Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 251–260

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 251–260

पृष्ठ 251

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ( नित्यं ) विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ॥१ ॥

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ॥२ ॥

परं ब्रह्म परं सत्यं सच्चिदानन्दलक्षणम् ।

श्रप्रमेयमनिद्दश्यमवाङ् मनसगोचरम् ॥३ ॥

स्थूल देहविहीनात्मा सूक्ष्मदेह विर्वाजतः । अखण्डैकरसोवाहमानन्दोऽस्मिविर्वाजितः । [ २३६ ] प्राणात्म विज्ञानोपनिषत - बृ ० प्रा ० उप ० ३।१।२८ - तैत्ति ० उप ० २।१।१ आत्मा अखण्ड है, निर्विकार है, सर्वव्यापक है, प्रबन्मा है, यह भी शास्त्र का ही सिद्धांत हैं । शरीर से उत्क्रांत प्रारमा कर्मफल- भोगने के लिए लोकान्तर में जाता है, विभिन्नपक्षसमर्थन - यह भी शास्त्रसम्मत्त पक्ष है शरीर के नष्ट होने पर श्रात्मा लोकान्तर में नहीं जाता, अपितु वह यहीं विलीन हो जाता है, यह भी वेदाभिमत ही सिद्धांत हैं । शरीर छोड़ने से पहले जब श्रात्मा अपना नया शरीर पहले से निश्चित कर लेता है, तभी पूर्व शरीर को छोड़ता है, इस सिद्धांत को भी अशास्त्रीय नहीं माना जा सकता । शरीर ही श्रात्मा है, शरीर से पृथक् आत्मा नही है, इस नास्तिकवाद का मूल भी शास्त्र ही है । श्रात्मा न विश्व का कारण है न, कार्य है, उस प्रसंग तस्व का ससंग विश्व से कोई सम्बन्ध नहीं है, यह भी शास्त्र की ही उक्ति है । श्रारमा ही विश्व का कर्त्ता है, यह भी शास्त्र ही कहता है । आत्मा ही विश्व बना हुआ है, यह भी शास्त्र का ही सिद्धांत है । कहीं विश्वपर्वभूत सूर्य्यं को आत्मा बतलाया जा रहा है, कहीं अग्नि को आत्मा कहा जा रहा है, कहीं चार पुरुषों की समष्टि आत्मा बन रहा है । कहीं लोमत्वमांसप्रस्थि की समष्टि को आत्मा माना जा रहा है, कहीं आत्मा को कृश एवं स्थूल कहा जा रहा है, कहीं आत्मा को मनःप्राण-वाङ्मय बतलाया गया है । इसी प्रकार इन्द्र - सोम - प्रारण वायु - पानी- श्राकाश - वाक् प्रादित्य - विष्णु - प्रदि क्षर पदार्थों को भिन्न - भिन्न स्थलों में श्रात्म शब्द से व्यवहृत किया गया है । निम्नलिखित भिन्न - भिन्न शास्त्रीय प्रमाण इन्हीं भिन्न - भिन्न पक्षों का समर्थन कर रहे हैं-शुद्धं सूक्ष्म निराकारं निर्विकारं निरञ्जनम् । श्रनन्तमपरिच्छेद्यमनूपममनामयम् ॥ ४ ॥ - योगशिखोपनिषत् २ अ ० । १६ । १७

कारणादिविहीनात्मा तुरीयादिविवजितः ॥ ५ ॥ - तेजबिन्दुपनिषत् ४।७३

सर्वातीतस्वभावात्मा नादान्तर्ज्योतिरेव स ॥ ६ ॥ - तेजोबिन्दुपनिषत् ५।७

पृष्ठ 252

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अथ यो हैवमेतमग्नि सावित्रं वेद, स एवास्माँ-ल्लोकात् प्रेत्य प्रात्मानं वेद ॥१ ॥

प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् - तं ब्रा ० ३ | १०: ११।१ एतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मि ॥२ ॥ छा ० उ ० ३ अ ० । १३ खं ० । ४ कं ०

तद्य इत्थं विदु ० + + तेऽचिषमभि संभवन्ति ० + + रमणीयां योनि वा कपूयां योनि वा प्रपद्येरन् ॥३ ॥

