Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 301–310
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 301–310
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श्राद्धविज्ञान प्रथम दण्ड पार्थिव वषट्कार परिलेख: -पार्थिववषट्कारः सूर्य: त्र.वि. हृदयम् सजापति प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् जिस स्थान पर बेदावच्छिन्न सौर सम्वत्सराग्नि एव विस्रस्त पार्थिव उख्याग्नि का समन्वय होता है वही प्रदेश विराट् -पुरुष की प्राधार भूमि है । सुप्रसिद्ध भूपिण्ड ही भूमि हैं । पृथिवो इसी भूपिण्ड के ग्राधार पर ही प्रतिष्ठित है । दूसरे शब्दों में पृथिवी के केन्द्र में भूपिण्ड प्रतिष्ठित है । इसी भूपिण्ड का प्राणाग्नि रसरूप से बाहर निकल कर अपना मण्डल बनाता है । वाक् आपः श्रग्नि का समुच्चित रूप ही भूपिण्ड है । इन तीनो शुक्रों के आधार पर क्रमशः द्यौ - गौ- वाक् नामक पार्थिव मनोताओं का उदय होता है । केन्द्रस्थ भाग हृदय कहलाता है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र की ममष्टि ही हृदय प्रजापति है । इसी हृदय प्रजापति से ३३ ग्रहण पर्यन्त ६-१५ - २१ २६ - ३३ इस क्रम स पाँच प्रधान स्तोम हो जाते हैं । यह पञ्चस्तोमात्मक वाङ्मण्डल कहलाता है । जिस प्रकार ग्रन्तर्मण्डलरूपी भूपिण्ड का निश्चित केन्द्र होता है । इसी प्रकार इस बहिर्मण्डल का भी एक स्वतन्त्र केन्द्र होता है वह स्थान १७ वां अहर्गण माना गया है । यहोम्थान सप्तदश-प्रजापति, उद्गीथ प्रजापति इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । यही छठा स्तोम है । इसलिए इन्ही ः स्तोमों के कारण यह वाङ्मण्डल " वषट्कार " कहलाया है ।
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न घनावस्थापन्न अग्नि की घनता में तारतम्य है । इसी तारतम्य से इसकी अवान्तर आठ अवस्थाएँ हो जाती हैं । तरलावस्थापन्न रुद्रमूर्ति वायु की अवान्तर ११ अवस्थाएँ ही ११ रुद्र हैं । विरलावस्थापन्न श्रादित्याग्नि की अवान्तर १२ अवस्थाएँ ही १२ श्रादित्य हैं । इस प्रकार अग्निप्रमुख प्राठ वसु, वायु प्रमुख ग्यारह रुद्र, इन्द्रज्येष्ठ १२ श्रादित्य भेद से ३१ प्राण देवता हो जाते हैं । त्रिवृत् - पञ्चदश, पञ्चद्वश - एकविंश, इन दो सन्धियों में रहने वाले दो प्राण अश्विनी नाम से प्रसिद्ध हैं । वही अग्नि पहले अग्नि - वायु - श्रादित्य, इन तीन स्वरूपों में परिणत होता है । अनन्तर इसीकी अवान्तर ३३ अवस्थाएँ हो जाती हैं । ये ही ३३ यज्ञिय देवता हैं । इन्हीं को लक्ष्य में रख कर यजुः - श्रुति कहती है-इति स्तुतासो असा रिशादशो ये स्थ त्रयश्च त्रिशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः || ( ऋक् सं ० ८ | ३० | २ ) सम्पूर्ण देवता एक मात्र अग्नि के ही विवर्त हैं -- " अग्निः सर्वा देवता: " - " श्रग्निपुरोगाः सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् ” । उक्त तीनों अग्नियों में