श्रीगणेशाय नमः।
Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 171–180
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 171–180
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्म विज्ञानोपनिषत् है, यह कौन नहीं जनता । बैंकों के सिपाही, कौन है?, यह तीन बार पूछेगें, तीसरी बार भी श्रागन्तुक ने उत्तर न दिया तो फायर हो जायगा । ऐसा क्यों? इसका उत्तर वर्तमान विज्ञान भले ही न दे सके, परन्तु वेदमहर्षि ग्रात्मवित्त्ववाद को ग्रागे करते हुए हमारा सर्वात्मना सन्तोष कर रहे हैं । इस अव्यक्तात्मा का प्रभव ( उत्पत्तिस्थान ) पोडशीपुरुषावच्छिन्न, प्राणप्रधान, अपोरुषेय वेदपु रञ्जन है । प्रतिष्ठा ( स्थितिस्थान ) स्वायम्भुव हृदयबिन्दु है । योनि ( ग्रागमनद्वार ) ब्रह्म ( प्रात्मक्षर ) है । श्राशय ( व्याप्तिस्थान ) सम्पूर्ण विश्व है । पचपर्वात्मक विश्व में सर्वत्र व्याप्त प्रलय एवं खण्डप्रलया-धिष्ठाता विश्वकर्मा यही स्वयम्भू प्रजापति बत्शेश्वर, किंवा बल्शात्मक विश्व की अपेक्षा से ' विश्वेश्वर ' नाम से प्रसिद्ध है । यह सत्यमूर्ति परोरजा भगवान् पूर्व कथनानुसार नित्य अशान्ति - गर्भित नित्य शान्ति-मूर्ति है । श्रतएव इसे ' शान्तात्मा ' भी कहा जाता है । इस प्राणदेव का उदयकाल ही सृष्टिकाल है, अस्त-काल ही प्रलयकाल है । सृष्टिकाल इसका महरागम है, प्रलयकाल रात्र्यागम है । इसी अभिप्राय से भगवान् मनु कहते हैं— यदा स देवो जागत तदेदं चेष्टते जगत् । यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सवं निमीलति ॥ ( मनु: १ । ५२ ) अंशरूप से प्रध्यात्मजगत् में प्रविष्ट यही शान्तात्मा इतर सम्पूर्ण खण्डात्माओं की प्रतिष्ठा बना हुआ है । प्राज्ञखण्डात्मा विज्ञान में अनुस्यूत है । विज्ञानात्मा महानात्मा के प्राधार पर प्रतिष्ठित है । सर्वाधार यही शान्तात्मा है । इस प्राध्यात्मिक शान्तात्मा का प्रभव बल्शात्मक विश्वव्यापक स्वयम्भू है, प्रतिष्ठा हृदय है, योनि परमाकाश नाम से प्रसिद्ध परमव्योम है, प्राशय सर्वाङ्गशरीर है । अन्तर्य्यामी-सूत्रात्मा - वेदात्मा, भेदभिन्न त्रिकल यह श्रव्यक्तात्मा ही सम्पूर्ण विश्व का कारण है, यह प्राणप्रधान है । प्राण असङ्ग तत्त्व है, अतएव कारण होते हुए भी यह मंधुनीसृष्टि की अपेक्षा से शास्त्रों में अकारण नाम से प्रसिद्ध है । ' महतः परमव्यक्तम् ' ( कठोप ० १ । ३ । ११ । ) इस सिद्धान्त के अनुसार अव्यक्त स्व-यम्भू ही व्यक्ताव्यक्त पारमेष्ठ्य महद का कारण है, जैसा कि महदात्मप्रकरण में स्पष्ट होने वाला हम यह कह आए हैं कि, वेद भाग ही इस अव्यक्तात्मा की ( भौतिक विश्व की अपेक्षा से ) मुख्य प्रतिष्ठा है । इस वेदत्रयी में भी यजुर्वेद ही मुख्य है । स्थितिगत्यात्मक यजुर्वेद