श्रीगणेशाय नमः।

Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 41–50

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना करेगा, तो वह दण्डनीय समझा जायगा । आज्ञानुसार कनिष्ठ अधिकारी प्रजा में ग्राज्ञापत्र वितीर्णं कर देता है । कोई भी व्यक्ति इस कनिष्ठ अधिकारी से, जिसका एकमात्र कर्तव्य है - प्रधान न्यायालय से निकले श्राज्ञापत्र को वितरण कर देना - यह नहीं पूछता कि ' अमुक आज्ञापत्र क्यों निकाला गया, क्यों ग्राज्ञा दी गई? ' यदि कोई मूर्खतावश पूछ बैठता है, तो इसे यही उत्तर मिलता है कि ' मैं नहीं जानता, प्रधान न्यायालय से पूछो ' । ठीक यही परिस्थिति श्रुति स्मृतिशास्त्रों के सम्बन्ध में समझिए । श्रुतिशास्त्र अपनी अपौरुषेयता के सम्बन्ध से स्वतः प्रमाण बनता हुआ जहाँ प्रधान न्यायालय है, वहाँ स्मृतिशास्त्र ' श्रुतेरिवाथं स्मृतिरन्वगच्छत् ' के अनुसार श्रोत प्राज्ञात्रों का अनुगवन करता हुआ कनिष्ठ अधिकारी है । वेदविहित ( वेदाज्ञासिद्ध ) धर्म का प्रादेशमात्र देना ही उसके अपने अधिकारक्षेत्र की अन्तिम सीमा है । यदि उस से कोई जिज्ञासु सद्भावना से उपपत्तिज्ञान के सम्बन्ध प्रश्न करता है, तो वह उत्तर देता है

अर्थकामेष्वसक्तानां धर्म्मज्ञानं विधीयते ।

धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥

— मनुः २ | १३ | तात्पर्य मनुवचन का यही है कि, " जिन्हें धर्म के धर्मत्त्वलक्षण उपपत्तिज्ञान - रहस्यज्ञान की जिज्ञासा है, उन्हें वेदशास्त्र का ही स्वाध्याय करना चाहिए । वहीं से प्रत्येक स्मार्त - धर्मादेश के ' क्यों '? का समाधान प्राप्त हो सकेगा " । जैसा कि निवेदन किया गया है, भारतीय विद्वानों ने वेदार्थ के अध्ययनाध्यापन से अपने ग्रापको उदासीन बना रक्खा है । व्याकरणादि का सामान्य ज्ञान प्राप्त कर इजर - उधर की कुछ एक स्मृतियों का प्रालोडन - विलोडन कर ऐसे ही प्रर्द्धदग्ध महानुभाव देश के धर्म्मा-चार्य बने हु हैं । संशय करना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है । साथ ही जब तक संशयनिवृत्ति नहीं हो जाती, तब तक संदिग्ध विषय पर श्रद्धा एवं विश्वास का उदय भी सम्भव नहीं है । एक ऐसा नवयुवक,, जिसने यावज्जीवन पाश्चात्य - शिक्षा का अनुगमन किया हो, जिसे प्रत्येक विषय युक्ति - तर्क - विज्ञान के प्राधार पर ही समझाए गए हों, तब तक स्वधर्म सिद्धान्तों पर कभी पूर्ण श्रद्धा नहीं कर सकता, जब तक कि उसे धर्म्म का वैज्ञानिकरहस्य युक्ति- तर्क द्वारा नहीं समझा दिया जाता । स्वयं मनुभगवान् भी ' स्तरणानुसंधते स धम्मं वेद नेतरः ' ( मनुः १२ । १०६ ) इत्यादि रूप से स्पष्ट शब्दों में वेदार्थोपयोगी तर्कवाद को धर्म्मपरिज्ञान के सम्बन्ध में एक आवश्यक साधन स्वीकार किया है । नवशिक्षा दीक्षित एक नवयुवक स्वभावतः उत्पन्न सन्देह - निवृत्ति के उद्देश्य से जिज्ञासा रूप से धम्माचार्य्यो की सेवा में विनीतभाव से, अथवा तो अपने स्वाभाविक उच्छङ्खलभाव से पहुँचता है, और प्रश्न करने लगता है कि - " भगवान्! मृतप्राणियों को निमित्त बनाकर श्राद्धकम्मं क्यों किया जाता है? लाखों कोस दूर बैठे प्राणी ( पितर ) ब्राह्मणभोजन से क्यों कर तृप्त हो जाते हैं? पूर्व शरीर को छोड़ कर प्राणी जब तत्काल नवीन शरीर धारण कर लेता है, तो ऐसी अवस्था में श्राद्ध किस की तृप्ति के लिए किया जाता है? एक के उत्पन्न होने से, तथा एक के मर जाने से उस जात मृत के सभी वंशज अस्पृश्य क्यों मान लिए जाते हैं "? उत्तर में हमारे प्राचार्य महोदय शास्त्रीय ( स्मार्त ) प्रमाण उद्धृत [ ३२ ]