त्रिवृदवच्छिन्न घनाग्नि गार्हपत्याग्नि है, यह एकाकी है । एक-विंशोऽवच्छिन्न श्रादित्याग्नि आहवनीयाग्नि है यह भी एकाकी है । मध्य के तरलाग्नि में ग्राठ नाक्षत्रिक सर्पप्राण प्रविष्ट रहते हैं । इन नाक्षत्रिक धिष्ण्य प्राणों के समावेश से यह श्रान्तरिक्ष्य अग्नि ग्रष्टकल बन जाता है । इस यज्ञिय क्रम से १ - गार्हपत्य ८ धिष्ण्य, १ आहवनीय, इस प्रकार पार्थिव अग्नि दशकल बन जाता है । यही दशाक्षर विराट् छन्द के अनुसार रुद्रमूर्ति विराट् भगवान् हैं, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होनेवाला है । जिस प्रकार श्राग्नेय लोक पृथिवी कहलाता है, एवमेव वायव्यलोक अन्तरिक्ष एवं श्रादित्यलोक द्य ु नाम से प्रसिद्ध है । इस परिभाषा के अनुसार एक ही अग्नि की व्याप्ति के कारण जहां ६-१५-२१ स्तोमयुक्त महाप्रदेश को हमने महापृथिवी कहा था, एवमेव इस महापृथिवी के गर्भ में प्रति-ष्ठित ε – १५–२१, इन तीनों स्तोम प्रदेशों को क्रमशः अग्नि वायु - आदित्य द्वारा शासित होने के कारण क्रमशः पृथिवी - प्रन्तरिक्ष - यौ, इन नामों से व्यवहृत कर सकते हैं । दूसरे शब्दों में त्रिवृत्स्तोमा -वच्छिन्न घनाग्नि प्रदेश महा - पृथिवी के गर्भ में रहने वाला पृथिवीलोक है, पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न तर-लाग्नि ( वायु ) प्रदेश महापृथिवी के गर्भ में रहने वाला अन्तरिक्षलोक है, एवं एकविंशस्तोमावच्छिन्न विर-लाग्नि ( प्रादित्य- ) प्रदेश महापृथिवी के गर्भ में रहने वाला द्युलोक है । इस प्रकार महापृथिवीरूपा प्रदिति के गर्भ में पृ ० प्र ० द्यौ, इन तीनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । विज्ञानभाषा में पृथिवी को माता कहा जाता है, द्यौ को पिता कहा जाता है -- " द्यौष्पितः पृथिवि मातरध्र गग्ने ० " ( ऋक् सं ० ६ । ५१।५ ) । इस परिभाषा के अनुसार अदितिरूपा महापृथिवी त्रिवृत्स्तोमावच्छेदेन पृथिवी स्थानीया बनती हुई माता है, एकविशस्तोमावच्छेदेनद्य स्थानीया होती हुई पिता है । अदिति के इसी स्वरूपविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं—
अदित्द्यिौरदितिरन्तरिक्षमादितिर्माता स पिता स पुत्रः ।
विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना प्रदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥१ ॥
[ २७७ ] ( ऋक् सं ० १।६ ९ ।१६ )
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अदितिर्द्यावापृथिवी ऋतं महदिन्द्राविष्णू मरुतः स्वबृहत् । प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् देवाँ प्रादित्याँ प्रवसे हवामहे वसून्द्रन्त्सवितारं सुदंससम् ॥ २ ॥ - ऋक् सं ०१०।६६।४
