Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 261–270

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् परमेश्वर प्रतिकृति अनन्त महेश्वराधिष्ठाता श्रमायोपरमेश्वरः ' अविज्ञेय ' परिलेख: -महेम्बर महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः मह महेश्वर: महेश्वर: म महे महेश्वरः महेश्वरः A महेश्वर: महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगम सिद्धान्त के अनुसार ' महेश्वर - विश्वेश्वर उपेश्वर - ईश्वर ' इन चारों प्रजापतियों का अधिष्ठाता चारों से पृथक् ' परमेश्वर ' है वह एकाकी है, सर्वव्यापक है, आत्म प्रारण पशु -भाव से विरहित होता हुआ प्रजापति मर्यादा से बहिष्कृत है । यही पहला प्रखण्ड सर्वव्यापक आत्मा है । इसके उदर में अनन्त महेश्वर - ईश्वरादि प्रजापति हैं, अतएव इसे ' परमेश्वर ' कहा जाता है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपूर ।

पृष्ठ 262

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वाढविज्ञान प्रथम खण्ड महेश्वर प्रतिकृति प्रारणात्म विज्ञानोपनिषत् ' परात्पर ' नाम से प्रसिद्ध इस परमेश्वर रूप अखण्ड घरातल पर मायाबल के उदय से अश्वत्थमूर्ति मायी महेश्वर का जन्म होता है । मायाबल ग्रनन्त हैं । एक - एक मायाबल से सीमित एक - एक परात्पर प्रदेश एक - एक महेश्वर होता है । मायाबल की अनेकता के कारण मायी महेश्वर सहस्रबल्शेश्वरयुक्त एक - एक अश्वत्थ वृक्ष है । एक - एक बल्शा ( टहनी ) में स्वयम्भू – परमेष्ठी - सूय्यं - चन्द्रमा पृथिवी ये पाँच - पाँच पवं होते हैं । इन पाँचों की समष्टि ही एक विश्व है, तथा इसका अधिष्ठाता महेश्वर है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 263

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड परमप्रजापतिः विश्वेश्वर प्रतिकृति-१ प्राणामयः स्वयम्भूः प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् ब्रह्मा आभूप्रजापतिः जा प्रतिमा प्रजापतिः प परमेष्ठी विष्णुः प्रतिमा प्रजापतिः वाड़मय: + इन्द्रः सूर्य:, अपरमयान प्रतिमा प्रजापतिः अग्निः प्रतिमाप्र. के बा सोमः --महावन ( परमेश्वर ) में ग्रनन्त महेश्वर होते हैं । प्रत्येक महेश्वर अश्वत्थ ऊर्ध्वमूल माना जाता है । वर्तुलवृत्त का केन्द्र परिधि से ऊर्ध्व माना जाता है । उस ऊर्ध्वमूलरूप केन्द्र बिन्दु से चारों और परिधि पर्यन्त सहस्र शाखाएँ निकलती हैं । प्रत्येक शाखा में ' स्वयम्भू - परमेष्ठी सूर्य - पृथिवी - चन्द्रमा ' यह पाँच - पाँच पर्व होते हैं । उपक्रम में पुण्डीर स्वयम्भु व उपसंहार में चन्द्रमा है ग्रतएव चान्द्रब्रह्म को ' निधन ' कहा जाता है । स्वयम्भू की महिमा में परमेष्ठी, परमेष्ठी की महिमा में सूर्य, सूर्य की महिमा में पृथिवी, पृथिवी की महिमा में चन्द्रमा प्रतिष्ठित है । इन पाँचों पर्वो की समष्टि ही हमारा एक विश्व है । अश्वत्था मूर्ति प्रत्येक महेश्वर के उदर में ऐसे - ऐसे सहस्र विश्व हैं । विश्वावच्छिन्न- विश्वोपाधिक यही महेश्वर विश्व का अध्यक्ष बनता हुआ ' विश्वेश्वर ' कहलाता है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 264

