Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 201–210
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 201–210
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् रमेष्ठ्य ' बज्ञात्मा ' की मूलप्रतिष्ठा भृग्वङ्गिरोमय ' आप ' तत्त्व है, जैसाकि पूर्वप्रकरण में पा बिस्तार से बतलाया जा चुका है । भृगु, तथा अङ्गिरा, इन दोनों तत्त्वों में से ' ग्रङ्गिरा ' तत्त्व का विकास ही ' सूर्ख है । ग्रापोमय पारमेष्ठ्य परमेष्ठी का अपेक्षाकृत श्रव्यक्तत्व मण्डल के गर्भ में प्रतिष्ठित बीजावस्थापन ग्रङ्गिरोऽग्नि ही आगे जाकर संवरण - सर्वव्याप्तितक्षण ' यज्ञवराह ' नामक पारमेष्ठ्य वायु के व्यापार से संत्रातावस्था में परिणत होता हुआ ' सूट ' रूप से प्रकट हो जाता है । पञ्चपर्वा विश्व में ज्ञानज्योतिर्गभित स्वयम्भू सर्वथा अव्यक्त है । परमेष्ठी यद्यपि अव्यक्त - स्वयम्भू की अपेक्षा व्यक्त है, परन्तु परमेष्ठी में भूतज्योतिर्लक्षणा रूप- ( प्रकाश - उजाला ) - ज्योति का विकास नहीं है अतएव ' रोदसी त्रिलोकी ' नाम से प्रसिद्ध रुद्र त्रिलोकी ( सौर त्रिलोकी ) की अपेक्षा से परमेष्ठी अव्यक्त ही माना जायगा । रूपज्योतिर्लक्षण भूतज्योतिः - स्वरूप से व्यक्त होने वाले जितने भी पदार्थ हैं, उन सब में सूर्य्यं ही अग्रणी माना गया है । असदात्मक तम को छिन्न भिन्न करने वाला अव्यक्त स्वयम्भू था, सृष्ट्यभावरूप तम को दूर करने वाला परमेष्ठी था, किन्तु ' अन्धकार नाम से प्रसिद्ध रात्रितम को दूर कर विश्वान्तर्गत पदार्थों को रूपप्रकाश से व्यक्त करने वाले व्यक्तमूर्ति यही भगवान् अंशुमाली हैं । रोदसी-त्रिलोकी में प्रतिष्ठित रहने वाली चर - अचर प्रजा के प्रभव- प्रतिष्ठा परायण यही है । दूसरे शब्दों में अनुपाख्य तम को दूर करने वाले अव्यक्त स्वयम्भू थे, एवं प्रनिरुक्त तम को हटाने वाले यही सहस्रांशु हैं । ईश्वर प्रजापति ( षोड़शी पुरुष नामक अमृतात्मा ) की ज्ञानकला सूर्य्य द्वारा ही सर्वत्र व्याप्त होती है, जैसाकि मन्त्रश्रुति कहती है-यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति । इनो विश्वस्य भुवनस्य गोपाः स मा धीरः पाकमत्रा विवेश ॥ ऋक् १ । १६४ । २१ । ' धियो यो नः प्रचोदयात् ' के प्रनुसार यही ज्ञान के प्रचोदयिता ( प्रेरक ) हैं । ग्रध्यात्मसंस्था में जीवत्रजापति ( कम्र्म्मात्मा ) जो कार्य अपनी बुद्धि से लेता है, अधिदेवत संस्था में विश्वस्य हृदयम् ईश्वर प्रजापति ( कर्मसाक्षी ) वह कार्य्यं सूर्य से लेते हैं । दूसरे शब्दों में बुद्धि ग्राध्यात्मिक संस्था का सूर्य है, एवं सूर्य्य अधिदैवत संस्था की बुद्धि है । रोदसी-त्रैलोक्यात्मिका द्यावापृथिवी के अधिष्ठाता, विश्वकेन्द्रस्थ, अतएव " श्रादित्यो वै विश्वस्य हृदयम् ” ( शत ० ε । १ । २ । ४० ) इत्यादि के अनुसार " हृदय " नाम से प्रसिद्ध व्यक्तपदार्थों की अपेक्षा सर्वप्रथम विश्व में व्यक्त होने के कारण ' श्रश्रज " नाम से प्रसिद्ध इसी हिरण्यगर्भ सूर्य - प्रजापति का दिग्दर्शन कराते हुए
ऋषि कहते हैं-हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक श्रासीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
[ १ ९ ४ ] — यजुःसं. १३ ॥ ४
