Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 181–190

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् १ - " स ( सोमः ) तायमानो जायते । स यज्जायते, तस्माद्यञ्जः । यञ्जो ह वै नामैतद्यज्ञ इति " ( शत ०३ । ६ । ४ । २३ ) २ – " यज्ञो वा ऋतस्य ( परमेष्ठिनः ) योनिः " ( शत ० १ । ३ । ४ । १६ ) ३ - " एष ह वै महान् देवो यद्यज्ञः " ( गो ० पू ० २ । १६ । ) इस प्रकार कहीं पारमेष्ठ्य यज्ञात्मक तत्त्व को महानात्मा कहना, कहीं चान्द्रतत्त्व को महानात्मा बतलाना उक्त प्रकरण से सर्वथा समन्वित हो जाता है । प्रकृत प्रकरण में यज्ञात्मदृष्टि से ही परमेष्ठी का उपबृंहरण अपेक्षित है । पूर्व के अव्यक्तात्मप्रकरण में वेद - सूत्र - अन्तर्य्यामी, भेद से श्रव्यक्तात्मा के तीन विवर्त्ती का दिग्दर्शन कराया गया है । वहीं प्रकरणोपसंहार में यह भी बतलाया गया है कि, हृत्प्रतिष्ठ ग्रन्तर्य्यामी ब्रह्मा - प्रधान है । यह आलम्बन है । सूत्ररूष से बाहर यज्ञात्मा के यज्ञ - चित् नामक दो विवर्त निकल कर सब को परस्पर में वद्ध रखने वाला सूत्रात्मा विष्णुप्रधान है, एवं वस्तुनों का आरम्भक वनने वाला वेदात्मा इन्द्रप्रधान है । ग्रव्यक्तावस्था में यही तीनों शान्तात्मा के स्वरूप सम्पादक रहते हैं एवं व्यक्ता-वस्था में ग्राकर ये ही तीनों यज्ञात्मा के प्रारम्भक बन जाते हैं । इस यज्ञात्मा के ही चित्सम्बन्ध से आगे जाकर १ - यज्ञात्मा, २ - चिदात्मा ये दो विवर्त्त हो जाते हैं । दोनों में से सर्वप्रथम यज्ञात्मा का ही संक्षिप्त निदर्शन कराया जाता है । प्रवपन - अन्नाद- अन्न, इन तीन तत्त्वों के संगतिकरण का ही नाम यज्ञ है । श्रावणन ' खं ब्रह्म ' है, अन्नाद ' रं ब्रह्म ' है, ग्रन्न ' कं ब्रह्म ' है । तीनों की समष्टि यज्ञमूत्ति ( विष्णुमूर्ति ) ' शं ब्रह्म ' है । जब तक त्रिकल यज्ञ स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक विश्व में शान्ति है । जिस समय प्रावपन - प्रन्नाद-अन्न का सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, यज्ञसंस्था उच्छिन्न हो यज्ञात्मक विष्णु का स्वरूप परिचय जाता है, अव्यवहितोत्तरकाल में ही विश्व अव्यक्तगर्भ में विलीन हो जाता है । इष्टप्राप्ति ही शभाव है । इधर ' सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । श्रनेन प्रसविष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक् ' इत्यादि स्मार्त वचन यज्ञ को ही इष्टकामधुक् ( यथेच्छफलावाप्तिसाधक ) बतलाती है । यज्ञ की उक्त तीनों कलाओं में से श्रावपन का अन्तर्यामी ब्रह्मा के साथ सम्बन्ध है । अन्नाद का वेदात्मा इन्द्र के साथ सम्बन्ध है, एवं ग्रन्न का सूत्रात्मा विष्णु के साथ सम्बन्ध है । विज्ञपाठकों को स्मरण होगा कि, अमृतात्मा का स्वरूप बतलाते हुए हमने अक्षर को गतिधर्म्मा बतलाया था । साथ ही में एक ही गतितत्त्व के स्थिति- विशुद्ध ग्रागति - विशुद्धगति-स्थिति - गर्भिता प्रागति- स्थितिगर्भिता गति ये पांच विवर्त बतलाते हुए इन्हीं पांचों विवर्त्तो को क्रमशः ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र - सोम - अग्नि - कहा था । यज्ञस्वरूप परिज्ञान के लिए पुनः एक वार इन्हीं अक्षरकलाओं पर ध्यान देना ग्रावश्यक होगा । विष्णुतत्त्व विशुद्ध रूप से जहां आगति है, वहां वही स्थितिगर्म में [ १७४ ]