पृष्ठ 42

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना करते हुए – ' शास्त्र ऐसा प्रादेश देता है, इसलिए ऐसा ही करना न्याय है " इस सूक्ति से वे उस श्रागन्तुक जिज्ञासु की जिज्ञासा शान्त करना चाहते हैं । " शास्त्र ऐसा ग्रादेश क्यों देता है? " इस सम्बन्ध में ग्राप सर्वथा तटस्थ बने रहते हैं । यदि जिज्ञासु अधिक ग्राग्रह करता है, तो ग्राचार्य महोदय कुद्ध हो पड़ते हैं, एवं भूताविष्ट वनकर - " तुम तो पाश्चात्य शिक्षा संसर्ग में पड़ कर नास्तिक बन गए, तुम्हें शास्त्रों पर विश्वास नहीं रहा, जाम्रो तुम्हारे साथ सम्भावण करने में भी हमें प्रायश्चित का भागी होना पड़ेगा " इस प्रकार मत्तप्रलाप करने लगते हैं । इस भर्त्सना का परिणाम यह होता है कि, उस जिज्ञासु को यह विश्वास कर लेना पड़ता है कि, " वास्तव में सनातनधर्म्म केवल काल्पनिक जग है, ब्राह्मणों के स्वार्थ-साधन का द्वार मात्र है । भला यावज्जीवन धर्म्मशास्त्र का स्वाध्याय - मनन करने वाले विद्वान् भी जब धर्माज्ञात्रों के सम्बन्ध में युक्तियुक्त समाधान नहीं कर सकते, तो ऐसी दशा में इस धर्म की काल्पनिकता में क्या सन्देह रह जाता है " । सचमुच ग्राज इस एक महत्त्वपूर्ण कारण से भी धर्म - विश्वास उत्तरोत्तर शिथिल होता जा रहा है । यद्यपि हम मानते हैं कि उपपत्तिविज्ञानात्मक रहस्यज्ञान सर्वसाधारण के परिज्ञान की वस्तु नहीं है । प्रत्येक व्यक्ति रहस्यज्ञान प्राप्त करके ही धर्म का ग्राचरण करे, यह सर्वथा असम्भव है । ' तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते काय्र्याकार्यव्यवस्थितौ ' ( गी ० १६ । २४ ) इत्यादि भगवदादेशानुसार शास्त्रीय वचनों पर अनन्यनिष्ठा रखते हुए - ' महाजनो येन गतः स पन्थाः इस न्याय के ग्रनुगमन सर्वसाधारण का कल्याण है । लक्ष्यैकचक्षुष्कता की तुलना में लक्षंकचक्षुष्कता ही सिद्धि का अन्यतम द्वार माना गया है । यह सब कुछ जानते हुए भी वर्तमान युग के लिए हम उपपत्तिज्ञान प्रचार को आवश्यकतम साधन माने विना नहीं रह सकते । इसके अतिरिक्त यदि उपपत्तिज्ञान सर्वथा अनावश्यक ही होता, तो स्वयं वेदशास्त्र में, तथा वेदशास्त्र के ब्राह्मणभाग में स्थान - स्थान पर उपपत्तिज्ञान का स्पष्टीकरण ही उपलब्ध न होता । ब्राह्मणग्रन्थ प्रतिपादित प्रत्येक ऋत्यर्थकर्म्म, तथा पुरुषार्थकर्म्म की इतिकर्तव्यता के साथ - साथ ' तद्यत् - अप उपस्पृशति, मेध्या वा आपः पवित्रं वा ग्रापः ' मेध्यो भूत्वा व्रतमुपायानीति, * श्राहवनीय, तथा, गार्हपत्य के मध्य में खड़े होकर प्राचमन करना ही ' अप उपस्पर्श ' कर्म्म है । क्यों आचमन किया जाता है? इसी प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि, पानी मेध्य ( सङ्गमनीय ) है, पवित्र ( दोपमार्जक । उधर अपने स्वाभाविक ग्रनृतभाव से पुरुष अमेध्य, तथा अपवित्र है । ऐसी मेध्य अपवित्र अध्यात्मसंस्था में मेध्य - पवित्र यज्ञसंस्कार तब तक प्रतिष्ठित नहीं हो सकता, जब तक कि वह किसी उपाय विशेष से मेध्य, तथा पवित्र न बना ली जाय । इसी उद्देश्य से ग्रप उपस्पर्श कर्म्म किया जाता है, जिसका विशद वैज्ञानिक विवेचन ' शतपथब्राह्मण - विज्ञानभाष्य ' में निरूपित है । २ नाकारणं हि शास्त्रेऽस्ति धर्मः सूक्ष्मोऽपि जाजले! कारणाद्धर्म्ममन्विच्छन् स लोकानाप्नुते शुभान् ॥

ज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत नाज्ञात्वा कर्म्म प्राचरेत् ।

प्रज्ञानेन प्रवृत्तस्य स्खलनं स्यात् पदे पदे ॥

[ ३३ ]

