Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 321–330

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयोभवेत् ॥ २ ॥ ( मुण्डक २।२।३-४ )

विशुद्ध अक्षर उपास्य नहीं है, अपितु देवसत्यात्यगर्भित ब्रह्मसत्यावच्छिन्न, अतएव ब्रह्म नाम से व्यवहृत सोपाधिक अक्षर ही उपास्य बनता है । यद्यपि उपासना का आश्रय ब्रह्म ( ब्रह्मसत्यात्मक देवसत्यात्मा ) है, परन्तु प्रधान लक्ष्य वही अक्षर है । इन्हीं दोनों भावों को सूचित करने के लिए पहले श्रुति ने - " लक्ष्यं तदेवाक्षरम् " यह कहा एवं आगे जाकर “ ब्रह्म तल्लक्ष्यं मुच्यते " यह कहा । ज्ञान का सर्वालम्बनरूप अव्यय विवर्त से ही सम्बन्ध है । इस श्रालम्बनरूप अव्ययप्रधान आत्मा की न आप उपासना कर सकते एवं न इसे कर्म में अग्रणी बनाया जा सकता । यह केवल बुद्धिगम्य ( जानने की वस्तु ) है - " तद्विज्ञानेन परिपश्यन्तिः धीरा । " इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर महर्षि कठ कहते हैं— एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ – कठोपनिषत् १ । २ । १७ उपर्युक्त आत्मविवर्त के वैज्ञानिक पृथक्करण से प्रसंस्कृतात्मा अभिनिविष्टों ने आज निराकार को उपास्यदेव मान रक्खा है । जहां उपास्य न निराकार आत्मा है, न साकार आत्मा, अपितु सगुण- सवि-कार देवसत्यात्मा है । तभी तो इसे उपास्य " देव " कहा जाता है, वहाँ निराकार की गाथा गाते रहने का कितना महत्त्व है? यह उन्हीं वेदभक्त निराकार - वादियों से पूछना चाहिए । हम तो विज्ञान प्रधान भारत-वर्ष की इस अवैज्ञानिकता से सिवाय दुःखानुभाव के और कर ही क्या सकते हैं? १ - षोडशी पुरुषोऽव्ययप्रधानः ----ज्ञानकाण्डम् २ -- ब्रह्म सत्यात्मगर्भितो देवसत्यात्माऽऽक्षरप्रधानः - उपासनाकाण्डम् ३ – पाञ्चभौतिकं जगत् क्षरप्रधानम् -- -- कर्मकाण्डम् १ - क्षराक्षरगर्भितः — — अव्यय: ( अमृतात्मा ) ----ज्ञानम् २ — क्षराव्ययगभितः - - अक्षर: ( ब्रह्मसत्यगर्भित देवसत्यात्मा ) – उपासनम् ३- अक्षराव्ययगभितः - क्षरः ( सर्वगभितं वैकारिकं जगत् ) - कर्म इन तीनों विवर्त्तो से विज्ञ पाठकों को यह --- विदित हो गया होगा कि, क्षराक्षरगर्भित अव्यय का ईश्वरसंस्था से सम्बन्ध है, क्षराव्ययगभित अक्षर का जीवसंस्था से सम्बन्ध है, एवं अक्षराव्ययगर्भित क्षर का जगत् संस्था से सम्बन्ध है । तीनों तीनों हैं, इसलिए तीनों ही पूर्ण है - " पूर्णमदः पूर्णमिदम् " – “ यद-मुत्र तदन्विह ", विज्ञानभाषा के अनुसार इन तीनों को " जगत् - ईश्वर - महेश्वर ' नामों से व्यवहृत किय. [ २ ९ ३ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् जाता है । जीवरूप भोक्ता सुपर्ण ईश्वररूप अक्षरप्रधान ब्रह्मसत्यात्मगर्भित उसी देवासत्यात्म नामक साक्षी सुपर्ण का अंश है । न अव्यय जीव बनता, न क्षर । जीव बनता है देवसत्यात्मरूप अक्षर का अश | अक्षर को पराप्रकृति कहा जाता है । यही जीवसृष्टि का प्रवर्तक है । इसी ग्रभिप्राय से भगवान् कहते हैं—

