श्रीगणेशाय नमः।
Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 211–220
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 211–220
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्म विज्ञानोपनिषत् पार्थिव सम्वत्सरमण्डल ( अधिभूत संस्था ) परिलेख: -वाक्आपः : वाक् आपः स्वः भुवः भूः वाक् पृथिवी Ye ple क भूः वाक् आपः स्वः भुवः पञ्चपर्वा विश्व में वाक् स्तर को ' स्वयम्भू ' तथा ' प्राप: ' स्तर को परमेष्ठी कहा जाता है । यही परमेष्ठी ग्रन्नम् भी है । इस पञ्चपर्वा विश्व में महापृथिवी सम्वत्सर ( अन्नाद् ) के अन्तर्गत ' भू: ' - भुवः स्वः क्रमशः ६-१५ २१ स्तोमों में व्याप्त रहते हैं । इन्हें ही क्रमशः पृथिवी - ग्रन्तरिक्ष- द्यो लोक कहते हैं । मध्य में स्थित वाक् ही पृथिवी है । यही आवपन ब्रह्म कहलाती है तथा यही अग्नि ब्रह्म है । इसी मध्यस्थ ग्रग्नि के दोनों ओर अन्न - सोम अभिव्याप्त हैं । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपूर ।
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अर्णवसमुद्रगर्भित भूपिण्ड परिलेख: -आपोलोकः भूलोकः भुवर्लोकः आपोलोकः भूलीक: भुवर्लोकः स्वर्लोकः ) ( ि १ - प्रापः २ - भूः ( चित्याग्नि ) ३ – भुवः ( तरलाग्नि ) ४ – स्वः ( हृदयम् ) ५ – ग्रापः ग्रापः ग्राम: भूः → भुविवर्त्तम् श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर । विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत्
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अधिदैवत अधिभूत समष्टि परिलेख: -वाक् स्वयम्भूः आपः परमेष्ठी अग्निः सूर्य आपः चं विज्ञानात्म विज्ञानोपनिषत् gron Lette Lethbr उक्त परिलेख में पञ्चपर्वा विश्व का स्वरूप बतलाया गया है । जिसमें स्वयम्भू आकाश है यही बाग्ब्रह्म है । तथा यही विश्व यज्ञ का श्रावपन । परमेष्ठी ग्राप: है सूर्य अग्नि है, चन्द्रमा प्रापः सोम है । पृथिवी वाक् है | उपक्रम - उपसंहार में वाक् है, मध्य में सूर्य्याग्नि है । वाक् स्वयम्भू आवपनब्रह्म ( खं ब्रह्म ), आपः परमेष्ठी अन्नब्रह्म ( रं ब्रह्म ), अग्नि सूर्य्य अन्नादब्रह्म ( कं ब्रह्म ), ग्रापः चन्द्रमा अन्नब्रह्म ( र ब्रह्म ) तथा वाक् पृथिवी ब्रह्म ( खं ब्रह्म ) कहलाते हैं । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् शरीरकाग्नि [ अध्यात्मिक सप्तर्षिमण्डल ] परिलेख: -आत्मा-( प्राण :) बारन्ध्रम्- शिरोगुहा वाक् - स कर्णौदिकसोम: - आप पर चक्षुषी - आदित्य मेष्ठी - अग्निः सूर्य, नासिके - वायुः ( आत्मा ) सुखम् - अग्नि हृद्गम — भास्वरसोमः आपः - चन्द, शरीरम वाक - पृथिवी वाक् आप अग्निः आप उक्त परिलेख में शरीरकाग्नि के रूप में शिरोगुहा स्वरूप बतलाया गया है, जिसके अन्तर्गत २ श्रोत्रे, २ चक्षुपी, २ नामिके व १ मुखम् है | यही सातों साकञ्ज प्रारण सप्तक का शिरोनुगत प्रथम विस्तार है | इनकी मूल प्रतिष्ठा श्रग्न्यादि देव हैं ग्रतएव इन सप्तऋषि प्राणों को ' देवता ' भी कहा जाता है । ६ १५ - २१ २७-३३ स्तोम भेद से महिमा पृथिवी के पाँच स्तोम प्रदेश माने गए हैं । इनमें क्रमशः श्रग्निवायु - प्रादित्य- भास्वरसोम - दिक्सोम नामक पाँच अग्निसोमात्मक प्राण देवता प्रतिष्ठित माने गए हैं । जिनका क्रमशः मुख, नासिका, चक्षु श्रौत्र, ब्रह्मरन्ध्र इन पाँचों में क्रमवार भोग होता है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर 1
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् दृश्य भूस्तर है, यही भूलोक है । इसके भीतर तरलावस्थापन्न अग्नि जलरूप है; यही भुवर्लोक है । सर्वान्तरतम प्राणात्मक मौलिक ग्रग्नि विरलावस्थायुक्त है, यही तीसरा स्वर्लोक है । आज दिन पृ ० अन्त ० द्यौः, एवं भूः - भुवः स्वः, इनको परस्पर में पर्य्याय माना जा रहा है, परन्तु वस्तुतः ऐसा नहीं है । भूः - भुवः स्वः का भूपिण्ड से सम्बन्ध है । दूसरे शब्दों में पार्थिवाग्नि से सम्बन्ध है । भूकेन्द्रस्थान स्वर्लोक है । इस की प्रतिष्ठा प्राणाग्निमूर्ति प्रजापति है - ' प्रजापतिश्चरति गर्भे ० " । भूपृष्ठ के भीतर बहने वाला पानी भुवर्लोक है । यही पातालादि सात लोकों की प्रतिष्ठा है । यही पानी साक्षात् वरुणाग्नि है । स्वयं दृश्य भूपिण्ड भूलोक है । इस प्रकार भूः भुवः स्वः इन तीनों का केवल भूपिण्ड में ही भोग हो जाता है । भूपृष्ठ से प्रारम्भ कर एकविंशस्थ सूर्य्य पर्य्यन्त सम्वत्सराग्नि व्याप्त है । इसी की उक्त तीनों अवस्थाएँ क्रमशः ग्रग्नि - वायु - आदित्य, नाम से प्रसिद्ध हैं, एवं ये ही तीनों देवता क्रमशः त्रिवृत् पञ्चदश – एकविंश – स्तोमरूप पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ - इन तीनों लोकों के अधिष्ठाता हैं । इसी पार्थक्य को लक्ष्य में रखकर ‘ दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व: ' ( ऋक्सं ० १० । १६० । ३ । ) यह कहा गया है । यदि द्युलोक, एवं स्वर्लोक दोनों एक ही वस्तु होते तो ' दिवं प्रथो स्वः ' यह पुनरुक्ति व्यर्थ होती । सम्वत्सराग्नि के तीनों विवत्तों के लिए ' दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षम् ' यह कहा है, एवं प्रजापतिमूत्ति पार्थिव अग्नि की तीनों अवस्थाओं का हृद्यभाव से संग्रह करते हुए ' प्रथो स्वः ' यह कहा गया है । इसी प्रकार आध्यात्मिक अग्नि भी इसी त्रिवृद्भाव से आक्रान्त है । वागिन्द्रिय ग्रग्नि है, प्राणेन्द्रिय वायु है, चक्षुरिन्द्रियग्रादित्य है । अग्नि के उक्त तीनों ही विवर्त्त उभयतः पानी से वेष्टित हैं । सत्याग्नि, सदा आपोमय ऋत पर-मेष्ठी के गर्भ में प्रतिष्ठित रहता है - ऋतेभूमिरियं श्रिता । पहले प्राधिदैविक विवर्त्त को ही लीजिए पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौरूप सम्वत्सराग्नि के उस ओर प्रापोमय दिक्सोममय परमेष्ठी