-छां ० उ ० ५।१०

ती प्रणवं पितृणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् ।

ताभ्यामिदं विश्वमेजत् समेति यदन्तरा पितरं मातरं च ॥४ ॥

विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः पराहताः ।

न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः ॥ ५ ॥

शुक्लकृष्णे गती ह्यते जगतः शाश्वती मते ।

एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽवर्त्ततेः ॥६ ॥

-- ऋक् सं ० १० १८८।१५ न तस्य प्रारणा उत्क्रामन्ति, इहैव समवलीयन्ते ॥१ ॥ -यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्त तागेव भवति ।

एवं मुविजानत प्रात्मा भवति गौतम ॥ २ ॥

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । - गी ० ८।२६ - बृ ० प्रा ० उप ० ३।२।११।४ । ४६ - कठोपनिषत् ४।१५ क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परात्परे ॥ ३॥ – मुण्डकोपनिषत् २।२15

= ++ -व्रजंस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति ।

एवं तृणजलौकेयं देही कर्मगतिगतः ॥ १ ॥

- श्रीमद्भागवत् [ २४० ]

पृष्ठ 253

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड * —— श्रात्मा व तनू ॥१ ॥ - शत ० ४।२२।५

B. - * --[ २४१ ] प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् - गी ० २।२२ - व्या ० सू ० ३ | १ | १ - श्व ० उ ० ६८ – श्व ० उ ० ३।३

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २ ॥

तदनन्तरप्रतिपत्तौ रंहति संपरिष्विक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ॥३ ॥

इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ॥ ४ ॥ - ४० उ ० ५।६।१

श्रात्मनो वाऽइमानि सर्वाण्यङ्गानि प्रभवन्ति ॥२ ॥ —शत ० ४,२।२।१

( शरीरं ) तत् सर्वमात्मा वाचमप्येति, वाङ् मयो भवति ॥ ३ ॥ – कौ ० २।७

बाह्योह्यात्मा ॥४ ॥ —–शत ० ६।६।२।१६

आत्मा वाग्रे सम्भवतः सम्भवति ॥५ ॥ - शत ० ७।१।१।२१

न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत् समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।

परास्य शक्तिविविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥१ ॥

अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्त्ता ॥ २॥ —श्व े

० उ ० १।६

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात् ।

सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥१ ॥

एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ - ३० ४।१७

पृष्ठ 254

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड सर्वमुह्य वेदं प्रजापतिः ॥ ५ ॥ - ० ५ । १ । १ । ४

--प्रारणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्यः । - प्र ० उ ०१।८ [ २४२ ] प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् - मुण्डक ० २।१।१ - यजुः सं ० ७ ४२ तथाऽऽक्षराद्विविधाः सौम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ ३ ॥

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः ।

वायोरग्निः प्रग्नेरापः, अद्द्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या औषधयः ॥ ४ ॥

- त ० उप ० २।१ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ १ ॥ - यजुः सं ० ३१।२

मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ २ ॥ — गी ० ७।७

स बाह्याभ्यन्तरे देहे ह्यध ऊर्ध्वं च दिक्षु च । इत श्रात्मा ततोऽप्यात्मा नास्त्यनात्ममयं जगत् ॥ ३॥ - महोपनिषत् ० ६।१०

सर्वं खल्विदं ब्रह्म - ब्रह्मैवेदं सर्वम् ॥४ ॥ - छा ० उप ० ३।१४।१

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोस्येहा भवत् पुनः ॥६ ॥– यजुः सं ० ३१।४

एष ह देवः प्रदिशोऽनुसर्वाः पूर्वोह जातः स उ गर्भे अन्तः ।

स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ जनांस्तिष्ठति सर्वतो मुखः ॥७ ॥

चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुम्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।

प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य्य श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥१ ॥

पृष्ठ 255

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड

अग्नि सर्वेषां देवानामात्मा ॥ १ ॥ - शत ० १४।३।२१५

श्रात्मा वा श्रग्निः ॥२ ॥

- शत ० ७।३।२।१

श्रग्निरेव ब्रह्म ॥३ ॥

- शत ० १०१४।१।५ प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् सवै सप्तपुरुषो भवति । सप्त पुरुषो ह्ययं पुरुषो यच्चत्वार श्रात्मा,

