Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 21–30
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 21–30
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खण्डचतुष्टयात्मक “ श्राद्धविज्ञान " - ग्रन्थान्तर्गत ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' प्रथमखण्ड १ पितन्नमस्ये निवसन्ति साक्षाद्य देवलोके च तथान्तरीक्षे ॥ महीतले ये च सुरादिपूज्यास्ते मे प्रतीच्छन्तु मयोपनीतम् ॥१ ॥
पितृन्नामस्ये परमात्मभूता ये वै विमाने निवसन्ति मूर्त्ताः ॥ यजन्ति यानस्तमलैर्म्मनोभिर्योगीश्वरा क्लेशविमुक्तिहेतून् ॥२ ॥
पितृन्नमस्ये दिवि ये च मूर्त्ताः स्वधाभुजः काम्यकलाभिसन्धौ ॥ प्रदानशक्ताः सकलेप्सितानां विमुक्तदा येऽनभिसहितेषु ॥ ३ ॥
—श्रीमार्कण्डेयपुराणे
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॥ सब्रह्मणे नमः ॥ श्राद्धविज्ञान [ आत्मविज्ञानोपनिषत् ] मङ्गलपाठ
नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुविप्रतमं ।
न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे महामार्कं मघवञ्चित्रमर्च ॥१ ॥
—ऋक्सं ० १०।११२। वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।
वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥२ ॥
तै ० ब्रा ० २ | ८ | ८ | ४ हे गणपते! आप गणों में ( मरुद्गणों, तथा स्तोतृगणों में ) विराजिए, क्योंकि ( विद्वान् लोग ) आप ही को कवियों में श्रेष्ठतम मेधावी समझते हैं । अपिच बिना आपके ( अनुग्रह के ) लौकिक, अथवा वैदिक, कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता ( इसलिए प्रत्येक कार्य के आरम्भ में आपका प्रथमस्मरण नितान्त अपेक्षित है ) । हे महनीय गणपते! " त्रिवृत् ( 8 ), पञ्चदश ( १५ ), सप्तदश ( १७ ), एकविंश ( २१ ), त्रिरणव ( २७ ), त्रयस्त्रश ( ३३ ) " इत्यादि विविध वाङ्मयस्तोमों से युक्त, अतएव विद्वानों की दृष्टि में आदरणीय जो हमारा यह वाङ्मयस्तोम ( श्राद्धविज्ञान ) है, उसे आप निर्विघ्न पूर्ण करने का अनुग्रह करें ॥१ ॥
( १ ) " ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, २ अश्विनीकुमार " भेदभिन्न ३३ यज्ञिय ग्राग्नेय देवदेवता, यच्चयावत् ( २ ) सौम्यदेवता, ( ३ ) कर्म्मदेवता, ( ४ ) आत्मदेवता, ( ५ ) अभिमानी देवता, ( ६ ) पुरुषविषै-चेतन ( मनुष्य ) देवता ( ७ ) मन्त्रदेवता, ( ८ ) चान्द्रदेवता, ये अष्टविध देवता एकमात्र वाक्तत्त्व को [ १३ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड
वागक्षरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माताऽमृतस्य नाभिः ।
सा नो जुषाणोपयज्ञमागादन्ती देवी सुहवा मेऽस्तु ॥ ३ ॥
मँङ्गलेपोठ - तं ० ब्रा ० २८ | ८ | ५
स इज्जनेन स विशास जन्मना स पुत्रैर्वाजं धना नृभिः ।
देवानां य पितरमाविवासति श्रद्धामना हविषा ब्रह्मणस्पतिम् ॥४ ॥
