Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 291–300
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 291–300
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् अपेक्षाकृत तारतम्य से विभूति सम्बन्ध से देव - प्रासुर, दोनों भाव उपलब्ध होते हैं, जैसा कि आगे आने वाले कर्मात्मनिरूपण - प्रकरण में स्पष्ट हो जायगा । पार्थिव केन्द्राग्नितत्त्व पार्थिव प्रजा का अधिष्ठाता होने से " प्रजापति " नाम से प्रसिद्ध है । ग्रग्नि-मूर्ति यह प्रजापति अपने विशकलनरूप स्वरूप धर्म्म के कारण निरन्तर वित्रस्त - पार्थिव प्रजापति विस्रस्त होता है । विस्त्रंसन प्रजापति का स्वाभाविक कर्म्म है । इस विसस्ति के कारण ही इस सोमगर्भित प्राणाग्नि की अग्नि वायु आदित्य दिक्सोम - भास्वरसोम, ये पाँच ग्रवस्थाएँ हो जाती हैं । यहाँ इस बात का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए कि, रोदसी - त्रिलोकी में जिन ग्रग्निवायु - सूर्य्यं चन्द्रमा का दिग्दर्शन कराया गया है, वे सर्वथा पृथक् तत्त्व हैं, एवं उक्त ग्रग्न्यादि स्वतन्त्र तत्त्व हैं । नाम साम्य मात्र से इनमें सांकर्य का भ्रम नहीं करना चाहिए । विस्रस्त पार्थिव अग्नि रसरूप में परिणत होकर वाङ्मय आधारपात्ररूप वषट्कार मण्डल में प्रतिष्ठित होता है । सौर अग्नि सम्वत्सराग्नि कहलाता है, एवं पार्थिव अग्नि " उख्याग्नि " नाम से प्रसिद्ध है | विस्रस्त पार्थिव प्रजापति की क्षतिपूर्ति इसी सौर संवत्सराग्नि से होती है । कैसे होती है?, इस जिज्ञासा को शान्त करने के लिए श्रग्निसंस्कार - विज्ञान की प्रोर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । “ अग्निपोमात्मकं जगत् " यह हमारा ध्रुव सिद्धान्त है । स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी, इन पाँच उपेश्वरों की समष्टि ही विश्व है । यह विश्व शुक्र की प्रधानता षट् शुक्रात्मक पार्थिव विवर्त से वास्तव में अग्निषोमात्मक ही बना हुआ है । अमृतभाव प्रधान * वाक्-श्रापः - श्रग्नि, मर्त्यभावप्रधान श्रग्नि - श्रापः - वाक् ये ६ क्षरप्रधान शुक्र ही विश्व के मूल उपादान हैं । इन ६ों में मध्य के दोनों अग्नियों का एक ही स्थान में समावेश है, फलत: ५ ही विवर्त्त रह जाते हैं । वाङ्मय मृत शुक्र का प्राणप्रकृतिक स्वयम्भू से सम्बन्ध है । ग्रापोमय अमृत शुक्र का ग्रप्प्रकृतिक परमेष्ठी से सम्बन्ध है, ग्रमृताग्नि शुक्र एवं मर्त्याग्नि इन दोनों का वाक्प्रकृतिक सूर्य से सम्बन्ध है । मर्त्य प्रापः शुक्र का अन्नप्रकृतिक चन्द्रमा से सम्बन्ध है । दूसरे शब्दों में यों कहा जा सकता है कि, जहाँ प्रकृति की अपेक्षा से विश्व के ' स्वयम्भू - परमेष्ठी, आदि पाँचों पर्व क्रमशः प्राणमय-श्रापोमय - वाङ, मय - अन्नमय - श्रन्नादमय कहलाते हैं, वहाँ शुक्रापेक्षया वे ही क्रमशः अमृतवाङ्मय ' श्रमृता-पोमय - श्रमृतमर्त्याग्निमय - मर्त्यापोमय मर्त्यवाङ्मय, इन नामों से व्यवहृत किए जा सकते हैं । यदि प्रकृति-भाव की दृष्टि से इन अग्निषोमात्मक शुक्रों का विचार किया जाना है, तो स्वयम्भू प्राणाग्नि है, सूर्य्य वाग्नि है, पृथिवी अन्नादाग्नि है, परमेष्ठी आपोमय सोममूर्ति है, चन्द्रमा अन्नमय सोममूर्ति है । यदि शुक्र की दृष्टि से ही विचार किया जाता है, तो स्वयम्भू वागग्नि है, सूर्य्यं श्रमृतमृयग्नि है, पृथिवी वागग्नि है । परमेष्ठी एवं चन्द्रमा आपोमय सोममूर्ति है । * इन ६ श्रों शुक्रों का सोपपत्तिक विवरण ईशोपनिषत् हिन्दीविज्ञान भाष्यान्तर्गत शुक्र निरुक्ति प्रकरण में देखना चाहिये । [ २६७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे भौतिक पिण्ड प्रकृत्यपेक्षया प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् १ - प्रकाशात्मा स्वयम्भूः -- प्राणाग्निमय: -२ - वाय्वात्मा परमेष्ठी-- प्रप्सोममय: -- ग्रमृतवागग्निमयः-- अमृतत्रापोमय: ---- अग्निः - सोमः ३ – तेजोमयः सूर्य्यः-- वागग्निमय: --- अमृतमर्त्याग्निमय: --- प्रग्निः ४ - जलमूत्तिश्चन्द्रमाः--अन्नसोममयः-५ - मृण्मयो भूपिण्ड: --- अन्नादाग्निमय: -· मर्त्यापोमयः—-- मर्त्यवागग्निमयः --—— अग्निः --सोमः " श्रग्नीषोमात्मकं जगत् " -इत्याहुः इन में स्वायम्भुवाग्नि अपौरुषेय वेद सम्बन्ध से वेदाग्नि नाम से, यजुः सम्बन्ध से सार्वयाजुषाग्नि, सत्यावाक् के सम्बन्ध से सत्याग्नि, ब्रह्मा के सम्बन्ध से ब्रह्माग्नि, अश्वत्थ के श्रवयवभूत अमृत के सम्बन्ध से श्रमृताग्नि इत्यादि अनेक नामों से प्रसिद्ध है । पार्थिवाग्नि के विविध विवर्त्त ज्योतिम्र्म्मयी गायत्री के सम्बन्ध से गायत्राग्नि, सौर अग्नि पौरुषेय वेद के सम्बन्ध से पुरुषाग्नि, संवत्सरप्रवृत्ति से संवत्सराग्नि, अङ्गिरा के सम्बन्ध से अङ्गिरोऽग्नि, देवप्राण के विकास से देवाग्नि, अश्वत्थ के ग्रवयवभूत ब्रह्मभाग के सम्बन्ध से ब्रह्माग्नि, इत्यादि रूप से अनेक नामों से प्रसिद्ध है । तीसरा पार्थिव अग्नि यज्ञमात्रिक वेद के सम्बन्ध से यज्ञाग्नि, अष्टावयव - सम्बन्धिनी तमोमयी गायत्री के सम्बन्ध से गायत्राग्नि, उख्यभाव के सम्बन्ध से उख्याग्नि, क्षरप्रधान भूत के सम्बन्ध से भूताग्नि, अश्वत्थ के अवयवभूत शुक्र भाग की प्रधानता से शुक्राग्नि, त्रादि विविध नामों से प्रसिद्ध है । १ - वागग्निः - - - शुक्र की अपेक्षा से २ - प्राणाग्निः --- प्रकृति की अपेक्षा से ३ - वेदाग्निः --- अपौरुषेय वेद की अपेक्षा से ४ - सार्वयाजुषाग्निः – यजुर्वेद की अपेक्षा से ५ – सत्याग्निः ——– सत्यावाक् की अपेक्षा से ६ - ब्रह्माग्निः ——- अक्षर ब्रह्मा की अपेक्षा से ७ – प्रमृताग्निः - - - प्रमृत भाग की अपेक्षा से [ २६८ ] J } + स्वयम्भूः
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १- प्रमृतमग्निः शुक्र की अपेक्षा से २ - वागग्निः - - - - प्रकृति की अपेक्षा से ३ - पुरुषाग्निः --- पौरुषेयवेद की अपेक्षा से ४ - गायत्राग्निः -- ज्यो ० गायत्री की अपेक्षा से ५ - सम्वत्सराग्निः --- संवत्मरापेक्षा से ६- अङ्गिरोऽग्निः - - पारमेष्ठ्य श्रङ्गिरा की अपेक्षा से --७- देवाग्नि: - --- देव प्रारण की अपेक्षा से 5 - ब्रह्माग्निः- - ब्रह्म भाग की अपेक्षा से + → सूर्यः | प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् १- म वागग्निः शुक्र की अपेक्षा से २- अन्नादाग्निः प्रकृति की अपेक्षा से ३- यज्ञाग्निः यज्ञमात्रिक वेद की अपेक्षा से -४ – गायत्राग्निः ——– तमोमयी गायत्री की अपेक्षा से पृथिवी ५- उपाग्निः -- महिमा के सम्बन्ध से ६ - भूताग्निः -- भूत की अपेक्षा से ७- शुत्राणि: -- शुक्रभाग की अपेक्षा से यद्यपि - " अन्नाद एवान्यतरोऽभवत् श्रश्रमन्यतरः । श्रनाद एवाग्निरभवत्, अन्नं सोमः । श्रन्नादश्व वाग्दवं सर्वमन्नं च ( शत ० ११ कां ० | १०० ९ ० १ ९ ० ) इस श्रौत पावाग्नि का अनावश्व विद्धान्त के अनुसार स्वायम्भुव सौर पार्थिव इन तीनों ही प्रग्नियों को अग्निसम्बन्ध से अन्नाद कहा जा सकता है, एवं पारमेष्ठ्य - चान्द्र, दोनों सोमों को प्रश्न कहा जा सकता है, तथापि प्रकृतिभाव की अपेक्षा से केवल पाथिव अग्नि को ही अन्नादाग्नि कहा जायगा, एवं केवल चान्द्रसोम को ही अन्नसोम कहा जायगा । प्राणादि पाँचों प्रकृतियों में अन्नाद-प्रकृति का केवल पृथिवी में एवं प्रकृति का केवल चन्द्रमा में ही विकास होता है । अन्न केवल चान्द्र सोम है । इसे न स्वायम्भुव ग्रग्नि खाता, न सोरअग्नि इसकी आहुति एक मात्र पार्थिव प्रग्नि में ही [ २६ ९ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १ - " ग्रन्नादोऽग्नि " ( शत ० २।