Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 241–250

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत् दोनों से जैसी सामग्री मिलती है, इसे उसी के अनुसार सुख दुःख भोगना पड़ता है । विज्ञानयुक्त इसी त्रि-गुण महानात्मा के अनुग्रह से जीवात्मा को उत्तम - मध्यम - जघन्य - गतियों का आश्रय लेना पड़ता है । सत्त्व की आधार भूमि ज्ञानमय - मन है, रज की प्रतिष्ठा क्रियामय प्रारण है, एवं तम का प्रभव अर्थमय वाक्तत्त्व है । मनः प्राण - वाङ्मय आत्मा ही महान् के सम्बन्ध से सत्त्वरजस्तमोरूप से विकसित होता है । तभी तो इन्हें - आत्मगुण कहना न्यायसङ्गत होता है । मन - प्राण - वाक्, ये तीनों ही त्रिवृत्कृत हैं । इस त्रिवृत् - करण से आत्मा के प्रत्येक पर्व में मनः - प्राण - वाक्, तीनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । त्रि-वृत् — करण से ही तीन के ε विवर्त हो जाते हैं । इन श्रात्मविवर्त्ती के कारण ही आत्मगुणाधारेण प्रतिष्ठित सत्त्वादि प्राकृतिक गुणों के भी ( परिलेखानुसार ) ६ विवर्त हो जाते हैं । सत्वप्रकृतिक महान् उत्तमगति का कारण है, रजःप्रकृतिक महान् मध्यमगति का कारण है एवं तमः प्रकृतिक महान् जघन्यगति का प्रवर्तक है । ये इसके स्थूल विभाग हैं । सत्व - रज- स्तम, तीनों ही उक्त त्रिवृत्करण से पुनः उत्तम – मध्यम — जघन्य - भेद से तीन तीन सत्व - रज - स्त मोलक्षरण महानात्मा भागों में विभक्त हैं । रजः - सत्त्वगर्भित तम रजस्त मोगर्भित मलिनसत्त्व उत्तम सत्त्व है, तमः सत्त्वगर्भित रज मध्यम सत्त्व है, जघन्य सत्त्व है । इसी प्रकार रजस्तमोगर्भित सत्त्व उत्तम रज है, तम - सत्त्वगर्भित रज मध्यम रज है, रजःसत्त्वगर्भित तम जघन्यरज है । एवमेव तमोरजोगर्भित सत्त्व उत्तमतम है, तमः सत्त्वगर्भित रज मध्यम तम है, एवं सत्त्वरजोगर्भित तम जघन्यसत्त्व है । पहले स्थूल योनियों का क्रम देखिए । सत्त्वप्रकृतिक जीव देवयोनि में जन्म लेते हैं, रजः प्रकृतिक जीव मनुष्ययोनि धारण करते हैं, एवं तम से अभिभूत जीव कृमि - कीट - पक्षी - पशु - भेदभिन्न तिर्य्य योनि में आते हैं । इसी सामान्य गति का उल्लेख करते हुए मनु कहते हैं—

देवत्त्वं सात्विका यान्ति मनुष्यत्त्वं च राजसाः ।

तिर्य्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषा त्रिविधा गतिः ॥ १ ॥

आगे जाकर ज्ञानजनित - प्रतएव ज्ञानात्मक भावनासंस्कार एवं कर्म्मजनित - अतएव कर्म्मरूप वासनासंस्कार के तारतम्य से उक्त प्रत्येक गति पूर्वकथनानुसार उत्तम - मध्यम - प्रथम भेद से तीन - तीन भागों में विभक्त हो जाती है । धातु - उपधातु - रस - उपरस - विष- उपविष - श्रौषधि - वनस्पति - प्रादि स्थावर योनियाँ, कृमि - कीट - मत्स्य - सर्प - कच्छप - गौ- प्रादि सामान्य, पशु, मृग - गवयादि वन्य विशेष पशुयोनियाँ रजःसत्त्वगर्भित तमोमयी जघन्यगति से सम्बन्ध रखती हैं । हाथी प्रश्व - शूद्र- म्लेच्छ - सिंह- व्याघ्र- वराह ( शूकर ) आदि योनियों का सत्त्वतमोगर्भिता रजोमयी मध्यमा तामसी गति से सम्बन्ध है । सुपर्ण ( गरुड़-पक्षी ) कुटिल मनुष्य, राक्षस, पिशाच, इन का रजस्तमोगर्भिता सत्वमयी उत्तमा तामसी योनि से सम्बन्ध है । झल्ल ( क्षत्रियों के वर्णसंकर ), नट, मल्लयोद्धा, शस्त्रक्रयविक्रयकर्त्ता, द्यूत ( जुआ ) मद्यादि में प्रसक्त रहने वाले पुरुष, इन सब का रजः सत्त्वगर्भिता तमोमयी जघन्या राजसी योनि से सम्बन्ध है । अभिषिक्त [ २२८ ]

