श्रीगणेशाय नमः।

Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 271–280

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखः परात्परः अमृतम् निष्क ने महेश्वरः | सकलः षोडशी अव्ययः सर्वधर्म्मोपपन्न ग्रात्मसंस्था में श्रव्यय- प्रक्षर - क्षर इन तीनों का ही साम्राज्य है । महेश्वर और पोडशी में अव्यय की प्रधानता है, यही अमृत भाग है । सत्य और यज्ञ प्रजापति में प्रक्षर की प्रधानता है, यही ब्रह्म भाग है । यहाँ तक मृत्यु की प्रधानता नहीं हैं । विराट् एवं विश्व प्रजापति में मृत्युपाश की प्रधानता मानी गई । है । इसे ही शुक्र कहते हैं । जब तक शुक्र है तभी तक संसार है । उक्त परिलेख में अमृत ब्रह्म- शुक्रमूर्ति - षोडशी सत्य - यज्ञ - विराट् -विश्वावच्छिन्न सर्वव्यापक महेश्वर ही प्रश्वत्थ प्रजापति है । विज्ञाने मनः अक्षरः वाक् : प्राण आत्मक्षम वाकअबाद अन्नम् ब्रह्म सगुणः सत्य प्रजापति सविकारोयज्ञ प्रजापति शुक्रम विराट् प्रजापति. सान विश्व प्रजापति सावरणः प्राणात्मविज्ञानोपनिषद अश्वत्थप्रजापति परिलेख: --श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 272

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड सर्वप्रजापति परिलेख: -षट्परिग्रहोपेतः सर्वमूत्तिः परात्परः विशुद्ध आत्मा ~ प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् अमृतम् ब्रह्म अव्ययपधानम् अक्षरप्रधानम शुक्रम् आत्मक्षर प्रधानम प्रायी महेश्वरः सकलः षोडश सगुणः सत्यः सविकारोय माया कला गुणः आत्मन्वी आत्मन्दी आत्मन्वी सावजी विराट साञ्जन विश्वम विकारः अञ्जनम् आवरणम् । आत्मन्वी आत्म विश्वम् । महेश्वर प्रजा विश्वेश्वर प्रजा. उपेश्वर प्रजा ० ईश्वर प्रजा ० सर्व मूर्ति सर्वप्रजापति परात्परात्मा का कोई शरीर नही होता है । विशुद्ध परात्पर ही बिशुद्ध ग्रात्मा कहलाता है । परात्पर मायाबल की कृपा से क्रमश अमृत - ब्रह्म- शुक्र इन तीन स्वरूपों को धारण कर लेता है । यह परात्परात्मा श्रव्ययदृष्ट्या श्रमृत ( महेश्वर पोडशी ) है, ग्रक्षरदृष्ट्या ब्रह्म ( सत्य यज्ञ ) है वही यह ग्रात्मा क्षरदृष्ट्या शुक्र ( बिराट् - विश्व ) है । इसमें अमृत ब्रह्मशुक्रमूर्तिपोडशी सत्य - यज्ञ विराट्विश्वच्छिन्न सर्वव्यापक महेश्वर ही पहली प्रजापति सस्था है । दूसरी विश्वेश्वर तीसरी उपेश्वर व चतुर्थ प्रजापति सस्था ईश्वर है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 273