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उपेश्वर प्रतिकृति परिलेख: -: -स्वतन्त्रः सन् स्वतन्त्रः सन् , स्वतन्त्रः सन् प्रशवः प्राणा: श्रात्म - पद - पुनः पदमूर्त्तयः पञ्च उपेश्वर आशितिः अर्का . आत्मा ( 3 क्थम ), प्रजापतयः विज्ञेयाः उपेश्वरः स्वयम्भूः पद्म पुनः पद्म पदम टम अर्का आशितिः यशवः प्राणाः आत्मा ( उक्थम ) पदम् पशवः अक आशिक्ति आत्मा उक्थम्प उपेश्वरः परमेष्ठी उपेश्वरः सूर्य्य: इन तीन देवताओं से सम्पन्न हुआ है । यहाँ पर ६ - १५ - २१ स्तोम त्रिलोकी को क्रमशः पृथिवी - अन्तरिक्ष-द्यौः लोक कहा गया है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 265

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उपेश्वर प्रतिकृति परिलेख: -मे स्वतन्त्रः सन् स्वतन्त्रः सन् पशवः प्राणा: श्रात्म - पद- पुनः पदमूर्तयः पञ्च उपेश्वर आशिति अर्का आत्मा ( उक्थम् ) प्रजापतयः विज्ञेयाः उपेश्वरः स्वयम्भूः पदम् पुनःचदम् पदम अर्का आशितिः पशक प्राणाः आत्मा ( उक्थम ) पशवः जाणाअर्का ' आशि स्वतन्त्रः सन् आत्मा ( उक्थमा . उपेश्वरः परमेष्ठी उपेश्वरः सूर्यः पशवः प्राणा स्वतन्त्रः सन् आरसा ( उक्थम ) -उपेश्वरः पृथिवी SHOW आश 4 स्वतन्त्रः सन् आत्मा उक्थम ) उपेश्वरश्चन्द्रमाः आत्मा - प्राण- पशु इन तीन कलाओं की समष्टि से ' प्रजापति ' का रूप निष्पन्न होता है । तात्पर्य यह कि इन तीनों कलाओं द्वारा ही प्रजापति संस्था का उदय होता है । उक्थ तत्त्व ( हृदय ) को श्रात्मा कहा जाता है । प्रर्क प्राण है एवं प्रशिति पशु है । श्रात्मा भोक्ता है | अर्थरूपी प्राण भोग साधन व प्रशिति ( अन्न ) रूप पशु भोग्य वस्तु है । प्रजापति संस्था को ' पृष्ठ ' शब्द से व्यवहृत किया जाता है । उक्थकला हृत्पृष्ठ ' अर्क कला ' अन्तः पृष्ठ ' एवं प्रशिति कला ' बहिः पृष्ठ ' नाम से व्यवहृत हुये हैं । इन्हें क्रमश: ' आत्मा'- ' पदम् ' - ' पुन पदम् ' भी कहा जाता है । यही तीनों उक्त पाँचों उपेश्वर मूर्तियों में स्पष्ट हो रहे हैं । इन्हें आत्मा, शरीर व महिमा के नाम से भी व्यवहृत किया जाता है ।

पृष्ठ 266

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ईश्वर प्रतिकृति बिराट् - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञात्मकः साक्षी प्रजापतिः- “ सुविज्ञेयः ” सहस्रशीर्ष: - इलोक सहस्त्राक्षः - वक्युलोकः सहस्त्रपात् - अमृताग्नितोळ: 4 ॥ एकदिश १५ ॥ पंचदशरतः ९ त्रिवृत्स्तोमः : सर्वज्ञः वायु हिरण्यगर्भः अग्निर्विराट् y → अन्तरिक्षम् पृथिव म भूमिस्मृत्वा चित्याग्निः सनिः भूपिण्डः पृ प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् महापृथिवी से सम्बन्ध रखने वाले विराट् हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञमूर्ति ( ६-१५ - २१ ) स्तौमित्रिलोकी में प्रतिष्ठित तत्त्व का ही नाम ईश्वर प्रजापति है । देवसत्य को ही विराट्मुर्ति ईश्वर प्रजापति कहा गया है, कर्मात्मा के साथ इसी ईश्वर प्रजापतिरूप देवसत्यात्मा का ही सम्बन्ध होता है । ईश्वर का स्वरूप श्रग्नि- वायु - इन्द्र इन तीन देवतानों से सम्पन्न हुया है । यहाँ पर ६-१५ - २१ स्तोम त्रिलोकी को क्रमशः पृथिवी - अन्तरिक्ष-द्यौः लोक कहा गया है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 267