पृष्ठ 242

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे महानात्मविज्ञानोपनिषत् राजा, जन्मना क्षत्रिय, राजाओं के कुलपुरोहित, वादयुद्ध में अग्रणी प्राविवाकादि, इन सबका सत्त्वत-मोगभिता रजोमयी मध्यमा राजसी योनि से सम्बन्ध है । गन्र्धव, गुह्यक, यक्ष, लौकिक व्यवहारों में निपुण लौकिकमनुष्य, सेवाधर्म में निष्णात सेवक, अप्सराएं, इन सबका रजस्तमोगर्भिता सत्वमयी उत्तमा राजसी योनि से सम्बन्ध है । वानप्रस्थाश्रमी तपस्वी, सन्यासाश्रमी यति, जन्मना ब्राह्मरण, पुष्पकादि विमानों के संचालक विद्याधर, खगोलीय सम्पूर्ण नक्षत्र, दितिपुत्र दैत्य, इन सब का सत्वरजोगभिता तमोमयी प्रथमा सात्त्विकी गति से सम्बन्ध है । यज्ञकर्त्ता याज्ञिक, प्राण परीक्षक ऋषि, देवप्राण साक्षातकर्त्ता भौमदेवता, एवं श्रभि-मानी देवता, खगोलीय ग्रह, वत्सर, पितर, साध्यादि देवता, इन सब का सत्वतमोगभिता रजोमयी मध्यमा सात्त्विकी योनि से सम्बन्ध है । ब्रह्मा - विश्वसृदशषि, धर्म, महान्, अव्यक्त --इन का रजस्तमो-गर्भिता सत्त्वमयी उत्तमा सात्त्विकी गति से सम्बन्ध है । इस प्रकार - " त्रिविधस्त्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ” ( मनुः १२ ।५१ ) भगवान मनु के इन शब्दों के अनुसार सम्पूर्ण भौतिक विश्व त्रिवृतकृत इसी त्रिगुणमूर्ति महद्योनि पर प्रतिष्ठित है 1 । यदि विद्याकर्म के सूक्ष्म सूक्ष्पतर- सूक्ष्मतम विभागों का विचार किया जाता है, तो यह योनिविवर्त - अनन्तकोटि में परिणत हो जाता है । अतीतानागतज्ञ मह-षियों ने चतुरशीति लक्ष - ( ८४००००० चौरासी लाख ) संख्या पर इस योनिविभाग का विश्राम माना है । महानात्मा के इसी योनिविवर्त्त को लक्ष्य में रखकर उपनिपच्छु ति कहती है—

यो योनि योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपारिण योनीश्च सर्वाः ।

ऋषि प्रसूतं कपिलं यमस्तमग्रे ज्ञानैबिभत्ति जायमानं च पश्येत् ॥

( श्वे ० उ ० ५. २ ) उपर्युक्त मानव - आत्मविज्ञान के अनुसार विज्ञपाठकों को यह भलीभाँति विदित हो गया होगा कि, वास्तव में श्रध्यात्मसंस्था में एक ही आत्मा का साम्राज्य नहीं, अपितु तन्त्रभेद से चान्द्र महानात्मा श्रनेक तन्त्रायी हैं । इन विभिन्न तन्त्रायियों को व्यापक जो एक महातन्त्रायी है, वह शास्त्रानधिकृत, अतएव कर्मप्रपञ्च से सर्वथा बहिर्भूत है । श्रस्तु प्रकृत में महानात्मा का गुणानुवाद चल रहा है । सर्वाधिष्ठाता पितृप्राणमूर्ति यह महानात्मा " शुरू " में प्रतिष्ठित रहता है । हमारा ( पुरुष का ) शुक्र मुक्त प्रौषधियों का ( अन्न का ) रस है । औषधियों में यह रस चन्द्रमा से आता है | चान्द्र सौम्यरसगर्भित सौर आग्नेयरस से वनस्पतियों की उत्पत्ति होती है, एवं सौर-रसगर्भत चान्द्ररस से औषधियों की स्वरूप निष्पत्ति है, जैसा कि प्रारम्भ की " अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् " में विस्तार से बतलाया जा चुका है । शुक्लपक्ष में प्रधानरूप से पूर्णिमा तिथि में सौरप्राण देवता सम्पूर्ण चान्द्रसोम का पान कर जाते हैं । अतः इन दिनों में वह चान्द्ररस पूर्णरूप से भूलोक में, एवं भूलोक में प्रतिष्ठित प्रौषधियों में नहीं प्राने पाता । परन्तु जब चन्द्रमा सूर्य्य एवं पृथिवी के मध्य के आ जाता है, तो इस कृष्णपक्षकाल में चान्द्रसोम को पृथिवी पर आने का अवसर मिल जाता है । चान्द्रसोम में पितृप्राण प्रतिष्ठित है । इसी आधार पर " विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति " यह कहा जाता है । पूर्व कथनानुसार [ २२६ ]

