Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 341–350

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानापनिषत् ही ' उपांश्वन्तर्याम " नाम से व्यवहृत हुआ है । विप्राण मूलग्रन्थि से जब ऊपर की ओर ( हृदय की ओर जाता है, तो उस समय यह समान नाम से व्यवहृत होने लगता है । ज्यों - ज्यों यह ऊर्ध्वगमन करता है, त्यों - त्यों व्यानशिला पर आया हुआ दिव्य प्रारण पार्थिव प्राणाघात से ऊपर ( कण्ठ- प्रदेश की ओर ) चढ़ने लगता है, इस अवस्था में यही दिव्य प्राण उदान नाम से व्यवहृत होने लगता है । चरम सीमा पर ( मूलग्रन्यि नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मरन्ध पर ) पहुंचने के अनन्तर यह उदान प्रत्याघात से वापस लौट कर हृदय की ओर आने लगता है । इस प्रागच्छत् अवस्था में यही दिव्य प्राण प्राण कहलाने लगता है ज्यों ज्यों व्यानशिला पर जाया हुआ पार्थिव समान प्राण इस दिव्य प्राण के प्राचात से नीचे की घोर ( गुव स्थान की बोर ) घाने लगता है, इस प्रागच्छत् प्रयस्था में यही पार्थिव प्राण अपान कहलाने लगता हैं । चरम सीमा पर ( मूलग्रन्थि नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मग्रन्थि पर ) पहुँचने के अनन्तर यह उदान प्रत्याघात से वापस लौट पड़ता है । ज्यों ज्यों यह समानावस्था में परिणत होता हुआ ऊपर चढने लगता है, त्यों त्यों प्रारणावस्था में परिणत दिव्य प्राण ऊपर जाता हुआ उदानभाव में परिणत होने लगता है । प्राणापान की इसी निर्गच्छत् आगच्छत् अवस्था का नाम " प्राणदपानत् " है । प्राणाग्निमयी सौर रश्मियों में आप जो ताप ( गर्मी ) देखते हैं, वह इसी प्राणदपानत् व्यापार की महिमा है । " श्रस्य प्राणादपानती " ( यजु ० [ सं ० ३६ ) इसी वर्ष से प्राण वान - व्यानरूप इन्द्र अग्नि वायु के समन्वय से शरीर संस्था में तापलक्षण अपूर्ण अग्नि उत्पन्न हो जाता है । यही आध्यात्मिक वैश्वानर है । क्रियामूर्ति तैजसात्मा ज्ञान-मूर्ति प्राज्ञात्मा, दोनों की मूल प्रतिष्ठा यह वैश्वानर है, एवं इसकी प्रतिष्ठा व्यान है । व्यानाधार पर प्रतिष्ठित यह वैश्वानर रुधिररूप श्राशय में व्याप्त रहता है । शरीर में जहाँ तक रुधिर की व्याप्ति है, वहीं तक वैश्वानराग्निव्याप्त है वहीं तक बेरवान राभिन्न तंज सप्राश व्याप्त हैं, इसी आधार पर " यावा वे रसस्तावानात्मा " यह कहा जाता है । केश लोम- नखाग्र भागों में रसरूप रुधिर का अभाव है । प्राणा-ग्नि से वारित ( निर्धारित प्रक्षिप्त ) मल भाग ( अग्नि का उच्छिष्ट भाग ) ही निवारित होने से बार है, वार ही बाल, किंवा बाल ( केशलोम ) है ' ख ' रूप इन्द्रियप्राणशून्य मल भाग ही " न - ख " के अनुसार नख है । लोकभाषा में यही नाखून ( सुन से विरहित भाग ) है । यहाँ अग्निग्स का अभाव है । अतएव इन में आत्मा नहीं रहता । अतएव इनके निकृन्तन से कोई पीड़ा नहीं होती, अपितु भार ( बोझ ) उतरा सा मालूम होता है । केश नखों का जो मूल भाग रसाग्निरूप रुधिर में अन्तः प्रविष्ट रहता है, उसमें अवश्य ही आत्मा है । यही कारण है कि यदि नापित की असावधानी से उस रसमय, अतएव आत्ममय केशनख मूल पर क्षुरिका ( उस्तरा ) से किसी प्रकार का प्राधात हो जाता है, तथा पीड़ा होने लगती हैं । अतएव श्रात्मव्याप्ति के सम्बन्ध में -- " श्रालोमभ्य श्रानखाग्रेभ्यः ' यह कहा जाता है । हम शरीर को जहाँ छूते हैं. गरम पाते हैं, यही वैश्वानर की दृष्टि ( त्वक्प्रत्यक्ष ) है, एवं कान - नाक बन्द कर लेने से जो एक धक् धक् शब्द सुनाई पड़ता है, वह इसकी भूति ( प्रत्यक्ष ) है । शरीर में तो अधिक भाग पानी का है, जैसाकि अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् में वास्मकत्वात्तु भूयस्त्वात् " इत्यादि सूत्रार्थ के सम्बन्ध में कहा जा चुका है । शरीररूप पात्र में पानी भरा है, नीचे के स्तर में वैश्वानर अग्नि प्रज्वलित हो रहा है । इसी अग्नि से वह पानी खोल रहा है । जलते हुए पानी का जो शब्द है, वही अनाहतनाव है । कान नाक बन्द करने पर हम इसे ही सुनते है । नाद शब्द को कहते हैं । ' संयोगाद्विभागाच्च शब्दाच्च शब्द निष्पत्तिः " ( वै ० द ०२ । २०३१ ) इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार शब्द आबात से उत्पन्न होता है । परन्तु यह शब्द बिना [ ३०६ ]