पृष्ठ 182

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् प्रविष्ट होकर सोम बन रहा है । सोम संकोचधर्म्मा स्नेह तत्त्व है, दाह्यगुणक है, एवमेव इन्द्रत्तत्त्व विशु-रूप से जहां गति है, वहां वही स्थिति के गर्भ में प्रविष्ट होकर अग्नि बन रहा है । अग्नि विकासम तेज तत्त्व है, दाहकगुणक है । इन्द्रा - विष्णु एक युग्म है । अग्नीसोम एक युग्म है । विष्णु - सोम सजा-तीय हैं । इन्द्राग्नी सजातीय हैं, दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि, विष्णु ही विकासावस्था में ग्राकर सोम बना हुआ है, एवं इन्द्र ही विकासावस्था में ग्राकर अग्नि बना हुआ है । इस प्रकार ब्रह्मा-विष्णु सोम- इन्द्राग्नी ये तीन विभाग हो जाते हैं । विशुद्ध ब्रह्मा ( स्थिति ), विशुद्ध विष्णु ( विशुद्ध आगति ), विशुद्ध इन्द्र ( विशुद्ध गति ), इन तीनों का समुच्चय अव्यक्तात्मा हैं | यदि इनके साथ अग्निसोम का सम्बन्ध हो जाता है, दूसरे शब्दों में इन्द्रा विष्णु यदि अग्नीसोमरूप में परिणत हो जाते हैं, तो वही अव्यक्त ग्रग्नि - सोम के सम्बन्ध से व्यक्त विश्वरूप में परिणत होकर " यज्ञात्मा " नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । विशुद्धरूप से तीनों क्रमशः अन्तर्य्यामी - सूत्रात्मा - वेदात्मा हैं, यज्ञरूप से ये ही तीनों ग्रावपन - प्रश्न-ग्रन्नाद हैं । अग्नि अन्नाद है, अन्न सोम है । आवपन ग्राधारभूमि है, मूलप्रतिष्ठा है, खं ब्रह्म ( श्राकाश ) हैं । ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ( शत ० ६ । १ । १ । ८ ) के अनुसार ब्रह्मा वास्तव में श्रावपन है । यही ग्रन्त-र्य्यामी है । विष्णुसहचारी सोम अन्न है । अतएव विष्णु को सोमवंशी कहा जाता है, जैसा कि - " सोमो वैष्णवो राजा " ( शत ० १३ । ४ । ३ । ८ ) " यो वै विष्णुः सोमः सः ' ( शत ३ । ६ । ३ । १६ ) इत्यादि निगम वचनों से स्पष्ट है | विज्ञानदृष्ट्या सोम भिन्न है, विष्णु पृथक्, तत्त्व है । इस अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर सोम को विष्णु न कह कर वैष्णव ( विष्णुयुक्त ) कहा गया है । साथ ही में दोनों का तार-तम्य है । इस अभिप्राय से ‘ यो वै विष्णुः सोमः सः ' यह कह दिया गया है । यही सूत्रात्म - विवर्त है । विष्णु सूत्रात्मा है, किंवा सूत्रात्मा विष्णुप्रधान है । विष्णु ने जिस से सूत्र से सम्पूर्ण प्रजा पर अपना अधि-कार जमा रक्खा है, वह यही सोमान्नसूत्र है । सब अन्न से गृहीत हैं, अन्नाधीन हैं । ग्रतएव ग्रहोपनिषत् ने अन्न को ग्रह कहा है । जैसा कि श्रुति कहती है-" अन्नमेव ग्रहः । अन्नेन हीदं सर्व गृहीतम् । तस्माद्यावन्तो नोऽशनमश्-नन्ति ते नः सर्वे गृहीता भवन्ति । एषैव स्थिति । स य एष सोमग्रहः । अन्नं वा एष सः " ( शत ० ४ । ६ । ५ । ) इन्द्र सहचारी अग्नि ग्रन्नाद ( अन्न खाने वाला ) है । अतएव ' तहि हैष ( अग्नि:-): भवतीन्द्र: ' ( शत ० २ । ३ । २ । ११ । ) ' इन्द्राग्नी वा इदं सर्वम् ' ( शत ० ४ । २ । २ ५ १४ ) इत्यादिरूप से इन्द्राग्नी का साहचर्य्य बतलाया गया है । इन्द्रावच्छिन्न अन्नाद् अग्नि में विष्णु के अंशनाया - सूत्र से आक-र्पित सोमान्न प्राहुत होता है । इस ग्राहुति से ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र, तीनों अन्नादयुक्त, बनकर यज्ञस्वरूप में परिणत हो जाते हैं । अग्नि में सोम की ग्राहुति होना ही यज्ञ है, एवं यज्ञ ही प्रत्येक पदार्थ का जीवन है | ग्रावपनरूप खं ब्रह्मात्मक ब्रह्मतत्त्व पर प्रतिष्ठित अन्न सम्बन्ध से रममाण, ग्रतएव ' र ' ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध विवच्छिन्न अन्न सोम ग्राहुत होता रहता है, तभीतक शान्तिलक्षण, किंवा शं ब्रह्मलक्षण यज्ञात्मा स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है, यही निष्कर्ष है । यज्ञात्मा में ब्रह्मा - विष्णुसहचारी सोम, इन्द्रसहचारी [ १७५ ]