पृष्ठ 243

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत् अमावस्यातिथि में सोम अतिशय मात्रा से पृथिवी पर आता है, अतएव प्रमा को पितृतिथि कहा जाता है । इन सब विषयों का ग्रागे के प्रकरणों में विस्तार से निरूपण होने वाला है, अतः प्रकृत में केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि, श्रौषधियां सोमरसमयी, किवा सोमरसप्रधान हैं । चान्द्रसोम में ही पार-मेष्ठ्य महान् प्रतिष्ठित है । महान् ही पितर है । इस महन्मूत्ति पितृप्राणयुक्त प्रौषधिरस से ही रस मल के क्रमिक विशकलन से रस - प्रसृक्- मांस - मेद - अस्थि - मज्जा - शुक्र, इन सात धातुयों का स्वरूप निष्पन्न होता है । यही सौम्यशुक्र संतानसूत्र द्वारा सात पीढी पर्यन्त वितत होता है । अर्थात् सति पुश्त पय्यंन्त इस एक महान् का अंश व्याप्त रहता है । श्रौषधियों में दधि घृत - मधु श्रमृत, ये चार तत्त्व माने गए हैं । पार्थिव घनरस दधि है, ' श्रान्त-रिक्ष्य वायव्य रस घृत है, सौर दिव्य रस मधु है, पारमेष्ठ्य सौम्य रस अमृत है । अन्न का दाना भाग पार्थिव है, यही दधि है " - दधि हैवास्य लोकस्य रूपम् । प्रांटे को गोंदने पर एक प्रकार के स्नेह ( चिक-नाई ) तत्त्व का प्रत्यक्ष होता है । यही प्रान्तरिक्ष्य तरलभाग घृत है - " घृतमन्तरिक्षस्य । " प्रत्येक अम्न्न में एक प्रकार का मिठास होता है । यही सौर दिव्य पदार्थ है । यहीं मधु है - " मध्वमुष्य " ( शत०-७।५।१।३ कूर्म्मचितिब्राह्मण ) । प्रत्येक अन्न में एक प्रकार का जायका होता है, स्वाद होता है । यही चौथा अमृत है । इन चारों रसों के सम्बन्ध से तन्मूति महान् श्राकृति - प्रकृति - प्रहंकृति का जनक बन जाता है । आकार आकृति है, स्वभाव प्रकृति है, इन्द्रियसामर्थ्य अहंकृति है । दधि घृत के समन्वय से शरीराकृति का निर्माण होता है, घृत- मधुसे प्रकृतिभाव का उदय होता है एवं मधु - अमृत से अहंकृति का जन्म होता है । इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि श्राकृति प्रकृति - श्रहंकृति - भावों का उत्तम मध्यम-श्रधम - भाव प्रधानरूप से अन्न से ही सम्बन्ध रखता है । इन तीनों की स्वरूप - रक्षा के लिए एवं विकास के लिए अन्न का नियन्त्रण ( खान पान का नियन्त्रण ) प्रत्येक परिस्थिति में अपेक्षित है । महदवच्छिन्न शुक्र से उत्पन्न होने वाली प्रजाके लिए श्राकार - स्वभाव - इन्द्रिय सामर्थ्य, तीनों कर्म्म - विद्यानुसार सर्वथा नियत रहते हैं । एक हजारे के वृक्ष को दूध से सींचने पर भी वह पिप्पलवृक्ष के समान दीर्घकाय नहीं बन सकता । वृक्षादि का जितना प्रायतन ( आकार - श्राकृति ) नियत होता है, वह बीजरूप से उसी महद-गर्भ में पहले से ही प्रतिष्ठित रहता है । महानात्मा की इस वीजावस्था के वास्तविक स्वरूप को न समझ कर कितने ही दार्शनिक ( श्रमणक ) बीज में ही सम्पूर्ण वृक्ष मानते हैं । वृक्ष बीज में प्रतिष्ठित नहीं है, अपितु उसकी वीजावस्था वहां प्रतिष्ठित है । महानात्मा की प्रतिष्ठा शुक्र है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जिस पुरुष का शुक्र अधिक मात्रा में खर्च हो जाता है, उसकी ग्रप्राकृति प्रकृति - अहंकृति, तीनों - भाव बिगड़ जाते हैं । चान्द्र महानात्मा का यही संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन है । दूसरा है प्रज्ञानात्मा । इसी चान्द्रभाग से सर्वेन्द्रियाधिष्ठाता प्रज्ञानात्मा ( अतीन्द्रिय नाम से प्रसिद्ध सर्वेन्द्रिय मन ) का स्वरूप निष्पन्न होता है । चन्द्रमा में पानी और सोम दो चान्द्र- प्रज्ञानात्मा तत्त्व है । पानी पारमेष्ठ्य है, सोम चान्द्र है । समान स्थानीय होने से दोनों, दोनों में प्रोतप्रोत हैं । " श्रद्धा वा श्राप " के अनुसार चान्द्र अप्तत्त्व श्रद्धा है, इसका प्रधान सम्बन्ध महान् से है । सोम से मन का सम्बन्ध है । दूसरे शब्दों में सोम- गर्भित श्रद्धा [ २३० ]