है, इस ओर ग्रापोमय ( भास्वर सोममय ) चन्द्रमा है । इसी प्रकार भूमिण्ड ' समुद्रमभितः पिन्वमानम् ' ( यजुः सं ० ११ । २ ९ ) के अनुसार ' अर्णव ' नाम से प्रसिद्ध रोदसी समुद्र के गर्भ में प्रविष्ट । एवमेव दिक्सोममय श्रोत्र; एवं भास्वर सोममय मन से वेष्टित प्राध्यात्मिक त्रिवृदग्नि भी पानी के गर्भ में ही प्रतिष्ठित है— जैसा कि परिलेखों से स्पष्ट हो रहा है । जिस प्रकार स्वयम्भू ऋषिप्राणप्रधान, परमेष्ठी पितर - एवं श्रसुरप्राणप्रधान, चन्द्रमा गन्धर्वप्राण-प्रधान, पृथिवी पशुप्राणप्रधान, किंवा वैश्वानरप्रधान है, एवमेव विश्ववमध्यस्थ सूर्य्य " चित्रं देवानामुदगात् ” इत्यादि के अनुसार देवप्रारण प्रधान है । इसी सौर देवप्राण से यज्ञद्वारा नवीन ग्रात्मा उत्पन्न होता है, अतएव इसे " देवात्मा " नाम से व्यवहृत किया जाता है । इसके अतिरिक्त चिदात्मा के सम्बन्ध से इसी से दूसरे " विज्ञानात्मा " का भी विकास होता है । दोनों में से कम प्राप्त पहले दैवात्मा का ही संक्षेप से दिग्दर्शन कराया जाता है । सूर्य्यमूलक देवात्मा वपन पर प्रतिष्ठित ग्रन्नाद ( अग्नि ) के साथ अन्न ( सोम ) का मिथुन सम्बन्ध हो जाना ही यज्ञ है । यद्यपि मौलिक यज्ञ की प्रथम विकासभूमि आपोमय परमेष्ठी ही है, तथापि रोदसी त्रिलोकी [ २०३ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् में रहने वाली प्रजा की अपेक्षा से प्रकृत में यज्ञ से सौरसंस्था का ही ग्रहण करना न्याय प्राप्त है । सौर-प्राणदेवता इसी यज्ञ के बल पर अमृतत्त्व को प्राप्त हो रहे हैं । सूर्य्यं का अंश श्रवर्ग्य वन कर पार्थिव बनता हुआ मृत्युधर्म्म से प्राक्रान्त हो जाता है । आगे जाकर यज्ञ के प्रभाव से ही यह पार्थिव प्राणदेवता स्वप्रभव सौरप्राण के साथ ग्रन्थिबन्धन करते हुए मृत्युपाश से विमुक्त हो जाते हैं । महर्षियों ने प्रकृति के इस गुप्त रहस्य का अपनी दिव्यदृष्टि से साक्षात्कार किया, एवं उसी प्राकृतिक नित्य यज्ञ के आधार पर अमृतभाव - सम्पादक वैधयज्ञ का आविष्कार किया । इस वैधयज्ञ के द्वारा मानुषात्मा में एक प्रकार का पूर्व भाव उत्पन्न होता है, वही देवात्मा नाम से प्रसिद्ध है । आध्यात्मिक प्रपञ्च का ग्राधिभौतिकप्रपञ्च के द्वारा प्राधिदैविक प्रपञ्च के साथ सम्बन्ध करा देना ही इस वैधयज्ञ का चरम फल है । दूसरे शब्दों में, सौर दिव्यतत्त्व का अध्यात्म-देवताओं के साथ ग्रन्थिबन्धन करा देना यज्ञ है । यद्यपि सौरप्राण का सम्बन्ध हमारे साथ नित्य बना रहता है, परन्तु यह सम्बन्ध बहिय्यम है । ऐसा सम्बन्ध ' त्याग ' न कहला कर ' योग ' कहलाया है । में स्वभावतः पार्थिवप्रारण की प्रधानता रहती है । अतएव सौरप्राण ग्रन्तर्य्यामि सम्बन्ध से यहाँ मनुष्य स्वतः एव प्रतिष्ठित नहीं हो सकता । इस विप्रतिपत्ति के निराकरण के लिए सर्वप्रथम " अग्न्याधान ” करना पड़ता है । मन्त्रवाक् द्वारा दिव्य ग्रग्नि को मानुपाग्नि