Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 31–40
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 31–40
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्त'वन चेष्टा करने लगते हैं, तो उनकी यह चेष्टा आर्षप्रजा की में सर्वथा भ्रान्त, ग्रतएव अप्रामाणिक ही उद्घोषित होती है । तत्त्वतः स्वामीजी मनुष्य थे, उनके पास ऋषिष्टिका ग्रात्यन्तिक प्रभाव था । प्रतएव ग्रपनी विशुद्ध वाह्यदृष्टि के ग्राधार पर उन्होंने बाह्यजगत से सम्बन्ध रखने वाली सामाजिक त्रुटियों के प्रति जहां हिन्दू जाति का उपकाराभास किया, वहां अपने मानव सुलभ अनार्ष अनृतभाव के कारण वेदशास्त्रसिद्ध धाम्मिक - इतिकर्तव्यताओं के ( वेदसिद्ध प्रतिमापूजन, अवतारवाद, श्राद्ध, षोडश संस्कार, आदि के ) सम्बन्ध में स्वयं वेदशास्त्र को ही आधार बना कर अपनी विशुद्ध - अनार्ष अनृतभावापन्ना - कल्पना के आधार पर कुछ एक ऐसी भयङ्कर भूलें कर डाली हैं, जिनके प्रभाव से क्रियात्मक सनातनधर्म का एक प्रकार गला घुट गया है । यह कौन जानता था कि, प्राच्य आर्षधर्म्म, ग्रार्षसंस्कृति, प्रार्षसभ्यता आदि प्राच्यविभूतियों के अन्तः प्रकाश को अपने चाकचिक्ययुक्त बाह्यप्रकाश से अभिभूत करने वाले पाश्चात्य शिक्षात्मक सौभाग्य सूर्य्य को पूर्णरूपेण विकसित होने के लिए एक भारतीय वेदभक्त ब्राह्मण के ही द्वारा इस प्रकार का सुपरिष्कृत धरातल उपलब्ध हो जायेगा । आत्म-परमात्मसत्ताज्ञान से वञ्चित, प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने वाले वेदविरोधी चार्वाक लोग अज्ञानतावश— " मृतानामिह जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम् । गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेयकल्पना ॥ " * इत्यादि जिन कुतर्कमूलक कारणाभासों को सामने रखते हुए ' पिण्डदानादिलक्षण ' श्राद्धकर्म्म का उपहास किया करते हैं, स्वामीजी ने उसी चार्वाकमूलक नास्तिकवाद जैसे जधन्यवाद का पोषण करते हुए मृतपितृनिमित्त पिण्डदानादिलक्षण श्राद्धकर्म्म का खण्डन करने का दुस्साहस किया है । चार्वाकमत की समालोचना करते हुए, उक्त श्लोक को चार्वाक मत में उद्धृत करते हुए, चार्वाक के इस कथन की पुष्टि करते हुए उत्तरपक्ष में आगे जाकर स्वामीजी कहते हैं - ब्राह्मणों ने प्रेतकर्म्स अपना जीविकार्थ बना लिया है, परन्तु वेदोक्त न होने से खण्डनीय है ' ( देखिये – सत्यार्थप्रकाश, १२ स ० । चा ० मतमीमांसा, २१ वां संस्करण, २६४ पृ ० ८ वीं पंक्ति ) । इसी प्रकार ग्रार्थसभ्यता के अनन्य पक्षपाती, अनुद्वेगकरी ऋषिभाषा के अपने ग्रापको पृष्ठपो-पक मानने वाले, किन्तु उसी चार्वाकमतमीमांसा में सुप्रसिद्ध वेदव्याख्याता श्रद्वेय महीधरादि वेदभाष्य-कारो के प्रति - ' हां भांड धूतं निशाचरवत् महीधरादि टीकाकार हुए है, उनकी धूर्त्तता है, वेदों की नहीं ' ( सत्या ० २६४ पृ ० १०, ११ पंक्तियां ) इस प्रकार की अशिष्ट - सभ्य भाषा का प्रयोग करते * मरे हुए प्राणियों की तृप्ति का साधन यदि श्राद्ध ( श्राद्धकर्म में मृत पितरों के लिए प्रदत्त पिण्डादिरूप श्राद्धान्न ) है, तो विदेश यात्रा करने वाले जीवित प्राणियों के लिए पाथेय ( मार्ग के भोजन ) की कल्पना व्यर्थ है । फिर तो जिस द्वार से परलोकगत मृतप्राणियों को भोजन पहुंचा दिया जाता है, उसी द्वार से विदेशस्थ प्राणियों को भी तृप्त किया जा सकता है । [ २२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना हुए शिष्टतम उन्हीं स्वामीजी ने अपने विश्वविख्यात ' ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ' नामक ग्रन्थराज में पंच-महायज्ञान्तर्गत पितृयज्ञ का निरूपण करते हुए अपने निम्नलिखित वेदशास्त्रसम्मत, -हां विशुद्ध वेदशा-स्त्रसम्मत? – उद्गार प्रकट किए हैं-" तस्य ( पितृयज्ञस्य ) द्वौ भेदौस्तः- एकस्तर्पणाख्यो, द्वितीयो श्राद्धाख्यश्च । तत्र येन कर्मणा विदुषो देवान् पितृ श्च तर्पयन्ति, सुखयन्ति, तत्तर्पणम् । तथा यत्तषां श्रद्धया सेवनं क्रियते तच्छ्राद्धं वेदितव्यम् । तत्र विद्वत्सु विद्यमानेष्वेतत् कर्म्म संघट्यते, न व मृतकेषु । कुतः । तेषां प्राप्त्यभावेन सेवनाशक्यत्वात् । तदर्थकृतकर्म्मणः प्राप्त्यभाव इति व्यर्थापत्तश्च । तस्माद्विद्यमानाभिप्रायेणैतत् कर्मोपदिश्यते । सेव्यसेवकसंनिकर्षात् सर्वमेतत् कर्त्तुं शक्यते । " " ( ऋ ० भा ० भू ० पितृयज्ञ विषय ) उक्त निदर्शन से प्रकृत में बतलाना यही है कि, जन्मानुगता जाति के अनुग्राहक परम्परा प्राप्त शुभसंस्कारों की कृपा से ' श्राद्ध ' शब्द से तो स्वामीजी को प्रेम अवश्य है । परन्तु वेद - तत्त्वानभिज्ञता-नुगत स्वाभाविक अनृतसंस्कार के अनुग्रह से श्रुति स्मृतिशास्त्रसम्मता पिण्डदानादि - लक्षण मृत प्रतात्मा-नुगता चिरकाल से चली आने वाली श्राद्ध तिकर्त्तव्यता से आप सहमत नहीं हैं, एवं इस अपनी ग्रमा-न्यता की मान्यता के सम्बन्ध में मुख्य कारण आप यह बतला रहे हैं कि " वेदशास्त्र में श्राद्ध का विधान नहीं है ” । शास्त्राभिमत तर्क ( सु ) से सम्बन्ध रखने वाले वाद का अनुगमन ' वादे वादे जायते तत्त्वबोधः ', के अनुसार जहां तत्त्वनिर्णायक माना गया है, वहां शास्त्रविरुद्ध तर्क ( कु. ) से सम्बन्ध रखने वाला वाद दूर से ही प्रणम्य है । अतएव ऐसे खण्डन - मण्डनात्मक वाद से हमारे अन्तर्जगत् का कोई सम्बन्ध नहीं है । प्रतिपाद्य विषय का युक्ति, तर्क, विज्ञान, सर्वोपरि प्राप्तप्रमाण के आधार पर प्रतिपादन कर देना ही हमारे कर्त्तव्य की कृतकृत्यता है । ऐसी दशा में स्वामीजी के श्राद्धकर्म्मविषयक शास्त्रीय कल्पित सिद्धा-* " इस पितृयज्ञ के तर्पण, और श्राद्ध, नामक दो भेद हैं । जिस कर्म से ( मनुष्य ) विद्वानों, देवतात्रों, ऋषियों, तथा पितरों का तृप्त करते हैं, उन्हें सुख पहुंचाते हैं, वह सुख कर्म्म तर्पण है । एवं जिस कर्म्म से श्रद्धापूर्वक इनकी सेवा की जाती है, उसे श्राद्धकर्म्म समझना चाहिए । यह कर्म्म जीवित पितर आदि के सम्बन्ध में ही उत्पन्न है, मरे हुत्रों के लिए नहीं । कारण? मृत पितर जब हैं ही नहीं, तो उनकी सेवा करना, उनके लिए किए गए कर्म की उनके न रहने से व्यर्थता भी है । इसलिए श्राद्ध, तर्पण का उपदेश विद्यमान ( जीवित ) पितरों के लिए ही हुआ है । इस स्थिति में सेवक, और सेव्य ( स्वामी ) के सामने रहने से ( विद्यमान रहने से ) सेवादि सब काम चरितार्थ हो जाते हैं । " [ २३ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना न्ताभास का इस विज्ञानप्रधान - शास्त्रीय निबन्ध में उल्लेख करना यद्यपि सर्वथा असामयिक, साथ ही कुछ एक अभिनिविष्ट सन्मित्रों के लिए उद्वेगकर था, तथापि किसी कारण - विशेष से ही हमें इस निबन्ध--रचना - कारण - निदर्शन में ऐसे अप्रिय सत्य का आश्रय लेना पड़ा है । वेदशास्त्रसम्मत प्रार्षधर्म से विरोध रखने वाले चार्वाकादि नास्तिक ही यदि पिण्डदानादिलक्षण श्राद्धकर्म के विरोधी होते, तो कोई हानि न थी । क्योंकि उनकी सहजसिद्धा ग्रासुरी बुद्धि सदा से ही शाश्वत देवासुरसंग्राम की भांति दिव्य कम्म के साथ प्रतिद्वन्द्विता करती आई है । हानि की क्या कथा, उस परिस्थिति में तो ' श्राद्धविज्ञान ' का रच-नाप्रयास भी अनावश्यक था । परन्तु जब हम अपने ही समाज में, अपनी ही जाति में श्राद्धकर्म के सम्बन्ध में विरोध पाते हैं, दूसरे शब्दों में एक ही वेदशास्त्र को प्रमाणाधार मानने वाला धार्मिक जगत् ही जब श्राद्धकर्म्म के सम्बन्ध में अपना विभिन्न दृष्टिकोण रखता है, तो उस परिस्थिति में - ' एकस्मिन् धम्मरिण विरुद्धनानाकोट्यवगाहि ज्ञानं संशयः * इस लौकिक न्याय के अनुसार साधारण तटस्थ जिज्ञासु मनुष्य सन्देह में पड़ जाते हैं । अपने आपको ' सनातनधर्मावलम्बी ' कहने वाले आर्ष- महानुभाव भी श्राद्धकर्म को वैदिक कर्म्म मान रहे हैं, एवं तदनुसार अनुगमन कर रहे हैं । उधर अपने आपको ' आर्यसमाजी ' उद्घोषित करने वाले महाशय - गण भी श्राद्ध की वैदिकता में यथाकथञ्चित् निष्ठा रख रहे हैं । मानते दोनों हैं, परन्तु इस मान्यता के प्रवृत्तिनिमित्त भिन्न भिन्न हैं । एक ( स ० ) कहते हैं - मृत पितरों के लिए पुत्रादि का श्रद्धा सूत्र द्वारा पिण्डप्रदान करना श्राद्ध है । ' दूसरे ( प्रा ० ) कह रहे हैं - ' जीवित पितरों को अन्न - वस्त्रादि से श्रद्धा-पूर्वक तृप्त करना ही श्राद्ध है । ' निर्विवाद है कि, इस मतविरोध ने, किंवा धर्म ( सनातनधर्म्म ), तथा मत ( श्रार्यमत ) की प्रतिस्पर्द्धा ने आज जनसाधारण को संशयास्पद् बना