१ ॥२८ ) २ - " अन्नाद एवाग्निः " ( शत ० ११ | १ | ६ | १६ ) १– ३ - " अन्नादो वा एषोऽन्नपतिर्यदग्निः " ( ऐ ० १15 ) ४ - " इयं वाऽग्निः " ( शत ० ७।३।१।२२ ) [ २७० ] प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् ' १ →→ ग्रन्नादाग्निः - भूः होती है । ग्रन्न ( चान्द्र ) सोम को खाने वाला तो केवल पार्थिव श्रग्नि ही है, इसलिए भी पार्थिव को ही अन्नाद कहना न्यायप्राप्त होता है । अन्नाद अग्नि की अन्नव्यवस्था नियत है, सौर वागग्नि की अन्नव्यवस्था अनियत है । उदाहरण के लिए पार्थिव - प्रन्नादाग्नि- प्रधान पुरुष को ही लीजिए । हमारे लिए “ सायंप्रातराश्येवस्यात् " ( शत ० २४ । २ । ६ ) के अनुसार अन्नव्यवस्था सर्वथा नियत है । सायं प्रातः हमें नियतमात्रा में अन्न खाना पड़ता है । परन्तु सोर अग्नि निरन्तर अन्न खाया करता है । ग्रन्नादाग्नि का अन्न अब्रूगर्भित चान्द्रसोम है, सौराग्नि का अन्न ब्रह्मणस्पतिसोमगर्भित पारमेष्ठ्य आप: है । स्वायम्भुव अग्नि केवल आवपनमात्र है, जहाँ प्रतिष्ठित होकर सौर, एवं पार्थिव अग्नि अन्न खाते हैं, ऐसा खंब्रह्म है । इस प्रकार यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं की जा सकती कि केवल पार्थिव ग्रग्नि ही " श्रन्नाद " है । उपर्युक्त अग्नि अपनी - अपनी संस्था के प्रजापति है । ब्राह्मणग्रन्थों में सृष्टिधारा के सम्बन्ध में स्थान - स्थान पर प्रजापति शब्द प्रयुक्त हुआ है । यह प्रजापति शब्द किसी कृष्णाजिन और पुष्करपर्ण एक अर्थ से सम्बन्ध न रखता हुआ प्रकरणभेद से भिन्न - भिन्न तत्वों का ही सूचक बनता है । प्रकृत में अन्नादपूर्ति पार्थिव प्रजापति ही अभिप्रेत है । इस की ' प्रन्नाद एवं उख्य ' भेद से दो प्रधान अवस्थाएँ हैं । जब तक पार्थिव अग्नि भूपिण्ड में प्रतिष्ठित रहता है तब तक तो अन्नाद नाम की पाँचवीं प्रकृति से अनुगृहीत रहता हुआ यह ' अन्नादाग्नि ' नाम से ही व्यवहृत होता है । यही अन्नाद वित्रस्त होता हुआ भूपिण्ड से बाहर निकलकर क्रमशः अग्न्यादि देवता-रूप में परिणत होता हुत्रा ' उख्याग्नि ' नाम से प्रसिद्ध होता है । पूर्वोक्त ब्रह्मसत्य देवसत्य विज्ञान के अनुसार ग्रन्नाद ब्रह्मसत्य का अवयव है । अतः अन्नादाग्निमूर्ति इस भूपिण्ड को हम " ब्रह्म सत्यात्मा ” नामक भूतात्मा ही कहेंगे । दूसरा प्रारणमुत्ति उख्याग्नि देवमूत्ति है, अतः इसे देवसत्यात्मा नामक प्राणात्मा कहेंगे । हाँ, तो निष्कर्ष यह निकला कि अन्नादाग्नि से भूपिण्ड का, एवं उपाग्नि से उख्या पृथिवी नाम से प्रसिद्ध महापृथिवी का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । याज्ञिक परिभाषा के अनुसार मर्त्यभूतभागप्रधान, चीयमान अन्नादाग्नि " चित्याग्नि " नाम से एवं श्रमृतप्राणभागप्रधान चित्य पर निहित उख्याग्नि ' चितेनिधेय ' नाम से व्यवहृत हुआ है । चयनविज्ञान के अनुसार प्रन्नादाग्निमूर्ति भूपिण्ड कृष्णाजिन है, एवं उख्याग्निमूर्ति महापृथिवी पुष्करपर्ण है । कृष्णाजिनमूर्ति भूपण्डि ही अषाढा नाम से भी प्रसिद्ध है । इस प्रकार निम्न-लिखित निगम वचनों के अनुसार ग्रग्नि पार्थिव उभयविध अग्नि के उक्त नानों की प्रामाणिकता में कोई सन्देह नहीं रह जाता ।