पृष्ठ 244

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनपत् ( प ) महान् है एवं अब्गभित सोम मन है । शुक्र ग्रापोमय है, सोम इसके गर्भ में है । मन सोममय है प्तत्त्व इसके गर्भ में है । महान् की प्रतिष्ठा जहां शुक्र है, वहां मन की प्रतिष्ठा हृदय है— " हृत्प्र-तिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु " ( यजुः सं ० ३४।६ ) | महानात्मा शुक्र में रहता है, प्रज्ञानात्मा हृदय में रहता है । महानात्मा उत्त्पत्तिसृष्ट है, प्रज्ञानात्मा उत्पन्नसृष्ट है । अर्थात् महानात्मा तो जन्मकाल में ही विकसित है । शुक्रमूत्ति मद्दान् तो जन्म का ही कारण है, परन्तु प्रज्ञानात्मा का पूर्ण विकास जन्म के पीछे सोलहवें वर्ष में होता है । षोडशपर्वा चन्द्रमा के क्रमिक भाव से सम्बन्ध रखने वाला प्रज्ञानमन सोलह वर्ष पर्य्यन्त अपरिपक्व रहता है, अनन्तर उसमें आत्म निर्भरता का उदय होता है । इसी आधार पर - " प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं - मित्रवदाचरेत् " यह प्रभाणक प्रतिष्ठित है । शुकतत्त्व रस - मल के विशकलन से ही श्रागे जाकर प्रोज रूप में परिणत होता है । शुक्र पार्थिवधातु - प्रधान था, प्रोज श्रान्त-रक्ष्य वायव्यधातु - प्रधान है । शुक्र में हमने पार्थिव प्रान्तरिक्ष्य - दिव्य, तीन धातु बतलाए हैं । शुक्र में तीन हैं, में प्रान्तरिक्ष्य वायव्य, दिव्य सौम्य, दो धातु हैं । जब विशकलन- प्रक्रिया से ग्रान्तरिक्ष्य वायव्य धातु भी निकल जाता है, तो शुद्ध सोमरस रह जाता है । यही विशुद्ध दिव्य चान्द्ररस मन है । इसके साथ रोदसी त्रैलोक्य के द्युलोकाधिष्ठाता मघवा इन्द्रप्राण का सम्बन्ध रहता है । स्तोम्य एवं रोदसी भेद से त्रैलोक्य दो प्रकार का है । केवल पार्थिव अहर्गणों से सम्बन्ध रखने वाला त्रैलोक्य " स्तौ-म्य त्रैलोक्य " कहलाया है । इसी का नाम महापृथिवी का त्रिवृत् स्तोम पृथिवी है, पञ्चदशस्तोम अन्तरिक्ष है एवं एकविंश स्तोम द्युलोक है । तीनों में क्रमशः अग्नि- वायु - प्रादित्य, देवता प्रतिष्ठित हैं । इन्हीं तीनों से वैश्वानर - तंजस - प्राज्ञरूप पार्थिव कर्मात्मा का स्वरूप निष्पन्न होता है, सौरमण्डल द्युलोक है, दोनों के मध्य का स्थान अन्तरिक्ष है । यही दूसरी रोदसी त्रिलोकी है । इन तीनों में भी क्रमशः अग्नि- वायु-इन्द्र, ये तीन दिव्यदेवता प्रतिष्ठित । इन्हीं तीनों से आध्यात्मिक शुक्र - ओज - मन, इन तीनों का निर्माण होता है । महापृथिवी स्तौम्य त्रिलोकी पृ ० १ - त्रिवृत्स्तोमः - श्रग्निः - ततो वैश्वानरः अ ० २- पञ्चदशस्तोमः - वायुः - ततस्तैजसः द्यौः ० ३ - एक विशस्तोम: - प्रादित्यः- ततः प्राज्ञः रोदसीत्रिलोकी ( १ - पृथिवी अग्निः ततः शुक्रम् ५ - कर्मात्मा २ २ - श्रन्तरिक्षम् - वायुः ततः - प्रीजः ( ३ - सूर्यः - इन्द्रः - ततः - मनः उक्त कथनानुसार मन में सोम एवं सौर इन्द्रप्राण भेद से दो तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । इस पर विज्ञान प्रतिबिम्बित होने से यह भी चिदंश से युक्त हो जाता है । वह प्रतिबिम्ब वीघ्र सोम पर प्रतिष्ठित होता है, इससे वह सोम चिन्मय बनता हुआ ज्ञानमय बन जाता है । श्रतएव मन का चिदंशयुक्त यह सोम-भाग प्रज्ञा नाम से व्यवहृत होता है । प्रज्ञा एवं प्राण की समष्टि प्रज्ञानमन | विज्ञान - प्रज्ञान, दोनों परस्पर प्राणेन्द्र के सम्बन्ध से संपरिष्वक्त हैं- " स वा एष प्रज्ञानात्मा विज्ञानात्मना संपरिष्वक्तः " । [ २३१ ]