पृष्ठ 43

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना पवित्रपूतो व्रतमुपायानीति, तस्माद्वा श्रप उपस्पृशति ' ( शत ० १ । १ । १ । १ ) इत्यादि रूप से उपपत्तिप्रकरण भी समाविष्ट रहता है । यही क्यों, स्वयं वेदशास्त्र ने ही एक स्थान पर यह स्पष्ट किया है कि, " जो कर्म्म मनोयोगलक्षणा ' श्रद्धा ' के, कार्य्य - कारण - सम्बन्धपरिज्ञानात्मिका ' विद्या ' के तथा उपपत्तिज्ञानलक्षणा ' उपनिषद् ' के सहयोग से किया जाता है, वह अतिशयरूप से फलप्रद होता है, जैसा कि - ' यवेव विद्या करोति, श्रद्धयोपनिषदा, तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति ' ( छा ० उप ० १1१1१० ) इत्यादि उपनिषच्छु ति से प्रमाणित है । इसी ग्राधार पर कारणविज्ञान को श्रेयःप्राप्ति का तथा कर्म्मसौष्ठव का अन्यतम कारण माना गया है । जिस वर्त्तमानयुग में प्राच्य प्रतीच्य सभ्यताओं का संघर्ष चल रहा हो, भौतिक, श्रतएव क्षणिक, अतएव दुःखप्रवर्तक, अतएव शून्यं शून्यं लक्षण जिस विज्ञानशास्त्र को लेकर प्रतीच्य - संस्कृति का निगरण करने के लिए ग्राज मुंह बाए खड़ी हो, ऐसे विषम युग में ' विषस्य विषमौषधम् ' –'कण्टकं कष्टकेनंवोद्धरेत् ' इत्यादि लोकन्यायों का अनुगमन करते हुए तो यह सर्वथा श्रावश्यक हो जाता है कि, प्राणात्मक अतएव नित्य, अतएव ग्रानन्दप्रवर्त्तक, श्रतएव पूर्ण - पूर्ण - लक्षण भारतीय वेदविज्ञानात्र का श्राश्रय ग्रहण किया जाय । बिना ऐसा किए उक्त संघर्ष से प्राच्य संस्कृति का त्राण पाना कठिन ही नहीं, अपितु सर्वथा असम्भव है । भौतिक महासंग्राम के कारण प्राज भारतवर्ष संत्रस्त है । परमात्मानुग्रह से जिस दिन संग्रामसाधक घातक शस्त्रप्रपञ्च निधनावस्था को प्राप्त हो जायगा, उसी दिन संसार कुछ क्षणों के लिए एक बार शान्ति का श्वास ले सकेगा । परन्तु कुछ ही समय पीछे इस प्रतीत युद्ध से भी कहीं भयङ्कर सांस्कृतिक संघर्ष का सूत्रपात होगा । तत्तद्राष्ट्र अपनी अपनी संस्कृतियाँ लेकर इस संघर्ष में भाग लेंगे । इस अहमहमिका में जिस राष्ट्र की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होगी, वही प्रमुख स्थान पा सकेगी, शेष संस्कृतियाँ उस प्रमुख संस्कृति के उदर में समाविष्ट हो जायँगीं, एवं वही समय युद्ध का अन्तिम निर्णायक समय माना जायगा | क्या उस सांस्कृतिक संघर्ष से भारतराष्ट्र अपने ग्राम को बचा सकेगा? कभी नहीं, इसे इच्छा से नहीं, तो अनिच्छा से योग देना पड़ेगा, एवं तब इसके सामने यह प्रश्न उपस्थित होगा कि, “ मैं इस संघर्ष में विजय प्राप्त करने के लिए कौन सी संस्कृति का अनुगमन करू " । वर्त्तमान युग के देश नेता भले ही हमारे कथन की बाज उपेक्षा कर दें, परन्तु उन्हें कालान्तर में ही यह अनुभव करना पडेगा कि, भावी संघर्ष में विजय प्राप्त करने का एकमात्र साधन होगा नित्य विज्ञानप्रधान-शाश्वतशान्तिप्रदाता श्रासाहित्य एवं तन्मूला प्रसंस्कृति । इस भावी दृष्टिकोण की दृष्टि से भी यह आवश्यक है कि, कारण विज्ञानात्मक ग्रार्वसाहित्य का अधिक से अधिक प्रचार किया जाय । सांस्कृतिक संघर्ष को थोड़ी देर के लिए उपेक्षणीय भी मान लिया जाय, तब भी अपने अभ्युदय के नाते भी इसकी आवश्यकता का अपलाप नहीं किया जा सकता । वैज्ञानिक तत्त्वों के विलुप्तप्राय हो जाने से ही ईश्वरीय प्राकृतिक नित्य सनातन मानवधर्म्म ग्राज मतवादरूप में परिणत होता हुआ शान्ति प्रवृत्ति के स्थान में कलहप्रवृत्ति का कारण बन रहा है । एक ' वाह गुरुजी ' के नाम पर समस्त सिक्ख सम्मिलित हो जाते हैं, एक पैगम्बर के नाम पर सम्पूर्ण यवन प्रजा का संघटन सम्भव है । परन्तु सनातनधर्म के पास ऐसा आज एक भी उद्घोष नहीं है, जिस के आधार पर वह समस्त सम्प्रदायों का एकसूत्र में संगठन कर सके । केवल वैदिक विज्ञान ही एक ऐसा ३४ ]