—ऋक्स ० २।२६।३ । आधार बना कर ही स्वस्वरूप से प्रतिष्ठत हैं, अर्थात् ' देवपात्रं वा यदेष वषट्कार ' के अनुसार वाङ्मय वषट्कार ही इनकी आधारभूमि है । २७ गन्धर्व, " पुरुष - श्रश्व - गौ - श्रवि - श्रज " भेदभिन्न ५ पशु, “ प्रण्डज - पिण्डज - स्वेदज - उद्भिज्ज " भेदभिन्न चतुविध मनु, ये सब ( भी ) वाक्तत्त्व को प्रतिष्ठा बना कर ही जीवित हैं । ' रोदसी - क्रन्दसी- संयतो ' नामक त्रैलोक्यत्रिलोकीरूप, " भूः भुवः - स्वः - महः - जनत् - तपः-सत्यम् ” इन सात लोकों की समष्टिरूप सम्पूर्ण भुवन ( लोक ) वाक् - सूत्र में ही प्रोत हैं । इस प्रकार देवता, गन्धर्व, पशु, मनु, लोक, प्रादि रूप से जो वाक् ' प्रयो वागेवेदं सर्वम् ' के अनुसार सर्वत्र व्याप्त हो रही है, ' इन्द्रपत्नी ' नाम से प्रसिद्ध वह वाग्देवी ( हमारे इस वाङ्मय पितृयज्ञतक्षण श्राद्धविज्ञान निर्माण में ) हमारी प्रार्थना सुनें ॥ २ ॥
" क्षमिति [ ( १ ) - ( २ ) क्ष- ( ३ ) रम् - इति ] त्र्यक्षरम् " ( तां ० म ० ब्रा ० १० ५ | १० ) “ वाग् - इत्येकाक्षरम् ” – “ एकाक्षराव वाक् " इत्यादि श्रौत - सिद्धान्तों के अनुसार वाग्रूप एकाक्षर ब्रह्म, किंवा एकाक्षररूप वाग्ब्रह्म ऋततत्त्व ( प्राणतत्त्व ) से सर्वप्रथम उत्पन्न होने के कारण ' ऋतस्थ प्रथमजा ' नाम से प्रसिद्ध है । ऋत की प्रथमजा यह वाग्देवी अनन्त वेदों की जननी है, अमृत ( सोम ) की उद्भवभूमि है । ऐसी यह वाग्देवी अमृत की वर्षा करती हुई ( पितरप्राणतर्पक इस ) वाग्यज्ञ में पधारे । ग्रपिच हमारी ( अपने अर्थविवर्त्त द्वारा ) रक्षा करने वाली वाग्देवी हमारी यह वाङ्मयी प्रार्थना सुनने का अनुग्रह करे ॥३ ॥
( श्रापोमय - पारमेष्ठ्य मण्डल में प्रतिष्ठत ' पवित्र ' नाम से प्रसिद्ध प्राङ्गिरस -आग्नेय - देवताओं का तृप्तिकारक ब्रह्मणस्पति - सोम श्राग्नेय - देवाहुति होने से देवमूर्ति है, एवं स्वस्वरूप से – सौम्यरूप से— पितरप्राणात्मक है ) इस प्रकार आग्नेय देवताओं तथा सौम्य पितरों के पालयिता ( प्रवासभूमिलक्षरण ) इस परमेष्ठ्य ब्रह्मणस्पति का जो यजमान हविद्रव्य से यजन करता है, वह " सर्वमापोमयं जगत् - लोका सुप्रतिष्ठिताः " के अनुसार ग्रापोमय सम्पूर्ण लोकों से ( जनसे- ' लोकस्तु भुवने जने ), सम्पूर्ण प्रजा [ १४ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रन्वारभेथामनुसंरभेथामेतं लोकं श्रद्दधानां सचन्ते । मङ्गलपाठ यद् वां पक्वं परिविष्टमग्नौ तस्य गुप्तये दम्पत्ती सं श्रयेथाम् ॥५ ॥
- अथर्व सं ० ६ । १२२।३ ।
एतो ज्योतिः पितरस्तृतीयं पञ्चौदनं ब्रह्मणेजं ददाति ।
प्रजस्तमांस्यप हन्ति दूरमस्मिल्लोके श्रद्दधानेन दत्तः ॥६ ॥
- अथर्व सं ० | ५ | εε से, अपने आप से, अपने पुत्रादिवंशजों से, तथा अपने सेवकवर्ग से अभीष्ठ सम्पत्ति प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है । ब्रह्मणस्पति द्वारा पारमेष्ठ्य प्रग्नेय - देवदेवता, तथा सौम्य - पितृदेवता, दोनों के यजन से यजनकर्त्ता सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकारी बन जाता है, यही मन्त्रार्थ निष्कर्ष है ॥४ ॥
