Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 161–170

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 161–170

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् यः स्तनयिस्नौ तिष्ठन् ० x x, यः सर्वेषु लोकेषु तिष्ठन् ० x x, यः सर्वेषु वेदेषु तिष्ठन् ० x x, यः सर्वेषु यज्ञेषु तिष्ठन् ० , यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् ० × ×, यः प्राणेषु, वाचि, चक्षुषि, श्रोत्रे, मनसि त्वचि तेजसि, तमसि, रेतसि श्रात्मनि तिष्ठन् ० x x । प्रदृष्टो द्रष्टा, अश्रुतः श्रोता, मतो मन्ता, अविज्ञातो विज्ञाता, एष तात्मा अन्तर्यामी अमृतः । अतोऽन्यदार्त्तम् । ततो होद्दालक प्रारुणिरूपरराम ". -शत ० १४ । ६ । ७ वह घट घट व्यापक है, सब के हृदय में प्रतिष्ठित है, सब का शास्ता है, नियतभाव का प्रवर्तक है, सब कुछ उसी से उत्पन्न हुआ है । सम्पूर्ण प्रपञ्च प्रकृति ( नेचर ) रूप उस तत्त्व की लीला मात्र है " यह है ग्रव्यक्त अन्तर्य्यामी का तटस्थ लक्षण । सुप्रसिद्ध सर्वानुभूः – सर्वग - प्रात्मतत्त्व ( षोडशीपुरुष ) के स्वरूप से सर्वथा अपरिचित वर्त्तमानजगत् ( पाश्चात्य जगत् ) प्रत्येक विषय में नेचर की ही घोषणा किया करता है । अमुक काम ऐसे क्यों हुआ?, इसका ऐसा स्वरूप क्यों है?, इत्यादि प्रश्नों के समाधान के लिए " नेचर ने ऐसा किया है, नेचर में ऐसा हुआ है, सब काम नेचर करती है " यह कहा जाता है । यदि विज्ञानगर्विष्ठ इन नेचरभक्तों से पूँछा जाता है कि कृपा कर बतलाइये! आपकी इस नेचर का क्या स्वरूप है? तो इस प्रश्न के लिए ये निरुत्तर हो जाते हैं । इधर प्रार्ष महर्षियों के तटस्थ एवं स्वरूप लक्षण का भी विचार कर लीजिए । प्रत्येक पदार्थ की स्वरूप रक्षा स्वरूप निर्माण अन्नादान पर निर्भर है । जड़ हो, अथवा चेतन, सब को अन्न खाने की आवश्यकता होती है । " यत् सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत् पिता " ( वृ ० आ ० उ ० १, ५, १ ) इस सिद्धान्त के अनुसार यह अन्न आत्म - प्राण- भूतादि विविध भोक्ताओं के भेद से १ - ज्ञात, २- कर्म्म, ३ - आकाश ( शब्द ), ४- वायु ( श्वास - प्रश्वास ), ५ - तेज ( ऊष्मा ), ६- जल ७ - पृथिवी ( औषधि - वनस्पति ), भेद से सात भागों में विभक्त है । एक मकान, जिसे श्राप प्रथा जड़ समझ रहे हैं, विश्वास कीजिए, वह भी वायु - प्रकाश, आदि अन्नों की अपेक्षा रखता है । शिल्पियों द्वारा निम्मित नवीन भवन समय समय पर जीर्ण होता रहता है । इस की रक्षा के लिए मर-म्मत करवानी पड़ती है । भूतभाग ज्यों का त्यों रहता है, प्राणभाग निकल जाता है, उसी की चिकित्सा करनी पड़ती है । मकान का जीर्ण होना ही यह बतला रहा है कि, अवश्य ही इसमें से कोई तत्त्वविशेष निकल गया है । इसी प्रकार यदि किसी भवन को चारों ओर से बन्द कर दिया जाता है, तो वायु - प्रका-शादि ग्रन्नों के बन्द हो जाने से साल दो साल में वह जीर्णवत् हो जाता है । स्थान स्थान से चूना गिरने लगता है । कारण यही है कि, प्राण अपने गतिस्वभाव से निकलता रहता है, उधर वायु- प्रकाशादि के अवरुद्ध हो जाने से प्राण का आगमन अवरुद्ध हो जाता है । फलतः वह निष्प्राण हो जाता है । जड़ शब्द से पदार्थों की जब यह दशा है, तो चेतना पदार्थों के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है | अन्न खाना व्यवहृत यह पहला साधारण धर्म है । इसके साथ साथ भुक्तान्न खर्च भी होता रहता । यदि ऐसा न हो, तो एक बार, अथवा दो तीन बार अन्न खा लेने के पश्चात् पुनः अन्नादान की आवश्यकता ही न पड़े । अन्न-विसर्गलक्षण यही दूसरा धर्म है । प्रदान और विसर्ग, दोनों की श्राधारभूमि एक तीसरा स्थिर तत्त्व [ १५४ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् और मानना पड़ता है | अन्न आता रहता है और जाता रहता है । फिर भी पदार्थ स्थिर सा प्रतीत होता है । अवश्य ही स्थिरता सम्पादक, आगतिगति की मूलप्रतिष्ठारूप यह तत्त्व दोनों से पृथक् है । एक सरो-वर में पानी प्राता रहता है एवं जाता रहता है । परन्तु सरोवर स्थिर है । बिना इस स्थिर प्रायतन के पानी का प्राना भी में ग्रन्नादान अन्नवि-सम्भव न था, जाना भी सम्भव न था । इस प्रकार वस्तुमात्र, सर्ग, दोनों की स्थिति का ग्राधार, इन तीन भावों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । अवश्य ही प्रत्येक पदार्थ में एक शक्ति ऐसी है, जो निरन्तर अपने आकर्षण सूत्र से अन्न खँचा करती है । साथ ही में एक शक्ति आगत अन्न का विक्षेपण किया करती है । एक तटस्थ शक्ति के प्राधार पर इन दोनों प्रतिद्वन्द्विनी शक्तियों का समन्वय होता रहता है । शक्तित्त्वेन यह शक्तित्रयी समान है, परन्तु उपाधिभेद से, दूसरे शब्दों में पदार्थों के स्वरूप भेद से वह ग्रनन्त रूपों में परिणत हो रही है । उदाहरण के लिए अग्नि और जल को लीजिए । एक ही शक्ति दोनों में है । परन्तु अग्निसम्बन्ध से अग्नि की शक्ति दहन करने का सामर्थ्य रखती है, पानी की शक्ति शान्ति की अधिष्ठात्री बन रही है - ' शान्तिराप: ' । यहाँ दोनों एक दूसरे की प्रतिद्वन्द्वि-नयाँ बन रहीं हैं । अग्नि का नियत भाव इसे ऊपर ले जा रहा है, पानी की नियति इसे नीचे लेजाती है । वायुकी नियति वायु को तिर्य्यग्गामी बना रही है । कहना यही है कि, पदार्थ भेद से नियतिभाव भी बदल रहा है । उक्त तीनों शक्तियाँ प्रत्येक पदार्थ के केन्द्र में रहती हैं । ग्राप अपने चर्म्मचक्षु से नामरूपकम्र्म्मा-त्मक पदार्थ को देख सकते हैं । पदार्थ ही व्यक्त है, हृदयस्था वह शक्तित्रयी अव्यक्त है, चर्म्मचक्षु से परे है । इनमें प्रदान शक्ति का आहरण सम्बन्ध से " हु " ग्रक्षर से, विसर्ग शक्ति का खण्डनरूप विनाशस-म्बन्ध से “ द ” अक्षर से एवं दोनों की आधारभूता नियमन शक्ति का नियमन भाव के कारण " यम् " अक्षर से अभिनय किया जाता । तीनों की समष्टि ही " हृदयम् " है । संकेत विद्या के अनुसार ' ह ' को विष्णु, ' द ' को इन्द्र, ' यम् ' को ब्रह्मा कहा जाता । हृ - द - य - ये तीनों विष्णु - इन्द्र - ब्रह्मा - के वाचक हैं । यह ' हृ - द - य विष्णु इन्द्र - ब्रह्मा ) प्रत्येक पदार्थ के हृदय में ( केन्द्र में ) प्रतिष्ठित रहती है, केन्द्र के विच-लित हो जाने से पदार्थ सत्ता उच्छिन्न हो जाती है । केन्द्रस्थान एक सूक्ष्मतम एवं वृहत्तम निराकार प्राय-तन है । इसमें वही हृदय नाम की शक्ति प्रतिष्ठित हो रही है । हृदय में ' हृ - द - य ' प्रतिष्ठित हो रहा है ' यह कम आश्चर्य नहीं है - ' हृदि श्रयं हृदयम् ' । पिण्ड प्रजा का सञ्चालन इसी हृद्य प्रजापति पर निर्भर है | वह स्वयं अजायमान है, सब कुछ लूनातन्तु ( मकड़ी के जाल ) की तरह उसीसे उत्पन्न हुआ है । इसी गर्भी अव्यक्त प्रजापति का दिग्दर्शन कराती हुई यजुःश्रुति कहती है—