पृष्ठ 44

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्ताबना शङ्खनाद है, जिस के ग्राह्वान पर सम्पूर्ण सम्प्रदाएं समवेत हो सकती हैं । संगठन के नाते भी विज्ञानतत्त्व का प्रचार- प्रसार ग्रावश्यक बना रहा है । इस प्रकार साम्प्रदायिक इस विज्ञाननिधि के विस्मृतप्राय हो जाने से ही उस परम वैज्ञानिक अनादि सनातनधर्म्म की श्राज ' ख्रीष्ट ' - जैन - बौद्ध - मोहम्मदीय ' आदि मतवादों के साथ तुलना की जा रही है । उस वृद्धातिवृद्ध-प्रपितामह को इन वृद्धातिवृद्धप्रपोत्रों की कक्षा में लाकर इन के साथ उसके औचित्य अनौचित्य का समतुलन किया जा रहा है । सीमा यहीं समाप्त नहीं हो जाती । उसी के सुपूतों द्वारा इन मतवादों की तुलना में इसे न केवल स्थान ही नीचा दिया जाता, अपितु उसका अपमान भी किया जा रहा है, उसके प्रति अवाच्यवादों का प्रयोग किया जा रहा है । ' ईसामसीह कैसे थे? बड़े महात्मा थे, बुद्ध कैसे थे? अहिंसा, दया के अवतार थे ' सुस्वागतम् । हां, तो आर्षधर्म्म प्रवर्तक ऋषि कैसे थे? बड़े स्वार्थी थे, मानव सभ्यता के अन्यतम शत्रु थे, पक्षपाती थे, यह है आज की उस समालोचना का निष्कर्ष, जिसके समर्थक निबन्धों को पढ़कर आज भारतीय नवयुवक अपनी प्रतिभा का सदुपयोग (? ) कर रहे हैं । सौभाग्य कहिए, अथवा दुर्भाग्य, कोई सा ही सामयिकपत्र ( समाचारपत्र ) बचा होगा, जो आए दिन धर्माज्ञाओं की, तत्प्रवर्त्तक महर्षियों की, तदनुगामी सनातनधर्मावलम्बियों की निन्दा से अपने श्रीमुख पर कालिख न पोतता होगा? वह समाचारपत्र ही क्या, जिस के प्रत्येक अङ्क में धर्म्मविरुद्ध कार्य्यो के दो चार समाचार समाविष्ट न हों । आज तो हमारा यहाँ तक पतन हो गया है कि हमने अपने मनोरञ्जक चित्रपटों में भी धर्म्मनिन्दा को अपना प्रधान लक्ष्य बना लिया है, और ऐसे ही चित्रपट आज हमारे लिए विशेष आकर्षण की वस्तु बने हुए हैं । देश - नेताओं के कर - कमलों के द्वारा उद्घाटित कतिपय सामाजिक चित्रपटों में रूढ़िवाद के नाश पर भारतीयवर्णाश्रमधर्म्म पर उसी के प्रसूनों द्वारा जो प्रसूनवृष्टि देखने सुनने में आती है, वह एक प्रकार से हमारी संस्कृति की पतन की ही सूचिका मानी जायगी । एवमेव पाश्चात्य - संस्कृति की अरुणप्रतिभा से युक्त भारतीय नवयुवकों में से कोई सा ही ऐसा सौभाग्यशाली युवक बच रहा होगा, जो प्रातः सायं उठते - सोते अपने इस पूज्य का उपहासादि साधनों से सत्कार न करता होगा । छोड़िए पाश्र्चात्य शिक्षा दीक्षितों की बात । विद्वानों में से भी ऐसा कोई विरला ही विद्वान् होगा, जो अन्तःकरण से सनातनधर्म के प्रत्येक आदेश के सामने अपना मस्तक विनम्र कर देता होगा | जो विद्वान् अपने आपको प्राच्यसंस्कृति के अनन्यपोषक कहते हैं, जो ' कट्टर सनातनधर्मी ' उपाधि से अपने आपको गौरवान्वित मानते हैं, जो आए दिन सभाम काष्ठों का अपने ताण्डवनृत्य से दर्पदलन करते हुए अहमहमिका - कर्म्म से चाणमुष्टिप्रसङ्ग का स्मरण कराते हुए अर्थशून्य सनातनधर्म्मसभाओं को ऋणग्रस्त बनाने का पुण्यसञ्चय करते रहते हैं, धर्म के जयघोषों से जो द्यावापृथिवी ( आकाशपाताल ) के विच्छेद को हटाते रहते हैं, ऐसे उपदेशकों से यदि उनका ही कोई अन्तरङ्ग व्यक्ति धर्माज्ञाओं के जब कभी सन्दे-हात्मक प्रश्न कर बैठता है, तो उनके मुखविवर से भी यही उत्तर निकलता है कि, ' ऐसा प्रश्न करना व्यर्थ है । हम स्वयं जब कभी विचार करते हैं, तो ऐसा ही प्रतीत होता है, मानो यह सब केवल कल्पना का ही साम्राज्य हो । परन्तु क्या करें, सर्वसाधारण के द्वारा प्राप्त प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए, तथा [ ३५ ]

पृष्ठ 45

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना आजीविका निर्वाह के लिए जान बूझ कर आत्मा को धोका देना ही पड़ता है ' । जब अपने घर की ही यह दुर्दशा है, तो नवशिक्षित, तथा ग्रन्यमताबलम्बी सनातनधर्म पर यदि आपेक्ष करते हैं, तो इस मं उनका क्या अपराध है । बे तो जिज्ञासू हैं, वास्तविक तत्त्वपिपासू हैं । जब विद्वान् उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर सकते, श्रपितु पुरस्कार में विद्वानों की ओर से उन्हें ' नास्तिक ' की उपाधि प्राप्त होती है, तो वे क्यों न सनातनधर्म से विमुख होंगे । इसी परिस्थिति के आधार पर हम कह सकते हैं कि, आज सनातनधम्मं पर जनता का जो विश्वास बढ़ता जा रहा है, उसका एक कारण वेदतत्त्वानभिज्ञ, अतएव उपपत्ति-· ज्ञानशून्य ( रहस्यज्ञानशून्य ) इन पण्डितम्मन्यों के तथा ' प्राचार्य ' उपाधि - विभूषित धर्माध्यक्षों के द्वारा धर्मोपदेश का सञ्चालित होना भी है । ' अविद्यायानन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितम्मन्यमानाः । दंद्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ' — कठोपनिषत् - ११२।५ । उक्त औपनिपद् सिद्धान्त के अनुसार स्वयं लक्ष्यच्युत ये धर्म्मरक्षक अन्य मुग्ध श्रद्धालु समाज का भी ग्रन्धकूप में निक्षेप कर रहे हैं । सभी क्षेत्रों में आज उक्त वचन चरितार्थ हो रहा है । सभी नेता हैं, सभी पण्डित हैं, सभी उपदेशक हैं, सभी सुधारक हैं, सभी सब कुछ हैं । अन्धों का समुदाय अन्धों को मार्ग दिखारहा । ऐसी स्थिति में ' कुतस्तत्र प्रतीकारो रक्षको यत्र भक्षक: ' के अनुसार इन रक्षकों से भक्षित संस्कृति अद्यावधि कैसे बच रही, यही एक महाप्राचर्य है । शिक्षा हमारे हाथ से जाती रही, यह अविश्वास का पहला कारण । वेदस्वाध्याय का परित्याग कर अन्य ग्रन्थों में आयुः समाप्त करने वाले अयोग्य विद्वानों तथा धर्माचायों के हाथ में धर्म्मसूत्र ( धर्म्म की बागडोर ) का चला जाना अश्विास का दूसरा कारण । इन दोनों कारणों में से प्रथम कारण की चिकित्सा कई एक प्रतिबन्धकों से शीघ्र सम्भव नहीं है । देश अपनी पादप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित होकर स्वस्वरूप को सुरक्षित रखता हुआ जब पहले स्वतन्त्रता प्राप्त करले, तब इसे शिक्षा-स्वातन्त्र्य उपलब्ध हो, एवं आर्ष साहित्य का जब पूर्ण प्रचार हो, तब कहीं स्वतन्त्रताप्रापक प्रतिष्ठाबल प्राप्त हो । ऐसी परिस्थिति में ' वर्तमान दशा में वर्तमान शिक्षा पर हमारा स्वतन्त्ररूप से नियन्त्रण हो जायगा, एवं हम उसमें ऐच्छिक परिवर्तन कर सकेंगे ' यह खपुष्पसम केवल कल्पना ही रह जाती है । दूसरा उपाय है— वैदिक - विज्ञान का प्रचार प्रसार । इस नवीन युग के सम्मुख जब तक धर्म के प्रत्येक अंशकी उपपत्ति ( ज्ञानिक रहस्य ) उपस्थित नहीं करदी जायगी, तब तक उखड़ा हुआ धर्म्मविश्वास पुनः प्रतिष्ठित न हो सकेगा । ' नवीन मार्गानुयायी अपने मौलिक साहित्य की वैज्ञानिकता का स्वरूप समझते हुए उसकी आवश्यकतम उपादेयता स्वीकार करें, तद्द्वारा प्राप्त प्रतिष्ठाबल पर स्वलक्ष्य सिद्धि में सफलता प्राप्त करें, तथा विद्वानों की वैदिक - विज्ञान की ओर प्रवृत्ति हो, एवं तदाश्रयद्वारा वे जनता की वास्तविक धर्म्मभावनात्रों को पुष्पित - पल्लवित करें, ' श्राद्धविज्ञान ' व्याज से इन्हीं उद्देश्यों [ ३६ ]

