Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 311–320

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 311–320

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् इन दोनों में सर्वभूतान्तरात्मा नामक देवसत्यात्मा ही ईश्वर है, भूतात्मा नामक देवसत्यात्मा ही ही जीव है । दोनों में ईश्वर विशुद्ध त्रात्मक्षरमूर्ति है, जीव अव्ययाक्षरगभित आत्मक्षरमूर्ति है । यही आत्म विवर्त की तीसरी संस्था है । दोनों ही सुपर्ण नाम से व्यवहृत हुए हैं । सुपर्ण शब्द का भी विचार कीजिए । जिस प्रकार मनुष्य का सौन्दर्य उसके सदाचार पर मवलम्बित है, स्त्री का उत्कर्ष पातिव्रत्य पर निर्भर है, एवमेव पक्षी का सौन्दर्य उसके पक्षों पर प्राश्रित है । पक्ष सम्बन्ध से ही वह पक्षी कहलाया । पक्षों से पक्षी आकाश में विचरण किया करता है । जो पक्षी अपने पक्षों से आकाश में जितना अधिक दूर उड सकता है, वहीं पक्षों की प्रशंसा है, यही पक्षों का सौन्दर्य है । पक्षसौन्दर्य केवल उड़ने से सम्बन्ध रखता है । इतर पक्षियों की अपेक्षा गरुड़ पक्षी अधिक वेग से अधिक दूर तक उड़ सकता है, अतएव इसके पक्ष इतर पक्षियों की अपेक्षा सुष्ठु ( सुन्दर ) माने जाते हैं । गरुड़ पक्षी के इसी पक्ष सौन्दर्य के कारण वैज्ञा-निकों ने इसे " सुपर्ण " ( अच्छे पक्ष वाला ) कहा है । अतएव इसे खगेश्वर कहा गया है । " बीर्य्यवं सुपर गरुत्मान् " ( शत ० १० | २ | ३ | ४ ) | यही स्थिति प्राध्यात्मिक जीवेश्वर की है । पक्षी अधिक से अधिक भू - वायु का तलस्पर्श कर सकता है । परन्तु हमारा यह कर्म्मभोक्ता जीवात्मा तो सुदूर स्थित वि-विध लोकों में जाया करता है । यहाँ तक कि, पृथिवी के २१ अहर्गण पर सूर्य्य है – “ एकविंशो वा इतः ( पृथिवीलोकात् ) प्रादित्यः ( तै ० ब्रा ० १ | ५ | १० | ६ ) वहां तक यह जा सकता है । भला इस से अधिक दूर जाने की किस पक्षी में शक्ति है? जीव के साथ प्रत्यगात्मरूप ईश्वर भी नित्य सम्बन्ध रहता हुआ घटाकाशादिवत् लोकान्तर में घूम रहा है । यही इन दोनों की सुपता है । इसी सुपरसादृश्य से प्राणाचार्यों ने आत्मगति में आरुढ इस प्रेत जीव को " गरुड़ " 8 नाम से व्यवहृत किया है । इसीलिए इन सयुजों को " सुपर्ण " ( अच्छे - शक्तिशाली पक्षों ) वाला पक्षी शब्द से व्यवहृत करना ग्रन्वर्थ बन जाता है । अपिच, सुपर्ण शब्द का दूसरा अर्थ है - सुनहरी पक्ष । अग्नि को हिरण्यरेता कहा जाता है । हिरण्य ही सुपर्ण है । उधर अग्नित्रयमूर्ति को ही हमनें साक्षी कहा है । जीव भी इसी का अंश होता हुग्रा अग्नित्रयमूत्ति ही है । इस हिरण्यअग्नि के सम्बन्ध से भी इसे सुपर्ण ( सुनहरी - आग्नेय - पक्षवाला ) कहना उचित होता है । अपिच, इन दोनों ही पक्षियों का सुपर्णचिति नाम से प्रसिद्ध प्रग्निचिति से सम्बन्ध है । भूपिण्ड से निकलने वाला पार्थिव अग्नि ठीक पक्षी के आकार में परिणत होकर ही २१ स्तोम पन्त वितत रहता है । सौर सम्वत्सररूप ही बन जाता है । इसी रहस्य का वैज्ञानिकों ने सुपर्णाख्यान रूप से निरूपण किया है । पार्थिव अग्नि गायत्री है । वह सुपर्ण पक्षी बनकर ही २१ स्थ सूर्य्य से ऊपर रहने वाले सौम्यगन्धर्व-प्राणों से सुरक्षित पारमेष्ठ्य सोम का अपहरण करती है । इसी आधार पर निम्नलिखित निगमवचन प्रतिष्ठित हैं-" इमे वै लोका गायत्री " ( तां ० ब्रा ० १५ । १०।