Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 231–240

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 231 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डं महानात्म विज्ञानोपनिषत् है । दूसरे शब्दों में जीवात्मा का स्वरूप एकमात्र अक्षर ही पर प्रतिष्ठित है, अध्यात्मसंस्था का एक मात्र लक्ष्य अक्षर ही है । इसी के वेध से ( ग्रन्थिविमोक से ) जीवात्मा अव्यय स्वरूप में परिणत होता हुआ मुक्त हो जाता है । जीवस्वरूप अक्षर प्रधान है, अतएव अव्यय - ग्रक्षर - क्षर, तीनों के विद्यमान रहने पर भी ' अक्षर ' को. ही जीवभूता प्रकृति कहा गया है, जैसा कि भगवान् कहते हैं— . इतत्स्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूता महाबाहो ययेदं धार्य्यते जगत् ॥ - ( गी ० ७।५ ) तीसरा विवर्त्त ' जगत् ' है । इसमें न श्रव्यय की प्रधानता है, न अक्षर की । प्रधान है यहाँ केवल ' क्षर ' । क्षर से ही भूत का विकास होता है । ' क्षरः सर्वाणि भूतानि ' ( गी०-१५/१७ ) के अनुसार क्षर भौतिक विश्व है । सृष्टिसाक्षी अव्यय मन का पूर्ण विकास स्वयं अव्यय में होता है, यही ईश्वर है । इसमें अर्थ एवं क्रिया गौण हैं, ज्ञानतत्त्व प्रधान है । अव्यय के प्राणभाग का विकास अक्षर में होता है, यही जीवसृष्टि का प्रवर्तक है । यह अक्षर क्रियामूर्ति है । जीवसंस्था में अर्थ एवं ज्ञान गौण हैं, क्रियातत्त्व प्रधान है । तीसरी वाक्कला की पूर्ण विकास भूमि क्षर है । यह क्षर अर्थ-मूर्ति है । विश्वसंस्था में ज्ञान एवं क्रिया गौण है, प्रर्थतत्त्व प्रधान है । इस प्रकार ज्ञान क्रिया - अर्थमय मनः प्राण वाङ्मूत्ति अव्यय ही क्रमशः अव्यय - अक्षर - क्षरसंस्था में परिणत होता हुआ ईश्वर - जीव जगत्, इन तीन विवर्तभावों में परिणत हो जाता है । तीनों एकमात्र मनःप्राणवाङ् मय अव्यय की विभूति हैं । अव्यय -तत्त्व का इसी सर्वव्यापकता का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् कहते हैं— मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय! मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगरणा इव ॥ - ( गी ० ७।७ ) श्रव्ययमूर्ति ईश्वर ज्ञानप्रधान होता हुआ सत्त्वप्रधान है, अक्षरमूत्ति जीव क्रियाप्रधान बनता हुआ रजः प्रधान है एवं क्षरमूर्ति विश्व प्रर्थप्रधान बनता हुआ तमः प्रधान है । सत्त्व-त्रिगुणात्मक पुरुषब्रह्म मूर्ति श्रव्यय से प्राणमय ब्रह्मा अनुगृहीत हैं, रजोमूत्ति प्रक्षर से ग्रब्वाङ्मय विष्णु अनुगृहीत हैं एवं तमोमूर्ति क्षर से वाक्- अन्न अन्नादमय महादेव ग्रनु-गृहीत हैं । सत्त्वभाव शुक्ल है, असङ्ग है । तमोभाव कृष्ण है, ससङ्ग है । रजोभाव सान्ध्य होने से रक्त ( अनुरक्त - लाल ) है | आत्मा के इन्हीं तीनों गुणों का आगे जाकर महत्प्रकृति में उदय होता है । ' अज ’ श्रव्यय की ' अजा ' प्रकृति श्रात्मगुणों से त्रिगुणभावमयी बन रही है । अहंकृति का सम्बन्ध सत्त्वगुण से होता है, प्रकृति का सम्बन्ध रजोगुण से होता है एवं प्रकृति का सम्बन्ध तमोगुण से होता है । महान् में गु-भाव का उदय क्यों हुआ? इस प्रश्न का यही उत्तर है । त्रिपुरुष पुरुष एक है, तो त्रिगुणा प्रकृति भी एक है । श्रात्मा सगुण है, तो इसकी प्रकृति भी सगुण है । श्रात्मा ज्ञान क्रिया - अर्थमयी है । तत्त समन्व यात् ' ( शा ० सू ० १।१ । ) इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार प्रकृति पुरुष के समन्वय से उत्पन्न पदार्थ-मात्र त्रिगुणभाव से नित्य श्राक्रान्त हैं । [ २१