ही पुरुष है । यही भौतिकी चित्सृष्टि का मूलाधार है । जूरूप स्थितितत्त्व की अपेक्षा से यह श्रव्यक्तात्मा का प्रकृतिभाव अव्यक्त तत्त्व सर्वथा कम्पनरहित है, अनेजत् है । यत् - रूप गतितत्त्व की अपेक्षा से यह मन से भी जवीय ( शीघ्रगामी ) है । अपने इन्हीं दोनों विरुद्ध रूपों से यज्जूमूर्ति परोक्ष भाषानुसार, यजुर्मूर्ति यह अव्यक्त समष्टि -- व्यष्टिरूप से सर्वत्र व्याप्त * वेद नाम के पुरञ्जन से प्रारम्भ में प्रव्यक्तात्मा का विकास बतलाया है । यह वेद पुरुषरूप होने से अपौरूषेय कहलाता है, एवं पूर्व में अव्यक्त के आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाले जिस वेदात्मा का दिग्दर्शन कराया गया है, वह पुरुषगर्भ में उत्पन्न होने के कारण पौरुषेय है । यह वेद उस मूलवेद से भिन्न पदार्थ है । [ १६४ [
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् हो रहा है । प्रत्येक पदार्थ पर दृष्टि डालिए, वह आपको ठहरता हुआ चलता दिखाई देगा । बनना स्थि-तिमूलक है, बिगड़ना गतिमूलक है । प्रत्येक पदार्थ बनता हुआ बिगड़ रहा है । समुद्रतरङ्गों की भाँति प्रत्येक पदार्थ उच्चावचभावों से नित्य प्राक्रान्त है । यही अव्यक्तात्मा के साक्षात् दर्शन हैं । भाविर्भाव-काल स्थितिकाल है, तिरोभावकाल गतिकाल है । ग्राविर्भावकाल में वह अव्यक्त व्यक्त है, तिरोभावकाल में वही व्यक्त अव्यक्त है । आविर्भाव वस्तु का व्यक्तभाव है, व्यक्तता ही व्यक्तिभाव है, व्यक्तिभाव ही तत्तद् पदार्थों की ग्रभिव्यक्ति ( प्राकट्य ) है । एक एक स्वतन्त्र अभिव्यक्ति है । इस प्रकार अभिव्यक्तिल-क्षण इस व्यक्तिभाव की प्रतिष्ठारूप यही एकमात्र अव्यक्तात्मा बन रहा है । अमृतात्मा की भाँति इस अव्यक्तात्मा का भी कम्मंभोग से कोई सम्बन्ध नहीं है । शरीर में रहता हुआ भी, शरीरपरिच्छिन्न होता हुआ भी असङ्गः प्राणमय होने से यह आकाशात्मा कर्म्मलेप से सर्वथा प्रसङ्ग है । यहां भूतज्योति का अभाव है, केवल ज्ञानज्योति ( श्रमृतात्मज्योति ) ही इसकी ग्राधारभूमि है । यह असङ्ग अव्यक्त तत्त्व ही विश्व की बहिरङ्ग प्रकृति है । इस खण्ड तत्त्व के साथ भी सर्वव्यापक, श्रात्मयोनिस्वरूप उस ग्रखण्ड षोडशी ग्रात्मा का सम्बन्ध होता है । अतएव क्षररूप, अतएव प्रकृतिरूप होते हुए भी इसे ' अव्यक्तात्मा ' इस प्रकार आत्मशब्द से व्यवहृत किया जाता है । खण्डात्मानों में यह पहला ' प्राकृतात्मा ' है । इसका प्रधान कर्म्म है- सर्वथा विभिन्न संस्था वाले शरीर को एकसूत्र में बद्ध रखना, शारीर धातुओं का अव्यक्तरूप से निर्मारण करना एवं उनका नियतरूप से यथास्थान सन्निवेश करना, नवीन नवीन भूतों को उत्पन्न करते रहना, पूर्व पूर्व भूतों का विलयत करते रहना । प्रसङ्गोपात्त यह और जान लीजिए कि, जिस