९ ) । " श्रग्निर्ह वाव राजन् गायत्री मुखम् " ( जं ० उ ० ४८२। ) । * गरुड़रूप प्रेतात्मा शरीर से निकलकर किन किन लोकों में जाता है? वहाँ क्या फल भोगता है? इत्यादि विषयों का निरूपण करने वाला श्रायतीवादात्मक पुराण ही " गरुड़पुराण " नाम से प्रसिद्ध है । मृत प्राणी के द्वादश अहर्गणात्मक प्राशीचकाल में तद्वंशधर इसी का श्रवण करते हैं । [ २८३ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् " यद् गायत्री श्येनो भूत्वा दिवः सोममाहरत् - तेन सा श्येनः " - शत ० ३ | ४ | १ | १२ " तृतीयस्यामितो दिव सोम प्रासीत् । तं गायत्र्याहरत् " – ते ० १ । १ । ३ । १० " इमऽउ लोकाः संवत्सरः " - शत ०८ । १।१।१७ " अग्निर्वाव संवत्सरः " - तां ० द्रा ० १७ १३।१७ उक्त वचनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि, पार्थिव त्रैलोक्य में प्रतिष्ठित गायत्राग्नि, संवत्सर, श्येन आदितत्त्व पेक्षा भिन्न भिन्न नामों से व्यवहृत होते हुए भी अग्नित्त्वेन अभिन्नार्थ के ही बोधक हैं । इस पञ्चचितिक अग्नित्रयी का ही नाम ईश्वर, किंवा देवसत्यात्मा है, यही संवत्सर प्रजापतिरूप महा सुपर्ण हैं । इसी का श्रंशरूप जीव क्षुद्र सुपर्ण है । सुपर्ण की इसी सुपर्णता का दिग्दर्शन कराती हुई ब्राह्मणश्रुति कहती है— ईश्वरः – ' अथ ह वा एष महासुपर्ण एव यत् सम्वत्सरः । तस्य यत् पुरस्ताद्विषुवतः षण्मासानुपयन्ति सोऽन्यतरः पक्षः । अथ यान् षडुपरिष्टात् सोऽन्यतरः । श्रात्मा विषुवान् ॥ ” – शत ० १२ २।३।७ जीवः - " पुरुषः सुपर्णः ”" शत ०७ । ४ । २ । ४ हा, इस सम्बन्ध में इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि, यदि सुपर्ण शब्द का " पञ्चचितिक अग्निमय पुरुष सुपर्ण है " यह अर्थ अभिप्रेत है, तब तो श्रात्मगति से कोई सम्बन्ध न रखने वाला स्थिर-स्वरूप सम्वत्सरात्मक त्रैलोक्य व्यापक चिदात्मरूप ईश्वर ही सुपर्ण शब्द से व्यवहृत किया जा सकता है । यदि सुपर्णका - " लोकान्तर में पक्षों से गमन करने वाला सुन्दर पक्षी सुपर्ण है " यह अर्थ है, तो उस दशा में चिदंशरूप शरीरोपाधिक प्रत्यगात्मेश्वर का साक्षी सुपर्ण शब्द से ग्रहण करना पड़ेगा । " द्वा सुपर्णा ० " इत्यादि में सुपर्ण शब्द से इसी ग्राध्यात्मिक सुबर्णयुग्म का ग्रहण अपेक्षित है । कारण – दोनों सुपर्णो का समान ( एक ) वृक्ष में अवस्थान, दोनों का सयुग्भाव अध्यात्मसंस्था में ही संभव हो सकता है । अधिदैवतसंस्था का अध्यक्ष सम्वत्सरात्मक चिदात्मक महासुपर्ण भौतिक विश्व का समानरूप से साक्षी होता हुआ भी, अपने इस व्यापकरूप से वह अध्यात्मसंस्था का साक्षी नहीं माना जा सकता । साथ ही में उस व्यापक