वसु - रुद्र - सविता - ग्रग्नि- वायु - प्रादित्य, आदि सभी देवता यहीं प्रतिष्ठित हैं, इसी के पुत्र हैं । जैसा कि अभियुक्त कहते हैं-अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिन्दम्! श्रदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परन्तप! वाल्मीकिरामा ० इन सब देवताओं का स्वरूपधर्म आगे की पितृदेवता स्वरूपविज्ञानोपनिषत् में बतलाया जाने वाला है । प्रकृत में केवल यही जान लेना पर्य्याप्त होगा कि भूपृष्ठ से संलग्न वषट्कार के एकविंश-स्तोम पर्य्यन्त व्याप्त महापृथिवी का सूर्य्याभिमुख, अतएव प्रकाशित, त्रैलोक्यात्मक अर्द्ध भाग ही प्रदिति पृथिवी है । स्तोम सम्बन्ध से ही इस महापृथिवीरूपा अदिति त्रिलोकी, किंवा उख्या त्रिलोकी को " स्तोम्य-त्रिलोकी " कहा जाता है । ' या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी " ( कठ ०६।७ ) के अनुसार इस का प्रारणाग्नि के साथ सम्बन्ध है, यह देवतामयी है । इस के सम्बन्ध में इतना और ध्यान रखना चाहिए कि, सौर सम्वत्सर प्राण के ग्रागमन से ही इसका स्वरूप निष्पन्न होता है, जैसा कि पूर्व के श्रक्य महाव्रत - उक्थ्य-प्रकरण में बतलाया जा चुका है, सौर तेज सावित्री रूप से भूपिण्ड पर आता है । भूपिण्ड के दोनों प्रान्तों को काटता हुआ वह आगे निकल जाता है । आगे जा कर भूच्छायारूप राहु का शिरच्छेद करता हुआ यह सावित्र सौर प्रकाशः पुनः मण्डलरूप में परिणत हो जाता है । जितना सा सौर प्रकाश भूपृष्ठ से संलग्न रहता है, वह सत्य भाव के कारण वापस लौटता हुआ, गो पृथिवी से सम्बन्ध होने के कारण गायत्री नाम से प्रसिद्ध होता है । इसी को अश्व कहा जाता है— ( देखिये ऐ ० ब्रा ० ६ | ५ ) | जैसा आकार भू के सूर्य्य विरूद्ध दिक् में प्रतिष्ठित भूच्छाया का है, ठीक वैसा ही आकार इस अश्व का है । यही ज्योति -म्म सौर अश्व किंवा ज्योतिर्म्मया गायत्री प्रदिति की प्रतिष्ठा है । अदिति सहचारिणी तमोमयी श्रर्द्ध-भागात्मिक वषट्कार- पृथिवी दिति पृथिवी है । यही असुरों की ग्रावास भूमि है । दोनों का परस्पर में घनिष्ठ सम्बन्ध है । " देवेभ्यश्च जगत् सर्वम् " ( यजुः ३ २०१ ) के अनुसार अदितिमय देवता एवं चकार से परिगृहीत दितिगर्भ में प्रतिष्ठित असुर ही स्तौम्य त्रैलोक्य में रहने वाली प्रजा के आरम्भक बनते हैं । इन दोनों में से त्रैलोक्य का विकास ( देवता के सम्बन्ध से ) केवल अदिति पृथिवी में ही होता है । इसी पार्थिव विवर्त्त को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" इयं यं पृथिव्यदितिः, सेयं देवानां पत्नी " - शत ० १।३।१।४ " तिस्रो वा इमाः पृथिव्यः । इयमहैका, द्वोऽस्याः परे " ( शत ० ५ । १ । ५।२१ ) * भूपिण्ड एक पृथिवी है, स्तोमत्रययुक्ता महापृथिवी दूसरी पृथिवी है । इसी के गर्भ में प्रतिष्ठित त्रिवृत्स्तोमस्थानीया तीसरी पृथिवी है । इन तीनों में " इयम हैका " के अनुसार एक का भूपिण्ड से सम्बन्ध है, शेष दोनों का परस्थानरूप महिमामण्डल से सम्बन्ध है, यही तात्पर्य है । [ २७८ ]