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् यद्यपि आदित्य - विज्ञान के अनुसार सूर्य्य ' १ - इन्द्र, २- धाता, ३ - भग ४ - पूषा, ५- मित्र, ६- वरुण ७ श्रर्यमा पशु - विवस्वान् १० - त्वष्टा, ११ - सविता, १२ - विष्णु ' सोम - चित - इन्द्र - विभूतियां इन बारह दिव्यप्राणों का समुच्चित रूप माना गया है, तथापि प्रधा-दृष्टि से सूर्य्य १ - सोम, २ इन्द्र, ३- चित् इन तीन विभूतियों के प्राधार पर ही स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित है । प्रत्यक्ष में भी सूर्य में ये ही तीन तत्त्व उपलब्ध होते हैं । सूर्य्यपिण्ड [ सूर्य्यगोलक ] भूतमय है । यही " सोम " तत्त्व है । इसे ही ही दर्शनभाषा में ' भूतमात्रा ' कहा जाता है । रश्मिमण्डल में व्याप्त, प्रकाश का अधिष्ठाता तत्त्व प्राण है । यही रूपाधिष्ठाता सौरप्राण – " रूप रूपं मघवा बोभवीतु " " इन्द्रो रूपाणि कनिकृदचरत् " इत्यादि वचनों के अनुसार ' इन्द्र, नाम से प्रसिद्ध है । दर्शन समय की यह ' प्रारणमात्रा ' है । सूर्थ्य ही बुद्धि का प्रवर्तक बनता हुआ ज्ञान का अधिष्ठाता है । की वही ज्ञानशक्ति ' चित् ' नाम से व्यवहृत हुई है । यही ' प्रज्ञामात्रा ' नाम से प्रसिद्ध है । इस चिदंश के सम्बन्ध से ही इन्द्रतत्त्व चिन्मय बनता हुआ चेतना नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । इन्द्र का प्रज्ञाभाव, किंवा चैतन्य, सोम के सम्बन्ध से ही स्थिर रहता है । ग्रग्नि को जहां पुरुष कहा जाता है, वहां सोमतत्त्व शक्ति नाम से प्रसिद्ध है । ( देखिए बृहज्जाबालोपनिषत् २।८।१ ) सौर ग्रग्नि हिरण्मय है । इसी हिरण्य तत्त्व के सम्बन्ध से यह सोममयी शक्ति " हैमवती " नाम से प्रसिद्ध है । यह तत्त्व वीघ्र है । प्रतिबिम्बग्रहण-योग्यता इसी में है । सब से पहिले पारमेष्ठ्य महद्गर्भित चिदंश का सम्बन्ध इसी के साथ होता है, श्रतएव इसे ' चिच्छक्ति ' कहा जाता है । चिच्छक्तिस्वरूपा इसी हैमवती उमा के द्वारा महेश्वरमूर्ति सावित्राग्निमय इन्द्रप्राण के साथ सम्बन्ध होता है । तात्पर्य यही हुआ कि इन्द्र में जो चैतन्य है, वह सोम के द्वारा ही श्राया हुआ है । ( देखिए केनोपनिषत् ३ । ११ ) । सृष्टिसाक्षी मनःप्राणवाङ्मय अव्ययात्मा की वाक्कला का विकास अव्यक्त स्वयम्भू में होता है । प्रारण वाक् इन दो कलाओं का विकास महत् परमेष्ठी में होता है । परन्तु विश्वकेन्द्रस्थ बुद्धिरूप सूर्य में मनः प्राणवाक्इन तीनों कलाओं का विकास है । दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि, षोडशी पुरुष की पूर्ण विकास भूमिइन्द्रात्मक यही सूर्य्य है । अतएव - ' इन्द्रो ह वं षोडशी ' ( शत ० ४ । ५ । ३ । १ ) इत्यादि रूप से सौर इन्द्र को ' षोडशी ' कहा गया है । यही कारण है कि, पञ्चपर्वा विश्व के किसी पर्व को श्रात्मा का अधिष्ठाता न मानकर ' सूर्य्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजुः सं ० १३ | ४६ ) इत्यादि रूप से एकमात्र सूर्य को हि अधिष्ठाता मान लिया गया है । आत्मा के साथ साथ ही देव, एवं भूतप्रजा की भी प्रतिष्ठा यही सूर्य्य है । ग्रात्मा — भूत — देव, इन तीनों के मूलस्तम्भ ग्रायुः – गौः - ज्योतिः ये तीन