प्रकार ग्रध्यात्मसंस्था में यह ' श्रव्यक्तात्मा शान्तात्मा ' यादि नामों से प्रसिद्ध है । एवमेव ग्राधिभौ-तिक संस्था में यही " गुहा ' नाम से प्रसिद्ध है । एक ही तत्त्व अधिदैवत - प्रध्यात्म - प्रधिभूत भेद से त्रिसं-स्था बनता हुआ ' १ स्वयम्भू २ श्रव्यक्त- ३ गुहा इन तीन नामों से प्रसिद्ध हो रहा है । अव्यक्तसंस्था में भूत-प्राण - भेद से दो तत्त्व नित्य प्रतिष्ठित रहते हैं । बलभाग का विकास भूत है, रसभाग का विकास प्राण है । प्राणापेक्षया वह स्वयम्भू कहलाया है, भूतापेक्षया वही आकाश कहलाया है । इसी आकाश को ' वाब्रह्म ' कहते हैं । इसी " सत्यावाक् " दूसरे शब्दों में अनादिनिधना नित्या वेदवाक् के ( स्वयम्भू के ) उदर में सम्पूर्ण विश्व समा रहा है, जैसा कि ' प्रथो वागेवेदं सर्वम् ' " वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता " इत्यादि श्रौत वचनों से स्पष्ट है । पोडशी पुरुष विश्वात्मा है । इसी विश्वात्मा से सर्वप्रथम आकाशात्म अव्यक्त स्वयम्भू का प्रादुर्भाव हुआ है । इसी श्रमिप्राय से " तस्माद्वा एतस्मादात्मन श्राकाशः सम्भूतः " ( तै ० उप ० ) यह कहा गया है । आत्मोत्क्रान्ति के अनन्तर यह अव्यक्तात्मा सर्वव्यापक प्राणमूर्ति आकाशात्मा में यहां का यहीं विलीन हो जाता है । सङ्गत होने से कर्म्मबन्धन से सर्वथा पृथक् रहता हुआ परोरजाप्राण मूत्ति यह अन्य-क्तात्मा लोकान्तर में गमन नहीं करता घट के छूटते ही घटाकाश जैसे लोकान्तर में गमन न कर वहीं परमाकाश में लीन हो जाता है, एवमेव शरीरनिधन के श्रव्यवहितोत्तरकाल में ही यह स्वप्रभव व्यापक परमाकाश में लीन हो जाता पर नवीन - नवीन अव्यक्त ( आकाश ) प्रकरणोपसंहार है । लोकान्तर में गमन करने वाले कर्मात्मा के साथ बिन्दु बिन्दु का सम्बन्ध होता रहता । इसी अव्यक्त विलयन को लक्ष्य में रख कर " न तस्य प्रारणा उत्क्रामन्ति, [ १६५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् इहैव समवलीयन्ते " यह कहा गया है । श्राद्धकर्मादि का इसके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । आप अपने कर्म से न इस का उपकार कर सकते, न अपकार । त्रिकल अव्यक्तात्मा का यही १ संक्षिप्त स्वरूप निद-र्शन है । अब क्रमप्राप्त यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् की ओर पाठकों का ध्यान प्राकर्षित किया जाता है । तदित्थं – वेद — सूत्र — नियतिर्भेदेन त्रिकलोऽयं स्वयम्भूरव्यक्तात्मा व्याख्यातो द्रष्टव्यः समाप्ता चेयं श्राद्ध विज्ञानान्तर्गत- ' प्रात्मविज्ञानोपनिषदि प्रथमायां प्रथम खण्डात्मिकामां ' अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् ' द्वितीया * इस विषय का विशद विवेचन ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्य