Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 331–340
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 331–340
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् क्लेशकमोदि का अभाव है । अतएव इस का क्लेशकर्म्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर: " यह लक्षण किया जाता है । इसी त्रैलोक्य व्यापक अग्निमूर्ति विराट की रुद्ररूप से भी उपासना की जा सकती है, ब्रह्मारूप से भी की जा सकती है, विष्णुरूप से भी की जा सकती है । क्योंकि अर्थशक्तियुत अग्नि का अव्यय के वाग्भाग से अनुग्रहित इन्द्र - सोम - ग्रग्नि समष्टिरूप तीनों ग्रक्षरों से सम्बन्ध है । अक्षरत्रय समष्टि ही रुद्र, किंवा शिव है । यह मूल में सब की प्रतिष्ठा बना हुआ है । व्यक्त मूर्तिक्षरप्रधान बनता हुआ यह देवादि -देव शीघ्र ही ग्रात्मसात् हो जाता है, अतएव इसे " श्राशुतोष " कहा जाता है । यही रुद्र त्रैलोक्याग्नि रूप परिणत होते हुए, विष्णु और ब्रह्मा की प्रतिष्ठा बनते हुए विश्वाधिप बन रहे हैं, जैसाकि भगवान् श्वेताश्वेतर कहते हैं-यो देवानां प्रभवोद्भवश्व विश्वाधिपा रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्वं स नो बुध्या शुभया सयुक्त । - श्वे ० ३।४ इस का पार्थिव प्राणाग्नि से सम्बन्ध है, इसी को अग्निविज्ञान के अनुसार पूर्व में हमने पवमान कहा है । रुद्रमूर्ति पवमानाग्नि प्राणरूप होने से " ऋषि " है । अतः इसे ऋषि शब्द से व्यवहृत किया गया है " अग्नि ऋषिः पवमान - इति " ( ऐ ० २।३७ ) । ऋषिमूर्ति आन्तरिक्ष्य दिव्याग्नियों की यही एकषि रुद्र मूल प्रतिष्ठा है, अतएव इसे महर्षि कहा गया है । मध्यस्थ आन्तरिक्ष्य अग्नि अव्यय के प्रारणभाग से अनु-गृहीत मध्यस्थ विष्णु - अक्षर से सम्बन्ध रखता है, एवं दिव्य ग्रग्नि अव्यय के मनोभाग से अनुगृहीत शीर्ष स्थानीय ब्रह्माक्षर से सम्बन्ध रखता है । इन तीनों में भी रुद्र क्षरप्रधान अमर है, विष्णु अक्षरप्रधान अक्षर है, एवं ब्रह्मा ग्रन्ययप्रधान अक्षर है । उपासना का प्रधान सम्बन्ध अक्षर से है, इसकी प्रधानता अक्षरमूर्ति विष्ण में है, अतः उपासनाकाण्ड में विष्णु ही प्रधान माने जाते हैं । इसी प्रधानता के आधार पर प्रजा को " वैष्णत्री ” कहा जाता है । रुद्र क्षरप्रधान अक्षर है, जैसा कि श्रुति कहती हैं-क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः । तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावाद्भयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥ श्वे ०१।१० अतएव भारतवर्ष में विष्ण की उपासना की अपेक्षा रुद्रोपासना की कम प्रधानता है । उधर अव्यय - प्रधान ग्रक्षरमूर्ति ब्रह्मा की उपासना का प्रचार तो और भी कम है, क्योंकि अव्यय प्रत्येक दशा में अनुषास्य ही रहता है । १ - वैश्वानरमूर्त्तिरिन्द्राग्निसमाक्षरमयः क्षरप्रधानः — रुद्रः २ - हिरण्यगर्भमूर्ति विष्ण्वक्ष रमयोऽक्षर मयोऽक्ष र प्रधानः – विष्णुः ३ – सर्वज्ञ मूत्तिर्ब्रह्माक्षरमयोऽव्ययप्रधानः--ब्रह्मा [ २६६ ] - विराट्