पृष्ठ 245

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड महानात्म विज्ञानोपनिषत् जब तक अध्यात्मसंस्था में प्रज्ञान ब्रह्म प्रतिष्ठित रहता है, तभी तक विज्ञान की स्थिति रहती है । चित्ता-परपर्य्यायक मन की स्वस्थता पर ही बुद्धि का विकास होता है - " स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ” । ग्रषि च इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि यदि कुछ दिन तक अन्न नहीं खाया जाता है, तो अन्नमय प्रज्ञानमन शिथिल हो जाता है । प्रज्ञान के शिथिल होते ही इसी पर प्रतिष्ठित रहने वाली चिद्घना बुद्धि शिथिल बन जाती है । भूखे मनुष्य की अक्ल जरा भी काम नहीं करती - " बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित् । ” भूखे को कुछ नहीं सूझता । सूझना बुद्धि का काम है । अपने प्रतिष्ठाघरातल की शिथिलता से ग्राज वह स्वयं भी अप्रतिष्ठित सी हो रही है । बुद्धिप्रतिष्ठारूप यह प्रज्ञान- मन ही सम्पूर्ण इन्द्रियों का अधिष्ठाता है । इस में हमने सोम, चिदंश, प्राण ये तीन तत्त्व बतलाये हैं । सोम भूतभाग है, चित् ज्ञानभाग है, प्राण प्राणतत्त्व है । वाक् - प्राण - चक्षु-श्रोत्र - मन, इन पाँच ( वैदिक ) इन्द्रियों के भेद से इस प्रज्ञान की ज्ञानभूत प्राण, इन तीनों कलाओं के पाँच-पाँच विवर्त्त हो जाते हैं । पाँच प्रज्ञामात्रा हैं, पाँच भूतमात्रा हैं, पाँच ही प्राणमात्रा हैं । इन १५ ही कलाओं की मूलप्रतिष्ठा त्रिकल स्वयं प्रज्ञान है । ' प्रज्ञानोङ्कारविद्या ' के अनुसार पञ्चभूतमात्रा मकार है, पञ्चप्राणमात्रा उकार हैं, एवं पञ्चप्रज्ञामात्रा प्रकार है । सर्वालम्बन स्वयं प्रज्ञान श्रर्द्धमात्रा है । समष्टि प्रोङ्कार है । अर्द्धमात्रिक प्रज्ञान की प्रेरणा से ही सब इन्द्रियाँ अपना अपना नियत कर्म करने में समर्थ होती है । प्रज्ञानगत प्राणमूर्ति इन्द्र के सम्बन्ध से इन्द्रियों को इन्द्रिय कहा जाता है । सभी इन्द्रियाँ इन्द्र-जुष्ट हैं । स्वयं इन्द्रप्रारण उक्थ है, आत्मा है, अतएव इसे " मुख्यप्राण ' कहा गया हैं । पाँचों ऐन्द्रियक प्राण प्रर्करूप हैं, अतएव इन्हें " प्राणाः " कहा गया है । ये ही इन्द्रिय प्राण ' श्रनुचीनप्रारण ' नाम से प्रसिद्ध हैं । " नियतविषयत्वमिन्द्रियत्त्वम् " के अनुसार इन्द्रियों के स्व - स्वविषय सर्वथा नियत है । दूसरे शब्दों में यों कहिए कि, जिनका विषय नियत है, वे ही इन्द्रिय नाम से व्यवहृत होती है । " गुणानां च परार्थत्वाद-सम्बन्धः समत्वात् ” के अनुसार गुणभूत इन्द्रियों का परस्पर में कोई सम्बन्ध नहीं है । असम्बन्ध ही इनका सम्बन्ध है, अनान्तर्य्य ही इन का आन्तर्य्य है । सब अपने अपने रूप - रस- गन्धादि विपय ग्रहण में स्वतन्त्र हैं । इन इन्द्रियों में मन सुख - दुःख ( अनुकूल वेदना - प्रतिकूल वेदना ) का अनुभव करने वाला, ग्रतएव नियतविषयी बनता हुआ इन्द्रियकोटि में ही प्रविष्ट है । इस इन्द्रिय मन का वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञमूर्ति कर्मात्मा के प्राज्ञभाव से ही सम्बन्ध है । प्राज्ञ ही इन्द्रिय मन है । इसी के लिए ' मनः षष्ठानि मे हृदि " ( अथर्व सं ० १६ | ६ | ५ ) यह कहा गया है । इन्द्रियाधिष्ठाता प्रज्ञान मन स्वतन्त्र रूप से कर्म्म करने में समर्थ होता हुआ अपने ऊपर भावना वासना रूप से कर्म का लेप कर लेता है, परन्तु प्राज्ञरूप इन्द्रिय मन केवल भोग में समर्थ है । यही कारण है कि, विज्ञान- प्रज्ञान विरहित प्राज्ञ केवल भोग कर सकता है, नया संस्कार उत्पन्न नहीं कर सकता । पाँचों इन्द्रियों में प्रज्ञान अनुस्यूत रहता है, अतएव इसे कर्मेन्द्रिय - मन इन्द्र इवेन्द्रियाणि - अधि धारयामः ।