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् भावग्राह्यमनोडाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥ —श्वे ० ५।१४ आगे जाकर ' कला ' नाम के दूसरे परिग्रह का उदय होता है । अनेक खण्डों में विभक्त ' योगमाया ' का ही नाम कला है । यह कलात्मिका माया महामाया से नित्य-षोडषकलाप्रवर्त्तक- ' कला ' परिग्रह युक्त रहती है, अतएव इसे योगमाया कहा जाता । यही मोहम्मू-लक नानात्त्वभाव की प्रथम भूमिका है – “ योगमाया हरेश्चैतत् तथा संमोह्यते जगत् । " इसके ' विष्णु माया, रुद्रमाया, शिवमाया अग्निमाया, सोममाया, इन्द्रमाया " आदि अनेक प्रवान्तर भेद हैं । खण्डखण्डात्मिका अतएव ' कला ' नाम से प्रसिद्ध इस योगमाया के उदय से वहाँ अव्ययमूर्ति निष्कल महेश्वर षोडशकल बनता हुआ – ' योगेश्वर ' नाम धारण करलेता है । योगमाया ही योगेश्वर की गोगेश्वरता है । यही सकल प्रजापति सोलह योगकलात्रों के सम्बन्ध से षोडशी नाम से प्रसिद्ध है - " षोडशकलं वा इदं सर्वम् " ( कौ ० ब्रा ० ८1१ ) । इसी दूसरी आत्मसंस्था का निरूपण करती हुई मन्त्रश्रुति कहती है ।

यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य प्रविवेश भुवनानि विश्वा ।

प्रजापतिः प्रजया संसराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी ॥

–यजुः सं ० ८।३६ पञ्चकल श्रव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल प्रात्मक्षर, सोलहवाँ अर्द्धमात्रिक वही परात्पर, इन की समष्टि ही षोडशी प्रजापति है । मायोपाधिक निष्कल महेश्वर एवं कलोपाधिक सकल योगेश्वर, दोनों की एक संस्था है । यही अमृतसंस्था- पुरुष संस्था - प्रमृतात्मसंस्था इत्यादि अनेक नामों से व्यवहृत की जा सकती है । आरम्भ की मृतात्मोपनिषत् में इसी संस्था का स्पष्टीकरण किया गया है । -कलाभाव के पीछे ' गुरण ' एवं ' विकार ' नामक दूसरा आत्मपरिग्रह युग्म ग्राता है इसका प्रधान सम्बन्ध - अक्षर मूर्ति प्रकृति भाव के साथ है । इसी अभिप्राय से - " विका-सगुरण - सविकार भावप्रवर्त्तक श्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् " ( गी ० १३ । १६ ) यह कहा जाता है । ' गुण - विकार ' परिग्रह गुण भाव के उदय से सत्यप्रजापति का उदय होता है । वही पुरुषात्मा सर्व-गुणसम्पन्न बनता हुआ ( सत्व रजः तमोगुण से युक्त होता हुआ ) सत्यप्रजा-पति नाम से व्यवहृत होने लगता है । विकार सम्बन्ध से ( पञ्चीकृत गुणभूतों के समन्वय से ) वही सत्य प्रजापति सविकार बनता हुआ ' यज्ञप्रजापति ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । सत्य के ग्राधार पर ही यज्ञ प्रतिष्ठित है । सत्य त्रयीवेदात्मक है । त्रयीवेद ही त्रेताग्नियज्ञ की मूल प्रतिष्ठा है । मौलिक वेद सत्य प्रजापति है, जैसा कि पूर्व की ' यज्ञात्मोपनिषत् ' में विस्तार से बतलाया जा चुका है । इसी आधार पर " सैषा त्रयी विद्या यज्ञः ” ( शत ० ११ | ४ | ३ ) " ते देवा श्रब्रवन् यज्ञकृत्वा सत्यं तनवा है " ( शत ० ६५।१-१८ ) इत्यादि निगम वचन प्रतिष्ठित है । महेश्वर - योगेश्वर का समन्वितरूप अव्यय प्रधान, अतएव अमृत [ २४६ ]