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महापृथिवीअमृतम् श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् " अश्वा ( अश्वरूपा ) ह वा ऽइयं भूत्वा मनुमुवाह " ( शत ० १४। १ । ३।२५ ) " इयं वे देव्यदितिविश्वरूपी " ( तं ० ब्रा ० १।७।६।७ ) “ तस्या एतत् परिमितं रूपं यदन्तर्वेदि ( भूपिण्ड: ) अथैष भूमाऽपरिमितो यो * बहिर्वेदिः ( महापृथिवी ) ( ऐ ०८।५ ) । " गायत्री वाऽइयं पृथिवी " ( ४ । ३ । ४ । ) | " पृथिव्यामि ( पृथिवी - अन्तरिक्षं - द्यौरिमे त्रयो ) लोकाः प्रतिष्ठिताः " ( जै ० उ ० १।१०।२ ) । भू — विवर्त्त के सम्बन्ध से अब तक जो कुछ कहा गया है, वह आगे के परिलेखों से सर्वथा बुद्धि-ग्राह्य वन जाता है | [ ४८ [ १ – ब्रह्मा ( प्राणः ) — अक्षरब्रह्मा २ – विष्णुः ( प्रापः ) - अक्षर विष्णुः ३३ ३ – सोमः ( अन्नम् ) – अक्षरसोमः - श्रश्वत्थाय नमो नमः ४ – इन्द्रः ( वाक् ) – प्रक्षरेन्द्रः २१ पिण्डः ५ - प्रग्निः ( अन्नादः ) - अक्षराग्निः --0 ( ५ – अग्नि: ( अन्नादः ) - क्षरग्निः मृत्युः भूषिडः अन्तर्यामी ४ - सोमः. ( अन्नम् ) —क्षरसोम. - अग्रत, शिवरूपाय ३ – इन्द्रः ( वाक् ) —क्षरइन्द्रः २ – विष्णुः ( आप: ) - क्षरविष्णुः ( मध्यतो विष्णुरूपिणे ) १ – ब्रह्मा ( प्राणः ) — क्षरब्रह्मा ( मूलतो ब्रह्मरूपाय ) नित्ययज्ञ में भूपिण्ड हविर्यज्ञ की वेदि है, इसी को यज्ञभाषा में अन्तर्वेदि कहा जाता है, एवं २१ स्तोमावच्छिन्ना महापृथिवी सोमयज्ञ की प्रतिष्ठारूपा महावेदि है । इसे ही बहिर्मण्डलात्मिका होने से ' बहिर्वेदि ' कहा जाता है । महापृथिवी के इसी याज्ञिक रूप के आधार पर - " इयं वै वेदिः " ( शत०-७।३।१।१५ ) । “ एताबती वै पृथिवी, यावती वेदिः " ( तै ० ब्रा ० ३ | २ || १२ ) - " तस्मादाहुर्यावती वेदितवती पृथिवी इति " ( शत ० १।२।५।७ ) " वेदिवें परोऽन्तः पृथिव्या: " ( तै ० ३ || ५ | ५ ) इत्यादि निगमवचन प्रतिष्ठित हैं । [ २७६ ] विवत्तंम् – भू
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४८ वाकुसाहस्री श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् इमे लोकाः इमे देवा: इमे वेदा: इमे स्तोमा: ४- श्रापः--चन्द्रमाः -ब्रह्मवेद: -- त्रिणव- त्रयस्त्रिशस्तोमी- २७-३३ ३- द्यौः - श्रादित्यः-- सामवेदः - - एकविंश स्तोमः – २१ २ - अन्तरिक्षम्--वायु: -- यजुर्वेदः --- पञ्चदशस्तोमः — १५ १- पृथिवी-अग्निः ऋग्वेदः -- त्रिवृतस्तोमः -- ६ इमे लोकाः - लोकसाहस्री इमे वेदा: - वेदसाहस्री “ प्रथो वागिति ब्रूयात् " -- वाक्साहस्री - ( ४८ स्तोमः ) पूर्व के भौम विवर्त - निरूपण से यह स्पष्ट हो जाता है कि, पृथिवी भिन्न वस्तु है एवं भूपिण्ड भिन्न वस्तु है । भूपिण्ड - भूतप्रधान है, पृथिवीमण्डल देवप्रधान है । भूतमय भूपिण्ड सर्वभूतान्तरामा का अन्नाद - प्रकृति से सम्बन्ध है, अन्नादतत्त्व ब्रह्मसत्य से सम्बन्ध रखता है । अतएव ईश्वरीय ग्रात्मसंस्था -क्रम में हम इसे ब्रह्मसत्यात्मा किंवा भूतात्मा कहेंगे । देवता-मयी पृथिवी का प्राणात्मक उख्याग्नि से सम्बन्ध है । प्राणतत्त्व ही देवता है । इसका विकास - अदिति पृथिवीस्वरूप - समर्पक एकविंशस्तोम पर्य्यन्त है । इस प्रकार २१ पर्य्यन्त