पृष्ठ 183

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् अग्नि, तीनों की, किंवा पाँचों कलायों की सत्ता है । ब्रह्मा यज्ञ के रक्षक । शेष चारों यज्ञात्मक हैं । अतएव इन्द्र - प्रग्नि- विष्णु - सोम, इन चारों को ही यज्ञ शब्द से व्यवहृत किया गया है, जैसा कि निम्न-लिखित निगमवचनों से स्पष्ट हो जाता है— १ – ' इन्द्रो यज्ञस्य नेता ' ( शत ० ४। १ । २ । १५ ) । २ —— तदाहुः किं देवत्यो यज्ञ इति? ऐन्द्र इति ब्रूयात् ' ( गो ० उ ० ३।१३ ) । ३ – ' ऐन्द्रो वै यज्ञः ' ( ऐ ० ब्रा ० ६ । ११ ) । १ – इन्द्र यज्ञः ४ – ' इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता ' ( शत ० १ । ' । १ । ३३ ) । ५- ' इन्द्रो यज्ञस्यात्मा इन्द्रो देवता ' शत ० ६ । ५ । ३३ ) । २ - श्रग्नियज्ञः १ - ' शिर एतद्यज्ञस्य यदग्निः, ( शत ० ६ । २ । ३ । ३१ ) । २ – ' अग्निवं यज्ञमुखम् ( तै ० ब्रा ० १ । ६ । १ । ८ ३ – ' एष वै यज्ञा यदग्निः ' ( शत ० २ । १ । ४ । १६ ) । ४ – ' अग्निरु वै यज्ञ: ' ( शतं ० ५ | २ | ३ | ६ ) । ५ – ' एष वै यज्ञस्य सुक्रतुर्यदग्निः ' शत ० १ । ४ । १ । ३५ ) । ३ – विष्णुयज्ञः १ – ' यो वै विष्णुः स यज्ञ: ' ( शत ० ५ । २ । ३ । ६ ) । २ - ' यज्ञो वै विष्णुः शिपिविष्ट: ' ( तां ० ब्रा ० ε । ७ । १० ) । ३ – ' यज्ञो विष्णुः स देवेभ्य इमां विक्रान्तिं विचक्रमे ' ( शत ० १ ९ ३० ) । ४ – ' यज्ञो व विष्णुः ' ( तां ० ε । ६ । १० ) । ५ – ' विष्णु वै यज्ञ: ' ( ऐ ० १ । १५ ) । [ १७६ ]

पृष्ठ 184

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् १ - स ( सोमः ) तायमानो जायते । स यत् जायते, तस्माद् यञ्जः । यञ्जो ह वै नामतैतद्यज्ञ इति ' ( शत ० ३ । ६ । ४ । २३ ) । २ - ' आहुतिहि यज्ञः ' ( शत ० ३ । १ । ४ । १ ) । ४ - सोमयज्ञः ३ – ' हवींषि ह वाऽश्रात्मा यज्ञस्य ' ( शत ० १।६ । ३ । ३ ९ ) । ४ – ' हवि देवानां सोम: ' ( शत ० ३ । ५ । ५ – ' सोमाहुतयो ह वाऽएता देवानाम् ' ( शत ० ३ । २ ) । ११ । ५ । ६ । ६ ) । ५ – ब्रह्मयज्ञः १ – ' ब्रह्म हि यज्ञ: ' ( शत ० ५ । ३ । २ । ४ ) । २ - ' प्रजापतिर्वै यज्ञ: ' ( गो ० उ ०२ । १८ ) । ३ – ' एष वै प्रत्यक्षं यज्ञो यत् प्रजापतिः ' ( शत ० ४ । ३ । ४ । ४ ) । ४— ' स वै यश एवं प्रजापतिः ( शत ० १ । ६ । ४ । ४ ) । ५ – ' प्राजापत्यो यज्ञः ' ( तै ० ३ । ७ । १ । २ ) । इन पाँच क्षरों की समष्टि से ही यह यज्ञ ' पाङ्क्तो वै यज्ञ के अनुसार पश्वावयव कहलाया है । प्रत्येक पदार्थ में पिण्ड, और हृदय, ये दो विभाग हैं । इनमें पिण्ड में अग्नीसोमात्मक यज्ञ की प्रधानता है, एवं हृदय में ब्रह्मा— विष्णु — इन्द्र प्रतिष्ठित हैं । इस प्रकार प्रत्येक परमेष्ठी का प्रथम विवर्त पदार्थ यज्ञसमष्टिरूप है । पाँच यज्ञक्षरों के एकीकरण से प्रत्येक पदार्थ का स्वरूप निर्माण हुआ है । इन पाँच क्षरों के रहने पर भी वस्तु एक ही कहलाती है, इसका कारण वही कूटस्थ अक्षर है । क्षरयज्ञकूट अक्षराधार पर प्रतिष्ठित है । इसीसे यज्ञ के छिद्र आवृत हो रहे हैं । इसी अभिप्राय से अक्षरेणैव यज्ञस्य छिद्रमपि दधाति ' ( तां ० ब्रा ० ८६ ।-( १३ ) । यह कहा जाता है । ग्रावपनकला ब्रह्ममूर्ति अन्तर्य्यामी की प्रधानता से मनोमयी है । अन्नादकला इन्द्रमूत्ति वेदात्मा की प्रधानता से वाङ्मयी है, एवं ग्रन्नकला विष्णुमूर्तिसूत्रात्मा की प्रधानता से प्राणमयी है । इस प्रकार प्रकारान्तर से मनःप्राणवाङ्मय अव्यय पुरुष ही क्रमशः अन्तर्य्यामीसूत्रात्मा - वेदात्मा रूप में ( अव्यक्तरूप में ) परिणत होता हुआ प्रवपन - प्रन्न - अन्नाद बनकर यज्ञपुरुष बन रहा है । तभी तो ' ऐतदात्म्यमिदं [ १७७ ]