" इतस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥

यही अक्षर " ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते " के अनुसार ब्रह्म है । प्रकृति को ही वृहरणात् ब्रह्म कहा जाता है | अक्षर- प्रतिपादक शारीरक दर्शन के " प्रथातो ब्रह्म जिज्ञासा " वाला सर्वधर्मोपपन्न यही अक्षरब्रह्म है । विश्व सम्बन्ध से आरम्भ में प्रतिपादित मायादि ६ प्रों परिग्रहधम्मों का पूर्ण विकास यही होता है । वेदा-न्तदर्शन ने— “ जन्याद्यस्य यतः " के अनुसार विजिज्ञास्य ब्रह्म को जन्मस्थितिभङ्ग का कारण माना है | ऐसा ब्रह्म निर्धर्मक व्यापक तत्त्व नहीं हो सकता । वह तो एकमात्र ग्रक्षर ही हो सकता है । कारण-" तथाऽऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ” ( मुण्डकोपनिषत् २।१।१ ) इत्यादि श्रुति अक्षर को ही जन्मस्थिति भङ्ग का कारण बतलाती है । " श्रव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवयन्तगमे । रात्र्या-गमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ( अक्षरे " ) इत्यादि स्मृतियाँ भी उक्त श्रौत अर्थ का ही समर्थन कर रही. है । ऐसी स्थिति में जो व्याख्याता अभिनिवेश में पड़कर ग्रक्षरब्रह्म प्रतिपादक वेदान्त दर्शन को ग्रखण्डब्रह्म का प्रतिपादन मान रहे है, यह उनका प्रौढिवाद ही समझना चाहिए । क्षर कार्यरूप जगदीश्वर है, ग्रव्यम कार्यकारणातीत सर्वालम्बन तत्त्व है । इन तीनों पूर्णेन्द्रों से अक्षर द्वारा श्रद्धेन्द्र जीवसृष्टि का विकास होता है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । जहाँ तक हमारा अनुमान है, पाठक इस श्रात्मविवर्त से ऊब गये होंगे । अच्छा तो एक बार अपने उपास्यदेव ( विराट् प्रजापति ) के दर्शन कर विश्राम कीजिए । प्रदिति का वैश्वानर - हिरण्यगर्भ- स्वरूप बतलाते हुए इस में अग्नि वायु प्रादित्यात्मक, तीन देवताओं की सर्वज्ञात्मक विराट् के दर्शन सत्ता बतलाई गई है । अग्नि के ये तीन विवर्त्त जहाँ देवतासम्बन्ध से पूर्व -कथनानुसार ३३ अवस्थानों में परिणत होते हैं, वहाँ यज्ञ की अपेक्षा से इसकी १० कलाएं हो जाती हैं । दशाक्षरछन्द को ही विराट् छन्द कहा जाता है - " दशाक्षरा वै विराट् ” ( शत ० १।१।१।२२ ) । पार्थिव प्राणाग्नि तत्त्व दशकल बनता हुआ, प्रतएव विराट्संपति से युक्त होता हुआ विराट् प्रजापति नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । त्रिवृत्स्तोमपर्यन्त एकल गार्हपत्याग्नि है, पञ्चदश पर्य्यन्त अष्टकले धिष्ण्याग्नि है, एवं एकविंश स्तोम पर्य्यन्त एकल ग्राहवनीयाग्नि है । इन तीनों श्रग्नियों की स्व - स्व स्तोमों में तो उक्भावस्था रहती है, शेष दोनों स्तोमों में यही प्रर्करूप से व्याप्त रहते हैं । त्रिवृतिरूप पृथिवी पर्य्यन्त अग्नि उक्थरूप से, पञ्चदश एवं एकविंश पर्य्यन्त प्रर्करूप से व्याप्त है । पञ्चदश-रूप अन्तरिक्ष में धिष्ण्यरूप वायव्याग्नि उक्थरूप से, एकविंश एवं त्रिवृत् में अर्करूप से व्याप्त है | एकवि-शस्तोमरूप द्युलोक में इन्द्ररूप प्रादित्याग्नि उक्थरूप से, एवं त्रिवृत् - पञ्चदश में अर्करूप से व्याप्त है । इस प्रकार महापृथिवी ( अदिति पृथिवों ) के अवयव भूत ६-१५-२१ स्तोमात्मक पृ ० अन्त द्यौः तीनों में अग्नि-वायु - इन्द्र, तीनों की व्याप्ति सिद्ध हो जाती है । यह अवश्य समझ लेना चाहिए कि, स्व स्व स्थान में तीनों [ २६४ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड पुरुषः ( कार्यकारणातीतः प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् अव्यय संस्था [ पूर्ण पुरुषः ] परिलेख: -क्षराक्षर गर्भितः अव्ययप्रधानः ब्रह्म- देवसत्याधिष्ठाता अमृतात्मा अव्ययः अक्षरः भरः आलम्बनम् पोडशी ( पूर्णं ) प्रजापति ( पुरुष ) नाम से प्रसिद्ध अमृतात्मा ईश्वर - जीव - जगत् इन तीनों विवर्त्ती में क्रमशः श्रव्यय-अक्षर – क्षर ग्रात्मावयव हो जाते हैं । उक्त मूर्ति केवल अव्ययप्रधान है । इसी कारण यह ईश्वर संस्था मानी गई है, क्योंकि ईश्वर संस्था में ही श्रात्मा का श्रव्यय भाग विकसित होता है । इसी संस्था में ज्ञानतत्व प्रधान होता है । क्योंकि अव्यय प्रधान ग्रात्मा की न श्राप उपासना कर सकते हैं, न ही इसे कर्म में ग्रग्रणी बनाया जा सकता है । यह केवल वुद्धिगम्य है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 324