दम्पती! ( यजमान, तथा यजमानपत्नी ) आप दोनों परलोकहितसाधक कर्म्म को, तथा कर्म द्वारा प्राप्तव्य परलोक - फल को अपना लक्ष्य बना कर कर्म्म का प्रारम्भ कीजिए, प्रारब्ध कर्म्म में मनसा वाचा कर्म्मणा संयुक्त हो जाइए, क्योंकि देव - पितृयजनात्मक कर्म से प्राप्त होने वाले परलोक - फल को लक्ष्य बना कर ही इस इन्द्रियातीत परलोकफल पर श्रद्धा करने वाले श्रद्धालुजन ही कर्म का अनुगमन करते हैं । इसलिए आप भी श्रद्धापूर्वक देवताओं, तथा पितरों का यजन कीजिए । आप दोनों के लिए स्थालीपाकादिलक्षरण सुसंस्कृत, जो पत्रव अन्न हविरूप से ग्रग्नि में प्रक्षिप्त हुआ है, उसकी रक्षा के लिए आप प्रयत्नशील बनिए । अर्थात् अग्नि में प्रदत्त आहुतिद्रव्य द्वारा ' यावद्धित्तं तावदात्मा ' के अनुसार आपके लिए परलोक - प्रतिष्ठात्मक जिस सुसंकृत दैवात्मा का स्वरूप सम्पन्न हुआ है, उसे अपने श्रद्धाकर्म से प्राप सुरक्षित रखिए ॥ ५ ॥
जो यजमान अपने पिण्डपितृयज्ञ में अनन्य श्रद्धापूर्वक ब्रह्मोदनलक्षण ' पञ्चौदन ' द्रव्य की प्राहुति देता है, उसकी इस प्रदत्त प्राहुति से इस भूलोक के प्रतिविदूर प्रतिष्ठित ' तृतीयद्य नाम ' से प्रसिद्ध सौम्य पितरप्राणमय पारमेष्ठघलोक से सम्बन्ध रखने वाली पितृज्योति प्राप्त हो जाती है, जो कि पितृ-ज्योति स्वगत २८ कल पितृसहोभाग द्वारा सप्तपुरुषपर्य्यन्त सन्तानभाव से वितत होती हुई ( सन्तानभाव में परिणत होती हुई ) लोकप्राप्तिबाधक तमःपुञ्जों का एकान्ततः विनाश कर देती है । पिण्डपितृ-यज्ञात्मक श्राद्धकर्म्म श्रद्धापूर्वक किये जाने से तृतीयद्य निवासी पितरों का ज्योतिर्भाग सहोरूप से शुक्र में प्रतिष्ठित हो जाता है, एवं तद्द्वारा होनेवाली सन्तानपरम्परा से लोकप्रतिष्ठा सुरक्षित रहती है, यही तात्पर्य्य है ॥६ ॥
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड मङ्गलपाठ
श्रद्धाऽग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः ।
श्रद्धां भगस्य मूर्द्धनि वचसा वेदयामसि ॥७ ॥ ॥
श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते ।
श्रद्धां हृदय्ययात्या श्रद्धया विन्दते वसु ॥८ ॥
- ऋक् मं ० १०।१५१ | १ | - ऋक् सं ० १०।१५१।४ ।
श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यन्दिनं परि ।
श्रद्धां सूर्यस्य निचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः ॥९ ॥
ऋक् सं ० १०।१५१+ ५० ऋत्विक्लोग श्रपने देवयज्ञ - कर्म में श्रद्धा के द्वारा ही सौर - दिव्याग्नि का आकर्षण कर इसके समाबेश से इद्ध आहवनीयाग्नि का समिन्धन किया करते हैं, श्रद्धा से इस अग्नि में खुलोकस्य प्रा-देवताओं के लिए बाहुति दी जाती है, ऐसी श्रद्धा का, जो कि ऐश्वर्य के शिरोभाग में ( ऐश्वर्य्यात्मक श्रीभाव की प्रतिष्ठारूप सूय्यं के ऊर्ध्वभाग में सौम्य परमेष्ठी में ) प्रतिष्ठित है, मैं अपनी इस वाणी द्वारा ( इस श्रद्धामय - श्राद्ध विज्ञानात्मक निबन्ध रचनाकर्म में ) विस्तार कर रहा हूँ || ७ || यज्ञकर्त्ता यजमान ( मनुष्य ), तथा पार्थिव प्रवर्ग्यभाग से यजन करने वाले दिव्यप्रारणात्मक देवता वायु से ( वायुद्वारा प्रदत्त ग्राहुतिद्रव्य से ) सुरक्षित रहते हुए ( अपनी इस रक्षा के लिए प्राण-दाय्बात्मिका ) इस श्रद्धा की ही उपासना किया करते हैं । सम्पूर्ण प्राणी हृदयावच्छिन्न मन के मंकल्प से ( संकल्पसिद्धि के लिए ) इसी श्रद्धा की उपासना किया करते । क्योंकि श्रद्धा से ही ग्रभीष्ट-फलसिद्धि होती है, ( अतएव सब इसी श्रद्धा का अनुगमन करते हैं ) || ८ || अपने कम्मस्वरूप सम्पादनानुगत ग्रहःकाल में ( प्रातः से सायं पर्य्यन्त ) हम प्रातःसवनात्मक प्रातःकाल में भी इसी श्रद्धा की प्राराधना करते हैं, माध्यन्दिनवनात्मक मध्याह्न में भी इसी श्रद्धा का अनुगमन करते हैं, एवं सायंसवनात्मक सूर्य्यातकाल में भी इसी का अनुगमन करते हैं । हे श्रद्धे! प्राप तत्तत् कम्र्मानुष्ठानों के प्रति हमें श्रद्धावान् बनाइए ( यही उस श्रद्धा से हमारी विनम्र प्रार्थना है ) || || [ १६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड
प्रियं श्रद्धे ददतः प्रियं श्रद्धे दिदासतः ।
प्रियं भोजेषु यज्वस्विदं म उदितं कृधि ॥ १० ॥
मङ्गलपाठ —ऋक्सं ० १०।१५१।२ ।
श्रद्धा देवानधिवस्ते " श्रद्धाविश्वमिदं जगत् " ।
श्रद्धां कामस्य मातरं हविषा वर्द्धयामसि ॥ ११ ॥
— तै ० ब्रा ० २८ | ८ | ६ |
पितरो मा विश्वमिदं च पृश्निमातरो मरुतः स्वर्काः ।
अग्निजिह्वा तवा यजत्रास्ते नो देवाः सुहवाः शर्म यच्छत ॥ १२ ॥।
- ऐ ० आ ० ५।१।१ । श्रद्धे! दान देने वालों के लिए, तथा दान देने की इच्छा रखने वालों के लिए, दोनों के लिए आप अभीष्टफल प्रदान करें । हे श्रद्धे! आप मेरा, मत्सम्बन्धी भोगार्थी बन्धुत्रों का, यज्ञकर्त्ता यजमानों का, सबका कल्याण करें ( आपसे यही हमारी विनम्र प्रार्थना है ) ॥१० ॥
उक्त लक्षण यह सौम्य श्रद्धातत्त्व अपने सोमात्मक आहुतिभाव से सदा प्राग्नेय प्राणात्मक यज्ञिय देवदेवताओं का अनुगामी बना रहता है ( श्रद्धा द्वारा ही देवप्राण की अध्यात्म में प्रतिष्ठा होती है ) । अपने प्रापोमय पारमेष्ठ्य ' श्रत् ' लक्षण सत्यरूप से लोकसृष्टि की प्रवृत्तिका भी यही श्रद्धा है, एवं पञ्चाहुति - क्रम से लोकप्रतिष्ठ प्रजासृष्टि की मूलप्रभवा भी यही श्रद्धा है । अतएव यह सम्पूर्ण विश्व ( स्थावर सृष्टि ) भी श्रद्धामय है, एवं सम्पूर्ण जगत् ( जङ्गमलक्षणा प्राणिसृष्टि ) भी श्रद्धात्मक ही है | हृदयस्थ सौम्य मन में चान्द्रनाड़ी द्वारा प्रतिष्ठित होती हुई यही श्रद्धा मानस कामनाओं की जननी है । ऐसी सर्वरूपा इस श्रद्धा को इस वाङ्मय ( श्राद्धविज्ञानरूप ) हविः प्रदान द्वारा मैं समृद्ध कर रहा हूं ॥११ ॥
अग्निष्वात्ता - सोमसत् - बर्हिपत् नामक अन्नपितर, प्राज्यपा सोमपा- हविर्भुक - नामक श्रन्नादपितर, तथा ' काली ' नाम के अनुभवपितर मेरी तथा सम्पूर्ण विश्व की रक्षा करें । सूर्य्यरश्मिगत पृश्नितत्व से उत्पन्न पितरप्राण - सहयोगी मरुद्देवता भलीभांति पूजनीय हैं, ( क्योंकि इन्हीं के द्वारा पितृकर्म सम्पन्न होता है ) । साथ ही अग्निद्वारा ग्राहुतिप्रहण करने वाले ' हुताद ' देवता, तथा यजत्र प्रहुताद ' देवता, दोनों स्वसहयोगी मरुद्गणों के साथ एवं मरुद्गणावच्छिन्न सर्वविध पितरों के साथ प्रार्थना पूर्वक इस वाग्यज्ञ में बुलाए जाते हुए हमारे लिए लोकराम्पत्यवाप्तिलक्षण सुख प्रदान करें । [ १७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना
ओष्ठापिधाना न कुली दन्तैः परिवृता पविः ।
सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेन् ॥१३ ॥
ऐ ० आ ० ३।२ | ५ | कृमि - कीट- पक्षी - पशु- मनुष्य - यक्ष - राक्षस गन्धर्व - पिशाच - इन्द्र- पितर - ब्रह्म - प्रजापति, आदि यश्वयावत् ( चतुर्दशविध ) भूतसर्गों के वाङ्मय प्रपश्व की अधिष्ठात्री ( ' पितरो वाक्यमिच्छन्ति ' के अनुसार पितृप्राणाकर्षिणी ), वस्राच्छादन की भांति श्रोष्ठद्वय से सुरक्षित, छिद्ररहित प्रतएव वज्रसदृश दृढ दन्तपक्ति से घिरी हुई यह वाग्देवी इस वाग्यज्ञ ( श्राद्धविज्ञान - निबन्ध ) में मुझ से प्रिय - हित - मित-सत्य - वाणी का प्रयोग करावे || १३ || ॥ इति मङ्गलपाठः ॥ ' किमपि प्रास्ताविकम् ' स १ ' श्रद्धा ' तत्त्व की प्राहुति से २ ' सोम ' ३ ' वृष्टि ' ४ ' प्रन्न ' ५ ' रेतः ' क्रम से पाचवीं प्राहुति जिमें पुरुषसृष्टि का विकास हुआ है, जो ' श्रद्धा ' तत्त्व अपने आपोमय रूप से सम्पूर्ण विश्व तथा विश्वप्रजापति का उपादान कारण है, जो ' श्रद्धा ' तत्त्व त्रयीलक्षण सत्यमूत्ति प्रसिष्ठाब्रह्म के साथ युक्त हो कर सम्पूर्ण विश्व की प्रतिष्ठा बना हुआ है, जिस ' श्रद्धा ' तत्त्व की प्राहुति श्रद्धा - संस्मरण – से दिव्यलोकस्य प्रारणदेवता अपने सम्वत्सराग्नि को समिद्ध रखने में समर्थ हो रहे हैं, द्य ुलोकस्थ सूर्य्य- केन्द्र से भू- केन्द्र पर्य्यन्त वितत जिस ' श्रद्धा ' मूत्र के द्वारा लोकस्थ प्राणदेवता, तथा द्य लोकस्थ ( ' प्रद्यौ ' नामक द्युलोक में प्रतिष्ठित ) पितर भूलोकस्थ यजमानों से प्रदत्त स्व - स्व आहुतिद्रव्य प्राप्त करने में समर्थ बन रहे हैं, जिस ' श्रद्धा ' तत्त्व के आधार पर अग्नीषो-मात्मक पाचमहाभौतिक विश्व का स्वरूपसम्पादक प्राधिदैविक ( प्राकृतिक ) अग्नीषोमीय अग्निहोत्र प्रतिष्ठित है, जिस ' श्रद्धा ' तत्त्व की अपनी स्वरूपरक्षा के लिए वायु से सुरक्षित ( वायुमय - प्राणमय ) देवता निरन्तर उपासना किया करते हैं, जो ' श्रद्धा ' हृदयस्थ मन में प्रतिष्ठित होती हुई सर्वविध कामनाओं की जननी वन रही है - जो ' श्रद्धा ' अपने ' अत् ' लक्षण सत्यधर्म्म से सत्यभाव की मूलप्रतिष्ठा बन रही है, जो ' श्रद्धा ' सूत्र प्रवरपुरुषों के शुक्र में प्रतिष्ठित महानात्मा के द्वारा चन्द्रोर्ध्वभाग में प्रतिष्ठित प्रत - परपुरुषों के महानात्मानों को तृप्त कर पिण्डदान द्वारा ' श्राद्धकर्म्म ' की मूलप्रतिष्ठा बन रहा है, जिस ' श्रद्धा ' तत्त्व के संस्काराभाव - प्र शिक्षा - कुशिक्षा पर शिक्षा - निषिद्धकर्मानु - गमन इत्यादि कारणों से अभिभूत हो जाने के कारण मान वर्ग सत्यधर्म से विमुख से हो जाता है, -* - " इति तु पञ्चाम्यामाहुता वापः पुरुषवचसो भवन्ति " -छां ० उप ० ८।६।