पृष्ठ 232

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 232 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे महानात्मविज्ञानोपनिषत् स्वायम्भुव अव्यक्त एवं पारमेष्ठ्य महत्, दोनों अभिन्न हैं । महत् से नीचे बुद्धिरूप सूर्य्य है, बुद्धि से नीचे प्रज्ञानरूप चन्द्रमा है, चन्द्रमा से नीचे पृथिवी जल - तेज- वायु - प्रकाश के पश्वीकरण से उत्पन्न पञ्चभूतमयी शरीररूपा पृथिवी है । इनमें जीवप्रकृति के अधिष्ठाता अव्ययानुगृहीत अक्षर की योनि श्रव्य-क्तात्मगर्भित महान् ही है, श्रतएव महान् को ' अक्षर ' शब्द से भी व्यवहुत कर दिया जाता है । जैसा कि निम्नलिखित श्रुति से स्पष्ट हो जाता है -" भूतं भविष्यत् प्रस्तौमि महद्ब्रह्म कमक्षरम् । बहुब्रह्म कमक्षरम् ॥ इति एतद्ध्येवाक्षरं सर्वे देवाः सर्वाणि भूतान्यभिसम्पद्यत । ” - शत ० १० | ४ | १ || अव्ययगर्भित अक्षरयुक्त क्षरमूर्ति महान् को जीवसंस्था समझिए । महत् से नीचे के बुद्धि - मन-पृथिवी जल - तेज- वायु- श्राकाशात्मक शरीर को जगत् समझिए । शेष बचे हुए उत्तम पुरुष ( अव्यय ) को ईश्वर समझिए । इसी संस्थाक्रम को लक्ष्य में रखकर भगवान् कहते हैं । १ २ ३ ४ ५ ६ ७ -भूमि - रापोऽनलो वायुः - खं - मनो- बुद्धिरेव च । ८ अहंकार इतीयं मे भिन्न प्रकृतिरष्टधा ॥१ ॥

अपरेयम्.. ........ t

. इतस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ २ ॥

— गीता ७ ४, ५, । १ - क्षराक्षरगभितोऽव्ययपुरुषः पुरुषोत्तमः -: - श्रव्यय + ईश्वरः + एतावद्वा इदं सर्वम् २ – अव्यक्तगभितोऽक्षरावच्छिन्नो महान् — प्रक्षरः जीवः O - श्रव्यक्तमहद्गभितः क्षरपुरुषः क्षरः जगत् १ – पुरुषोऽव्यय – ज्ञानम् २ -- पराप्रकृतिरक्षरः — क्रिया [ २२० ]

