श्रीगणेशाय नमः।
Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 191–200
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 191–200
पृष्ठ 191
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् प्रसिद्ध है, एवं पृथिवी चन्द्रमा का विभाग अपरब्रह्म नाम से व्यवहृत होता है । मध्यस्य सूर्य्य दोनों का अनुग्राहक बनता हुआ परापरब्रह्म है । चतुष्कल परब्रह्म की परात्पर कला प्रर्द्धमात्रा है । षोडशीपुरुष प्रकार है, अव्यक्तात्मा उकार है, यज्ञात्मा मकार है । समष्टि प्रोङ्कार है । १ अर्द्ध मात्रा -परात्परः रसः चत्वारः पुरुषा इति बाध्वः ( ऐ ० आ ० ) ( स्थितिप्रधानः ) बलानि ( गतिप्रधानानि ) २ षोडशीपुरुष: २ सोऽयं कालपुरुषो विश्वातीतः प्रकार: -३ उकारः-मकार: -आनन्द: - विज्ञान मनः अक्षरः ( स्थितिप्रधानः ) अविद्या अव्यक्तात्मा मनः - प्राणः - वाक् आत्मक्षरः ( गतिप्रधान:) २ सोऽयं महापुरुषो विश्वेश्व ३ यत् ( स्थितिः ) जू ( गतिः ) सोऽयं वेदपुरुषो विश्वस्रष्टा यज्ञात्मा भृगुः ( स्थितिप्रधानः ) अङ्गिराः ( गतिप्रधान:) सोऽयं यज्ञपुरुषो [ १८४ ]
पृष्ठ 192
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्म विज्ञानोपनिषत् स्वयम्भू प्राणमय होने से प्रसङ्ग बनता हुआ यज्ञमर्यादा से बहिर्भूत था, परमेष्ठी इसी प्रप्तत्त्व के कारण प्रसङ्ग बनता हुआ यज्ञ का प्रथम प्रवर्त्तक बन जाता है, जैसा यज्ञात्मा के विविध विवर्त कि- " यज्ञैरथर्वा ० " इत्यादि रूप में प्रकरण के आरम्भ में ही कहा जा चुका है । स्वायम्भुवी प्राणसृष्टि प्रसंगभाव की प्रधानता से ' मानसीसृष्टि ' कहलाती है, यही भावसृष्टि है । ऋषि- मनु आदि सृष्टियों का इसी भावसृष्टि में अन्तर्भाव है । पारमे-ष्ठिनी यज्ञसृष्टि योषावृषात्मक स्त्रीपुरुष तत्त्व के मिथुनभाव से सम्बन्ध रखने के कारण " मैथुनी सृष्टि " कहलाती है । ' सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा ' के अनुसार यज्ञसृष्टि ही प्रजासृष्टि की मूलप्रवृत्तिका है । इस यज्ञ-प्रजापति का स्वरूप ऋक् - सामावच्छिन्न यजुरग्नि पर ही प्रतिष्ठित है । त्रयीतत्त्व - प्रप्तत्व का समन्वित-रूप ही यज्ञ है । इसी आधार पर - ' सैषा त्रयी विद्या यज्ञः ' ( शत ० १ । १ । ४ । ३ । ) के अनुसार त्रयीविद्या को यज्ञ कहा गया है । ग्रापोमय परमेष्ठी में प्रतिष्ठित, दूसरे शब्दों में प्रप्प्रकृतिक परमेष्ठी की प्रतिष्ठारूप विष्णु के साथ पारमेष्ठ्य यज्ञ का तादात्म्य सम्बन्ध है । विष्णु ही अपनी श्रशनाया - शक्ति से अन्नाहुति [ सोमाहुति ] का सञ्चालक बनते हुए, अग्नीषोमात्मक यज्ञ का सम्पादन करते हैं । इसी-लिए विष्णु को भी यज्ञ कहा जाता है । इस प्रकार विष्णु - त्रयीविद्या - प्रापः - अङ्गिरा - भृगु - आदि के सम-न्वय से निष्पन्न होने वाला यज्ञ श्रुतियों में तत्तन्नामों से प्रसिद्ध हो रहा है, जैसा कि निम्न लिखित श्रौत-प्रमाणों से स्पष्ट हो जाता है— १- अथर्वसम्बन्ध से यज्ञनिरुक्ति-आदङ्गिराः प्रथमं दधिरे वय इवाग्नयः शम्या ये सुकृत्यया । सर्वं परः समविन्दन्त भोजनमश्वावन्तं गोमन्तमा पशुं नरः ॥ १ ॥
यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्य्यो व्रतपावेन प्राजनि ।