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बाद विज्ञान प्रथम अक्षर संस्था [ पूर्ण प्रकृति ] परिलेख: -सराव्ययगभितः प्रधानत्यात्मकः प्राकृतारमा -प्राणात्मविज्ञानोपनिषत अक्षरः क्षरः अव्ययः प्रकृति -( कारणम् ) कर्मी क्षराव्यपगर्भित अक्षर प्रधान ब्रह्मसत्यात्मक प्राकृतात्मा ( पूर्ण प्रकृति ) के जीद जगत् - ईश्वर ये तीन विवर्त हो जाते हैं । इनमें प्राकृतात्मा समान है परन्तु इन तीनों विवर्ती के क्रमश अक्षरः - क्षरः प्रव्ययः ये तीन प्राकृतात्मकावयव हो जाते हैं । उक्त प्राकृतात्मा मूर्ति में केवल अक्षर ही प्रधान है, इसीलिए यह जीवसंस्था मानी गई है, क्योंकि जीवसंस्था में प्राकृतात्मा का विकास माना जाता है, तथा इसी संस्था में क्रियात्मा प्रधान होता है । श्रीवालचन्द्र पन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 325

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड क्षर संस्था [ पूर्ण विकृति ] परिलेख: -प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् अक्षराव्ययगभित क्षर प्रधानः विश्वमूर्तिविकृतात्मा कर्मकाण्डाधिष्ठाता भूतात्मा क्षरः अक्षरः अव्ययः विकृतिः ० कार्य विश्वम अक्षराव्ययगभित क्षर प्रधान विश्वमूर्ति विकृतात्मा जगत् जीव- ईश्वर इन तीनों विवर्तों में क्रमश क्षर-अक्षर - अव्यय ये तीन विकृतात्मावयव हो जाते हैं । उक्त मूर्ति क्षर प्रधान है । इसी कारण यह जगत् संस्था मानी गई है । क्योंकि जगत् सस्था में कर्मतत्त्व ही प्रधान होता है । इसीलिए क्षरमूर्ति विश्व कर्म्मकाण्ड का प्राश्रय है । कर्म का भौतिक क्षरविवर्त से ही सम्बन्ध होता है । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ',, जयपुर ।

पृष्ठ 326

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड समष्टि परिलेख ः— ( तदिदं सर्वम् ) प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ईश्वर अव्ययःअव्ययः

अक्षरः ।

क्षरः ॥9

अक्षरः ट अत्ययः॥ण क्षर: अक्षर: अव्यमी हृदयम् उक्त तीनो ( १-२-३ ) विवत्र्ती में क्षराक्षरगर्भित अव्यय का ईश्वर संस्था से, क्षरात्र्यय गर्भित अक्षर का जीव संस्था से तथा ग्रक्षराव्यय गर्भित क्षर का जगत् संस्था से सम्बन्ध है । प्रकृति के मृत प्रधान पर, मृत्यु प्रधान अपर भेद से दो विवर्त्त हैं । इस प्रकार अमृत मृत्यु सममूर्ति पुरुष अमृतप्रधाना मृत्युगर्भित पराप्रकृति और मृत्युप्रधाना श्रमृतगर्भिता अपरा प्रकृति भेद से एक ही आत्मा के तीन रूप हो जाते हैं । ये तीनों ग्रात्मरूप क्रमशः ईश्वर जीव जगत् की प्रतिष्ठा बनते हैं । श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।

