Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 281–290
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 281–290
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषदं भूः - भुवः स्वः, इन तीनों लोकों का विकास इसी रुद्रसूर्य्य से हुआ है । रुद्रसम्बन्ध से ही यह त्रिलोकी " रोदसी " नाम से व्यवहृत हुई है । ब्रह्मा केवल प्राणप्रधान होने से देव हैं, रुद्र - त्रैलोक्य श्रादिदेव हैं | विष्णु ग्रापोमय एवं वाङमय होने से देवश्रेष्ठ हैं । किन्तु ये रुद्रदेवता अन्नादमय - अन्नमय - होने से त्रिकल बनते हुए महादेव हैं । पूर्व प्रतिपादित ग्रश्वत्थमूर्ति महेश्वर का स्मरण कीजिए । इस अश्वत्थवृक्ष को ही श्रागमशास्त्र में " द्रुम " नाम से व्यवहृत किया गया है । हमारे रुद्रदेवता दक्षिणामूर्ति भगवान् इस द्रुम के अधोभाग में प्रतिष्ठित हैं । ग्रश्वत्थवृक्ष के श्रमृत - ब्रह्म - शुक्र, ये तीन विवर्त्त बतलाए गए हैं । अमृत विवर्त्त ग्रव्ययप्रधान है, ब्रह्मविवर्त्त अक्षरप्रधान है एवं शुक्र विवर्त्तक्षरप्रधान है । क्षरतत्त्व वाङ्मयभूत की प्रतिष्ठा है, अक्षरतत्त्व प्राणमय देवता की प्रतिष्ठा है एवं अव्ययतत्त्व मनोमय सत्यग्रात्मा की प्रतिष्ठा है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि - सोम, ये पांचों ग्रक्षर प्रारण - प्रापः- वाक् प्रन्नाद अन्न, इन पांच क्षरों से नित्ययुक्त रहते हैं । इन पांचों के १-२-३ - इस क्रम से तीन विभाग हो जाते हैं । प्राणमय ब्रह्मा का स्वतन्त्र विभाग है । इस पर अश्वत्थ महेश्वर के अमृत प्रधान अव्यय का अनुग्रह रहता है । दक्षिणामूर्ति शिवतत्त्व आपोमय विष्णु एवं वाङ्मय इन्द्र, इन दोनों का एक स्वतन्त्र विभाग है । ' इन्द्राविष्णु सयुजी ' कहलाते हैं दोनों की समुच्चित अवस्था का नाम विष्णु । जो इन्द्र है, वही विष्णु है । ग्रतएव विष्णु को उपेन्द्र कहा जाता है । इस पर ब्रह्म प्रधान अक्षर का अनुग्रह रहता है एवं वाङ्मय इन्द्र, अन्नादमय अग्नि, ग्रन्नमय सोम, इन तीनों क्षरगर्भित अक्षरों का एक स्वतन्त्र विभाग है । इन तीनों की समष्टि ही महादेव है । इस पर शुक्र प्रधान भौतिक क्षर का अनुग्रह रहता है क्षर प्रधान होने से त्रिमूर्ति महादेव भूतनाथ हैं, वाक्पति हैं । ग्रक्षरप्रधान होने से द्विमूर्ति विष्णु देवश्रेष्ठ देवनाथ हैं, प्राणपति हैं । श्रव्यय की प्रधानता से एकमूर्ति ब्रह्मा सत्यनाथ हैं, चित्पति हैं । ज्ञान-मूर्ति ब्रह्मा, क्रियामूर्ति विष्णु, दोनों ही ज्ञान - क्रिया के नीरूप होने से अप्रत्यक्ष हैं, दृष्टि से परे हैं । इन दोनों के ज्ञानक ( परिचायकलिङ्ग ) अर्थमूत्ति भूतपति महादेव ही हैं । प्रतएव इनकी लिङ्गरूप से उपा-सना की जाती है । वाङ्मय व्यक्त भूतप्रपञ्च ही अव्यक्त का लिङ्ग है । शुक्रमूति यह रुद्र किंवा भूतनाथ सचमुच द्युई -मरूप अश्वत्थ के सब से नीचे के स्थान में ( रोदसी त्रैलोक्य में ) प्रतिष्ठित हैं । रोदसी का यही रुद्र भोग करते हैं अतएव रोदसी को रुद्रपत्नी कहा जाता है । अन्नादमयी पृथिवी श्रग्निज्योति है, अन्नमय अन्त-रिक्ष्य चन्द्रज्योति है, वाङ्मय सूर्य्य इन्द्रज्योति है । इन्हीं तीनों के सम्बन्ध से ये त्रैलोक्य व्यापक महादेव त्रिनेत्र बन रहे हैं । इसी दक्षिणामूर्ति शिव की उपासना का प्रकार बतलाता हुआ ग्रागमशास्त्र कहता है--दक्षिणामूर्तिः शिव