पृष्ठ 233

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 233 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड सर्वेश्वर कला परिलेखः— महानात्मविज्ञानोपनिषत् 1 पुरुषः १ अव्यय: - ज्ञानम् ने प्रकृतिः ईश्वरः अक्षर - क्रिया ज्ञानम् - सत्वमहान् अहतिः क्षरः - अर्थः अक्षर: -क्रिया जीवः अव्यय: - ज्ञानम् क्रिया - रजोमहान प्रकृति क्षर - अर्थ: 3 क्षर: - अर्थ जगत् अव्ययः - ज्ञानम् अर्थः तमोमहान् आकृतिः अक्षरः क्रिया पोडशी - प्रजापति नाम से प्रसिद्ध अमृतात्मा के ईश्वर - जीव - जगत् ये तीन विवर्त हो जाते हैं । तीनों में ग्रमृतात्मा समान है, परन्तु तीनों के स्वरूपों में श्रव्यय - अक्षर - क्षर नामक आत्मावयवों की प्रतिष्ठा से ग्रन्तर हो जाता है । ईश्वर संस्था में ग्रात्मा का अव्यय भाग जीव संस्था में आत्मा का अक्षर व जगत् संस्था में ग्रात्मा का क्षर के रूप में विकास होता है । ईश्वर संस्था में ज्ञानतत्त्व, जीव संस्था में क्रियातत्त्व व जगत् संस्था में प्रर्थतत्त्व प्रधान होते हैं । इसी प्रकार ईश्वर संस्था में ज्ञानप्रधान सत्त्वप्रधान जीव संस्था में क्रिया प्रधान रजःप्रधान एव जगत् संस्था में अर्थप्रधान तमः प्रधान है । तथा सत्त्वमूर्ति ग्रव्यय से प्राणमय ब्रह्मा, रजोमूर्ति अक्षर से अबूवाङ्मय विष्णु व तमांमूर्ति क्षर से वाक् - ग्रन्नादमय महादेव ग्रनुगृहीत हैं । आत्मा के इन्हीं गुणों से आगे जाकर महत् प्रकृति का उदय होता है । श्रहंकृति का सम्बन्ध सत्त्वगुण से प्रकृति का सम्बन्ध रजोगुण एवं प्रकृति का सम्बन्ध तमोगुण से होता है । इसका तात्पर्य यह हुआ कि, त्रिपुरुष पुरुष एक है, तो त्रिगुणा प्रकृति भी एक है । आत्मा सगुण है, तो इसकी प्रकृति भी सगुण है । श्रात्मा ज्ञान-क्रिया - प्रथमय है, तो प्रकृति भी ज्ञान - क्रिया - अर्थमयी है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 234

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 234 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ३ - श्रपराप्रकृतिः क्षरः - श्रर्थः श्रहंकारः – १ ( अपरेयं - प्रकृति ) १ – बुद्धिः ( बुद्धि:) २- मनः ( मनः ) महानात्म विज्ञानोपनिषत्

.......... इतस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम् ।

जीवभूतां महाबाहो! ययेदं धार्य्यते जगत् ॥

१ – आकाशः ( खम् ) विश्वम् २- वायुः ( वायु ) ३ – तेजः ( अनल ) ( आप ) ४ — जलम् ५- पृथिवी ( भूमिः ) उक्त कथन से यही बतलाना है कि, जीवसंस्था का अन्यतम अधिष्ठाता एकमात्र महानात्मा ही है । एकाक्षरमूर्ति महद्ब्रह्म - एवं यह महानात्मा " महद्ब्रह्म कमक्षरम् " के अनुसार अक्षरमूर्ति है । पूर्व की श्रव्यक्तात्म विज्ञानोपनिषत् में जिस अन्तर्य्यामी का दिग्दर्शन कराया गया है, वह यही महदक्षर है । श्रव्यक्तत्त्वावच्छिन्न ग्रक्षर महद्रूप में परिणत होकर पहले वस्तु की प्रकृति का निर्माण करता है, अन-न्तर अहंरूप से उस वस्तु के केन्द्र में प्रतिष्ठित होता हुआ, उसका नियत रूप से सञ्चालन करता हुआ अन्तर्यामी नाम से प्रसिद्ध होता है । अक्षरावच्छिन्न, किंवा ग्रक्षररूप ज्ञान से ही जीवसंस्थाका सञ्चा लन होता है । हमें ( कर्मात्मा को ) कुछ बिदित नहीं, शरीर के भीतर अपने आप सम्पूर्ण चक्र सुव्य-वस्थित रूप से चल रहा है । यही महदक्षर किंवा महद्ज्ञान प्रकृति - प्रकृति- अहंकृति भेद का सञ्चालक बनता है । इसकी जैसी इच्छा होती है, हमारी आकृति - प्रकृति - अहंकृति वैसी ही हो जाती । हाँ, इसकी इच्छा का नियामक पूर्वजन्मकृत भावना वासना संस्कारपुञ्ज प्रवश्य ही मानना पड़ता है । पानी नीचे ही जाता है, अग्नि सदा ऊपर ही जाता है - ' प्रसिद्धमूर्ध्वज्वलनं हविर्भुजः ", सूर्य्यं को नियत समय पर उदयाचल पर आना ही पड़ता है, नियत समय पर ही अस्ताचलानुगामी बनना पड़ता है, पृथिवी कभी क्रान्तिवृत्त को नहीं छोड़ती, चन्द्रमा कभी दक्षवृत्त का परित्याग नहीं करता यह सब उसी नियतिरूप महदक्षर की महिमा है । मनुष्य के श्रृंग ( सींग ) नहीं होते, पशु के होते हैं । कारण वही महानात्मा है । मनुष्य का महान् सींग की इच्छा न कर ऊपर के दाँतों की इच्छा करता है । इसी इच्छा से सींगों के स्थान में ऊपर के दांत बन जाते हैं । पशु का महान् विचार करता है कि, पशु में आक्रमण से अपने आपको बचाने के लिए हाथ नहीं है, मैंने इसके दोनों हाथों को आगे के दो पैर बना दिए हैं, अतः रक्षार्थ सींग बनाना श्रावश्यक है । इसी स्वेच्छा से वह पशु के ऊपर के दांत न बनाकर ऊपर के सींग बना देता है । जो श्रश्मासोन ( घन [ २२१ ]