" प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।

तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥

— यजुः स ० ३१ । १६ ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र, तीनों अक्षर की कलाएँ हैं । प्रतएव उक्त हृदय प्रजापति को ' अक्षर ' कहा जाता है । यह अक्षरत्रयी ही तो अन्तर्य्यामी है । यही तो शास्ता है । पाठकों को स्मरण होगा कि, पूर्व की अमृतात्मोपनिषत् में हमने पञ्चकल अक्षर को बोडशीपुरुष नाम से प्रसिद्ध अमृतात्मा के अन्तर्गत माना है । वह अमृतात्मा विश्वव्यापक है । इधर स्वयम्भू नामक यह अव्यक्तात्मा सखण्ड है, विश्व का एक अव-[ १५५ ]

पृष्ठ 163

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् यव है । ऐसी स्थिति में प्रश्न उपस्थित हो सकता है कि, अक्षर तो अखण्ड श्रात्मा का अनुग्राहक है, फिर इस सखण्ड प्राकृतात्मारूप अव्यक्त को अक्षर कैसे मानो गया?, इस प्रश्न के समाधान में हम यही कहेंगे कि, विश्व के पर्वरूप स्व ० पर ० सू ० च ० पृ ०, इन पाँच खण्डों में उस पोडशोपुरुष का भोग होता है । षोडशी का मव्यय भाग तो पाँच पर्वों में समान रूप से व्याप्त है । परन्तु सूर्य्य से ऊपर अमृत प्रकृति प्रधान अक्षर का प्रभुत्त्व है, सूर्य्य से नीचे मत्यं प्रकृतिप्रधान प्रात्मक्षर का प्रभुत्त्व है । मध्यस्थ सूर्य में दोनों की प्रधानता है । अक्षर की पराप्रकृति कहा गया है एवं आत्मक्षर को मपराप्रकृति कहा गया है । सूर्य्य से ऊपर स्वयम्भू और परमेष्ठी में पराप्रकृतिरूप अमृताक्षर का एवं सूर्य्य से नीचे पृथिवी और चन्द्रमा में अपराप्रकृतिरूप मर्थ्यात्मक्षर का साम्राज्य है । अतएव ऊपर के दोनों लोकी परब्रह्म, नीचे के दोनों लोकी प्रपरब्रह्म नाम से प्रसिद्ध होते हैं । ' परं चापरं च ब्रह्म योङ्कारः ' के अनुसार समष्टि प्रोङ्कार है । इस ब्रोङ्कार में अव्यय अद्धं मात्रस्थानीय है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है— परब्रह्म १ – १ – प्रारणमयः स्वयम्भूः ( २ – २ – प्रापोमयः परमेष्ठी - परापरप्रकृतिरक्षरः प्रकार: परापरब्रह्म २ ३–१ - वाङ्मयः सूर्यः - परापरप्रकृतिरक्षरात्मक्षरः—— → उकारः - * अपरब्रह्म ( ४ - १ – अन्नमयश्चन्द्रमाः - प्रपरा प्रकृतिरात्मक्षरः— → मकारः -२ -अन्नादमयी पृथिवी पुरुषोऽव्ययः पचपर्वव्यापकः ' अर्द्धमात्रा ' एतद्वै सत्यकाम! परं चापरं च ब्रह्म, यदोङ्कारः अक्षर का मौलिक रूप ब्रह्मा है । इसका व्यक्तरूप मर्त्य ब्रह्मा है । विकार स्वरूप प्राण है । इस प्रकार ब्रह्ममूर्ति अमृताक्षर ही अमृतब्रह्मा - मत्यं ब्रह्मा- प्राण- पञ्चीकृतप्राण- पञ्चपञ्चीकृतप्राण, इस क्रम से स्वयम्भू रूप में परिणत हुआ है । स्वयम्भू में अव्यक्त अक्षर की ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीनों कलाओं का हृदयरूप से विकास हुआ है । अतः इस स्वयम्भू को अवश्य ही अव्यक्त अमृतात्मा इत्यादि नामों से व्यव-हृत किया जा सकता है । इसी अक्षर विकास दृष्टि को लक्ष्य में रख कर सखण्ड इस प्राकृतात्मा को हम ' अक्षर ' शब्द से व्यवहृत कर सकते हैं । इसी अक्षर दृष्टि से वाजिश्रुति ने इसके लिए - " एव ते प्रामा अन्तर्यामी प्रमृतः ” यह कहा है । हृदयरूप होने से ही यह सत्य है । सत्य ही तो नियति का प्रधान स्वरूप है । यथा - तथारूप याथातथ्य ही सत्यभाव है, यही नियतभाव है, यही नियति है, यही विधि ( प्राणमूर्ति [ १५६ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् ब्रह्मा ) का अटल विधान है । वह भयातीत किन्तु भय का प्रवर्त्तक है । पाँचों विश्व - पर्वों में सर्वप्रतिष्ठा-रूप सत्य व्यक्त ही ग्रनार्त है, तदतिरिक्त सारे रज सभय ( विचाली ), अतएव आर्त हैं -- श्रतोऽन्य दार्तम् ' । इसी हृदयमूत्ति, त्रयक्षरात्मक, अक्षर प्रधान, प्राणप्रकृतिक, सत्यप्रजापति ( नियतिः प्रजापति-अन्तर्य्यामी ) के स्वरूप को लक्ष्य में रख कर बृहदारण्यक श्रुति कहती है-" एष प्रजापतिर्यद्धृदयम् । एतद् ब्रह्म एतत् सर्वम् । तदेतत् त्र्यक्षरं — ' हृ - द - यम् ' इति । ' हृ ' - इत्येकमक्षरम् । श्रभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद । ' यम् ' इत्येकमक्षरम् । एति स्वगं लोकं, य एवं वेद । तद्वैतदेतदेव तदास सत्यमेव । स यो हैवमेतन्महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्म ेति, जयती-माँल्लोकान् ” ( शत ० १४ का ० ८ । ४–५ ) । यद्यपि अन्तर्यामी स्वयम्भू प्रधान होता हुआ प्राणप्रधान है, उधर अक्षर ब्रह्माप्रधान है । परन्तु वही यहां प्राणरूप से विकसित हुआ है, अतएव श्रुति अक्षर को भी शास्ता - अन्तर्य्यामी कहने में संकोच नहीं करती । जैसा कि निम्नलिखित वचत से स्पष्ट हो जाता है— " एतद्वै तदक्षरं गागि ब्राह्मणाः अभिवदन्ति ० ००० एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गागि द्यावापृथिवी विधृते तिष्ठतः, सूर्य्याचन्द्रमसौ विधुते ० । अथ य एतदक्षरं गागि विदित्त्वास्माल्लोकात् प्रेति, स ब्राह्मणः " - शत ० १४ क ०६८ निष्कर्ष यही हुआ कि, ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्रानुग्रह से त्रयक्षर बनता हुग्रा वही स्वायम्भुव ग्रव्यक्तात्मा हृदयरूप से सब पदार्थों के केन्द्र में प्रतिष्ठित होता हुआ नियति रूप से सब का सञ्चालन कर रहा है । अन्तर्यामी नाम से प्रसिद्ध अव्यक्तात्मा का यही प्रथम विवर्त्त है । इसी व्यक्तात्मा का दूसरा विवर्त है विष्टम्भन लक्षरण सूत्रात्मा । उपर्युक्त बृहदारण्यक श्रुति ने अक्षरमूर्ति अव्यक्तात्मा को ' सूर्य्याचन्द्रमसौ विधृते तिष्ठतः ' इत्यादि रूप से ऋत सत्य लक्षरण - सूत्रात्मा विधर्त्ता कहा है । अव्यक्त अन्तर्यामी स्वयम्भू विश्व के यच्चयावत् पदार्थों का सञ्चालन कर रहा है । किस सम्बन्ध से, किस शक्ति के द्वारा? इस प्रश्न का समाधान यही सूत्रात्मा है । विश्व में १ ऋत २ - सत्य - ३ ऋतसत्य, भेद से पदार्थ तीन भागों में विभक्त हैं | सहृदय ( सकेन्द्र ) सशरीरी पदार्थ सत्य हैं, अहृदय अशरीरी वायु श्रादि पदार्थ ऋत हैं एवं अहृदय सशरीरी पदार्थ ऋतसत्य हैं । वायु और पानी का न कोई शरीर है, न केन्द्र है । पानी, अथवा वायु जिस श्रायतन में अवरुद्ध कर दिया जाता है, उनका वैसा ही शरीर हो जाता है । इसी प्रकार केन्द्राभाव [ १५७ ]