त्रयः पक्ष पुच्छानि । चत्वारो हि तस्य पुरुषस्य आत्मा ॥ १ ॥

चतुविधोऽयमात्मा ॥२ ॥ – शत ० ७।१।१।१८

-- * --- शत ० ६ | १ | १६ पाङ्क्त इतर आत्मा - लोमत्वङ मांसमस्थिमज्जा ॥ १ ॥ - तां ० ब्रा ० ५।१४

---तस्मादितर आत्मा मेद्यति च कृश्यति च ॥१ ॥ - तां ० ब्रा ० ५।१।७

एतन्मयो वाऽप्रयमात्मा वाङ् मयो मनोमयः प्राणमयः ॥ १ ॥

-33-पुरुषो वै संवत्सरः ॥ १ ॥ — शत ० १२।२।४ । १

स एष प्रजापतिरेव संवत्सरः ॥ २ ॥ की ० ६।१५

स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलः ॥ ३ ॥ -शत ० १४।४।३।२२

----प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा - तं मामायुरमृतमित्युपास्व ॥ १ ॥ -- ( इन्द्रः ) कौ ० उ ०३।१२

सोमो वै प्रजापतिः ॥ २ ॥ – शत ० ५।१।३।७ ( सोमः )

[ २४३ ]

पृष्ठ 256

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् प्राणो वै ब्रह्म || ३ || – शत ० १४ | ६ | १० | २ ( प्राण:) श्रयं वै ब्रह्म योऽयं ( वायुः ) पवते ॥४ ॥ - ऐ ० ८२८ ( वायुः )

श्रद्भिर्वा इदं सर्वमाप्तम् || ५ || - शत ० १ | १ | १ | १४ ( श्रापः ) मनोमयो भारूप आकाशात्मा || ६ || – छा ० उप ३ | १४ | २ ( श्राकाशः ) वाग्वै ब्रह्म ॥७ ॥ – ऐ ० ६।३ ( वाक् )

उपर्युक्त आत्मतत्त्व प्रतिपादक, परस्पर में सर्वथा विरुद्ध शास्त्रीय सिद्धान्त हमें उलझन में डाल रहे हैं । सत्यतत्त्व एक हो सकता है, अनेक नहीं, ऐसी स्थिति में कौन व्याख्यादोषमूला श्रात्मस्वरूपविप्रतिपत्ति से सिद्धान्त को सत्य समझा जाय? हमारी दृष्टि से इन सारे प्रश्नों का एकमात्र उत्तर है, आत्मस्वरूप की यथार्थप्रतिपत्ति । कहना अनुचित ही नहीं, साथ में प्रप्रासङ्गिक भी होगा, परन्तु ग्रापको यह मान लेना पड़ेगा कि श्रात्म —– स्वरूप के सम्बन्ध में ग्राज जो भ्रान्तियाँ फैल रही हैं, यह शास्त्र का दोष नहीं है, अपितु व्याख्या-ताों की कृपा का फल है । प्रत्येक विषय का सर्वथा परिष्कृत रूप से निरूपण करने वाला शास्त्र इन सम्प्रदायभक्त व्याख्याताओं की कृपा से दुरूह बन रहा है । व्याख्याताओं की दृष्टि में परमेश्वर - महेश्वर-ईश्वर - उपेश्वर - प्रात्मा - यादि सब तत्त्व समानार्थक हैं । उनकी दृष्टि में सर्वत्र अभेदवाद का साम्राज्य है । बस एकमात्र इसी व्याख्यादोप से सर्वथा विभक्त परमेश्वर - महेश्वरादि तत्त्व हमारे लिए अविज्ञात कोटि प्रविष्ट रहते हुए सन्देह के कारण वन रहे हैं । आत्मस्वरूप परिचय के लिए पहले इन भेदों का स्वरूप-ज्ञान परम आवश्यक है । अतएव अप्राकृत होते हुए भी इस प्रकरण में आत्मभेदों का संक्षिप्त स्वरूप परिचय पाठकों के समक्ष उपस्थित किया जाता है । " आत्मा ह्ययं प्रजापति " ( शत ० ४।६।१।१ ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार प्रात्मतत्त्व को प्रजापति कहा जाता है । यह ' प्रजापति ' शब्द बड़ा ही उलझा हुआ है । ब्राह्मणश्रुति के अवलोकन से प्राप को विदित होगा कि, एक ही प्रजापति श्रात्मभेदस्वरूपपरिचय शब्द भिन्न - भिन्न ग्रर्थों के लिए सैकड़ों स्थानों में प्रयुक्त हुआ है । उदाहरण के लिए कुछ एक स्थलों का दिग्दर्शन यहां भी करा दिया जाता है । " एष वै प्रजापतिर्यदग्निः " ( तै ० ब्रा ० १ | १ | ५ | ५ ) - " यो ह खलु वाव प्रजापतिः, स उ एवेन्द्र: " ( तै ० ब्रा ० १।२।२२५ ) – " प्रजापति मनः " ( कौ ० १०1१ ) - " एष प्रजापतिर्यद्धृदयम् " ( शत ० १४ । ८४११ ) - " वाग्वै प्रजापतिः " ( शत ० ५ | १ | ५ | ६ ) - " प्रजापति वाचस्पति: " ( शत ० ५।१।१।१३ ) “ स एष सम्वत्सरः प्रजापतिः " ( शत ० १४ | ४ | ३ | २२ ) — " स वै यज्ञ एव प्रजापतिः " ( शत ० १।७ । [ २४४ ]