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड २-१ - " श्रयं वा अग्निरुख्यः " ( शत ० ८ | २ | ११४ ) २- " इमे वं लोका उखा " ( शत ० ६।५।२।१७ ) ३ - " योनिर्वा उखा " ( शत ० ७।५।२।२ ) ४ - " इमे व लोका एषोऽग्निः " ( शत ० ६ । ७ । १।१६ ) + प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् २ उख्याग्निः पृथिवी १– “ चेतव्यो ह्यासीत् तस्माच्चित्यः " ( शत ० ६ । १।२।१६ ) २- अयं वाव लोकोऽग्निश्चितः " ( शत ० १०।१।२।२ ) १–३– ' यच्चेतयमाना प्रपश्यंस्तस्माच्चितयः " ( श ० ६ २ २ ) ४– “ पश्ञ्च ह्यतेऽग्नयो यदेताश्वितयः " ( शत ० ६।२।१।१६ ) ५ - " प्रयमेव सयोऽयमग्निश्रीयते " ( शत ० ६ | १ | १ | ५ ) → चित्याग्निः - भूः २– १ - " अथ यचितेऽग्निनिधीयते यैवैतेषां श्रीः, यो रसः, तमूर्ध्व समुहन्ति " ( शत ० ६।१।१।६ ) २ → चिते निधेयाग्निः - पृथिवी १ - " इयं वै कृष्णाजिनम् " ( शत ० ६ | ४ | २ | ६ ) १–२– “ तस्य ( ग्रग्नेः ) एप स्वोलोको यत् कृष्णाजिनम् ” ( श ० ६।४।२।६ ३- ' यज्ञो वै कृष्णाजिनम् " ( शत ० ६ | ४ | १ | ६ ) १ > कृष्णाजिनम् - भूः --१– “ इयं वै पुष्करपर्णम् ” ( शत ० ७।४ । १ । १२ ) २–२– “ वाक्पुष्करपर्णंम् " ( शत ० ६ | ४ | १ | ७ ) ३ - " योनि पुष्करपर्णम् ” ( शत ० ६ | ४ | १ | ७ ) [ २७१ ] २ → पुष्करपर्णम् - पृथिवी
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत भूपिण्ड गार्हपत्यकुण्ड है । इसमें रहने वाला अन्नादाग्नि गार्हपत्याग्नि है । उयत्रिलोकी ग्राहव-नीकुण्ड है । पार्थिवग्रन्नाद ही प्राणप्रधान बनकर इस में प्रतिष्ठित होता श्रग्निचितिरहस्य - है, अतएव इस उख्यश्राहवनीयाग्नि को प्राहृत ( ले गया हुआ ) कहा जाता है । यही कारण है कि, इस नित्य प्राकृतिक यज्ञ के आधार पर वितत वैध यज्ञ में गार्हपत्यग्रग्नि को ही तत्पूर्वस्थ ग्राहवनीयकुण्ड में ऋत्विक् लोग प्रतिष्ठित करते हैं । सौर सम्वत्सराग्नि पृथिवी की ओर निरन्तर प्राया करता है, ठीक इसके विपरीत पार्थिवविस्रस्त अनादाग्नि सम्वत्सर की ओर जाया करता है । सूर्य्यं से आनेवाला सम्वत्सराग्नि सत्यधर्म्मा होने के कारण भूपिण्ड से टकराकर परावर्तित होता हुआ उसी अपने मण्डल ( सम्वत्सर ) में प्रतिष्ठित हो जाता है । भूपिण्डाघात से प्रतिफलित, गायत्रीमात्रिक नाम से प्रसिद्ध - पौरुपेय वेदावच्छिन्न ( ऋक् - यजुः सामावच्छिन्न ) सम्वत्सरमण्डल में प्रतिष्ठित, अतएव सम्वत्सररूप यही सौराग्नि तत्रस्थ उरुयाग्नि में अन्तर्य्यामि सम्बन्ध से प्रतिष्ठित होता हुआ, इस पार्थिवाग्नि की पुष्टि का कारण बनता हुआ इस का ग्रन्न बन जाता है । सीधे शब्दों में प्रतिफलित सम्वत्सराग्नि पार्थिव अग्नि का अन्न है । पार्थिव अग्नि ग्रस्मदादि प्रजा निर्माण में वित्रस्त ( खर्च ) होता रहता है । इस कमी की पूर्ति सम्वत्सराग्नि से ही होती है । सौर सम्वत्सर, एवं पार्थिव उख्याग्नि का एक स्थान पर समन्वय होता है । इसी सम्बन्ध से सम्वत्सराग्नि द्वारा पार्थिव अग्नि का संस्कार होता रहता है । दूसरे शब्दों में वेदावच्छिन्न अतएव ऋग्यजुः साम मूर्ति सौर अग्नि की विस्रस्त पार्थिव अग्नि में चिति होती रहती है, अतएव यह श्रग्नियज्ञ ( अग्नि में अग्नि का बहुत होना ही अग्नि यज्ञ है ) " चित्या चिति - वयन " आदि नामों से व्यवहृत किया जाता है । विस्रस्त पार्थिवाग्नि प्राणदपातत् व्यापार से उख्य त्रिलोकी में जाता है, अतएव " श्रचश्चरति " इस ब्राह्मणोक्त निर्वचन के अनुसार इसे " अर्क " कहा जाता है । यह अर्का -श्रव - महाव्रत उक्थ्य परिचय - ग्नि यद्यपि प्रातिस्विकरूप से एक ही स्वरूप रखता है, परन्तु इसकी विस्र-ति की पूति ( क्षतिपूर्ति ) करने वाला, ग्रतएव ' अग्नि ' होते हुए भी ' अन्न ’ नाम से प्रसिद्ध ऋग्यजुः सामरूप - सम्वत्सराग्नि के सम्बन्ध से इस के प्रवर्य - महाव्रत उक्थ्य, ये तीन रूप हो जाते हैं । आत्मरूप अन्नादाग्नि में ग्राहुत होने वाला ग्रन्न अन्तर्य्याम सम्बन्ध में आत्मसात् बनता हुआ आत्मा ही बन जाता है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने अन्नावच्छिन्न पार्थिव अग्नि को ' अर्थ-महाव्रत - उक्थ्य ' नामों से व्यवहृत किया है । श्रर्क - महा - उक् इन तीनों की समष्टि अन्नादाग्नि है एवं क्यम् - व्रतम् - थम् इन तीनों