का इस परिच्छिन्न चिदाभास के साथ समान वृक्ष में प्रवस्थान, एवं सयुग्भाव भी उत्पन्न नहीं हो सकता । इस प्रकार द्विकल ग्रात्मा, द्विकल ब्रह्मा, द्विकल देव, इन तीनों युग्मों में आत्म विवर्त्त समाप्त है । उत्तर - उत्तर का युग्म पूर्व - पूर्व के ग्राधार पर प्रतिष्ठित है । इस क्रम से देवसत्ययुग्म में शेष दोनो आत्म - ब्रह्मयुग्मों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । देवसत्यात्म - परिज्ञान से सब कुछ विज्ञात है । देव सत्यात्मयुग्म त्रिकल है, इसी आधार पर " त्रिःसत्या वे देव: " यह अनुगम प्रतिष्ठित है । [ २८४ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् अपरिच्छिन्न का परिच्छिन्न बन जाना ही मृत्युबन्धन है, यही भोग्य भाव है । इस सीमा भाव के तारतम्य से विश्व विवर्त में ( महामाया के गर्भ में प्रतिष्ठित उक्त तीनों विवत्त परिच्छिन्न - मृत्यु बन्धन को हम भोग्य कह सकते हैं । इस दृष्टि से विशुद्ध भोक्तृलक्षण ग्रात्मा केवल विश्वातीत अखण्ड परात्पर है । मही ब्राह्मी स्थिति है, यही ब्राह्मी उपनिषत् है । इस के गर्भ में प्रविष्ट सभी प्रात्मविवर्त्त परस्पर की अपेक्षा भोक्ता भी हैं, योग्य भी है । साक्षी भी है, भोक्ता भी हैं । पहले आत्मयुग्म को ही लीजिए, ग्रवान्तर युग्मों की अपेक्षा भोक्ता बनता हुआ भी षोडशी-गर्भित महेश्वर परात्परढष्टा भोग्य है । परात्पर चिदात्मा है, पुरुष चिदंश है । परात्पर साक्षी है, पुरुष भोक्ता है । परात्पर प्रतिष्ठा है, पुरुष प्रतिष्ठित है । परात्पर अन्नाद है, पुरुष अन्न है । स्वयं श्रात्म-विवर्त्त में निष्कल महेश्वर चिदात्मा है, साक्षी है । षोडशी चिदंश है, भोक्ता है । इस की अपेक्षा ब्रह्मस-त्यात्मविवर्त्त भोक्ता है, आत्मयुग्म साक्षी है । स्वयं ब्रह्मसत्यविवर्त्त में बल्शेश्वर साक्षी है, उपेश्वर भोक्ता है । इस की अपेक्षा देवसत्यात्मविवर्त्त भोक्ता है, ब्रह्मसत्यात्मयुग्म साक्षी है । स्वयं देवसत्यात्मविवर्त्त में त्रैलोक्येश्वर साक्षी है, जीवप्रजापति भोक्ता है । सुपर्ण केवल इसी अन्तिम संस्था का नाम है । कारण, आत्मगति के साथ इस देवसत्यात्मविवर्त्त का ही सम्बन्ध है । एक और चमत्कार देखिए । सभी आत्मसंस्थानों में पञ्चवकल अव्यय की प्रधानता है - " मत्त परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय " ( गीता ० ७ ७ ), अव्यय भी मन: -चामत्कारिक - पुरुषात्मा प्राणवाङ्मय सृष्टिसाक्षी है । ग्रव्यय का ज्ञानघन मन, क्रियामन प्राण, अर्थरूप वाक्तत्व ही षोडशी संस्था में क्रमशः अव्यय - अक्षर - क्षर रूप से विकसित होता है | स्वयं ग्रव्यय मनःप्रधान होता हुआ ज्ञानप्रधान है । ग्रक्षर प्राणप्रधान होता हुआ क्रियाप्रधान है । स्वयं क्षर वाक्प्रधान बनता हुआ ग्रर्थप्रधान है । समष्टिरूप से स्वयं षोडशी अव्ययप्रधान है, ब्रह्म-सत्यात्मयुग्म अक्षरप्रधान है, देवसत्यात्मयुग्म क्षरप्रधान है । प्रत्येक में पुनः मनः प्रारणवाक् प्रधान, श्रतएव