व्याख्यामुद्राक्षमालाकलशसुलिखिते बाहुभिर्वामपादम् ।
बिभ्रारणो जानुमूर्ध्ना पदतलनिहितापस्मृतिर्युर्दुमाधः ॥
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत्
सौव योगपीठे लिपिमयकमले सूपविष्ट स्त्रिनेत्रः ।
क्षीराभश्चन्द्रमौलिवितरतु विपुलां शुद्धबुद्धि शिवो नः ॥ १ ॥
" धुरपिस्यात्तदव्ययम् " के अनुसार ' द्यु ' शब्द ग्रव्यय का भी वाचक है । अव्यय ही ग्रश्वत्थ वृक्ष-रूप में परिणत हो रहा है । इसका क्षरप्रधान शुक्रभाग सर्वाधः है, वहीं शिव प्रतिष्ठित हैं । सौर ज्योति -मंण्डल स्थिर हिरण्मय मण्डल है । यही सौवर्ण योगपीठ है । क्षर से ही क - च - ट - त - पादि मयी लिपि का विकास होता है । यही क्षरमूर्ति महादेव का ग्रासन है । सूर्य्य इनका मस्तक स्थान है । इससे ऊपर पारमेष्ठ्य ब्रह्मणस्पति चन्द्रमा है । इसीलिए इन्हें " चन्द्रमौलि " कहा जाता रोदसी त्रैलोक्य का सूर्य्य उस विश्वेश्वर की बुद्धि है, चन्द्रमा उसका मन है, ग्रान्तरिक्ष्य वायु उसका हंसात्मा है, पृथिवी बाह्यात्मा स्थानीय है । इस रोदसी त्रैलोक्य के सम्बन्ध में वायुवेष्टित भूपिण्ड पाठकों को यह विशेष ध्यान रखना चाहिए कि, रोदसी के अन्तरिक्षरूप भुवर्लोक में चन्द्रमा - वायु- मरुत्वान् इन्द्र, ये तीन तत्त्व प्रतिष्ठित हैं । चान्द्रसोम एवं मरुत्वा-निन्द्र, दोनों अभिन्न रहते हुए वायुवरातल पर प्रतिष्ठित हैं । यह वायु स्थिर - चर - भेद से दो प्रकार का है | स्थिर वायु वराह नाम से प्रसिद्ध है एवं चर वायु -वात ( वक्त प्रावात भेवजम् ) नाम से व्यवहृत होता है । भूपिण्ड के चारों ओर स्थिर रहने वाला भूपिण्डस्वरूपसमर्पक वायु ही वराह है, जैसाकि अनु-पद में ही स्पष्ट होने वाला है । इस पिण्डस्वरूप समर्पक स्थिर वायु का भूपिण्ड में ही ग्रन्तर्भाव है । दूसरा ग्रान्तरिक्ष्य भुवर्लोक स्थानीय वायु ही सोमगर्भित इन्द्र की प्रतिष्ठा । इस सोमगर्भित ऐन्द्रवायु को यज्ञविज्ञान के अनुसार " ग्रह " कहा जाता है । सोमगर्भित ऐन्द्र वायु ही अन्तरिक्ष का प्रधान ग्रधि-ष्ठाता है । इसीके लिए " इन्द्रतुरीया ग्रहा गृह्यन्ते " यह कहा जाता है । इस वात वायु में एक चतुर्थांश इन्द्र रहता है । यदि सौ ग्रंश वायु है, तो उसमें २५ अंश इन्द्र है, ७५ अंश वायु किंवा वायव्य सोम है । इस ग्रह नामक ऐन्द्र वायु के अवान्तर ४० विभाग हैं, जिनका निरूपण ग्रविज्ञान में द्रष्टव्य है । इस प्रकार सूर्य्य - चन्द्रमा - मरुत्त्वानिन्द्र - एमूषवराह - भूपिण्ड, भेद से इन पाँच तत्त्वों की सत्ता सिद्ध हो जाती है | ये सब उसी ब्रह्मसत्यात्मक प्रकृतितन्त्र के ग्रवयव हैं । दूसरे शब्दों में वह विभाग उपे-श्वर से सम्बन्ध रखता है । १ - सूर्य्य, २ - इन्द्रगर्भित चन्द्रमा, ३- त्रायुवेष्टित भूपिण्ड, तीनों