१ । [ १८ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना वैदिक विज्ञान के अस्तप्राय हो जाने से, कुछ एक शताब्दियों से पुष्पित- पल्लवित होने वाले वर्णाश्रमधर्म्मविरोधी ' सन्तमत ' के आक्रमण से, आर्षधम्र्म्मविलुप्ति से, व्याजधर्म्मानुगामी अर्वाचीन वेदभक्तों की काल्पनिक वेदन्याख्याओं से, परराजतन्त्रानुगता आर्ष संस्कृतिविरोधिनी परशिक्षा के प्रबल आक्रमण से, सर्वोपरि अचिन्त्याप्रमेय कालपुरुष की महिमा के अनुग्रह से श्रद्धानुगत श्राद्धतत्त्व से सर्वथा ग्रनभिज्ञ, ' श्राद्धेतिकर्त्तव्यता ' से एकान्ततः पराङ्मुख, भ्रान्त भारतीयों के मानसक्षेत्र में श्राद्धसूत्र प्रतिष्टित करने के लिए ' श्राद्धविज्ञान निबन्ध ' के प्रारम्भ में उसी विश्वरूपा ' श्रद्धादेवी ' का संस्मरण करते हुए ' श्राद्धविज्ञान ' प्रारम्भ किया जाता है । ब्राह्म - ग्रहोरात्र की एकोत्तरसप्तति ( ७१ ) चतुर्युगी में से प्रक्रान्त अष्टाविंशतितमा ( २८ वीं ) चतुर्युगी के सत्ययुग आरम्भ काल से कलियुग के आज के भोग्यकाल से लगभग ६० - ७० वर्ष पहले तक भारतीय प्रास्तिक प्रजा का ' श्राद्धकर्म ' के सम्बन्ध में जो श्रद्धा-प्रार्षप्रजाभिमत श्राद्धकर्म- विश्वास था, दुर्भाग्य से इन प्रतीत ६०-७० वर्षों से किसी एक आकस्मिक कलिवात्याहित झञ्झावात से वह शिथिल हो गया । फलतः ' देवकार्य्याद् द्विजातीनां पितृकाय्यं विशिष्यते ' के अनुसार अग्निहोत्र - दर्शपूर्णमासादि लक्षण देवकार्य्यं से भी कहीं विशेष महत्त्व रखनेवाला पिण्डपितृयज्ञात्मक पितृकार्य्यं परप्रत्ययनेय कतिपय महाशयों की दृष्टि में प्रश्रद्धेय बन गया, जिसका दुष्परिणाम सङ्ग - दोष से आस्तिकश्रद्धालु प्रजावर्ग को भी भोगना पड़ रहा है । प्रजा का श्राद्धकर्म की इतिकर्तव्यता के सम्बन्ध में शास्त्राभिमत जो चिरन्तन श्रद्धा - विश्वास है, उसका निम्नलिखित शब्दों में अभिनय किया जा सकता है— " स्थूलशरीर परित्यागानन्तर प्रतिवाहिक - अङ्ग ुष्ठमात्र - सूक्ष्मशरीर धारण कर - ' ये व केचा-स्माल्लोकात्प्रयन्ति, चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' ( कौषीतकि ० उप ० १ | २ | २ | ) इत्यादि कौषीतकि-सिद्धान्तानुसार प्रेतसंज्ञक ' प्रत्यगात्मा ' ( भोक्तात्मा ) कर्म्मफल भोगने से पहले एक बार चान्द्रसम्वत्स-रानुगत १३ महीनों में चन्द्रलोक में पहुंचता है । इसके साथ साथ ही प्रकृति - प्रकृति- अहंकृतिभाव - त्रयी का अधिष्ठाता, सत्त्व - रज - स्तमोगुणक, चतुरशीति ( ८४ ) कल ऋण धनात्मक पित्र्य - सहः पिण्डों से नित्ययुक्त, शुक्रप्रतिष्ठ, ' पितर ' संज्ञक ' महानात्मा ' भी स्वप्रभव चन्द्रलोक के उर्ध्व भाग में उसी एक चान्द्रसम्वत्सर में प्रतिष्ठित हो जाता है । उत्तरायणानुगता स्वर्गलोकगति, तथा दक्षिणायनानुगता नरकलोकगति, दोनों आत्मगतियों के विभाजन, प्रतएव ' एतद्वै लोकस्य द्वारं यच्चन्द्रमाः ' ( कौ ० उप ० १।२।३ ) इस श्रुति के अनुसार ' द्वार ' ( उभयलोकद्वार ) नाम से प्रसिद्ध चन्द्रमा में जब प्रत्यगात्मा तथा महानात्मा, दोनों प्रेतात्मा पहुंच जाते हैं, तो अनन्तर महानात्मा तो स्वप्रतिष्ठालक्षरण विघूर्ध्व भाग में ही प्रतिष्ठित रह जाता है, एवं कर्म्मभोक्ता प्रत्यगात्मा शुभाशुभ कर्मफल भोगार्थं शुभाशुभ उत्तर-दक्षिण - मार्गों में से किसी एक मार्ग को स्वगति का निमित्त बनाता हुग्रा ' देही कर्म्मगति गतः ' के अनुसार लोकान्तरानुगामी बन जाता है । परलोकात्मक चन्द्रलोक