पृष्ठ 268

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् नामक पुरुष था । सत्य यज्ञ प्रजापति का समन्वितरूप अक्षर प्रधान, अतएव ब्रह्म नामक मूलप्रकृति संस्था है । ब्रह्म शब्द बृंहण भाव का सूचक है । ' यतो बृंहणं भवति तद् ब्रह्म " " बिर्भात सर्व तद् ब्रह्म " इत्यादि के अनुसार ' भ ' ही निरुक्त क्रमानुसार ' ब्रह्म ' बना हुआ है । ' बृह ' धातु से ' मन् ' प्रत्यय करने से भी ' ब्रह्म ' शब्द निष्पन्न हो जाता है । जो तत्त्व उपादान कारण बनता हुआ स्वस्वरूप से प्रविकृत रहता है, उसी अविकृत परिणामवाद के लिए " बृंहण " शब्द प्रयुक्त हुआ है । जिस प्रकार मकड़ी स्वस्वरूप से विकृत रहती हुई जाल का उपादान कारण वनती है, एवमेव गुण - विकारयुक्त सत्य यज्ञात्मक अक्षर स्व-स्वरूप से सबंथा अविकृत रहता हुआ उपादान बनता है । इसी वृहण भाव के कारण इसे ब्रह्म कहा जाता है, – “ तयाऽक्षराद्विविधाः सोम्यभावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ” ( मुण्डक ) ' अथातो ब्रह्म जिज्ञासा " यहाँ ब्रह्म शब्द से जन्मस्थितिभङ्ग- हेतुभूत प्रकृतिरूप सत्ययज्ञात्मक गुणविकारमय इसी अक्षर ब्रह्म का ग्रहण समझना चाहिए । गुण विकार के अनन्तर श्रावरण- अञ्जनरूप तीसरा परिग्रह युग्म आता है । स्वच्छ श्रावरण अञ्जन मलिन आवरण श्रावरण है । काच दीपक का अञ्जन हैं ' घट सावरण - साञ्जनभावप्रवर्तक दीपक का आवरण है । कांच के प्रावरण से दीपप्रभा एकान्ततः अवरुद्ध ' श्रावरण- श्रञ्जन ' परिग्रह नहीं होती, परन्तु घट के आवरण से दीप प्रकाश सर्वथा अवरुद्ध हो जाता है. अञ्जन और आवरण में यही अन्तर है । इन में आवरण ही जड़भाव का प्रवत्तंक माना गया है । यज्ञप्रजापति ही अञ्जन परिग्रह से विराटरूप में परिणत होता है । इस ईश्वर एव जीव भेद से दो विवर्त हैं । सात्त्विक अञ्जन से ईश्वर विराट् का उदय होता है, एवं पाप्मा नाम से प्रसिद्ध तामस अञ्जन से जीव भाव का