पृष्ठ 235

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 235 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत् सोम ) दांत बनता है, वही सींग बनता है । महान् की इच्छा से वहां मनुष्य में दांत बन गया है, वही पशु में सींग बन गया है । सींग वाले जितने भी पशु हैं, उनमें ऊपर के दांत नहीं होते, इसी अभिप्राय से ऐसी पशुप्रजा को " एकतोदत् " कहा जाता है, एवं बिना सींग वाले हम पुरुषपशुओं को दोनों ओर दांत होने से “ उभयतोदत् ” कहा जाता है । पक्षी का महान् प्रश्मासाम को न दांत बनाता, न सींग । अपितु उसे वह ओष्ठभाग में प्रतिष्ठित कर देता हैं । वही श्रेष्ठ पक्षी की चञ्चु ( चौंच ) है । दांत सींग चञ्चु, तीनों का उपादानद्रव्य एक प्रश्मासोम है । केवल महान् के इच्छा भेद से वही द्रव्य एक स्थान में दांत, एक स्थान में सींग, एक स्थान में चञ्चु बन गया है । वानर ( बन्दर ) सदा श्रोणिभाग से बैठता है । इसमें विज्ञान की कमी है, प्रतएव इस वानर का महान् इसके श्रोणिभाग को आघात से बचाने के लिए इस स्थान पर घनता उत्पन्न कर देता है बैठने के लिए आस्तरण बना देता है । गुप्तेन्द्रियों को परोक्षप्रिय महानात्मा गुप्त रखना चाहता है । मनुष्य में विज्ञान ( बुद्धि ) का विकास है । वह अपने बुद्धिबल से कार्पास ( कपास ) वल्कल ग्रादि के वस्त्रों से अपने गुप्त अवयवों को ढक सकता है, श्रतः मनुष्य के महान् वहाँ ( गुप्ताङ्गों पर ) अपनी ओर से प्रावरण लगाने की श्रावश्यकता न समझी, यह भार मनुष्य की बुद्धि पर छोड़ दिया गया । परन्तु पशुयों में बुद्धिमात्रा अल्पमात्रा में प्रतिष्ठित है, अतः वे स्वयं अपने बुद्धिबल से गुप्त अवयवों को वस्रादि से गुप्त रखने में असमर्थ हैं । इसलिए इसके महान् ने पुच्छ ( पूछ ), एवं चर्मवेष्टन द्वारा उपस्थ - गुद आदि गुप्ताङ्गों को अपनी ओर से प्रावृत कर दिया । पुरुष बुद्धिबल से अपने पैरों को उपानत् ( जुते ), अथवा और किसी साधन विशेष से कङ्कड़ - पत्थर ग्रादि के प्राघात से बचा लेता है अतः यहाँ महान् ने पैरों की रक्षा के लिए विशेष प्रयत्न नहीं किया, केवल एड़ी एवं तलवों को घन बना दिया । परन्तु पशु उसी बुद्धिबल की कमी से अपने पैरों को कांटे - कङ्कड़ आदि के ग्रक्रमण से बचाने में असमर्थ थे अतः वहां महान् को शफ ( खुर ) बनाने पड़े । निदर्शनमात्र है । श्राकृति - प्रकृति-अहंकृति, इन तीनों भावों में व्यक्ति एवं जाति का परस्पर में आप जो भेद देखते हैं, वैचित्र्य पाते हैं, यह सब उसी महानात्मा का कर्म है । महान् के इसी सर्वाधिपत्य का निरूपण करते हुए महर्षि श्वेता-श्वतर कहते हैं-एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन् क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ - श्वे ० उपनिषत् ५।३ । वह हमारी बुद्धि से परे है, अतः हम उसके ज्ञान का अनुभव नहीं कर सकते, जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है । उदर के रिक्त होते ही अपने आप जो भोजन की एक विश्वयोनि लक्षण महानात्मा स्वाभाविकी इच्छा होती है, वह महानात्मा की इच्छा है - " यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः " ( श्वे ० उ ० ५।५ ) के अनुसार स्वाभाविकी इच्छा का उक्थ ( प्रभवस्थान ) एकमात्र त्रिगुणभावापन्न महानात्मा ही है । पूर्ण तृप्त होने पर बाजारू चटपटी चाट खाने की जो आगन्तुक अस्वाभाविक इच्छा है, वह मन से सम्बन्ध रखती है । उत्थिताकांक्षा ( अपने आप [ २२२ ]