ज्ञानक्रियामूर्त्ति अव्यय - प्रक्षर - क्षर का विकास है । उदाहरण के लिए आत्मयुग्म को ही लीजिए । इसमें भी पहले विशुद्ध पञ्चकल ग्रव्यय नामक महेश्वर को लीजिए । इस की पाँच कलाओं में से आनन्द विज्ञान का एक विभाग है । यह विभाग ज्ञानप्रधान बनता हुआ अव्ययप्रधान है । प्राणवाक् का स्वतन्त्र विभाग है । यह विभाग अर्थप्रधान बनता हुआ क्षरप्रधान है । मध्यस्थ उभयात्मक मन का स्वतन्त्र विभाग है । यह उभयात्मक वनता हुआ सेतुस्थानीय बनता हुआ अक्षरप्रधान है । केवल सृष्टिसाक्षी त्रिकल ग्रव्यय में मन ज्ञानघन बनता हुआ ग्रव्ययप्रधान, प्रारण क्रियाधन बनता हुआ अक्षरप्रधान, वाक्त्रर्थवना बनती क्षरप्रधाना है । पोडशी संस्था में पञ्चकल ग्रव्यय ज्ञानप्रधान बनता हुआ मनोमय, पञ्चकल ग्रक्षर क्रिया-प्रधान बनता हुआ प्राणमय, एवं पञ्चकल क्षर - प्रर्थप्रधान बनता हुआ वाङ्मय है | ब्रह्मसत्यात्मरूप दूसरे युग्म का विचार कीजिए । इस में भी पहले विशुद्ध अक्षरात्मक प्रवारपारीण नकारात्मक वल्शेश्वर पर दृष्टि डालिए । प्रणवस्थानीय, पार्थिव संस्था का अनुग्राहक विशुद्ध अक्षरमूर्ति वही बल्शेश्वर मकारात्मक, अतएव वाक्प्रधान क्षर है । उद्गीथस्थानीय, सौरसंस्था का अनुग्राहक विशुद्ध अक्षरमूत्ति वही उकारात्मक बल्शेश्वर प्राणप्रधान ग्रक्षर है, एवं ओंकारस्थानीय स्वायम्भुव संस्था का अनुग्राहक विशुद्ध अक्षरमूर्ति वही प्रकारात्मक बत्शेश्वर मनःप्रधान अव्यय है । पर ( ग्रव्यय ), परम [ २८५ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ( अक्षर ) अवर ( क्षर ) रूप नकारात्मक विशुद्ध ही पारोवरण विशुद्ध अक्षरमूर्ति वल्शेश्वर नामक ब्रह्मसत्यात्मा है । उपेश्वरसंस्था में से प्रत्येक का विचार कीजिए । पहले स्वयम्भू को लीजिए । स्वयम्भू के वेद - सूत्र - नियति - भेद से तीन मनोता माने गए हैं वेदमृत्ति वही स्वयम्भू उपलब्धिरूप ज्ञान का प्रवर्तक बनता हुआ वेदावच्छेद से मनोमय बनता हुग्रा अव्ययप्रधान है । सम्बन्धसूत्रावच्छेदेन वही प्राणमय बनता हुआ ग्रक्षरप्रधान है । नियति - सम्बन्ध से वही वाङ्मय बनता हुआ आत्मक्षरप्रधान है । इन तीनों विवर्त्तो का स्वरूप पूर्व की प्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् में बतलाया जा चुका है । इसी प्रकार परमेष्ठी नाम के उपेश्वर में इडा ( मनोमय अव्यय ), ऊर्क ( प्राणमय ग्रक्षर ), भोग ( वाङ्मय क्षर ) इस रूप से, सूर्य्यो-पेश्वर में ज्योति ( वाङ्मय क्षर ), गौ ( प्राणमयग्रक्षर ), श्रायु ( मनोमय ग्रव्यय ) इस रूप से, चन्द्रो-पेश्वर में रेतः ( वाङ्मय क्षर ), श्रद्धा ( प्राणमय अक्षर ), यश ( मनोमय श्रव्यय ) इस रूप से, एवं भूण्डि-रूप उपेश्वर में वाक् ( वाङ्मय क्षर गौ ( प्राणमय अक्षर ), द्यौः ( मनोमय श्रव्यय ), इस रूप से तीनों पुरुषों का प्रवस्थान सिद्ध हो जाता है! सर्वान्त में देवसत्यात्मरूप तीसरे विवर्त्त का विचार कीजिए । इसमें भी साक्षीरूप प्रत्यगात्मविवर्त्त पर पहले दृष्टि डालिए । इसकी वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ, ये तीन कलाएँ हैं, जैसा कि अनुपद में ही स्पष्ट होने वाला है | इनमें अर्थप्रधान वैश्वानर वाङ्मय क्षर की विकास भूमि है । क्रियाप्रधान हिरण्य-गर्भ प्राणमय अक्षर से ग्रनुगृहीत है, एवं सर्वज्ञ मनोमय ग्रन्यय के अनुग्रह से युक्त है । इसी प्रकार भोक्ता ( जीवसुपर्णं ) देवसत्यात्मा की वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ, ये तीनों कलाएँ क्रमशः क्षर - ग्रक्षर - अव्यय से सम्बन्ध रखती हैं । यह है स्थूल निदर्शन । यदि दशाक्रमानुसार इस त्रिपुरुष की व्याप्ति के सूक्ष्म दर्शन किए जाते हैं, तो ग्रन्ततः त्रिपुरुष पर विश्राम करते हुए, इसके द्वारा पञ्चकलपुरुष, तद्द्द्वारा निष्कल पुरुष, सर्वान्त में उसी अखण्ड परात्पर का ग्राश्रय लेना हड़ता है - ' ऐतदात्म्यमिदं सर्वम् " । उक्त विषय का निम्नलिखित तालिकाओं से स्पष्टीकरण हो जाता है । १ - श्रात्मन्वीविवर्त्त परात्परे मायापरिग्रहसम्बन्धात् ससीमः सन् मायाधिको निष्कलः पुरुषोऽव्ययः १-. २-अव्यये कला ( योगमाया, परिग्रहसम्बन्धात् योगमायोपाधिकः षोडशकलो महेश्वरः १ महेश्वरप्रजापतिः अमृतात्मयुग्म ( ग्रात्मविवर्त्त ) * इम विषय का का विशद दिग्दर्शन ईशोपनिषत् विज्ञानभाष्य प्रथमखण्ड के पुरुषात्मा धिकरणा-न्तर्गत " मनः प्राणवाङ्मय अव्यय की व्यापकता " नाम के प्रकरण में देखना चाहिए | [ २८६ ]

पृष्ठ 315

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड २-पोडशीपुरुषो गुणपरिग्रहयोगात् _पञ्चपुण्डीरात्मको बल्शेश्वरः सत्यात्मा - * -सत्यात्मनि विकारपरिग्रहयोगात् २ -२ स्व ० पर ० सू ० चन्द्र ० भूः - इत्येताः -} जिससे . विश्वेश्वरप्रजापतिः ३ - उपेश्वर प्रजापतयः प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् २ ब्रह्मसत्यात्मयुग्म ( ब्रह्मविर्त्त ) - पृथक् पृथक् पञ्चोपेश्वरा यज्ञात्मानः ( सर्वहुतयज्ञमूत्तिः - वैश्वानरहिरण्यगर्म-- ईश्वरः • सर्वज्ञकृतात्मा प्रत्यगात्मा साक्षी सुपर्णः ४ ३ ' विश्वदानियज्ञमूत्तिः - वे ० तेजस प्राज्ञ -> ईश्वर प्रजापतिः - देव सत्यात्मयुग्म ( देवविवर्त ) २-कृतात्मा आवरणपरिग्रहयोगात् शारीरकात्मा — जीवः भोक्ता सुपर्णः २- चिदात्म - चिदंशविवर्त-१ - सर्व बलविशिष्टरस मूत्तिरमायी - अखण्ड परात्परः——-- चिदात्मा - विशुद्ध आत्मा १– २- षोडशकलो महामायी विश्वव्यापको महेश्वरः--- चिदंश: - - श्रात्मन्वी १ - मायामात्रो निष्कलो विशुद्धोऽव्ययपुरुपः-- चिदात्मा — ग्रात्मन्त्री ३– २ _ २- ग्रव्ययक्षराक्षरकृतरूपः षोडशकल स्त्रिपुरुषः पुरुषः- --- चिदंशः प्रात्मन्वी ( १ - पोडशकलस्त्रिपुरुषः पुरुषो महेश्वरः - * · ( २ - उपेश्वर - विश्वेश्वर - कृतरूपो ब्रह्मसत्यात्मा---- चिदात्मा - प्रात्मन्वी - चिदंश: - प्रात्मन्वी [ २८७ ]

पृष्ठ 316