व्याप्त, अग्नि - वायु - आदित्या-त्मक इस प्राणाग्नि को हम प्राणात्मा किंवा देवसत्यात्मा नाम से व्यवहृत करेंगे । इसी देवसत्य का नाम विराट् प्रजापति है, यही ईश्वर । स्मरण कीजिए अश्वत्थवृक्ष की पञ्चपुण्डीरा बल्शा का । ईश्वर को साक्षी सुपर्ण - सर्वभूतान्तरात्मा, इत्यादि नामों से व्यवहृत किया जाता है । गुहानिहित विज्ञान रहस्य का प्रसादभाषा में निरूपण करते हुए कहा जाता है कि, ' एक ही वृक्ष पर सुनहरे पक्ष ( पंख - पर ) वाले जोड़ले पक्षो बैठे हैं । इन दोनों में एक पक्षी उस वृक्ष का फल खा रहा है, एक पक्षी फल खाने वाले की चौकसी कर रहा है । ' इन दोनों पक्षियों का एक ही वृक्ष में प्रतिष्ठित रहना केवल अध्यात्मसंस्था की अपेक्षा से ही उपपन्न हो सकता है । पूर्वप्रतिपादित चिदात्मा- प्रत्यगात्मा - शारीरकात्मा, इन तीनों में व्यापक षोडशी चिदात्मा है । वह जन्मातीत बतलाया गया है । बाकी बचा हुआ प्रत्यगात्मा उस व्यापक काही अंश होने से चिदंश है । यद्यपि यह व्यापक षोडशी की अपेक्षा परिच्छिन्न है, व्याप्य है, तथापि पार्थिव चतुर्दशविध भूत सर्ग में एक रूप से व्याप्त होने के कारण इसे सर्वभूतान्तरात्मा कह दिया जाता है | जीवात्मा नाम से प्रसिद्ध शारीरकात्मा ( चिदाभास ) इसी का अंश है, जैसा कि वहीं स्पष्ट कर [ २८० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड भूविवर्त्तम् परिलेख -अक्षरब्रह्मा, प्राण: अक्षरविष्णुः ३३ अक्षरेन्द्रः २१. अग्नीषोमों भूवायुः अग्नीषोमी इन्द्रः विष्णुः ब्रह्मा सह Fibre अग्नीषोमी समूष -वरादः सोमाक्षरगभि प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् माक्षरगर्भितः भूविवर्त के लिए " भूमि, पृथिवी, दिति, प्रदिति मेदिनी, सागराम्बरा, मही, प्रापाढा " इत्यादि अनेक शब्द व्यवहृत हुए हैं । भूपिण्ड में केन्द्र र पिण्ड ये दो भाग हैं । इनमें केन्द्र में ' ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र ' प्रतिष्ठित हैं । स्वयं पिण्ड भूतप्रधान अग्निषोममय है I । इन्हीं ब्रह्मा विष्णु इन्द्र की समष्टि हो हृदय प्रजापति है । इनमें ब्रह्मा एकाकी है, विष्णु के साथ सोम का सम्बन्ध है, इन्द्र के साथ अग्नि का सम्बन्ध है । ब्रह्माक्षर द्यौमय, विष्णुसोमाक्षर गो मय, इन्द्राग्निक्षर वाङ्मय है | भूकेन्द्र से आरम्भ कर ४८ स्तोम पर्यन्त ब्रह्मगर्भित वाक्स्तर केन्द्र से ३३ पर्यन्त विष्णुगर्भित अप्स्तर व भूकेन्द्र से २१ स्तोम पर्य्यन्त इन्द्राग्निगर्भित अग्निस्तर व्याप्त होते हैं । इसी को अन्नादाग्नि मूर्ति भी कहा जाता है । श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपूर ।