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् इन तीनों की समष्टि ही विराट् है । विराट् की उपासना से ईश्वर उपासित होता है । जो एक एक श्रृङ्ग ( देवता ) की उपासना करते हैं, वे भी परम्परया ईश्वर की ही उपासना करते हैं । १ - अन्नादाग्निः पार्थिवः --२ - दिश्याग्निः -- प्रान्तरिक्ष्यः --- अग्निः -वायुः - समन्वयात् -विराडुत्पत्तिः ३ – प्रन्नाग्निः - दिव्यः इन्द्रः १ – गार्हपत्याग्निरेकल: -—पार्थिवः २- धिष्ण्याग्निरष्टकल ः - - - - प्रान्तरिक्ष्यः ३ – ग्राहवनीयाग्निरेकलः---facu: ( १ - पवमानः पार्थिवाग्निः ( अर्थः ) १ - प्रर्थ: - २२ - मातरिश्वाः पार्थिववायुः ( क्रिया ) ३ – वासवः —— पार्थिवेन्द्रः ( ज्ञानम् ) R ---१ - पावक: - आन्तरिक्ष्योऽग्निः ( अर्थ ) - स एव रुद्र विष्णुब्रह्ममूर्तिर्दशकलो विराट् त्रिमूर्तिरग्निरर्थप्रधानः पार्थिवः ( १ ) २- क्रिया -- < २ - यमः - प्रान्तरिक्ष्यो वायुः ( क्रिया ) · त्रिमूत्तिर्वायुः क्रियाप्रधानः श्रान्तरिक्ष्यः ( ८ ) वैश्वानर | साक्षी प्रजापतिरीश्वर विराट् --दशकलो . ३ - मरुत्वान् - आन्तरिक्ष्य इन्द्रः ( ज्ञानम् ) ( १ - शुचिः - - दिव्याग्निः -- ( अर्थः ) ३ - ज्ञानम् -- < २ - पवित्रः - - - दिव्याग्नि - - - ( क्रिया ) ३ – मघवा - - दिव्य इन्द्रः — ( ज्ञानम् ) - त्रिमूर्ति रिन्द्रः - ज्ञानप्रधानो दिव्य: ( १ ) हिरण्यगर्भः | सर्वज्ञः पाठकों को स्मरण होगा कि, इस विराट् प्रकरण के आरम्भ में हमने महिमा - पृथिवी में रहने वाले अमृतभावापन्न अग्नि एवं सोम, दोनों की संभूय पांच अवस्थाएँ बतलाई हैं - ( देखिए पृ ० सं ० २६८ ) । पार्थिव अग्नि, वायु, आदित्य, तीनों की पूर्व में उक्थ - प्रर्क - भेद से दो दो अवस्थाएँ बतलाई हैं । इन दोनों में उक्थावस्था मूलप्रतिष्ठा बनती हुई आत्मा है एवं प्रर्कावस्था मूलप्रतिष्ठा बनती हुई प्राण है । प्राणों [ ३०० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् की प्रचीन, मुख्य, भेद से दो जातियाँ हैं । मुख्यप्राण ग्रात्मा है । यही उक्थ है, इसीको छान्दोग्य श्रुति ने उद्गीथ कहा है । इस उक्थ ( बिम्ब ) रूप उग्दीथात्मक प्रात्मप्राण से निकलने वाले पञ्चप्राण श्रनुचीन नाम से व्यवहृत होते हैं । ये ग्रङ्गप्राण हैं । " यस्मिन् प्रारणः पञ्चधा संविवेश ” ( मुण्डकोपनिषत् ३ | १ | १ ) के अनुसार आत्मप्राणरूप उस मुख्य प्राण में ये पांच अनुचीन श्रङ्गप्रारण नित्य युक्त रहते हैं । वह मुख्य-अग्नीषोमात्मक है । ग्रतएव उससे निकलने वाले ये पांचों प्रङ्गप्राण भी अग्नीषोमात्मक ही हैं । इन में तीन ग्रग्निप्रधान हैं, दो सोम किंवा श्रपप्रधान हैं । ये पांचों उसी उद्गीय की उपासना किया करते हैं । यही उद्गीथ ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ प्राण माना गया है । मुख्य प्रारण के इसी आत्मभाव का निरूपण करती हुई उपनिषच्छति कहाती है -" अथ ह य एवायं मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे । तं हासुरा ऋत्वा विदध्वंसुः + + आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते " ( छा ० ३।