Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 221–230
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 221–230
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् प्रज्ञान मन में प्रज्ञा और प्राण, कलाएं हैं । चिविशिष्ट सोम प्रज्ञा है, यह वीध है । इसी पर बुद्धिरूप सूर्य का प्रतिबिम्ब चमकता है । प्रज्ञान मनका प्रज्ञाभाग ही अध्यात्म संस्था में बुद्धिप्रतिष्ठा का कारण है । इस प्रज्ञाभाग से युक्त वही बुद्धि प्रज्ञा कहलाने लगती है । प्रज्ञा भिन्न वस्तु है, प्राण पृथक् पदार्थ है, परन्तु दोनों का तादात्म्य है । एक दूसरे के बिना दोनों अप्रतिष्ठित हैं । इसी अभिप्राय से महर्षि कौषीतकि कहते हैं— यो वै प्राण: - सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा - स प्रारणः । सह ह्य ेतावस्मिन् शरीरे वसतः, सहोत्क्रामतः ॥ ( कौ ० उ ० ३।३ ) प्रज्ञा के सम्बन्ध से विज्ञान के अनुग्रह द्वारा जहां मन में ज्ञान का उदय होता है, वहां प्रारण सम्बन्ध से इसमें कुर्वद्रूपता का विकास होता है - " उभयात्मकं मनः " । यदि प्रज्ञाप्राणात्मक मन के केवल प्राज्ञ भाग पर दृष्टि डाली जाती है, तो इस दशा में प्रज्ञावच्छिन्ना बुद्धिको हम ' प्रज्ञा ' कहेंगे । यदि प्राण-युक्ताप्रज्ञा के साथ, दूसरे शब्दों में मन के साथ बुद्धि के दर्शन किए जायंगे, तो इस अवस्था में इसे प्रज्ञान न कह कर " मति " कहा जायगा । यद्यपि मनन ( चिन्तन ) मन का धर्म माना गया है । परन्तु किसी एक विषय पर चिरकाल पर्य्यन्त मन की वृत्ति को लगाए रहना ही मनन है । उधर - " चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् " ( गीता ६ । ३४ ) के अनुसार सर्वथा चञ्चल मन अपने विशुद्धरूप से स्थिरधर्म्म के प्रयोजक मनन- व्यापार में असमर्थ है । स्थिरधर्म - प्रयोजिका एकमात्र बुद्धि के सहयोग से ही मनमें स्थि-रता का उदय होता है । ऐसी अवस्था में मानना पड़ेगा कि, मनन न केवल मन का व्यापार है, न केवल बुद्धि का व्यापार है, अपितु बुद्धियुक्त मन ही किंवा मनोमयी बुद्धि ही मनन की अधिष्ठात्री है । मनन ही " मति " है । मनोयुक्ता बुद्धि ही मति है । उपर्युक्त अवस्थाकृतभेदों को समझते हुए बुद्धि - मनीषा मति - प्रज्ञा - आदि का पर्य्यायसम्बन्ध मानना किसी सीमा तक ठीक है, परन्तु ग्रांख मीच कर यथेच्छ प्रयोग करना विज्ञान - विरुद्ध है । अस्तु विविधभावात्मिका इस बुद्धि को प्रकृत प्रकरण में हमने " विज्ञानात्मा " नाम से व्यवहृत किया है । इस नामकरण की उपपत्ति यही है कि, प्रज्ञान मन सब में समान परन्तु व्यक्तिभेद से बुद्धि में अन्तर है । ऐन्द्रिय विषय भोग करना मन का काम है । इस अंश में सब समान हैं । श्राहार - निद्रा - भय - अशन-पानादि इन्द्रिय भोगों में सब की समान वृत्ति है - " सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् " । इस दृष्टि से सब मनुष्य एक श्रेणी में प्रतिष्ठित हैं । परन्तु बुद्धि विज्ञानमयी है विविध ज्ञानमयी है । सौरज्ञान