तत्त्व हैं । पूर्व प्रतिपादित इन्द्र का विकास ज्योतिरूप से, सोम का विकास गौरूप से, चिदंश का विकास प्रारूप से होता है । इन्द्रमय ज्योति, सोममयी गौ, चिन्मय श्रायु, इन्हीं तीनों मनोताओं के सम्बन्ध से सूर्य्य से ज्योतिष्टोम - गोष्टोम - श्रायुष्टोम इन तीन स्तोमयज्ञों का विकास होता है । ज्योतिष्टोम देवसृष्टि की गोष्टोम भूतसृष्टि की एवं ग्रायुष्टोम आत्म विकास की मूलप्रतिष्ठा है । इस प्रकार इन तीनों स्तोमों से सूर्य सर्वप्रतिष्ठा बन रहा है । केवल आत्म – देव – भूत विवर्त का ही, अपितु अधिदैवत, अध्यात्म, अधिभूत, इन तीनों संस्थाओंों की भी सत्ता सूर्य के आधार पर ही प्रतिष्ठित है । श्रतएव इसे विश्वप्रतिष्ठा कहा गया है जैसा कि महर्षि श्वेताश्वतर कहते हैं-[ १६५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १ ॥
- श्वेता ० ५ । १३ । पूर्व की यज्ञात्मोपनिवत् में कहा गया है कि, सूर्य्यं से ऊपरका पारमेष्ठीयलोक तृतीय नाम से है । इसी में सोम नामक ग्रप् तत्त्व प्रतिष्ठित है । यह लोक ' अस्ति वै प्रसिद्ध यज्ञप्रवर्तकविश्वात्मा चतुर्थो देवलोक प्राप: ' ( कौ ० ब्रा ० १८ ) के अनुसार ग्रापोलोक नाम से प्रसिद्ध है । यह पारमेष्ठ्य सोम दूषित परमाणुओं को उच्छिन्न करने की शक्ति रखता है, ग्रतएव यह पवित्र नाम से प्रसिद्ध है, जैसा कि मन्त्रश्रति कहती है-पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पतेर्प्रभुर्गात्रारिण पर्येषि सर्वतः । तप्ततनूनं तदामो समश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत् समाशत ॥ — ऋक् ० ६ । ८३ । १ परमेष्ठी में प्रतिष्ठित भृगुतत्त्व की आपः - वायुः - सोम, ये तीन अवस्थाएं, बतलाई गई हैं । इन तीनों में क्रमशः आप्यप्राण असुर, वायव्यप्राण गन्धर्व, एवं सौम्यप्राण पितर नाम से प्रसिद्ध है । श्राप्य-प्राणात्मक पारमेष्ठ्य असुरों के आक्रमण से पारमेष्ठ्य वायव्य प्राणात्मक गन्धर्व पितृप्राणात्मक सोम की निरन्तर रक्षा किया करते है । सौरी वागुरूपा सुपर्णी के द्वारा गन्धर्वो से सुरक्षित यह पवित्र सोम निरन्तर सूर्य में प्राहुत होता रहता है । इसी रहस्य को बतलाने के लिए सौपर्णाख्यान की कल्पना की गई है । सुप्रसिद्ध कद्र - विनता की संधा ( शर्त - होड़ - बाजी ) का भी इसी ब्राह्मणाख्यान से सम्बन्ध है । ' आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानः ' ( यजुः सं ० ३३ | ४३ ) के अनुसार सूर्य्य सर्वथा कृष्ण ( काला ) है । दाह्य पारमेष्ठ्य सोम की इस दाहक और सावित्राग्नि में ग्राहुति होती रहती है । इस सोमाहुति से दाहक अग्नि प्रज्ज्वलित हो पड़ता है । यही प्रकाश है । आप सौरमण्डल में जो प्रकाश देख रहे हैं, वह जलता सोम ही है । सोम ही प्रकाश का प्रवर्त्तक है । इसी अभिप्राय से ऋषि कहते हैं-त्वमिमा प्रोषधीः सोम! विश्वास्तमपो अजनयस्त्वं गाः । त्वमा तथन्तोर्वन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ ॥ — ऋक् ० १ । ६१ । २२ । इसी सोमाहुति से सूर्य्यसत्तारूप अहःकाल का उदय होता है । यही अहर्यज्ञ अग्निहोत्र नाम से प्रसिद्ध है । इसी आधार पर - " सूर्य्यो ह वा श्रग्निहोत्रम् " ( शत ० २ । ३ । १ । १ ) यह कहा गया है । सोराग्निमण्डल ही सम्वत्सर है । इसी में सोम आहुत हो रहा है । अग्निसोम के उद्ग्राभ ( चढ़ाव ) निग्राभ ( उतार ) से इस सौर - सम्वत्सर में ६ ऋतुएं उत्पन्न हो जाती हैं । अग्निजन्मकाल वसन्त है, [ १६६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् की युवावस्था ग्रीष्म है, प्रौढ़ावस्था वर्षा है । सोम का उदयकाल शरत् है, युवावस्था हेमन्त है, प्रौढ़ावस्था शिशिर है । ग्रग्नीषोममय इस सम्वत्सरात्मक सौर यज्ञ के पाँच अवयव हैं । अहोरात्र पहला पर्व है, शुक्ल - कृष्ण पक्ष दूसरा पर्व है, चातुर्मास्य तीसरा पर्व है, दक्षिण - उत्तर - प्रयन चौथा पर्व है, एवं स्वयं सम्वत्सर पाँचवां है । यही इस सौरयज्ञ की पाक्तता ( पञ्चावयवता ) है । उक्त सम्वत्सर यज्ञ के ये ही पाँचों पर्व क्रमशः श्रग्निहोत्र – दर्शपूर्ण मास – चातुर्मास्य – पशुबन्ध ज्योतिष्टोम – नामों से प्रसिद्ध हैं । प्रकारान्तर से यज्ञ की पाङ्क्तता देखिए । हविर्यज्ञ - सोमयज्ञ - मेधयज्ञ प्रतियज्ञ - धर्म्मयज्ञ, भेद से सम्वत्सर यज्ञ पञ्चधा विभक्त है । पार्थिव अन्न की सौराग्नि में प्राहुति होने से हविर्यज्ञ का, पारमेष्ठ्यसोम की आहुति से सोमयज्ञ का, पुरुष - गौ - नर - सर्व नाम के चारों पशव्य प्राणों की आहुति से मेधयज्ञ का, एवं विशेष प्रकार की सोमद्वयी, एवं अग्निचिति से प्रतियज्ञ का, प्रव-तिज्ञ का स्वरूप निष्पन्न होता है । ये पाँचों यज्ञ, दूसरे शब्दों में एक ही यज्ञ के पाचों पर्व क्रमशः ७-७-४-१ इन विभागों में विभक्त हैं । इन के भी आगे जाकर अवान्तर अनेक विभाग हो जाते हैं । यह सम्पूर्ण यज्ञकर्म्म -कलाप एकमात्र इसी सौरसम्वत्सर में प्रतिष्ठित है । अग्नीषोमात्मक इसी सौर-यज्ञ से सौरदेवता अमृतभाव को प्राप्त होते हुए सम्पूर्ण विश्व के सञ्चालक बन रहे हैं । जब तक सोमा-है, तब तक यज्ञ है । जब तक मज्ञ है, तभी तक व्यक्त विश्व का व्यक्तीभाव है । यह व्यक्तीभाव यज्ञा-त्मक इसी व्यक्त सूर्य्य पर प्रतिष्ठित है । अतएव सूर्य्यसत्ता सृष्टिकाल कहलाया है, एवं सूर्य्यं का तिरोभाव प्रलयकाल का अधिष्ठाता माना गया है । उक्त यज्ञसंस्थाक्रम निम्नलिखित तालिकाओं से स्पष्ट हो रहा है । - + ग्रन्नाहुत्या सम्पद्यते । १- हविर्यज्ञः २- सोमयज्ञः + सोमाहुत्या सम्पद्यते । ३- मेधयज्ञः + मेधाहुत्या सम्पद्यते । १-४ - अतियज्ञः + राज - वाजाग्निसम्बन्धेम ० ५- घर्म्मयज्ञः → प्रवर्ग्याहुत्या सम्पद्यते । " पाङ्क्तो वै यज्ञः " इत्याहुः । सैषा पाङ्क्तयज्ञस्यैकाविधा २-२ - दर्शपौर्णमास. १ – ग्रग्निहोत्रम् .... अहोरात्र यज्ञः पक्षयज्ञः .... ऋतुयज्ञ ॥ ३ – चातुर्मास्यम् ४- पशुबन्धः अयनयज्ञः .... ५ - ज्योतिष्टोमः..... सम्वत्सरयज्ञ: :: -" पाङ्क्तो वै यज्ञः " इत्याहुः सैषा पाङ्क्तयज्ञस्यैकाविधा [ १६७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १ - हविर्यज्ञः--१ - प्रग्निहोत्रम् २ – दर्शपूर्णमासः ३ – चातुर्मास्यम् ४ - आश्रयणेष्टिः ५— इष्ट्ययनम् ६- सौत्रामणिः ७ – पशुबन्धः २- सोमयज्ञः-१- प्रग्निष्टोमः २- प्रत्यग्निष्टोमः ३ - उक्थ्य स्तोमः ४- पोड़शीस्तोमः ५- प्रतिरात्र स्तोमः ६- वाजपेयस्तोमः ७- प्रप्तोय्र्यामस्तोमः 67 सप्तसंस्थो व हवियज्ञः प्राक्सौमिकः ७ सप्तसंस्थो वै ज्योतिष्टोमः - सोमयज्ञः ३ - मेधयज्ञः— १ - अश्वमेधः २ - गोमेधः ३- नरमेधः ४- सर्वमेधः ४ - चतः संस्थो वं मेधयज्ञः [ १ ९ ८ ] विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत्