में प्रतिष्ठित करने वाली प्रक्रिया - विशेष ही अग्न्याधान है । इस से मानुपात्मा दिव्याग्नि से युक्त होता हुआ उस सौरप्राण के ग्रहण करने की योग्यता प्राप्त कर लेता है । अग्न्याधान के अनन्तर ' अग्निहोत्र ' का अधिकार मिलता है । इससे अहोरात्र के दिव्यप्राण को आत्मसात् किया जाता है । दर्शपूर्णमासेष्टि से पाक्षिक दिव्याग्नि के साथ योग किया जाता है | चातुर्मास्य से ऋतुव्यापक अग्नि का ग्राधान होता है । पशुबन्ध से प्रयनाग्नि को आत्मा में प्रतिष्ठित किया जाता है । इन सब के करने के अनन्तर सम्वत्सरात्मक सोमयज्ञ ज्योतिष्टोम का अधिकार मिलता । अतएव इन्हें " प्राक्सौमिक " यज्ञ कहा जाता है । ज्योतिष्टोम से सम्वत्सराग्नि का आत्मा के साथ सम्बन्ध हो जाता है | अध्यात्म में प्रतिष्ठित यही साम्वत्सरिक दिव्याग्नि " दैवात्मा " है । इसी के प्रभाव से मानुषात्मा स्थूलशरीर के परित्याग के अनन्तर त्रिणाचिकेत स्वर्ग में चला जाता है । जब तक यज्ञा-तिशय बना रहता है, तब तक मानुषात्मा स्वर्ग में प्रतिष्ठित रहता है । यज्ञातिशय की समाप्ति पर च्युत होता हुआ कम्र्मात्मा पुनः कर्मभोगार्थ उसी योनिचक्र में श्रा जाता है - " क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके वसन्ति ” । जितने भी यज्ञ हैं, वे सब इस संसार समुद्र को पार करने वाली अस्थिर नौकाएँ हैं । कभी न कभी ये श्रवश्य छिन्न - भिन्न होती हैं प्रतएव उपनिपच्छु ति ने इस ' यज्ञनौका ' को प्रमृतत्त्व प्राप्ति में असमर्थ बत-लाया है, जैसा कि महर्षि मुण्डक कहते हैं-प्लवा ह्येते दृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्यु ते पुनरेवापियन्ति ॥ - मु ० उ ० १ । २ । ६ । प्राकृतिक नित्य साम्वत्सरिक यज्ञ पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ, भेद से तीन लोकों में वितत है । त्रैलोक्य में वितत रहने के कारण ही इसे श्रातानयज्ञ - वितानयज्ञ- त्रेताग्नियज्ञ- इत्यादि विविध नामों से [ २०४ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् व्यवहृत किया जाता है । इसी के आधार पर यहां वैधयज्ञ में गार्हपत्य - दक्षिणाग्नि- श्राहवनीय, इन तीन अग्नियों का वितान किया जाता है । गार्हपत्य पृथिवी की प्रतिकृति ( नकल ) है, दक्षिणाग्नि अन्तरिक्ष की, श्राहवनीय द्युलोक की प्रतिकृति है । सूर्य की की प्रकृति ' यूप ' है । पारमेष्ठ्य ग्रहसोम की प्रतिकृति वल्ली से निकाला हुश्रा सोमरस है । प्राकृतिक यज्ञ में ऋग्वेदावच्छिन्न अग्नि होता है, यजुर्वेदावच्छिन्न वायु अध्वर्यु हैं, सामवेदावच्छिन्न श्रादित्य उद्गाता है, त्रयीमूर्ति चन्द्रमा ब्रह्मा है, त्रैलोक्य व्यापक प्रतिष्ठावा यजमान है । इसी आधार पर इस वैधयज्ञ में होता ॠग्वेदी, अध्वर्यु यजुर्वेदी, उद्गाता सामवेदी, एवं ब्रह्म त्रैविद्य होता है । प्रजापति की प्रतिकृति स्वयं यज्ञकर्त्ता यजमान है । आत्मा को मनःप्राणवाङ्मय