पृष्ठ 165

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत भी प्रत्यक्ष सिद्ध है । सकेन्द्र वस्तु के एक श्रवयव ग्रहण से सम्पूर्ण वस्तु गृहीत हो जाती है । पानी को प्राप जहाँ से उठावेंगे, प्रांशिक रूप से वह वहीं से उठ ग्रावेगा । कारण, यहाँ केन्द्राभाव है । मेघ में शरीर है, परन्तु हृदय नहीं है । इस हृदयबन्धन के प्रभाव से ही वायु के प्रबल प्राघात से मेघ खण्ड खण्ड होकर इतस्ततः विकीर्ण हो जाता है । ग्रग्निप्रधान पदार्थ सहृदयशरीरी बनते हुए सत्य कहलाते हैं । सोमप्रधान हृदय अशरीरी रहते हुए ऋत कहलाते हैं । ग्रग्निसोमप्रधान पदार्थ सोमसम्बन्ध से अहृदय, अग्नि-सत्ता से सशरीरी बनते हुए उभयधर्मों से ग्राक्रान्त रहते हुए ' ऋतसत्य ' कहलाते हैं । इन तीनों के सञ्चा-लन के लिए उस अव्यक्त में सूत्रबल का आविर्भाव होता है । पूर्व के प्रकरण में १६ वलकोशों में एक ' सूत्र ' नाम के बलकोश का भी दिग्दर्शन कराया गया है । यह एक प्रकार का प्राबिल है । प्राण को विघर्त्ता कहा जाता है । श्लथ परमाणुत्रों को संगठित करने वाला प्रारणवल ही सूत्र है । इसी सूत्रबल के सम्बन्ध से प्रत्येक वस्तु के सर्वथा विभक्त परमाणु एक सूत्र में संगठित प्रतीत होते हैं । ग्रक्षर प्राणमूर्ति कहा गया है । इसी सूत्रभाव के कारण, दूसरे शब्दों में परमाणुकूट ( समूह ) पर प्रतिष्ठित रहने के कारण इसे ' कूटस्थ ' कहा जाता है - " कूटस्थोऽक्षर उच्यते " । यही वलविशेष सूत्रशक्ति है । ६ ओं लोकों से पराः-परावत ( दूर से दूर ) रहने वाले अव्यक्त स्वयम्भू ने इसी सूत्ररूप पाश से सब को बद्ध कर रखा है । हृदय में वह अन्तर्य्यामी रूप से प्रतिष्ठित रहता है एवं पिण्ड में, साथ ही में जिनमें हृदय नहीं है - ऐसे ऋतपदार्थों में सूत्ररूप से प्रतिष्ठित रहता है । यह सूत्र ऋत - सत्य - ऋत सत्य भेद से तीन भागों में विभक्त है । पूर्वोक्त लक्षण आग्नेय प्रधान सत्यपदार्थों का सञ्चालन करने वाला सत्यसूत्र है । सोमप्रधान ऋतप-दार्थों का शास्ता ऋतसूत्र है । उभयप्रधान ऋतसत्य पदार्थों का सञ्चालक ऋतसत्यसूत्र है । विश्व में जितने भी सत्यपदार्थ हैं, उन सब की योनि यही अव्यक्त सत्य हैं । अतएव इसे ' सत्यस्य सत्यम् ' कहा जाता है । यह सत्यस्य सत्यं प्राणवायु स्वरूप है । सूत्रात्मक इमी अव्यक्त का निरूपण करती हुई ब्राह्मण श्रुति कहती है-" वायुर्वे गौतम तत् सूत्रम् । वायुना ( प्राणेन ) वै गौतम सूत्रेरण - ग्रयं च लोकः, परश्च लोकः, सर्वाणि च भूतानि संरब्धानि भवन्ति । तस्माद्वं गौतम पुरुषं प्रेतमाहुर्व्यत्र सिषतास्याङ्गानि । वायुना हि गौतम तत् सूत्रेण संरब्धानि भवन्ति " इति । — शत ० १४ का ० । ६ । ७ । इस प्रकार ऋतसत्य सूत्र द्वारा वह अव्यक्त सब में व्याप्त हो रहा है । नामरूपात्मक, अतएव सत्य शब्द से व्यवहृत विश्व इसी सूत्र द्वारा उस सत्यस्यसत्य स्वयम्भू के साथ अपना सम्बन्ध स्थापित किये हुए है । श्रव्यक्तात्मा के इसी सूत्रात्मविवर्त का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् वादरायण