— प्रथर्व सं ० १।३५।३ ।

इन्द्रियाणि शतक्रतो या ते जनेषु पञ्चसु । इन्द्र तानि त श्रावृणे ॥

- प्रथर्व सं ० २० | २० | २ | [ २३२ ]

पृष्ठ 246

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड महानात्मविज्ञानोपनिषत् कहा जाता है । यह स्वयं इन्द्रिय नहीं है, अतएव इसे अनिन्द्रियमन नाम में व्यवहृत करने में कोई आपत्ति नहीं होती । अब तक ग्रापने अध्यात्मसंस्था में एक ही मन समझ रक्खा होगा । परन्तु आज से आप अपना यह वैदिक विश्वास वदल दीजिए । अध्यात्म में एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं प्रकरणोपसंहार अपितु चार मन हैं । अव्यय - महान् - प्रज्ञान - प्राज्ञ भेद से मन चतुर्द्धा विभक्त है । अव्ययमन श्वोवसीयस् एवं श्वोवस्यस्ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध है । महत् - मन सत्व कह-लाता है, प्रज्ञान मन सर्वेन्द्रिय है एवं प्राज्ञ - मन इन्द्रियमन नाम से प्रसिद्ध है । प्राज्ञमन कर्मात्मा की प्रतिष्ठा है, प्रज्ञान- मन विज्ञानात्मा की प्रतिष्ठा है, महत् - मन अमृतात्मा की प्रतिष्ठा है, एवं श्रव्ययमन सबकी प्रतिष्ठा है । इसमें अव्यय मन का एक स्वतन्त्र विभाग है । महत् - विज्ञान- प्रज्ञान, तीनों का एक स्वतन्त्र विभाग है । इन तीनों का कर्म्मगति से कोई सम्बन्ध नहीं हैं । परन्तु इतना ध्यान रखिए कि श्राद्धकर्म्म की मूलप्रतिष्ठा शुक्रतत्त्व पर प्रतिष्ठित पितृप्राणमूर्ति महानात्मा ही हैं । सम्पूर्ण श्रात्मविवत्त में से श्राद्ध एक मात्र महानात्मा के लिए ही किया जाता है । महान् के सम्बन्ध में अभी बहुत कुछ वक्तव्य है, क्योंकि इस ग्रन्थ का सम्पूर्ण उत्तरदायित्त्व इसी पर अवलम्बित है । अतः आगे आने वाले पितृप्राण-निरूपण - प्रकरण के लिए इसे छोड़ते हुए प्रकृत प्रकरण को यहीं समाप्त कर क्रमप्राप्त ' प्राणात्मा ' की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । तदित्थं - प्राकृति, प्रकृति - श्रहंकृतिभेदेन त्रिकलः - महत्- प्रज्ञानभेदेन द्विको वायं महानात्मा, चन्द्रमा व्याख्यातो द्रष्टव्यः समाप्ता चेयं श्राद्ध विज्ञानान्तर्गत- ' श्रात्मविज्ञानोपनिषदि ' प्रथमायां प्रथमखण्डात्मिकायां " महदात्मविज्ञानोपनिषत् " पञ्चमी [ २३३ ]

पृष्ठ 247

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ( ६ ) ( १ - श्रधिदैवतम् पृथिवी ( पूर्णमदः ) -( २- श्रध्यात्मम् + प्रारण ( पूर्णमिदम् ) अथ प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् } " प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् " III प्राणात्मा - वैकारिकात्मा - पृथिवी ( 4 ) १ - त्रिवृतोऽग्निः ( वैश्वानरात्मा ) २ - त्रिवृतो वायुः ( तैजसात्मा ) ३ – त्रिवृत् श्रादित्यः ( प्राज्ञात्मा ) + प्रत्यगात्मा ( १ ) ४- भूवायुः ( हंसात्मा ) + प्रेतात्मा ( २ ) } -+ शरीरात्मा ( ३ ) ५ - चित्याग्निः ( बाह्यात्मा )