कहा गया है । यज्ञद्वारा नवीन ग्रात्मा उत्पन्न कराया जाता है | दूसरे शब्दों में यज्ञद्वारा सौरदिव्य मनःप्राणवाङ्मय आत्मा का मानुषात्मा ( कर्मात्मा ) के साथ सम्बन्ध कराया जाता है । फलतः वैधयज्ञ में मनः - प्राण - वाक् – इन तीनों कलायों के समावेश की आवश्यकता श्रवश्यंभाविनी बन जाती है । इसी श्रात्मसम्पत्ति के लिए दक्षिणाक्रीत ऋत्विजों का सहयोग आवश्यक हो जाता है । होता - अध्वर्यु - उद्गाता ये तीनों तो वाक्तत्त्व सम्पादित करते हैं । अध्वर्यु प्राणसम्पत् सवित करता है, एवं निरीक्षक ब्रह्मा मनोयोगद्वारा मनोमयी विभूति पर अपना अधिकार जमाता है । प्रका-रान्तर से यों भी कहा जा सकता है कि, ऋग्वेदी होता ऋक्तत्त्व पर प्रतिष्ठित १ - शस्त्र कर्म्म से वाक्-कला सम्पन्न करता है, यजुर्वेदी अध्वर्यु जुस्तत्त्व पर प्रतिष्ठित ३ - ग्रह कर्म से प्राण का सश्चय करता है । सामवेदी उद्गाता सामतत्त्व पर प्रतिष्ठित ३ - स्तोत्र कर्म से महिमामण्डल का निर्माण करता है । ब्रह्माद्वारा मनोमय भाग सञ्चित होता है । इस प्रकार शस्त्र - स्तोत्र - ग्रह - द्वारा ऋत्विक् लोग यज्ञकर्म्म से नया दैवात्मा उत्पन्न कर देते हैं । शस्त्रकर्म्म -- हौत्रं — ऋचा सम्पद्यते -- ( होता ) ग्रह कर्म - प्राध्वर्यवं – यजुषा सम्पद्यते - ( अध्वर्यु ) स्तोत्रकर्म – प्रौद्गात्रं - साम्ना सम्पद्यते - ( उदगाता ) सर्वाध्यक्षो ब्रह्मा ' यजति ' धात्वर्थ के परिज्ञान के लिए वैय्याकरणों के ' भूषरण ' की शरण में जाइये । यहां तो केवल “ यज- देवपूजा, संगतिकरण, दानेषु " इसी पर विश्राम समझिए । देवताओं का पूजन, देवताओं के * इन सब याज्ञिक पदार्थों का मौलिक रहस्य, एवं इतिकर्त्तव्यता ( पद्धति ) शतपथ ब्राह्मण हिन्दी -विज्ञानभाष्य के प्रथम वर्ष के प्रथम ग्रङ्क में देखना चाहिए । [ २०५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्म विज्ञानॊपनिषत् लिए दान, एवं देवताओं का परस्पर सङ्गतिकरण, इन्हीं तीनों भावों के लिए ' यजति ' प्रयुक्त हुआ है । प्रकृत में दैवात्मसम्बन्ध से सङ्गतिकरण अर्थ ही अभिप्रेत है । यज्ञकर्त्ता यजमान इसी देवप्राण, किंवा दैवात्मा के प्रभाव से साधारण अयज्ञिय मनुष्यों की अपेक्षा उत्कृष्टकर्मा, एवं उत्कृष्टधर्म्मा बन जाता है । भौमदेवता बन जाता है, स्वर्गतत्त्व प्राप्त कर लेता है, दिव्यप्राण को पहचान लेता है । साक्षात् इसी यज्ञफल का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है-सत्रस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता भूम । दिवं पृथिव्या अध्यारुहामाविदाम देवान्त्स्वर्ज्योतिः ॥ ( यजुः सं ० ८।