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ४ - प्रतियज्ञः-१ - राजसूयः ( राज्ञाम् ) ४ २- वाजपेयः ( ब्राह्मणानाम् ) > चतुः संस्थो वै प्रतियज्ञः ३ – चयनम् ( ब्राह्मणानाम् ) ४ – प्रश्वमेधः ( राज्ञाम् ) विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् ५- घम्मयज्ञः -१ - शिरोयज्ञः, प्रवर्ग्य यज्ञो वा एकविध एव । अग्नि रहस्यवेत्ता विद्वानों को यह भलीभांति विदित है कि, सम्पूर्ण विश्व एकमात्र सोमगर्भित अग्नितत्त्व का ही विवर्त है । ( श्रग्नीषोमात्मक जगत् ' वृ ० जा ० उ ० २ । ४ ) । सूर्य्यात्मक क्षत्ररुद्र इस अग्नितत्त्व के सम्यक् परिज्ञान के लिए तीन तत्त्व विज्ञेय है । अग्नि स्वयं अन्नाद ( अन्न खाने वाला ) है । बिना अन्न के अग्नि कभी स्वरूप से प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । यही पहला तत्त्व है । दूसरा अन्न तत्त्व है । भोक्ता अग्नि जिस धरातल पर प्रतिष्ठित होकर अन्न भोग करता है, वह तीसरा तत्त्व है । ये तीनों क्रमशः प्रवपन ब्रह्म- अन्नादब्रह्म - श्रन्नब्रह्म, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । आावपन खं ब्रह्म है, खं प्रकाश है, आकाश ही वाक्तत्त्व है, जैसाकि यज्ञात्मप्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । इस वाङ्मय खं ब्रह्म पर प्रतिष्ठित रहने वाला भोक्ता अन्नाद ब्रह्म अन्न से सुख प्राप्त करता हुआ " कं " ब्रह्म नाम से व्यवहृत होता है । आवपन बाग ब्रह्म था, यह अग्नि-ब्रह्म है | रमणकभूत अन्नब्रह्म ' र ' ब्रह्म से प्रसिद्ध है । इस प्रकार वाङ्मय प्रवपनरूप खं ब्रह्म प्रतिष्ठित अग्निमय अन्नादरूप कं ब्रह्म प्रापोमय अन्नरूप ' र ' ब्रह्म का भोग करता हुग्रा वाक् - अग्नि प्रमय शं ब्रह्म-रूप में परिणत हो रहा है । प्रवपन पर प्रतिष्ठित प्रन्नाद के साथ जब तक अन्न का सम्बन्ध है, तभी तक रुद्राग्नि शिवरूप में परिणत होता हुआ शान्ति के साम्राज्य में प्रतिष्ठित हो रहा है । अन्नसम्बन्ध के विच्छेद से शिवभाग रुद्ररूप में परिणत होता हुया विश्वसंहारक बन जाता है । अन्नसम्बन्ध से वही प्राणाग्नि तत्त्व शिवशरीर धारण कर लेता है । प्रन्नाभाव में वही घोरशरीरी बन जाता है । इसी ग्रन्ना-दाग्नि - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" अग्निर्वा रुद्रः, तस्यैते द्वे तन्वे घोरान्या च शिवान्या " । चित्याग्नि साक्षात् रुद्र है । इसके प्रचण्ड क्रोध से सम्पूर्ण देवता कम्पित हो जाते हैं | अपनी रक्षा के लिए, दूसरे शब्दों में रुद्रकोप से बचने के लिए अन्नयज्ञ का आश्रय लेते हैं । इस ग्रन्न से रुद्र शान्त हो [ १६६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् जाते हैं, शिवस्वरूप में परिणत हो जाते हैं, अतएव यह रुद्रान्न ' शान्तदेवस्य ' किंवा " शान्तरुद्रिय " नाम से प्रसिद्ध होता है । परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में यही शान्तरुद्रियभाव " शतरुद्रिय " नाम से प्रसिद्ध है, यही " शतरुद्री " है ( देखिए शत ० ७ कां ० संचितिब्रा ० १ । १ । १ ) । उत्पन्न शिशु श्रग्निमूर्ति है । गर्भस्थ शिशु सम्वत्सराग्नि के चयन से नवमास में जब सर्वात्मना सम्पन्न हो जाता है तो एवयामरुत् के आघात से गर्भाशय को छोड़ता हुआ बाहर निकल पड़ता है । भूमिष्ठ होने के अव्यवहितोत्तरकाल में ही वह रोने लगता है । शिशुशरीरस्थ अन्न विरहित अग्नि ही " अग्नि वें रुद्रः । यवरोवीत, तस्माद्र: ( शत ० ६ । १ । ३ । ११ ) के अनुसार रुद्र नाम से प्रसिद्ध है । इसी से सम्पूर्ण इन्द्रिय देवता कम्पित हो पड़ते हैं । श्रन्नाहुति दी जाती है । तत्काल रुद्राग्नि शान्त हो जाता है । बच्चा चुप हो जाता है । इसी आधार पर खं - कं - रं- की समष्टि को " शं " ब्रह्म कहा गया है । तीनों की समष्टि ही यज्ञ है । जब तक यज्ञ है, तभी तक संसार है । यद्यपि परमेष्ठि को यज्ञात्मा कहा गया है, तथापि मग्नीसोमात्मक यज्ञ का पूर्ण विकास तो सूर्य्य में ही होता है । पारमेष्ठ्य यज्ञ सामवेद में " गोसव " यज्ञ कहलाया है । यही यज्ञ पुराण में " गोलोक " कहलाया है । सूर्य्य के मूलप्रतिष्ठारूप गौ यहीं विकसित होती है । यही गोस्थान ब्रजभूमि से प्रसिद्ध है । इस यज्ञ की आधार भूमि एकविशस्तोम से आरम्भ कर ३६ वें स्तोम तक का पारमेष्ठ्य प्रदेश है । इन्हीं पन्द्रह स्तोमां के कारण यह यज्ञ " पञ्चवशाह " यज्ञ नाम से प्रसिद्ध है । गौप्रवत्तंक पञ्चदश अहर्गणात्मक सोममूत्ति यही पारमेष्ठ्य गोसवयज्ञ " पट्त्रिंश " कहलाया है । यज्ञाधारभूमि को आवपन कहा गया है । श्रावपन और आधार में अन्तर है । प्रवपन भिन्न प्रकार का श्रायतन है, आधार निम्न प्रकार का आयतन है । एकत: आयतन भूमि प्राधार कहलाता है, एवं सर्वतः श्रायतन भूमि प्रवचन कहलाता है । हमारा आधार भूपिण्ड है, पुस्तक का आधार मेज है, पानी का श्राधार घट है, फूल का आधार शाखा है, शाखा का आधार वृक्ष है, ये सब प्रायतन आधार तन्तु है, शरीर का आधार मात्मा है, ये सब आवपन नाम से प्रसिद्ध होंगे । आकाश वसुधानकोश ( डिब्बी ) की भाँति सर्वतः आधार बना हुआ है । प्रकृत में आकाशात्मक यही प्रावपन सम्बन्ध अभिप्रेत है । इसी -लिए इस श्रावपन को हमने " खं ब्रह्म " कहा है । अन्न को हमने प्रापोमय कहा है । यह अप्तत्त्व, किंवा श्रापोमय श्रन्न सौर, एवं पार्थिवाग्नि भेद से दो भागों में विभक्त हो जाता है । पार्थिव अन्न सोम है, सौर श्रत X पानी है । जहां भी पानी होता है, " नाड्योवायुसंयोगादारोहणम् " ( ० द ० ५ । २ । ६ । ) के अनुसार सूर्य्यं स्वनाड़ी द्वारा उसे अपने गर्भ में प्रतिष्ठित कर लेता है । पञ्चपर्वा विश्व के उन ओर वाग्ब्रह्म है, इस ओर भी वाग्ब्रह्म है, मध्य में अग्निब्रह्म है । इस मध्यस्थ अग्नि के दोनों ओर अन्नसोम श्रभिव्याप्त है । स्वयम्भू आकाश है, यही वागुब्रह्म, किंवा खं ब्रह्म है, यही विश्वयज्ञ का प्रवपन है । * इस विषय का विशद विवेचन शतपथ विभानभाष्य ( १ अङ्क में देखना चाहिए । X अथैष गोसवः । स्वाराज्यो वा एष यज्ञ. । प्रजापतिहि परमेष्ठी स्वाराज्यम् । सर्वः षट्त्रिंश ( ३६ ) स्तेन ' गोसव: ' । ( तां ० म ० ब्रा ० १६ । १३ ) । [ २०० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् ' परमे व्योमन् " नाम