२ ) उद्गौथ में ' उत् – गो — थम् ' - तीन अक्षर है । उत्- सर्वोच्चभाव का सूचक बनता हुआ शिरः-स्थानीय है, ' गी ' - गच्छर भाव का सूचक बनता हुआ हृदयस्थानीय है, थम् - स्थितिभाव का सूचक बनता हुआ पादस्थानीय है | अन्त - मध्य - मूल, प्राण की इन तीन अवस्थात्रों के लिए ही क्रमशः उत् - गी -थम्, ये तीन अक्षर प्रयुक्त हुए हैं । तीनों में ' अम् ' इन्द्राग्नि सीमाक्षर है, ' गी ' विष्ण्वक्षर है, ' उत् ' ब्रह्माक्षर है । त्रिमूर्तिरूप यही एकमूत्ति सम्पूर्ण त्रैलोक्य का उद्गीथ ( प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण ) है । द्यौ - सामवेद -श्रादित्य, तीनों का ' उत् ' से सम्बन्ध है । अन्तरिक्ष - यजुर्वेद - वायु, इन तीनों का ' गी ' से सम्बन्ध है । पृथिवी - ऋग्वेद- श्रग्नि, इन तीनों का थम् - अक्षर से सम्बन्ध है । पृथिवी ही स्तोमभेद से पृ ० अ ० द्यौ, तीन रूप में परिणत हो रहा है । ऋग्वेद ही विज्ञान के तारतम्य से ऋक् - यजुः साम - रूप में परिणत हो रहा है । अग्नि ही अवस्था भेद से अग्नि - वायु - प्रादित्यरूप में परिणत हो रहा है । तीनों लोकों में प्रति-ष्ठित तीनों वेदों से कृतशरीरी तीनों देवता ही उत् गी -थम् हैं । यही ग्रापका सुपरिचित विराट् पुरुष है । यद्यपि प्रग्नि- वायु - प्रादित्य, तीनों ही प्राणमय हैं, तथापि श्रादित्य में प्राण की प्रधानता है । वायु में वाक्तत्त्व की प्रधानता है । अग्नि में ग्रन्न की प्रधानता है । प्राणमय ग्रादित्य उत् है, वाङ्मय - वायु - गी है; अन्नमय अग्नि थम् है, समष्टि उद्गीथम् है । उत्रूप श्रादित्य प्रकार है, गीरूप - वायु उकार है, थम्-रूप अग्नि मकार है, समष्टिरूप उद्गीथ ग्रोंकार है । " अथ खलु य उद्गीथः स प्ररणवः यः प्ररणवः स उद्गीथ: ' ( छा ० ३।५ ) के अनुसार यही प्रणव है । प्रणव की अकार कला का विकास प्रादित्यप्रधान सर्वज्ञ में है, उकार कला का विकास वायु - प्रधान हिरण्यगर्भ में है एवं मकार का विकास अग्निप्रधान वैश्वानर में है । इस दृष्टि से इस ईश्वर - प्रजापति का भी प्रणवमूत्तित्त्व सिद्ध हो जाता है— ' तस्य वाचकः प्रणवः । ' निष्कर्ष यही हुआ कि, उक्थ रूप अग्नि - वायु - प्रादित्य की समष्टि ही ' थम् - गी - उत् ' रूप उद्-गीथ प्राण है । यही मुख्य प्रारण है, यही आत्मा है । इस त्रिकल उद्गीथाक्षररूप प्राणात्मा के अर्क ही पञ्चप्राण हैं । उक्थाग्नि की प्रकविस्था श्राग्नेयप्रारण है, उक्थवायु की अर्कावस्था वायव्यवारण है, उक्थ श्रादित्य की अवस्था ऐन्द्रप्रारण है । भास्वर सोममयप्रारण सौम्यप्रारण है, दिक्सोमावच्छिन्न प्राण [ ३०१ ]
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् प्राप्यप्राण है | ये पांचों ग्रनुचीन प्राण उस ईश्वरात्मरूप मुख्य प्राण के इन्द्रिय स्थानीय है, जैसा कि अध्यात्मविवेचन से स्पष्ट हो जायगा । इसी प्राणरहस्य को लक्ष्य में रख कर सामश्रुति कहती है-' अथ खलु - उद्गीथाक्षराण्युपासीत इति ( श्रादेशः ) । प्रारण एवं उत्, प्राणेन ह्य ुत्तिष्ठति । वाक्- गोः, वाचो ह गिर इत्याचक्षते । श्रन्नं थम्, अन्ने हीदं सर्व स्थितम् । द्यौरेव उत्, ग्रन्तरिक्षं गीः, पृथिवी थम् । आदित्य एव उक् वायुर्गीः, श्रग्निस्थम् । सामवेद एवं उत्, यजुर्वेदो गीः, ऋग्वेदस्थम् " ( छा ० उ ०१।३।६ ) । ' ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत " ( छा ० १।