पृष्ठ 46

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे प्रस्तावनों की सिद्धि के लिए श्राद्धविज्ञान निबन्ध ' उपस्थित हो रहा है ' यही श्राद्धविज्ञान रचना - कारणत्रयी में से दूसरे कारण का संक्षिप्त निदर्शन है । सनातनधर्मावलम्बी ग्रार्ष - प्रजावर्ग का ग्राज हम तीन भागों में श्रेणि - विभाग मान सकते हैं, एवं उन्हें क्रमशः राष्ट्रीयवर्ग, विद्वद्वर्ग, साधारणश्रद्धालुवर्ग, इन नामों से व्यवहृत किया जा सकता है । राष्ट्रीय वर्ग की दृष्टि में राष्ट्रनिर्माण में, राष्ट्रोन्नति में, किंवा राष्ट्र के स्वतन्त्रतायज्ञ में धर्म्म सर्वथा अनपेक्षित तत्त्व है । प्रत्युत यह वर्गं धर्म्म को राष्ट्रोन्नति तथा समाजोन्नति, दोनों का वृतीय कररण निदर्शन - एक महान् प्रतिबन्धक मानने की भूल कर रहा है, जबकि राष्ट्र शब्द का सर्व-प्रथम जन्मदाता ही सनातनधर्म माना गया है । इस सम्बन्ध में हमारा अपना तो यह भी विश्वास है कि, सनातनशास्त्र, तथा तदनुगत सनातनधर्म्म को मूलप्रतिष्ठा बनाए बिना कम से कम भारतराष्ट्र का अभ्युदय तो एकान्ततः असम्भव ही है । सामान्य राष्ट्रीय विधानों के अतिरिक्त आर्ष-शास्त्र प्रवर्त्तक महर्षियों ने प्राकृतिक विज्ञान के आधार पर कुछ एक ऐसे गुप्त कारणों का अन्वेषण किया है, जिनके रहते राष्ट्र कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता । साथ ही उन कारणों को दूर कर राष्ट्र - स्वातन्त्र्य के लिए एक विशेष प्रकार के वैज्ञानिक - कर्म का भी आविष्कार किया है, जो कि कर्म्म ब्राह्मणग्रन्थों में ' राष्ट्रभृत् ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । राष्ट्र क्यों निर्बल हो जाता है? निर्वल राष्ट्र पराक्रमण का सामना करने में असमर्थ होता हुआ कैसे परतन्त्र हो जाता है? ब्राह्मण श्रुति ने पहिले इन प्रश्नों का समाधान किया है । बतलाया गया है कि, अर्थशक्ति विवो राष्ट्र का वास्तविक स्वरूप है । अर्थ ही राष्ट्र है । जिस राष्ट्र का अवल क्षीण हो जाता है, निश्वत वह राष्ट्र अर्थाभाव में पराक्रमण सहने के साधनों से वश्चित होता हुआ पर-तन्त्र बन जाता है | अतः राष्ट्र -स्वरूप - रक्षा के लिए अर्थ- स्वातन्त्र्य सर्वप्रथम अपेक्षित है । प्रश्न उपस्थित होता है कि, राष्ट्र का अर्थवल कैसे सुरक्षित रक्खा जाय? इस प्रश्न का समाधान करते हुए श्रुति ने ' ब्रह्म - क्षत्र ' नामक द्वन्द्व की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है । ब्रह्मवीर्य्य राष्ट्र का ज्ञानबल है, क्षत्र-वीर्य्य राष्ट्र का कर्म्मबल है | ज्ञान- सहकृत कर्म्म ही अर्थरूप राष्ट्र का, किंवा राष्ट्ररूप अर्थ का स्वरूप— रक्षक है | जब राष्ट्र का ज्ञानबल अभिभूत हो जाता है, तो ज्ञानानुगत कर्म्मबल सर्वथा उच्छृङ्खल बन जाता है | ज्ञानवश्चित ऐमा उच्छृङ्खल कर्म्म अर्थरक्षा में असमर्थ होता हुआ निश्वयेन राष्ट्रवारतन्त्र्य का प्रवर्त्तक बन जाता | अतएव आवश्यक है कि, अर्थरक्षा के लिए कर्म्मगुप्ति का आश्रय लिया जाय, एवं कर्म्मसौष्ठव के लिए ज्ञानगुप्ति को मूलप्रतिष्ठा बनाया जाय । इस प्रकार ज्ञानशक्तिरूप ब्रह्म, तथा क्रिया-शक्तिरूप क्षेत्र, इन दो रक्षकों की सत्ता में ही अर्थशक्तिरूप बिट् ( राष्ट्र ) सुगुप्त रहता हुआ बलवान् रह सकता है, एवं ऐसे ब्रह्म - क्षत्रानुगृहीत अर्थलक्षण राष्ट्र की स्वतन्त्रता पर कोई भी शक्ति आक्रमण नहीं कर सकती । विचार करने पर वर्त्तमान परतन्त्रता का यही एक मुख्य कारण हमारे सम्मुख उपस्थित हो रहा हैं । भारतवर्षं के पास आज भी अर्थबल ( कोप ) की कमी नहीं है । परन्तु दुःख है कि, वह अपनी इस [ ३७ ]