पृष्ठ 327

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् की क्रमशः प्रधानता है । अतः अग्निपृथिवीलोक का वायु अन्तरिक्षलोक का एवं श्रादित्ययुलोक का अधिपति माना जाता है । स्वस्थान से अतिरिक्त तीनों की दोनों स्थानों में गौरखता है । साथ ही में लो क्यभेद से तीनों के नाम - रूप- कर्म भी बदल जाते हैं । पार्थिव उक्थ अग्नि पवमान कहलाता है, ग्रान्त-रिक्ष्य अर्कारिन पावक कहलाता है, एवं दिव्य अर्कानि शुचि नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिव वायु मातरिश्वा ( पिण्डावच्छिन्न वायु ) कहलाता है । आन्तरिक्ष्य वायु यम कहलाता है । दिव्य वायु पवित्र नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिव इन्द्र वासव कहलाता है । अान्तरिक्ष इन्द्र मरुत्वान् कहलाता है, एवं दिव्य इन्द्र मघवा नाम से प्रसिद्ध है | देवत्रयी के इसी त्रिवृद्भाव का स्पष्टीकरण करते हुए निम्नलिखित निगम वचन हमारे सामने आते हैं । ( १ – " स वा ग्रग्नये पवमानाय निर्वपति ” – | २ -- प्राणो ( प्राणाग्निः ) वै पवमानः ". ०२।२।१६ ) ३- " यो वा अग्निः पवमानः " १ पवमानः २४ स यदग्नये पवमानाय निर्वपति यदेवास्था-स्यां पृथिव्यां रूपं तदेवास्यैतेनाप्नोति ” ५ – " यदस्य पवमानं रूपमासीत् तदस्यां-पृथिव्यां व्यधत " २ - ( शत ० २।२।१।६ ) - ( ऐ ० २।३७ ) - ( शत ० २।२।१।१५ ) शत ० २।२।१।१४ ) १ - " प्रथाग्नये पावकाय निर्वपति ' ( शत ० २।२1१1७ ) २– “ अन्नं वै पावकम् ” -- ( शत ० २।२1१1७ ) पावकः -- २ ३– “ यत् ( अग्ने: ) पावकं ( रूपं ) तदन्तरिक्षे ( न्यधत्त ) " - ( शत ० २।२।१।१४ ) ४ - " अथ यदग्नये पावकाय निर्वपति - यदेवा-स्यान्तरिक्षे रूपं तदेवास्यतेनाप्नोति " ( १ - - " अथाग्नये शुचये निर्वपति ". } - शत ० २।२।१।१५ ) शत ० २।२।१६ २ - " वीर्य्यं वं शुचिः " -३ शुचि: --- ( शत ० २।२।१८ ) ३ – " अथ यत् ( अग्नेः ) शुचि: ( रूपं ) तद्दिवि ( न्यधत्त ) " - ( शत ० २ | २ | १ | १४ ) ४– “ अथ यदग्नये शुचये निर्वपतिः यदेवास्य-दिवि रूपं तदेवास्यं तेनाप्नोति " [ २ ९ ५ ] } - ( शत ० २।२।१।१५ )