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञोपनिषत् १ – १ – मायापरिग्रहः – मायी महेश्वरो निष्कलः--- प्रात्मन्वी ' } -महेश्वरप्रजापतिः १ २ – २ – कलापरिग्रहः – सकलः षोडशी -• श्रात्मन्वी ' ३ – १ – गुणपरिग्रहः- - सगुणः सत्य प्रजापतिः- -- प्रात्मन्वी प्र - विश्वेश्वरप्रजापतिः २ ४ – २ – विकारपरिग्रहः – सविकारो यज्ञप्रजापतिः - - श्रात्मन्वी ५ – १ – श्रञ्जनपरिग्रहः - साञ्जनो विराट्प्रजापतिः- - आत्मन्वी ६ – २ – आवरणपरिग्रहः- सावरणो विश्व प्रजापतिः - - विश्वम् - उपेश्वरप्रजापतिः ३ -- ईश्वरप्रजापतिः ४ प्रसंगागत यह जान लेना भी अनुचित न होगा कि ग्राज जो भिन्न भिन्न * दर्शनों में विरोध पाया जाता है, उसका मुख्य कारण भी उपर्युक्त प्रात्मसंस्थानों का विवेकाभाव ही है । यदि श्रात्मसंस्थाओं का पार्थक्य समझ लिया जाता है, तो भिन्न भिन्न, एक एक प्रात्मसंस्था को प्रधान मानकर साथ ही में गौ रूप से इतर आत्मसंस्थानों का भी दिग्दर्शन कराने वाले दर्शनों में कोई विरोध नहीं रह जाता । इस दृष्टि में जो महत्त्व आस्तिक दर्शन का है, वही महत्त्व नास्तिक दर्शन का है । यहाँ दर्शन चर्चा प्राकृतिक है, अतः तालिकारूप से ही प्रकृत में दर्शनों का समन्वय वतला दिया जाता है । १ – परात्परोपासकाः २ - ग्रव्ययात्मोपासकाः ३ – अक्षरानुगृहीतात्माक्षरोपासकाः ४ - आत्माक्षरानुगृहीतविकारक्ष रोपास काः ५ — विकारक्षरानुगृहीतवैकारिकोपासकाः ६ - वैकारिक विश्वोपासकाः → परमास्तिका गीताचार्याः + वेदान्तिनः → परात्परानुयायिनः → पुरुषात्मानुपायिनः → सत्यात्मानुयायिनः → यज्ञात्मानुयायिनः → विराडात्मानुयामिनः → विश्वानुयायिनः १ - विश्व - विराट् - यज्ञ - सत्य- पोडशी प्रजापतिरूपशरीरावच्छिन्न श्रात्मन्वी + सांख्याः → * वैशेषिकाः साम्प्रदायिकाः → लोकायतिकाः - मायी महेश्वरः २ - विश्व - विराट् - यज्ञ - सत्यप्रजापतिरूपशरीरावच्छिन्नो महेश्वरात्मगभितः - प्रात्मन्वी — सकलः षोडशीप्रजापतिः * इस विषय का विशद विवेचन ' गीता विज्ञानभाष्यभूमिका ' २ खण्ड ' क ' विभाग ' श्रात्मपरीक्षा ' में देखना चाहिए । * तदित्थं स्वस्वात्मसंस्थाविषयेषु साटोप सन्नद्धास्तेऽमी - प्रात्म विचारपरका ः सर्वथा श्रविरुद्धाः, इति सर्वेषामात्मानात्मदर्शनानां याथार्थ्येन समन्वयो द्रष्टव्यः । [ २५३ ]

पृष्ठ 274

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ३ - विश्व - विराट् - यज्ञरूपशरीरावच्छिन्नो महेश्वरषोडशीगभितः - श्रात्मन्वी ४ - विश्व - विराट्रूपशरीरावच्छिन्न महेश्वरषोडशी सत्यगभितः - श्रात्मन्वी ५- विश्वशरीरावच्छिन्नो महेश्वरपोडशी सत्ययज्ञगभितः - श्रात्मन्वी ६- महेश्वरषोडशी सत्ययज्ञविराट् गर्भितस्तत्कृतात्मा प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् - सगुणः सत्यप्रजापतिः - सविकारो यज्ञप्रजापतिः - सानो विराट्प्रजापतिः - सावरलो विश्व प्रजापतिः इस प्रकरण में प्रधानरूप से हमें जीवात्मा का स्वरूप बतलाना है । जीवात्मा का वैज्ञानिक स्व-रूप तो आगे जाकर स्पष्ट होगा ही, परन्तु बहुत दिनों से चली आने जीवात्मस्वरूपोपक्रम बाली दार्शनिक भावना के अनुसार भी जीवात्मा का संक्षिप्त स्वरूप जान लेना अनावश्यक न होगा । जीवात्मा ईश्वरात्मा का अंश है एवं उपाधिभेद से वह नाना ( अनेक ) है । इस जीवनानात्वपक्ष को दृढमूल बनाते हुए निम्नलिखित वेदान्तसूत्र हमारे

सामने आते हैं ।

१ - " अंशी नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके " ॥

२ - " मन्त्रवर्णाच्च " ॥

३ - " अपिच स्मर्य्यते " ॥ - शा ० सू ० २ प्र ० । ३ पा ० । १७ ग्रधि ० । ४३-४४-४५ भ्रू ० महामायी पूर्ण पुरुष का स्मरगा कीजिए । इसे ही हमने महेश्वर कहा है । सम्पूर्ण प्रपञ्च इसी महेश्वर की विभूति है । यही विशुद्ध अन्यय पुरुष है । यह पुरुष पुरुषत्त्वेन सर्वथा अजन्मा है । केवल अव्यय जीवरूप से कभी जन्म नहीं लेता । श्रपितु जीवभाव में परिणत होने के लिए इसे स्वभावभूत, अन्तरंग-प्रकृति नाम से प्रसिद्ध क्षरयुक्त अव्यक्त अक्षर का ग्राश्रय लेना पड़ता है, जैसा कि पूर्णेश्वर कहते हैं—– अजोऽपि सन्नव्यमात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥ ( गी ० ४।६ ) । प्रकृतिविशिष्ट वही महेश्वर पुरुष पोडशकल बनता हुआ षोडशीप्रजापति नाम से व्यवहृत होने लगता है, जैसा कि पूर्व में वतलाया जा चुका है । इस पुरुषात्मा चिदात्मा, चिदंश, विदाभास की सृष्टिधारा के सम्बन्ध में प्रधानरूप से चिदात्मा, चिदंश, चिदा-भास, ये तीन विवर्तभाव होते हैं । सर्वव्यापक सहस्रवशेश्वर षोड-शीपुरुष ही चिदात्मा है । दूसरे शब्दों में हम महेश्वर को चिदात्मा कह सकते हैं । यह वृक्षवत् स्तब्ध है, इसमें किचित् भी गति नहीं है । यह नित्य कूटस्थ है । यह सर्वथा अजन्मा है । जीवस्वरूप का इस व्यापक चिदात्मा के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । जीवात्म- प्रकरण में सर्वव्यापक इस चिदात्मा का पूर्ण-पुरुष का भी नाम ग्रहण उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे कि तत्सम निरञ्जन विश्वातीत परात्पर की चर्चा सर्वथा [ २५४ ]