उदय होता है । ईश्वरीय अञ्जन विभूति नाम से प्रसिद्ध है । इस के लोक - वेद- देव भूत- पशु, ये पांच अवान्तर भेद हैं । इन पाचों विभूति अञ्जनों से युक्त यज्ञप्रजा-पति ही ईश्वर विराट् प्रजापति है । यही अंशात्मना १ - पर्याय, २ ऊहिम, ३. प्राशय, ४ अवस्था, ५ - क्लेश, ६- कम्मं, ७ - विपाक इन सात पाप्मारूप तामस अञ्जनों से जीव विराट्रूप में परिणत हो जाता है । ईश्वर नित्यमुक्त है । वह कभी मुक्त रहे, कभी बन्धन में रहे, इस पर्य्याय शब्द का उस में अभाव है, परन्तु जीव विद्याक्रमानुसार कभी बन्धपर्य्याय से युक्त रहता है, कभी मुक्तपर्य्याय से युक्त रहता है । ईश्वर में क्षुधा-पिपासा - शोक - मोह - जरा - व्याधि इन ६ प्र ऊम्मियों का ( उच्चावच लहरों का ) प्रभाव है, वह एक रस है । इधर जीव इन ६ ओं से नित्ययुक्त है । ईश्वर में भावना वासनात्मक ज्ञान - कर्म संस्काररूप दोनों श्राशयों का अभाव है । जीव दोनों से युक्त है । ईश्वर नित्यप्रबुद्ध, नित्यंकरस रहता हुआ जाग्रत - स्वप्न - सुषुप्ति - मोह - मूर्च्छा - मृत्यु इन ६ त्रों अवस्थाओं से विमुक्त रहता है, जीव ६ श्रों से युक्त रहता है । ईश्वर नित्य कम्मंठ बनता हुआ भी बुद्धियोग प्रभाव से कर्म्मलेप से पृथक् रहता हुआ कर्म्म - विरहित कहलाता है । परन्तु जीव यज्ञ- तपो दान लक्षण विद्यासमुचित प्रवृत्ति सत्कम्मं, इष्ट - प्रापूर्त, दत्त लक्षण विद्या निर-पेक्ष प्रवृत्ति सत्कर्म्म, मुरापान - श्रगम्यागमन वृथा हिंसा स्तेय - भ्रूणहत्या खलद्वारा धनोपार्जन, प्रादि शास्त्र निषिद्ध विकरूप असत् - कर्म्म, जलताड़न कराघात - पादभ्रमण - बृरणच्छेदन - वृयाहास्य प्रादि शास्त्राप्रतिषि-द्धाविहित अकर्म्म ( निरर्थककर्म्म ) रूप असत् कर्म्म, एवं सर्वकम् मूर्द्धन्य बुद्धियोग लक्षण, अतएव मुक्ति-साधक fro काम कर्म्म, इन कम्मों में से किसी न किसी कम्र्मानुष्ठान में नित्य रत रहता है । ईश्वर जाति-[ २५० ]