४ ) ॥ इति ॥ ३ – लोकः - एकविंशः ( २१ ) - - - सामवेदः - प्रादित्यमयः - उत् - भास्वरसोमो दिक्सोम २ – ग्रन्तरिक्षलोकः - पञ्चदश: ( १५ ) यजुर्वेदः - वायुमय: -: I I गीः १ – पृथिवीलोक स्त्रिवृत: ( ६ ) - - - ऋग्वेदः - - श्रग्निमयः – थम् मुख्यप्राणः - आत्मा - श्रङ्गी -५ - दिक्सोमः उक्थ: --ग्रापः , पञ्च इति ० प्रतिष्ठिताः प्रा ० लोकाः सो ० वा द्यौ ० प्र चत्वारो पृ ० तत्र ० इति -- द्यो ० अ सोमदण्डः ० पृ सर्वज्ञाना ० हि वै ० त्रयाणामेतेषां आधारभूमिः ४ – भास्वरसोमः उक्थः सोमः ३- दिव्याग्निरुक्थः — प्रादित्यः - तत् प्रधानः सर्वज्ञः: - अकारः प्रथमाक्षर: - उत् २- प्रान्तरिक्ष्याग्निरुक्य: - वायुः तत्प्रधानो हिरण्यगर्भः उकारोद्वितीयाक्षरः गीः १- पार्थिवाग्निरुक्थः - प्रग्निः- तत्प्रधानो वैश्वानरः - मकारस्तृतीयाक्षरः थम् [ ३०२ ] — उग्दीथम्
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड अनूचीनप्राणः - ग्रङ्गानि -प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ग्रात्मा विराट् उक्थापः प्राणाः विराड्विभूतयः ५- त्रयस्त्रिशस्तोमावच्छिन्नाः – आप्याः -- प्रर्काः -श्राप्य प्राणः ) उक्थसोमः ४ – त्रिवस्तोमावच्छिन्नाः – – सौम्याः — अर्का: - ( सौम्यप्राणः ) उक्थादित्यः ३ - एकविंशस्तोमावच्छिन्नाः - दिव्याः - - अर्का: - ( ऐन्द्रप्राणः ) उक्थ वायुः उक्थाग्निः २ - पञ्चदश स्तोमावछिन्नाः - - आन्तरिक्ष्याः - अर्का: - ( वायव्यप्राणः ) : -१ - त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्नाः - - पार्थिवाः - - प्रर्का: - ( आग्नेयप्रारणः ) १ — ब्रह्माक्षरः ---- - प्राणः - - - उत् ( सर्वज्ञो ब्रह्मा ) -२ - विष्णुरक्षरः-- वाक्- -- गीः ( हिरण्यगर्भो विष्णुः ) ( मुख्य: - प्रारणात्मा ३ – इन्द्राग्निसमाक्षरः- ग्रन्नम् -----थम् ( वैश्वानरो रुद्रः ) आधारभूमि आधेया-उदीरूप विराट् प्रजापति साक्षी देवसत्यात्मा है । यही ईश्वर है, इसमें कोई सन्देह नहीं । साथ ही में उग्दीथरूप क्षुद्र विराट्प्रजापति भोक्ता देवसत्यात्मा है, इसमें भी कोई सन्देह नहीं, तथापि जिस प्रकार जीवात्मा एकाकी न रहता हुआ अपने परिकर के साथ रहता है, एवमेव उक्त ईश्वर भी अपने परिकर के साथ नित्य सम्बद्ध रहता है । जीवात्मा में ' शरीर - पाप्मा विभूति - मन - बुद्धि- महत् श्रव्यक्त- पुरुष ' इत्यादि परिकर हैं । ग्रतः परिकरविशिष्ट जीव ही जीव शब्द से व्यवहृत कर दिया जाता है । एवमेव भूः - विभूति चन्द्रमा सूर्थ्य - परमेष्ठी स्वयम्भू - पुरुष ' इत्यादि परिकरो से ईश्वरात्मा कभी पृथक नहीं होता, अतएव परिकरविशिष्ट ईश्वर ही ईश्वर कहलाने योग्य है । ईश्वरीय संस्था में जितने खंडात्मा है, उन सब की श्राधारभूमि वही पोडशीपुरुष है । दूसरे शब्दों में समप्टि में एकरूप से व्याप्त रहता हुआ भी पोडशीपुरुष खंडात्मोपाधि भेद से प्रत्येक का स्वतन्त्ररूप से प्रालम्बन बना हुआ है - " प्रविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् " । इसी विभक्तभाव के कारण ईश्वरीय, एवं जैवसंस्था में अनेक कलाएँ हो जाती हैं । इन विशेषकलाओंों का विचार आगे कीजिए । अभी