पृष्ठ 275

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् व्यर्थ है । श्रतएव इसे हम यहीं छोड़कर चिदंश की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । यह चिदंश प्रत्यगात्मा शरीरकात्मा, भेद से दो भागों में विभक्त है । विराट् - वैश्वानर - हिरण्यगर्भमूत्ति, स्तौम्य त्रिलोकी में व्याप्त, जिस ईश्वर प्रजापति का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, जीवात्मा उसी का अंश है । वह ईश्वर किंवा चित्तत्त्व दो प्रकार से शरीरसंस्था में प्रविष्ट होता है । ईश्वर का जो अंश ( चिदंश ) प्रवर्ग्य बनकर अन्तर्थ्याम ( ग्रन्थिबन्धन ) सम्बन्ध से शरीर में प्रतिष्ठित होता है, वह तो शारीरपाप्माओं से संसृष्ट होआ हुआ " शारीरकात्मा ' ( शरीराभिमानी जीवात्मा ) कहलाता है, एव जो चिदंश प्रवर्ग्य बनता हुआ केवल साक्षीरूप से बहिय्याम ( योग ) सम्बन्ध से शरीरसंस्था में प्रविष्ट होता हैं, वह शरीरो-पाधियुक्त प्रतीत होता हुआ भी शरीरबन्धन से, शरीरपात्मानों से सर्वथा प्रसंस्पृष्ट रहता हुत्रा " प्रत्यग-त्मा " नाम से प्रसिद्ध होता है । दोनों की प्रतिष्ठाभूमि एक ही शरीरयष्टि है । दोनों हृदय में प्रतिष्ठित हैं । केवल प्रतिष्ठा में तारतम्य है । एक निर्लेप है, दूसरा सलेप है । एक साक्षी है, दूसरा भोक्ता है । प्रकारान्तर से यों समझिए कि व्यापक चिदात्मा का शरीर के साथ विभूति सम्बन्ध है । ईश्व-रात्मरूप त्रैलोक्यव्यापक चिदात्मा का चिदंशरूप से शरीर के साथ योग संबन्ध योग - बन्ध विभूति है, एवं प्रवर्ग्यभूत चिदंश का शरीर के साथ बन्ध सम्बन्ध है । विभूतिसम्बन्धाव-च्छिन्न व्यापक चिदात्मा निग्रहानुग्रह से परे रहता हुआ केवल प्रालम्बनमात्र है, प्रवपन है, खंब्रह्म है, अविचाली है, एक प्रकार से शाश्वत ब्रह्म ( परात्पर ) ही है । योगसम्बन्धाबच्छिन्न चिदंश निग्रहानुग्रह का अधिष्ठाता है । इसी की शक्ति से जीवात्मा सञ्चालित है । उसका सर्वत्र समान वैभव था, इसका एकमात्र हृदय के साथ योग है । इसी चिदंशरूप प्रत्यगात्मा ( ईश्वरात्मा ) का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् कहते हैं-ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ( योगमायया ) ॥ ( गीता १८ । ६१ ) बन्धसम्बन्धावच्छिन्न चिदंश ही शरीराभिमानी जीवात्मा है । प्रत्येक शारीरक प्रात्मा के लिए प्रत्यगात्मा स्वतन्त्र है । स्वस्वनियति - भेद से प्रत्येक का प्रत्यगामा शारीरकात्मा की भांति शरीरोपाधिभेद से पृथक बन रहा है । इस चिदंशरूप प्रत्यगात्मा को यद्यपि शरीरोपाधियुक्त बतलाया जाता है, परन्तु वस्तुतः यह जीवमात्र में समान है । जीवशरीर में रहता हुआ जीवसहकारी यह चिदंश जीवमात्र का अनुग्राहक है । चिदशभूत प्रत्यात्मा एवं चिदंशरूप ही शारीरकात्मा के स्वरूप परिचय के लिए उदाहरणार्थ सौरसंस्था पर दृष्टि डालिये । जलपूर्णपात्र, दर्पण, स्फटिकमणि, ग्रादि के साथ सूय्यंज्योति का सम्बन्ध होता है । यह सम्बन्ध श्रातप ( चमक ज्योति प्रकाश ) एवं प्रतिबिम्ब भेद से दो भागों में विभक्त है । जल दर्पादि पर सूर्य्य का ( क्षेत्रविन्यास के अनुसार ) प्रतिबिम्ब प्रतिष्ठित होता है । यह प्रतिबिम्ब शरीरोपाधिकृत विलक्षण सम्बन्ध से वहीं बन्धन में प्राता हुआ प्रति पात्रादि भेद से पृथक् पृथक् बन जाता है । एक पात्र को तोड़ दीजिए, केवल उसीके प्रतिबिम्ब का विलयन होगा, शेष पात्रों के प्रतिबिम्ब ज्यों के त्यों प्रक्षुण्ण रहेंगे । [ २५५ ]