५२ ) । यज्ञविद्या साधारण विद्या नहीं है । अपितु रूप - रस - गन्ध - स्पर्श - शब्दशून्य, अतएव इन्द्रियातीत प्राणतत्त्व को अधिकार में लाने वाली एक असाधारण शक्ति है । अतः इस की इतिकर्त्तव्यता में हमारे लिए एकमात्र शास्त्र ही शरण है । मनमाने फल की ( हवाशुद्धि आदि की ) कल्पना कर यथेच्छ पद्धतियों का निर्माण कर व्याज से यज़ का अनुगमन करना समृद्धि के स्थान में सर्वनाश का कारण है । यज्ञ एक नया असाधारण दैवात्मा उत्पन्न करता है, यह कोई बालक्रीड़ा नहीं है । अवैध पद्धति से ताम्रकुण्डिकानों में स्वाहा - स्वाहा वोलते हुए दो चार बार घृताहुति देने से ही यज्ञेतिकर्त्तव्यता समाप्त नहीं हो जाती । आज श्रीतपद्धतियों का तिरस्कार कर कल्पित पद्धतियों के ग्राश्रय से ही यज्ञविद्या विलुप्तप्राय हो गई है । अस्तु, कहना केवल यही है कि, प्रक्रियाविशेष से सौरप्रारण को अध्यात्म में प्रतिष्ठित कराना ही यज्ञ है । यज्ञजनित यह सौर देवात्मा मानुवात्मा से युक्त होकर स्थूलशरीर के परित्यागानन्तर इसे स्वर्ग प्रदेश में लेजाता है । दैवात्मा का यही मुख्य कर्म है । श्राद्धकर्म का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है । कारण सौर-प्राणमय होने से यह प्रसङ्ग है । इस पर वासना - भावना आदि संस्कारों का लेप नहीं हो सकता । इस का प्रभव यज्ञ है, योनि वेदमन्त्र है, प्रतिष्ठा मानुषात्मा ( कम्र्मात्मा ) है, ग्राशय सर्वाङ्ग शरीर है । यह ग्रात्सा इतर खण्डात्मानों के समान साधारण नहीं, अपितु असाधारण है । जो विद्वान् यथाविधि यज्ञ करते हैं, उन्हीं में यह पूर्व आत्मा प्रतिष्ठित रहता है । यज्ञिय यथाजात मनुष्य इस देवात्मा से सर्वथा वश्चित है । हां, इसी सूर्य का विज्ञानात्मा नाम का जो दूसरा विवर्त्त है, वह सर्वसाधारण में प्रतिष्ठित है । मानु-पात्मा, एवं दैवात्मा के इसी पार्थक्य को लक्ष्य में रखकर वाजिश्रुति कहती है— सर्वेषामु हैष देवानामात्मा - यदयमग्निः । तत् प्रातरभिपद्य, प्रभिषुत्य -अग्नौ जुहोति । तदग्नावमृतं दधाति, तदात्मन्नमृतं धत्ते । देवो वा -प्रस्यैष श्रात्मा, मानुषोऽयम् । देवा उ अग्रे, अथ मनुष्याः । तस्मादग्नौ हुत्वा भक्षयति " । ( शत ० ६ । ५ । १ । ११ ) [ २०६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्म विज्ञानोपनिषत् दूसरा विवर्त्त है विज्ञानात्मा का । यह अपेक्षया असाधारण होता हुआ भी सृष्टिक्रमानुसार सर्व-साधारण में प्रतिष्ठित है । विज्ञानात्मोपनिषत् का प्रारम्भ करते हु बत-सूर्य्यमूलक विज्ञानात्मा लाया गया है कि, आनन्द विज्ञानगर्भित मनः प्राणवाङ्मय, विद्या - कम्मत्मिक, श्रमृतमृत्युमय, श्रव्ययात्मा नाम से प्रसिद्ध चिदात्मा ( षोडशी - पुरुष ) का पूर्ण विकास सूर्य्य में ही होता है । अतएव सौर इन्द्र को षोडशी कहा जाता है । सूर्य्यगत चिदात्मा, किंवा चिदंश अपनी विद्या ( ज्ञान ), अविद्या ( कर्म्म ) नाम की दोनों कलाओं से पूर्णरूप से विकसित है । सूर्य्य-प्रतिष्ठत चित् ( ज्ञानमात्रा ) इन्द्र ( प्राणमात्रा ) सोम ( भूतमात्रा ) विशिष्ट यही विज्ञानभाग अध्यात्म में प्रविष्ट होकर ' विज्ञानात्मा ' नाम से प्रसिद्ध होता है । यही विज्ञानात्मा ' कारयिता -क्षेत्रज्ञ - बुद्धि ' प्रादि विविध नामों से बहुत हुआ है । ब्रह्मरन्ध्र नाम से प्रसिद्ध नान्दनद्वा ( नान्दनद्वार - इतिद्वार ) से यह अध्यात्म में प्रविष्ट होता है । सूर्य्य इसका प्रभवस्थान है, नान्दनद्वार योनि है, प्रज्ञानमन ( सर्वेन्द्रिय नाम से प्रसिद्ध अनिन्द्रियमन ) इसकी प्रतिष्ठा है । आशय सर्वाङ्ग शरीर है । विज्ञानात्मा में प्रतिष्ठित सोममय चिदंश ' धिषरणा ' कहलाता है, एवं इन्द्रतत्त्व ' प्रारण ' नाम से प्रसिद्ध है | धिषणाभाग ज्ञानप्रधान होता हुआ विद्यात्मक है, प्राणभाग क्रियाप्रधान होता हुआ श्रविद्या-त्मक है | इस प्रकार धिषणा - प्राण - रूप से विज्ञानात्मा पर उस ज्ञान - कर्ममय, किंवा विद्या - कर्ममय पुरुषात्मा का पूर्ण अनुग्रह हो रहा है । यद्यपि आज दिन ' बुद्धि - मनीषा - धिवरणा - धी- प्रज्ञा - मति ' आदि सब शब्दों का एक ही तात्पर्य्य समझा जा रहा है । परन्तु विज्ञानबुद्धि से विचार करने पर ग्रापको विदित होगा कि उक्त सब शब्द सर्वथा विभिन्नार्थक हैं । यद्यपि वस्तुतत्त्व एक है परन्तु उपाधि भेद से ब्रह्मवत् वही बुद्धि मनीषा त्रादि भेद से नानारूपों में परिणत हो रहा है । अवस्थाभेद से ही तो पदार्थ भेद का कारण है । नहीं तो मन है, वही बुद्धि है, वही ब्रह्म है यह कहने में भी कोई हानि नहीं है । वही सावित्राग्नि स्वमण्डल में ( सूर्य्यलोक में ) प्रतिष्ठित रहता हुग्रा देवता है एवं प्रवर्ग्यरूप से सूर्य्य से पृथक् होकर अन्तय्यम सम्बन्ध से पृथिवी में प्रतिष्ठित होकर गायत्री नाम से प्रसिद्ध होता हुआ वही सौर ग्रग्नि " भूत " प्रधान बन जाता है । अन्न ही तो अवस्थान्तर में मल है | क्या अन्न और मल एक वस्तु है? बस यही अवस्थाभेदमूलक भेद बुद्धि - मनीषा आदि शब्दों में समझिए । चिदंश - इन्द्र - सोम- इन तीनों ज्ञानों- क्रिया - अर्थमय भावों की समष्टिरूप विशुद्ध उवथतत्त्व बुद्धि है | विज्ञानात्मिका यह बुद्धि प्रज्ञानात्मक मन पर प्रतिष्ठित होकर ही विकसित होती है । भौतिक विषयों का इन्द्रियों के द्वारा सर्वप्रथम ( संस्काररूप से इन्द्रियाधिष्ठाता प्रज्ञान मन के साथ सम्बन्ध होता है । वासनाभावनासंस्कार रूप से प्रज्ञान मन पर प्रतिष्ठित विषयों का ही बुद्धि भोग करती है । दूसरे शब्दों में भावनावासनासंस्कारावच्छिन्न मन ही बुद्धि का अन्न है । " अन्नं वा इड: ' ( ऐ ० २ । ४ । ) के अनु-सार ग्रन्न तत्त्व “ इट् ' नाम से प्रसिद्ध है । संस्कारावच्छिन्न इट् - रूप ( ग्रन्नरूप ) मन को अपने गर्भ में रखने वाली वही विशुद्धा बुद्धि, बुद्धि न कहला कर " मनीषा " नाम से व्यवहृत होती है । निर्विषया, निरुपाधिका बुद्धि, बुद्धि है, सविषया सोमाधिका वही बुद्धि मनीषा है । सांसारिक विषयों को ही सुख-[ २०७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् मूल मानने वाले सांसारिक यथाजात मनुष्यों में विषयों की प्रधानता से मत