विविधरूप में परिणत होकर ही ग्रस्मदादि में प्रतिष्ठित होता है । उसका एक ही ज्ञान ( बुद्धि ) अनेक भागों में विभक्त हो रहा है । एक श्वान में प्राण परीक्षा - विज्ञान प्रतिष्ठित देखा जाता है । इसी विज्ञान के आधार पर नह भगेहुए चोर का पता लगाने में समर्थ होता है । ज्ञानका गर्व रखने वाले हम मनुष्यों में यह शक्ति नहीं है | विज्ञानधारा सर्वथा विभक्त हो रही है । इसी के तारतम्य से एक पण्डितराज भी व्याख्यान नहीं दे सकते, एक साधारण व्यक्ति भी अच्छा बोल लेता है । इसी विज्ञान की कृपा से एक श्रमजीवी ( मजदूर ) दिन भर पत्थर ढोने पर भी चार - छ आना ही प्राप्त करता है, परन्तु इसी विज्ञान की महिमा से शान्ति [ २०६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्म विज्ञानोपनिषत से बैठा हुआ एक वैज्ञानिक क्षणमात्र में अतुल सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है, एवं सर्वत्र उसका यश व्याप्त हो जाता है इस प्रकार बुद्धि अनेक रूपा है, प्रज्ञानवत् समान धम्मिणी नहीं है । बुद्धि के इसी वैविध्य से " विविधं ज्ञानं विज्ञानम् " इस निर्वचन के अनुसार इसे विज्ञानात्मा कहा जाता है । विज्ञान के तारतम्य से ही सेवक - स्वामी, गुरू - शिष्य, हाकिम - ग्रहलकार, छोटा - बड़ा, अमीर - गरीब, इत्यादि द्वन्द्वभाव उत्पन्न होते हैं । विज्ञानात्मा में धिषणा - प्रारण, ये दो कलाएं बतलाई गई हैं । साथ ही में धिषणा भाग को ज्ञान कहा है, एवं प्राणभाग को कर्म्म कहा है । ज्ञानकर्म्ममयी विज्ञानात्मिका इस धिषरणा, तथा प्रारण विविर्त बुद्धि के आगे जाकर ग्राठ विवर्त हो जाते हैं । " श्रविद्या स्मितारागद्वेषाभि-निवेशाः पञ्च क्लेशाः " ( पा ० योगदर्शन 213 ) के अनुसार कम्र्मात्मा को प्रत्यवाय का भागी बनाने वाले पांच क्लेश प्रसिद्ध हैं । अज्ञान श्रविद्या है । ' श्रज्ञानेनावृत ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ' ( गीता ५।१५ ) के अनुसार यही अज्ञानरूपा अविद्या मोह की जननी है । ज्ञानाभाव अज्ञान नहीं है, अपितु आज्ञानावृत ज्ञान ही अज्ञान है । अनुकूल बन्धन राग है, प्रतिकूल बन्धन द्वेष है । जिस प्रकार अपना श्रात्मीय सदा मन पर चढ़ा रहता है, उसी प्रकार प्रात्मीय से भी कहीं अधिक शत्रु बुद्धि पर चढ़ा रहता है । जो राग है वही द्वेष है । दोनों में आसक्तिरूप बन्धन समान है । अतएव दोनों को दोन मानकर एक रूप में ' श्रासक्ति ' नाम से व्यवहृत किया जा सकता है । आत्मा का संकोचभाव ही ' अस्मिता ' है । सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य आत्मा में प्रतिष्ठित है । फिर भी हम प्रत्येक कार्य में परमुखापेक्षी बने रहते हैं । आज यह नहीं, कल वह नहीं, इस प्रकार से आत्मा अपने आप में प्रत्येक वस्तु की कमी का अनुभव किया करता है । यही आत्मा का अस्मिता ( स्मितभाव के विकास का प्रभाव ) भाव है । दुराग्रह ही ' अभिनिवेश ' है । शास्त्रज्ञानाभावरूप प्रज्ञान से अविद्या का उदय होता है, आसक्ति से राग-द्वेष का नैश्वर्य