दोनों ऊपर की ओर गए हैं, तो समानान्तर से, समान रूप से । एक वृक्ष के पर्वो को देखिए । मूल - शाखा - पल्लव- पुष्प - फल - प्रादि प्रत्येक पर्व में प्रदद्भुत कारीगरी । पानी को श्राप जब कभी जिस स्थान पर भी डालेंगे, वह सदा नीचे की ओर ही बहेगा । भला सोचिए तो सही, इस जड़ पानी को किस ने सिखलाया कि, तू नीचे की ओर ही वहना । कैसा नियत धर्म है । अग्नि सदा ऊपर [ १५२ ]
पृष्ठ 160
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् की ओर ही जाता है । वायु सदा तिर्य्यक् ही चलता है । चन्द्रमा कभी दक्षवृत्त को नहीं छोड़ता । पृथिवी कभी क्रान्तिवृत्त से च्युत नहीं होती । सूर्य्यं कभी अहोरात्र मदा का अतिक्रमण नहीं करते । पर्जन्य देवता कभी अपने दृष्टि कर्म से उपरत नहीं होते । विष कभी अपनी मादकता नहीं छोड़ता । ग्रहादि कभी अपने मार्गों से विचलित नहीं होते । प्राप्तकाल में मृत्यु देवता कभी किसी पर उदारता नहीं दिख-लाते । साराँश में ( एकमात्र ग्रसत्य संहित मनुष्य को छोड़कर ) कोई भी इस नियत मर्य्यादा का उल्ल-धन नहीं करता, " मनुष्या एवैकेऽतिक्रामन्ति शत ० २ । ४ । २ । ६ ) | तभी शास्त्रोपदेश एकमात्र मनुष्य के लिए ही उपयुक्त बना है । इतर सारे प्राणी स्वतएवं अपनी नियतचर्य्या से बद्ध हैं । इनके लिए शास्त्रोपदेश अनपेक्षित है । हम बुमुक्षा शान्त करने के लिए अन्न खाते हैं । यहां तक तो हमारा ( जीवात्मा का ) व्यापार है । परन्तु शारीराग्नि में हुत अन्न किस क्रम से रसामृगादि धातु रूपों में परि-णत जाता है? यह श्रविज्ञात है । शरीर उदाहरण मात्र है । विश्व के प्रत्येक पदार्थ किसी हृद्यशा-सनकर्ता की प्रेरणा से प्रेरित होकर स्व - स्व कम्मों में संलग्न रहते हैं । इच्छा होने पर हम शन पानादि करते हैं । परन्तु इच्छा क्यों हुई? इस प्रश्न का समाधान वही शास्ता है । क्या मजाल, जो कोई इसका शासन न माने । विश्व के बड़े से बड़े शक्तिशाली पदार्थ, छोटे से छोटे पदार्थ, सब इसके भय से कम्पित् होते हुए अपने अपने आधिकारिक कम्मों में प्रवृत्त हो रहे हैं । इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ से ग्रविदित, किन्तु उसके हृदय में प्रतिष्ठित वह शास्ता तत्त्व ही " प्रन्तस्तिष्ठन् सन् नियमति " इस निर्वचन से ' अन्तर्यामी ' नाम से प्रसिद्ध है । यही नियत भावों का प्रेरक बनता हुमा, नियत भाव की चर्चा का अधिष्ठाता बनता हुआ नियतिब्रह्म नियतिचरब्रह्म " इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । यही नियतिवर शब्द निरुक्त क्रमानुसार बिगड़ते बिगड़ते आज के जगर में ' नेचर ' ( Nature ) नामों से प्रसिद्ध हो रहा है । दर्शन भाषा में यही तत्त्व ' स्वभाव - प्रकृति ' आदि नामों से व्यवहृत हुआ है । ब्रह्मदण्डात्मक इसी अन्तर्य्यामी का दिग्दर्शन
कराती हुई श्रुति कहती है-यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्रारण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ १ ॥
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्य्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ २ ॥ ( कठोपनिषत् ६ । २ । ३ )
" यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तर:, यं पृथिवी न वेद, यग्य पृथिवी-शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति, स तऽश्रात्मान्तर्याम्यमृतः । योऽ-प्सु तिष्ठन् ० x x, योऽग्नौ तिष्ठन् ० xx ' य श्राकाशे तिष्ठन् Xx यो वायौ तिष्ठन् ० X x, य आदित्ये तिष्ठन् ० X Xx, यश्चन्द्रतारके-तिष्ठन् ० , यो दिक्षु तिष्ठन् ० x x, यो विद्युति तिष्ठन् ० Xx [ १५३ ]