पृष्ठ 257

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानापनिषद ४ । ४ ) - " प्रजापति सविता " शत ० ८ | ४ | १ | ४ ) -( तां ० ] ब्रात् १६ । ५।१७ ) -- " प्राणा उ वै प्रजापतिर्वै: " ( " अन्नं वै प्रजापतिः " ( शत ० ५।१।३।७ ) - प्रजापति ब्रह्मा " ( गो ० उ ० ५८ ) - प्रजापतिव चन्द्रमा: " ( शत ० ६ | १ | ३ | १६ ) – “ सोमो हि प्रजापतिः " शत ० ५।१।५।२६ ) - " प्रजापति वसिष्ठः " ( कौ ० २५ २ ) – “ प्रजापति व्योमा " ( शत ० ८ | ४ | १ | ११ ) - " प्रजापतिर्वा श्रोदन: " ( शत ० १३।३।६।७ ) - " प्रजापतिवें हिङ्कारः " ( तां ० ६८५ ) - प्रजापति भूतः " ( तै ० २ | १ || ३ ) -" प्रजापतिवें सुपर्णः " ( शत ० १०।२।२।४ ) – " प्रजापतिः स्वरः " ( श ० ब्रा ० ३।७ ) – “ सत्यं हि प्रजापतिः " ( शत ० ४२ । १ । २६ ) - " पुरुषो हि प्रजापतिः " ( शत ० ७।४१ । १५ ) - " प्रजापति भरतः " ( शत०-५।८।१।१४ ) - " प्रजापतिर्धाता " ( शत ० ६ | ५ | १ | ३८ ) - " को वै प्रजापतिः " ( गो ० उ ० ६ । ३ ) - " प्रजापतिर्वै-जमदग्निः ” ( शत ०१३।२।२।१४ ) - प्रजापति क्षत्रम् " ( शत ० ८ | २ | ३ | ११ ) - " द्यावापृथिवी हि प्रजापतिः " ( शत ० ५ । १।५।२३ ) इत्यादि । उक्त श्रौत वचनों के अनुसार " अग्नि - इन्द्र - मन - हृदय - वाक् - वाचस्पति - सम्वत्सर - यज्ञ - सविता - प्रारण-प्रश्न - ब्रह्मा - चन्द्रमा -- सोम- वशिष्ठ - व्योम - श्रोदन - हिङ्कार- भूत- सुपर्ण- स्वर - सत्य- पुरुष भरत -- धाता क- जमदग्नि-क्षत्र द्यावापृथिवी इत्यादि तत्त्वों के लिए प्रजापति शब्द प्रयुक्त हुत्रा है । इन सब वचनों का समन्वय करने के लिए विज्ञ पाठकों को ' श्रात्मप्राणपशूनां समष्टिः प्रजापतिः " प्रजापति शब्द का यह लक्षण करना पड़ेगा जिस वस्तुतत्त्व में आप को प्रात्मा - प्राण- पशु " ये तीन विभाग उपलब्ध हों उसे अवश्य ही आप " प्रजा-पति ” शब्द से व्यवहृत कर सकते हैं । उक्य तत्त्व आत्मा है । वह मूल