पृष्ठ 276

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् सब प्रतिविम्व उस एक ही सूर्ख के अंश हैं परन्तु पात्र - ग्राधार भेद से एवं ग्राधारों के धर्म्मभेद से वह एक ही प्रवर्ग्यरूप से नानारूपों में परिणित हो रहा है । इन प्रतिबिम्बों का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है । प्रतिविम्वभाव के अतिरिक्त प्रत्येक पात्र दर्पणादिरूप शरीर के साथ त्रैलोक्य में व्यापक सूर्य के आप भाग ( ज्योतिर्भाग ) का भी सम्बन्ध होता है । यह आतप भी यपि देखने में तत्तच्छरीरपर्याप्त है, परन्तु प्रतिबिम्बवत् वह उस पात्र में प्रवर्ग्य रूप से प्रतिष्ठित नहीं है । अतएव इसे हम त्रैलोक्यव्यापक एक ही सर्वसाधारण - सर्वसमान तत्त्व कहेंगे । यही परिस्थिति जीवेश्वर के सम्बन्ध में समझिए । विश्व-व्यापक चिदात्मा सूर्य्यस्थानीय है । वह स्वस्वरूप से सर्वथा अजन्मा है । इस व्यापक चिदात्मा के चिदंश का सम्बन्ध प्रतिशरीर के साथ चेतनारूप से एवं चिदाभास रूप से, दो दो प्रकार से होता है | चेतना ( चिज्योति - चित् प्रकाश ) को श्रातपस्थानीय समझिए एवं चिदाभास को प्रतिबिम्बस्थानीय समझिए । यद्यपि चेतनारूण चिदंश तत्तच्छरीर में प्रातपवत् व्याप्त है तथापि यह प्रवर्ग्य सम्बन्ध से वहां ग्रन्थिभाव-रूप से प्रतिष्ठित नहीं है । श्रतएव स्थूलदृष्ट्या शरीरोपाधिक किंवा शरीरपरिच्छिन्न बनता हुआ भी यह सर्वशरीर साधारण है । प्रतिशरीर में व्याप्त उस चिदात्मा से अभिन्न यह ईश्वर तत्त्व जीवसहयोग से यथाकथंचित् जीवशब्द से भी व्यवहृत किया जा सकता है । यह " ज्ञ " है, दूसरा चिदाभास " अज्ञ ” है | यह प्रवर्ग्यरूप से प्रतिष्ठित होता हुआ प्रतिशरीर में भिन्न है । इन दोनों में प्रत्यगात्मरूप चेतना - भाव को लक्ष्य में रख कर ही — " प्रविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् " ( गी ० १३ | १६ | ) " समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ' ( गी ० १२ । २७ । ) " श्रात्मादेवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः ” ऋक्सं ० ( १० । १५८ । ४ ) इत्यादि कहा जाता है । वेदान्तदर्शन इसी सर्वसाधारण प्रत्यगात्मा को ग्रात्मा ( जीवात्मा ) मानता हुआ जीवनानात्त्व का खण्डन करता । उधर प्रतिशरीर में क्षेत्रभेद से सर्वथा विभिन्न जीवात्मा का ही निरूपण करने वाला सांख्यदर्शन जीव नानात्त्व का ग्रनुगमन कर रहा है । इस प्रकार यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है कि, एकमात्र चिदात्मा ही चिदात्मा प्रत्यगात्मा-शारीरकश्रात्मा - भेद से तीन भावों में परिणित होकर सब कुछ बन रहा है । इन तीनों में हमारे ग्रात्म-प्रकरण में चिदात्मा बहिष्कृत है, प्रत्यगात्मा एवं शारीरक आत्मा ग्राह्य हैं । दोनों नित्य सहचारी हैं । एक असंग है, दूसरा ससंग है । इनके इसी साहचर्य्यका दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् व्यास कहते हैं—