पृष्ठ 269

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् श्रायु - भोग इन तीनों कर्म्मविपाकों से पृथक् रहता है, इधर जीव कर्मपरिपाकस्वरूप योनि- आयु - भोग से नित्ययुक्त रहता है । इसका जैसा कर्म - परिणाम होता है उसी के अनुसार योनि मिलती है, तदनुसार ही आयु मिलती है, तदनुसार ही भोग्यसंपत्ति मिलती है । तीनों का जन्म से सम्बन्ध है । इसी आधार पर निम्नलिखित सूक्ति प्रचलित है—

आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च ।

पञ्चैतानि तु सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥

जीवत्त्व सपादक उपर्युक्त पाप्पाओं का आगे सोपपत्तिक स्पष्टीकरण होने वाला है । यहाँ केवल यही बतलाना है कि, अञ्जन की ही तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । ऐसा अञ्जन, विभूति तथा पाप्मा जो प्रकाश का अवरोधक न बने, उसे ' विभूति ' कहा जायगा । ऐसा अञ्जन, जो प्रकाश का अवरोधक तो न हो, परन्तु प्रकाश को मलिन कर दे, वह ' पाप्मा ' कहलायेगा, एवं ऐसा प्रञ्जन, जो प्रकाश को ही रोक दे, वह ' प्रावरण ' कहलाएगा । इनमें विभूति श्रञ्जन ईश्वर स्वरूप समर्पक है । पाप्माञ्जन जीवस्वरूप समर्पक है, एवं आवरण विश्व एवं शरीर स्वरूप समर्पक है । आवरण से ही विश्वरूप ईश्वर का शरीर बनता है एवं प्रावरण से ही शरीररूप जीव के विश्व का निर्माण होता है । श्वेत दर्पण दीपक के लिये विभूतिरूप अञ्जन है । कृष्ण दर्पण दीपक के लिए पाप्माञ्जन है एवं चारों ओर से कज्जल से सर्वथा लिप्त दर्पण दीपक के लिये प्रावरण है । जीव प्रजापति को थोड़ी देर के लिये छोड़ दीजिए, केवल ईश्वर विराट्प्रजापति को ही अपना लक्ष्य बनाइए । यह कहा जा चुका है कि, अञ्जन नाम के पाँचवें परिग्रह से वही यज्ञप्रजापति विराट् प्रजापति वन जाता है । यहाँ तक आत्मज्योति का अपेक्षया विराट् प्रजापति विकास रहता है, अतः श्रात्मा किंवा चेतन व्यवहार इस विराट् संस्था पर्य्यन्त ही रहता है, आवरण से ग्रात्मविकास एकान्ततः अवरुद्ध हो जाता है, जड़भाव का उदय हो जाता है । यही ६ ठा विश्वप्रजापति है यही उस विराट् प्रजापति का शरीर है । भौतिक क्षर प्रधान मर्त्य विश्व ही विश्व-प्रजापति है । एक बात का विशेष ध्यान रखिए । पूर्व - पूर्वसंस्था उत्तर की संस्था से परिगृहीत रहती है । सावरण विश्वप्रजापति में साञ्जन विराट् सविकार यज्ञ सगुण सत्य, सकल षोडशी, मायी महेश्वर, चारों अन्तर्भूत हैं । सच्चिकार यज्ञप्रजापति में सगुण सत्य, सकल पोडशी, मायी महेश्वर, तीनों अन्तर्भूत हैं । सगुण सत्यप्रजापति में सकल पोडशी, मायी महेश्वर, दोनों ग्रन्तर्भूत हैं । सकल पोडशी मायी महेश्वर से नित्ययुक्त है । मायी महेश्वर और श्रमायी परात्पर एक वस्तु है । विशुद्ध परात्पर विशुद्ध आत्मा है । वही परिग्रहवश उक्त संस्थाओं परिणत हो रहा है - " प्रात्मैवेदं सर्वम्, ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्, ब्रह्म वेदं सर्वम्, सर्वं खल्विदं ब्रह्म, एकं वा इदं विबभूव सर्वम् " इत्यादि श्रौत सिद्धान्तो का कौन विरोध कर सकता है? परात्पर ही एकमात्र ग्रात्मा है, विश्वप्रजापति ही एकमात्र शरीर है । शेष मध्य की महेश्वर-षोडशी - सत्य - यज्ञ - विराट् ये पाँचों संस्थाएँ श्रात्मन्वी ( शरीरविशिष्ट ग्रात्मा ) हैं । परात्परात्मा का कोई शरीर नहीं है । वह विभु है, सर्वमहान् है - " महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति " श्रुति [ २५१ ]