तत्त्व जिससे तद्गत वस्तु के अव-यव प्राणरूप से उठकर बाहर व्याप्त होते हैं — उक्थ नाम से व्यवहृत होता है । यही उस वस्तु का आत्मा है । वस्तुतत्त्व से निकलने वाले श्रर्क रश्मियाँ हैं । अर्कमण्डल ( रश्मिमण्डल ) में प्रतिष्ठित अनात्म-भोग्य शिति पशु है । उक्थ प्रर्क - अशितिरूप आत्मा - प्राण - पशु की समष्टि प्रजापति है । उदाहरण के लिए सूर्य्य को सामने रखिये । सूर्य्यपिण्ड रश्मिमण्डल का उक्थ है । यहीं से उठकर रश्मियाँ चारों ओर व्याप्त हो रही हैं । प्राणमयी ज्योतिर्घना रश्मियाँ अर्क है । इस प्राणमय रश्मिमण्डल के गर्भ में प्रन्नरूप प्रतिष्ठित पृथिवी - चन्द्रमा मङ्गल - बुध - गुरू - शनि - आदि ग्रहोपग्रह एवं रोदसी त्रैलोक्य में रहने वाला चतु-दशविध भूतसर्ग अन्नात्मक प्रशिति है । प्रजापति शब्द प्रजासापेक्ष है । भोक्ता - भोगसाधन - भोग्य के समन्वय से ही यह अपेक्षा पूरी होती है । उक्थ आत्मा भोक्ता है, यही तन्त्रपरिभाषा के अनुसार पशुपति है । अर्क प्राण भोग साधन है, यही पाश है, अशिति पशु भोग्य है । यही पशुभाव प्रजा है । इस का पति वही उक्थ आत्मा है । इस प्रकार — " श्रात्मप्रारणपशुत्वम् " " श्रात्मप्राणपशूनामन्योऽन्यपरिग्रहत्त्वम् " ही ' प्रजापत्तित्त्व ' है । उपर्युक्त अग्निन्द्रादि सब तत्त्वों के साथ इस प्रजापति - लक्षण का समन्वय हो जाता है, अतएव श्रुति ने सबको प्रजापति शब्द से व्यवहृत कर दिया है । यह प्रजापतितत्त्व – “ चतुष्टयं वा इदं सर्वम् " ( को ० ब्रा ० २1१ ) इस अनुगम सिद्धान्त के अनुसार " महेश्वर- विश्वेश्वर - उपेश्वर - ईश्वर " भेद से चार भागों में विभक्त है । इन चारों प्रजापतियों का अधिष्ठाता चारों से पृथक् “ परमेश्वर " है, वह एकाकी है, सर्वव्यापक है, आत्म, प्राण, पशु - भाव से विरहित होता प्रजापति मर्य्यादा से बहिष्कृत है । वेदशास्त्र ही शास्त्र है । " शास्त्रयोनित्त्वात् " ( शा ० सू ० ३।१ ) इस [ २४५ ]