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ १ ॥

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २ ॥ - श्रीमद्भगवद्गीता २ प्र ० । २२, २७

( ६ ) प्राणात्मस्वरूपपरिचयः-( ज्ञान - क्रिया- अर्थमयः प्राणात्मा )

रथिर्न चित्रा सूरो न सहगायुर्न प्राणो नित्यो न सूनुः ।

तक्वा न भूर्विना सिषक्ति पयो न धेनुः शुचिविभावा ॥१ ॥

— ऋक् सं ० १ । ६६ । १ [ २३५ ]

पृष्ठ 248

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड इन्द्रियाणि हयानाहुविषयास्तेषु गोचरान् । सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । [ २३६ ] प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् —ऋक् सं ० १० ५५।५ —ऋक्सं ० १०।५५।८ — मुण्डको ० ३ । १ । १ - मुण्डको ० ३।१।२ — कठोप ० २।५।१२ -श्वे ० उ ० ५।७ — कठोप ० १ | ३ | ४ — मुण्डको ० ३ | १ | ४ -श्वे ० उ ० ३।१४

विधुं दद्राणं समने बहूनां युवानं सन्तं पलितो जगार ।

देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान ॥ २ ॥

युजा कर्माणि जनयन्विश्वौजा प्रशस्तिहा विश्वमनास्तुराषाट् ।

पीत्वी सोमस्य दिवा वृधानः शूरो निर्युधाधमद्दस्यून् ॥३ ॥

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषष्वजाते ।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥४ ॥

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।

जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥५ ॥

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ ६ ॥

गुरायो यः फलकर्म्मकर्त्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता ।

स विश्वरूपस्त्रिगुणविर्मा प्रारणाधिपः सञ्चरति स्वकर्म्मभिः ॥७ ॥

श्रात्मेन्द्रियमनोयुक्त ' ' भोक्त ' त्याहुर्मनीषिणः ॥।८ ॥

प्राणो ह्येष यः सर्वभूतविभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी ।

श्रात्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ९ ॥

स भूमि विश्वतो वृत्वाऽत्य तिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१० ॥

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॥ प्राणात्मब्रह्मणे नमः ॥ प्राणात्मा - पृथिवी ' प्राणो ब्रह्मे ' त्युपास्व [ २३७ 1 - कैवल्योपनिषत् १।१२ - कँ ० १ | १३ — कै ० १ | १५ - कँ ० १1१७ -प्रवे ० उ ० ५।६ - कठोपनिषत् ४।१४ श्रङ गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः संकल्पाहङ्कारसमन्वितो यः । बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपिदृष्टः ॥ - श्वे ० उ ० ५८