कहते हैं-सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनि निहितं च सत्ये ।

सत्यस्य सत्यं ऋतसत्यनेत्रे ( सूत्रे ), सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥

- श्रीमद्भागवत [ १५८ ]

पृष्ठ 166

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् अव्यक्तात्मा का तीसरा विवर्त है उपलब्धिलक्षरण - वेदात्मा । नियतिः सत्यरूप अन्तर्यामी से ही इस वेदात्मा का विकास होता है । अन्तर्यामी में ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र, ये उपलब्धिलक्षण - वेदात्मा तीन कलाएँ बतलाई गई हैं । साथ ही में यह भी कहा गया है कि, स्थि-तिलक्षणा ब्रह्मप्रतिष्ठा पर आगति - गतिलक्षण विष्णु - इन्द्र का प्रादान विसर्गात्मक व्यापार होता रहता है । यह विरुद्ध व्यापार ही इन्द्राविष्णु की प्रतिस्पर्द्धा है । इस प्रतिस्पर्द्धा की आधारभूमि है - प्रापः वाक् - अन्न - अन्नाद | विकारक्षर की - प्राण - प्रापः - वाक् – अन्न - अन्नाद, ये पाँच कलाएँ बतलाइ गई हैं । इन पाँचों के साथ क्रमशः ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र - सोम - अग्नि, इस पाँच अक्षरों का सम्बन्ध बतलाया गया है । इसमें प्राणकला का स्थितिलक्षण ब्रह्मा में अन्तर्भाव है । यही प्रधान अन्त-य्र्यामी है । शेष चारों कलाओं की अग्नि - सोम समन्वय से तीन ही कलाएँ रह जातीं हैं । अपकला का प्रधान सम्वन्ध विष्णु के साथ है वाक् कलाका प्रधान सम्बन्ध इन्द्र कला के साथ है एवं अन्नगर्भित ग्रन्ना-दकला का प्रधान सम्बन्ध सोमगर्भित अग्नि कला के साथ है । श्रापः - वाक् - अन्नान्नाद, तीनों के अधिष्ठाता क्रमशः विष्णु - इन्द्र - सोमाग्नि ये तीन अक्षर हैं । इन तीनों में स्पर्द्धा के आधारभूत तीनों का ग्रापः शब्द से ग्रहण कर लिया जाता है । कारण अब गर्भ में वाक् - अन्नाद का समावेश है । इस अस्पर्द्धा से लोक-वेद - वाक् ये तीन भाव उत्पन्न होते हैं । विष्णु सम्बन्ध से अन् द्वारा लोक का विकास होता है— “ लोकाः सुप्रतिष्ठिताः । इन्द्र सम्बन्ध से बाग्द्वारा वेदतत्त्व का विकास होता है - ' वाग्विवृताश्च वेदा: ', एवं इन्द्रसोमगर्भित अग्नि- सम्बन्ध से वागन्नगर्भित अन्नाद से वागलक्षण वषट्कार का उदय होता है-' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् । इस प्रकार प्रकृतिभेद से लोकसाहस्री - वेदसाहस्री - वाक्साहस्री, इन तीन साहस्रियों का जन्म हो जाता है । इसी साहस्री - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर मन्त्रश्रुति