रक्खा है । इस ' गृहकलह, ' किंवा दो ग्रहों के पारस्परिक ' ग्रहकलह को शांत करने के लिए ही इस निबन्ध की आवश्यकता समझी गई है । हमारा यह विश्वास ही नहीं, अपितु दृढ़ निश्चय है कि, यदि पाठकों ने दोषदृष्टि से भी एकबार ' श्राद्धविज्ञान - निबन्ध ' को श्राद्योपान्त देखने का कष्ट उठाया, तो उनके श्राद्ध कर्म्म सम्बन्धी सम्पूर्ण सन्देह दूर हो जायंगे । अज्ञानता ही मतभेद की जननी है, मतभेद सामाजिक संगठन का विच्छेदक है, समा-जविच्छेद ही राष्ट्रीय निर्वलता का प्रवर्तक है, एवं निर्वल राष्ट्र ही सर्वस्वविघातिका परतन्त्रता के पाश में बद्ध होता है, जिसका प्रत्यक्ष निदर्शन श्राज का परतन्त्र भारतवर्ष है । ' हम ज्ञानबल के अनुग्रह से निष्पक्षपात बनते हुए यथार्थस्थिति पर पहुंच कर परस्पर का विरोध छोड़ दें, विरोध- परिहार द्वारा अपने प्रसंगठित समाज को सुसंगठित बनाते हुए स्वतन्त्राह्नान करने के अधिकारी बनें ' श्राद्धविज्ञान रचना की कारणत्रयी में यही प्रथम कारण - निदर्शन है । ' एक ही धर्म्म, किंवा धम्र्मों में स्थाणु, तथा पुरुषलक्षण अनेक विरुद्व ज्ञानों का जब उदय हो जाता है, तो ऐसी दशा में - ' स्थाणुर्वा वा ' इत्याकारक सन्देह उत्पन्न हो जाता है । " [ २४ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना पाञ्चभौतिक विश्व में जितने भी जङ्गम प्राणी हैं, उन सब में ' मनुष्य ' प्राणी का स्थान सर्वोच्च माना गया है । इस सर्वोच्चता का एकमात्र कारण यही है कि, अन्य जङ्गम- प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य में ज्ञानशक्ति विशेष मात्रा से विकसित रहती है । इसी ज्ञानशक्ति के प्रभाव द्वितीयकारण निदर्शन - से अपने ज्ञानानुगत पराक्रम से अपना प्रभुत्त्व जमा लेता है । किं बहुना, स्वज्ञान बल से ही इसने विश्व की समस्त चर - अचर विभूति को अपना भोग्य बना रक्खा है । ज्ञानशक्ति ही पुरुषत्त्व है, ज्ञानविहीन पुरुष पुच्छविषाणहीन पशु है । जिस प्रकार सप्तवितस्ति-कायात्मक, वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञमूर्ति ईशप्रजापति अपने ज्ञानबल से सम्पूर्ण विश्व का भोक्ता बन रहा है, एवमेव ईश्वरसंस्था में मुक्त यच्चयावत् ईश्वरांशों का प्रवर्ग्यरूप से अपनी अध्यात्मसंस्था में संग्रह करता हुआ - ' पुरुषो वै प्रजापतेर्ने दिष्ठम् ' ( शत ० १ कां ० ५ ० १ ० ) इत्यादि ब्राह्मणश्रुति के अनुसार प्रजापति के समकक्ष बन कर यह पुरुष सर्वत्र स्वसत्ता की व्याप्त किए हुए है । यद्यपि सृष्टि - विज्ञानानुसार पुरुष में जन्म से ही इतर प्राणियों की अपेक्षा ज्ञानशक्ति का आधिक्य रहता है, तथापि इसके पूर्ण विकास के लिए शिक्षाशास्त्र का ग्राश्रय ग्रहण करना आवश्यक हो जाता है । ऊर्ध्व - प्ररोहित होने की जन्मतः शक्ति रखते हुए भी वृक्षादि जैसे जलसिचन के बिना विकसित नहीं हो सकते, एवमेव बिना बाह्यशिक्षा के जन्मतः प्रतिष्ठित भी ज्ञानशक्ति का विकास असम्भव है । प्रशिक्षित मनुष्य की ज्ञानशक्ति मुकुलित रहती हैं, मेघाच्छन्न सूर्य्यवत् उसकी स्वज्ञानरश्मियों का प्रसार अवरुद्ध रहता है । जो दशा एक पशु की है, वही दशा एक यथाजात प्रशिक्षित मनुष्य की है । कर्त्तव्यविवेकशून्य ऐसे मनुष्य की दृष्टि किसी पूर्ण ( वास्तविक ) तत्त्व की ओर न जाकर शून्य ( निरर्थक ) भावों की र ही मुहुर्मुहुः आकर्षित होती रहती है, अतएव ( मुहुर्मुहुरनुगता शून्यसमतुलिता ' ख ' दृष्टि से ) ऐसा अशिक्षित यथाजात ' मूर्ख ' कहलाया है । इस सम्बन्ध में यह भी स्मरण रखना आवश्यक होगा कि, मनुष्य जैसी शिक्षा का ग्राश्रय लेता है, उसका हृदयावच्छिन्न मन, एवं ततप्रतिष्ठिता बुद्धि, दोनों का विकास तदनुरूप ही होता है । शिक्षा मनुष्य के हृद्य जगत का निर्माण करनेवाला एक अव्यर्थ यन्त्र है । भारतवर्ष ने अपनी प्रार्थसभ्यता-संस्कृति - साहित्य के विकासकाल से आरम्भ कर अद्यावधि अनेक प्राक्रमणों का सामना किया । उदाहरण के लिये वेदविरोधी- बौद्धमत को ही लीजिये । शताब्दियों तक बौद्धसंस्कृति की छत्रच्छाया में रहता हुआ भी भारतवर्ष अपनी वैदिक - संस्कृति से पराङ्मुख न हुआ । इसका एकमात्र कारण था ' शिक्षायन्त्र पर उसका अपना आधिपत्य ' । यही कारण था कि, बौद्धमत में दीक्षित ' देवानांप्रिय ' प्रियदर्शी:सम्राट् अशोक की राजसभा में जो सम्मान बौद्धभिक्षुत्रों को प्राप्त था, वही सम्मान आर्षधर्मानुयायी ब्राह्मणों को प्राप्त हुआ । अपने प्रबल तर्कवाद से नास्तिकों के युक्तिवाद का समूल विनाश कर विलुप्तप्राय प्रार्षधर्मं को पुनः स्थापित करनेवाले भगवान शङ्कराचार्य, प्रातःस्मरणीय कुमारिलभट्ट, श्रद्धेय मण्डनमिश्र, जगदीश्वर के प्रति — [ २५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ऐश्वर्य्यमदमत्तो हि मामज्ञाय वर्तसे । उपस्थितेषु बौद्धेषु मदधीना तव स्थितिः ॥ * प्रस्तावना इस प्रकार की गर्वोक्ति का प्रयोग करनेवाले, अपने सुप्रसिद्ध ' कुसुमाञ्जलि ' ग्रन्थ द्वारा ईश्वर-सत्ता के संस्थापक, तर्कशास्त्रपारङ्गत सर्वश्री उदयनाचार्य, आदि कई एक महापुरुषों को उसी परम्परासिद्ध-स्वशिक्षा - सन्तान के बल पर तत्कालीन भारतवर्ष ने जन्म दिया । ग्रागे जाकर दुर्भाग्य से इस श्रार्ष संस्कृति को यवनमत का सामना करना पड़ा । यह ग्राक्रमण बौद्ध आक्रमण से कहीं भयङ्कर सिद्ध हुआ । कला के ग्रन्यतम शत्रु नरराक्षसों ने कला को विध्वस्त किया, देवप्रतिमाएं तोडी गई, देश का मौलिक साहित्य अग्निज्वाला को समृद्ध करने में सहायक बनाया गया, ललनात्रों का सतीत्त्व छीना गया, अबोध बच्चे जीवितदशा में ही दीवारों में चुना दिए गए । यह सभी कुछ प्रकाण्ड ताण्डव हुआ, परन्तु सौभाग्य से इस युग में भी प्राततायियों की दृष्टि से हमारा शिक्षायन्त्र यथाकथञ्चित् बचा रह गया । फलतः इस युग में भी हमारी मौलिक सभ्यता इस ग्राक्रमण को सहने में सर्वात्मना समर्थ हो गई । प्रतिभासम्पन्न कवियों के अतिरिक्त वर्णाश्रमधर्मात्मक प्रार्षधर्म के अनन्य समर्थक महात्मा तुलसीदास, भक्तप्रवर सूरदास, सर्वश्री सन्त तुकाराम, समर्थ रामदास स्वामी, श्रीज्ञानेश्वर महाराज, सूक्तिवर कबीर आदि महापुरुषों ने उसी भयावह युग में उसी शिक्षानुग्रह से इस देश को अलंकृत किया । स्वनामधन्य हम्मीर, प्रताप, छत्रसाल, शिवाजी, गुरुगोविन्दसिंह, आदि क्षत्रियवीरों ने अपनी इसी आर्षशिक्षा के बल से यवनों की प्रबलशक्ति को छिन्न भिन्न किया, और इस प्रकार ' स्वधम्र्मे निधनं श्रयः परधर्मो भयावहः ' श्रादर्श की अनुगामिनी प्रार्षप्रजा ने इस भवबन्धन से पुनः मुक्तिलाभ प्राप्त कर लिया । परन्तु ' ' ' ' ' ' ' ' | इस ' परन्तु ' का अतीत इतिहास सभी इतिहासों की सीमा का प्रतिक्रमण करने वाला सिद्ध हुआ | कहने के लिए यवनाक्रमणजनित भय से हमारा त्राण करने वाले, प्रतएव हमारे परम हितैषी पाश्चात्य महानुभावों की किसी शुभ मुहूर्त्त में भारत वसुन्धरा के वक्षस्थल पर पादप्रतिष्ठा हुई । जिस * ऐसी किंवदन्ती है कि, एक बार उदयनाचार्य श्रीजगदीश के दर्शनार्थ पधारे । उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि, जगदीशविग्रह ( मूर्ति ) उन्हें साक्षात् रूप से दर्शनों का सौभाग्य प्रदान करें । अनेक बार मानसिक प्रार्थना करने पर भी जब उन्हें साक्षात् दर्शन न हुए, तो अन्त में प्रवेश के कारण उनके मुख से निकल पड़ा कि - " हे जगदीश! ग्राज तू अपने ऐश्वर्य के मद में पड़ कर मेरा तिरस्कार ( उपेक्षा ) कर रहा है । परन्तु तुझे यह नहीं भुला देना चाहिए कि, जब बौद्ध लोग तेरी सत्ता ( ईश्वर सत्ता ) उखाड़ने के लिए सामने आते हैं, तो उस समय तेरी सत्ता मेरे अधीन रहती है " । श्रर्थात् मैं न हूं, तो संसार तुझे मानना छोड़ दे । सुनते हैं- भक्त की इस शुद्धहृदय से निकलने वाली भक्तिपूर्ण अन्तर्वेदना के बल से भगवत् प्रतिमा ने साक्षाद रूप से उदयनाचार्य को दर्शन दिए । [ २६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना प्रकार सप्तगोलकयोग से, किंवा ऐन्द्रविद्यत् के आघात से समस्त भूपिण्ड कम्पित हो उठी । कहना नहीं होगा कि, यह आक्रमण पूर्व के दोनों आक्रमणों से कही भयङ्कर था । परम राजनीतिज्ञ लार्ड मेकॉले महोदय ने भारतवर्ष की पावनभूमि पर पाश्चात्य शिक्षा - प्रसार के साधनभूत भवननिर्माण की मूलभित्ति ( नींव ) रखने के अनन्तर स्वदेश ( इंग्लैन्ड ) वासी अपने किसी बन्धु को निम्नलिखित आशय का एक पत्र प्रेषित किया था--' मित्र! आज मैंने भारतवर्ष ऐसा शिक्षालय स्थापित कर दिया है, जिस में शिक्षा ग्रहण करने वाले भारतीय