से अस्मिता का, एवं ग्रधर्म से अभिनिवेश का उदय होता है । रागद्वेषरूपा आसक्ति, अविद्या, अस्मिता, अभिनिवेश, ये चारों ही श्रविद्याएँ हैं । इन चारों का सम्बन्ध बुद्धि के कर्म्मप्रधान प्राण भाग के साथ रहता है । इसीलिए प्रारणावच्छेदेन बुद्धि की चार अवस्थाएँ हो जाती हैं । दूसरा है धिषणा भाग । इस के साथ अविद्याचतुष्टयी के चार विपर्य्ययों का सम्बन्ध रहता है । विद्या का तिरोभाव ज्ञान से होता है । अस्मिता का विलयन ऐश्वर्य से होता है । आसक्ति का विनाश वैराग्य से होता है । धर्मभावना अभिनिवेश का उच्छेद करती है । इन का सम्बन्ध ज्ञानमय धिषणाभाग के साथ होता है, अतएव धिषणावच्छेदेन बुद्धि की इन चारों ज्ञानप्रधानावस्थायों को " विद्याबुद्धि ” कहा जाता है । इस प्रकार क्लेश, एवं क्लेश के चार विपर्ययों के सम्बन्ध से धिषणा - प्राणात्मिका बुद्धि की आठ अवस्थाएँ हो जाती हैं । यही प्राधानिकशास्त्र की - " अष्टौ बुद्धयः " हैं । विद्याबुद्धि - चतुष्टयी से अव्ययात्मा का विद्याभाग प्रसन्न होता है, अतएव इसे विद्याबुद्धि ( आत्मविद्यानुगामिनी बुद्धि नाम से एवं क्लेशचतुष्टयावच्छिन्ना प्राणप्रधाना ग्रविद्या बुद्धि से अव्ययात्मा का अतः इसे अविद्याबुद्धि ( ग्रात्मविद्यानुगामिनी बुद्धि ) नाम से व्यवहृत व्यवहृत करना यथाप्राप्त है, अविद्याभाग सबल बनता है, करना श्रन्वर्थ है । [ २१० ]
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् * १ – १ – धर्मबुद्धि: -- श्रार्षविद्या - धर्म्मप्रवृत्तिका २–२ – ज्ञानबुद्धिः-- सिद्धविद्या -- ज्ञानप्रवृत्तिका - धिषणा प्रधाना विद्याबुद्धिचतुष्टयी श्रष्टौ बुद्धयः ३ – ३ – वैराग्यबुद्धिः - राजर्षिविद्या --- वैराग्यप्रवर्तिका ४ - ४ - - ऐश्वर्य बुद्धि: - - राजविद्या- -- ऐश्वर्यत्रवतिका ५ - १ - अभिनिवेशबुद्धिः--- श्रधर्मप्रवर्तिका ६ -- २ - प्रविद्याबुद्धिः ७ – ३ – रागद्वेषबुद्धिः --- अज्ञानप्रवर्तिका -ग्रासक्तिप्रवृत्तिका -- प्राणप्रधाना प्रविद्या बुद्धिचतुष्टयी ८ -४ - श्रस्मिता बुद्धिः - - - अस्मिताप्रवृत्तिका यह है सौर विज्ञानात्मा का संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन । इस का प्रधान कर्म्म है - प्रज्ञानमनोऽवच्छिन्न, वैश्वानर - तेजस -- प्राज्ञसमष्टिरूप कर्मात्मा को कर्म में प्रवृत्त रखना । प्रकररणोपसंहार इसी की प्रेरणा से कर्मात्मा कर्म्म करने में समर्थ होता है, अतएव इसे कारयिता ( कर्म्म कराने वाला ) कहा गया है । प्रज्ञान मन पर विषय आते हैं, परन्तु यह विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) विषय पर जाता है । ' यह बात हमारी समझ में नहीं ग्राई, श्रमुक बात हमारे जचती ही नहीं यह व्यवहार प्रज्ञानमन से सम्बन्ध रखते हैं । ' हमारा खयाल उस ओर नहीं दौड़ता, सोचते हैं, परन्तु कल काम नहीं करती " इत्यादि व्यवहार विज्ञानात्मा से सम्बन्ध रखते हैं | नवीन कृति में विज्ञान की प्रधानता रहती है, प्रतिकृति ( नकल ) में प्रज्ञान की प्रधानता