से प्रसिद्ध इसी श्रावापन में सब कुछ प्रतिष्ठित है । परमेष्ठी श्रापः है, यही ' रं ' ब्रह्म है । सूर्य अग्नि है, यही ' क ' ब्रह्म है । चन्द्रमा ग्रापः सोम है, यही ' रं ' ब्रह्म है । पृथिवी वाक् है, यही खं ब्रह्म है । उपक्रम – उपसंहार में वाक् है, मध्य में सूर्य्याग्नि है । यह उभयतः सोमरूप अप परिगृहीत है, जैसाकि निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट हो रहा है । १ - वाक् – स्वयम्भूः - प्रावपन ब्रह्म — खं ब्रह्म २ - ग्रापः — परमेष्ठी - अन्नब्रह्म --- -रं ब्रह्म ३ - प्रग्निः सूर्यः -- प्रन्नादब्रह्म - कं ब्रह्म ४ – ग्रापः– चन्द्रमाः'– अन्नब्रह्म ———- रं ब्रह्म > ब्रह्मा - श्रधिदेवतम् J ५ - वाक् – पृथिवी - - श्रावन ब्रह्मखं ब्रह्म --विश्वमध्यस्थ अन्नादाग्नि के ( सौर अग्नि के ) तीन विवर्त्त हैं, दूसरे शब्दों में वह तीन स्वरूपों में परिणत होकर विश्व में प्रतिष्ठित है । पहला विवर्त्त साम्वत्सरिक सौर प्रन्नादाग्नि के तीन विवर्त है, दूसरा पार्थिव है, तीसरा शारीरिक है । सौरमण्डलस्थ विश्व -नियन्ता अग्नि ही सम्वत्सर है, यही देवप्राण की प्रधानता से " आधिदैविकाग्नि " नाम से प्रसिद्ध है । भूलोक - नियन्ता अग्नि पार्थिव है, भूतभाग की प्रधानता से यही " प्राधिभौतिकाग्नि " हैं, एवं जीवसृष्टि का सञ्चालक शारीरिक अग्नि ही श्रात्मसम्बन्ध से “ आध्या-त्किाग्नि " नाम से व्यवहृत हुआ है । इन तीनों अग्नियों की मूलप्रतिष्ठा स्वायम्भुव प्राणाग्नि है । यही ब्रह्माग्नि, किंवा वेदाग्नि है । अध्यात्म - प्रधिभूत - प्रधिदैवत - तीनों प्रपञ्चों का उक्थ ब्रह्म - साम - रूप आत्मा यही सूर्य्य है । स्थावरप्रपञ्च भूतत्रपञ्च है, जङ्गमप्रपञ्च श्रात्मप्रपञ्च है । ' सूर्य्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च " ( यजुः सं.-७।४२ ) के अनुसार दोनों की प्रतिष्ठा यही सूर्य्य है । सौरमण्डल – ' चित्रं देवानामुदगात् " ( यजुः सं०-६।४२ ) के अनुसार देवप्राणात्मक है । इसी देवप्राण के सम्बन्ध से यह प्रथम संस्था " प्राधिदैविक ” नाम से प्रसिद्ध है | अतएव सौरमण्डलस्थ यह प्राणाग्नि " देवाग्नि " नाम से व्यवहृत हुआ है । " एषां वै भूतानां पृथिवी रस: " ( शत ० १४ । ६ । ४ । १ ) के अनुसार पार्थिव अग्नि ' भूताग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के सम्बन्ध से यह संस्था ग्राधिभौतिक नाम से व्यवहृत हुई है । मनोता विज्ञान के अनुसार सूर्य में ज्योतिः-गौ: - आयुः ये तीन मनोता माने गए हैं, जैसा कि प्रकरण के आरम्भ में बतलाया जा चुका है । मनः-प्राणवाक् के त्रिवृत्करण से इन तीनों मनोताओं का परस्पर में त्रिवृत्करण होता है । इस त्रिवृत्करण * इस विषय का विशद विवेचन ' ईशोपनिषत् हिन्दी विज्ञानभाष्य ' प्रथम खण्ड के ' मनप्राणवाक को व्यापकता ' नाम के प्रकरण में देखना चाहिए । [ २०१ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् से क्रमश: देवता - भूत - प्रत्मा; ये तीन तत्त्व आविर्भूत होते हैं । आयुः - गौ; - गर्भित ज्योतितत्त्व देवता है । सूर्य्यमण्डल में गो भाग गौण है; देवभाग प्रधान है । ज्योति प्रायुर्गभित गौभाग भूत है । यही पृथिवी है । यहां ज्योति, एवं