आगा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे ॥ २ ॥
२- अप् सम्बन्ध से यज्ञनिरुक्ति-" १ - " आपो वै यज्ञः ( ऐ ० २ । २० ) । २ - " आपो हि यज्ञः ” " ( शत ० ३ । १ । ४ । १५ ) ३ – " रेतो वा प्रापः ” ( ऐ ० १ । ३ । ) ( अथर्व सं ० २ । २३ । ४–५ ) ४ – “ योषा वा आपः " ( शत ० १ । १ । १ । १८ । ) [ १८५ ]
पृष्ठ 193
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ३-- वेदसम्बन्ध से यज्ञनिरुक्ति-यज्ञात्म विज्ञानोपनिषत् १--. " सैषा त्रयीविद्या यज्ञ " ( शत ० १ । १ । ४ । ३ । ) २-- " तद्यत् तत् सत्यं त्रयी सा विद्या " ( शत ० ६ । ५ । १ । १८ । ) ३-- " ते देवा अब्र ुवन् - यज्ञं कृत्वा- ( " ) सत्यं तनवामहै - इति " । ४ -- परमेष्ठी सम्बन्ध से यज्ञनिरुक्ति-" तत एतं परमेष्ठी प्राजापत्यो यज्ञमपश्यद्दर्शपूर्णमासौ । ताभ्यामयजत, स प्रापोऽभवत् । परमात्वा एतत् स्थाना-वर्षति यद्दिवः । तस्मात् परमेष्ठी नाम " । ( शत ० ११ । १ । ६ । १६ ॥ ) ५ - महत् सम्बन्ध से यज्ञनिरुक्ति-१ – “ एष ह वै महान् देवो यद्यज्ञः " २-- " यज्ञो ह वै देवानां महः " ( शत ० ( गो ० पू ० २ । १६ । ) १ । ६ । १ । ११ ) यह है प्राधिदैविक पारमेष्ठ्य यज्ञ का सक्षिप्त स्वरूप निदर्शन । अधिदैवत संस्था में जहां यह यज्ञतत्त्व " परमेष्ठी ” नाम से प्रसिद्ध है, वहां अंशरूप से अध्यात्मसंस्था में आध्यात्मिक यज्ञात्मा प्रतिष्ठित वही तत्त्व " यज्ञात्मा " नाम से व्यवहृत होता है । शारीरयज्ञ के के द्वारा ही शारीर - धातु प्रतिष्ठित रहते हैं । यज्ञ से शारीर धातुओं का निर्माण होता है । प्राध्यात्मिकसंस्था में जब तक इस यज्ञात्मा की सत्ता रहती है, तभी तक आत्मा ( चिदात्मा - पोडशी पुरुष ) चिदाभास एवं चिदंशरूप से शरीरपुर में प्रतिष्ठित रहता है । कारण स्पष्ट है । पाञ्चभौतिक शरीर ' इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' ( छा ० उप ० ) के अनुसार आपोमय है । यद्यपि शरीर में पाँचों ही महाभूतों की सत्ता है तथापि ' त्र्यात्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् ' ( शा०-सू ० ३ । १ । ) इस वेदान्तसूत्र - सिद्धान्त के अनुसार देहारम्भक भूतों में प्रप्तत्त्व ही अधिक मात्रा में रहता है । ग्रापोमय होता हुआ शरीर भृग्वङ्गिरोमय है । इसकी प्रतिष्ठा तदात्मक पारमेष्ठ्य यज्ञ ही है । भृग्वङ्गिरोमय इसी यज्ञात्मा के सम्बन्ध से दूसरे चिदात्मा का विकास होता है । * पोडशी पुरुष नाम से प्रसिद्ध अमृतात्मा के प्रधानरूप से चिदात्मा, चिदाभास, चिदंश, ये तीन विवर्त्त माने गए हैं । इन तीनों का दिग्दर्शन ग्रागे की ' प्राणात्मविज्ञानोपनिषद ' में कराया जायगा । [ १८६ ]
पृष्ठ 194
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोषनिपत् उपर्युक्त यज्ञतत्त्व की चिदात्मा ही योनि है । महत्स्वरूप इसी यज्ञ के आधार पर चिदात्मा, चिदा-भास रूप से प्रतिष्ठित रहता है । इस यज्ञात्मा के द्वारा ही जीवात्मस्वरूप- सम-यज्ञ का योनिभाव पंक चिदाभास स्वरूप में प्रतिष्ठित रहता । जिस दिन शारीरयज्ञ उच्छिन्न हो जाता है, तत्क्षण चिदाभास उत्क्रान्त हो जाता है । यज्ञात्मा का भृगु भाग घन - तरल - विरल भेद से तीन अवस्थाओं में परिणत रहता है । प्रब्वायु- सोम की समष्टि ही " भृगु " है-" वायुरापश्चन्द्रमा इत्येते भृगवः " ( गो ० ब्रा ० पू ० २ । ८ । ( ६ ) अङ्गिरोवच्छिन्न त्रिधा विभक्त यह भृगु ही चिदाभास की प्रधान प्रतिष्ठा है । अतएव चिदाभासरूपा जीवसृष्टि श्राप्या - वाव्यया - सौम्या भेद से तीन ही भागों में विभक्त है । पानी – हवा -- सोम, तीन ही तत्त्व वीधू बनते हुए चित् के ग्राहक है । जल में रहने वाले वृक्ष - वनस्पति - प्रौषधि - मत्स्यादि सम्पूर्ण जीव प्राप्य हैं । पानी ही इनकी जीवनसत्ता का मूलाधार है । यदि इन्हें पानी से पृथक् कर दिया जाता है, तो इनका तत्काल निधन हो जाता है । भूपृष्ठ से सम्बन्ध रखने वाले श्रौषधि - वनस्पति — कृमि — कीट - पक्षी — मनुष्यादि सम्पूर्ण जीव वायव्य हैं । वायु ही इनका आत्मा है, दूसरे शब्दों में वायु ही इनकी जीवनसत्ता की मूलभित्ति है । बिना वायु के ये कथमपि प्राणधारण नहीं कर सकते । सांख्य में ' सत्व विशालसर्ग ' नाम से प्रसिद्ध आठ प्रकार के चान्द्रदेवता सौम्य जीव हैं । सोम ही इनका जीवन है । चन्द्र मण्डल को छोड़कर ये कभी जीवित नहीं रह सकते । बस जीवसृष्टि के ये ही तीन मुख्य विवर्त्त हैं । अबू – वायु – सोमात्मक भृगु ही महान्, किंवा महानात्मा है । पोडशीपुरुष इसीमें गर्भ धारण करते हैं, जैसाकि स्मृति कहती है—
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यह्म ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ १ ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्त्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ २ ॥ ( गीता १४ । ३–४ । )
गर्भीभूत चिदात्मा का यज्ञमूत्ति महान् के साथ अन्तर्थ्याम ( ग्रन्थिबन्धन ), बहिर्य्याम ( योग-सम्बन्ध ) भेद से दो प्रकार से सम्बन्ध होता है । अन्तर्य्याम सम्बन्ध से स्वयं त्रयीमय त्रिगुणात्मा महान् महानात्मा, किंवा प्रकृतस्थल की अपेक्षा से यज्ञात्मा कहलाने लगता है । अर्थात् ग्रन्तर्य्याम सम्बन्ध से महन्मय बनता हुआ वही चिदात्मा महानात्मा का स्वरूप समर्पक बनता है, एवं बहिर्य्याम सम्बन्ध से वही महानात्मा से युक्त रहता हुआ स्वस्वरूप से ( स्वचिद्भाग से ) चिदात्मा नाम से प्रसिद्ध होता है । इसमें पारमेष्ठ्य महानात्मा के साथ सूर्य्यचन्द्रमा-पृथिवी, तीनों क्रमश: दर्शपूर्णमास करते हैं । यह स्मरण रखना चाहिए कि, इस महान् में अप् - वायु - सोम नाम के तीन तत्त्व हैं । इन तीनों में से अप् का अनुग्रह पृथिवी पर होता है, वायु का सम्बन्ध ग्रन्तरिक्ष-बिहारी चन्द्रमा के साथ है एवं सोम का प्रधान सम्बन्ध सूर्य्यं के साथ है । इन तीनों तत्त्वों के आधार पर सूर्य्य-- - चन्द्रमा - पृथिवी, इन तीनों के दर्शपूर्णमास यज्ञ से महानात्मा में सत्त्व - रज: -तम, इन तीनगुणों [ १८७ ]
पृष्ठ 195
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् का उदय हो जाता है । चन्द्रमा एव पृथिवी, दोनों को अपने बृहन्मण्डल में प्रतिष्ठित रखता हुआ, इन्हें साथ लेता हुआ सूर्य्यं महत्परमेष्ठी के चारों ओर परिक्रमा लगाता हुत्रा अपने साथ ही में स्वावयवभूत पृथिवी चन्द्रमा के गुणात्मक अंशों की उस परमेष्ठी में आहुति देता रहता है । इसी प्रक्रिया को ' दर्शपूर्ण-मासयज्ञ ' कहा जाता है । सोममय सूर्य्यभाग सत्त्वभाव का वायुमय