पृष्ठ 328

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् १ १ - " प्रयं वै वायुर्मातरिश्वा योऽयंपवते " -मातरिश्वा - २२ – “ सर्वादिशो ( भूपिण्डस्य समन्तात् ) ऽनुविवाति, २ यमः सर्वादिशो ऽनुवाति स वा एष मातरिश्वैव " १ – “ अयं वै यमो योऽयं ( वायुः ) पवते " -२ - " यमो ऽवा अस्या अवस्थानस्येष्टे " ३ १ पवित्र: -१ वासव: ---२ मरुत्वान्-३ मघवा १ श्रग्नि-- " अयं वै पवित्रं योऽयं ( वायुः ) पवते " -२ – “ पवित्रं वै वायु: -- " इन्द्रघोषस्त्वा वसुभिः पुरस्तात्पातु " २ – " ( वासवो वृत्रहा वृषा ) " -१ - " इन्द्रो वै मरुतः क्रीड़न: " २ – " ( इन्द्रो मरुत्वान्) ' शत ० ६।२।३।२ ) तै ० ब्रा ० २।३।६।६ ) - ( शत ० ६ । १ । २।१२ ) शत ० ८।१।१।३ ) शत ० १।१।३।२ ) - ( तै ० ब्रा ० ३।२।५।११ ) - ( शत ० ३ | ५ | २ | ४ ) - ( अमर ) ( गो ० उ ० १।२३ ) अमर: ) १ - " इन्द्रो वै मघवान् " - ( शत ० ४।१।१५ ) २ - " ( मघवा बिड़ोजा: ) ( अमर: ) १ – पवमानाग्निः – त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्नः पार्थिवः — उक्थरूपः २ – पावकाग्निः -- पञ्चदशस्तो ० आन्तरिक्ष्यः अर्करूपः ३ – शचिरग्निः - - एकविंशस्तो ० दिव्यः ——-- अर्करूपः - पृथिवि प्रधानः १ - मातरिश्वा वायुः ——- त्रिवृत् ० पार्थिवः--उक्थरूपः २ वायुः २ यम वायुः नवदशः प्रान्तरिक्ष्यः --.. - अर्करूपः --- प्रन्तरिक्ष प्रधानः ३- पवित्रवायुः - एकविंश ० दिव्यः --- अर्करूपः १ - वासव इन्द्रः ——— - त्रिवृत् ० पार्थिवः —— - उक्थ रूपः ३ इन्द्रः-२ - मरुत्वानिन्द्र: -- पञ्चदश ० आन्तरिक्ष्यः --- श्रर्करूपः -द्य प्रधानः ३ – मघवाइन्द्र-- एकविंश ० दिव्यः - -- अर्करूपः [ २६६ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् अग्नि वायु इन्द्र ( श्रादित्य ), इन तीनों देवताओं के ( प्रत्येक के ) तीन - तीन रूप क्यों हो गए? इस प्रश्न का समाधान तानूनप्त्रविज्ञान पर निर्भर है । जिस याज्ञिक प्रक्रिया - विशेष के कारण इन तीनों देवताओं के शरीर सुरक्षित रहते हैं । जिसयज्ञ के आधार पर इनके तनू गिरने नहीं पाते, वही यज्ञेष्टि " तानूनप्त्रेष्टि " नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिव अग्नि प्रर्थशरीरी है, आन्तरिक्ष्य वायु ज्ञानशरीरी है, एवं दिव्य इन्द्र ज्ञानशरीरी है, ज्ञान - क्रिया अर्थ, तीनों स्वतंत्र रहकर कभी विकसित नहीं हो सकते । इन तीनों में अर्थ एवं क्रिया के बिना ज्ञान यद्यपि स्वस्वरूप से रह सकता है, परन्तु अर्थ, एवं क्रिया बिना नित्यधर्म्मा ज्ञान को आलम्बन बनाए जीवित ही नहीं रह सकते । यदि ज्ञान को अर्थ, तथा क्रिया का सहकार प्राप्त नहीं होगा, तो वह निर्विकल्पक बनता हुआ विज्ञान ( जानना ) कोटि से बाहर मात्र निकल जायगा, परन्तु इस की स्वरुप हानि नहीं होगी । " प्रयं घटः - श्रयं पट: - तमहं जानामि " इस प्रकार का लौकिक ज्ञान