प्रबल रहता है, विषयाधिक्य से प्रबल बना हुआ मन अन्नरूप बनता हुआ भी बुद्धि पर अपना अधिकार जमा लेता है । ऐसा विषय प्रधान मन रहती हुई बुद्धि की उपेक्षा कर एक प्रकार से स्वतन्त्र बन जाता है । दूसरे शब्दों में यों कहा जासकता है कि, विषयासक्त मन बुद्धि का श्रन्न नहीं रहता, अपितु बुद्धि का अन्न नहीं रहता, अपितु बुद्धि मन का अन्न बनी रहती है । इसी बुद्धिवारतन्त्र्य एवं मन स्वातन्त्र्य का निरूपण करते हुए महपि कठ कहते हैं-यस्त्वविज्ञान् भवति प्रयुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथे: ॥ कठोपनिषत् १। ३। ५ । ठीक इसके विपरीत शास्त्र अभ्यास के द्वारा अथवा पूर्व जन्म के सुसंस्कारों के प्रभाव से जिनका मन बुद्धि का प्रश्न बन जाता है वे विचारशील मनुष्य इसी मनीषा के द्वारा मनीषी कहलाते हैं । इन्हीं युक्तात्माओं को लक्ष्य में रख कर आगे जाकर श्रुति कहती है-यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ( कठोपनिषत् १ । ३ । ६ ) यदि बुद्धि में विद्या का प्रात्यन्तिक उद्रेक जाता है, तो वह " घिषणा " कहलाने लगती है । अधिक विद्या ( मालुमात ) बुद्धि को अधिक प्रबल बना देती है । उसमें साधारण कोटि के मनुष्यों के घर्षण करने की शक्ति प्राजाती है । ऐसे प्रतिभाशाली के सामने सबको नत मस्तक होना पड़ता है । बहु-दर्शी बहुवित् है, उसकी बुद्धि धिषणा है । आप जितना अधिक विज्ञान सम्पादित करेंगे, आपकी बुद्धि उतनी ही प्रबल होगी । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर धिषणा का " विद्या वै धिषणा " ( तै ० ब्रा०-३।२।२।२ ) यह लक्षण किया जाता है । बुद्धि को उक्थरूपा बतलाया है । उक्ध पिण्ड है । उदाहरण के लिए सूर्य्यपिण्ड को उक्थ समझिए । इस उक्थ पिण्ड से जो प्राणात्मिका रश्मियाँ निकती हैं, वे ही ' नर्क ' नाम से प्रसिद्ध हैं । बिम्वरूपा बुद्धि से निकलने वाली प्राणात्मिका इन्हीं रश्मियों को " घी " कहा जाता है । सर्वप्रथम विषय का प्राधान इन्ही बुद्धिरश्मियों पर होता है, अतएव इन्हें " धी " कहना श्रन्वर्थ बन जाता है । विज्ञान रश्मियां ही विषयाकार में परिणत होती हैं । बुद्धि एक है, प्राणरूपा घी अनन्त हैं । हमारे आत्मा के साथ उक्थरूप विज्ञानधन बुद्धिस्थानीय सूर्य्यं का सम्बन्ध नहीं होता, सम्बन्ध होता है प्राणरूप ( रश्मिरूप ) घी भागका, वे अनन्त हैं । इसी अभिप्राय से - " धियो यो न प्रचोदयात् ” यह कहा जाता है । अतएब - " पुनन्तु मनसा घियः " इत्यादि रूप से तत्तत्स्थलविशेषों में घी का बहुत्वरूप से ही प्रयोग किया गया है । इसी आधार पर " प्रारणा घियः " ( शत ० ६ | ३ | १ | ३ ) इत्यादिरूप से घी को प्राण कहा है । उक्थलक्षण श्रात्मा सदा एक ही हाता है, अर्कलक्षण प्रारण सदा अनन्त ही होते हैं । निष्कर्ष यही हुआ कि, हृदयस्थितता बिम्बात्मिका बुद्धि बुद्धि है । वही अर्कावस्था में आकर धी, किंवा धियः है । [ २०८ ]