पृष्ठ 47

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे प्रस्तावना अर्थशक्ति का अपने राष्ट्रनिर्माण में अणुमात्र भी उपयोग नहीं कर सकता । क्यों हमारी अर्थशक्ति पर परराष्ट्रों का एकान्त स्वत्त्वाधिकार प्रतिष्ठित हो गया? इस प्रश्न का उत्तर भी स्पष्ट । तमोगुणप्रधाना अर्थशक्ति सभी राष्ट्रों के लिए आकर्षण की वस्तु है । जब तक यह अर्थशक्ति रजोगुणप्रधाना क्रियाशक्ति, तथा सत्त्वगुणप्रधाना ज्ञानशक्ति से सुरक्षित रहती है, दूसरे शब्दों में जब तक राष्ट्र के ज्ञानबल, सेनाबल, दोनों अपने अधिकार में रहते हैं, तब तक उसका अर्थबल सुरक्षित रहता है, एवं तब तक राष्ट्र की स्वतन्त्रता अक्षुण्ण बनी रहती है । ज्ञानबलप्रवर्तक देश के ब्राह्मणवर्ग ने जिस दिन से वेदगुप्ति का परि-त्याग किया, उसी दिन से ज्ञानानुगत क्षत्रबल क्षत्रियों के हाथ से निकल गया । दोनों से वश्चित अर्थ— अरक्षित रहता हुआ पर - गिद्धों का बलि बन गया । इस विवेचना से यह स्पष्ट है कि, अर्थ लक्षणराष्ट्र की स्वरूपरक्षा एकमात्र ब्रह्म - क्षत्र मिथुन पर ही अवलम्बित है । भारतवर्ष का ब्रह्म - क्षत्र बलात्मक मिथुनभाव क्यों निर्बल हो गया? इस प्रश्न का तात्त्विक कारण बतलाती हुई श्रुति आगे जाकर कहती है कि, जिस राष्ट्र में से प्राकृतिक प्राणदेवताओं का विनिर्गम हो जाता है, उस राष्ट्र का ब्रह्म - क्षत्रात्मक मिथुनभाव निर्बल बन जाता है । ' १ अग्नि-२ श्रौषधि, १ सूर्य्य - २ मरीचि, १ चन्द्रमा - २ नक्षत्र, १ वात - २ श्राप:, १ यज्ञ - २ दक्षिणा, १ मन - २ ऋक्साम, ' ये ६ युग्म ब्रह्म - क्षत्र मिथुन के स्वरूप रक्षक माने गये हैं । अतएव ' एते देवा राष्ट्रभृतः ' के अनुसार ये ही प्राणदेवता राष्ट्रस्वरूप के धारण करने वाले माने गए हैं । इनमें ग्रग्नि, सूर्य्य, चन्द्रमा, वात, यज्ञ, मन, ये ६ देवता ब्रह्मवीर्य्य के संरक्षक है, एवं औषधि, मरीचि, नक्षत्र, ग्रापः, दक्षिणा, ऋक्साम, ये ६ देवता क्षत्रवीर्य्यं के संरक्षक हैं । ऋषि कहते हैं कि, जिस राष्ट्र को परतन्त्र देखो, विश्वास करो उस राष्ट्र का ज्ञानानुगत ब्रह्मबल, तथा कम्र्मानुगत क्षत्रबल, दोनों जर्जरित हैं । एवं जिस राष्ट्र को ब्रह्म-क्षत्र - वीर्थों से वञ्चित देखो, विश्वास करो उस राष्ट्र के ब्रह्म - क्षत्रवीर्य्य संरक्षक दोनों बल उक्त ६ ओं द्वन्द्वदेवताओं के अनुग्रह से वञ्चित हो गए हैं । ऐसी स्थिति में यदि तुम्हें अपनी राष्ट्र की प्रतिष्ठा पुनः अपेक्षित है, तो राष्ट्र में ब्रह्म - क्षत्र को पुनर्जीवित करना पड़ेगा । इसके लिए उन द्वन्द्वदेवताओं का अपने राष्ट्र में समावेश करना आवश्यक होगा, एवं इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए ' राष्ट्रभृत् ' नामक यज्ञप्रक्रिया का अनुगमन करना पड़ेगा, जिसका निम्नलिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है— ' अथातो राष्ट्रभृतो जुहोति राजानो वै राष्ट्रभृतः । ते हि राष्ट्राणि बिभ्रति । एता है देवताः सुता एतेन सवेन येनैतत् सोष्यमाणो भवति, ता एवंतत् प्रीणाति । तास्या इष्टाः प्रीता एतं सवमनुमन्यन्ते, ताभिरनुमतः सूयते ।

यस्मै वै राजानो राज्यमनुमन्यन्ते स राजा भवति । न स यस्मै, न तत् ।

राजानो राष्ट्रारिण बिभ्रति, राजान उडएते देवाः, तस्मादेता राष्ट्रभृतः ॥ १ ॥

[ ३८

पृष्ठ 48

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना ' मिथुनानि जुहोति । मिथुनाद्वाऽधि प्रजातिः । यो वै प्रजायते, सराष्ट्रं भवति । अराष्ट्रं वै स भवति, यो न प्रजायते । तद्यन्मिथुनानि राष्ट्रं बिभ्रति,

मिथुना उऽएते देवाः । तस्मादेता राष्ट्रभृतः ' ॥२ ॥

" १ अग्निर्गन्धर्वः, तस्योषधयोऽप्सरसः 1 १ सूर्य्यो = गन्धर्वः २ तस्य मरीचयोऽप्सरसः । चन्द्रमा गन्धर्वः, तस्य नक्षत्राण्यप्सरसः । वातो गन्धर्वः, तस्य प्रापोऽप्सरसः । यज्ञो गन्धर्वः, तस्य २ दक्षिणा अप्सरसः । १ मनो गन्धर्वः, तस्य २ ऋक्सामान्यप्सरसः । प्राशासते - इति - नोऽस्त्वित्थं । स न इदं