क्रमशः वाक्– अन्न- प्रन्नाद नाम की प्रकृतियाँ हैं । इन तीनों प्राकृतात्मानों में से सूर्य्य का ' विज्ञानात्मोपनिषद् ' में, मरु-त्त्वानिन्द्रगर्भित चन्द्रमा का ' प्रज्ञान ' रूप से ' महदात्मविज्ञानोपनिषत् ' में निरूपण किया जा चुका है । प्रकृत में वायुवेष्टित भूतात्मस्थानीय भूपिण्ड का ही निरूपण अपेक्षित है । उक्त विषय का स्पष्टीकरण परिलेखों से भलीभाँति हो जाता है । भूपिण्ड, किंवा पृथिवीलोक ग्रन्नाद नाम की प्रकृति से युक्त है । यह पिण्ड पृथिवी ( जिसे कि विज्ञान दृष्टि से हम पृथिवी न कहकर भू कहेंगे ), अन्नादाग्निमयी है, श्रन्नादप्रकृति - श्रौर भूपिण्ड साथ ही में वराह नामक स्थिर वायु से चारों ओर से नित्य वेष्टित है । आज आप जिस पिण्ड पृथिवी का चर्मचक्षुत्रों से प्रत्यक्ष कर रहे हैं, किसी समय इसका दूसरा ही रूप था । ग्रापोमय प्रणव समुद्र में पृथिवी ' काल्वालीकृतरूपा ' थी । सर्वत्र [ २६२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १ - सूर्य्यः भूतम् प्राणः प्रज्ञा र - चन्द्रः भूतम् प्राणः प्रज्ञा प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् चिदात्मा प्रतिकृति -अर्थः पारमेष्ठ्य सोमः इन्द्रो मघवा -क्रिया चिदात्मा ज्ञानम् अर्थः चान्द्र सोमः क्रिया इन्द्री मरुत्वान चिदात्मा ज्ञानम् श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर । वेद विज्ञान में प्रकृति विशिष्ट महेश्वर पुरुष पोडषकल बनता हुआ पोडशीप्रजापति नाम से व्यवहृत होता है । इसी महेश्वर को चिदात्मा कहते हैं । यह वृक्षवत् स्तब्ध रहता है इसमें यत्किंचित भी गति नहीं है । नित्य कूटस्थ है । यह सर्वथा अजन्मा है । जीव स्वरूप का इस व्यापक चिदात्मा के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । उक्त परिलेख में त्रिकल ग्रात्मा प्रज्ञामात्रा ( मन ), प्राण मात्रा ( प्राण ), भूत मात्रा ( वाक् ) ग्रर्थात् मन - प्राण - वाक् का स्वरूप बतलाया गया है । यहाँ पर मन ( प्रज्ञामात्रा ) जान है, प्राण क्रिया है, वाक् अर्थ है ।
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड REESECECEE ए भूतात्मा [ पृथिवी ] प्रतिकृति परिलेख: -I ष पि भूतात्मा So प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् जितने भी पिण्ड दृष्टव्य, उन सब का स्वरूप सम्पादक वराह नामक वायु है । ग्रधिदैवत संस्था में पाँच पिण्ड होते हैं । पिण्ड प्राण भेद से पिण्ड सम्पादक वराहवायु भी पाँच स्वरूपों में ही परिणत होता है । इन पाँचों में भूपिण्ड ( पृथिवी ) भी एक पिण्ड है, तथा इसके स्वरूप को सम्पादित करने वाला वराहवायु " एमषवराह " नाम से प्रसिद्ध है । यह अत्यन्त ही घनवायु है, इसी घनता के कारण ही इसमें स्थिरता का उदय होता है । भूपिण्ड का निर्माण पश्वीकृत प्रारणादि से निष्पन्न होता है । ये पाँचों ही भूतात्मक, प्राणात्मक ( देवात्मक ) भेद से दो भागों में विभक्त हैं । भूपिण्ड के केन्द्र और पिण्ड ये दो भाग हैं । केन्द्र को भूतात्मा कहते हैं । इसमें ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र प्रतिष्ठित हैं । स्वय पिण्ड भूतप्रधान अग्नी-पोममय होता है अर्थात् भूतात्मा में प्रतिष्ठित भूताग्नि एवं एमूपवराह के यज्ञ द्वारा भूपिण्ड की निष्पत्ति होती है । श्रीवालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड माधः शिव परिलेखः-: -अमृतभावापन्तः ज्ञानधनः-अतएव मनोमयान्ययानुगृहीतः takalk प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् -एकांकी मूहीस्थानीय : -सत्यनाथ : -चित्पत्तिः अश्वत्थ वृक्ष को ही ग्रागमशास्त्र में " द्युर्द्रुम " नाम से व्यवहृत किया गया है । रुद्र देवता दक्षिणामूर्ति भगवान् इस द्युर्दुम के अधोभाग में प्रतिष्ठित है । अश्वत्थ वृक्ष में ग्रमृत- ब्रह्म - शुक्र विवर्त बतलाये गए हैं । वाङ्मय इन्द्र, अन्नादमय अग्नि, अन्नमय सोम इन तीनों क्षरगर्भित अक्षरों की समष्टि ही महादेव भूतनाथ कहलाती है । इस पर शुक्र प्रधान भौतिक क्षर का अनुग्रह रहता है । शुक्रमूर्ति यह रुद्र, किंवा भूतनाथ द्युर्द्रुमरूप अश्वत्थ के सबसे नीचे के स्थान में ( रोदसी त्रैलोक्य में ) प्रतिष्ठित हैं । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
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: अव्यय रा त् अक्षरः । आत्मक्षरः श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड केब प्राकसृष्टेः तुभ्यं नमस्त्रिमूर्तये " थोचित्पतिर्ज्ञानमू ससना शिरः ब्रह्मा घुर्द्रुमः * स्वयम्भूः > क्रियामूर्तिः देवनाथोदेएपतिः हृदयम् विष्णुः * परमेष्ठीः -2-ोगो आनन्दः १-मौगो ब्रह्मा प्राणः विज्ञानम् १-मनः २-भविष्णुः आपःवाक् → प्राणात्म विज्ञानोपनियत संयती त्रैलोक्य क्रन्दसी त्रैलोक्य रोदसी त्रैलोक्य भूत्पतिरर्थमूर्तिः भूतनाथो पादः महादेवः सूर्यः चन्द्रः घुर्द्रुमाधः पृथिवी-→ प्राण मनः प्राणः १- २-प्रा वाक् ३-अग्निः सोना इन्द्रः सोमः → वाक् अन्नम् → → अन्नादः → अमृतम् अव्ययविकास भूमि: ब्रह्म अव्ययविकास भूमिः शुक्रम् आत्मक्षर विकास भूमिः श्री बालचन्द्र यन्त्रालय. ' मानवाश्रम ', जयपुर । अमृत - ब्रह्म- शुक्र परिलेख : –
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् पार्थिव मृत् परमाणु इतस्तत व्याप्त थे । सत्यसंकल्प प्रजापति की सत्यकामना से वायुद्वारा एक ही समय में चारों ओर से इन मृत्परमाणुत्रों का नियत प्रदेश में संगठन हुआ । कालान्तर में पृथिवी पिण्डरूप में परि-णत होती हुई - " प्रभूत् - प्रतिष्ठा " इस निर्वचन के अनुसार भूमि नाम से प्रसिद्ध हो गई । वाबुद्वारा ही आपो-मय समुद्र में से काल्वालीकृतरूपा पृथिवी का पिण्डरूप से उद्धार हुआ अतएव यह वायुतत्त्व " वृणुते - इति - वरः, श्रह्नोतीति श्रहः, वरश्वासौ श्रहश्चेति वराहः " इस निर्वचन के अनुसार वराह नाम से प्रसिद्ध हुआ । प्राप जितने भी पिण्ड देख रहे हैं, उन सब का स्वरूपसम्पादक यह वराह वायु ही है । अधिदैवतसंस्था में— स्वयम्भू - परमेष्ठी, आदि पांच पिण्ड हैं । पिण्डप्राण - भेद से संपादक वराहवायु पांच स्वरूपों में परिणित हो रहा है । स्वयम्भू - पिण्ड सम्पादक वायु " प्रादिवराह " है, परमेष्ठीपिण्ड का " यज्ञवराह " है, सूर्य्यपिण्ड का " श्वेतवराह " है, चन्द्रपिण्ड का " ब्रह्मवराह " है एवं भूपिण्ड का स्वरूप समर्पक वराह वायु - ' एमूष -वराह " नाम से प्रसिद्ध है । यही वराह अध्यात्मसंस्था की अपेक्षा से " एवयामरुत् " नाम से प्रसिद्ध है । श्रौपनिषदविज्ञान के अनुसार इसका " मातरिश्वा " यह साधारण नाम है । माता पृथिवी का नाम है । संकेत भाषा के अनुसार पृथिवी शब्द पिण्ड का वाचक है । जो वायु पिण्ड के चारों ओर स्थिररूप से व्याप्त रहता है, वह ' ' मातरि ( पृथिव्यां तदुपलक्षिते पिण्डे ) - श्वयते " इस निर्वचन से अवश्य ही मात-रिश्वा नाम से व्यवहृत किया जा सकता है । प्रकृत में भूपिण्ड के सम्बन्ध से एकमात्र पार्थिव एमूत्रवराह ही अपेक्षित | " श्रा - ( अभिव्याप्य-समन्तात् ) ईम् ( पृथिवीम् ) वसति " इस व्युत्पत्ति से अङ्ग ुलीनिर्देश से ग्रभि-पार्थिव ' एमूषवराह ' यह पार्थिव वराह एमूष ( ग्रा - ईम् - वस ) कहलाता है । यह अत्यन्त घन-वायु है । घनता के कारण ही इसमें स्थिरता का उदय होता है । " घृतमन्तरि-क्षस्य " ( शत ० ७।५।१।३ ) के अनुसार इस प्रान्तरिक्ष्य वायु में घृत ( स्नेहतत्त्व ) भरा हुआ है । इसी घृतालुप्त एमूष वायु से शूकर पशु का जन्म होता है । दूसरे शब्दों में शूकर के आत्मा में इतर प्राणियों की अपेक्षा व राहवायु की प्रधानता है, इसी प्रधानता के कारण शूकर पशु को " वराह " कहा जाता है । वराह वायु को हमने स्तब्ध बतलाया है । भूपिण्ड की ओर ही इसका रुख रहता है, दूसरे शब्दों में यह भूपिण्डानुगत है । अतएव तत्प्राणप्रधान शूकर पशु सदा भूपिण्ड की प्रोर ही अपना ' शुंग ' किए, भूपृष्ठ से संलग्न ( सटकर ) होकर सर्पण करता हुआ ही चलता है । घृताक्त वायु की प्रधानता से ही वराह में इतर पशुओं की अपेक्षा घृत ( चर्बी ) अत्यधिक मात्रा में रहता है अतएव इसे मेदुर ( मेदस्वी ) कहा जाता है - ( देखिए शत०-५।४।३।१६ ) । सोमयाजी दीक्षित इसी के चर्म्म की उपानत् ( जूता ) पहनता है । पृथिवी पूषाप्राण प्रधान है, तमोमय पार्थिव पूषाप्राण ही शूद्र का आत्मा है । दूसरे शब्दों में जिसके ग्रात्मा में जन्म से पार्थिव पूषाप्राण की प्रधानता रहती है, वही वर्णसृष्टि में शूद्र कहलाता है । इसी आधारपर निम्न-लिखित निगम वचन प्रतिष्ठित हैं-* मातरिश्वा ' का विशद वैज्ञानिक विवेचन ' ईश ' भाष्य के ' तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ' मन्त्र-भाष्य में द्रष्टव्य है । [ २६३ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् " स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणम् । इयं ( पृथिवी ) वै पूषा । इयं हीदं सर्व पुष्यति यदिदं किञ्च ” – शत ० १४।४।२।