पृष्ठ 258

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् शारीरक सिद्धान्त के अनुसार शास्त्र शब्द प्रधानतया वेदराशि का ही बोधक माना गया है । इतर शास्त्रों का शास्त्रत्त्व वेदशास्त्रप्रामाण्य पर ही निर्भर है । सब इसी के प्रङ्गोपाङ्ग हैं । यह वेदशास्त्र, किंवा सर्व-शास्त्र एकमात्र इसी प्रजापति चतुष्टयी का निरूपण करने में समर्थ है । प्रजापति - मर्थ्यादा से बहिर्भूत व्यापक परमेश्वर का निरूपण करना इसके लिए असम्भव है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर उप-निच्छति कहती है-संविदन्ति न यं वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः । यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ॥ वेदशास्त्र एकमात्र प्राजापत्य - संस्थाओं का निरूपण करता है, अतएव इसका - " प्राजापत्यो वं वेद: ' ( तै ० ३।३।७।२ ) - " प्रजापतेर्वा एतानि श्मश्रूणि यद् वेदः " ( तै ० ३।३।६ ) ये लक्षण किए जाते हैं । आत्मस्वरूप - सम्बन्ध में इस प्रजापति के पूर्वोक्त महेश्वरादि चार प्रधान विवर्त हैं । यद्यपि इन प्रजापति - संस्थाओं का आरम्भ की " अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् " में दिग्दर्शन कराया जा चुका है, तथापि प्रकरण संगति के लिए सिंहावलोकनदृष्ट्या इन पर - पुन दृष्टि डाल लेना अनुचित न होगा । सर्वबलशून्य शुद्ध रसरूप " ऐकान्तिक सुख " नाम से प्रसिद्ध विश्वातीत तत्त्व " निविशेष " है, एवं-सर्वबल विशिष्ट — " शाश्वतधर्म्म " नाम से प्रसिद्ध रसबलात्मक विश्वातीत तत्त्व " परात्पर " है । शुद्ध - रस की केवल भावना ही की जा सकती है । ऐसा कथमपि सम्भव नहीं है कि, रस कभी बल से एकान्ततः पृथक् हो जाय । अतएव भातिप्रतिष्ठ शुद्ध रसरूप निर्विशेष का रसबलसमुच्चितरूप सर्वबलविशिष्ट रसमूर्ति परात्पर में ही अन्तर्भाव हो जाता है । यही पहला अखण्ड सर्वव्यापक श्रात्मा है । यह तत्त्व ' ईश्वर - जीव-जगत् ' तीनों विवत्तों से पृथक् है किन्तु तीनों में समान रूप से व्याप्त होता हुआ सर्वव्यापक है । इसकी सर्वव्यापकता ही इसकी अनिर्वचनीयता, अविज्ञेयता अतएव शास्त्रानधिकृतता का मुख्य हेतु है । इसके उदर में अनन्त महेश्वर - ईश्वरादि प्रजापति प्रतिष्ठित ग्रतएव इसे ' परमेश्वर ' कहा जाता है । ' परात्पर ' नाम से प्रसिद्ध इस परमेश्वर रूप - खण्ड घरातल पर मायाबल के उदय से अश्वत्थमूत्तिमायी महेश्वर का जन्म होता है । माया बल अनन्त हैं । एक - एक मामा बल से सीमित एक - एक परात्पर प्रदेश एक - एक महेश्वर है । परमेश्वर एक था, मायाबल के आनन्त्य के कारणमायी महेश्वर सहस्रबल्शेश्वर युक्त एक - एक अश्वत्थ वृक्ष है । एक - एक बलशा टहनी ) में स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा - पृथिवी - ये पांच - पांच पर्व हैं । इन्हीं के सम्बन्ध से यह पञ्चपर्व समष्टि - ' पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्या बल्शा " नाम से प्रसिद्ध है । इन पांचों पर्वों में पहला स्वयम्भू ( जिसके महिमामण्डल में परमेष्ठ - सूर्य्यादि चारों पर्व प्रतिष्ठित हैं ) " प्राभूप्रजापति " - " परमप्रजापति " - " विश्वकर्माप्रजापति " - " प्रव्यक्तप्रजापति " - " वेदप्रजापति ' - " परोरजाप्र-जापति " इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध । इन पांचों पर्वो की समष्टि हमारा एक विश्व है । अश्वत्थ-मूर्ति प्रत्येक महेश्वर के उदर में ऐसे ऐसे सहस्र सहस्र विश्व हैं । विश्वावच्छिन्न विश्वोवाधिक वही महे-श्वर विश्व का अध्यक्ष बनता हुआ ' विश्वेश्वर ' है । विश्वेश्वर के स्वयम्भूपरमेष्ठी - आदि एक - एक पर्व उपेश्वर है एवं महापृथिवी से सम्बन्ध रखने वाली विराट् - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ की समष्टि ईश्वर है । उद्धृत तालिकाओं से उपर्युक्त प्रात्मसंस्थाओं का सम्यक् रूप से स्पष्टीकरण हो जाता है । [ २४६ ]