तत्र यः परमात्मा हि स नित्यो निर्गुणः स्मृतः ।

न लिप्यते फलैश्चापि पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥१ ॥

कर्मात्मात्वपरो योऽसौ मोक्षबन्धः स युज्यते ।

स * सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते सदा ॥२ ॥

* ५ – ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ – कर्मेन्द्रियाँ, ५ - विषय, १ बुद्धि तथा १ - पन इनकी समष्टि से जीवात्मा नित्ययुक्त रहता है । [ २५६ ]

पृष्ठ 277

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् दार्शनिक दृष्टि से चिदाभासरूप कर्मात्मा का विवेचन हो चुका । अब विज्ञानदृष्टि से जीवात्म-स्वरूप का विचार किया जाता है । जीवात्मा ईश्वरप्रजापति का ही अंश है, यह निर्विवाद है । साथ ही में पूर्व प्रतिपादित चारों प्रजापतियों में से विराट् - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञमूर्ति स्तोम्यत्रिलोकी में प्रतिष्ठित तत्त्व का ही नाम ईश्वर प्रजापति है, यह भी सिद्ध विषय है । एतदंशभूत जीवात्म - स्वरूपपरिचय के लिए एकमात्र इसी त्रैलोक्य व्यापक ईश्वरप्रजापति की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । " यदि मन्यसे सुवेदेति भ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । यदस्य त्वं यदस्य च देवेषु, प्रथ विदित प्रविदित - विदिताविदितातीत - श्रात्मविवर्त नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् । अन्यदेव तद्वि-तादथो प्रविदितादधि " - ( केनोपनिषत् ) इत्यादि औपनिषद् सिद्धान्त के अनुसार ग्रात्मविवर्त विदितात्मा, प्रविदितात्मा, विदिताविदितातीतात्मा भेद से तीन भागों में विभक्त है । हम जानते हैं, कर्म्म करते हैं, ज्ञानकर्म्माश्रित अर्थों का ज्ञानकर्म्म द्वारा उपभोग करते हैं । जानना ज्ञानशक्ति है, करना क्रियाशक्ति है | ज्ञानकर्माश्रित तीसरा भाव शक्ति है । इन तीनों ही भावों का ग्रापामर - ग्राविद्वज्जन श्राबालवृद्ध, सभी को समानरूप से प्रत्यक्ष है । इन तीनों शक्तियों का विकास क्रमशः मघवा इन्द्र, मात-रिश्वा वायु, अग्नि, इन तीन देवताओं से हुआ है । अग्नि अर्थशक्ति की प्रतिष्ठा है, वायुदेवता क्रियाशक्ति का प्रवर्त्तक है एवं इन्द्र ज्ञान के सञ्चालक हैं । इन तीनों देवताओं की समष्टि ही देवता सम्बन्ध से " देवसत्यात्मा " नाम से प्रसिद्ध है । यह अवरात्मा सबके लिए सर्वथा विदित है । ज्ञानक्रियार्थमूर्ति, इन्द्र-वाय्वग्निमय, इस देवसत्यात्मा का अनुभव पूर्वकथनानुसार सभी को रहा है । इसी आधार पर इसे-" विदितात्मा " कहा जा सकता है । इन तीनों की आधारभूमि पञ्चप्रकृतिक ब्रह्मसत्यात्मा है । श्रव्यक्त– यज्ञ - विज्ञान - महान् - भूतात्मा, इन सुप्रसिद्ध पांच पर्वो की समष्टि ही ब्रह्मसत्यात्मा है । शास्त्रज्ञानविरहित साधारण मनुष्यों के लिए यह आत्मा अविज्ञात ( न जाना हुआ ) है अतएव इसे " श्रविदितात्मा " कहा जा सकता है । तीसरा विश्व व्यापक पुरुषात्मा स्वानुभवेकगम्य होने से विदित - विदित, दोनों कोटियों से परे रहता हुआ विदिताविदितातीतात्मा है । यही " यदस्य त्वम् " वाक्य से अभिनीत ब्रह्मसत्यात्मा की प्रतिष्ठा है यही " यदस्य च देवेषु " इस वाक्य से ग्रभिनीत देवसत्यात्मा का आलम्बन है । ये दोनों ही सोपाधिक बनते हुए मीमांस्य हैं । यदि आत्मशब्द से ग्रापने इन्हीं ब्रह्म - देव विवर्तों को ग्रात्मा समझा है, यदि इन्हीं के परिज्ञान से आप अपने को सुवेदा ( ग्रात्मज्ञानी ) मान रहे हैं, तो विश्वास कीजिए! अभी श्रापने ग्रात्मा का स्वरूप बहुत दत्र ( थोड़ा ) समझा है । जिसके चिदंश से यह ग्रात्मकोटि में प्रविष्ट हो रहे हैं, वह विदिताविदितातीत षोडशीपुरुष ही मुख्य आत्मा है । देवसत्यात्ना, ब्रह्मसत्यात्मा, दोनों इसी आत्मब्रह्म की विजय से महिमाशाली बन रहे हैं- " ब्रह्मणो वा विजये महीयध्वम् । " यह पुरुषब्रह्म पुरुष है, व्यवप्रधान है । ब्रह्मसत्य प्रक्षरप्रधान है एवं देवसत्य क्षरप्रधान है । पुरुषब्रह्म को ही पूर्व में महेश्वरप्रजापति कहा गया है, ब्रह्मात्य को ही समष्टिरूप से विश्वेश्वरप्रजापति एवं व्यष्टिरूप से उपेश्व-प्रजापति कहा गया है एवं देवसत्य को ही विराट्मृति ईश्वरप्रजापति कहा गया है । इन चारों संस्थानों में से कर्म्मात्मा के साथ ईश्वरप्रजापतिरूप देवसत्यात्मा का ही सम्बन्ध है । श्रात्मपरिभाषाज्ञान के प्रभाव से देवसत्यात्मरूप ईश्वर को जिन महानुभावों ने सातवें आसमान की कोई अलौकिक ग्रविज्ञेय वस्तु समझ [ २५७ ]