पृष्ठ 270

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 270 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे प्राणात्म विज्ञानोपनिपत् ने इस विभु ( व्यापक ) के लिए ' मत्वा ' कहा है, ' ज्ञात्वा ' नहीं कहा । वह केवल सत्तादृष्टया मानने की है, जानने की नहीं । ज्ञान तो ससीम आत्मा का ही होता है । महेश्वर श्रात्मन्वी है । स्वयं वस्तु निष्कल महेश्वर इस ग्रात्मन्वीभाव का आत्मा है, षोडशी - सत्य - यज्ञ - विराट् - विश्व इन पांचों की समष्टि इस महेश्वरात्मा का शरीर है । वह पूर्ण पुरुष सर्वत्र समानरूप से वृक्षवत् स्तब्ध रहता हुआ व्याप्त हो रहा है । इसी महेश्वरात्मा की व्याप्ति का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है-यस्मात् पर नापरमस्ति किञ्चित् - यस्मान्नारणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ - श्वे ० उ ० ३।६ महेश्वरगर्भित षोडशी आत्मा है, सत्य यज्ञ विराट् विश्वसमष्टि शरीर है । यही दूसरा आत्मन्वी है | महेश्वर- षोडशीगर्भित सत्यप्रजापति श्रात्मा है, यज्ञ - विराट् विश्व समष्टि सर्वधर्मोपपन्न पुरुषात्मा शरीर है, यही तीसरा आत्मन्वी है । महेश्वर - घोडशी - सत्यगर्भित यज्ञप्रजापति श्रात्मा है, विराट् - विश्व समष्टि शरीर है । यही चौथा आत्मन्वी है । महेश्वर-षोडशी – सत्य – यज्ञगर्भित विराट्प्रजापति श्रात्मा है, विश्व इसका शरीर है, यही पांचवां आत्मन्वी है | मायादि छत्रों धर्मों की समष्टि विश्वप्रजापत्यवच्छिन्न महेश्वर प्रजापति के साथ ही सम्बन्ध रखती है । वहाँ से यहाँ तक एक ही श्रात्मतत्त्व व्याप्त है । यही सर्वधर्मोपन्न नाम का दूसरा पट्संस्थ ग्रात्मन्वी विवर्त्त है | निर्धर्म्मक विशुद्ध आत्मा दूसरा विवर्त्त है । आत्मसम्बन्ध में ये ही दो प्रधान दृष्टियाँ हैं । सर्वधर्मोपपन्न ग्रात्मसंस्था में अव्यय - अक्षर - क्षर, इन तीनों का ही साम्राज्य है । महेश्वर, और षोडशी में व्यय की प्रधानता है यही अमृतभाग है । सत्य और यज्ञ प्रजापति प्रजापति - चतुष्टयी में ग्रक्षर की प्रधानता है, यही ब्रह्मभाग है । यहां तक तो मृत्यु की प्रधानता नहीं है । अमृतात्मा में मृत्यु का बन्धन हो जाना ही मृत्युपाश है । विराट्, एवं विश्व में क्षरमूत्ति इसी मृत्युपाश की प्रधानता है । यही तीसरा शुक्रविवर्त्त है । जब तक शुक्र है, तभी तक संसार है । शुक्र अतिक्रमण है – विश्वातिवर्तन है - " उपासते पुरुषं ये कामास्ते शुक्रमेतदतिवर्त्तन्ति धीराः " | वही ग्रात्मा श्रव्ययदृष्टया अमृत ( महेश्वर - षोडशी ) है, वही ग्रात्मा अक्षरदृष्ट्या ब्रह्म ( सत्य-यज्ञ ) है, वही क्षरदृष्ट्या शुक्र ( विराट् - विश्व ) है । अमृतब्रह्मशुक्रमूर्ति - षोडशी सत्य - यज्ञ - विराट् -विश्वावच्छिन्न सर्वव्यापक महेश्वर अश्वत्थ प्रजापति है । यही प्रारम्भ में बतलाई गई पहली प्रजापति-संस्था है | महेश्वर - पोडशीयुक्त सत्यप्रजापति विश्वेश्वर नाम की दूसरी प्रजापतिसंस्था है । महेश्वर-षोडशी - सत्य - यज्ञ गर्भित विराट्प्रजापति उपेश्वर नाम की तीसरी - प्रजापतिसस्था है, एवं महेश्वर - षोडशी -सत्य - यज्ञगर्भित विराट्प्रजापति ईश्वर नाम की चौथी प्रजापतिसंस्था है । इन चारों प्राजापत्यसंस्थाओं का पूर्व के चित्रों से भलीभाति स्पष्टीकरण हो जाता है एवं उपर्युक्त सम्पूर्ण विषय का परिलेखों से स्पष्टीकरण हो रहा है । [ २५२ ]