पृष्ठ 185

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भाजविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत सर्वम् ' को चरितार्थ होने का अवसर मिलता है । इसी आधार पर ' पुरुषो वै यज्ञः ' इत्यादि रूप से उस सर्वाधार कालपुरुष को भी यज्ञपुरुष कह दिया जाता है । निष्कर्ष यही हुआ कि, अव्यक्त स्वयम्भू ही ग्रावपन – ग्रन्न – ग्रन्नादरूप में परिणत होता हुआ परमेष्ठी बन जाता है । इस परमेष्ठी का पहला विवर्त यही उक्त लक्षण यज्ञात्मा है । १ ब्रह्मा १-२ विष्णु: ३ इन्द्रः - ब्रह्मा अन्तर्यामी तदवच्छिन्न श्रावपनम् ( ख ब्रह्म ) १ विष्णुः २-२ ब्रह्मा ३ इन्द्रः - विष्णु: - सूत्रात्मा तदवच्छिन्नः सोमोऽन्नम् ( रं ब्रह्म ) १ इन्द्रः ३-२ ब्रह्मा ३ विष्णुः - इन्द्र: - वेदात्मा तदवच्छिन्नोऽग्निरन्नाद: ( कं ब्रह्म ) १ – श्रावनम् - मनोमयम् २ - श्रन्नम् - प्राणमयम् -- सोऽयं विकलो यज्ञपुरुषो यज्ञात्मा " ब्रह्म शं यज्ञात्मा " ३ - प्रन्नादः - बाङमयः उक्त यज्ञात्मा का विवर्त्त ब्राह्मणश्रुति से सम्बन्ध रखने वाला है । उपनिपच्छ्र ुति ने प्रकारान्तर से यज्ञात्मा का स्वरूप हमारे सामने रक्खा है । वह भी प्रसङ्गागत जान लेना विश्वप्रकृतिभूत यज्ञेश्वर चाहिए । वेद - सूत्र - नियतिरूप अव्यक्त स्वयम्भू प्राणप्रधान होता हुआ असङ्ग है, अतएव वह यज्ञमर्य्यादा से बाहर है । दो, अथवा अनेक मौलिक तत्त्वों के रासायनिक संयोग से सिद्ध होने वाला अपूर्व यौगिक भाव ही यज्ञ है । रासायनिक संयोग ही विज्ञान भाषा में अन्तर्थ्याम चिति - संसृष्टि - आदि नामों से व्यवहृत हुआ है । असङ्ग प्राण में यह संसर्ग [ १७८ ]