पृष्ठ 278

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् रक्खा है, विज्ञानदृष्टि के द्वारा आज हम आपको ईश्वर के साक्षात् दर्शन करा देते हैं । ईश्वर का स्वरूप अग्नि- वायु - इन्द्र, तीन देवताओं से संपन्न हुआ है । तीनों देवताओं की प्रतिष्ठाभूमि महापृथिवी नाम से प्रसिद्ध स्तोम्यत्रिलोकी है । ग्रत पहले इन्हीं का संक्षिप्त स्वरूप बतलाया जाता है । पृथिवी - प्रन्तरिक्ष- द्यौः, इन तीन लोकों की समष्टि त्रिलोकी है । यह त्रिलोकी आठ भागों में विभक्त है । उन आठों में से प्रकृत में रोदसीत्रिलोकी, स्तौम्य त्रिलोको, ये पृथिवी, अन्तरिक्षं द्यौः दो त्रिलोकयाँ ही अपेक्षित हैं । जिस प्रतिष्ठा पर आप सपरिवार सशरीर-सपरिग्रह प्रतिष्ठित हैं, वह पृथिवीलोक है, यही भूलोक है । प्रत्यक्षरष्ट सहस्रांशु सूर्य्यं द्युलोक है, यही स्वर्लोक है । सूर्य्यरूपा द्यौः पृथिवी का अन्तरालप्रदेश अन्तरिक्ष है । यही भुवर्लोक है, जैसाकि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है । " अन्तरिक्षायतना हि प्रजा " ( तां ० ब्रा०-४।८।१३ ) " यथायं पुरुषो ( प्रजा ) मूल उभयतः ( पृथिव्या सूर्येण च ) परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरति " ( शत ० १।१।२४ ) इत्यादि निगम वचनों के अनुसार सम्पूर्णप्रजा ( चतुर्दशविध भूतसर्ग ) भुवलोका -हमक इस अन्तरिक्ष में ही प्रतिष्ठित है । सूर्य्य एवं पृथिवी के अन्तराल ( मध्य ) में जो आकाश देखा जाता है, वही — " प्रन्तः ईक्षते " के अनुसार अन्तरीक्ष है । अपि च सब कुछ इन दोनों लोकों के अन्तः ( भीतर ) प्रतिष्ठित है, अतएव इसे अन्तर्य्यक्ष कहा जाता है । यही अन्तरीक्ष किंवा अन्तर्यक्ष परोक्ष प्रिय देवताओं ( विद्वानों ) की परोक्षभाषा के अनुसार " अन्तरिक्ष " नाम से प्रसिद्ध है । अन्तरिक्ष के इसी स्वरूप को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" तद्यदस्मिन्निदं सर्वमन्तः - तस्मादन्तर्यक्षम् । अन्तर्यक्षं ह वै नामैतत्-तदन्तरिक्षमिति परोक्षमाचक्षते ” – जै ० उ ० १।२०।४ " अन्तरेव वा इदमिति, तदन्तरिक्षस्यान्तरिक्षत्त्वम् " ( तां ० व्रा ० २० । १४।२ ) " सह हैवेमावग्रे ( पृथिविसूय्यौं ) लोकावासतुः । तयोर्वियतोर्योऽन्तरेणा-काश प्रासीत् तदन्तरिक्षमभवत् । ईक्षं हैतन्नाम । ततः पुरान्तरा वाऽइदमीक्षमभूदिति । तस्मादन्तरिक्षम् " ( शत ० ७।१।२।२३ ) " मध्यं वाऽन्तरिक्षम् ” ( शत ० ७।५।१।२६ ) " छिद्र मिवेदमन्तरिक्षम् " ( तां ० ब्रा ० ७।३।१८ ) " प्रन्तरिक्षेरण होमे द्यावापृथिवी विष्टब्धे " ( शत ० १ । २ । १ । १६ ) एतेन इमौ लोकौ विष्कन्धौ ” ( जै ० उ ० १।२०।३ ) इत्यादि के अनुसार छिद्ररूप अनिरुक्त अन्तरिक्ष ही दोनों लोकों के स्वरूप को पृथक् - पृथक् वतलाने वाला, दोनों का स्तम्भ ( स्तम्भ - थम्ब ) स्थानीय है । अन्तरिक्षरूप आकाश ही " यह पृथिवी है, " " यह सूर्य्य है, " इस प्रकार पृथिवी तथा सूर्य्य के नामरूप का निर्बहिता है - " श्राकाशौ [ २५८ ]