ब्रह्म - क्षत्रं पातु इति । तस्योक्तो बन्धुः ॥ ३ ॥

- शत ० ६ कां ० | ४० | १ ब्रा ० | सर्वप्रथम ज्ञानशक्ति - प्रवर्तक ब्रह्मबल, तदनुगत क्रियाशक्ति प्रवर्तक क्षत्रबल, ब्रह्म - क्षत्रानुगृहीत-अर्थशक्तिप्रवर्तक विड्बल, तीनों राष्ट्र की प्रधान सम्पत्तियाँ है, यह उक्त कथन से भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । साथ ही यह भी स्वतः सिद्ध है कि, अर्थबलापेक्षया क्रियाबल श्रेष्ठ है, सर्वापेक्षया ज्ञानबल ' ज्येष्ठ तथा श्रेष्ठ है | ज्ञानबलोपासक ब्रह्मवीर्य्यप्रधान ( जात्याब्राह्मण ) ब्राह्मणवर्ग वेदगुप्ति द्वारा स्वब्रह्मवर्चसे राष्ट्र की ज्ञानानुगता ब्रह्मविभूति सुरक्षित रखने वाला माना गया है । क्रियावलोपासक क्षत्रवीर्य्यप्रधान क्षत्रियवर्ग ब्रह्मद्वारा ( ब्राह्मण द्वारा ) प्राप्त ज्ञानप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होता हु । रथ, ग्रश्वप्रादि वाहनबल के द्वारा, धनुजादि शस्त्रवल के द्वारा बाह्य प्राक्रमण से राष्ट्र की रक्षा करता हुआ राष्ट्र की क्रियानुगता क्षत्र - विभूति का रक्षक माना गया है । ब्रह्म क्षत्रबलों से सुगुप्त, श्रतएव ' गुप्त ' इस उपाधि से विभूषित अर्थ बलोपासक विड्वीर्य्यप्रधान वैश्यवर्ग कृषि - गोरक्षा - वाणिज्य - द्वारा स्व - सञ्चित अर्थ का ब्रह्म - क्षत्र के आदेशानुसार राष्ट्रनिर्माण में उपयोग करता हुआ राष्ट्र की विविभूति का संरक्षक माना गया है । इन तीनों पुरुषविभूतियों के अतिरिक्त कृषिकर्मोपयुक्ता दुधारी गाएं, सवल अनड्वान्, आदिलक्षण पशुसम्पत् भी नितान्त अपेक्षित है । वीर्य्यानुगता द्विजातिप्रजा ( ब्रा ० क्ष ० वै ० प्रजा ) की रक्तशुद्धि के लिए राष्ट्र की नारी - सम्पत्ति का भी निर्दुष्ट रहना परम अपेक्षित है । सर्वोपरि प्रकृति का निरापद वना रहना भी प्रत्यावश्यक है, जिसके लिए प्राकृतधर्म्म ( सनातनधर्म्म ) का अनुगमन सतत अपेक्षित माना गया है । धर्मानुष्ठान से प्रकृति राष्ट्र के अनुकूल रहती है, पूर्वोक्त ब्रह्म - क्षत्रप्रवर्तक देवताद्वन्द्वों का अनुग्रह सुरक्षित रहता है, फलतः समय पर वृष्टि होती है, प्रौषधि -वनस्पतियों का परिपाक होता रहता है । इसी प्राकृतिक ग्रनुग्रह से ब्रह्मक्षत्र - विड्वलत्रयी, पशुबल, आदि राष्ट्रोपयोगी सभी साधन पुष्पित पल्लवित बने रहते हैं । और इन सब साधन - सामग्रियों से राष्ट्र का योग ( सम्पदप्राप्ति ), तथा क्षेम ( प्राप्तसम्पत्ति का संरक्षण ) भलीभांति होता रहता है । एक स्वतन्त्र [ ३६ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना राष्ट्र की स्वतन्त्रतासाधक इन्हीं यच्चयावत् साधन - सामग्रियों का केवल अपने एक स्तुतिमन्त्र से विश्लेषण करते हुए राष्ट्रस्वातन्त्र्य के अनन्यप्रेमी वेदमपि कहते हैं— * ' ब्रह्मन्! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् श्री राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम् दोग्ध्रीधेनुः, वोढानड्वान्, आशुः सप्तिः, पुरन्धिर्योषा, जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न औषधयः पच्यन्ताम् योग - क्षेमो नः कल्पताम् ' - प्रजुः सहिता २२ प्र ० । २२ मं ० । जिस प्रकृति के द्वारा सम्पूर्ण चराचर - विश्व का एक सुव्यस्थित क्रम से सञ्चालन हो रहा वही प्रकृतितत्त्व उपनिषच्छास्त्र में ' ग्रन्तर्य्यामी ' कहलाया है । प्रत्येक वस्तु के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहने वाले इसी प्रकृतितत्त्व से चूकि तद्वस्तु - विवर्त्त का नियतभाव से नियमन होता रहता है, अतएव इसे - ' अन्तस्तिष्ठन् नियमयति ' निर्वचन से ' ग्रन्तर्यामी ' कहना ग्रन्वर्थ बनता है । वस्तुकेन्द्र ' हृदयम् ' कहलाया है | इस हृदय में प्रतिष्ठित ग्रन्तर्य्यामी ' हृ ' लक्षण प्रादानधर्म से ' द ' लक्षण विसर्गधर्म्म से, एवं ' यम् ' लक्षण नियमनधर्म से प्रागति - गति -स्थिति - भावों द्वारा अग्नीषोमात्मक वस्तुपिण्डों का स्वरूपरक्षक वन रहा है । हृदय में ' हृ - द - य ' रूप से प्रतिष्ठित यही अन्तर्य्यामी अपनी नियत - एकरूप -वृत्ति से ' नियतिः सत्यम् ' कहलाया है । यही प्रनिरुक्त हृद्य प्रजापति ' है, जिसका - प्रजापतिश्चरति गर्भे ० ' ( यजुः स ० ३१।१६ ) इत्यादि मन्त्र से स्पष्टीकरण हुआ है । इसी अन्तर्यामी, हृत्प्रतिष्ट, हृ - द - य - मूर्ति प्रजापति ( प्रकृतित्व ) का विश्लेषण करते हुए ब्राह्मणश्रुति ने कहा है-' एष प्रजापतिर्यत् - हृदम । एतद् ब्रह्म एत सर्वम् । तदेतत्त्र्यक्षरं - ' हृदय ' मिति ( हृ - द - यम् - इति ) । ' हृ ' इत्येकमक्षरम् । अभिहरन्त्यस्मैस्वाश्चान्ये च, य एवम् वेद । ' द ' इत्येकमक्षरम् । ददन्त्यस्मै - स्वाश्चान्ये च य एवं वेद । ' युम ' * मन्त्र की विशद् वैज्ञानिक व्याख्या ' गीताविज्ञान भाष्यभूमिका बहिरङ्गपरीक्षात्मक - प्रथमखण्ड ' में देखनी चाहिए । [ ४० 1