पृष्ठ 236

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 236 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीवविज्ञान प्रथम स्व महानात्म विज्ञानोपनिषत् उठी हुई इच्छा ) महान् से सम्बन्ध रखती है, उत्थाप्याकांक्षा ( संस्कारजनित आसक्ति के प्रभाव से जबर्दस्ती उठाई गई अस्वाभाविक इच्छा ) प्रज्ञातमन पर प्रतिष्ठित | यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् में हमने महान को ही यज्ञात्मा कहा है । यही ग्रन्नादान द्वारा ग्राध्यात्मिक यज्ञ का सञ्चालन कर रहा है । इस बज्ञात्मा की स्वयं उत्थित इच्छा के अनुसार जो भी कर्म किये जाते हैं, वे कभी बन्धन के कारण नहीं बनते । वन्धन का मूल कारण है - प्रज्ञानमन से उत्पन्न होने वाली उत्थाप्याकांक्षा से किया जाने वाला आसक्ति भावावन्न कर्म्म । यज्ञार्थं कृतकर्म्म, दूसरे शब्दों में बज्ञमूर्ति महान् की स्वाभाविक इच्छा से किया हुआ कर्म्म ईश्वर-तन्त्रानुगायी बनता हुआ सर्वदा अबन्धन होता है, जैसा कि - " यज्ञार्थात् कम्र्म्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म-बन्धन " ( गी ० ) इत्यादि से स्पष्ट है | मनुष्य एक मुद्रा से चिरकाल तक नहीं बैठ सकता । कभी उठ जाता है कभी बैठ जाता है । बैठा हुआ कभी पैरों को सीधा कर देता है, कभी समेट लेता है । ये सब व्यापार सुषुप्त्यधिष्ठाता महानात्मा उसी महदिच्छा पर निर्भर है । विज्ञान प्रज्ञान ग्रपने श्रागे के विषय को जान सकते हैं, महान् इन दोनों से अर्वाक् है, अतएव हम महदज्ञान का अनुभव नहीं कर सकते । जाग्रदवस्था में महान् विज्ञान- प्रज्ञान, तीनों जाग्रत रहते हैं । दूसरे शब्दों में इन तीनों की जाग्रदवस्था हो जाग्रदवस्था है । महान् विज्ञान की जाग्रदवस्था स्वप्नावस्था है, एवं एक-मात्र महान् की जाग्रदवस्था सुषुप्ति है । महानात्मा की सुपुप्ति मृत्यु है, एवं महानात्मा का ग्रन्थिविमोक मुक्ति है । इस प्रकार ज्ञानत्रय के तारतम्य से जीबात्मा की ' जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति - मृत्यु- मुक्ति, ये ५ अबस्-थाएँ हो जाती हैं । आप गहरी नींद में निमग्न है । इस सुषुप्तिकाल में विज्ञान प्रज्ञान दोनों सुप्त है । संस्कारावच्छिन्न गज्ञानमन विज्ञान सम्परिष्वक्त बनकर बुरीतति नाड़ी में चला गया है । न ऐन्द्रियक ज्ञान है, न बोद्ध ज्ञान है । प्रातः जब आप सोकर उठते हैं, तो आप कहने लगते हैं- " आज तो बड़े प्रानन्द से सोए " । हम ग्राम से पूछते हैं कि, सुषुप्ति में विज्ञान- प्रज्ञान, दोनों सुप्त थे, फिर - " सुखमहमस्वाप्सीः " कहने वाला, सुषुप्त्यानन्द का अनुभव करने वाला कौन था? उत्तर वही महान् होगा । महान् सदा जाग्रत रहता है । महान् में रहने वाला ग्रङ्गिराप्राण सदा रखवाली किया करता है । महान् जाग्रत है, प्रतएव तत् प्रतिष्ठ ' श्रहमस्सि ' यह प्रत्यय सभी अवस्थाओं में प्रक्षुण्ण रहता है । इस प्रकार तटस्थवृत्ति से विज्ञान प्रज्ञानवत् ग्राप महद्ज्ञान का भी प्रत्यक्ष कर लेते हैं । अध्यात्मसंस्था में केवल एक ही श्रात्मा समझने वाले, प्रतएव नाना ऊहापोहों में व्यस्त रहने वाले काल्पिनिक वेदांतियों की दृष्टि में भले ही श्राद्धादि कम्मों के सम्बन्ध में सन्देह रहे, परन्तु दूरदर्शी वैज्ञा-निकों की दृष्टि में सर्वथा विभक्त खण्डात्माओं के आधार पर प्रतिष्ठित तत्तत् कम्मं कलापों में किसी प्रकार का सन्देह नहीं हो सकता । धर्म्मशास्त्रोक्त कम्मों का प्रधान संवन्ध महानात्मा विज्ञानात्मा- प्रज्ञानात्मयुक्त कम्र्मात्मा, इन तीन खण्डात्मानों के साथ है । अतएव धर्म्मशास्त्र ने ( स्मृतिशास्त्र ने ) इन्हीं तीनों को प्रधानता दी है । जैसा कि भगवान् मनु कहते हैं— * इन पांचों अवस्थाओं का सोनिक निरूपण माण्डूक्योपनिषत् - हिन्दी - विज्ञानभाष्य में देखना चाहिए । [ २२३ ]