दोनों की सामान्य कलाओं पर दृष्टि डालिए । एक प्रोर ईश्वरसंस्था को रख लीजिए, दूसरी और जीवसंस्था को रख लीजिए । दोनों का संस्थानक्रम आपको समान मिलेगा । संयती क्रन्दसी - रोदसी भेद से ईश्वर में तीन त्रैलोक्य हैं । रोदसी भूः है, क्रन्दसी भुवः है, संयती स्व: है । प्रत्येक लोक त्रिवृद्भाव से पुनः ' भूः भुवः स्वः ' भेद से तीन - तीन लोकों में [ ३०३ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् विभक्त है । इस प्रकार यद्यपि तीन के ६ लोक हो जाने चाहिए थे । परन्तु रोदसी त्रिलोकी का स्वर्लोक, ऋन्दसी त्रैलोक्य का भूलोक बन जाता है एवं क्रन्दसी का स्वर्लोक संगतीत्रैलोक्य का भूलोक बन जाता है । इस क्रम से दो लोकों का मध्य में अन्तर्भाव हो जाता है, ε के स्थान में सात ही लोक रह जाते हैं । एक - एक वितस्ति है । श्रतएव सप्त लोकात्मक ईश्वर को ' सप्तवितस्तिकाया ' कहा गया है । एक वितस्ति में १२ अङ्ग ुल होते हैं | संभूय सात वितस्तियों के ८४ ग्रङ्गल हो जाते है । ईश्वरात्मक विराट् पुरुष अपनी अङ्ग ुलियों के प्रमाण से ८४ ग्रङ्ग लात्मक है । जीव इसी का अंश है, फलतः इसमें भी इस जीव के अङ्ग लि प्रमाण से ८४ ग्रङ्ग ुल ही माने जाते हैं । अन्तर दोनों में केवल इतना ही है कि, ईश्वरीय परिमाण जहाँ वितस्ति नाम से व्यवहृत होता है, वहाँ जीव परिमाण प्रादेश नाम से प्रसिद्ध है । वितस्ति जहाँ १२ अङ्ग ुल की है, वहाँ प्रादेश १० ॥ ( साढे दस ) श्रङ्ग ुल का माना गया गया है । सप्तचिति-मय अतएव सप्तलोकात्मक अग्नि से अग्निमूर्ति ईश्वर जहाँ सप्तवितरितरूप होता हुग्रा ८४ ग्रङ्गल का है, वहाँ गायत्राग्नि की चिति के सम्बन्ध से अग्निमूर्ति जीव अष्ट प्रादेशमित होता हुआ ८४ श्रङ्गल का है । गायत्राग्नि से ही जीवसंस्था का स्वरूप निर्माण हुआ है । गायत्राग्नि ग्रष्टाक्षर बनता हुआ गायत्री छन्द से छन्दित ( सीमित ) है । एक एक ग्रक्षर एक - एक स्वतन्त्र प्राण है । एक गायत्राग्नि ऐसे आठ प्राणों की समष्टि है “ प्रादेशमितो वं प्राणः ( कौ ० ब्रा ० २ | ३ | ) इस श्रीत सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक प्राण की व्याप्ति प्रादेशमित है । ब्रह्मरन्ध्र से कण्ठ पर्य्यन्त एक प्रादेश, कण्ठ से हृदयपर्य्यन्त दूसरा प्रादेश, हृदय से नाभिपर्य्यन्त तीसरा प्रादेश, नाभि से ब्रह्मग्रन्थिपर्ण्यन्त चौथा प्रादेश, यहाँ से गोडों तक दो प्रादेश, यहाँ से पादपर्य्यन्त दो - प्रादेश, संभूय पुरुषशरीर में आठ प्रादेश हैं । सब के संकलन से ८४ अङ्ग ुल हो जाते हैं । एक छः मास का शिशु भी अपनी अपनी ग्रङ्ग ुली के परिमाण से ८४ ग्रङ्गल का है, साढे तीन हाथ का एक दीर्घकाय मनुष्य भी अपनी अङ्ग ुली के परिमाण से ८४ ग्रङ्ग ुल का ही है । यह समा-नता सर्वात्मना केवल पुरुष ( मनुष्य ) के साथ ही समन्वित होती है, अन्य प्राणियों के साथ नहीं जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । ईश्वर यदि पादस्थानीय वैश्वानर भाग से भूपिण्ड पर खडा है, तो तत्समानधर्मा पुरुष भी अपने पैरों से इसी भूपिण्ड पर प्रतिष्ठित है । पैर से आरम्भ कर हृदयपर्यन्त रोदसी त्रैलोक्य है । हृदय से प्रारम्भ कर