चान्द्रभाव रजोभाव का एवं आपो-मय पार्थिवभाव तमोभाव का प्रवर्तक है । यों समझिए कि, सूर्य्य ने परिक्रमा लगाना प्रारम्भ किया । पारमेष्ठ्य महत् का सोमप्रधान अंश सूर्य्य से अनुगत होता सौरज्योति से हुआ ' सत्त्व ’ हुआ, ' युक्त होता रूप में परिणत हो जाता है । यही पौर्णमास ( पूर्णिमा ) है । सोममय महान् का यह सत्त्वभाग सर्वथा प्रकाशित रहता है । उधर पृथिवी सम्वन्ध से महत् का श्रापोमय भाग अप्रकाशित होता हुआ तमोगुणक बन रहा है । ग्रश्वमाहिष्यसम्बन्धात् वरुणप्रधान प्रप्तत्त्व के साथ इन्द्रप्रधान ज्योतिर्मय सौर प्रकाश का सम्बन्ध नहीं हो सकता अतएव यह भाग सर्वथा अप्रकाशित रहता हुआ ' तमोगुण ' नाम से प्रसिद्ध होता है । यह दर्शयज्ञ श्रमावास्या है । सत्त्व - तम की सन्धि में चन्द्रमा के सम्बन्ध से महत् का सान्ध्य वायुमय भाग प्रकाशिताप्रकाशित रहता हुआ रजोमूर्ति बना हुआ है । इस प्रकार अप्तत्त्वानुगृहीता पार्थि-वभाग के सम्बन्ध से अपधान वही महान् तमोमूत्ति, वायुतत्त्वानुगृहीत चान्द्रभाग के सम्बन्ध से वायुप्रधान सान्ध्य वही महान् रजोमूत्ति एवं सोमतत्त्वानुगृहीत सौरप्रकाश सम्बन्ध से सोमप्रधान वही महान् सत्त्व-मूर्ति बनता हुआ त्रिगुणमूर्ति बन रहा है - ' त्रयीमयाय त्रिगुणात्मने नमः ' । त्रिगुणो महानात्मा -सूर्य्यः – सोमेनानुगृहीतः.... - सोमप्रधानः स एव महान् - सत्त्वमूर्तिः चन्द्रमाः - वायुनानुगृहीत - वायुप्रधानः स एव महान् – रजोमूत्तिः पृथिवी - प्रद्भिरनुगृहीतः- तः - अपप्रधानः स एव महान् - तमोमूर्तिः इन्हीं सूर्य - चन्द्र- पृथिवी भागों के सम्बन्ध से महान् में श्राकृति - प्रकृति - श्रहंकृति, इन तीन भावों का उदय होता है । सूर्य्य के सम्बन्ध से सत्त्व द्वारा महान् में अहभाव का उदय होता है । चन्द्रमा के सम्बन्ध से रजो द्वारा प्रकृति भाव का उदय होता है, एवं पृथिवी के सम्बन्ध से तमोभाग द्वारा प्राकृ-तिभाव का उदय होता है । इस प्रकार सूर्य्य – चन्द्रमा पृथिवी, इन तीनों के दर्शपूर्णमास यज्ञ से महानात्मा त्रिगुण - प्रकृतित्रय - विशिष्ट बन जाता है । इसके ' यज्ञ - चित्- महत् ' ये तीन विवर्त का ( अध्यात्मसंस्था के साथ ) सम्बन्ध परमेष्ठी के द्वारा ही होजाता है ॥ इन तीनों परन्तु महदंश का सम्बन्ध साक्षात् रूप से न होकर चन्द्रमा के द्वारा ही होता है, जैसा कि उसी प्रकरण में स्पष्ट हो जायगा । इसी-लिए आत्मगतिप्रधान इस ग्रात्मविज्ञानोपनिषत् में हमने यज्ञात्मा - चिदात्मा — को पारमेष्ठ्य माना है, एवं गुण- प्रकृतिविशिष्ट महान् का सम्बन्ध चन्द्रमा के साथ बतलाया हैं । [ १८८ ]
पृष्ठ 196
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् १ - आपः १ – ग्रापः - तमः - - दर्शयज्ञः २- वायुः * ' भृगुः ' ' महान् ' २ – वायुः - रजः - उभयसमष्टि: - + गुरणत्रयविशिष्टो महानात्मा ३- सोमः ३ – सोमः सत्त्वम् - पौर्णमासयज्ञः १ - प्रापः – प्राकृतिः - - पृथिवीसम्बन्धात् २ - वायुः – प्रकृतिः —- चन्द्रगतप्राणेन्द्र सम्बन्धात् + प्रकृतित्रय विशिष्टो महानात्मा ३ – सोमः – अहङ्कृतिः - सूर्य्यसम्बन्धात् पारमेष्ठ्य तत्त्व अप्प्रकृतिक होता हुआ प्राकृत है । श्रतएव तत्प्रधान तन्मय यज्ञात्मा को हम अवश्य ही ' प्राकृतात्मा ' कहने के लिए तय्यार हैं । देवता - भूत - पशु - लोक - सम्पूर्ण भूतप्रपञ्च इसी प्राधि-दैविक यज्ञात्मा ( प्रापोमय परमेष्ठी ) के आधार पर प्रतिष्ठित हैं । एवमेव प्रकररणोपसंहार इन्द्रियाँ - सप्तधातु - केशलोमादि- शिरोगुहा - उरोगुहा - उदरगुहा - बस्तिगुहा -- इत्यादि सम्पूर्ण आध्यात्मिक प्रपञ्च इसी आध्यात्मिक चिद्गर्भित यज्ञात्मा के आधार पर प्रतिष्ठित है । इसके ' चित् - यज्ञ - महत् ' इन तीन विवर्त्तो में चिदात्मा यज्ञात्मा के साथ श्राद्ध का कोई सम्बन्ध नहीं है | श्राद्ध का सम्बन्ध है - एकमात्र महदंश के साथ, जैसा कि उसी प्रकरण में स्पष्ट हो जायगा | चिदात्म - यज्ञात्म भेद से द्विकल पारमेष्ठ्य यज्ञात्मा का यही संक्षिप्त निदर्शन है । अब क्रम-प्राप्त विज्ञानात्मोपनिषत् की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । तदित्थं चित् - यज्ञ - भेदेन द्विकलोऽयं परमेष्ठी, यज्ञात्मा वा व्याख्यातो द्रष्टव्यः । समाप्ता चेयं श्राद्धविज्ञानान्तर्गत - - " अमृतात्मविज्ञानोपनिषदि " प्रथमायाँ प्रथमखण्डात्मिकाया यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् तृतीया [ १८६ ]
पृष्ठ 197
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड त्रिगुरण भावापन्न यज्ञपुरुष परिलेख: -" यज्ञात्मा आपः - महान् वायुः " सोमः विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् तमः ३ → आकृति: रजः २ • प्रकृतिः सत्वम् १ अहंकृतिः या प्राणेन सम्भवत्यर्दितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्वा जायत ॥ ( कठोपनिषत् ) I प्रा सूर्य: णः चन्द्रमा २ ( पृथिवी ' - यज्ञः महानात्मा “ चिदात्मा का यज्ञमूर्ति महान् के साथ अन्तर्याम ( ग्रन्थिबन्धन ) व बहिर्याम ( योगसम्बन्ध ) भेद से दो प्रकार से स्लम्बन्घ होता है । इनमें से अन्तर्यामि सम्बन्ध के द्वारा ही महान् महानात्मा यज्ञात्मा कहलाने लगता है । इन सम्बन्धों में पारमेष्ठ्य महानात्मा के साथ सूर्य चन्द्रमा - पृथिवी तीनों क्रमश: दर्शपूर्णमास करते हैं । इस महानात्मा में श्रापः - वायु- सोम नाम के तीन तत्त्व होते हैं | इन तत्त्वों का क्रमशः पृथिवी - चन्द्रमा - सूर्य के साथ सम्बन्ध होता है । इन्हीं तीनों तत्त्वों के ग्राचार पर सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी इन तीनों के दर्शपूर्णमास यज्ञ से महानात्मा में सत्त्वम् - रजः तनः नामक गुणों का उदय होता है । श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
पृष्ठ 198
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड ( ४ ) १ - श्रधिदैवतम् + सूर्य: ( पूर्णमदः ) २ श्रध्यात्मम् + बुद्धि: ( पूर्णमिदम् ) विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् श्रथ " विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् " चतुर्थी विज्ञानात्मा- प्राकृतात्मा - सूर्य्यः ( ३ ) १ - देवदेवताविभूतिः ( दैवात्मा ) २ - नित्यविज्ञानविभूति: ( विज्ञानात्मा ) व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन! बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥१ ॥
दूरेण ह्यवरं कर्म्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय! बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपरणाः फलहेतवः ॥ २ ॥