में प्रतिष्टित पिता- पितामह प्रपितामहादि के महानात्मा ही ' प्रेत- पितर ' कहलाए हैं । इन्हें ही ' मृतपितर ' कहा गया है । इन मृतपितरों के लिये, दूसरे शब्दों में परलोकगत [ १६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना प्रेतसंज्ञक स्ववंशजों के लिये श्रद्धापूर्वक पिण्डदान करना ही श्राद्धकर्म्म है । इस सम्बन्ध में प्रार्षप्रजा का यह दृढ़ विश्वास है कि, शास्त्रोक्त पद्धति से पुत्र - पौत्रादि वंशजों के द्वारा प्रदत्त पिण्ड - रस इन्द्रियातीत श्रद्धा-सूत्र द्वारा परलोकस्थ पितृ - पितामह प्रपितामहादि की तृप्ति का कारण बनता है । प्रदत्त पिण्डरस ( प्राणात्मक रस ) से सबल बनता हुआ प्रेतात्मा पार्थिवाकर्षणजनित दुःख से युक्त अपनी ' अश्रुमुखा'वस्था छोड़ता हुआ सुखपूर्वक चन्द्रलोक में पहुँच कर सापिण्डयभाव को प्राप्त हो जाता है । ' गजच्छाया ' से सम्बन्ध रहनेवाले कन्यागत महालय श्राद्धपक्ष में तत्तत प्रेतपितरों की तत्तन्निधन - तिथियों में पुत्रादि द्वारा सम्पादित पिण्डदानादिलक्षण श्राद्धकर्म से तत्तत प्रेतपितर प्रतिवर्ण तृप्त हुआ करते हैं । श्राद्धान्न से तृप्त पितर श्रद्धासुत्र द्वारा भूपिण्डस्थ स्व - पुत्रादि के शुक्रस्थ पित्र्यसहः - पिण्डात्मक महानात्मा में जीवनीय-सन्ततिवितानात्मक - पित्र्यरस का प्राधान करते रहते हैं । इस ग्राहित रस से प्रजातन्तुवितान प्रक्षुण्ण बना रहता है, फलतः वंशोच्छेद का अवसर नहीं माने पाता । जो अभिनिविष्ट परलोक जाते हुए, तथा परलोक में पहुँचे हुए प्रेतपितरों के निमित्त पिण्डदानादिलक्षण श्राद्धकर्म नहीं करते, उनके प्रेतपितरों के पित्र्यसहः-पिण्ड क्षीण हो जाते हैं । उनके क्षीण हो जाने से तदभिन्न ततपुत्रादि के शुक्र में प्रतिष्ठित महानात्मा के पित्र्यासह: - पिण्ड क्षीण जाते हैं, शुक्र निर्बल हो जाता है । यही पिण्डक्षय इनके वंशोच्छेद का एक अन्यतम कारण बनता है । इस वंशोच्छित्ति के साथ - साथ बुभुक्षित पितरों के अभिशाप से ये लोकसमृद्धि से भी वञ्चित रहते हैं । अतएव आवश्यक है कि, प्रजातन्तुवितान के लिये तथा प्रेतात्मा को तृप्त कर उस तृप्ति के द्वारा उभर्याविध सोख्य प्राप्ति के लिये प्रत्येक श्रद्धालु श्रद्धानुसार परिग्रहों का संग्रह कर यथाविधि पिण्डानादि लक्षण श्राद्धकर्म का अनुगमन करता रहे । पिण्डदानादि लक्षण श्राद्धकर्म्म के इन्हीं अतिशयों का स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है-स्वर्गं - ह्यपत्य- मोजश्व - शोर्य्यं क्षेत्रं बलं
तथा ।
पुत्रं श्रेष्ठ्यं च सौभाग्यं -समृद्धि - मुख्यतां शुभाम् ॥१ ॥
प्रवृत्तचक्रतां चैव
वाणिज्य प्रभृतीनपि ।
परमां गतिम् ॥२ ॥
श्ररोगित्वं यशो वीतशोकतां
धनं वेदान् भिषसिद्धि कुप्यं गा अप्यजाविकम् ।
अश्वानायुश्च विधिवद्यः श्राद्धं सम्प्रयच्छति ॥३ ॥
कृत्तिकादि - भरण्यन्तं स कामानाप्नुयादिमान् । आस्तिकः श्रद्दधानश्च व्यपेतमदमत्सरः ॥४ ॥
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड वसुरुद्रादितिसुताः
पितरः श्राद्धदेवताः ।
प्रीणयन्ति मनुष्याणां पितृन् श्राद्धेन तर्पिताः ॥ ५ ॥