रहती है । नबीन ग्रन्थ की रचना बुद्धि से सम्बन्ध रखती है, बने हुए ग्रन्थ की प्रतिलिपि में मनोव्यापार प्रधान रहता है । शरीर-निपात के ग्रनन्तर यह विज्ञानात्मा भोगसाधक बना हुआ कम्र्मात्मा के साथ साक्षी रूप से युक्त रहता है । इन सब विषयों का सोपपत्तिक विशद निरूपण ' गीता हिन्दी विज्ञान भाग्य ' में देखना चाहिए । [ २११ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् स्वस्वरूप से असङ्ग इस विज्ञानात्मा का गति - श्राद्ध - प्रेतकर्म्म प्रादि से कोई सम्बन्ध नहीं है । क्षेत्रज्ञवि-ज्ञान क्षेत्र का अधिष्ठाता मात्र है । विज्ञानात्मनिरूपण गतार्थ हुआ । अब क्रमप्राप्त ' महानात्मविज्ञानो-पनिषत् ' की ओर पाठकों का ध्यान प्राकपित किया जाता है । तदित्थं देव - विज्ञानभेदेन द्विकलोऽयं सूर्य्यो विज्ञानात्मा वा व्याख्यातो द्रष्टव्यः । समाप्ता चेयं श्राद्धविज्ञानान्तर्गत ' श्रात्मविज्ञानोपनिषदि ' प्रथमायां प्रथमखण्डात्मिकाय ' विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् ' चतुर्थी [ २१२ ]
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड ( ५ ) १- श्रधिदैवतम् - चन्द्रमा ( पूर्णमदः ) २- श्रध्यात्मम्- महान् ( पूर्णमिदम् ) महानात्मविज्ञानोपनिषत् अथ " महानात्मविज्ञानोपनिषत् " पञ्चमी महानात्मा - प्राकृतात्मा - चन्द्रमाः १ - प्रकृतिमहान् ( आकृत्यात्मा ) २ - प्रकृतिर्महान् ( प्रकृत्यात्मा ) ३ – अहंकृतिर्महान् ( श्रहं कृत्यात्मा )
मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत! ॥१ ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय! मूर्त्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ २ ॥
- श्रीमद्भगवद्गीता १४ अ ०।३,४, । ( ५ ) महानात्मस्वरूपपरिचय: -( तेजः - स्नेहमयो महानात्मा )
स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुषश्चन्द्रः ।
धिये वाजाय हिन्वतु ॥१ ॥
--ऋक् सं ० १।२७।११ । [ २१३ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत्
क इमं वो निण्यमा चिकेत वत्सो मातृर्जनयत स्वधाभिः ।
बीनां गर्भो सामुपस्थान् कविनिश्चरति स्वधावान् ॥२ ॥
- ऋक्सं ११६५ | ४ |
महाँ प्रति महिष वृष्ण्येभिर्धनस्पृदुग्र सहमानो अन्यान् ।
एको विश्वस्य भुवनस्य राजा स योधया च क्षयया च जनान् ॥३ ॥
—ऋक्सं ० ३।४६।३ ।
नि वेवेति पलितो दूत प्रास्वन्तर्ममहांश्चरति राचनेन ।
वपूषि बिभ्रदभि नो विचष्टे महद्देवानामसुरत्वमेकम् ॥ ४ ॥
—ऋक्सं ० ३।५५।११ । प्राविः सन्निहितं गुहाचरं नाम महत्पदमन्त्रैतत् समर्पितम् । एजत् प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥५ ॥
- मुण्डको ० २।२।१ ।
एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन् क्षेत्रे संहरत्येष देवः ।
भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥६ ॥
तद्वै स प्राणोऽभवन् महान् भूत्वा प्रजापतिः ।
भुजो भुजिष्या वित्वा यत् प्रारणान् प्रारणयत् पुरि ॥७ ॥
यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यते ॥ ८ ॥