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SAX MGNR AND WOW 13 RONNEN III IIIII III II 31 Yo ४१ 32 ४४ ४८ | ३३ २१ ४८ प्रणम्यो ब्रह्मा नगर्भित ग्नि गमितः-" अधोवाक् " विष्णुः इमेलः इन्द्रः इमेवेदाः अलप्रकृतिक अन्नादप्रकृतिका द्यौः बाक् श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत भूविवर्तन परिलेख वायु-पञ्चदशस्त अन्तरिक्षम् यजुर्वेदः अग्निः-त्रिवृत्रस्तोमः पृथिवी ऋग्वेदः उ ) वाक् प्रजापतिः ( चतुस्त्रिंश दिक्सोजः आस्नरसोमः-- आदित्यः-शरस्तम जब त्रिणवस्तोम एकविंशस . आ ब्रह्म सोम: द्यौः सामवेदवी पृथि ख्या इस - अग्निः वाक्प्रकृतिकः : इन्द्र -गर्मितो-वाक् अन्नादाग्नि भूः- म इमेवेदाः स्तोमः अष्टाचत्वारिंश .प: वेद वी पृथि सागराम्बरा विष्णुः सोमगर्भितः-प्रकृतिक अप्प्रकृतिकः अन्न वी सर्वप्रतिष्ठा पृथि प्राणप्रकृतिकः - द्यौर्ब्रह्मा जगती ब्रह्मा स्वः -ब्रूयात् वागिति अथो आपः -भुवः : - लोका हा गौर्विष्णुः इमे -पृथिवी वाक् भूपिण्डः अन्नादाग्नि तदिदं सर्वम् श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपूर । पिण्ड:
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड तमोमयम् नाम ना आसुरमण्डलं दिदिति मण्डल परिलेखः— प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् : भूपरिभ्रमणमार्ग - ज्योति देवमण्डलंनाम भूपरिभ्रमणमार्गावच्छिन्नसम्वत्स रमण्डलं : अन्सुरा : -पृथिवी दिति दिति : -पृथिवी असुरा : -भूमा-छायापथः -: Sanile -: देवा -पृथिवी : अदिति अग्निः ( वसवः ) वायुः ( रुद्राः ) आदित्यः RP १५ आसुरमण्डलं नाम तमोमयम ← अदिति : देवा -पृथिवी -: ( आदित्याः ) भूपरिभ्रमणमार्ग : रमण्डलं देवमण्डलं नाम भूपरिभ्रमण मार्गावच्छांस वस महापृथिवी के गर्भ में प्रतिष्ठित ६-१५-२१ स्तोम प्रदेशों को क्रमशः अग्नि वायु - प्रादित्य द्वारा शामित होने के कारण पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ नामों से व्यवहृत करते हैं । सूर्य्याभिमुख अर्थात् प्रकाशित ज्योतिर्मय भाग अदिति पृथिवी देवमण्डल कहलाता है । अदिति की सहचारिणी अर्द्धभागात्मिकादिति पृथिवी श्रसुरमण्डल कहलाता है ।
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनपत् दिया गया है । इन दोनों में सर्वभूतान्तरात्मा वही सुप्रसिद्ध अग्नित्रयमूत्ति, अदिति त्रैलोक्य में प्रतिष्ठित देवसत्यात्मा है | प्रकारान्तर से देखिए । पूर्व में प्रजापति के महेश्वर - विश्वेवर - उपेश्वर - ईश्वर, ये चार विवर्त बतलाए गए हैं । इसी विभाग को श्रात्मा - ब्रह्म- देवता, भेद से देखिए । श्रात्म - ब्रह्म- देव - विभूतित्रयी इन तीन विभागों का मूलकारण अव्यय - प्रक्षर -क्षरमूर्ति, त्रिपुरुष पुरु-पात्मक प्रमृतात्मा ही है । क्षराक्षरगर्भित ग्रव्ययप्रधान वही आत्मा श्रात्मा है । ग्रव्ययक्षरगर्भित अक्षरप्रधान वही श्रात्मा ब्रह्म है, एवं प्रव्ययाक्षरगर्भित क्षरप्रधान वही आत्मा देवता है । मूल आत्मा ही ब्रह्म और देवभेद से दो प्रधान विभागों में परिणत होता हुआ मीमांस्य बन रहा है । इन दोनों में अव्ययप्रधान ग्रात्मा चिद्धन बनता हुआ चिदात्मा है । शेष दोनों अंशरूप होने से " चिदंश ” हैं । एक चिदात्मा है, दो चिदशात्मा है । ये तीनों ही पुनः दो - दो भागों में