प्रचार, व्यवहार, सभ्यता, प्रदि में सर्वात्मना यूरोपियन बन जायेंगे । रह जायेंगे केवल नाममात्र के लिए भारतीय ' । सचमुच उस दूरदर्शी राजनीतिज्ञ की उक्त भविष्यवाणी आगे जाकर सर्वथा चरितार्थ हुई । पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीय नवयुवकों का हृदय और का और ही बना दिया, जोकि हृदयस्थान सभ्यता, संस्कृति, जातीयता, आदि स्वभावों की मूलप्रतिष्ठा माना गया है । इन शिक्षालयों में अपनी आयु के सारभाग की आहुति देने वाले, अपने जन्मदाता - अभिभावकों की सचित सम्पत्ति का सदुपयोग (? ) करने वाले हमारे इन नवयुवकों ने प्रतिफल में प्राप्त क्या किया? श्रूयताम् ' तुम्हारे पूर्वज निरे जङ्गली थे, विज्ञानशून्य थे, असभ्य थे, अग्नि वायु- वृष्टि आदि जड़ पदार्थों के पूजक थे । जो ' कुछ भी उन्नति हुई है, इसी युग में, एकमात्र हमारे अनुग्रह से ही हुई है । खाना, पीना, सोना, उठना, चलना, फिरना, वेषभूषा धारण करना, सभ्यसमाज में बैठ कर सभ्यता का बर्ताव करना, आदि सम्पूर्ण मानवधर्म्मो ( सभ्यताओं ) के प्रथम प्रवर्त्तक एकमात्र हम ही हैं । हमने तुम्हें पशु से मनुष्य बनाया है, हमने तुम्हारे देश की अराजकता दूर की है, जो अराजकता तुम्हारे यहां आने से ग्राज तक दूर न हुई थी । हां, स्मरण रखना, भारतवर्ष तुम्हारी प्रातिस्विक सम्पत्ति नहीं । तुम लोगों ने बाहर ( पामीर से आकर इस देश पर अपना अधिकार जमा लिया है ( इसलिए आज हम भी अपने अपूर्व गुण - बल से इस पर अपना अधिकार प्रतिष्ठित करने में कोई प्रापत्ति नहीं समझते!!! ) । तुम्हारा धर्मं ब्राह्मणों की स्वार्थलीलामात्र है । इसी अवैज्ञानिक कल्पित धर्म के अनुगमन से ग्राज तक तुम उन्नति से वञ्चित रहे । अब इस हमारे शिक्षा साम्राज्य के आश्रय से तुम्हें जीवन की सफलता का अनुभव होगा ' । आचार - व्यवहार में परतन्त्रता का आदेश देने वाली, किन्तु विचार स्वातन्त्र्य प्रदान करने वाली, श्रतएव मानवीयमन के विकास की अनन्य साधनभूता भारतीय प्रार्षशिक्षा की प्रतिद्वन्द्विता में राजनीति का बाना पहन कर उपस्थित होने वाली पाश्चात्य शिक्षा ने प्रार्षशिक्षा से ठीक विपरीत प्रपना दृष्टिकोण बनाया । इस ने श्राचार - व्यवहार में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की, तथा विचारों में पूर्णरूप से परतन्त्र बना [ २७
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना डाला । आचार - व्यवहार की स्वतन्त्रता से एक ओर जहां हमने भारतीय आचार - व्यवहारों का एकान्ततः परित्याग कर प्रतीच्यदेशाभिमत श्राचार - व्यवहारों का अनुगमन करते हुए व्यक्तिगतरूप से अपने आपको परतन्त्र बना डाला, वहाँ दूसरी ओर स्वविचारपारतन्त्र्य से उन्हीं के विचारों का ग्रनुगमन करते हुए हमने अपने प्राध्यात्मिक जगत् को भी परतन्त्रता के निबिड़पाश में बद्ध कर डाला । इस प्रकार बाह्य, तथा अन्तः, उभयथा हम परतन्त्र बन गए । ग्राज न हमारे पास अपने आचार - व्यवहार हैं, न अपने विचार | उभयविध दासता से आज हमें अपनी प्रतीत स्मृतियाँ भी मिथ्या प्रतीत होने लगी हैं । इस प्रकार वर्तमान शिक्षायन्त्र के अनुग्रह से आज हम स्व - भाव से एकान्ततः विदूर पहुँच चुके है, एवं यही वर्तमान शिक्षा की सबसे बड़ी देन है । आचार - व्यवहारपारतन्त्र्यगर्भिता विचारस्वतन्त्रतात्मिका स्वतन्त्रता मानवीय मन का जन्म सिद्ध अधिकार है । संसार की कोई भी ग्रासुरीशक्ति ( भौतिकवल ) अधिक समय तक इस पर अपना अधिकार नहीं रख सकती । फलतः चरमसीमा पर पहुँच कर भारतीयक्षेत्र ने भी करवट बदली और देश ने एक स्वर से सस्यश्यामला मातृभूमि का यशोगान प्रारम्भ किया । परन्तु एक सब से बड़ी बड़ी भूल उन गायकों ने कर डाली, अथवा तो चिरकाल से विकृत संस्कारों के भूल हो पड़ी । जिनकी हत्तन्त्री से स्वतन्त्रता का झङ्कार विनिर्गत हुआ, उनकी शिक्षादोष से प्राक्रान्त थी । मलिन दर्पण से भूल, हां सब से अनुग्रह से स्वतः एव वह हृत्तन्त्री पूर्वकथनानुसार विनिर्गत रश्मियाँ जिस प्रकार स्वस्वरूप से स्वच्छ शुक्ल रहती हुई भी संसर्गदोष से मलिन रहती हैं, एवमेव परशिक्षाक्रान्ता हृत्तन्त्री से विनिर्गत स्वतन्त्रता का निनाद भी कालान्तर में परतन्त्रता का ही साधक सिद्ध हुआ । इस परतन्त्रतात्मिका स्वतन्त्रता