पृष्ठ 237

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 237 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानापनिषत्

यो s स्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते ।

यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधैः ॥१ ॥

जीवसंज्ञोऽन्तरात्मान्यः सहजः सर्वदेहिनाम् ।

येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु ॥२ ॥

तावुभौ भूतसंपृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च ।

उच्चावचेषु भूतेषु स्थित ' तं ' व्याप्य तिष्ठतः ॥३ ॥

— मनुः. १२।१२ - १३ – १४ । प्रज्ञानसंपरिष्वक्त विज्ञानात्मा ही क्षेत्रज्ञ यही कम्र्मात्मा को कर्म में प्रवृत्त कराने वाला कार-यिता है, जैसा कि पूर्व के विज्ञानात्म प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । कर्म्म करने वाला आत्मा उस क्षेत्रज्ञ कारयिता से सर्वथा पृथक है । यद्यपि साधारण दृष्टि के अनुसार जीवात्मा नाम से प्रसिद्ध कर्म्मात्मा ही कर्म्मकर्त्ता है । भूतात्मा से प्रकृत में महानात्मा अभिप्रेत है । महानात्मा शुक्रमय है, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । सत्त्व- रज - तम- तीनों ग्रात्मगुण महान् में ही विकसित होते हैं जैसा कि स्मृति कहती है—

सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रीन् विद्यादात्मनो गुणान् ।

यैर्व्यायेमान् स्थितो भावान् महान् सर्वानशेषतः ॥ १ ॥

यो यदैषां गुणो देहे साकल्येनातिरिच्यते ।

स तदा तद्गुणप्रायं तं करोति शरीरिणाम् ॥२ ॥

सत्त्वं ज्ञानं, तमोऽज्ञानं रागद्वेषौ रजः स्मृतम् ।

एतद्व्याप्तिमदेतेषां सर्वभूताश्रितं वपुः ॥ ३ ॥

( मनुः १२ / २४-२५-२६ ) । * श्रुति वेदशास्त्र है, श्रोत श्रर्थ का इतिकर्तव्यतारूप से निरूपण करने वाला स्मृतिशास्त्र धर्मशास्त्र है । " श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्म्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः " । इय विषय का विशद विवेचन ईशोपनिषत् - हिन्दी विज्ञानभाष्य प्रथम खण्ड में देखना चाहिए । [ २२४ ]