कहती है-उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे, न पराजिज्ञ कतरश्च नैनोः ।

इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम् ॥

- ऋक्सं ०६, ६ ९, ८ । किं तत् सहस्रमिति? - इमे लोकाः, इमे वेदाः, थो वागिति ब्रूयात् ” ( ऐत ० ब्रा ० ६ । १५ । ) उक्त तीनों साहस्रियों में से प्रकृत में प्रधानरूप से वेदसाहस्त्री ही अपेक्षित है । इसके ऋक् - साम-यजुः ये तीन पर्व हैं । तीनों में यजुः ही मुख्य है, यही पुरुष है । ऋक्साम वयोनाध ( छन्द- प्रायतन-सीमा ) मात्रा हैं । यजुः में भी गतिप्रकृतिक ( यत् ) रूप प्राणतत्त्व ही मुख्य है । आत्मविद्याशास्त्र का ही नाम वेदशास्त्र है । ग्रात्मतत्त्व ज्ञानशक्तिमयमन, क्रियाशक्तिममप्राण, अर्थशक्तिमयीवाक् के भेद से त्रिकल है | आत्मकलाभेद से वेदशास्त्र भी तीन भागों में विभक्त हो रहा है । मनोविद्याशास्त्र आरण्यकोपनि -पत् - शास्त्र है, प्राणविद्याशास्त्र त्रयी - ( संहिता ) - शास्त्र है एवं वाग्विद्याशास्त्र ब्राह्मणशास्त्र है । त्रयी की मूलप्रतिष्ठारूप यजुःप्राण से ( जो कि मौलिकप्राण श्रसत्, ऋषि, आदि नामों से प्रसिद्ध है ) ही क्रमश: [ १५६ ]

पृष्ठ 167

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अव्यक्तान्म विज्ञानोपनिषत् पितर- प्रसुर देवता- गन्धर्व - पशु - पुरुष ( बैश्वानर ), आदि इतर सम्पूर्ण प्राणदेवताओं की सृष्टि हुई है । सृष्ट-ब्रह्म ( विश्व ) का मूल प्रारम्भक वेदप्रारण ही है, जैसा कि भगवान् मनु कहते हैं--सर्वेषां तुस नामानि कर्माणि च पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ १ ॥ ( १ । २१ )

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्मतः ॥ २ ॥ ( १२ । ८ )

षोडशीपुरुष बेदरूप में परिणत होकर ही उपलब्ध होता है । अतएव उपलब्धि को ही ब्रह्म कहा जाता है । अमृतात्मा सच्चिदानन्दलक्षण है । अतः वेद को भी सच्चिदानन्द से ही उपलब्धि होती है । " विन्दति इति वेदः " " देत्ति इति वेदः " " विद्यते इति वेदः " यही वेदशब्द का निर्वाचन है । ' श्रमुक पदार्थ है " यह भी ' विद्यते ' के अनुसार वेद है । यह निर्वचन सत्ताप्रधान है । सत्ताश्रम नामरूप कर्म्ममय भौतिक पदार्थ हो सत् है प्रमुक वस्तु है, उसे देवदत्त जानता है, यह दूसरा पर्व है । यह भी ' वेति ' के अनुसार बेद है । यह निर्वचन चेतनाप्रधान है | चेतनाय भौतिक भाव ही चित् है । जो वस्तु है, जिसे देवदत्त जानता है, उसे वह प्राप्त कर लेता है । यह भी ' विन्वति ' के अनुसार वेद है । यह निर्वचन रस-प्रधान है । वस्तु की प्राप्ति से आत्मा में वृप्तिलक्षण आनन्द का उदय होता है । अतएव तीसरा पर्व आनन्दरूप है, यही प्रिय है है । इस प्रकार ' प्रस्ति भाति प्रिय ' रूप से वेदमय बनकर अमृतात्मा सर्वत्र व्याप्त हो रहा है | वेद ही उसका विश्वरूप है । ग्रतएव उसे वेदमूत्ति - वेद कवेद्य, इत्यादि नामों से ०५ व-हृत किया जाता है । अस्ति ही पदार्थ की उपलब्धि है । उपलब्ध पदार्थ ही रस है । यही वेद है । दूसरे शब्दों में उपलब्धि ही वेद है । जिसका वेद नहीं, उसकी उपलब्धि नहीं । ग्रापको विश्वास करना चाहिए कि, विश्व में उत्पन्न होने वाले पदार्थों का विकास वेदपूर्वक ही हुआ है । पहले वेद का विकास होता है, अनन्तर वेदप्रतिष्ठा पर दूसरे शब्दों में बेदगर्भ में तत्तद् भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं । वेदतत्त्व भौतिक पदार्थ से पहले विकसित होता है । अतएव इसे ' प्रथमज ' कहा गया है । ऋषिप्राणात्मक ( यजुःश्रारणात्मक सप्तपुरुष पुरुषात्मक, यजुः प्रधान इसी प्रथमज ब्रह्म ( त्रयीब्रह्म ) का निरूपण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— ' ततो ब्रह्म व प्रथममसृज्यत त्रय्येव विद्या । तस्मादाहुर्ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रथमजम्। " ( घात०६, १, १, १० ) " त्रय्यां वाव विद्यायां सर्वाणि भूतानि-( अपश्यत् ) " ( शत ० १०, ४, २, २२ ) जब तक वेद है, तभी तक बेदमूलक संसार है । " सवं वेदात् प्रसिद्धयति " " वेदोऽखिलं धर्म्मभूतम् ” इत्यादि स्मात्तं वचत भी इसी सिद्धान्त का स्पष्टीकरण कर रहे हैं । [ १६० ]