पृष्ठ 259

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १– १ - भातिबुध्या – सर्वबलशून्यो विशुद्धो रसः + निर्विशेषः २ - सत्तादृष्ट्या - सर्वबल विशिष्टो रसः परात्परः प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् > विश्वातीतः परमेश्वरः + ( १ - मायावच्छिन्नः सहस्रबशेश्वरोऽश्वत्थमूत्तिः षोडशी महेश्वरप्रजापतिः २ - पञ्चपर्वाध्यक्षो विश्वाधिष्ठाता --चतुष्टयं वा इदं सर्वम् २ - विश्वेश्वरप्रजापतिः ३ –स्वयम्भूः - परमेष्ठी - सूर्य्यः चन्द्रः पृथिवी ( पृथक् २ ) - उपेश्वरप्रजापतयः ४ - विराट् - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञमूत्तिः साक्षी -ईश्वरप्रजापतिः एक ही ग्रात्मतत्त्व अनेक भागों में कैसे विभक्त हो गया? इस प्रश्न का उत्तर है आत्मपरिग्रह | परिग्रहों के तारतम्य से वह एक ही अनेक रूपों में परिणत होजाता श्रात्मपरिग्रहमूलक - श्रात्मस्वरूपभेद है । प्रधान आत्मा है विश्वातीत अखण्ड परात्पर । इसीके आधार पर हमारा अद्वैत सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । यह आत्मा सर्वथा निर्ध-क । यद्यपि आत्मज्ञान - प्रकरण का चरम लक्ष्य निर्धक यही व्यापक आत्मा है, तथापि परिग्रहों से ससीम, अतएव सखण्ड, ग्रतएव च अनेक रूपों में परिणत सर्वधर्म्मा आत्मा को किंवा आत्मसंस्थानों को भी आत्मकोटि से बाहर नहीं किया जा सकता । वस्तुतस्तु विश्व के गर्भ में रहने वाले हमारी अपेक्षा से तो आत्मशब्द से जन्मस्थितिभङ्ग हेतुभूत सर्वधर्मोपपन्न सखण्ड आत्मविवर्त्तो का ही ग्रहण अपेक्षित है । निर्धर्मक आत्मा निग्रहानुग्रह, दोनों भावों से परे रहता हुआ प्रविज्ञेय है, अनुपास्य है, शास्त्रानधिकृत है । हम केवल सखण्ड ब्रह्म की ही जिज्ञासा कर सकते हैं । वही हमारे ज्ञान का विषय बन सकता है । वही जन्मादि का कारण है, वही सर्वधर्मोपपन्न है । आत्मस्वरूपनिरूपक जिस वेदान्त दर्शन को हमारे कृपालु व्याख्याता निर्धर्म्मक, जन्मस्थितिभंगमर्यादा से सर्वथा बहिर्भूत शास्त्रयोनित्त्व से असंस्पृष्ट जिस प्रखण्-डात्मा का प्रतिपादक मानने का व्यर्थ का साहस कर रहे हैं, वही शारीरक दर्शन शारीरक शब्द से सखण्ड-आत्मा की ओर लक्ष्य कराता हुआ - " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा " " जन्माद्यस्य यतः " " शास्त्रयोनित्वात् " “ सर्वधर्मोपपत्तेश्च ” इस प्रारम्भ की सूत्रचतुष्टयी से विस्पष्ट शब्दों में विश्वमूर्ति सखण्ड ब्रह्म का ही निरूपण कर रहा है । बहुत प्रयास करने पर भी हम श्रद्वैताभिमानी व्याख्याताओं के – वेदान्त अखण्ड ब्रह्म का प्रतिपादक है ' इस कल्पित अवैदिक सिद्धान्त का पोषक सम्पूर्ण प्रस्थानत्रयी उपनिषत् - वेदान्त-दर्शन - गीता ) में एक भी वचन उपलब्ध न कर सके । भगवान् ही जाने इन शास्त्रभक्तों ने किस आधार पर इस कल्पित अद्वैतवाद को इतना महत्त्व दे डाला । साथ ही में नीरक्षीरविवेकी विद्वानों ने भी न मालुम किस आधार पर इस मिथ्या भ्रान्ति को अपना लिया । अस्तु - परिग्रहों के सम्बन्ध से वही निर्धम्मंक सर्वधर्मोपपन्न बन गया है, उसीका शास्त्र में निरू-पण है, यह निर्विवाद है । वे ग्रात्मपरिग्रह माया, कला, गुरण, विकार, श्रञ्जन, आवरण, भेद से ६ भागों में विभक्त है । इन ६ धम्र्मों से परिगृहीत आत्मतत्त्व ही सर्वधर्मोपपन्न है । इन ६ श्रों में माया कला क [ २४७ ]