विभक्त हैं । इस प्रकार संभूय आत्मविवर्त्त षट्संस्थ बन जाता है । इन ६ विवर्त्ती के प्रधान कारण माया - कला, यादि पूर्वोक्त ४ परिग्रह ही हैं । माया - परिग्रह के सम्बन्ध से विशुद्ध परात्पर ही अंशात्मना ससीम बनता हुआ निष्कल पुरुष है, इसी को हमने पूर्व में महे-श्वर कहा है । कला - परिग्रह के सम्बन्ध से वही पोडशकल बनता हुआ षोडशीपुरुष है । दोनों में पहला विशुद्ध अव्यय है, दूसरा अक्षरक्षरगर्भित अव्ययप्रधान है । यही पहला ग्रात्मविभाग है । यह सर्वव्यापक ( महामायाव्यापक - महा विश्वव्यापक ), प्रतएव खण्डात्म- मर्यादा से सर्वथा वहिष्कृत है । दूसरा है चिदं-शरूप ब्रह्मविवर्त्त । इसके भी दो रूप हैं T । समष्टि इसका पहला रूप है, व्यष्टि इसका दूसरा रूप है । स्वयम्भू से ग्रारम्भ कर भूपिण्ड पर्य्यन्त उस अश्वत्थवृक्ष की एक शाखा मानी गई है । इस सम्पूर्ण शाखा में एकरूप से रहने वाला ग्रवार पारीण ( इस छोर से उस छोर तक रहने वाला ) सम-ष्टिरूप एकात्मक चिदंश ही बल्शेश्वर नाम का पहला ब्रह्मविवर्त है । षोडशीपुरुष सहस्त्रवल्शात्मक महा-विश्व का साक्षी था, यह पञ्चपर्वात्मक बल्शारूप खण्डविश्व का साक्षी है । यही आगे जाकर व्यष्टिरूप में परिणत होता हुग्रा पांच भागों में विभक्त हो जाता है । स्व ० पर ० सू ० च ० भू ०, पाँचों में पृथक् पृथक् साक्षी आत्मा प्रतिष्ठित हैं । पाँचों अपनी संख्या के स्वतन्त्र सञ्चालक हैं । इन पाँचों का साक्षी, पाँचों विभिन्नों में ग्रभिन्नरूप से व्याप्त उक्त वल्शेश्वर प्रतिष्ठित है । परस्पर की अपेक्षा से प्रतिविदूर, श्रतएव असमीपरूप से प्रतिष्ठित ये पांचों उस एक ही के उप ( समीप ) बैठे हुए हैं अतएव इन्हें उपेश्वर कहा जाता है । बल्शेश्वर यद्यपि प्रश्वत्थेश्वर की अपेक्षा चिदंशरूप था परन्तु इन उपेश्वरों की अपेक्षा यह चिदात्मा है, उपेश्वर चिदंशरूप भेद से दो भागों में विभक्त हो जाता है । इन दोनों में बल्शेश्वर विशुद्ध अक्षरमूर्ति है एवं उपेश्वर क्षराव्ययगर्भित अक्षरप्रधान है । इन दोनों का क्रमशः गुरण विकास नाम के दो परिग्रहों से सम्बन्ध है । बत्शेश्वर सगुण सत्यप्रजापति है, उपेश्वर सविकार - यज्ञप्रजापति है । तीसरा है चिदंशरूप देवविवर्त्त । इसके भी साक्षी भोक्ता - रूप से दो विवर्त्त है । ब्रह्मसत्यात्मिका बल्शा के भूरूप अग्रभाग से सम्बन्ध रखने वाले पृथिवी विवर्त से ही इन दोनों का सम्बन्ध है । त्रैलोक्य व्यापक अग्नित्रयमूर्ति देव सत्यात्मा साक्षी है । यह यद्यपि उपेश्वरादि की दृष्टि से चिदंश है, परन्तु जीवसृष्टि को अपने गर्भ में रखने के कारण जीवसृष्टि की अपेक्षा से यह चिदात्मा ही कहा जायगा इसी को भौतिक [ २८१ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् पार्थिव विवर्त में व्याप्त रहने के कारण " सर्वभूतान्तरात्मा " कहा जाता है । चिदात्मरूप सर्वव्यापक ( भीम त्रैलोक्य में व्यापक ) इस सर्वभूतान्तरात्मा के श्रागे जाकर प्रत्यगात्मा, शारीरकात्मा, भेद