पृष्ठ 168

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १ अव्यक्तात्मा विष्णुरापोमयः ब्रह्माप्रारणमयः विष्विन्द्रगभितो ब्रह्मा ब्रह्मन्द्रभितो विष्णुः १ हृ ३ - यम् ग्रन्तर्यामी सूत्रात्मा २ १ [ १६१ ] अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् इन्द्रोवाङ्मयः विष्णुब्रह्मगर्भित इन्द्रः २ - द वेदात्मा ३ प्रकारान्तर से अव्यक्तात्मविवर्त्त पर दृष्टि डालिए । प्राणमय ब्रह्मा, आपोमय विष्णु, वाङ्मय इन्द्र, इन तीनों की समष्टि को हमने अन्तर्यामी कहा है । इस अन्तर्य्यामी के ही स्वभक्तियों की प्रधा-नता- अप्रधानता से तीन विवर्त्त हो जाते हैं । इन्द्र - विष्णुगर्भित प्राणमूत्ति ब्रह्मात्मक वही अव्यक्तात्मा अन्तर्यामी है । ब्रह्मा कभी केन्द्र नहीं छोड़ते । वे सदा ग्रन्तः प्रविष्ट ही रहते हैं । केन्द्र में स्थिर रूप से प्रतिष्ठित प्राणमूर्ति ब्रह्मा इन्द्राविष्णु के आधार पर प्राणसूत्र द्वारा सत्र का नियमन करते हुए ' अन्तर्यामी ' नाम से प्रसिद्ध हो रहे हैं । ब्रह्मन्द्रगर्भित आपोमय विष्ण्वात्मक वही अव्यक्तात्मा सूत्रात्मा है । श्रव्यक्तात्मा जिस तत्त्व के आधार पर सातों लोकों में व्याप्त रहता है, उसी को सूत्रात्मा कहा गया है । वह व्याप्तिसाधन सत्यमूर्ति श्रप्तत्त्व, किंवा आपोमय विष्णु ही है । वेवेष्टीव हि यज्ञम् इत्यादि निर्वचनों के अनुसार विष्णु को इस प्राप्ति ( व्याप्ति ) लक्षण अप् सम्बन्ध से ही व्यापक माना गया है । श्रतएव च ब्राह्मणश्रुति ने आप: का-‘ यदाप्नोत्तस्मादापः ’ – ‘ यदवृणोत् तस्माद्वा: ' ( शत ० ६ । १ । १६ ) यह निर्बंचन किया है । श्रापोमय विष्णु ही शनायासूत्र का अधिष्ठाता वनता हुआ सर्वत्र व्याप्त हो रहा है । इसी विष्णुसूत्र से वह अव्यक्त सूत्रात्मा बना हुआ है । विष्णुब्रह्मगर्भित वाङ्मय इन्द्रात्मक वही अव्यक्तात्मा वेदात्मा है । अव्यक्तात्मा जिस रूप से विश्वस्वरूप में परिणत होता है. वह यही वाग् विवर्तरूप इन्द्रात्मक वेद है । यजुः प्रारण चितिधर्म्म के कारण