की समष्टि सम्वत्सराग्निरूप ग्रन्न है । क्यं यजुरूप अन्न है । इसके सम्बन्ध से पार्थिव ग्रर्काग्नि ' अम् ' बना हुआ है । व्रत - सामरूप ग्रन्न है । इसके सम्बन्ध से पार्थिव महदग्नि " महा-व्रतम् ” बना हुआ है । थम् - ऋग्रूप अन्न है इसके सम्बन्ध से पार्थिव उगग्नि " उक्थम् " बना हुआ है । इस प्रकार एक ही पार्थिव अग्नि ऋग्यजुः साममय उक् - क्यं व्रतम् - सम्बत्सराग्निरूप अन्नभेद से त्रिमूर्ति बन रहा है । अग्नि को ही परोक्ष - भाषा में " क्यम् " कहा जाता है । इस प्रकार ऋग्यजुःसामात्मक सौर सम्वत्सराग्नि, एवं पार्थिव श्रन्नादाग्नि ( उख्याग्नि ) का परस्पर सम्बन्ध होता रहता है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट हो रहा है । [ २७२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानापनिषत् जिस स्थान पर वेदावच्छिन्न सौर सम्वत्सराग्नि एवं वित्रस्त पार्थिव उख्याग्नि, इन दोनों का समन्वय होता है, वही प्रदेश विराट् पुरुष की ग्राधार भूमि है । दूसरे शब्दों वाक्साहस्री - स्वरूपपरिचय में अदितिमण्डल को विराट् की पृथिवी के दिति और अदिति दो प्रतिष्ठा माना जा सकता है । पूर्व में भेद बतलाए गये हैं । भूविवर्त्त के लिए ' भूमि, पृथिवी, दिति, श्रदिति, मेदिनी, सागराम्बरा, मही, श्रषाढा ' इत्यादि अनेक शब्द व्यवहृत हुए हैं । भूवि-वर्त्तत्त्वेन इन सब में यथाकथञ्चित् पर्य्याय सम्बन्ध मान लेने पर भी विज्ञान दृष्ट्या सभी शब्द भिन्न - भिन्न वस्तुतत्त्व के वाचक हैं | सुप्रसिद्ध भूपिण्ड ही भूमि है । इसी को अन्नादाग्निमूर्ति कहा गया है । आगे जाकर भूपिण्डस्थ प्राणाग्नि रस का वाक् के आधार पर प्रथन होता है, अर्थात् भूपिण्ड प्राणाग्नि - रसरूप से बाहर निकल कर अपना मण्डल बनाता है । इस अग्नि के साथ ग्रापः औौर वाक् नाम के दो शुक्र और हैं । वाक् - श्रापः श्रग्नि का समुच्चित रूप ही भूपिण्ड है । इन तीनों शुत्रों के आधार पर क्रमशः द्यौ - गौ-वाक्, इन तीन पार्थिव मनोताओं का उदय होता है । स्मरण कीजिए हृद्य प्रजापति का । ब्रह्मा - विष्णु-इन्द्र की समष्टि ही हृद्य प्रजापति है । इन में ब्रह्मा एकाकी है, विष्णु के साथ सोम का सम्बन्ध है, इन्द्र के साथ ग्रग्नि का सम्बन्ध है । ब्राह्माक्षर द्योमय है, विष्णुसोमाक्षर गौमय है, इन्द्राग्निक्षर वाङ्मय है । श्रग्निस्वरूप पहली संस्था ' अग्निर्भ स्थानः; के अनुसार भूः ( महापृथिवी ) है, ग्रामस्तररूप दूसरी संस्था गोमय भुव है, एवं वाक्स्तररूप तीसरी संस्था द्योरूप स्व: है । केन्द्रस्थ यही तत्त्व रस रूप से ऊर्ध्वगमन कर हु अपनी संस्थाएं बनाते हैं । वाङ्मय ब्रह्मा केन्द्र से बद्ध रहते हुए प्राणरूप से जहां तक वितत होते हैं, वहां तक वाक् शुक्र व्याप्त रहता है । यही सर्वाधारभूता द्यौमयी पहली संस्था है । इसमें एक सहस्र मनः प्राणगभिता - वाग्विवर्त्त माने जाते हैं । अतएव आलम्बन रूप यह वाक्स्तर “ वाक्साहस्री ” नाम से प्रसिद्ध है । इसी का दिग्दर्शन कराती हुई मन्त्रश्रुति कहती है-सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था यावद्यावापृथिवी तावदित्तत् । सहस्रधा महिमानः सहस्र ं यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक् ॥ ( ऋक्सं ० १०।