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ४– ५. ' १ - प्रवारपारीणो बल्शेश्वरो ब्रह्मसत्यात्मा-प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् - चिदात्मा - श्रात्मन्वी २ - पृथक् संस्था स्व ० प ० सू ० च ० भू ० इत्येता उपेश्वराः - चिदंशः - - आत्मन्वी ( १ - उपेश्वर विश्वेश्व कृतरूपो ब्रह्मसत्यात्मा-• * • . २ - प्रग्नित्रयमूत्तिस्त्रलोक्यव्यापको देवसत्यात्मा--- चिदात्मा - प्रात्मन्वी -- चिदंश — आत्मन्वी -∞ १ - वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञमूर्ति - महासंवत्स -→ चिदात्मा - प्रात्मन्वी रात्मको महासुप २ - वैश्वानर हिरण्यगर्भ सर्वज्ञमूर्ति - शरीरोपा-→ चिदंश: - प्रात्मन्वी ७–२ धिविशिष्ट: - साक्षी सुपर्णः प्रत्यगात्मा - १ - महारांवत्सरमुपर्ण साभिन्नः साक्षी प्रत्यगात्मा-( २ - वै०- तैजसप्राज्ञकृतमूतिर्भोक्ता सुपर्णः शारीरकात्मा — — चिदशः - - ग्रात्मन्वी --११ - विश्वप्रपञ्च - विशुद्धं शरीरम् - चिदात्मनः साक्षिणः - चिदात्मा - प्रात्मन्वी ८ २ - शरीरप्रपश्व - विशुद्धं जगत्- चिदंशस्य भोक्तुः ३ – त्रिपुरुष विवर्त्त १ – क्षराक्षर गर्भितोऽव्यय पुरुषः-निष्कलः पुरुषः सकलः षोडशी वल्शेश्वरः सत्यः २- क्षराव्ययगर्भितोऽक्षर पुरुषः--उपेश्वरा यज्ञाः [ २८८ ] ब्रह्मसत्यात्मयुग्म अमृतात्मयुग्म १ ४ अमृतात्मा ( ग्रात्मा ) २ ~ → ब्रह्मसत्यात्मा ( ब्रह्म )

पृष्ठ 317

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रत्यगात्मा साक्षी ३ - अव्ययाक्षर गर्भितः क्षरपुरुषः-शारीकात्मा भोक्ता देवतत्यात्मयुग्म प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् ३ ०४ → देवसत्यात्मा ( देव. ) ४ - मनः प्रारणवाङ् मयविवर्त -१ – प्राणवाग्गभितं त्रिवन् मनः -- तत् प्रघानः - अमृतात्मा ज्ञानमयः २ – मनोवाग्गभितस्त्रिवृत प्रारणः- -- तत्प्रधानः — ब्रह्मसत्यात्मा क्रियामयः ३ – प्राणमनोगर्भिता त्रिवृता वाक् — तत्प्रधानः -- देवसत्यात्मा - श्रर्थमयः ५ - - भोक्तृभोग्यविवर्त्त--( १ – असीमः परात्परः-१--भोक्ता ( साक्षी ) २ - निष्कलोऽव्यययुक्तः षोडशीपुरुषः - भोग्य: ( भोक्ता ) १ - निष्कलो ऽव्ययपुरुष: ---भोक्ता ( साक्षी ) २ - पोडशी महेश्वर: -- भोग्य: ( भोक्ता ) १ - षोडशीपुरुष महेश्वरः---भोक्ता ( साक्षी ) ३–२ २ – सोपेश्वरो बल्शेश्वरः--भोग्य: ( भोक्ता ) ११ - प्रवारपारीणो बल्शेश्वर: ----भोक्ता ( साक्षी ) ४ २ - पञ्चोपेश्वराः पृथक् पृथक् - - - भोग्य: ( भोक्ता ) १ - सोपेश्वरो बल्शेश्वरः--भोक्ता ( साक्षी ) ५–२ २ – प्रत्यगात्माभिन्नो महासुपर्ण: -- भोग्य: ( भोक्ता ) १ - संवत्सरात्मको महासुपर्ण: --भोक्ता ( साक्षी ) ६. २ - प्रत्यगात्मा साक्षी सुपर्ण:: - - - - भोग्य: ( भोक्ता ) [ २८६ ]

पृष्ठ 318