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ग्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिपत् आगे जाकर सप्तपुरुषात्मक बन जाता है । इस सप्तपुरुपसंस्था के मध्य का मुख्य प्रारण ही - " योऽयं मध्यत ऐन्ध " ( शत ० १४ । ६ । ११ । २ ) के अनुसार " इन्ध " कहलाया है । इन्धो हवं तविन्द्र इत्याचक्षते परो-क्षम् के अनुसार परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में इन्ध ही ' इन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रकार वाङ्मय इन्द्र की मजुरूपता भलीभाँति सिद्ध हो जाती है । वयरूप यजुमूर्ति यह इन्द्र वयोनाध - ( छन्द ) -रूप ऋक्साम के आधार पर प्रतिष्ठित रहता है । इसी आधार पर - ' ऋक्सामे वै इन्द्रस्य हरी ' ( ऐ ० ग्रा०-२ । २४ ) यह कहा जाता । यही इन्द्र अग्निसोमसम्बन्ध से वेदप्रवर्त्तक बनता हुआ आगे जाकर भूत-पति- भूतभावना - भूतयोनि - भूतनाथ, इत्यादि नामों से प्रसिद्ध हो जाता है । इस प्रकार एक ही अव्य-क्तात्मा अपेक्षा भेद से कथित तीन स्वरूपों में परिणत होता हुआ सर्वकर्मा ( विश्वकर्म्मा ) बन रहा है | ऋक्संहिता ने सर्वकर्म्मा इस अव्यक्तात्मा को " विश्वकर्मा " नाम से ही व्यवहृत किया है । वेदरूप से वही श्रव्यक्तात्मा सब कुछ वन रहा है, नियतिरूप से वही सब का सञ्चालक बन रहा है एवं सूत्ररूप से वह सब के साथ, सब इसके साथ सम्बद्ध हो रहे हैं । यही पारस्परिक सम्बन्ध ' सर्वहुत ' यज्ञ है । इसको लक्ष्य में रख कर - ' श्रात्मनि प्रजातिमधत्त ' यह कहा जाता है । उक्त तीनों ग्रव्यक्तात्मविवत्तों में क्रमशः ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र की प्रधानता के साथ इतर दोनों की भी सत्ता रहती है । फलतः प्रत्येक में सत्यस्वरूपसम्पादक हृदयभाव की सत्ता सिद्ध हो जाती है । सत्य-मूर्ति श्रव्यक्तात्मा इन्हीं तीन पृथक् पृथक् सत्यविवर्त्ती के कारण त्रिसत्य वन त्रिः सत्य प्रजापति जाता है । इसी ग्राधार पर " त्रिः सत्या वै देवाः " यह अनुगम वचन प्रतिष्ठित है यही त्रिसत्यमूर्ति श्रतएव पुराणों में त्रिमूर्ति नाम से प्रसिद्ध अव्यक्तात्मा स्वयम्भू सातों लोकों की मूलप्रतिष्ठा है अतएव लोकान्तर्गत सम्पूर्ण वाग्व्यवहार त्रित्व मर्यादा से ही श्राक्रान्त हैं । उधर मनः प्राणवाङ्मय पुरुषात्मा ( मृतात्मा ) त्रिसत्य था, इधर ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र॑मय अव्यक्तात्मा भी ग्र ० सू ० वे ० भेद से त्रिसत्य है । स्वत्रकृत्यपेक्षया जहाँ ब्रह्मा प्राणमय किंवा प्राणप्रकृतिक है, वहाँ आत्मकलापेक्षया ब्रह्मा मनोमय है । स्वप्र ० इन्द्र जहाँ वाक्प्रकृतिक है, आत्मापेक्षया वही प्राण-मय है | स्वप्र ० विष्णु जहाँ ग्रापोमय है, आत्मापेक्षया वही वाङ्मय है । जिस प्रकार मनः- प्राण - चाक्, तीनों त्रिवृद्भावयुक्त होने से प्रत्येक त्रिमूर्ति हैं, एवमेव ब्रह्मादि तीनों ( प्रत्येक ) त्रिमूर्ति हैं - ' नमस्त्रि-मूर्तये तुभ्यं प्राक्सृष्टेः केवलात्मने ' । सृष्टि से पहले मनःप्राणवाक् प्रधाना बनती हुई यह त्रिमूर्ति ग्रात्म-रूपा है । सृष्ट्य ुन्मुख बन कर यही प्रकृतिरूपा है, और इस तरह प्रकृति पुरुष का नित्य तादात्म्य सिद्ध हो रहा है । हमारा मूलप्रभव उक्त लक्षण त्रिसत्य श्रव्यक्तात्मा है । दूसरे शब्दों में हमारी मूलप्रकृति की पूर्णता तीनों सत्यों पर अवलम्बित है, अतएव लौकिक - वैदिक सभी त्रिवप्रवर्तक अव्यक्तात्मा ऐहिक पारमार्थिक कम्र्मों की पूर्णता त्रित्त्व भाव पर ही समाप्त होती है । श्राचमन - प्राणायाम स्वस्तिपाठ यादि शास्त्रीय कम्मों का त्रित्त्व सब को विदित है । एवमेव लौकिक व्यवहार भी बिना तीन के प्रतिष्ठित माने जाते | न्यायालयों ( कोर्टो ) में वादी प्रतिवादी ( मुद्दई - मुद्दालेह ) को वहाँ का भृत्य ( चपरासी ) तीन ही वार आवाज लगाता [ १६२. ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अकार: पु– रु -- + षः ओङ्कारः सृष्टिसाक्षी - श्रमृतात्मा - केवलात्मा श्रर्द्धमात्रा -कृ-त्रिवृतः प्राणः उकारः श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् -ति: त्रिवृता वाक् मकारः विष्णुः — इन्द्रः – ब्रह्मा ब्रह्मा – विष्णुः – इन्द्र: ब्रह्मा — इन्द्रः — विष्णः हृ द यम् यम् ह द यम् द ह हृदयम् हृदयम् हृदयम् सत्यम् मनोमयः - प्रकारः ( अन्तर्यामी ) ब्रह्मा सत्यात्मा १ सत्यम् प्राणमयः - उकारः ( वेदात्मा ) इन्द्रः सत्यात्मा २ ( सूत्रात्मा ) विष्णुः सत्यात्मा ३ सत्यम् वाङमय: - मकारः श्रव्यक्तात्मा स्वयम्भूः सृष्टिरूपः + + विश्वात्म अर्द्ध मात्रा ग्रोङ्कारः [ १६३ ]