बिना अर्थ ( विषय ) के कभी प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । उधर क्षणिक क्रिया बिना ज्ञानाश्रित विषय ( अर्थ ) को अपना आधार बनाए सर्वथा अनुपपन्न है । इस प्रकार विश्वोपाधिक ज्ञान - क्रिया - अर्थ, तीनों की ही स्वस्वरूपसिद्धि के लिए परस्पर तीनों का सहयोग अपेक्षित है । जब तक तीनों पृथक् है - ( यद्यपि ऐसा संभव नहीं है ), तब तक तीनों ही प्रासुर भावापन्न नास्तिसार बल से अभिभूत होते हुए पराजित हैं । जब तीनों परस्पर मिल जाते हैं, इस बात की प्रतिज्ञा ( शपथ ) कर लेते हैं कि, असुरबल को नष्ट करने के लिए हम सदा मिल जुल कर रहेंगे. कभी अलग नहीं होंगे, तो इस संघशक्ति के प्रभाव से तीनों का सम्पूर्ण पार्थिव त्रैलोक्य ( सम्वत्सर ) में एकच्छत्र शासन हो जाता है । सम्वत्सर में से असुर निकल जाते हैं । इसी शपथ ( प्रतिज्ञा ) से कारण इन के तनू नहीं गिरने पाते, अतएव शपथ को भी विज्ञान भाषा में ' तानूनप्त्र " नाम से व्यवहृत कर दिया जाता है । देवताओं का यह तानूनप्त्र कर्म्म ( शपथ कर्म्म ) वरुण के घर में होता है । भूपिण्ड के चारों ओर अर्णव व्याप्त है । यही ग्रापोमण्डल वरूणप्राण प्रधान होने से वारूणलोक कहलाता है । इसी वारुण ग्रप्तत्त्व के आधार पर इन्द्राविष्णु की स्पर्धा से वेद- लोक - वाक् साहस्रियों का वितान होता है. जैसा कि - ' इन्द्रश्च विष्णू यदपस्पृधेयाँ त्रेधा सहस्र ं वितवैरयेथाम् " इत्यादि रूप से पूर्व में कहा जा चुका है । इस तानूनप्त्र का विशद रहस्य शतपथ की तानूनप्त्रेष्टि में देखना चाहिए - ( शत ० ३।४।२ ) अग्नितत्त्व सदा गायत्री छन्द से गायत्राग्नि की आठ मात्राएँ हो जाती हैं । विवर्त्त बतलाए गए हैं । इस दृष्टि से पार्थिव छन्दित रहता है । अष्टाक्षर गायत्री छन्द के सम्बन्ध से इस अष्टाक्षर गायत्रछन्दा अग्नि के ही अग्नि - वायु - इन्द्र, ये तीन अग्नि - ( अग्नि ) - प्रान्तरिक्ष्य अग्नि ( वायु ) - दिव्याग्नि- ( इन्द्र ), तीनों की आठ - आठ मात्राएँ हो जाती हैं । पार्थिव अग्नि की आठ मात्रात्रों में से ४ मात्रा पर तो स्वयं अग्नि प्रतिष्ठित होता है, एवं शेष चार में से २ पर वायु, २ पर इन्द्र प्रतिष्ठित है । इस प्रकार अर्द्ध-भाग में अग्नि की सत्ता सिद्ध हो जाती है, एव प्रर्द्धभाग में वायु तथा इन्द्र दोनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । फलतः पार्थिव ग्रग्नि- अग्नि- वायु इन्द्रात्मक बनता हुआ सर्वमूर्ति बन जाता है । ग्रग्नि अर्थ है, वायु क्रिया है, इन्द्र ज्ञान है । अग्नि यद्यपि त्रिमूत्ति है, तथापि प्रधानता प्रथमूर्ति की ही है । अतः— इस त्रिदेवमूर्ति अग्नि की अर्थशक्ति का ही अधिष्ठाता माना जाता है । पृथिवी एक विश्व है, अन्तरिक्ष एक विश्व है, द्युलोक एक स्वतन्त्र ही विश्व है । इन तीनों विश्वों के अग्नि वायु - इन्द्र, ये तीन नर हैं । [ २६७ ]