- श्रीमद्भगवद्गीता २ ० ४१ । २ ० ४६ । ( ४ ) विज्ञानात्मस्वरूपपरिचयः ( विद्या अविद्यामयो विज्ञानात्मा )
प्रजाह तिस्रो प्रत्यायमीयुर्न्यन्या प्रर्कमभितो विवश्रे ।
बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित प्राविवेश ॥ १ ॥
[ १ ९ १ ] ऋक् सं ० ८ । १०१ । १४ ।
पृष्ठ 199
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड विभ्राजज्योतिषा स्वरगच्छो रोचनं दिवः । हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । [ १ ९ २ ] विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् ऋक् ० १० । १७० । ३ ऋक् ० १० । १७० । ४ । ऋक्र ० १० । १७० । २ । श्वे ० उ ० ६ । १५ ।
श्ये ० उ ० ४ । १८ ।
७ ॥
यजुःसं ० १३ । ४ । प्रश्नो ० ४ । ११ । मुण्डको २ । २ । ७ ।
इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं विश्वजिद्धन जिदुच्यते बृहत् ।
विश्व भ्राट् भ्राजो महि सूर्य्यो दृश उरु पप्रथे सह ओजो अच्युतम् ॥। २ ॥
येनेमा विश्वा भुवनान्याभृता विश्वकर्म्मणा विश्वदेव्यावता ॥ ३ ॥
विभ्राड् बृहत्सुभृतं वाजसातमं धर्मन्दिवो धरुणे सत्यमर्पितम् ।
अमित्रहा वृत्रहा दस्युहन्तमं ज्योतिर्जज्ञे श्रसुरहा सपत्नहा ॥ ४ ॥
एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले सम्निविष्टः ।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्य, पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ५ ॥
यदा तमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासच्छिव एव केवलः ।
तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात् प्रसृता पुराणी ॥ ६ ॥
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र ।
तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वमेवाविवेश ॥। ८ ॥
मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय ।
तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा श्रानन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥ ९ ॥
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १० ॥ ईशोप ० १५ ।
पृष्ठ 200
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
30 विज्ञानात्मब्रह्मणे नमः विज्ञानात्मा - सूर्य्यः ' विज्ञानं ब्रह्मे ' त्युपास्व यो देवानां प्रभवोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्धया शुभया संयुनक्तु ॥ श्वे ० उ ० ४ । १२ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् । बाहुभ्यां धमति सम्पतत्त्रेर्द्यावाभूमी जनयम् देव एकः ॥ श्वे ० उ ० ३ । ४ सर्वेन्द्रिय गुणाभासं सर्वेन्द्रियविवजितम् सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥ श्वे ० उ ० ३ । १७ नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः । वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च । श्वे ० उ ० ३ । १८ अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राभिरुद्धयते । सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र सञ्जायते मनः ॥ श्वे ० उ ० २ । ६
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तविष्णोः परमं पदम् ॥
कठोप ० १ । ३ । ε [ १ ९ ३ ]