तालुमूल पर्य्यन्त क्रन्दसी त्रैलोक्य है एवं यहां प्रारम्भ कर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त संयती त्रैलोक्य है । ईश्वरीय संस्थावत् ब्रह्मरन्ध्र में स्वयम्भू प्रतिष्ठित है, तालुमूल में ब्रह्मस्तन ( कागली ) रूप से पर-प्रतिष्ठित है, हृदय में प्रज्ञानचन्द्रमा के आधार पर विज्ञानसूर्य्य प्रतिष्टित है । ईश्वरशरीररूप विश्व के केन्द्र में यदि सूर्य्य है, तो जीवशरीररूप विश्व के केन्द्र में विज्ञानात्मा प्रतिष्ठित है - " श्रादित्यो वं विश्वस्यहृदयम् | " पाद से हृदय पर्य्यन्त पृथिवी लोक की प्रधानता है । तीनों में पुनः भूः – भुवः स्वः का विकास है । पृथिवीरूप भूलोक की प्रतिकृति ब्रह्मग्रन्थि ( गुदस्थान ) है, यही पुच्छ प्रतिष्ठा है, प्रतिष्ठा ही पृथिवी है - ( देखिए शत ० ६ । ६ । १ । १५ ) । ब्रह्मग्रन्थि से प्रारम्भ कर पादमूल पर्य्यन्त पार्थिव प्राण की प्रधानता है, अतएव इस प्रादेश को हम महिमापृथिवी मानने के लिए तय्यार हैं । पादमूल से आरम्भ कर गौड़ों तक त्रिवृत्स्थानीय पृथिवी लोक है, यही स्तौम्य - त्रिलोकी का भूलोक है । यहां से जङ्घामूल तक का प्रदेश पञ्चदश स्थानीय अन्तरिक्ष लोक है, यही स्तौ ० का भुवर्लोक है । यहां से नाभि पर्य्यन्त [ ३०४ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ईश्वरसंस्था-षोडशीपुरुष: प्रमृतात्मा १- सत्यलोकः १--- स्वयम्भूः २ - तपोलोकः २ -- -१३ – जनल्लोक ३ - परमेष्ठी ४ – महर्लोक: -----५ - - स्वर्लोकः ३ --- सूर्य - स्वः प्राणात्म विज्ञानोपनपत् - स्वः : 22 -भुव संयतीत्रिलोकी -स्वः भूः -भुवः भुवः भूः क्रन्दसीत्रिलोकी [ ३०५ ] एकविंश स्थानीय लोक । यही स्तौ ० का स्वर्लोक है । तीनों की समष्टि रोदसी त्रिलोकी का भूल.क है । नाभि एवं हृदय के मध्य का प्रदेश रोदसी त्रिलोकी का अन्तरिक्ष लोकात्मक भुवर्लोक है, विज्ञान प्रज्ञान प्रतिष्ठा रूप हृदयस्थान रोदसी का द्युलोकात्मक स्वर्लोक है । तीनों की समष्टि रोदसी त्रिलोकी है | हृदयरूप द्युलोक ' क्रन्दसी त्रिलोकी का भूलोक है, हृदय से ' तालुमूल तक का प्रदेश क्रन्दसी का अन्त-रिक्ष लोकात्मक भुवर्लोक हैं, स्वयं तालुस्थान क्रन्दसी का द्युलोकः स्थानीय स्वर्लोक है । यही संयती त्रैलोक्य का भूलोक है, शिरीगुहा संयंती का भुवर्लोक है, ब्रह्मरन्ध्र संयती का स्वर्लोक है । इस प्रकार ईश्वर विवर्तवत् जीवसंस्था में सातों लोकों का संस्थान सिद्ध हो जाता है । यहां केवल विषमता इतनी ही है कि, जीवतत्त्व अध्यात्मसंस्था में, रोदसी त्रैलोक्य में प्रतिष्ठित है एवं ग्रधिदेवत में, स्तोम्यत्रिलोकी में प्रतिष्ठित है । स्तौत्रिलोकी का द्युलोक स्थानीय, रोदसी त्रिलोकी का भूलोक स्थानीय ब्रह्म ग्रन्थि-स्थान वैश्वानर की प्रतिष्ठा है । नाभि और ब्रह्मग्रन्थि का मध्यस्थान तेजस की प्रतिष्ठा है, एवं स्वयं नाभि प्राज्ञ की प्रतिष्ठा है । हृदय का अधः प्रदेश चन्द्रात्मक प्रज्ञान की, स्वयं हृदय सूर्यात्मक विज्ञान की, ब्रह्मरन्ध्र स्वयम्भु की प्रतिष्ठा है । हृदय से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त सोमदण्ड है । इसके आधार पर तीन आग्नेय प्राण, दो सौम्य