का पहला मुष्टिप्रहार उस ग्रार्षभ्यसता पर ही हुग्रा, जिस की रक्षा ही एतद्देशीय स्वातन्त्र्य का बीजमन्त्र है । आज भारतवर्षं में स्वतन्त्रता की लहर ' वीचितरङ्ग ' न्याय से इतस्ततः प्रवाहित है । आबाल-वृद्ध - वनिता, सभी स्वतन्त्रता प्राप्त करना चाहते है । इस प्रकार देश प्राज स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए व्यग्र हो रहा है । परिणामस्वरूप वर्त्तमान राज्यसत्ता के साथ असहयोग किया जा रहा है, तत् प्रदर्शनार्थ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हो रहा है । ' सुस्वागत् '!!! परन्तु साथ - साथ स्वतन्त्रता के अनन्य-पोषक आर्षधर्म्म का, तदनुगामिनि प्राशिक्षा का उपहास करना भी परमपुरुषार्थ माना जा रहा है । ' महद्द ु : खास्पदम् '!!! । सर्वत्र एक स्वर से यही सुनाई पड़ रहा है कि, – ' हमारे पतन का, हमारी परतन्त्रता का एकमात्र कारण हमारा धर्म्म ( सनातनधर्म्म ), तथा तत्प्रवर्त्तक - पोषक समर्थक ब्राह्मण ही हैं । स्पृश्यास्पृश्य, सहशिक्षा, विधवा परिणय, आदि को धम्मं बिरुद्ध उद्घोषित करने वाले स्वार्थमूलक इसी सनातनधर्म्म ने, एवं तत्पृष्टपोषक स्वार्थी पण्डितों ने ही समाजस्वरूप का मूलोच्छेद करते हुए राष्ट्र-पारतन्त्र्य का बीजवपन किया है ' । कलकत्ता में होने वाली कांग्रेस में देश के एक प्रमुख व्यक्ति ने तो यहां तक आगे बढ़ने का दुस्साहस कर डाला था कि, – ' जब तक इन शास्त्रों को अग्नि में नहीं जला दिया जायगा, तब तक देश कभी स्वतन्त्र न हो सकेगा ' । भगवान् चतुर्मुख ब्रह्मा ने लोक, प्रजासृष्टि निर्माण के लिए सर्वप्रथम वेदशास्त्र का आविर्भाव किया । सहसा वेदशास्त्र को छीन कर असुर पाताल में जा छुपे । वेदशास्त्र के बिना सृष्टिक्रम अवरूद्ध हो [ २८ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना गया । अन्तोगत्वा भगवान् विष्णु को मत्स्यावतार धारण कर वेदशास्त्र का उद्धार करना पड़ा । एवं तब कहीं ब्रह्मा विश्वनिर्माण कर्म में समर्थ हो सके । इस प्रकार प्रादृष्टिकोण से जो प्रार्षशास्त्र ( वेदशास्र ) न केवल भारतवर्ष का ही, अपितु सम्पूर्ण त्रैलोक्य का स्वरूपरक्षक बन रहा है, उसे अग्निसात् करके स्वतन्त्रता का आह्वान करने वाले ये स्वतन्त्रतावादी क्या प्रलयकाल को निमन्त्रण नहीं दे रहे? जिस प्रार्थशास्त्रसिद्ध यज्ञकर्म्म के बल से देवताओं ने असुरों को परास्त कर अपनी विलुप्त स्वतन्त्रता पुनः प्राप्त की, वही प्रार्षशास्त्र ग्राज इन स्वतन्त्रता प्रेमियों की दृष्टि में अनन्य बाधक प्रतीत होता हुआ क्या ' विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ' को चरितार्थ नहीं बना रहा? स्वतन्त्रता - प्रेमियों की वह कौन सी सभा न होगी, जहां प्राशास्त्र, तत्प्रवर्तक ऋषिगण, तन्मूलक सनातनधर्म्म, तत्पोषक पण्डितवर्ग, तदनुगामिनी प्रजा का प्रवाच्यवादों से सत्कार (? ) न किया जाता हो? साथ ही ग्रार्षधर्म्मपोषक विद्वानों को - ' पुराणपन्थी ' रूढ़ियों के गुलाम ' स्वतन्त्रता के शत्रु ' प्रादि सदुपाधियों से विभूषित न किया जाता हो? आज तो यह धर्म्मविरोध यहां तक बढ़ गया है कि, जिन देश के सर्वमान्य नेताओं का अपना प्रधान लक्ष्य एकमात्र असहयोगानुगमन था, वे भी इसी बोर सर्वतोभावेन • रहे हैं । पवित्र देवमन्दिरों में प्रवरवर्णों का बलात्कार से प्रवेश कराने में, उनके हित-व्याज से धारासभा ( Legislativ Assembly ) में राजनियम ( Law ) बनवाने में ही ग्राज हमारे इन देश नेताओं की सम्पूर्ण शक्ति का अपव्यय, किंवा निरर्थक क्षय हो रहा है । यह सब प्रकाण्डताण्डव क्यों हो रहा है? उत्तर एकमात्र वही शिक्षामन्त्र । वर्तमान शिक्षा ने ग्रार्षप्रजा के दिव्य संस्कारपुञ्ज को श्रावृत कर लिया है । ग्राज हमारे उक्थ ( बिम्ब ) का स्वरूप दूषित हो गया है । दूषित उक्थ से दूषित अर्क ( मनोभावनाएं ) निकल रहे हैं * स्वसंस्कृतिरक्षक ग्रार्षशास्त्र ( वेदशास्त्र ) ज्ञान से एकान्ततः शून्य, शास्त्र-सिद्ध - मनःसंस्थास्वरूपनिर्मापक आहार - विहारादिलक्षण ग्राचार पारतन्त्र्य का सर्वथा तिरस्कार करने वाले, नदोष को गुणपक्ष में स्थापित करने वाले, सर्वोपरि यावज्जीवन पर शिक्षास्रोत में प्रवाहित रहने वाले महानुभावों के उक्थ से यदि उक्त प्रकार के धर्म्म- बिरोधी अर्क निकलें, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है | वर्चस्व - तेजोयुक्त ज्ञानबल ही हमारे अन्तर्जगत का ' स्व ' भाग है, एवं ' स्व - तन्त्र ' से सम्बन्ध रखने वाली आचार - व्यवहार - पारतन्त्र्यगर्भिता विचारस्वातन्त्र्यमूला स्वतन्त्रता ही ' स्व - तन्त्र ' ( आत्मतन्त्र ) को सुर-क्षित रखने वाली वास्तविक स्वतन्त्रता है, जिसकी मूलप्रतिष्ठा एकमात्र प्राशास्त्र तथा तदनुगामिनी शिक्षा ही मानी गई है । प्रार्षशिक्षानुगत ज्ञानबल ही ब्रह्मबल है, ( ज्ञानगुप्ति से ) बोजपूर्ण बना हुआ कर्म्मबल ही क्षत्रबल है, ब्रह्म - क्षत्र ( ज्ञान कर्म्म ) से सुगुप्त प्रथंबल ही विड्बल है । जहां वर्तमान शिक्षा विशुद्ध अर्थतन्त्र को अपना प्रधान लक्ष्य बनाती हुई जड़तामुलिका साम्राज्य - लिप्सा का समर्थन कर रही है, वहां आर्षशिक्षा ब्रह्म के ( ज्ञान के ) आधार पर क्षत्र ( कर्म्म ) द्वारा विड् ( अर्थ ) का नियन्त्रण करती * श्रनभ्यासेन वेदानामाचारस्य च वर्जनात् । प्रालस्यादन्नदोषाच्च मृत्युविप्राञ्जिघांसति ॥ ( मनु: ५/४ ) [ २ ९ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना हुई धर्म ग्रर्थ, काम, मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थों का समर्थन कर रही है, एवं यही भारतीय प्रशिक्षा की संक्षिप्त रूपरेखा है, जिसका अन्य निबन्धों में विस्तार से प्रतिपादन हुआ है । हमारा यह केवल विश्वास ही नहीं, अपितु दृढ़ निश्चय है कि, जब तक मानसिक दासता से देश उन्मुक्त नहीं हो जाता, तब तक अन्य प्रयत्नसहस्रों से भी वास्तविक स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो सकती । भारतीय दृष्टिकोण से मानसिकदासता से त्राण पाने का एकमात्र उपाय है - प्रध्यात्ममूलिका सहजज्ञानशक्ति का विकास ज्ञानशक्तिविकास का एकमात्र उपाय है - अध्यात्ममूला प्रार्ष शिक्षा का अनुगमन, जो ग्राशिक्षा एकमात्र प्राशास्त्र ( वेदशास्त्र ) में, एवं तन्मूलक स्मृति, पुराणादितर शास्त्रों में उपबृंहित हुई है । जब तक उक्तलक्षण प्रार्षशिक्षा का अनुगमन न किया जायगा, तब तक स्वयं जगदीश्वर भी हमें स्वतन्त्र न बना सकेंगे । देश का सौभाग्य है कि, देशनेता भी वर्तमान शिक्षा से ग्राज संत्रस्त दिखाई देने लगे हैं । जैसा कि उक्थार्कस्वरूप द्वारा पूर्व में कहा गया है, नेताओं का ध्यान अभी केवल शिक्षा प्रणाली की ओर ही आकर्षित हुआ है । परन्तु वह प्रणाली कैसी हो? शिक्षा कोनसी हो? इत्यादि प्रश्न अभी उनके लिए ग्रसमाधेया प्रश्नावली ही बन रही है । व्यक्तितन्त्ररक्षक स्वानुगत श्राचार, व्यवहार, सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, साहित्य, आदि को जला-ञ्जलि समर्पित करते हुए अपनी मौलिक जातीयता को स्मृतिगर्भ में विलीन कर हमें जो ' स्वतन्त्रता ' प्राप्त होगी, उससे हमारा स्व - तन्त्र सुरक्षित रहेगा? अथवा विनष्ट हो जायगा? इन प्रश्नों की मीमांसा मुकु-लितनयन बन कर उन स्वतन्त्रता प्रेमियों को ही करना चाहिए । ' हम हम बने रहें, और फिर स्वतन्त्रता प्राप्त करें ' यही वास्तविक स्वतन्त्रता कहलाएगी । हमारी सामान्य दृष्टि में - एक परतन्त्र अश्व का गर्दभ बनकर स्वतन्त्रता प्राप्त करने की अपेक्षा उसका अपने श्रश्वरूप से स्वतन्त्रता के लिए प्रयास करना कहीं अधिक श्रेय: पन्था है । ' अस्तु इस पराधिकार चर्चा करने का न तो हमें अधिकार ही है, न योग्यता ही है । प्रस्तुत वक्तव्य से निवेदन केवल यही करना है कि, जिस क्षण से हमारा शिक्षायन्त्र परायत्त बना है, उसी क्षण से हमारी परतन्त्रता का श्रीगणेश हुग्रा है । ' वर्तमान शिक्षाप्रणाली ने, शिक्षाप्रणाली में स्वीकृत वर्तमान ऐतिहासिक ग्रन्थों ने, वर्तमान ( पाश्चात्य ) विज्ञान के प्राधार पर समुद्भूत विविध प्रावि -ष्कारों ने भारतीय प्रजा के मानस जगत में इस विश्वास को दृढ़मूल बना दिया है कि, यदि उन्नति का कोई श्रेष्ठ मार्ग है, तो वह है एकमात्र पाश्चात्यशिक्षा! पाश्चात्य सभ्यता!! पाश्चात्य ग्राचार-व्यवहार!!! वर्त्तमान शिक्षा की अप्रतिहगति के अनुग्रह से हम अपने स्वरूप को भूल गए, आत्मविस्मृतिमूलक हमारे दुर्भाग्य का यह पहला तथा मुख्य कारण । भारतीय विद्वानों