पृष्ठ 186

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत लक्षण संसृष्टि सम्बन्ध सर्वथा अनुपपन्न हैं । इस वृत्ति का सबसे पहले ग्रापोमय परमेष्ठी में ही उदय होता है । पारमेष्ठ्य अपतत्त्व भृगु अङ्गिरोमन है । अङ्गिरा तेजस्तत्त्व है, भृगु स्नेह तत्त्व है । तेजः-स्नेहमूत्ति भृग्वङ्गिरोमय इस प्रप् प्रकृति की मातरिश्वा नाम से प्रसिद्ध वराह वायु द्वारा पूर्व प्रकरण में प्रतिपादित स्थितिगत्यात्मक प्राणमय स्वायम्भुव यजुरग्नि में आहुति होती रहने से जो एक अपूर्व भाव उत्पन्न होता है, स्थितिगत्यात्मक तेजः - स्नेहमूत्ति वही अपूर्वभाव यज्ञ, किंवा यज्ञात्मा | ग्राहुतिरूप होने से ही स्नेह - तेजोलक्षण यह अप्तत्त्व शुक्र नाम से व्यवहृत होता है । विश्वोपादनभूत आपोमय इसी शुक्र-तत्त्व का निरूपण करती हुई उपनिषछ ति कहती है-स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमब्ररणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ - ईशोपनिषत् मं ० । यह अमूर्ति यज्ञात्मा योनि - रेत- रेतोधा, भेद से त्रिकल है । तीनों की प्रतिष्ठा ग्रावपनभूत त्रयो-मूर्ति अव्यक्तात्मा है । त्रयीमूर्ति के वेदात्मा का यजुरग्नि योनि है । पारमेष्ठ्य प्रप्तत्त्व रेत है, मातरिश्वा वायु रेतोधा है । उक्त प्रप्तत्त्व ही शुक्ररूप आहुतिद्रव्य है । इसी की आहुति से यज्ञपुरुष का प्रादुर्भाव होता है । अधिदैवत ( सूर्य्य ), अधिभूत ( पृथिवी ), अध्यात्म, इन तीनों यज्ञों का प्रथम प्रवर्त्तक यही पारमेष्ठ्य यज्ञमूत्ति अथर्वा है, जैसा कि श्रुति कहती है-यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्य्यो व्रतपा वेन श्राजनि । आगा आजदुशना काव्य: सचा यमस्य जातममृतं यजामहे ॥ - ऋक् सं ० १ । ८३ । ५ । देवता - विभाग के अनुसार स्वयम्भू ब्रह्मा हैं । यह " ब्रह्मनिःश्वसित " नाम से प्रसिद्ध अपौरुषेय-लक्षण त्रयीवेद से युक्त होते हुए त्रयीमूत्ति है । त्रयीमूर्ति ब्रह्मा के रूप वाक् भाग से ही परमेष्ठीरूप अथर्वा ( ब्रह्मवेद ) का सर्वप्रथम जन्म हुआ है, अतएव इसे ब्रह्मा का ज्येष्ठपुत्र माना गया है, जैसा कि मुण्डकश्रुति कहती है—

ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ।

ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥

मुण्ड ० १ । १ । १ । उक्त त्रयीवेद के ऋक् – साम - प्रजुः, ये तीनों पर्व क्रमशः महोक्थ- महाव्रत- पुरुष - नामों से प्रसिद्ध हैं । पुरुषरूप यजुः के यत् एवं जू, ये दो विवर्त हैं । यह यजु ही वस्तु है, वय है । इसका स्वरूप सम्पादन [ १७६ ]