आयुः तत्त्व अन्तर्लोन हैं, गोभाग प्रधान है । ज्योतिः - गौः - गर्भित आयुः तत्त्व ही आत्मा है । यहां प्रायु का विकास है । यही प्राध्यात्मिकाग्नि पुरुषाग्नि नाम से भी व्यवहृत हुआ है । निष्कर्ष यही हुआ कि, वही अन्नादाग्नि सूर्य्यसंस्था में सम्वत्सर है, पृथिवीसंस्था में अग्नि है, एवं अध्यात्म संस्था में पुरुष है । साथ ही में इतना और ध्यान रखिए कि ये तीनों ही शब्द विचाली हैं । सम्वत्सर-श्रग्नि पुरुष, तीनों को तीन शब्दों से व्यवहृत किया जा सकता है । कारण, त्रिवृदभाव के कारण प्रत्येक में तीनों के प्रत्यंश विद्यमान हैं । साथ ही में तीनों का मूलप्रभव अन्नादाग्नि तीनों में समान है । सौर-सम्वत्सर अग्नि भी है, पुरुष भी है, पार्थिव अग्नि सम्वत्सर भी है, पुरुष भी है, सम्वत्सर भी है । इन तीनों अग्नियों का परस्पर में चिति सम्बन्ध हुआ करता है । यही प्राकृतिक अग्निचयन यज्ञ है । इन तीनों चित्याग्नियों का मूलाधार - सर्वतः आधारभूत वही स्वायम्भुव वेदाग्नि है, यही चौथा प्रवपन है । अग्नितत्त्व के इन्हीं चारों विवर्ती को लक्ष्य में रखकर - ' चतुर्द्धा विहितो ह वाऽग्रेऽग्निरास " ( शत ० ब्रा ० १ । २ । ३ । १ । ) यह कहा गया है । अग्निविवर्त्त-१ - १ - मूलप्रतिष्ठाग्निः - चितेनिधयः - प्राणप्रधानः – स्वायम्भुवः २ - २ - प्राधिदैविकाग्निः - चित्यः ३ - ३ - प्राधिभौतिकाग्नि: -,, ४ - ४ - प्राध्यात्मिकाग्निः- " 1 - ज्योतिः प्रधानः - सौरः - गौप्रधानः पार्थिवः - प्रायुः प्रधानः — शारीरिकः १ – ब्रह्माग्निः - - ब्रह्माण्डम् ं ं ंखं ब्रह्म देवाग्नि: - सम्वत्सरः २ -- [: --कं ब्रह्म १ - - भूताग्निः - - अग्निः ..कं ब्रह्म ३ -- आत्माग्निः - पुरुषः कं ब्रह्म श्रग्नि वँ त्रिवृत् " ( तै ० ब्रा ० १। ५ । १० । ४ ) के अनुसार अग्नितत्त्वत्रिवृकृत है । इसी त्रिवृद्भाव के कारण आधिदैविक - पाधिभौतिक - प्राध्यात्मिक; इन तीनों अग्नियों को तीन तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । श्राधिदैविका सम्वत्सराग्नि है । घनावस्थापन्न सम्वत्सराग्नि श्रग्नि है; तदवच्छिन्न लोक पृथिवीलोक है । तरलावस्थापन सम्वत्सराग्नि वायु है; तदवच्छिन्न लोक अन्तरिक्ष है । विरलावस्थापन्न सम्वत्सराग्नि आदित्य है, यही द्युलोक है । आधिभौतिकाग्नि पार्थिव है । धनावस्थापन पार्थिव अग्नि [ २०२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्म विज्ञानोपनिषत् सौर सम्वत्सरमण्डल ( अधिदैवत संस्था ) परिलेखः-वाक् : आप: द्यौ ) २१ ( वाक् ( २१ ) द्यौः ( १ ) अन्तरिक्षम ( 2 ) पृथिवो ( 3 ) ( (१५ ) अन्तारक्षम् पृथिवी ( २१ ) द्यौ: ( ए ) वाक ( सूर्य ) शाह ( 2 ) ille ( 82 ) c वाक पञ्चपर्वा सौर सम्बत्सर मण्डल में विश्वनियन्ता अन्नादाग्नि ही सम्वत्सर है । यही देवप्राण की प्रधानता से ' आधिदैविकाग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । यहाँ पर वाक् स्वयम्भू ( ग्रावपनम् ) तथा आप परमेष्ठी ( ग्रन्नम् ) रूप से व्याप्त है । इसी प्रकार द्यौः ( २१ ), अन्तरिक्षम ( १५ ) तथा पृथिवी ( 2 ) अग्नि रूप में सम्वत्सरः ( ग्रन्नाद ) हैं । वाक् ( सूर्य ) प्रापनम् है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।