११४1८ ) इन सहस्र वाक् - तत्त्वों में से ३० - ३० वाक् - राशि का एक एक अहर्गण होता है । इस संख्या त्रम से ६६० वाग्ररश्मियों के कुल ३३ अहर्गण हो जाते हैं । १० अहर्गण शेष रह जाते हैं । यही उच्छिष्ठ भाग चौतीसवाँ प्राजापत्य अहर्गण है – “ प्रजापतिश्चतुस्त्रिशः " ( शत ० ४ | ५ | ७ | १ ) | वाङ्मय ३३ प्रहर्गणों में तीन अहर्गणों का भोग तो भूकेन्द्रस्थ ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र, इन तीन हृदयाक्षरों के साथ हो जाता है | दूसरे शब्दों में तीन अहर्गण तो भूपिण्ड में ही ग्रन्तर्भूत हैं । शेष भूपृष्ठ से आरम्भ कर पूरे वाङ्मण्डल में ३० अहर्गरण बच जाते हैं । इन ३० में से ६-६ अहर्गणों का एक स्वतन्त्र विभाग होता है । भूकेन्द्रस्थ ३ अह-र्गणों के साथ ६ अहर्गणों को मिला दीजिए । इन & अहर्गणों का एक स्तोम त्रिवत् स्तोम कहलायेगा । इन में ६ और मिला दीजिए । इन ११ अहर्गणों का दूसरा स्तोम पञ्चदशस्तोम कहलायेगा और ६ ग्रहर्गणों के योग से एकविशस्तोम का और ६ अहर्गणों के योग से त्रिरणवस्तोम का एवं ६ ग्रहणों के योग से त्रयस्त्रशस्तोम का स्वरूप सम्पन्न होगा । इस प्रकार ६ / १-१५ / २ २१ / ३२१/६ ३३ / ५ इस क्रम से पांच [ २७३ ]
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् प्रधान स्तोम हो जायेंगे । यही पञ्चस्तोमात्मक वाङ्मण्डल बहिर्म्मण्डल कहलाएगा । जिस प्रकार अन्तर्मं-ण्डलरूप भूपिण्ड का एक निश्चित केन्द्र होता है, एवमेव अहर्गणात्मक इस बहिर्मण्डल का भी एक स्वतन्त्र केन्द्र होता है । वह स्थान सत्रहवाँ अहर्गण माना गया है । ३३ का केन्द्र १७ वां ही बन सकता है । यही स्थान सप्तदशप्रजापति, उद्गीथप्रजापति, इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । यही ६ ठा सप्तदशस्तोम है । इस प्रकार ब्रह्ममयी वाक् के ६ स्तोम हो जाते हैं । इन्हीं ६ स्तोमों के कारण यह वाङ्मण्डल “ वषट्कार ” कहलाया है । वाक् का षट्कार ( ६ स्तोम ) ही " वाक् षट्कार " है । परोक्ष - भाषानुसार वाक् - पट्कार ही वषट्कार है । वाङ्मय वषट्कार में ३३ अहर्गण किंवा ३ स्तोम बतलाए गए हैं । यदि और भी सूक्ष्म विचार किया जाता है तो ४८ स्तोम हो जाते हैं । त्रयस्त्रिशदहर्गणात्मक वषट्कार वाङ्मयस्तोमविवर्त एकविश स्तोम पर्य्यन्त इन्द्रात्मक श्रग्निः शुक्र व्याप्त है, त्रिरणवस्तोमपर्य्यन्त विष्णुमय श्रापः शुक्र की प्रतिष्ठा है, एवं त्रयत्रिंशस्तोम पर्य्यन्त वाङ्मय ब्रह्मा का साम्राज्य है | ३४ वें अहर्गण में विशुद्ध ब्रह्मा प्रतिष्ठित है । अष्टाचत्वारिंशत्स्तोमात्मक वषट्कार में २१ पर्य्यन्त अग्नि, ३३ पर्य्यन्त आपः एवं ४८ पर्य्यन्त वाक् है । इन तीनों की आधार भूमि वही अग्नि-गर्भित इन्द्र, सोमगर्भित विष्णु, एवं ब्रह्मगभिता वाक् है । जहां तक अग्निगर्भित इन्द्र व्याप्त है, वह द्युलोक है, यही द्यौ है । जहां तक विष्णुगर्भित अप्तत्त्व व्याप्त है, वह गोलोक है, एवं ब्रह्मगभित वागुलोक ही ‘ वाक् ’ है | केन्द्रस्थ ग्रग्निगर्भित इन्द्र, सोमगर्भित विष्णु, तथा ब्रह्मा - युक्त वाक् तत्त्व ही वितत होकर ४८ पर्य्यन्त व्याप्त हुआ है । वाक् का यह वितान ही इसका प्रथन है । इसीलिए - " यदप्रथयत् " इस निर्ब-चन के अनुसार इस भौमविवर्त्त को ' पृथिवी ' कहा जाता है । यह पृथिवी उस भूपिण्ड के आधार पर ही प्रतिष्ठित है । दूसरे शब्दों में पृथिवी के केन्द्र में भूपिण्ड प्रतिष्ठित है । इसके चारों ओर प्रथम स्तर अग्नि का है, द्वितीय स्तर आपः ( जल ) का है एवं तृतीय स्तर वाक् का है । इस स्तरभाव का यह अभिप्राय नहीं है कि अग्नि के अनन्तर अप्स्तर का एवं प्रप्स्तर के अनन्तर वाक्स्तर का प्रारम्भ होता है । अपितु तीनों स्तरों का उपक्रम भूकेन्द्र ही है । भूकेन्द्र से प्रारम्भ कर ४८ पर्य्यन्त व्यापक वाक्स्तर है । केन्द्र से ३३ पर्य्यन्त अस्तर है एवं भूकेन्द्र से २१ पर्य्यन्त अग्निस्तर है । इसीलिए युग्म - युग्म स्तोमों की व्यवस्था केन्द्र से ही की जाती है । भुकेन्द्र से प्रारम्भ कर ३३ पर्यन्त प्रतिष्ठित रहने वाले उपर्युक्त त्रिवृत् पञ्चदश- सप्तदश- एकविंश - त्रिरणव- त्रयस्त्रिश, ये ६ मों स्तोम युग्मस्तोम हैं एवं केन्द्र से ४८ पर्य्यन्त गायत्री के सम्बन्ध से चतुविशस्तोम, त्रिष्टुप् के