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १ - महा सुपर्णा भिन्नः साक्षी - -- भोक्ता ( साक्षी सुपर्णः ) ७ ०२ - शारीरको भक्तात्मा--- भोग्य: ( भोक्ता सुपर्णः ) प्राणात्मविज्ञानोपनि ६ - पुरुषात्मविवर्त ( पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भाव्यम् ) १ - - पञ्चकलोऽव्ययो ज्ञान - काम - कर्म्ममूत्तिः— १ - प्रानन्दविज्ञाने ( ज्ञानात्माव्यय: ) + ज्ञानघनोऽव्ययः २ - मनः ( कामात्माव्ययः ) - - क्रियाघनोऽक्षरः ३ - प्राणवाची ( कम्र्मात्माव्ययः ) – अर्थघनः क्षरः ३ – त्रिकलोऽव्ययः सृष्टिसाक्षी-१ - ज्ञानमूत्तिर्मन: --- ज्ञानघनोऽव्ययः २ - - त्रियामूर्तिः प्राणः - - क्रियाघनोऽक्षरः ३ -- ग्रर्थमूत्तिर्वाक्- -- अर्थघनः क्षरः ३ – षोडशकलो. महेश्वरः क्षराक्षरगभितोऽव्ययप्रधानः ( सृष्टेरालम्बनम् ) ४– श्रोङ्कारो बल्शेश्वरः १ – पञ्चकलोऽव्ययो मनोमय: - मनोऽव्ययरूपम् २ – पञ्चकलोऽक्षरः - प्राणमयः - प्राणोऽक्षर रूपम् ३ – पञ्चकलः क्षरः - वाङ् मयः - वाक्क्षररूपम् - बल्शेश्वरप्रजापतिविशुद्धाक्षरमूत्तिः १ – स्वायम्भुवसंस्थानुग्राहकः - - ओङ्कारात्मको विशुद्धाक्षरमूत्तिर्मनोमयोऽकारः - अव्ययः २ - सौरसंस्थानुग्राहकः - उग्दीथात्मको विशुद्धाक्षरमूत्तिः प्राणमयः - उकारः ——— ग्रक्षरः ३- पार्थिव संस्थानुग्राहकः - प्रणवात्मको विशुद्धाक्षरमूत्तिर्वामयो - -मकारः [ २ ९ ० ] -क्षरः

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् ५ – बल्शेश्वरगर्भितः - श्रव्ययक्षरगभितोऽक्षरप्रधानः-- उपेश्वरः स्वयम्भू: ( १ ) १ - वेदसत्यमूत्तिर्ज्ञानात्मा मनोमयः --२ - सूत्रसत्यमूत्तिः कामात्मा प्राणमयः ---श्रव्ययः ( वेदाः ) - अक्षर: ( सूत्रम् ) ५ – नियतिः सत्यमूत्तिः कम्र्मात्मा वाङ्मयः -- क्षरः ( नियतिः ) ६ – बल्शेश्वरगर्भितः श्रव्ययक्षरगर्भिताक्षर प्रधान: - - उपेश्वर: - - परमेष्ठी ( २ ) १ - इमूर्तिर्ज्ञानप्रवर्त्तको मनोमयः - श्रव्ययः ( इडा ) २ - ऊर्ग मूत्तिः क्रियाप्रवर्त्तकः प्राणमयः - अक्षरः ( ऊर्क ) ३ – भोग मूत्तिरर्थप्रवर्त्तको वाङ्मयः - क्षरः ( भोगाः ) ७ — बल्शेश्व रगर्भितः -- अव्ययक्षर गर्भिताक्षरप्रधान: - - उपेश्वरः सूर्यः ३ १ – ग्रायुमूर्तिर्ज्ञानप्रवर्त्तको मनोमयः - अव्ययः ( आयु ) २ - गौमूत्तिः क्रियाप्रवर्त्तकः प्राणमयः - अक्षरः ( गौः ) ३ — ज्योतिर्मूत्तिरर्थप्रवर्त्तको वाङ्मयः - क्षरः ( ज्योतिः ) ८- बल्शेश्वरगर्भितः - श्रव्ययक्षरगर्भिताक्षरप्रधानः - उपेश्वरश्चन्द्रमा: ( ४ ) १ - यशोमूत्तिर्ज्ञानाधारो मनोमयः - श्रव्यमः ( यशः ) २ – श्रद्धामूत्तिः क्रियाधारः प्राणमयः - प्रक्षर: ( श्रद्धा ) ३ – रेतोमूत्तिरर्थाधारो वाङ्मय ' — क्षरः ( रेतः ) ९ - बल्शेश्वरगर्भितः - अव्ययक्षरगर्भिताक्षर प्रधान: - उपेश्वरो भूपिण्डः ( ५ ) १ - द्यौमूर्तिर्ज्ञानसञ्चालको मनोमयः अव्ययः ( द्यौ ) २ - गौमूत्तिः क्रिया सञ्चालकः प्राणमयः - श्रक्षरः ( गौः ) ३ – वाङ्मूत्तिरथंसञ्चालको वाङ्मयः – नरः ( वाक् ) १० - प्रग्नित्रयमूत्तिः प्रव्ययाक्षरगर्भितात्मक्षरप्रधानः प्रत्यगात्मा साक्षी सुपर्णः ( १ ) १ – सर्वज्ञ मूत्तिरादित्यप्रधानो ज्ञानप्रदाता मनोमय - अव्यय: ( सर्वज्ञः ) [ २ ९ १ ]

पृष्ठ 320