पृष्ठ 238

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 238 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत् प्रकृति भूतमयी है, प्रकृति प्राणमयी है, अहङ्कृति मनोमयी है । भूतप्रधान श्राकृतिभाव के सम्बन्ध से ही इस महानात्मा को भूतात्मा कहा गया है । यही भूतों प्राकृति - प्रकृति - श्रहङ्कृतिभाव का जनक है । अपिच कम्र्मात्मा " श्रहंकरोमि " इस अभिमान से ही कर्म्मकर्त्ता कहलाया है । यह अहंभाव उसी अहं - कृति - महान् पर प्रतिष्ठित है । इसलिए भी महानात्मा के लिए - " यः करोति तु कर्माणि " यह कहना न्यायप्राप्त होता है । ' जीवात्मा ' नाम से प्रसिद्ध कम्र्मात्मा तो नाममात्र का कर्मकर्त्ता है । वस्तुतः वह अर्जुनवत् निमित्तमात्र है । शुभाशुभ कर्मों की योनि तो महानात्मा ही है । उसमें जैसे संस्कार रहते हैं, कर्मात्मा को वैसे ही कर्म करने पड़ते । यदि महान् में सत्वगुण का विकास रहता है, तो इसे सात्विक कम्मं करने पड़ते हैं । रज के अनुग्रह से इसे राजस कर्म्म में प्रवृत्त होना पड़ता है, एवं तम की प्रधानता से $ तामस कम्मं का अनुगमन करना पड़ता है । महान् ही जन्मप्रवृत्ति का मुख्य द्वार है । इन्हीं सब कारणों से महान् की ही कर्म्मकर्त्ता कहा जा सकता है । यही तो अन्तर्य्यामी - रूप से जैसा चाहता है, कम्र्मात्मा से वैसा ही करवा लेता है । इच्छा महान् की है, कर्म्म जीवात्मा का हैं । जिसकी इच्छा होती है, उस इच्छा से होने वाला कर्म्म उसी का कहलाया है । राजा की इच्छा से वध की इच्छा न रखता हुआ भी वधिक वधकर्म्म में प्रवृत्त हो जाता है । यह कर्म्म राजा का कर्म्म कहलाता है । ' राजा ने उसे दण्ड दिया है ' यही व्यव-हार होता है । ठीक यही परिस्थिति यहां समझिए । कर्म्म करता है जीवात्मा, परन्तु इच्छा है अन्तर्यामी महानात्मा की - " केनापि देवेन हृदि स्थितोऽहं यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि " । इसीलिए मनु ने कर्म्मा-त्मा के द्वारा होने वाले कर्म्म की उपेक्षा कर इच्छाप्रवर्तक महान् को ही कर्म्मकर्त्ता मान लिया है । इच्छा महान् की है, कर्म्म जीवात्मा का है, साधन क्षेत्रज्ञ है । इन तीनों के समन्वय से कर्म्म का स्वरूप निष्पन्न होता है । इस में इतना ध्यान रखना पड़ेगा कि, यदि प्रज्ञानमन महानात्मा की इच्छा के अनुगत रहता हुआ, बुद्धि का अनुगमन करता हुआ कर्म्म का उपकारक बनता है, तब तो जीवात्मा वन्धन से पृथक् रहता । यदि विज्ञान की उपेक्षा कर महदिच्छा को अपना अनुचर बनाता हुआ प्रज्ञानमन स्वतन्त्र हो जाता है तो तत्सहयुक्त कर्म्म जीवात्मा के सुख दुःख का कारण बन जाता है । इसी दृष्टि से " येन वेदयते सर्व-सुख दुःखं च जन्मसु ” यह कहा गया है । अहंभावात्मक जीव प्राणिमात्र में समानधर्मा है, परन्तु महा नात्मा विज्ञानात्मा की भाँति विषमधर्मा है । आकृति - प्रकृति - किसी की नहीं मिलती । इसी पार्थक्य को बतलाने के लिए " सहजः सर्वदेहिनाम् " यह कहा गया है ।

* वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।

धर्म्मक्रियात्मचिन्ता च सात्त्विकं गुरणलक्षणम् ॥

श्रारम्भरुचिताऽधैर्य्यमसत्कार्यपरिग्रहः । मनुः १२।३० ) विषयोपसेवाचाल ' राजसं गुणलक्षणम् ॥ ( मनु: १२ । ३२ ) $ लोभः स्वप्नोऽधृतिः क्रौर्य्य नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता । याचिष्णुता प्रमादश्च तामसं गुणलक्षणम ॥ ( मनुः १२ । ३३ ) [ २२५ ]

पृष्ठ 239

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 239 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत् प्रकारान्तर से यों समझिए कि, महान् विज्ञान, दोनों एक श्रेणि की वस्तु हैं । प्रज्ञान - जीव, दोनों एक श्रेणि की वस्तु है । प्रज्ञानयुक्त जीवात्मा सब में समान है, महान्युक्त विज्ञानात्मा सब में असमान है । महान् और विज्ञान के तारतम्य से जीवात्मा के कर्म्मकलाप में उच्चावचभावों का समावेश हो जाता है । प्रज्ञान - जीव, दोनों भूतप्रधान हैं । इस भूतभाग से पहाम् और क्षेत्रज्ञ, दोनों संश्लिष्ट रहते हैं । भूतों से युक्त ये दोनों जीवात्मा को चारों ओर से वेष्टित कर इसके भाग्यविधाता बने हुए हैं । जीवात्मा को इन आ-शुक्ल भावः ज्ञानम् श्वेतमूत्तिः क्रिया रक्तभावः रक्तमयी अर्थः मनः प्राणः वाक् 7 ० श्वे १ - मनः - सत्त्वम् १ - मन: - २ २ - प्राणः - रजः २- प्राण: -३ - वाक् - तमः १ सत्त्वम्०__ श्वे | १ - प्राणः - रजः २ - मनः - सत्त्वम् ३- वाक् - तमः ३ – वाक् [ २२६ ] ० कृ ० श्वे रज 102 | १- वाक् - तमः २- प्राणः - रजः ३- मन: - सत्त्वम् | ५१० ० कृ तम कृष्णभावः - त्मा मयः कृष्ण

पृष्ठ 240

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 240 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड मनः — — सत्त्व – रजस्तमोगर्भित – १ ) ज्ञानम् ( श्वेतवरणेः गतिः सात्त्विकी उत्तमा ——— प्राणः --रज -मोगर्भित सत्त्वत २ – – १ ) क्रिया ( रक्तवर्णः गतिः सात्त्विकी मध्यमा ——— श्वेतभावः | - मनः सत्वं • वाक् — — - तम सत्त्वरजोगभित — ३ ) अर्थः ( कृष्णवर्णः गतिः सात्त्विकी प्रथमा ——— -महद्विवर्त्त [ २२७ ] --प्राणः — — रज -सत्त्वतमोगर्भित – १ ) क्रिया ( गतिः राजसी श्रेष्ठा ———— मनः -सत्त्व- -रजस्तमोगर्भित २ – – २ ) ( ज्ञानम् | श्वेतवर्णः | | रक्तवर्णः गतिः राजसी मध्यमा ---प्राणः रजः रक्तभावः वाक् —— – तम सत्त्वरजोगभित — ३ ) अर्थः ( कृष्णवरणः गतिः राजसी कनिष्ठा --+ वाक् —— - तम रजोगर्भित सत्व – १ ) अर्थः ( श्वेतवर्णः । गतिः तामसी निकृष्टा --+ + प्राणः --रज -मोगर्भित सत्त्वत – २ – ३ ) क्रिया ( रक्तवर्णः गतिः तामसी मध्यमा -वाक् तमः कृष्णभावः मनः ---सत्त्व मोगर्भित रजस्त – ३ ) ( ज्ञानम् कृष्णवरणः गतिः तामसी जघन्या --+ महानात्मविज्ञानोपनिषत्