प्रारण प्रतिष्ठित हैं । मूल में रहने वाला सौम्य ( भास्वरसौम्य ) प्राण इन्द्रियमन है, वाक् ( मुख ) अग्निप्रधान है, प्रारण ( नासिका ) वायुप्रधान है, चक्षु श्रादित्यप्रधान है, श्रोत्र दिक्-सोम्य प्राणप्रधान है । अधिदैवत में ये पांचों स्तोम्य त्रिलोकी में ही प्रतिष्ठित हैं । भूवायु का अंश ही अध्यात्मा में हंसात्मा हैं, भूपिण्डांश ही बाह्यात्मा है । इस प्रकार दोनों संस्थानों के सम्बन्ध में – “ यदे -वेह तमुत्र । यमुत्र तदमुत्र तदन्विह " यह श्रौत सिद्धान्त सर्वात्मना संगत होरहा है, जितने पदार्थ ईश्व-रसंस्था में है, उतने तो जीवसंस्था में हैं ही परन्तु प्रज्ञापराधवश जीनसंस्था में कुछ और भी पदार्थ सम्मि-लित हो जाते हैं । वे ही आगन्तुक पाप्मा ईश्वर और जीव के पार्थक्य के कारण हैं । यदि इन प्रतिव-न्धकों को हटा दिया जाता है, तो जीव अपना जीवत्त्व छोड़ता हुआ ईश्वरकोटि में प्रविष्ट हो जाता है ।
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सप्तवितस्तिकायः -ईश्वरः श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड १ - चन्द्रमाः ६ — भुवर्लोकः ४ - = < २ – त्रायुः ३- मरुत्वानिन्द्रः -भुवः ७- भूलोकः -- ५-प्राणात्मा देवसत्यः त्रिलोकी रोदसी -- दि ० सौ ० प्राण: ( ५ ) -- भा ० सौ ० प्राणः ( ४ ) सर्वज्ञः -- ऐन्द्रप्राण: -हिरण्यगर्भः वायव्य प्राणः --- ( २ ) वैश्वानरः प्रग्नेयप्रारण: - - - ( १ ) एमूषवराहो भूषायुः भूषिण्ड: १ - - स्वयम्भूः - सत्यलोकः-२ -- सूत्र वायुः - - तपोलोक: -३ – परमेष्ठी: - जनल्लोकः ४ – शिवदायुः – महर्लोकः-५ – सूर्य: - - स्वर्लोकः स्वः ६ -- चन्द्रमाः - भुवर्लोकः - भुवः ७ - पृथिवी --- मूलोकः --- भूः रोदसीत्रिलोकी -भुवः [ ३०६ ] क्रन्दसीत्रिलोकी भुवः प्राणाः-अनूचीनाः स्तोम्यत्रिलोकी -मुवः बलाको संयती प्राणात्मविज्ञानोपनिषत्
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प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् -स्वः ] श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड जीवसंस्था-षोडशीपुरुषः - अमृतात्मा १ – सत्यः – १ – ग्रव्यकात्ना ( ब्रह्मरन्ध्र ) २ – तपः ———— * - - - ( शिरोगुहा ). ३ - जनत् – २ – यज्ञात्मा --- --- ( ब्रह्मस्तन ) २४ - महः ------—— - ( उरोगुहा ) ५ – स्वः —– ३– विज्ञानात्मा - ( हृदयम् ) -१ - चान्द्रः प्रजानात्मा ६ - भुवः - ४ २ २ - शुक्र मूतिर्महानात्मा ७ - मूः - ५-पुरुषः अष्टप्रादेशमितः-३- प्रज्ञात्मकः प्राणः देवसत्य प्राणात्मा • ( उदरगुहा ) — भुवः - मन: ( ५ ) ) श्रोत्र ( ४ ) प्राज्ञ ---- नक्षुः ( ३ ) तेजम: - - - प्रारण (? ) वैश्वानरः - वाक् हंमात्मा - ( बस्ति गुहा ) शरीरम् THEEK TINK स्तोमत्रिलोकी भूः-रोदसी १ – ब्रह्मरन्ध्र से कण्ठपर्य्यन्त १ प्रादेश १० अंगुल २ – कण्ड से – हृदयपर्यन्त ३ – हृदय से - नाभिपर्यन्त ४ - नाभि से -" 1 " प्रथिनयन्त ५ – ब्रह्मथि से प्रजङ्गापय्र्यन्त ६ – श्रजङ्घा से " 71 कानपर्यन्त " ७ - जानुकाल से - प्रर्द्धपादपर्यन्त ८ - अर्द्धवाद से – गुल्फपय्र्यन्त " " स्वः मुवः [ ३०७ । अंगुल ८४-- भुवः क्रन्दसी - स्वः संयती