पृष्ठ 330

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् त्रिमूर्ति तापधर्म्मा अग्नि इन्हीं वैश्वानरों के समन्वय से संपन्न हुआ है अतएव इसे " वैश्वानर " कहा जाता है | यह त्रैलोक्य में व्याप्त है, इसी आधार पर " वैश्वानरो यतते सूर्येण " ( ऋक्सं ० १ ९ ८१ ) श्रा यो द्यां भात्या पृथिवीम् " यह कहा जाता है ठीक यही व्यवस्था आन्तरिक्ष्य वायु, दिव्य इन्द्र की आठ - आठ मात्राओं के सम्बन्ध में समझिए । वायु में से चार में वायु २-२ में अग्नि - इन्द्र हैं । इन्द्र में से चार में स्वयं इन्द्र, २–२ में अग्नि वायु हैं । यही त्रिमूत्ति वायुप्रधान, श्रतएव क्रियाप्रधान वायु हिरण्यगर्भ नाम से, त्रिमूर्ति इन्द्र प्रधान, अतएव ज्ञान प्रधान इन्द्र सर्वज्ञ नाम से प्रसिद्ध है दूसरे शब्दों में यों कहिए कि, पार्थिव अग्नि- अग्नि है, इसमें सोमस्थानीय वायु इन्द्र की प्राहुति से वैश्वानर का जन्म होता है । वायु अग्नि है, इसमें अग्निीन्द्र की प्राहुति से हिरण्यगर्भ प्रकट होता है, एवं इन्द्र अग्नि है, इसमें वाय्वग्नि की प्राहुति होने से सर्वज्ञ का विकास होता है । सर्वज्ञ ( ज्ञान ) की प्रतिष्ठा हिरण्यगर्भ ( क्रिया ) है, हिरण्यगर्भ की प्रतिष्ठा वैश्वानर ( अर्थ ) है । वैश्वानर की प्रतिष्ठा भूपिण्ड है । भूपिण्ड से प्रारम्भ कर त्रिलयुक्त त्रिमूर्ति दशकल अग्निमूर्ति विराट् पुरुष खड़ा हुआ है । समष्टि रूप से एक अग्नि ही विराट् है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" दश वा एतानग्नींश्चिनुते । अष्टौ धिष्ण्यान्, आहवनीयं च-गार्हपत्यं च । तस्मादाहुविराडग्निरिति । दशाक्षरा हि विराट् । तान्नु सर्वान्नेक इवैवाचक्षते श्रग्निरिति । एतस्यैवैतानि सर्वाणि रूपाणि "

- शत ० १०।३।२।१ इति ॥

वैश्वानर इसके पाद है, हिरण्यगर्भ हृदयस्थानीय है, सर्वज्ञ शिरः स्थानीय है, भूषिण्ड प्रतिष्ठा है, जैसा कि पूर्व की ईश्वर प्रकृति में स्पष्ट कर दिया गया है । अग्नित्रयकृतमूर्ति सम्वत्सरात्मक यह विराट्-प्रजापति स्वसिसृक्षा से पतिपत्नीरूप धारण कर लेता है । विराट् अग्निमूर्ति है, यह अन्नाद की ही अव-स्थान्तर है | अन्न सोम के बिना यह अप्रतिष्ठित है । फलतः विराट् को प्रग्निसोममूर्ति मानना आवश्यक हो जाता है । एक स्थान पर अग्नि आधार है, सोम आधेय है, यही पति है । अन्यत्र सोम आधार है, अग्नि प्रधेय है, यही पत्नी है । सोमगभित ग्रग्नि वृषा है, अग्निगर्भित सोम योगा हैं । वृपा पुरुष है, योषा स्त्री है । दोनों स्वतन्त्र विराट् हैं । दोनों में १०-१० कल अग्नि विद्यमान है । केवल अग्नि सोम की प्रधानता, अप्रधानता का तारतम्य है । दोनों एक मूर्ति बनकर त्रैलोक्य में प्रतिष्ठित हैं । दोनों में प्रधानता अत्ता अग्नि पुरुष की ही है, अतः विराट् को पुरुष शब्द से ही व्यवहृत कर दिया जाता है । योषा - वृषात्मक इसी विराट् - मिथुन से प्रजोत्पत्ति होती है । पति - पत्नी- भाव से यह विराट् सर्वत्र विराज-मान हो रहा है । यह " विराजते " से ही विराट् नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । हमारे प्रकरण का यही साक्षी सुपर्ण है । तन्त्र परिभाषा के अनुसार यही ' पक्षीराज ' नाम से प्रसिद्ध है । उपनिषत् परिभाषा के अनुसार यही ' सर्वभूतान्तरात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है । बज्ञ परिभाषानुसार यही ' सर्वहुतयज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है | अध्यात्मभाषानुसार यही ' प्रत्यगात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है । विज्ञानभाषा में यही ' देवसत्यात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है - " सोऽनुध्यातव्यः, स विजिज्ञासितव्यः, स उपासितव्यः सोऽन्वेष्टव्यः " । इसमें श्रावरण मूलक [ २६८ ]