२५ इयं वै पृथिवी पूषा "- शत ० २ । १ । ४ । ७ । दैववर्णव्यवस्था - विज्ञान के अनुसार पूषाप्राण शूद्र हैं, यह पार्थिव तत्त्व है, अतएव पृथिवी से नित्य सम्बद्ध वराह वायु के साथ इस शीघ्र पूषा प्राण का घनिष्ठ सम्बन्ध श्रौरशूकरपशु है । पाप्राणात्मक भूपिण्ड, एवं तादात्म्य को लक्ष्य में रख कर तद्वेष्टनरूप वराह वायु के इसी इस वराह को भी पूषा कह दिया जाता है । जैसा कि श्रुति कहती है-अयं वै पूषा, योऽयं ( वातः ) पवते । एष हीदं सर्व पुष्यति ” ( शत ० १४ । २ । १ ६ ) इति । इस परिस्थिति से बतलाना यही है कि, भौतिक सृष्टि में शूद्र एवं शूकरपशु का समान स्थान है । शूद्र मनुष्य में जिस पूषाप्रारण की प्रधानता रहती है, शूद्रपशुरूप वराह पशु में भी उसी पूपाप्राण की प्रधा-नता है । ब्राह्मण मनुष्य के साथ ब्राह्मण अज पशु की, क्षत्रिय मनुष्य के साथ क्षत्रिय अश्वपशु की, वैश्य मनुष्य के साथ वैश्य गौ पशु की यदि समानता है, तो शूद्र मनुष्य के साथ शूद्र वराह पशु की समानता यही कारण है कि वराह पशु को मलमार्जक शूद्र ( महत र भंगी ) ही आश्रय देते हैं । याद रखिए, जो कार्य महतर का है, वही कर्म्म शूकर पशु का है । प्रकारान्तर से दोनों ही मल का संवरण करते हैं । मलभाग आसुर है । असुरप्राण आपोमय है, ग्रापोमय, अतएव ग्रसुरप्राणप्रधान समुद्र गर्भ में से भूपिण्ड का उद्धार करना इसी वराहवायु का कार्य है, जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । दूसरे शब्दों में वराहवायु आसुर-भाव का नाशक है । अतएव प्रसुरसम्प्रदाय वाले मलीमस यवन आज भी वराह पशु से सहज वैर रखते हैं । जिस समय इस वराह वायु ने पिण्डनिर्माण प्रक्रिया आरम्भ की थी, उस समय इसे एक वर्ष लगा था । एक सम्वत्सर के अनन्तर जब भूपिण्ड पूर्ण घन हो गया, तभी वह वराह वायु के चारों ओर विकसित हुआ । कहने का तात्पर्य यही है कि, पिण्डरूप घनभाव की निष्पत्ति के अनन्तर ही वराह को पूर्णरूप से जन्म लेने का अवसर मिलता है । इस प्रकार " भू " नाम से व्यवहृत प्राकृतात्मा में भूपिण्ड-वराह वायु, इन दो भावों की सत्तासिद्ध हो जाती है । इन दोनों में से वराह वायु को थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए, केवल भूपिण्ड को अपना लक्ष्य बनाइये । * स ( प्रजापतिः ) वराह रूप कृत्वोपन्यमज्जत् । स पृथिवीमध ग्रार्छन् । तस्या उपहत्योदमज्जत् । तत् पुष्करपर्णे प्रथयत् । तत् पृथिव्यं पृथिवित्वम् " ( तै ० ब्रा ० १ | १ | ३ | ६ | ७ | ) ( इयतो हवाइम पृथि-त्र्यास प्रादेशमात्री । तामेमूष इति वराह उज्जिद्यान । सोऽस्या ( पृथिव्याः ) पतिः प्रजापति " ( शत०-१४।१।२ २१। ) [ २६४ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् भूपिण्ड को हमने अन्नादप्रकृतिक बतलाया है । अग्नि - अक्षर ही आगे जाकर क्षरभाव में परिणत होता हुआ ग्रन्नाद नाम से व्यवहृत होने लगता है । ग्रन्नादतत्त्व साक्षात् अग्नि है । यह अन्नादग्नि विश-कलनधर्म्मा है । संकोचधर्म्मा अन्न प्रकृतिक सोम के बिना यह अग्नि एक क्षण भी स्वरूप से प्रतिष्ठित नहीं रह सकती । इस अन्न सम्बन्ध की नित्यता के कारण ही तो अग्नि को " श्रन्नाद " ( अन्नमत्तीति श्रन्नादः-अन्न खाने वाला ) कहना अन्वर्थ बनता है । अन्नादगर्भित अन्नसोम की स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, अतएव अग्निसोममयी पृथिवी को केवल अग्निमयी मान लिया है । " प्रत्तैवाख्यायते नाद्यम " । जैसा कि निम्न-लिखित श्रौत प्रमाणों से स्पष्ट है— " श्राग्न यी पृथिवी " - ता ० ब्रा ० १५।