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना इत्येकमक्षरम् । एति स्वर्ग लोकं, य एवं वेद । तद्वै तदेतदेव तदास - सत्यमेव । स यो हैवमेतन्महद्यक्षं प्रथमजं वेद ' सत्यं ब्रह्म ' ति जयतीमाँल्लोकान् । सत्यं ब्रह्म । ' — शत ० १४ कां ८ अ ० ४, ५ ब्रा ० वेत्थ नु त्वं तमन्तर्यामिणं - य इमं च लोकं परं च लोकं, सर्वारिण च भूताति अन्तरो यमयति, इति । यः ( हृदये ) तिष्ठन् अन्तरो यमयतीति, सत-श्रात्मा अन्तर्यामी, अमृतः । - शत ० १४।६।७ । ब्रा ० हृदयस्थित ' हृ - द - य ' मूर्ति इस सत्यप्रजापति की नियत्तिवृत्ति ही ' धर्म ' है । जिस वस्तु के केन्द्र में उपाधि - भेदभिन्न जैसा अन्तर्यामी - सत्य प्रतिष्ठित है, वह वस्तु तदनुरूपावृत्ति से ही युक्त रहता है । पानी अपने सत्यधर्मं से सदा निम्नगामी ही रहता है, ग्रग्नि अपने सत्यधर्म से सदा ऊर्ध्वगामी ही रहता है, वायु तिग्गामी ही रहता है । यहो उपाधिकृत प्राकृतिक नित्य धर्म्मभेद है, यही स्व - धर्म है, यही स्वधर्म्म तद्वस्तु का स्वरूप रक्षक है । प्राकृतिक अविचाली भाव ही सत्य है, यही धर्म है | अतएव' यो वै धर्मः, सत्यं वै ' शत ० १४।४।२।६ ) इत्यादि रूप से उक्थरूपेण हृदय में प्रतिष्ठित सत्यलक्षण अन्तर्य्यामी का तथा अर्करूप से बहिर्विनिःसृत धर्म्मलक्षणा बाह्यवृत्ति का प्रभेद मान लिया गया है । अन्तर्यामी - सत्य के धर्मलक्षण प्राकृतिक तत्त्व का विश्लेषण करने वाला प्राकृतिक शास्त्र ही आर्षशास्त्र ( वेदशास्त्र ) है, अतएव यह शास्त्र अपौरुषेय माना गया है । इस अपौरुषेय शास्त्र के आधार पर प्रतिष्ठित श्रौतस्मार्त्तलक्षण सनातनधर्म्म ही प्राकृतिक धर्म है, जिस की नित्यसिद्धा वर्षाव सृष्टि के आधार पर धर्म्मभेदरूपेण व्यवस्था हुई है । वर्णानुगति से ही यह वेदाज्ञासिद्ध प्राकृतिक सनातनधर्म्म ' वर्णाश्रमधर्म्म ' नाम से व्यवहृत हुआ है । इस प्राकृतिक नित्यध का जब आर्षप्रजा परित्याग कर देती है, तो तत्सम्बद्धा प्रकृति कुपित हो जाती है । प्रकृतिक्षोभ से शान्तिसंवाहक देवता - द्वन्द्व कुपित हो जाते हैं । फलतः राष्ट्रसमृद्धि विनाशोन्मुखा बन जाती है, जिसका प्रत्यक्ष निदर्शन समृद्धिशून्य वर्त्तमान भारतराष्ट्र बन रहा है । इस दृष्टिकोण से भी धर्म की राष्ट्रसमृद्धि में भली भांति उपयोगिता सिद्ध हो जाती है । जो राष्ट्रवादी भारतीय धर्म के इस मौलिक - प्राकृतिक-सत्य - स्वरूप से अपरिचित रहते हुए सनातनधर्म्म तथा धर्म्म रहस्यप्रतिपादक वेदशास्त्र को राष्ट्र के अभ्युदय में प्रतिबन्धक मान रहे हैं, क्या यह उनका राष्ट्रसमृद्धि - विनाशक प्रौढिवाद नहीं है? अस्तु. राष्ट्रीयवर्ग किस अज्ञात कारण से धर्म को प्रतिबन्धक मान रहा है? इस प्रश्न की मीमांसा में न पड़ते हुए क्रमप्राप्त दूसरे विद्वर्ग की प्रोर पाठकों का ध्यान प्राकर्षित किया जाता है । संस्कृतज्ञ विद्वान् धर्म्म का परिशीलन करते हुए भी प्राशास्त्र की उपेक्षा से धर्म के रहस्यज्ञान से वश्चित [ ४१ ]