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः ।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्मता प्रापः स प्रजापतिः ॥९ ॥
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । - श्वे ० उ ० ५।३ ।
- शत ० ब्रा ० ७।५।१।२४ ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥१० ॥
[ २१४ ] — कठोप ० २ | १ | ६ | - यजुः सं ० ३२ | १ | — कठोप ० १।२।२२ ।
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महानात्मब्रह्मणे नमः महानात्मा - चन्द्रमाः ' महद्ब्रह्मे त्युपास्व
यो योनि योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः ।
ऋषि प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैबिर्भात जायमानं च पश्येत् ॥
- श्वे ० उ ० ५।२ यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिरणा मयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुरणांश्च सर्वान् विनियोजयेद्यः ॥ – श्वे ० उ ० ५।५
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥
महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्त्तकः । - यजुः सं ० ३१।१८ सुनिर्मला मिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ —श्वे ० उ ० ३।११ । भूतं भविष्यत् प्रस्तौमि बहुब्रह्मकमक्षरम् । महद्ब्रह्मकमक्षरम् ॥ —शत ० व्रा ० १०।४।१।६ । दात्मा ' नाम से प्रसिद्ध षोडशीपुरुष, प्राणप्रधान श्रव्यक्तात्मा, ग्रापः प्रधान यज्ञात्मा, ' चिवाक्प्रधान विज्ञानात्मा, अन्नप्रधान प्रज्ञानात्मा, ग्रन्नादप्रधान कर्मात्मा, चित्याग्निप्रधान शरीर, भेद से अनेक संस्थायुक्त प्राध्यात्मिक प्रपञ्च की मूलप्रतिष्ठारूप यह महा-महान की महत्ता नात्मा सचमुच महान् ( बड़ा ) है । यदि ग्रध्यात्मसंस्था से महानात्मा को पृथक् कर दिया जाता है, तो शेष अखण्ड - सखण्ड आत्मविवर्त, तथा शरीर सब कुछ उत्क्रान्त हो जाते हैं । सशरीर सम्पूर्ण आत्मविवर्त्त महान् के ही गर्भ में प्रतिष्ठित हैं । शुक्रमूर्ति महान् [ २१५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत् के साथ जब तक कर्मात्मा का ग्रन्थिबन्धन रहता है, तभी तक सशरीर - सपरिग्रह कम्र्म्मात्मा बन्धन में है । महन्थि - विमोक ही कम्र्मात्म - मुक्ति का मूलद्वार है । भूत, भविष्यत्, वर्तमान, सभी कुछ इसी महानात्मा पर प्रतिष्ठित है । संसार में जितनी भी प्राकृतियाँ हैं, जितने भी प्रकृति ( स्वभाव भेद हैं, जो भी महंकृतियाँ हैं, उन सब का प्रादिप्रवर्तक यही महानात्मा है, जैसा कि आगे जाकर विस्तार से स्पष्ट होने वाला है । महानात्मा के इसी सर्वापेक्षाकृत महत्व को लक्ष्य में रखते हुए वैज्ञानिकों ने सर्वव्यापक षोडशी बल्शेश्वर श्रव्यक्त, आदि किसी को भी महान् न कह कर एकमात्र इस पारमेष्ठय - तत्व को ही ' महान् ' उपाधि से विभूषित किया है, जिस उपाधि का ' ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्य ' के ' महवात्मप्रकरण ' में विस्तार से विश्लेषण हुआ है । " महोबेव " " महान् " इत्यादि नामों से प्रसिद्ध यह प्राकृतात्मा यद्यपि श्रापोमय परमेष्ठ की वस्तु है, जैसा कि पूर्व के यज्ञात्मप्रकरण में बतलाया जा चुका है, तथापि अध्यात्म-महोबेव और महान् संस्था की अपेक्षा से इसकी मृतप्रतिष्ठा बुक्र है । उधर शुक्र चान्द्रपदार्थ है, अतएव इस आत्मगतिप्रकरण की अपेक्षा से इस प्रकरण में हमने इसे चन्द्रमा की वस्तु माना है । वस्तुतः इसकी महत्ता परमेष्ठी के सम्बन्ध पर ही निर्भर है । इस महानात्मा में सत्त्व - रज - तम, ये तीन गुण, एवं श्राकृति - प्रकृति- महंकृति भेद से तीन प्रकृतियाँ नित्य प्रतिष्ठित रहती हैं, जैसा कि यज्ञात्मप्रकरण में ही विस्तार से बतलाया जा चुका है । जब तक महानात्मा स्वस्वरूप से प्रति-ष्ठित रहता है, तब तक जीवात्मा कथमपि मुक्त नहीं हो सकता । ' महानात्मा में स्थूल - सूक्ष्म - कारण ' शरीरभेद से तीन ग्रन्थियां रहती हैं । स्थूलग्रन्थि से वाङ्मय स्थूलशरीर स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है । इसका प्रधान सम्बन्ध पार्थिवभूतभाग - प्रधान तपोमूत्ति प्रकृतिमहान् के साथ है । सूक्ष्मग्रन्थि से प्राणगभित मनोमय सूक्ष्मशरीर को रक्षा होती है । इसका प्रधान सम्बन्ध चान्द्रभाग - प्रधान रजोमूर्ति प्रकृति महान् के साथ है । कारणग्रन्थि से मनोगभित इन्द्रमय कारणशरीर की स्वरूपरक्षा होती है । इसका प्रधान सम्बन्ध सौरभाग - प्रधान सत्वमूर्ति श्रहंकृतिमहान् के साथ है । जब तक उक्त तीनों ग्रन्थियों में से एक भी ग्रन्थि रहती है, तब तक महानात्मा में चिदाभास ( चित् प्रतिबिम्ब ) रूप से प्रतिष्ठित चिदात्मा ( जीव ) कभी मुक्त नहीं होता । चिदात्मा की योनि यही महानात्मा है । यजुम्र्म्मय अव्यक्त तत्त्व भी - " सोऽनया त्रध्या विद्यया सहापः प्राविशत्, तत श्राण्डं समवतंत " ( शत ०६ । १ । १ ) के अनुसार इसी श्रापोमय महान् के गर्भ में प्रविष्ट रहता है । भृग्वङ्गिरोमय पारमेष्ठय यज्ञात्मा की प्रतिष्ठा भी यही आपोमय महान् है । सौर विज्ञान, चान्द्रप्रज्ञान भी यहीं प्रतिष्ठित है । शरीरत्रयमूर्ति अध्यात्मसंस्था का भी चरम प्राधार यही महा-नात्मा है । संभूति- विनाश, दोनों का संचालक भी है । इस प्रकार इस महान् की महत्ता सर्वात्मना सिद्ध है । इस महानात्मा में प्रधानरूप से पारमेष्ठ्यसोम, चिवंश, पितृ - प्राण, ये तीन तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । तीनों तत्वों के समुचितरूप का ही नाम ' महानात्मा ' है । सोमतत्व की सोम - चित् और पितरप्राण - अपेक्षा से यह महान् है, चिदंश की अपेक्षा से यह प्रात्मा है, पितृ - प्राण की अपेक्षा से यही पितर है । पितरप्राणावच्छेद से ही यह महान्– " सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत! " ( गी ० १४१३ ) इस स्मार्त्त सिद्धान्त के अनुसार सब का प्रज [ २१६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत् यता ( उत्पादक ) है । प्रजनयिता को ही लोकभाषा में पिता कहा जाता है, अतएव महदूगर्भित प्रजन-यिता