४।८ " इयं वा अग्निः " — शत ० ७।३।१।२२ " अयं वै ( पृथिवी ) लोकोऽग्निः ” – शत ० १४ । ६ । १ । १४ " अग्निगर्भा पृथिवी " " अयं वा प्रग्निर्लोकः " - शत ० १४ | ६ | ४ | २१ - शत ० १६ | २ | १३ पृथिवी संस्था से सम्बन्ध रखने वाले अन्नाद अग्नि, अन्न सोम, दोनों ही ग्रमृत - मृत्यु - भेद से दो दो अवस्थाओं में विभक्त हैं । मर्त्य अग्नि एवं मर्त्य सोम दोनों ही अमृत - मर्त्यलक्षरणा पार्थिवसंस्था सुप्रसिद्ध तेज एवं जल नाम के भूत हैं । अग्निभूत एवं जलभूत के समन्वय से ही भूषिण्ड बना है । पानी ही अग्नि के प्रवेश से वराह वायु द्वारा क्रमशः आपः - फेन - मृत् - सिकता - शर्करा - श्रश्मा - श्रयः - हिरण्य ' इन ग्राठ घनावस्थानों में परिणत होता हुआ पिण्डरूप में परिणत हो गया है । इन आठ अवयवों के कारण ही छन्दोविज्ञान के अनुसार इस पिण्ड पृथिवी को " गायत्री " कहा जाता है । कारण अष्टाक्षर छन्द का ही नाम गायत्री है-" या वैसा गायत्री - श्रासीत्, इयं वै सा पृथिवी " ( शत ० १ ४ | १ | ३४ ) | दूसरा है अमृत विभाग । अमृ-ताग्नि एवं अमृतसोम को " देवता " कहा जाता है । इसी देवता के आधार पर मर्त्यभूत प्रतिष्ठित है । ये दोनों प्राणदेवता भूकेन्द्र से बद्ध होकर, दूसरे शब्दों में केन्द्र को स्वप्रतिष्ठा बना कर भूपिण्ड से बाहर निकलते हुए अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाते हैं । वही प्राणमण्डल किंवा देवमण्डल विज्ञानभाषा के अनु-सार ' पुनः पद - साहस्री - महिमा - विभूति ' इत्यादि विविध नामों से प्रसिद्ध है । याज्ञिक लोग अपनी यज्ञ-परिभाषा के अनुसार इसी को " वषट्कार " कहते हैं- " देवपात्रं वा यदेष वषट्कारः " ( शत ० १७।२।१३ ) । प्रत्येक वस्तु में पिण्ड एवं महिमा भेद से दो विभाग अवश्य रहते हैं । पिण्ड उस वस्तु का अन्तर्मण्डल है, महिमा उस वस्तु का बहिर्मण्डल है । पिण्डरूप अन्तर्मण्डल स्पृश्य है, इसे श्राप छ्छू सकते हैं, देख नहीं सकते । महिमारूष बहिर्मण्डल दृश्यमण्डल है, इसे आप देख सकते हैं, छू नहीं सकते । जिस वस्तु का श्राप स्पर्श करने में समर्थ हैं, विश्वास कीजिए वह आपकी दृष्टि में कभी नहीं आ सकता । साथ ही में जिसे [ २६५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् आप देखने का अभिमान कर रहे हैं, स्वप्न में भी बाप उसका स्पर्श नहीं कर सकते । इस प्रकार विज्ञान शास्त्र आपके चिरानुभूत कल्पित सिद्धान्तों को सर्वथा छिन्न - भिन्न कर देता है । भूपिण्ड एवं भूमहिमा का विचार कीजिए । अमृताग्निसोमगर्भित मर्त्याग्निसोमप्रधान भूपिण्ड है एवं मर्त्याग्निसोमगर्भित, अमृताग्निसोमप्रधान भूमहिमा है । दूसरे शब्दों में भूपिण्ड में मर्त्यअग्निसोमरूप भूतों का साम्राज्य है एवं भूमहिमा में श्रमृतश्रग्निसोमरूप देवताओं का प्रभुत्व है । मर्त्यभूपिण्ड में से अर्करूप से बाहर निकलने वाले अमृतरूप प्राणमूत्ति अग्नि एवं सोम, बाहर निकलते