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आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 260 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् एक विभाग है, गुण - विकार का एक विभाग है, ग्रञ्जन - प्रावरण का एक विभाग है । माया एवं कला मृतपरिग्रह हैं, गुण एव विकार ब्रह्मपरिग्रह हैं, ग्रञ्जन एव ग्रावरण शुक्रपरिग्रह हैं । परिग्रहण्या श्रमृतात्मा - ब्रह्मात्मा - शुक्रात्मा तीनों पृथक् पृथक् हैं । परिग्रह छोड़ देने पर - " तदेव शुक्रं तद्द्ब्रह्म तदेवा-मृतमुच्यते ” ( कठ ० ६।१ ) के अनुसार तीनों एक ही ग्रात्मतत्त्व है । वही विशुद्ध ग्रात्मा सपरिग्रहावस्था में तीन है, परिग्रहशून्यावस्था में तीनों एक आत्मा है - " श्रात्मा उ एकः सन्नेतत् त्र्यं त्रयं सदयमेक-आत्मा ” ( शत ० १४।४।३।३ ) । माया परिग्रह एकाकी है, निष्कल है । इसी को विश्व की प्रवान्तर खण्ड मायायों की अपेक्षा ' महामाया ' कहा जाता है । इस माया - परिग्रह के उदय से सीमाभावप्रवर्त्तक ' माया ' परिग्रह वही परात्पर मायापुर से वेष्टित होता हुआ, ससीम बनता हुआ " पुरुष " नाम धारण कर लेता है । " मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् " ( श्वे ० उप ० ४।१० के अनुसार यही निष्कल विशुद्ध केवल सीमित ग्रात्म-भाव महेश्वर कहलाता है । अभी कलाओं का उदय नहीं है । कला ही विविध भाव की जननी है । श्रभी इसमें वैविध्य का प्रभाव है अतएव " न वैविध्यमेति " इस निर्वचन के अनुसार अव्यय नाम से व्यवहृत होता है । केवल - मायापरिग्रहोपाधिक प्रतएव निष्कल विशुद्ध अव्ययात्मक इसी मायी महेश्वर का स्वरूप बतलाती हुई गोपथश्रुति कहती है-सदृशं त्रिषु लिङ्गषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥ ( गो ० ब्रा ० पू ० १।२६ । ) मायातीत परात्पर निरञ्जन है । वही निरञ्जन केवल मायासंसर्ग से मायी बना हुआ है, परन्तु निष्कलता अब भी इसकी प्रक्षुण्ण है । यदि इस निष्कल अव्यय की उपासना की जाती है, तो समानकक्ष, किंवा अभिन्नकक्ष होने से वह निरञ्जन परात्पर पद को प्राप्त हो जाता है । इसी अभिप्राय से उपनिष-छ ुति कहती है-न भूमिरापो न च वह्निरस्ति न चानिलो मेऽस्ति न चाम्बरं च । एवं विदित्वा परमात्मरूपं गुहाशयं निष्कल मद्वितीयम् ॥ समस्तसाक्षि सदसद्विहीनं प्रयाति शुद्धं परमात्मरूपम् ॥ ( कं ० व ० २ खं ० ४ )

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्म्मणो वा ।

ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमान ॥

- मुण्डकोपनिषत् ३।१।८ ' विशुद्ध भावात्मक ( ज्ञानात्मक ) इस निष्कल अव्यय से ही कला नाम के परिग्रह से आगे जाकर कलासगं का उपक्रम होता है, अतएव निम्नलिखित रूप से इस निष्कल को कलासर्ग की मूलप्रतिष्ठा माना गया है— [ २४८ ]