सम्बन्ध से चतुश्चत्वारिंशस्तोम एवं जगती के सम्बन्ध से अष्टाचत्वारिंशस्तोम, ये तीन छन्दोमास्तोम हैं, ये ही " युग्मन्ति स्तोमानि " हैं । भूपिण्ड पञ्चीकृत प्रारणादि से निष्पन्न हुआ है । ऐसी अवस्था में इसमें ब्रह्मादि पाचों ग्रक्षरों से नित्ययुक्त प्राणादि पाँचों क्षरप्रकृतियों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । लोकसाहली- -स्वरूप परिचय भूपिण्ड में प्राणमय ब्रह्मा, श्रापोमय विष्णु, वाङ्मय इन्द्र, अन्नादमय अग्नि, अन्नमय सोम, पाँचों का भोग सिद्ध है । ये पाँचों ही भूतात्मक, प्राणात्मक ( देवात्मक ), भेद से दो भागों में विभक्त है । इनमें भूतात्मक पाँचों से तो भूपिण्ड का निर्माण [ २७४ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् हुग्रा है, एवं प्रारणात्मक पांचों वपट्कारात्मिका पृथिवी के स्वरूप समर्पक हैं । भूपिण्ड में केन्द्र और पिण्ड, ये दो भाग हैं । इनमें केन्द्र में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - प्रतिष्ठित है । स्वयं पिण्ड भूतप्रधान अग्नीषोममय है । इस प्रकार भूपिण्ड में पाँचों का भोग सिद्ध हो जाता है । पृथिवी के २१ पर्य्यन्त अग्निगर्भित इन्द्र है, ३३ पर्य्यन्त सोमगर्भित विष्णु है, एवं ४८ पर्यंन्त ब्रह्मा है । इस स्तोम क्रम से पृथिवी में अमृत प्रधान इन पाँचों का भोग सिद्ध हो जाता है, स्वयम्भू का जो अंश प्रवर्ग्य बन कर पृथिवी में आता है, वही ४८ स्तोम प्रतिष्ठित होकर पृथिवी की प्रातिस्विक वस्तु बन जाता है । परमेष्ठी का प्रवर्ग्याश ३३ पर प्रतिष्ठित है, एवं सूर्य का प्रवयश २१ पर प्रतिष्ठित है । चन्द्रमा स्वयं पृथिवी का ही उपग्रह है । अष्टाचत्वा-रिशस्तोम पृथिवी की अन्तिम परिधि है । इस का जगती छन्द से सम्बन्ध है | अतः समष्ट्यात्मिका भूपिण्डयुक्ता इस महापृथिवी को हम " जगती " कहेंगे । " यत् किञ्च जगत्यां जगत् " ( ईशोपनिषत् ) से यही जगती अभिप्रेत है । यदि ३३ वें अहर्गण पर्यन्त पृथिवीलोक अपेक्षित है, तो ऐसी अवस्था में इसे हम जगती न कह कर “ सागराम्बरा " कहेंगे । कारण, ३३ का स्तर ग्रापोमय है । यही सागर ( अर्णवसमुद्र ) अग्न्यवच्छिन्न पृथिवी का श्रावरण बना हुआ हैं । यदि २१ विशस्तोमपर्यन्त पृथिवी लोक अपेक्षित है, तो ऐसी अवस्था में इस पृथिवी को हम " उख्या " कहेंगे । कारण, उख्याग्नि एकविंश पर्य्यन्त ही व्याप्त है । यदि अन्तरिक्ष पर्य्यन्त पृथिवी लोक अपेक्षित होगा, तो उस अवस्था में हम इसे " मेदिनी " कहेंगे । कारण, मेदभाव - प्रवर्त्तक घृताक्त वायु अन्तरिक्षस्थानीय इसी पञ्चदश स्तोम में व्याप्त है । यदि केवल पिण्ड ही लक्ष्य रहेगा, तो उस अवस्था में हम इसे “ भूमि ” कहेंगे । यहाँ प्रथन का प्रभाव है । जगती - सागराम्बरा-उख्या - मेदिनी - दिति - अदिति, सब का प्रथन भाव से सम्बन्ध है, अतः इन सब को पृथिवी नाम से व्यवहृत किया जा सकता है । पृथिवी इनका साधारण नाम है । परन्तु - पिण्डभाग केवल भूमिः - धरा - धरित्री-धरणी- क्ष्मा- इत्यादि नामों से ही व्यवहृत होगा । फलतः विज्ञान काण्ड में भूमि और पृथिवी को परस्पर में पर्य्याय समझना एवं उक्त जगती आदि नामों में पर्य्याय सम्बन्ध मानना नितान्त असंगत हो जाता है । ब्रह्म के सम्बन्ध से पूर्व में वाक् - साहस्री का दिग्दर्शन कराया गया है । प्रसंगोपात्त - लोक - वेद-साहस्री का भी नाम मात्र जान लेना अनावश्यक न होगा । प्रग्निमूर्ति इन्द्र ही वेद साहस्री का प्रवर्त्तक है | २१ पर्यन्त व्याप्त रहने वाला इन्द्रमूत्ति अग्नि- वायु - आदित्य इन तीन अवस्थाओं में परिणत रहता है | इन्हीं तीनों से क्रमश यज्ञस्वरूप समर्पक, अतएव यज्ञमात्रिक नाम से प्रसिद्ध पार्थिव क्षरात्मक ऋक्-यजुः साम का विकास होता है । वेदसाहस्त्री है । सोमगर्भित विष्णु ही लोकसाहस्री के प्रवर्तक हैं । ३३ पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला विष्णु - मूर्ति सोम, किंवा आपः ही भूकेन्द्र से ३३ पर्य्यन्त व्याप्त होता हुआ-" पृथिवी - श्रन्तरिक्ष- द्यौः - श्रापः " इन चार लोकों का प्रारम्भक बनता है । यही तीसरी लोकसाहस्त्री है । इसी त्रयी को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं—