स एव माया परिमोहितात्मा शरीरमास्थाय करोति सर्वम् ।

स्त्रियन्नपानादिविचित्र भोगैः स एव जाग्रत् परितृप्तिमेति ॥

स्वप्ने स जीवः सुखदुःखभोक्ता स्वमायया कल्पितजीवलोके ।

सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति ॥

पुनश्च जन्मान्तरकर्म्मयोगात्स एव जीवः स्वपिति प्रबुद्धः ।

पुरत्रये क्रीडति यश्च जीवस्ततस्तु जातं सकलं विचित्रम् ॥ ० १ १४

एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।

खं वायुर्ज्योतिरापश्च पृथ्वी विश्वस्य धारिणी ॥

जाग्रत् - स्वप्न - सुषुप्त्यादि प्रपञ्चं यत् प्रकाशते ।

तद् ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धः प्रमुच्यते ॥

बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च ।

भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥

यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेष्वनुधावति ।

एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानु विधावति ॥

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत यद्यपि सर्वशास्त्रमूर्द्धन्य, स्वतः प्रमाणभूत वेदशास्त्र में ग्रात्मभ्वरूपनिरूपण के सम्बन्ध में किसी भी अंश में त्रुटि नहीं है, तथापि विज्ञानदृष्टि के विलुप्त प्रायः हो जाने से विज्ञानमूला तथा विज्ञानात्मक वेदशास्त्र के वास्तविक तात्पर्य्यं से हम बहुत पीछे हट गये हैं । क्षणिक विज्ञानमूला म्रान्ति अथवा तो बहुत आगे बढ़ गये हैं । एक दल कहता है - वेद में विज्ञान का अन्वेषण करना मृगमरीचिका है । वेद ईश्वर की पवित्र वाणी है ( अवश्य ), इस के द्वारा केवल ज्ञानोपासना कर्मकाण्डत्रयी का ही स्वरूप प्रतिपादित हुआ है । दूसरे दल की वेदार्थ के संबन्ध में इससे भी भयङ्कर मनोवृत्तियाँ हैं । वे महानुभाव वेद में विज्ञान अवश्य मानते हैं, परन्तु उनकी बिज्ञान दृष्टि पाश्चात्य क्षणिक अशान्तिप्रवर्द्धक - भौतिक ( अतएव एकान्ततः भयावह ) विज्ञान की ही अनुगामिनी वन रही है । वे केबल इसी में वेद का महत्त्व समझते हैं कि एकमात्र भौतिक विज्ञान के उपासक प्रतीच्य वैज्ञानिकों ने तार - वायरलेस टेलिग्राफी - फोनोग्राफ - रेल्वेट्रन वेलून, आदि जो ग्राविष्कार किए हैं, वे सब हमारे वेदशास्त्र में निहित हैं । फलतः मीमांसा संगति के एकान्ततः विरुद्ध मन्त्राओं की दुर्दशा करते हुए वे महा-शय ग्राविष्कारों का स्वप्न देख रहे हैं । कितने ही महानुभावों की दृष्टि में वेद केवल राष्ट्रनीति का निरूपण करने वाला नीतिशास्त्र है । एक सज्जन ने अपनी इसी काल्पनिक भावना के लक्ष्य से दर्शपूर्ण-मास यज्ञ के सब मन्त्रों का राजनैतिक अर्थ करने का व्यर्थ प्रयास किया भी है । कितने ही अभिनिविष्ट कहते हैं कि, वेद केवल अध्यात्मशास्त्र हैं । वैद में जितने भी पदार्थ प्राये हैं, वे सब केबल अध्यात्मसंस्था से सम्बन्ध रखते हैं । कितने ही कृतयुगप्रेमियों की दृष्टि में वेद केवल खगोलीय चरित्र का दूसरे शब्दों में ज्योतिविद्या का ही निरूपक है । इन सब प्रपश्वियों को हम ग्रागे बढ़ा हुआ कहेंगे । मध्यममार्गानुयायी श्रस्मदादि साधारण व्यक्तियों की दृष्टि में उक्त दोनों ही दल भ्रांति के उपासक बन रहे हैं । वेदार्थ के सम्बन्ध में सबसे पहला, एवं मुख्य कर्त्तव्य यह होना चाहिए कि, हम अपने कल्पित - सिद्धांत को पुष्ट करने की दृष्टि से वेदमन्त्रों को न देखते हुए, मीमांसाशास्त्र प्रतिपादित प्रसंग, उपोद्घात, हेतुता, श्रवसर, निर्वा हकश्य, काय्यैक्यवाक्यता, इन छहों सङ्गतिम्रों की पूर्ण मीमांसा करते हुए, उपक्रम व उपसंहार पर पूर्ण व्यान देते हुए, शब्दप्रमाणका वयं, यदस्माकं शब्द प्राह तदस्माकं प्रमाणम् " " ईक्षतेर्नाशब्दम् " " लक्षणं-कच्चक्षुष्कात्रयम् ” “ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कायकाय्यं व्यवस्थितौ ” इत्यादि प्राप्तसिद्धांतों के अनुसार प्रत्येक विषय की सिद्धि के लिए शास्त्रीय प्रमाणों को ग्राधार बनाते हुए ही ग्रागे बढ़ें । तभी हम यथार्थ निर्णय पर पहुंच सकते हैं । ग्रभिनिवेशमूलक मतवाद मनुष्य को सत्य मार्ग से सर्वथा च्युत कर देता है । यदि उक्त शास्त्र दृष्टि से वेदार्थ का उपड़ हगा किया जाता है, तो ब्रह्म ( मन्त्र ) - ब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र में हमें विज्ञान, स्तुति, इतिहास, ज्ञान, कर्म, उपासना ये ६ विषय उपलब्ध होते हैं । इन ६ ओं में से वेद-रहस्य प्रतिपादक गाथा - नाराशंसी- रहस्य- निदान -कुम्व्या, इन ग्रन्थों के विलुप्तप्राय हो जाने से विज्ञान एवं इतिहास, ये दो विषय स्मृतिगर्भ में विलीन हो चुके हैं । भारतीय विद्वानों की दृष्टि में वेद केवल स्तुति-ज्ञान - कर्म - उपासना- इन चार ही विषयों का प्रतिपादक वन रहा है । बिज्ञान एवं इतिहासरष्टि के प्रभाव से ही आज हम वेद के वास्तविक अर्थ से पराः परावत चले गये हैं । विशेषतः विज्ञान के प्रभाव से हो आज हम ग्राम - परमात्म - परलोक - श्रात्मगति - श्राद्ध आदि विज्ञान सिद्ध विषयों के सम्बन्ध में सन्देह के भाजन बन रहे हैं । सबसे पहले ग्रात्मा का ही विचार कीजिए । | २३८