पृष्ठ 279

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् नामरूपयोनिबंहिता " । यदि दोनों के मध्य में यह आकाशरूप अन्तरिक्ष न होता, तो उक्त पार्थक्य व्यवहार असम्भव था । न केवल द्यावापृथिवी का ही, अपितु पदार्थमात्र के नामरूप भेद व्यवहार का सम्पादक एकमात्र आकाशात्मक अन्तरिक्ष ही है । भूपिण्ड से एक निराकार प्राण निकल कर बड़ी दूर तक अपना एक मण्डल बनाता है । जहाँ तक यह प्रारण व्याप्त है, वहां तक पृथिवीलोक की सत्ता मानी जाती है । इसी प्रकार जहां तक सौरप्राण की व्याप्ति है, वहाँ तक सूर्य्यलोक की सत्ता मानी जाती है । सूर्य के केन्द्र में उक्थरूप से प्रतिष्ठित होकर अर्करूप से बाहर निकल कर वितत होने वाला तत्त्व ही " अक्षर " कहलाता है । ' स्वरोऽक्षरम् " ( का ० प्रा ० १।६६ ) के अनुसार अक्षर को ही स्वर कहा जाता है । इसी ग्रक्षररूप स्वर के सम्बन्ध से सूर्य्य को-" स्वरहर्देवाः सूर्य्य. " ( शत ० १ १ २ २१ ) इत्यादि के अनुसार स्वर्लोक कहा जाता है । विज्ञाननिष्ठ पाठकों को यह स्मरण रखना चाहिए कि, सूर्य से ऊपर की ओर परमधाम में प्रतिष्ठित यज्ञमूत्ति पर-मेष्ठी एवं प्रव्यक्तमूत्ति स्वयम्भू, इन दो लोकों में मनोमय अमृतप्रधानता है । सूर्य्य से नीचे की ओर श्रवमधाम में महन्मूत्ति चन्द्रमा एवं भूतपूर्ति पृथिवी में वाङ्मय मृत्युप्रधान क्षरपुरुष की प्रधानता है— " तस्माद्यत् किञ्चार्वाचीनमादित्यात् सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् " ( शत ० १० | ५ | १ | ४ ), एवं स्वयं मध्यस्थ सूर्य्य में अमृताव्यय से अमृतभावापन्न, मर्त्यक्षर के सम्बन्ध से मृत्युधर्म्म से भी संस्पृष्ट, अतएव ग्रमृतमृत्युमय प्राणमूर्ति ग्रक्षरपुरुष का विकास है । " यः सेतुरीजानानाम् " ( कठोपनिषत् १।३।२ ) के ग्रनुसार यज्ञकर्त्ता यजमान की परमप्रतिष्ठा यही सेतुरूप अक्षरतत्त्व, किंवा अक्षरमूत्ति सोरतत्त्व, किंवा सूर्य्यलोक है - " एषा गतिरेषा प्रतिष्ठा य एष तपति । तस्य ये रश्मयस्ते सुकृतः । श्रथ यत् परं भा: ( तद्रूपोऽक्षर: ) प्रजा-पतिर्वा स स्वर्गो वा लोक: ( शत ० १ | ६ | ३ | १० ) । शब्दब्रह्म विज्ञान के अनुसार ग्रव्ययपुरुष स्फोट है, ग्रक्षरपुरुष स्वर है, एवं क्षरपुरुष वर्ग है । वर्ण - ( क्षरप्रधानभूत ) का विकास चन्द्रगर्भिता क्षरप्रधाना पृथिवी में होता है, स्वर शब्दब्रह्म विवर्त की प्रतिष्ठा सूर्य्य है, स्फोट की विकासभूमि अव्ययगर्भित व्यक्ताव्यक्तमूति महान् है । ग्रव्ययनाम से प्रसिद्ध चिदात्मा की योनि महान् ही है- " मम योनिर्महद्ब्रह्म " । सम्पूर्ण अर्थ यहीं से स्फुट होते हैं । ग्रव्यक्तगर्भित महदवच्छिन्न स्फोटरूप ग्रव्यय अखण्ड धरातल है । इस पर सूर्य्यरूप स्वर प्रतिष्ठित है । स्वरात्मक सूर्य्य के ग्राधार पर वर्णरूपा चन्द्रगर्भिता पृथिवी प्रतिष्ठित है । इधर शब्दसृष्टि में भी यही व्यवस्था है । पृथिवीरूप वर्ण ( क - च - ट - त - नादि व्यञ्जन ) सूर्य्यात्मक स्वर के ( ग्र - प्रा- इ - ई - ग्रादि के ) आधार पर ही प्रतिष्ठित है । बिना स्वर को ग्रालम्बन बनाए आप विशुद्ध व्यञ्जन का कथमपि उच्चारण नहीं कर सकते । क्योंकि बिना सूर्य्य के भूलोक कथमपि प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । इस स्वर की, किंवा सर्वप्रपञ्च की प्रतिष्ठा तीसरा सर्वव्यापक स्फोट है । राम शब्द में र - प्र-अ- म् अ इतने ख़ण्ड हैं । इन सब खण्डों का ग्राधार, इस छोर से उस छोर तक एक रूप से व्याप्त ग्रखण्ड तत्त्व ही विस्फोट है । इसी के सम्बन्ध से राम- शब्दार्थ स्फुट होता है । यही कारण है कि, उच्चाररणकाल में पूर्व पूर्व वर्ण के विलीन हो जाने पर भी " राम " इत्याकारक समूहालम्बनज्ञान की प्रतीति ज्ञात हो जाती है । दूसरे शब्दों में वही अखण्ड धरातल राम शब्द के अर्थ को स्फुट करता है । वर्णों में यह वर्ण-[ २५६ ]