" उभा जिज्ञथुर्न पराजयेथे न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः ।
इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेथां त्रैधा सहस्र वि तदैरयेथाम् ॥
( ऋक्सं ० ६ | ६६८ ) । [ २७५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् किं तत् सहस्रमिति? – इमे लोकाः, इमे वेदाः प्रथो वागिति ब्रूयात् । " ( ऐ ० ब्रा ० ६।१५ ) " भौम प्रपञ्च के सभी विवर्त्तो का संक्षेप से दिग्दर्शन कराया गया । अब केवल दिति - प्रदिति का स्वरूप अवशिष्ट रहता है । संक्षेप से उसका भी दिग्दर्शन करा इस आधिभौतिक प्रकरण को समाप्त किया जाता है । पृथिवी का वह भाग, जो सूर्य्य की ओर रहता हुआ प्रकाश से युक्त रहता है, उसीको पूर्व में हमने - अदिति कहा है । उल्यापृथिवी, ३३ यज्ञिय देवता, श्रग्नित्रयी, विता-श्रदिति- दिति - विवर्त्त नयज्ञ, सब कुछ इसी प्रदिति के गर्भ में प्रतिष्ठित है । विराट् - प्रजापति नाम से प्रसिद्ध वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञमूत्ति स्वयं ईश्वर प्रजापति भी इसी अदिति के गर्भ में जन्म लेते हैं । अदिति पृथिवी ही जगन्माता है । भूपिण्डस्थ अग्नि की पूर्व में मर्त्य-अमृत: भेद से दो अवस्थाएं बतलाई गई हैं ॥ मर्त्य अन्नादाग्नि भूत है, अमृत प्राणाग्नि रस है । यही रसाग्नि ऊपर जाता हुआ उख्य नाम से प्रसिद्ध होता है । वाङ्मय वषट्कार के त्रिवृत स्तोम पर्य्यन्त यह साग्नि धनभाव से रहता है, यही घनाग्नि श्रग्नि कहलाता है । पञ्चदशस्तोम पर्य्यन्त वितत होकर यही तरलावस्था में परिणत होजाता है । इसी तरलाग्नि को वायु कहा जाता है । आगे जाकर वितत होता हुआ यह अग्नि वाष्पावस्था में परिणत हो जाता है । इसकी स्थिति सप्तदशस्तोम पर है । विरलावस्था-पन्न इसी अग्नि को श्रादित्य कहा जाता है । त्रयस्त्रिशस्तोमावच्छिन्न वषट्कार के अर्द्ध भाग में अमृताग्नि का साम्राज्य है एवं अर्द्धभाग में सोम प्रतिष्ठित है । १६ पर्यन्त ग्रग्नि है, ३३ पर्य्यन्त सोम है, सत्रहवां स्थान इसका केन्द्र है । यही ग्राहवनीय है । इसमें ऊर्ध्वस्थित सोम की ग्राहुति होती है । इसी सोमाहुति के कारण " प्रायते यत्र सोमः " के अनुसार यह सप्तदशस्तोमावछिन्न श्रादित्याग्नि ग्राहवनीय कहलाता है । श्रादित्याग्नि दाहक है, सोम दाह्य है । दाह्य सोमहुति से दाहक अग्नि प्रज्वलित हो जाता है | प्रज्व-लित होकर यह एकविशस्तोम पर्य्यन्त व्याप्त होजाता है । इस प्रकार १५ से १७ पर्य्यन्त मूलरूप से प्रति-ष्ठित रहने वाले इस श्रादित्याग्नि का २१ स्तोम पर्यन्त वितान होजाता है । अग्नि पृथिवी - लोक का अधिष्ठाता माना जाता है इस सामान्य परिभाषा के अनुसार भूपृष्ठ से प्रारम्भ कर २१ स्तोमावच्छिन्न इस आग्नेय प्रदेश को हम यज्ञिया - पृथिवी मानने के लिए तय्यार हैं । अग्नित्रय को अपने गर्भ में प्रति-ठित रखने वाली सूर्य्यानुगता यह महापृथिवी ही " प्रदिति " है । ग्रग्नि की इन्हीं तीन रसावस्थाओंों का निरूपण करती हुई वाजिश्रुति कहती है-" आपो वाऽर्कः । तद्यदपां शर श्रासीत्, तत्समहन्यत । सा पृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः । स त्रेधात्मानं व्याकुरुत - आदित्यं तृतीयं वायुं तृतीयम् । स एष प्राण: ( प्राणाग्निः - श्रमृ-ताग्निः ) त्रेधा विहितः " ( शत ० १० | ६ | ६ | २ ) । [ २७६ ]