द्वितीय खण्ड में देखना चाहिए । [ १६६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ( ३ ) ( १ - श्रधिदेवतम् -- परमेष्ठी ( पूर्णमदः ) २ - श्रध्यात्मम् -- अहरहर्यज्ञः ( पूर्णमिदम् ) यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् ( २ ) अथ " यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् " तृतीया यज्ञात्मा - प्राकृतात्मा परमेष्ठी ( २ ) १ - ज्ञानानुगतश्चिदंशः ( चिदात्मा ) २ - प्रग्नीषोमयोश्चिदंशभोगः ( यज्ञात्मा )
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १ ॥
यज्ञार्थात कर्म्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म्मबन्धनः ।
तदर्थं कर्म्म कौन्तेय! मुक्तसङ्गः समाचर ॥२ ॥
- श्रीमद्भगवद्गीता ३ अ ० श्लो ० १०, ६, यज्ञात्मस्वरूपपरिचयः - ( अग्नीषोममयः शिपिविष्टात्मा )
यो यज्ञो विश्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः ।
इमे वयन्ति पितरो य प्रययुः प्र वयाप वयेत्यासते तते ॥१ ॥
[ १६७ ] ऋक्सं ० १०।१३०।१
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अग्नेर मृत निष्पत्तिरमृतेनाग्निरेधते । | १६८ यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत - ऋक्सं ० १०।१३०।२ - ऋक्सं ० १०।७१।३ —ऋक्सं ] ० १।८३।५ - वृहज्जाबालोपनिषत् २।४ - बु ० जा ० उ ० २१५ - ऋक्सं ० १६३ । ६ — ऋक्सं १ ९ १६४ / ६ - बु ० जा ० उ ० २।१५
पुमाँ एनं तनुत उत्कृरणत्ति पुमान्वि तत्ने अधिनाके अस्मिन् ।
इमे मयूखा उप सेदुरू सदः सामानि चक्रुस्तसराप्योतवे ॥२ ॥
सहस्तोमाः सहछन्दस प्रावृतः सहप्रमा ऋषयः सप्त दैव्याः ।
पूर्वेषां पन्थामनुश्य धोरा अन्वालेभिरे रथ्यो न रश्मीन् ॥३ ॥
- ऋक्सं ० ] १०।१३०।७
यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम् ।
तामाभृत्या व्यदधुः पुरुत्रा तां सप्त रेभा अभि सं नवन्ते ॥ ४ ।
यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन आजनि ।
आ गा ग्राजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे ॥ ५ ॥
अतएव हविः क्लृप्त - ' मग्नीषोमात्मकं जगत् ' ॥६ ॥
ऊर्ध्वशक्तिमयः सोम अधः शक्तिमयोऽनलः ।
ताभ्यां सम्पुटितस्तस्माच्छश्वद्विश्वमिदं जगत् ॥७ ॥
अन्यं दिवो मातरिश्वा जभारामथ्नादन्यं परिश्येनो श्रद्रेः ।
अग्नीषोमा ब्रह्मणा वावृधानोरु यज्ञाय चक्रथुरु लोकम् ॥ ८ ॥
वधैर्दुः साँप दृढयो जहि दूरे वा ये ग्रन्ति वा केचिदत्रिरणः ।
अथा यज्ञाय गृरणते सुगं कृध्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ॥९ ॥
यो वेद गहनं गुह्यं पावनं च ततोदितम् ।
अग्नीषोमपुटं कृत्वा न स भूयोऽभिजायते ॥ १० ॥