आयुः, प्रजां धनं, विद्यां, स्वर्ग, मोक्षं, सुखानि च । " प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पतामहाः ॥ ६ ॥
प्रस्तावना —-याज्ञवल्क्यस्मृतिः आ ० श्रा ० १० । " गतानुगतिको लोको न लोकः पारमार्थिकः ” इस लोकसूक्ति से सम्बन्ध रखने वाली प्रचलित परिपाटी के अनुसार ग्रन्थारम्भ करने से पहले उसकी निबन्ध की आवश्यकता तथा तत्सम्बन्ध में प्रथम कारण निदर्शन-प्रावश्यकता के सम्बन्ध में भी कुछ निवेदन कर देना आवश्यक हो जाता है । इसी आवश्यकता का अनुभव करते हुए हमें इस सम्बन्ध में नाप्राप्त अप्रिय सत्य को लक्ष्य बनाते हुए निबन्ध रचनाकारणत्रयी का स्पष्टीकरण करना पड़ रहा है । उन तीनों कारणों में से प्रथम कारण की ओर ही विज्ञ पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । श्राद्धकर्म्म के आर्षप्रजाभिमत स्वरूप के सम्बन्ध में पूर्व में जो कुछ कहा गया है, धार्मिक जगत सदा से उसी वक्तव्य का अनुगमन करता आ रहा है । पिण्डदानादि - लक्षण श्राद्धकर्म की वैदिकता में उसे कभी सन्देह नहीं हुआ । परन्तु विगत अर्द्धशताब्दी से इस आवश्यकतम वैदिक कर्म्म के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के ऊहापोह होने लगे हैं । यों तो ऐसे ऐसे परोक्ष विषयों के सम्बन्ध में साधारण प्रज्ञजनों को सदा से ही व्यामोह होता चला आ रहा है, फलस्वरूप भारतीय आर्षधर्मानुगता ( सनात्नधर्मानुगता ) प्रजा को सदा से ही सामयिक धर्म्मविप्लवों का सामना करना पड़ता है । तथापि वर्तमान शताब्दी का धर्म्मविप्लव अपना एक विशेष महत्त्व रखता है । साथ ही विगत शताब्दियों में परमतवादियों के धर्म पर जितने भी आक्रमण हुए हैं, उन सबकी अपेक्षा आज का आक्रमण अपेक्षाकृत कहीं अधिक भयावह बन रहा है । कारण यही है कि, आज तक इस मानवधर्म्म पर केवल बाह्य श्राक्रमण हुआ था, दूसरे शब्दों में अब तक सनातनधम्मं को विधम्मियों का ही सामना करना पड़ा था, परन्तु दुर्भाग्य से ग्राज उसे स्वधर्मानुयायियों के ही ग्रक्रमण का लक्ष्य बनना पड़ रहा है, एवं इसी दृष्टि से यह आक्रमण प्रतीत प्राक्रमणों की तुलना में कहीं ज्येष्ठ बन रहा है । इस धार्मिक विप्लव के जहां अन्यान्य कई एक सामान्य कारण हैं, वहां यदि हम भूल नहीं कर रहे, तो सर्वश्री स्वामी दयानन्दजी ही एक मुख्य कारण माने जा सकते हैं । ' अनृतसंहिता वै मनुष्याः ' ( शत ० १ । १ । १ । १ ) इस श्रौत - सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य जन्मतः ग्रनृतसंहित होते हैं, स्वप्रभव ऋत के अनुग्रह से भ्रान्ति हो जाना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है । प्रतीतानागतज्ञ, विदितवेदितव्य, साक्षात्कृतधर्म्मा महर्षियों की दिव्य दृष्टि जहां सर्वथा निर्भ्रान्त होती है, वहां केवल बाह्यदृष्टि के अनुगामी सामान्य मनुष्य इन्द्रियातीत विषयों के सम्बन्ध में केवल अपनी बाह्यदृष्टि के आधार पर ' इदमित्थमेव ' निर्णय करने में सर्वथा असमर्थ हैं । यदि वे स्वकल्पना के ग्राधार पर इन परोक्ष विषयों के सम्बन्ध में हठार कुछ निर्णय करने की अनाधिकार [ २१ ]