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रारणात्म विज्ञानोपनिषत् २ - हिरण्यगर्भ मूतिर्वायुप्रधानः क्रियाप्रदाता प्राणामयः - अक्षर: ( हिरण्यगर्भः ) ३ – वैश्वानरमूत्तिरग्निप्रधानोऽर्थ प्रदाता वाङ्मयः - क्षरः ( वैश्वानरः ) ११ - अग्नित्रयमूत्तिरव्ययाक्षर गर्भिताक्षर प्रधानः सावरणो भोक्ता सुपर्णः ( २ ) १ - प्राज्ञमूत्ति रादित्यप्रधानो०-- श्रव्ययः ( प्राज्ञः ) २ - तेजस मूत्तिर्वायु ० ----- अक्षरः ( तैजसः ) ३ - वैश्वानरमूर्तिरग्नि ०. - - - - क्षरः ( वैश्वानरः ) ० आदिति के गर्भ में हमने विराट्प्रजापति की सत्ता बतलाई है । इसी विराट् प्रजापति को हमने साक्षीसुपर्ण कहा है । यही हमारी इस प्राणात्मा - विज्ञानोपनिषत् की मूल प्रारणात्मोपनिषत् की उपनिषत् प्रतिष्ठा है । यही हमारा ( जीवात्मा का ) उपास्य ईश्वर है । पूर्वोक्त श्रात्मविवर्त्तो में से हम सुगमता पूर्वक इसी की उपासना कर सकते हैं, प्रतएव पूर्व की प्राजापत्यसंस्थाचतुष्टयी में हमने इसे सुविज्ञेय कहा है । इस बात को न भूल जाइए कि, कर्म सदा विश्व से सम्बन्ध रखता है, उपासना एकमात्र ब्रह्मगर्भित देवता की ही हो सकती है एवं ज्ञान का सम्बन्ध एकमात्र श्रात्मा के साथ ही है । दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि, कर्म्मकाण्ड की मूलप्रतिष्ठा सावरण भौतिक विश्वरूप में परिणत आत्मा है, उपासना की आधारभूमि ब्रह्मसत्यगर्भित देवसत्यात्मा है एवं ज्ञानकाण्ड का श्राश्रय श्रमृतात्मरूप षोडशी पुरुष है । अथवा यों कहिए कि, भौतिक विश्व को साथ लेकर वही आत्मा साञ्जन - सावरण बनता हुआ कर्म्म का प्रवर्तक बनता है । प्रारण ( स्वयम्भू ), प्रापः ( परमेष्ठी ), वाक् ( सूर्य्य ), श्रन्न ( चन्द्रमा ), श्रन्नाद ( भूपिण्ड ), इन ब्रह्मसत्यात्मक पाँचों प्रकृतियों से नित्ययुक्त श्रग्नि- वायु - श्रादित्य की समष्टिरूप देवत्रयी को साथ लेकर तद्विशिष्ट यही आत्मा उपासना का प्रवर्त्तक बनता है, एवं अपने विशुद्ध षोडशीरूप से वही ज्ञान का प्रवर्त्तक बनता है । सर्वा-तीत परात्पर ( निराकार परमेश्वर ) कर्म्म उपासना ज्ञान, तीनों घम्मों से बहिर्भूत होता हुग्रा सर्वथा निर्धक है । और सूक्ष्मविचार कीजिए । क्षराक्षरगर्भित अव्ययमूर्ति अमृतात्मा ज्ञानकाण्ड का, क्षराव्य-यगर्भित अक्षरमूत्ति ब्रह्मसत्यात्मानुगृहीत देवसत्यात्मा उपासनाकाण्ड का एवं प्रक्षराव्ययगर्भित क्षर ( विकार क्षर ) मूत्ति विश्व कर्मकाण्ड का आश्रय है । कर्म का भौतिक क्षरविवर्त से ही सम्बन्ध है - " क्षरः सर्वारिण भूतानि । " उपासना का क्षरकूट पर एकरूप से प्रतिष्ठित, अतएव - कूटस्थ नाम से प्रसिद्ध अक्षरविवर्त से ही सम्बन्ध है - " कूटस्थोऽक्षर उच्यते । " इसीलिए उपनिषदों ने इसी अक्षरप्रधान देवसत्यात्मा को किंवा देव-सत्यसंस्था में विकसित अक्षर को उपास्य माना है, जैसाकि श्रुति कहती है-धनुगृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्य् पासा निशित सन्धीयत । प्रायम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं विद्धि ॥१ ॥

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