सौम्यप्राण को " पितर " कहना न्यायतः प्राप्त है । अधिदैवतसंस्था में ही यही प्रजनयिता परमेष्ठी नाम से प्रसिद्ध है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वाजिश्रुति कहती है-१ - - " ता वाऽएताः प्रजापतेरधिदेवता प्रसृज्यन्त - श्रग्नि- रिन्द्रः सोमः परमेष्ठी प्राजापत्यः । तत एतं परमेष्ठी प्राजापत्यो यज्ञमपश्यत् - दर्शपूर्णमासौ । ताभ्यामयजत । ताभ्यामिष्ट्वा कामयत -5 । स - श्रहमेवेदं सर्वं स्यामिति श्रापोऽभवत् । श्रापो वा इदं सर्वम् । ता यत् परमे स्थाने तिष्ठन्ति ( सूर्या-दपि परमे स्थाने तिष्ठन्ति, तस्मात् परमेष्ठी नाम । " २ - - - " श्रौषधिलोको वै पितरः " ( शत ० १३ । ८।१।२० ) ३ - - " पितृलोकः सोमः " ( कौ ० १६।५ । ) - शत ० ११।१।६ ४ " पितृदेवत्यो वं सोमः " ( शत ० २ । ४ । २ । १२ । ) ५ " प्रजापतिर्वै चन्द्रमाः, प्रजापतिर्वै महान् देवः " ( शत ० ६॥ ३।१६ । ) यही महान संसार का शुक्र ( उपादानद्रव्य ) होने से " शुक्र " नाम से भी व्यवहृत हुआ है । " सप-र्थ्यगाच्छुक्रम् ” ( ई ० उ ० ) ' शुक्रमेतदतिवर्त्तन्ति धीराः " ( मुण्डक ) " तदेव शुक्रम् " ( कठोपनिषत् ) इत्यादि स्थलों में पढ़ा हुआ शुक्र शब्द महानात्मा का ही वाचक है । इस पारमैष्ठ्य सोममग महान का चन्द्रमा के साथ संबन्ध होता है । दूसरे शब्दों में चान्द्र सोम ही आध्यात्मिक महान् की प्रतिष्ठा है । महद्ज्ञान-विज्ञानज्ञान - प्रज्ञानज्ञान, इन तीनों ज्ञानों में से विज्ञान ( बुद्धि ) एवं प्रज्ञान ( मन ) के ज्ञान का तो हमें प्रत्यक्ष हो जाता है, परन्तु महत् - ज्ञान बड़ा विलक्षण है । उसका यथार्थ स्वरूप हमारे लिए अविज्ञेय ही रहता है । यह केवल अनुमानगम्य है । आप अपने घर से निकल कर देवदर्शनार्थ जा रहे हैं । मार्ग में जाते हुए आप एक साथ तीन कर्म्म कर रहे हैं । ' गमन ' प्रधान कर्म है । गतिरूप कर्म के साथ साथ ही मार्ग में आने वाले दृश्यों को देखना, अच्छे बुरे शब्द सुनना, सुरभि असुरभि ग्रहण करना, आदि इन्द्रिय सम्बन्धी कर्म्म भी हो रहा है । साथ ही में आप अपने अन्तर्जगत में कुछ सोचते भी जाते हैं । ' एक समय में एक ज्ञान एक ही कर्म्म कर सकता है, यह सर्वसम्मत सिद्धांत है । इधर आप एक ही समय में तीन कर्म्म कर रहे हैं | अतः इन तीनों सहकृत कर्मों के लिए अवश्य ही तीन ज्ञान धाराएँ माननी पड़ती है । ऐन्द्रिककर्म की प्रतिष्ठा प्रज्ञान - ज्ञान ( मन ) है, अन्तर्जगत् में प्रवाहित विचारधारा की प्रतिष्ठा विज्ञान-ज्ञान ( बुद्धि ) है, एवं तीसरे गति कर्म्म का सञ्चालक महदुज्ञान ( महानात्मा ) है । तीनों अपना अपना काम [ २१७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिपत् करते हुए एक दूसरे के उपकारक बने हुए हैं । दूसरे शब्दो में तीनों को स्व - स्व कार्य निर्वाह के लिए आंशिकरूप से परस्पर में एक दूसरे का श्राश्रय लेना पड़ता है । यदि कोई ज्ञान ग्रन्य ज्ञान में सर्वात्मना ग्रात्मसमर्पण कर देता है, तो उसका अपना कर्म्मयन्त्र बंद हो जाता है । यदि आप सुन्दर दृश्य देखने में इतर ज्ञानों का समावेश कर लेते है तो विचार धारा बंद हो जाती है । यहाँ विज्ञान प्रज्ञान में डूब रहा है । यदि महद भी इसी श्रोर झुक जाता है, तो इस दृश्य विषय की तल्लीनता से महत् का गतिकर्म्म भी अवरुद्ध हो जाता है, आप या तो वहाँ स्तब्ध हो जाते हैं, अथवा ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं । इसी प्रकार यदि विज्ञान में प्रज्ञान, एवं महत् का लय है, तो न ग्राप ऐन्द्रियक कर्म्म कर सकते, न चल सकते । एवमेव यदि महत् में प्रज्ञान विज्ञान का लय है तो न आप विचार कर सकते, न ऐन्द्रियक कर्म्म कर सकते । केवल चलने में ध्यान रहता है । मार्ग में कौन आया, कौन गया, किसने क्या कहा, यदि किसी का कुछ भी भान नहीं होता । इसी को अनन्य योग कहा जाता है । यही आत्म समर्पण है, यही विषय सिद्धि का मुख्य द्वार है । उक्त तीनों में से विचार एव विषयानुभव द्वारा विज्ञान- प्रज्ञान का स्वरूप विदित हो जाता है | परन्तु महद्ज्ञान का स्वरूपज्ञान नहीं होने पाता । कारण इसका यही है कि प्रज्ञान, विज्ञान तो ज्ञाता अहंपदार्थ के गर्भ में प्रतिष्ठित है, परन्तु पदार्थ ( स्वयं ज्ञाता ) उस गर्भ में है— विज्ञातारं वा श्ररे केन विजानीयात् ” । महद्गभित ' अहं ' ही तो जानने वाला है महद्ज्ञान तो इस ज्ञाता का स्वरूपधर्म्म है । दूसरे शब्दों में महानात्मा अहंकृति - धर्मावच्छिन्न महानात्मा ही स्वयं ज्ञाता है । वह अपने आपको क्या जाने । हम ज्ञानपूर्वक ग्रन्न खाते हैं । अन्न को मुख में डालकर गले के नीचे उतार देना, यह तो हमें विदित है, परन्तु भुक्त अन्न किस ज्ञान की प्रेरणा से रसासृङ्मांसादि सप्तधातुओं में परिणत हो गया? यह अविज्ञात है । यह सम्पूर्ण प्रविज्ञात प्रपञ्च उसी अनुमेय महद्ज्ञान पर अवलम्बित है । आकृति - प्रकृति- अहंकृतिभाव उत्पन्न करना इस महानात्मा का मुख्य कर्म्म है । षोडशी प्रजापति नाम से प्रसिद्ध श्रमृतात्मा के ईश्वर - जीव जगत् ये तीन विवर्त्त है । इसी त्रित्त्व प्रजापति के तीन विवर्त्त पर श्रीवैष्णवों ( रामानुजों ) का विशिष्टाद्वैत प्रतिष्ठित है । इन्हीं तीन स्थानों में ग्रात्मतत्त्व प्रतिष्ठित है । तीनों में ही अमृतात्मा समान है, फिर भी तीनों के स्वरूप में अन्तर क्यों हुआ? इस प्रश्न का उत्तर है - ग्रव्यय, अक्षर, क्षर इन तीन आत्मा-वयवों का संस्थान वैचित्र्य । ईश्वरसंस्था में अव्यय भाग प्रधान रहता है, अक्षर एवं क्षर गौण रहते है । यही कारण है कि, ईश्वर संस्था में अव्यय, अक्षर, क्षर तीनों प्रात्तविवत्तों के नित्य प्रतिष्ठित रहने पर भी एकमात्र अव्यय को ही ईश्वर कहा जाता है, जैसा कि स्मृति कहती है-उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ - गी ० १५।१७ । दूसरी जीवसंस्था में मध्य स्थित अक्षर का विकास है, अव्यय, क्षर दोनों गीग हैं । जन्म लेना ' अज ' अव्यय का धर्म नहीं, अपितु अक्षर का धर्म है । ' पराप्रकृति ' नाम से प्रसिद्ध अक्षर ही ' जीवात्मा [ २१८ ]