से दो विवर्त्त हो जाते हैं । त्रैलोक्य में प्रतिष्ठित रहने वाला, केवल पार्थिव विवर्तरूप बाधिभौतिक प्रपञ्च का साक्षी रहने वाला वही चिदात्मा कहलाता है । अध्यात्म - संस्था में प्रविष्ट होकर यही अपने दो रूपधारण कर लेता है । अश्वत्थवृक्ष कर्म - ब्रह्म, भेद से दो भागों में विभक्त है । इनमें ब्रह्माश्वत्थ का सम्बन्ध आधि-भौतिक संस्था से है, एवं कम्मश्वत्थ का सम्बन्ध अध्यात्मसंस्था से है । इसी में फल भोगने के लिए प्राणी को आना पड़ता है । इस फलभोक्ता प्राणी के साथ उसी हृदयस्थान में साक्षीरूप से सर्वप्राणी-समान वही त्रैलोक्य व्यापक साक्षी प्रात्मा सर्वभूतसाधारणापेक्षया एकरूप से किन्तु तत्तच्छरीरोपाधि-भेद से तत्तच्छरीरावच्छिन्न बनता हुआ चिदंश रूप से प्रतिष्ठित होता है । यही प्रत्यगात्मा है । इस प्रकार एक ही कर्म्माश्वत्थ के शाखारूप एक ही शरीर में ( केन्द्र में ), एक ही स्थान पर अभिन्नरूप से प्रतिष्ठित रहते हुए एव ' सयुज ' ( जोड़ले ) नाम से प्रसिद्ध ये दोनों प्रतिष्ठित हो रहे हैं इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं ( एक ) वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥ - मुण्डकोपनिपत्. ३।१।१ । ) इन दोनों चिदशों में प्रत्यगात्मरूप साक्षी चिदंश शरीरोपाधिक बनता हुआ भी, सूर्य्यश्रातपवत् चेत-मारूप से सूर्य्यप्रतिबिम्बस्थानीय सर्वथा विभिन्न जीवात्माओं का समा श्रात्मगत्यधिष्ठाता - सुपर्णात्मा नोपकारक बनता हुआ उस त्रैलोक व्यापक साक्षी से अभिन्न है । अतः इसका, और उसका अभेद मानते हुए दोनों को एक ही तत्त्व मान लिया जाता है । जो चिदात्मा है, वही शरीरोपाधिक, परमार्थतः निरुपाधिक रहता हुग्रा, शरीर दोषों से सर्वथा निर्लिप्त रहता हुआ प्रत्यगात्मा है । इसका उस सविकार यज्ञप्रजापति में अन्तर्भाव है । यही सर्वभूतान्त-रात्मा नाम का पहला देवसत्यात्मा है । दूसरा जीवात्मा इसी का अंशरूप चिदाभास लक्षण शारीरकात्मा है । इसी का अञ्जन परिग्रह से सम्बन्ध है । यही साञ्जन प्रतिशरीर भिन्न प्रत्यगात्मात्मा से नित्य अवि-नाभूत भोक्ता जीवात्मा अपनी अपनी प्रातिस्विक भूतसंस्था का अभिमानी बनता हुआ " भूतात्मा " नाम से प्रसिद्ध है । मधुरूप फल भोगने के कारण ही महर्षि कठ ने " मध्वद " ( मधुरूप फल खाने वाले वाला ) नाम से व्यवहृत किया है । इस मध्वद के साथ इस का ईशिता, अतएव " ईशान " नाम से प्रसिद्ध सर्व-भूतान्तरात्मा प्रमध्वद सदा साथ रहता है । जो जीव स्वान्तिक ( समीपस्थ ) इस ईश को न जानता हुआ अनीश बना रहता है, वह " अनीशया शोचति मुह्यमानः " के अनुसार क्लेशादि में फँसा रहता है, परन्तु जो जीव अपने प्रत्यगात्मरूप इस ईश रूप को पहचान लेता है वह - " श्रमुह्यमानो न शोचति, न शोचति " । य इमं मध्वदं वेद श्रात्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतमव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । ऐतद्वै तत् ॥ ( कठो ० ४।५ ) [ २८२ ]