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आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १, पृष्ठ 280 का मूल पृष्ठ
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् रूप से, पदों में परूप से, वाक्यों में वाक्यरूप से यथास्थान प्रतिष्ठित रहता है - " यद्यच्छरीरमादते तेन तेन स युज्यते । इसी प्राधारपर वैयाकरणों ने इस शब्दात्मक स्फोट के " वस्फोट, पवस्फोट, वाक्यस्फोट, प्रखण्ड स्फोट, आदि आठ विभाग माने हैं । इस प्रकार जैसी स्थिति परब्रह्म की है, ठीक वही स्थिति शब्दब्रह्म की है । एक के विज्ञान से अन्य स्वतः एव विज्ञात है- " शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति । परब्रह्म --- + शब्दब्रह्म १ - प्रग्यन्तर्गाभतमहान् + अव्ययः श्रमृतम् + स्फोट: २ – सूर्य्य:----- + अक्षरः प्रमृत मृत्यु + स्वरः - " तदिदं सर्वम् " वर्णः ३ – चन्द्रगर्भितापृथिवी - + क्षर - मृत्युः अक्षरात्मक सूर्यलोक स्वर सम्बन्ध से जहां है, वहां क्षरात्मक पृथिवीलोक " स्वर्लोक " कहलाता प्रभूद्वाऽइयं प्रतिष्ठेति - तद्भूमिरभवत्, तामप्रययत् सा पृथिव्यभवत् " ( शत०-विश्वा भुवनानि १।१।१५ ) इत्यादि के अनुसार " मूलोक " कहलाता है । सूर्य्य और भू एकाकी हैं परन्तु इन दोनों के अन्तराल प्रदेश में चन्द्रमा - बुध - शनि श्रादि अनेक भूपिण्ड हैं । इन्हीं अनेक भूपिण्डों के कारण तत्प्रतिष्ठारूप - अन्तरिक्ष को " भुवर्लोक " कहा जाता है । " अग्निर्वा रुद्रः ” असोष के अनुसार सावित्राग्निमूर्ति सूर्य्य साक्षात् रुद्र है । यही क्षत्ररुद्र है, एकाकी है । सूट से निकलने वाले रश्म्यवच्छिन्न सौरप्राणाअनन्तरुद्र है, ये विरुद्र हैं । इसी समहिम एकाकी क्षत्ररुद्र का स्वरूप बत-लाती हुई श्रुति कहती है-असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रः सुमङ्गलः । ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशोऽवैषां हेड ईमहे ॥१ ॥

सौ योऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः ।

उतैनं गोपा प्रश्रन्नश्रन्नुदहार्य्यः स दृष्टो मृडयाति नः ॥ २ ॥

नमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे । प्रथो ये अस्य वनोऽहं तेभ्योऽकरं नमः ॥३ ॥ – प्रजुः सं ० १६।६।७।८

एकोहि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्ध्य इमाँल्लोकानोशत ईशनीभिः ।

प्रत्यङ, जनां तिष्ठति सञ्चुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥४ ॥

( श्वे ० ३।२ ) [ २६० ]