पृष्ठ 187

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् करने वाले छन्दोरूप, अतएव वयोनाध नाम से प्रसिद्ध ऋक्सामात्मक महोक्थ एवं महाव्रत हैं । ऋक्साम छन्दित स्थितिगत्यात्मक यजुर्मूर्ति योनिरूप इसी ब्रह्माग्नि का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है— श्रनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा प्राप्नुवन् पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ( ईशो ० ४ । ४ । ) गतितत्त्व वायु है, स्थितितत्त्व श्राकाश है । ' यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ( गी०-ε । ६ । ) के अनुसार आकाशवाय्वात्मक स्थितिगतिरूप यत् एवं जू ग्रविनाभूत हैं । दूसरे शब्दों में दोनों तादात्म्यापन्न हैं । इसीलिए दो तत्त्व होने पर भी ऋषि ने - " अवेजत् " - " एकम् " - " मनसो जवीयः " यह कहा है । वायुरूप गतितत्त्व प्राण है, ग्राकाशरूप स्थितितत्त्व वाक् है । यत् प्राण- गति - बायु, चारों एवं जू - वाक् - स्थिति - आकाश, ये चारों अभिन्नार्थक हैं । इन सर्वथा विरुद्ध दो भावों का मूल विद्या अविद्या-त्मक षोडशीपुरुष नाम से प्रसिद्ध वही मृतात्मा । षोडशीपुरुष के अव्यय भाग की श्रानन्दादि पाँच कलाएँ बतलाई गई हैं । इनमें ग्रानन्द - विज्ञान - मनोमयभाग मुक्तिसाक्षी बनता हुग्रा स्थितिप्रधान विद्या-भाग है । मनःप्राणवाङ्मयभाग सृष्टिसाक्षी बनता हुआ गतिप्रधान श्रविद्या ( कम ) - भाग है । मध्यस्थ, श्रतएव उभयात्मक ( विद्या - अविद्यात्मक ) श्वोवसीयस् मन की कामना से मुक्तिसाक्षी भाग का अनुग्रा-हक बनता हुआ वह ग्रन्थियाँ तोड़कर मुक्ति का अधिष्ठाता वनता है, एवं सृष्टिसाक्षी भाग का अनुग्रा-हक बनता हुआ ग्रन्थिबन्धन द्वारा वही सृष्टि का प्रवर्तक बनता है । उसका विद्याभाग अमृततत्त्व है, यह सर्वथा स्थितिप्रधान है । अविद्याभाग मृत्युतत्त्व है, यह सर्वथा गतिप्रधान है । इसमें भुक्त दो विरुद्ध भावों का आगमन कहाँ से हुआ? इस प्रश्न का उत्तर श्रापका सुपरिचित वही परात्पर है । अमृतात्मा का स्वरूप बतलाते हुए कहा गया है कि, इसकी १६ कलाओं में से सर्वाधा-रभूता तुरीय- श्रर्द्धमात्रिक - श्रमात्रिक ग्रादि नामों से प्रसिद्ध परात्पर नाम की सोलहवीं निष्कलात्मिका कला है । यह निष्कल परात्पर रस - बल की समष्टि है । अमृतलक्षण रसतत्त्व सर्वथा शान्त होता हुत्रा स्थितिरूप है, मृत्युलक्षण बलतत्त्व सर्वथा प्रशान्त होता हुआ गतिरूप है । यही तो मायोपाधिकृत सीमा से अपने यत्किचित् प्रदेश से सीमित होकर पुरुष बन गया है । फलतः परात्पर के स्थिति - गति भावों का पुरुष में समन्वित होना सर्वथा अनिवार्य बन जाता है । स्थितिगति लक्षणा, विद्या - प्रविद्यात्मिका, आनन्द विज्ञानघन मनोमय प्राणगर्भिता, पुरुषवाक् ही त्रयीवेद की मूलप्रतिष्ठा है - ' वाग्विवृताश्च वेदा: ' । वेदत्रयी के यजुर्भाग को ही पुरुष कहा गया है । इसका कारण यही है कि, पुरुष ( अमृतात्मा ) के विद्या अविद्या प्रधान स्थितिगति भावों का यत् - जू रूप से में ही पूर्ण विकास होता है । इसी स्थिति गति के साधर्म्य से पुरुष सदृश होता हुआ, किन्तु वस्तुतः यजु पुरुषमर्यादा से बहिर्भूत होता हुआ भी यह यजुः " पुरुष " शब्द से व्यवहृत कर दिया जाता है । इस प्रकार आत्मा के स्थिति - गतिभावों का तत्वह्रिङ्गप्रकृतिभूत वेदमूर्ति इस अव्यक्तात्मा स्वयम्भू में भी आगमन सिद्ध हो जाता है । [ १८० ]