की अनन्य कृपा का प्रहार दूसरा कारण । ग्रर्ष साहित्यमूला ग्रार्वशिक्षा, ग्राशिक्षामूलक प्रार्षधम्मं ( वर्णाश्रमधर्म्म ), ग्राचार, व्यवहार, संस्कृति, सभ्यता, आदि ऐसे दृढ दुर्ग माने गए हैं, जिन्हें विश्व की कोई भी प्रवलशक्ति स्थानच्युत नहीं कर सकती । ऐसी स्थिति में प्रश्नोत्थान स्वाभाविक बन जाता है कि, जबकि हम अपनी अभेद्य प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित थे, तो प्राप्रतिष्ठा की तुलना में सर्वथा प्रतिष्ठित पाश्चात्यप्रतिष्ठा ने ग्राप्रतिष्ठा का [ ३० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना श्रासन क्यों, एवं कैसे छीन लिया? यह एक माना हुआ सिद्धान्त है कि, अपनी निर्बलता ही पराक्रमण-साफल्य का प्रधान कारण है । अवश्य ही जिस युग में पाश्चात्य शिक्षा ने हमारे यहाँ का प्रातिथ्य ग्रहण किया, हम अपनी श्रार्ष शिक्षा को या तो भुला चुके होंगे, अथवा तो उसका व्याज से प्राचरण कर रहे होंगे । अन्यथा आगन्तुक परशिक्षाक्रमण कभी हमें अपनी प्रार्थशिक्षा प्रतिष्ठा से च्युत नहीं कर सकता था । हमारे उपदेशक विद्वान् अपने उपदेशों की प्रथम भूमिका में ही यह घोषणा करते हैं कि, पाचा-त्यशिक्षा के प्रभाव से भारतीय नवयुवकों का श्रद्धा - विश्वास सनातनधर्म्मादेशों से हट गया है । ' इस सम्बन्ध हमारे विद्वान् बन्धु यह भूल जाते हैं कि, पाश्चात्यशिक्षा के साथ साथ स्वयं हमारा भी इस प्रश्रद्धान में परोक्ष, तथा प्रत्यक्षरूप से पूर्ण सहयोग हैं । पहले तो हमारा उपदेश ही केवल वाचिक है, उस पर आर्षशास्त्र को हमने दूर से ही प्रणम्य मानते हुए अपने उपदेशों को और भी अधिक शून्यं शून्यं बना लिया है । कर्तव्य की प्रतिच्छाया से भी वश्वित, आर्षशास्त्र की सर्वथा उपेक्षा करने वाले, सर्वोपरि सामयिक सन्तमत ( सम्प्रदायवाद ) के अभिनिवेश से सम्पुटित ऐसे उपदेशों, तथा उपदेशक विद्वानों के रहते यदि पाश्चात्य शिक्षा स्वाक्रमण में सफल हो जाय, तो इसमें क्या प्राचर्य है । अङ्गीभूत प्रार्षशास्त्र ( वेदशास्त्र ) के रहस्य ज्ञान का अधिकार प्रदान करने के किए जिन ' शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्यौतिष ' इन ६ अङ्ग - शास्त्रों ने जन्म लिया था, कुछ एक शताब्दियों से से भारतीय विद्वानों ने इन अङ्ग शास्त्रों के, उनमें भी विशेषतः व्याकरणशास्त्र के अध्ययनाध्यापन को ही प्रधानता दे रक्खी है । वेदाङ्ग - ज्योतिष का स्थान मयासुरोप हित अर्वाचीन ज्योतिष ने ग्रहण कर रक्खा है | षडङ्गों में से शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, ये चारों अङ्गशास्त्र भी स्मृतिगर्भ में विलीन हैं । इसके अति-रिक्त काव्य - साहित्यादि ने भी अपनी प्रभुता प्रतिष्ठित कर रक्खी है । इस प्रकार ज्ञान - विज्ञानप्रधान श्रङ्गी-भूत वेदशास्त्र का सर्वथा तिरस्कार कर नाममात्र के लिए अङ्गशास्त्र, विशेषतः काव्य - साहित्य परिशीलन में ही अपने सम्पूर्ण जीवन की आहुति देने वाला आज का विद्वतसमाज धर्म के मौलिकरहस्यज्ञान ( उपपत्तिज्ञान ) से सर्वथा पराङमुख हो रहा है । यदि विशेष अनुग्रह हुआ, तो स्मृति - ग्रन्थों पर धर्म - परि-शीलन की सीमा समाप्त मान ली जाती है । सम्भवतः हमारे उन मान्य विद्वानों से यह तिरोहित नहीं है कि, स्मृतिग्रन्थ केवल अनुशासक ग्रन्थ हैं । ' ऐसा करो, ऐसा न करो, जब करो, तब करो ' इत्यादि रूप से तत्तदुपादेय कम्मों की विधि ( प्राज्ञा ) बतलाने वाला, तथा तत्तदनुपादेव शास्त्रविरुद्ध कम्र्मों का निषेध करने वाला विधिनिषेधात्मक ग्रन्थ है । वहाँ आपकी - ' ऐसा ही क्यों करें, ऐसा क्यों न करें इन जिज्ञा-मात्रों का समाधान प्राप्त नहीं हो सकता । कारण उपपत्ति बतलाना स्मृतिशास्त्र के अधिकार से सर्वथा भूत है । यदि भूल से कोई स्मृतिशास्त्र से ' क्यों? ' प्रश्न कर बैठता है, तो वह ' नास्तिको वेदनिन्दकः ' कह कर उसका तिरस्कार कर देता है । बात यथार्थ है । प्रधान न्यायालय अपने कनिष्ठ अधिकारी ( मातहत ) को यह ग्राज्ञा देता है कि तुम इस आशय का एक प्रज्ञापत्र प्रजा में वितीर्ण कर दो कि, ' ग्राज से एक सप्ताह पर्य्यन्त कोई भी व्यक्ति रात्रि के ११ बजे पीछे मकान से बाहर न निकाले । यदि कोई इस राजाज्ञा का उल्लङ्घन [ ३१ ]