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यज्ञात्मब्रह्मणे नमः यज्ञात्मा - परमेष्ठी ' यज्ञोब्रह्म ' त्युपास्व यज्ञो देवानां प्रत्येति सुम्नमादित्यासो भवता मृळयन्तः । श्रावोऽर्वाची सुमतिर्ववृत्यादंहोश्चिद्या वरिवोवित्तरासत् ॥ ऋक्सं ० १ । १०७ । १ । तस्माद्यज्ञात् सर्गहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥ ऋक्सं ० १० । ६० । ६ । यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ ऋक्सं ० १०। ६०। १६ यश्माते न सिद्धयति यज्ञो विपश्चितश्चन । स धीनां योगमिन्वति ॥ ऋक्सं ० ] १ । १८ । ७ । - णमय अव्यक्तमूत्ति स्वयम्भू प्रजापति ( परमप्रजापति ) के ' साहस्रीमण्डल ' ( महिमामण्डल, प्राविभूतमण्डल, वैश्वरूप्य श्रादि नामों से व्यवहृत वषट्कारमण्डल ) में मृग्वङ्गिरोमूत्ति प्रापो-मय परमेष्ठीतत्त्व प्रतिष्ठित है । जिस प्रकार अव्यक्त स्वयम्भू के अधिष्ठाता पारमेष्ठ्यतत्त्व परिचय प्रधान देवता प्राणप्रकृतिक ' ब्रह्मा ' हैं, एवमेव व्यक्ताव्यक्त मूर्ति यज्ञात्मक परमेष्ठी के अधिष्ठाता प्रधान देवता प्रप्प्रकृतिक ' विष्णु ' हैं । विष्णु ही यज्ञ के अन्यतम स्वरूप समर्पक माने गए हैं । इसी आधार पर विष्णुतत्त्व का ' वेवेष्टीव हि यज्ञम् ' यह निर्व-चन किया जाता है । कठोपनिषच्छु ति के अनुसार यह पारमेष्ठ्य प्रात्मतत्त्व महानात्मा नाम से भी व्यव -हृत हुआ है, जैसा कि निम्नलिखित वचन से प्रमाणित है-[ १६६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिपत्
यच्छे- १ द्वाङ, मनसी - २ प्राज्ञ - स्तद्यच्छेज् - ३ ज्ञान प्रात्मनि ।
ज्ञान - ४ मात्मनि महति - नियच्छेत् तद्यच्छे -५ च्छान्त आत्मनि ॥
— कठोपनिषत् १ । ३ । १३ । हमारी अध्यात्मसंस्था में १ - शरीर, २ - प्राणात्मा, ३ - प्रज्ञानात्मा, ४ - विज्ञानात्मा, ५- महानात्मा, ६- शान्तात्मा ( अव्यक्तात्मा ) ये ६ विभाग माने गए हैं, शरीर के ग्राधार पर १ - इन्द्रियप्राण, २ - वाक्, ३ - इन्द्रिय- मन का अधिष्ठाता तथा ४ - प्राणात्मा ( कर्मात्मा - भोक्तात्मा ) श्रात्म सोपानपरम्परा प्रतिष्ठित हैं । इन चारों की समष्टि ' पार्थिव - प्रपञ्च ' है । पृथिवी से ऊपर चन्द्रमा है । इससे सर्वेन्द्रिय, अनिन्द्रिय, अतीन्द्रिय इत्यादि नामों से प्रसिद्ध प्रज्ञानात्मा ( मन ) का विकास होता है । चन्द्रमा से ऊपर सूर्य्य है । सूर्यांशभूत विज्ञानात्मलक्षण ज्ञान ही बुद्धि है । सूयं से ऊपर परमेष्ठी है । तदंश महानात्मा है । परमेष्ठी से ऊपर स्वयम्भू है । तदंश शान्तात्मा, किंवा अव्यक्तात्मा कहलाया है । अव्यक्त से परे उक्त पञ्च - प्राकृतात्मा धिष्ठाता षोडशीपुरुष है । श्रात्म-विवर्त्त की यही पराकाष्ठा है । इसीका स्पष्टीकरण करते हुए ऋषि कहते हैं-इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १-पुरुष: पोडशी ( अमृतात्मा ) १ - १ - पुरुषः षोडशी ( अमृतात्मा ) १-१-पुरुष: पोडशी ( अमृतात्मा ) २-३-४-५- ४- चन्द्रमाः ६-१ – स्वयम्भूः ( प्राणमयः ) २ - १ - अव्यक्तात्मा ( प्रा ० ) २ - १ -२– परमेष्ठी ( श्रापोमयः ) ३- २ - महानात्मा ( प्रा ० ) ३ – २ – ३ – सूर्य्यः ( वाङ्मय ) ४- ३ – विज्ञानात्मा ( वा ० ) ४- ३ – । ( अन्नमयः ५- ४ - प्रज्ञानात्मा ( ) श्र ० ) ५- ४-५ - महापृथिवी ( प्राणाग्नि ० ) ६- ५ - प्राणात्मा ( प्रा ० ) ६- ५ गुहा ( प्रा ० ) आपः ( ग्रा ० ) ज्योति: ( वा ० ) अमृतम् ( प्र ० ) रसः ( ग्रा ० ) -61 ७- १ - शरीरम् ( भू ० ) ७– १ – | १ - भूपिण्ड: ( भूताग्निमयः ) प्राधिदैविक प्रपञ्च १ प्राध्यात्मिकप्रपञ्च २ [ १७० पिण्डः ( भू ० ) श्राधिभौतिकप्रपञ्च ३
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड आधिदैविक प्रपञ्च आध्यात्मिकप्रपञ्च २ यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् १ १ २ २ ३ बशेश्वरो विश्वकर्मा प्रसंज्ञजीवाः श्रन्तः संज्ञजीवाः ससंज्ञजीवाः + + प्रकृतितन्त्रेश्वरः धातवः औषधिवनस्पतयः १ - स्वयम्भूः ( प्राणमयः ) १ -गुहा १- गुहा कृमिकीटपक्षि-पशुमनुष्याः १ - अव्यक्तात्मा अध्यात्मम् २- परमेष्ठी ( प्रापोमयः ) २- प्रापः २ - प्रापः २- महानात्मा ३- सूर्य्य: ( वाङ्मयः ) ३- ज्योतिः ३- ज्योतिः ३ - विज्ञानात्मा ४- चन्द्रमाः ( अन्नमयः ) ४ – अमृतम् ४- श्रमृतम् ४- प्रज्ञानात्मा X X -५ - सर्वज्ञः ( आदित्य मयः ) X X ( ५ - प्राज्ञः X X -५ - तैजसः ( वायुरसः ) ६ - हिरण्यगर्भः ( वायुमयः ) ६- तैजसः ५- वैश्वानरः ( ६ - वैश्वानर: ( अग्नि ० ) ७- विराट् ( श्रग्निमयः ) ( अग्निरस ) ८७ - वैश्वानरः ८- भूपिण्डः ( भूतमयः ) ६- पिण्ड: ७- पिण्डः ८- शरीरम् अष्टकलः प्रकृतितन्त्रेश्वरः षट्कलोपेता-असंज्ञजीवाः सप्तकलोपेता-अन्तः संज्ञजीवाः अष्टक लोपेताः-ससंज्ञजीवाः १ १ २ ३ पूर्णमदः मदः → तदमुत्र ( रसप्रधान संस्था ) [ १७१ ] पूर्णमिदम् देवेह-बलप्रधानसंस्था
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ( ० १ । ३ । १०-११ ) इन्द्रियार्थसमष्टिरूप, शरीरानुगृहीत प्राणात्मा पहला विवर्त है । इससे परे मन ( प्रज्ञानात्मा ) है, मन से परे बुद्धि ( विज्ञानात्मा ) है, बुद्धि से परे महानात्मा है, महान् से परे अव्यक्त है, अव्यक्त से परे पुरुष है । यही परपरायण है । श्राद्धकर्म के अतिरिक्त सर्वत्र इसी क्रम की प्रधानता समझनी चाहिए । अधि-दैवत - अध्यात्म - अधिभूत, तीनों संस्थानों में उक्त सभी ( ६ ) विवर्त्तो का भोग हो रहा है, जैसा कि पूर्व परिलेख से स्पष्ट हो जाता है-दर्शनशास्त्र ने प्रधानरूप से आधिदैविक ( ईश्वर ), को प्रधानता दी है । स्वयं उपनिषत् ने भी “ यदेवेह तदमुत्र " प्राध्यात्मिक ( जीव ) भेद से दो ही विवत्त पूर्णमदः पूर्णमिदम् " ( ई ० ) इत्यादि रूप से इह ( यहां ), प्रद: ( वह ), इदं ( यह ), ये दो ही विभाग माने हैं । ये ही दोनों श्रवः इदं विवर्त विभाग दर्शनों में ऐहिक - आमुष्मिक, नामों से व्यवहृत हुए प्रदर्शित आधिभौतिक पदार्थों को प्रसंज्ञजीव मानते हुए उनका प्राध्यात्मिक संस्था में ही अन्तर्भाव मान लिया गया है, जैसाकि कोष्ठक ( १७१ पृष्ठ ) से स्पष्ट हो जाता है । यहां पर प्रश्न उपस्थित होता है कि, उक्त आत्मविवर्त्ती में महानात्मा का परमेष्ठी से सम्बन्ध बतलाया गया है । साथ ही पूर्वोक्त कठश्रुति भी इसी अर्थ का समर्थन कर रही है । ऐसी स्थिति में महा-नात्मा को ( प्रकृत श्राद्धप्रकरण में ) चान्द्र बतलाना, साथ ही पारमेष्ठ्य ग्रात्मा यज्ञात्मस्वरूप समन्वय को ' यज्ञात्मा ' नाम से व्यवहृत कराना कैसे सङ्गत हो सकता है? । इस प्रश्न के उत्तर में अभी यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि, ईश्वरीय संस्था में चन्द्रमा और परमेष्ठी, दोनों सजातीय पर्व हैं । तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम श्रासीत् ( तै ० ब्रा ० १, -१, ३, १०, ) इस श्रोतसिद्धान्त के अनुसार पृथिवी के तृतीय द्युलोक स्थानीय परमेष्ठी में भी सोम है । दूसरे शब्दों में परमेष्ठी भी सोममय है, एवं – “ एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः " ( शब् १-६-४-५, ) के अनुसार भूपिण्ड के चारों ओर परिक्रमा लगाने वाला, पृथिवी का उपग्रहभूत अत्रिप्राणारब्ध प्रत्यक्ष दृष्ट चन्द्रमा भी सोममय ही है । यह सोमपिण्ड ( चन्द्र पिण्ड ) सौररश्मियों के सम्बन्ध से प्रकाशित हो रहा है । इसीलिए इसे चन्द्रमा ( चन्द्रिकायुक्त प्रकाशयुक्त ) कहा जाता है । विज्ञानभाषा में यही ' भास्व-रसोम ' नाम से प्रसिद्ध है । सूर्य्य के ऊपर प्रतिष्ठित रहने वाला भूतज्योति से संस्पृष्ट, किन्तु ज्ञान-* " नभोऽन्तरिक्षं गगनम् " इत्यादि के अनुसार सूर्य्य और पृथिवी का ( अन्तरिक्ष नाम का ) अन्त-राल प्रवेश पहला द्युलोक है, सूर्य्य दूसरा द्युलोक है, इस क्रम से परमेष्ठी तीसरा द्युलोक बन जाता है । पृथिवी से तीसरे इस द्युलोक में ( परमेष्ठी में ) सोम प्रतिष्ठित है । सुपर्णरूप में परिणत प्रष्टाक्षरा गायत्री इसी सोम का अपहरण करती है— जैसा कि " एतद्ध सौपर्णमाख्यानमाख्यानविद श्राचक्षते " इत्यादि रूप सुपर्णाख्यान से स्पष्ट है । [ १७२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् ज्योति का ग्राहक, अतएव ज्ञानज्योतिम्र्म्मय पारमेष्ठ्य सोम ' दिक्सोम ' नाम से प्रसिद्ध है । इन्द्रियविज्ञान के अनुसार चान्द्रसोम जहां मन का प्रारम्भक है, वहां दिक्सोम श्रोत्रेन्द्रिय का स्वरूप समर्पक माना गया है | ( देखिये ऐ ० उप ० २ - ४ ) चन्द्रमा प्रकाश का अधिष्ठाता है । दूसरे शब्दों में प्रकाशित सोम है । प्रकाश ही वस्तुरूपों का अधिष्ठाता है अतएव तद्रूपमन रूपों का ग्राहक बनता है । दिक्सोम ज्ञान का अधिष्ठाता बनता हुआ श्रोत्रेन्द्रियरूप में परिणत होकर शब्दज्ञान का अधिष्ठाता बनता है । शब्दश्रवण ज्ञानोदय का अन्यतम एवं प्रधानद्वार है । ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जो परा - पश्यन्ती - मध्यमा - वैखरी नाम के वाक्विवर्ती ( शब्दविवत्त ) में से किसी एक से सम्बन्ध न रखता हो । इसी अभिप्राय से सेतुकार कहते हैं— न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमारते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥ - भर्तृहरिप्रणीतवाक्यपदी । परमेष्ठी में केवल ज्ञानप्रकाश है, वहां सूर्य्य से सम्बन्ध रखने वाली भूतज्योति का प्रभाव है । अतएव तदंशभूत श्रोत्रनिष्ठ शाब्दज्ञान केवल ज्ञानप्रकाश का ही उत्तेजक बनता है । वहीं पारमेष्ठघ चिद्युक्त सोम प्रवर्ग्यविद्या के अनुसार अंशात्मना परमेष्ठी से प्रवृक्त ( पृथक् ) होकर सौर प्रकाश से भी युक्त हों जाता है । अतएव तदंशभूत मन चिन्मय सोम के सम्बन्ध से जहां विषयज्ञान का अधिष्ठाता बनता हैं, वहां यह भूतज्योति के प्रभाव से विषयरूपों का भी अनुग्राहक बन जाता है । वक्तव्य यही पर-कि, मेष्ठी एवं चन्द्रमा तात्त्विक दृष्टि से दोनों अभिन्न हैं, एक वस्तुतत्त्व ( सोम ) हैं । महत्तत्व का आगमन यद्यपि परमेष्ठी से ही होता हैं । परन्तु उसके ग्रागमन का द्वार चन्द्रमा ही है, जैसा कि आगे के महदात्म-प्रकरण में स्पष्ट हो जायगा । ग्रतः महानात्मा को चन्द्रमा की भी वस्तु मान लिया जाता है । साथ ही में प्रेतपितरों की ग्राधारभूमि चन्द्रमा है । पितरप्राणावच्छिन्न महत् का प्रधानरूप से चन्द्रमा के साथ ही सम्बन्ध है । इसलिए भी इस श्राद्धप्रकरण में हमने महानात्मा को चान्द्र माना है । रही श्रुतिविरोध की बात । इसका निराकरण भी किया जा सकता है । वही पारमेष्ठ्य महत् सोम चन्द्रमा का स्वरूप समर्पक है, अतः चन्द्रमा को भी महान् कहा गया है, जैसा कि निम्नलिखित वचन से स्पष्ट हो जाता है— " तमब्रवीत् – महादेवोऽसीति । तद्यत्तस्य तन्नामाकरोत् चन्द्रमास्तद्रूपम-भवत् । प्रजापतिर्वै चन्द्रमाः । प्रजापतिर्वै महान् देवः - ( शत ० ६ । १ । ३ । १ । ) परमेष्ठी यज्ञ का अधिष्ठाता है । यही महानात्मा है । अतएव इस यज्ञ को भी महान् कहा जा सकता है । उधर प्राधिदैविक यज्ञ की मूलप्रतिष्ठारूप चन्द्रमा भी यज्ञमूर्ति ही है । चन्द्रमा यज्ञ के ब्रह्मा माने गए हैं— “ ब्रह्मा कृष्णश्च नोऽवतु " ( यजुः २३ | १३ | ) " चन्द्रमा वै ब्रह्मा कृष्णः ” ( १३ । २ । ७। ७। ) । यज्ञमूत्ति सोममय परमेष्ठी महान् है, इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए निम्नलिखित श्रोत-वचन हमारे सामने आते हैं— [ १७३ ]