पृष्ठ 188

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् ऋक्साम में अपीत ( डूबा हुआ ) यजुः ही उस स्वायम्भुव अव्यक्त ब्रह्मा की प्रतिष्ठा है । इसी वेदप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित होकर वह तत्त्व यजु के यत्व्यापार से ( गतिधर्म्मा वायु के व्यापार से ) जू के द्वारा ( स्थितिरूप आकाश के द्वारा ) ' अप एव ससर्जादा ' इस मानवीय सिद्धान्त के अनुसार सर्वप्रथम श्रृप्तत्त्व ही उत्पन्न करता है । जू को प्रकाश कहा गया है । रस - बल की अनुकम्पा से ( तारतम्य से ) यह आकाश भी आगे जाकर अमृत - मृत्यु भेद से दो भाग में विभक्त हो जाता है । इन दोनों में अमृता-काश " इन्द्र " नाम से प्रसिद्ध है एवं मर्त्याकाश वाक् किंवा इन्द्र पत्नी नाम से व्यवहृत होता है । प्रप्तत्त्व इसी मर्त्या वाक् से उत्पन्न होता है । अमृता वाक् केवल आधारभूमि है । सांख्यदर्शन शून्यप्रदेश को आकाश मानता है । यदि वह " शून्यम् " का वैज्ञानिक तात्पर्य समझता हुआ ग्राकाश को शून्य कहता है, तब तो कोई क्षति नहीं है । परन्तु ऐसा न समझकर यदि वह शून्य शब्द का " रिक्तस्थान - पोल " यह अर्थ समझता है, तो यह उसकी सर्वथा भ्रान्ति है । इसी भ्रान्ति से भ्रान्त बनकर श्रोतसिद्ध आकाश तत्त्व को तत्त्वमर्यादा से बहिष्कृत कर रक्खा है । विज्ञानप्रेमियों का विश्वास आज हम ठीक इसके विरुद्ध विषय की ओर कराना चाहते हैं । उन्हें विश्वास करना चाहिए कि, आकाश वास्तव में शून्य है । परन्तु इस शून्य शब्द का अर्थ रिक्त स्थान नहीं, अपितु पदार्थतत्त्व ही शून्य है । सर्वत्र व्याप्त प्राणप्रद इन्द्र तत्त्व ही शून्य है । इसी श्वा इन्द्र का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है— शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन् भरे नतमं वाजसातौ । शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु धनन्तं वृत्रारिण सञ्जितं धनानाम् ॥ ऋ ० ३ । ३० । २२ इस ब्रह्म ( मन्त्र ) श्रुति के आधार पर निम्नलिखित ब्राह्मण वचन प्रतिष्ठित् है— १ – “ वाय्वा इन्द्रः ” ( कौ ० २ । ७ । ) २ – “ वाग्ध्यैन्द्री ” ( ऐ ० ब्रा ० २। २६ । ) ३ – “ सा या सा वाक् - असौ स प्रादित्यः " ( शत ० १०।५।१।४१ । ) सचमुच इस शुन ' इन्द्र ' से कोई भी स्थान रिक्त नहीं है । इसी अभिप्राय से ' नेन्द्राहृते पवते धाम किञ्चन " ( ऋक् ० ६ । ६६ । ६ । ) यह कहा जाता है । अमृतावाक् रूप श्वा इन्द्र से नित्य सम्बद्ध मर्त्यावारूप इन्द्रपत्नी ही प्रागे जाकर पञ्चतन्मात्रा की आधारभूमि बनती है । इनमें पहली शब्दतन्मात्रा है, इसकी विकासभूमि वेदमयी यही मर्त्यावाक् है । इसी रहस्य को समझाने के लिए ' वेदवाग्भ्यः ' यह न कहकर ' वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निम्मे ( मनुः १ । २१ ) यह कहा गया है । शब्दतन्मात्रा का जनक मर्त्याकाश, मर्त्याकाशरूपा इन्द्रपत्नी की प्रतिष्ठा अमृताकाशरूप श्वा इन्द्र, यह सब कुछ सिद्ध होने पर भी आकाश अपदार्थ?, कितनी भ्रान्ति! कैसा अज्ञान! कैसा दुराग्रह!!! | यदि आकाश कोई पदार्थतत्त्व न होता, तो ' मनोमयः, प्राणशरीरः, भारूप:, आकाशात्मा " इत्यादि श्रुतियों का समन्वय कैसे संभव था? जिस तत्त्व को रिक्तार्थ का वाचक समझते हुए ' शून्य ' कहते हैं, वह ' शुने ( इन्द्राय ) [ १८१ ]

पृष्ठ 189

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् हितम् ' इस निर्वचन से सम्बन्ध रखता हुग्रा तत्त्वविशेष का वाचक बन रहा है । जिस अन्तरिक्ष में श्वा इन्द्र व्याप्त है, वही विज्ञानभाषा में शून्य कहलाया है । कहना यही है कि, यह वाक्तत्त्व सर्वथा स्थिर है । यही जू कहलाया है, जैसा कि श्रुति कहती है— “ जूरसि – इति ” ( यजुः ४ । १७ । ) " एतद्ध वा अस्याः ( वाचः ) एकं नाम " ( शत ० ) दूसरा यत् तत्त्व प्राण है । यही गतितत्त्व है । इस प्रकार विद्याकर्मात्मक श्रव्ययपुरुष का विकास आगे जाकर स्थितिगत्यात्मक यजुरूप में होता है । यह यजु साक्षात् ग्रग्नि ( प्राणाग्नि ) है, पुरुषधर्म्मा-वच्छिन्न होने से पुरुष है । इसीके वाक्भाग से तो प्रप्तत्व उत्पन्न हुआ है – ' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात्, वागेव सासृज्यत ' ( शत ० ६ । १ । १ । १ । ) । यजु के गतिभाव का विकास यहाँ तेजोरूप से हुआ है एवं स्थितिभाव का विकास स्नेहरूप से हुआ हैं । स्नेह संकोचधर्म्मा होता हुआ स्थितिप्रधान है, तेज विकासशील वनता हुआ गतिप्रधान है । इस प्रकार परात्पर संस्था से आरम्भ कर इस आपोमय पर-मेष्ठी संस्थापर्यन्त रस - बल का ही भिन्न भिन्न रूप से विकास हुआ है । स्थानभेद से एक ही के नाम - रूप कम्र्मों में अन्तर हो गया है । जैसा कि तालिका से स्पष्ट है-१ – रसः २ I वलम् - परात्परो विश्वातीतो निर्धर्मकः १ ९ – विद्या - पोडशीपुरूषो विश्वेश्वरः सर्वधर्मोपपन्नः २- अविद्या १ — स्थितिः - ग्रव्यक्तात्मा बल्शेश्वरः प्राकृतात्मा २ - प्रागतिः १ – स्नेह. - यज्ञात्मा प्रतिमेश्वर. प्राकृतात्मा २ - तेजः वाक् से उत्पन्न प्रप्तत्त्व योषा है, स्त्री है । जहाँ रस का ग्रागमन होता है, वह स्त्री है! जो रस का प्रदाता है, वह पुरुष है । जहाँ रस प्रतिष्ठित रहता है, वह आयतनपुर है । रसवर्पण करने वाला ग्रग्नि वृषा है, यही पुरुष है । रसाहुति की अपने में संहत करने वाला ( स्त्यंष्ट्यं - शब्दसंघातयोः, तत्त्व स्त्री है । अग्नि पानी में मिल जाता है, पानी खोलने लगता है । परन्तु पानी कभी अग्नि में नहीं मिलता । यदि पानी का आक्रमण निर्बल होगा, तो अग्नि उसे वाष्परूप में परिणत कर उत्क्रान्त कर देगा, यदि पानी प्रबल होगा तो वह अग्नि को बुझा देगा पानी अग्नि में प्रवेश कर जाय, यह सर्वथा असम्भव है । [ १८२ ]