हुए अपनी पाँच संस्थाएँ बनाते हैं । रोदसी त्रैलोक्य की अपेक्षा से बृहतीछन्द नाम से प्रसिद्ध विष्वद्वृत्त पर स्थिररूप से प्रतिष्ठित सूर्य्य के चारों श्रोर सौर प्रकाशमण्डल के गर्भ में नियत क्रान्तिवृत्त पर समहिम देवासुरप्रतिस्पर्द्धा भूपिण्ड परिक्रमा लगाया करता है । परिक्रममाणा इस पृथिवी का अर्द्धभाग सदा सूर्य के सम्मुख रहता है एवं प्राधा भाग सदा विमुख रहता है । पृथिवी का जो भाग सूर्य की ओर रहता है, उस भाग की ओर सौर तेज ( प्रकाश ) अविच्छिन्न रूप से पृथिबी पर आया है । इसी सौर प्रकाश के सम्बन्ध से इस ओर का पार्थिव प्राणाग्नि प्रकाशित रहता है । प्रकाश नि का धर्म्म नहीं अपितु “ रूपं रूपं मघवा बोभवीति " ( ऋक्सं ० ३।५३१८ ) के अनुसार सौर मघवा इन्द्र ही प्रकाश - लक्षण है । अग्नि केवल तापलक्षण है । इस ज्योतिर्म्मय इन्द्रप्राण के सम्बन्ध से सौर प्रारणा-नुगत पार्थिव ग्रग्निभूतप्रधान होता हुआ भी ' देवता " नाम से व्यवहृत होने लगता | देवप्राणगभित ( सौरप्राणगर्भित ), अतएव ज्योतिर्मय इसी पार्थिव सूनुगत अग्नि को " देवानां दूतः ” कहा जाता है । पृथिवी का वह अर्द्धभाग, जिस ओर सौर ज्योति का सम्बन्ध नहीं होता, उस ओर भी प्राणाग्नि प्रतिष्ठित है । क्योंकि केन्द्र से निकलने वाला यह प्राणाग्नि चारों ओर व्याप्त होता हुआ वर्त्तुलवृत्त बन कर महिमामण्डल का स्वरूप सम्पादक बनता है । सूर्य्य की विरुद्ध दिक् में प्रतिष्ठित अर्द्ध मण्डलस्थ इस प्राणाग्नि में प्रकाश का प्रभाव है, यह विशुद्ध कृष्णमूर्ति है, तमोमय है, प्रतएव श्रासुर भावापन्न है । तम और माया, श्रसुरों की ही प्रातिस्विक सम्पत्ति मानी गई है - ( देखिए शत ० २।४।२।४ ) । अतएव आसुरप्राणप्रधान इस अर्द्धपार्थिव प्राणाग्नि को " असुराणां दूतः " कहा जाता है । देवदूत श्रग्नि है, असुरदूत सहरक्षा है । इस प्रकार दिग्भेद से मण्डलावच्छिन्न एक ही पार्थिव प्राणाग्नि के दो रूप होजाते हैं । दोनों की मूलप्रतिष्ठा भूकेन्द्रस्थ अमृतमृत्युमय हृदय प्रजापति ही है । सूर्य्यविरुद्धभागानुगता अतएव मलीमस प्राणमयी पृथिवी सौर प्रकाश के कट जाने से " दिति पृथिवी " ( प्रकाश से वञ्चित पृथिवी ) कह-लाता है एवं सूर्य्यभागानुगता, प्रतएव ज्योतिर्म्मयी पृथिवी सौर प्रकाश के अविच्छिन्न सम्बन्ध से " अदि-तिपृथिवी " नाम से व्यवहृत होती है । वहां पृथिवी अर्द्धभाग से अदिति है, अर्द्धभाग से दिति है । प्रदिति में ज्योतिम्मय देवता प्रतिष्ठित हैं, दिति में तमोमय असुरों का साम्राज्य है । पूर्व कथनानुसार दोनों उसी हृद्य प्रजापति की सहजन्मा सन्तान हैं । दिति - प्रदिति, दोनों इस हृद्य प्रजापति की पत्नियाँ हैं । भूपिण्ड इन्द्रयज्ञ के द्वारा नोदनाबल प्राप्त करता हुआ घूमता है । इस भूपरिभ्रमण से दिति - प्रदिति गर्भ में प्रति-• ष्ठित असुर एवं देवप्राण का परस्पर में सम्बन्ध सिद्ध हो जाता है । यही देवता एवं असुरों की प्रतिस्पर्द्धा है । दोनों के समुच्चय से ही भौतिक जड़ चेतन पदार्थों की उत्पत्ति होती है । अतएव प्रत्येक पदार्थ में [ २६६ ]