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् जिस प्रकार वै ० हि ० सर्वज्ञ की समष्टि का नाम ईश्वर है, एनमेव वै ० तैजस - प्राज्ञ, इन तीनों के समुचितरूप को ही जीवात्मा कहते हैं । जीवात्मा का वैश्वानर भाग अर्थप्रधान बनता हुआ शरीर रसादि सप्तधातु - उपधातुयों का निर्माण करता है । तैजसात्मा क्रिया का प्रवर्तक है । गर्भाशय में आरम्भ में शुक्र रूप में प्रतिष्ठित गर्भ प्रादेश पर्यन्त कैसे फैल गया? एवं वही बाहर निकलकर प्रादनवास्क होता हुआ ३ ॥ हाथ लम्बा कैसे हो गया? इन प्रश्नों का समाधान क्रियामूर्ति इसी तेजसात्मा पर ही अवलम्बित है, एवं विषय - भोग करना तीसरे ज्ञान प्रधान प्रांज्ञात्मा का काम है । यह प्राज्ञ आत्मा अन्नरसमय है । इसका अन्तर्य्याम सम्बन्ध शुक्र के द्वारा होता है, बहिर्य्यामि सम्बन्ध प्रपद से होता है, जैसा कि आगे जा कर स्पष्ट हो जायगा । वास्तव में यद्यपि देवसत्यात्मा का यह प्राज्ञ भाग ही भोक्तात्मा है, परन्तु यह तैजस - वैश्वानर से अविनाभुत रहता है, अतः तीनों के समुच्चित रूप को ही भोक्तात्मा मान लिया जाता है । ईश्वरीय देवसध्य के सर्वज्ञादि तीनों विवत्तों का दिग्दर्शन कराया जा चुका है । अब क्रमप्राप्त जीव-देवसत्य के तीनों खण्डात्मायों का क्रमशः दिग्दर्शन कराया जाता है । त्रिवत् पृथिवी, पञ्चदश अन्तरिक्ष, एकविंश यु, ये तीन विश्व हैं, तीनों विश्वों के शव -सोमपात् ( प्रतिष्ठावा- अधिष्ठाता ) क्रमशः श्रग्नि वायु प्रादित्य, तीन नर हैं, अर्थमूर्ति - वैश्वानरात्मा जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । पार्थिव अग्निनर में प्रान्तरिक्ष्य वायुनर तथा दिव्य इन्द्रनर की आहुति होने से अग्नि वायु - इन्द्र, तीनों का यजन ( संगति-करण ) होता है । इस रासायनिक संयोग लक्षण, अन्तर्य्याम सम्बन्धात्मक योग से जो एक अपूर्व सांयोगिक, वैकारिक भाव उत्पन्न होता है, वही वैश्वानर नाम से प्रसिद्ध है । अग्नि वायु इन्द्र तीनों ही प्राणाग्नियां है । प्राणमय होने से तीनों ही रूप - रस- गन्ध - स्पर्श - शब्द, इन मात्रात्रों से शून्य है । परन्तु एतल्लक्षण इन तीनों प्राणियों से उत्पन्न वैश्वानर में ताप है । सर्वाङ्गशरीर में यह व्याप्त हैं । पार्थिव प्राणाग्नि प्रपान है, ग्रान्तरिक्ष्य प्राणानि व्यान है, दिव्य प्राणाग्नि प्रारण है । इन तीनों में प्राणापान विचाली हैं, मध्यस्थ व्यान स्थिर है । यह स्थिरधर्म्मा व्यान ही ग्रहयज्ञपरिभाषा के उपांशुसवन ( शिला - सिल ) नाम से प्रसिद्ध है, एवं विचाली पार्थिव अपान अन्तर्य्यामि विचाली दिव्य प्रारण उपांशु नाम से प्रसिद्ध है, जैसा कि ग्रहश्रुति कहती है-" प्राणे ह वा अस्य ( यज्ञात्मानः ) उपांशुः, व्यान उपांशुसवनः, उदान ( पान ) एवान्तर्य्यामः " - शत ० ४ । १ । १ । १ यदि उपांशुसवन रूप व्यान हृषत् ( सिल ) है, तो उपांशु एवं ग्रन्तर्याम रूप प्राणोदान ( प्राणापान ) उपल ( लोढी ) है । उपांशुमवन रूप स्थिर शिला पर होने वाला उपांशु अन्तर्य्यामरूप प्राणापान व्यापार * शतपथ के ग्रहकाण्ड में उदानशब्द से सर्वत्र अपान ही ग्रभिप्रेत है । तभी प्राणापान व्यापार का समन्वय होता है । [ ३०८ ]