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आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 190 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् अग्निरस का ही प्रवेश अप में हो सकता है, अतएव यही वृषा है । पुर श्रायतनरूप होने से ग्रावपन बनता हुआ पूर्व कथनानुसार ' खं ' ब्रह्म है, अग्नि भोक्ता बनता हुआ अन्नाद रूप से ' र ' ब्रह्म है एवं प्रप्तत्त्व रमण-साधन होने से ग्रन्नात्मक ' क ' ब्रह्म है । समष्टि ही ' शं ' ब्रह्म है! १ - यत्र र सागमनं - सा स्त्री — योषा २ – यो रसः प्रदाता - स पुरुषः वृषा ३ – यत्र रसः प्रतिष्ठितः - तत्पुरम् आयतनम् —0— १ – स्त्री – आपः – अन्नब्रह्मकं ब्रह्य ] - दाम्पत्य भावः २ – पुरुषः – यजुरग्निः - श्रन्नादब्रह्म - रं ब्रह्म - शं ब्रह्म यज्ञात्मा ३ – पुरम् — श्राकाशः - प्रावपन ब्रह्मखं ब्रह्म उपर्युक्त प्राणमयी वाक् -0- से ( यजु से ) उत्पन्न प्रापः में भी ' कारणगुणाः कार्यगुणाना रभन्ते ' इस न्याय के अनुसार कारणरूप यजु के उन्हीं दोनों तत्त्वों का ( स्थिति - गतिभावों का ) स्नेह - तेजोरूप से विकास होता है, जैसा कि पूर्व में ही कहा जा चुका है । तेजस्तत्त्व ग्रङ्गिरा है, स्नेहतत्त्व भृगु है । समष्टि ग्रप्तत्त्व है । तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' सिद्धान्त के अनुसार त्रयीप्रधान श्रव्यक्तात्मा बाक् भाग से भृग्वङ्गिरोमय प्रप्तत्त्व को उत्पन्न कर स्वयं उसके गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है । इसी प्रबूविज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-आपो भृग्वङ्गिरो रूपमापोभृग्वङ्गिरोमयम् । अन्तरते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥ ( गो ० पू ० १ । ३६ । ) निशानार्थक ' तिज ' धातु का अर्थ है - तीक्ष्णीकरण । स्वगति - धर्म से विशकलनधर्म्मा अङ्गिरा उत्तरोत्तर केन्द्र से प्रधि की ओर सूक्ष्मरूप में परिणत होता हुआ जाया करता है । ठीक इसके विपरीत स्नेहरूप भृगु स्थितिभावयुक्त होता हुआ उत्तरोत्तर प्रधि से केन्द्र की ओर प्राता हुआ संकुचित होता जाता है । इस प्रकार प्रप्तत्त्व में मूलभूत स्थितिगतिरूप यजु के धर्म्म विस्पष्ट हो जाते हैं । उक्त श्रात्मविवर्त्ती में परात्पर कालपुरुष नाम से प्रसिद्ध है । षोडषी पुरुष महापुरुष नाम से, ऋक्सामावच्छिन्न यजुर्मूर्ति अव्यक्तात्मा वेदपुरुष नाम से एवं परात्पर - षोडशी - प्रव्यक्तात्मगर्भित, तदवच्छिन्न ग्रप्तत्त्व यज्ञपुरुष नाम से प्रसिद्ध है, जैसा कि ग्रागे के परिलेख से स्पष्ट हो जाता है । विश्वविद्यात्मिका प्रोङ्कारविद्या के अनु-सार परात्पर- षोडशी - अव्यक्तयज्ञात्मा, इन चारों का एक स्वतन्त्र विभाग है । यही " परब्रह्म " नाम से [ १८३ ]