पृष्ठ 342

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् श्राघात के उत्पन्न होता हुआ अनाहत है । वैश्वानर की इसी दृष्टिश्रुति का निरूपण करती हुई मंत्री श्रति कहती है-" अन्यत्राप्युक्तमय मग्निवंश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेद-मन्नं पच्यते, यदिदमद्यते, तस्यैष घोषो भवति, यमेतत् कर विपिधाय शृणोति । स यदोत्क्रमिष्यन् भवति, नैनं घोष शृणोति । स वा एष पञ्चधात्मानं विभज्य निहितो गुहायाँ मनोमयः, प्राणशरीरः, भारूपः, सत्यसंकल्पः, श्राकाशात्मा " - ( ० उ २६ ) इति । प्राण व्यान अपान के उपाश्वन्तर्य्याम लक्षण प्राणादपानत् व्यापार से ही तापलक्षण वैश्वानर का जन्म होता है । जबतक वैश्वानर स्वरूप से प्रतिष्ठित है, तभी तक तैजसात्मा एवं प्राज्ञ श्रात्मा की स्वरूप रक्षा है, तभी तक जीवन सत्ता है । वैश्वानर के इसी सांयोगिक धर्मं का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है-" स एको नाशकत् । स पञ्चधात्मानं विभज्योच्यते, यः प्राणो ऽपानः, समान, उदानो, व्यान इति । प्रथायं य उर्ध्वमुत्क्रामति, एष वाव स प्रारणः । श्रथयोऽयमवाङ संक्रामति वाव सोऽपानः । प्रथ येन वैतानुगृहीतेत्येष वाव स व्यानः । अथ योऽयं स्थविष्ठो धातुरन्नस्यापाने प्रापयति, प्रणिष्ठोवाऽङ्ग समान यति एष वाव स समानसंज्ञा । उत्तरं व्यानस्य रूप चैतेषामन्तरा प्रसूतिरेवो-दानस्य । श्रथ योग्य पीताशीत्तमुद्गिरति निगिरति इति वैष वाव स उदानः । श्रथोपांशुरन्त र्थ्याममभिभवति, अन्तर्य्याम उपांशुं ( प्राणः अपानं अपानः प्रारणम् ) । चंतयोरन्तरादेवौष्ण्यं ( तापं ) प्रासुवत् । यदौष्ण्यं स पुरुषः । अथ यः पुरुषः सोऽग्निवंश्वानरः । " मं ० २।६ इति । जब तक ताप है, तभी तक जीवनसत्ता है । जब तक वैश्वानर है, तभी तक ताप है । जब तक प्राणापान का उपांश्वन्तय्यंमरूप प्राणदपानत् ( घर्षण ) व्यापार है, तभी तक वैश्वानर है । जब तक मध्यस्थ ब्यान स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित है, तभी तक उपांश्वन्तय्यम है । इस प्रकार परम्परया मध्यस्थ, प्रादेशमित, अतएव वामन नाम से प्रसिद्ध, ऊर्ध्वस्थ दिव्य सौरप्राणदेवता, एवं अधोऽवस्थित पार्थिव प्राणदेवताओं का अनुग्राहक व्यानप्रारण ही जीवनसत्ता का मूल आधार बन जाता है । इसी व्यानविज्ञान को लक्ष्य में रख कर उपनिषच्छ्रति कहती है— [ ३१० ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत्

ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति पानं प्रत्यगस्यति ।

मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ॥१ ॥

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुभाश्रितौ ॥२ ॥

— कठोपनिषत् ५।३४ यद्यपि पूर्व कथनानुसार अग्नि- वायु - इन्द्र तीनों का समुच्चित रूप ही वैश्वानर है । परन्तु ग्राधार मुख्यता भाव की ' के कारण प्रधानता इसमें ग्रग्नि की है । ग्रग्नि योनि है, वायु - इन्द्र- रेत है । दूसरे शब्दों में अग्नि आधार है, वायु इन्द्र आधेय है । चतुर्मात्रिक ग्रग्नि हैं, द्विमात्रिक वायु है, द्विमात्रिक इन्द्र है, जैसा कि ईश्वरीय देवसत्यनिरूपण में बतलाया जा चुका है । अग्नि का अर्थ मात्रा से सम्बन्ध है । अर्थ-भौतिक है । वैश्वानर में इसी की प्रधानता है । क्रियामूर्ति तेजस तथा ज्ञानमूत्ति प्राज्ञ, दोनों इसमें सुप्त हैं । अतएव जिन असंज्ञ जीवों में ( लोष्ठ - पाषाण - धातु ग्रादि जड़ पदार्थों में ) केवल वैश्वानर का विकास होता है, न उनमें क्रियारूप वृद्धि व्यापार देखा जाता, न उनमें भोग - सामर्थ्य देखा जाता | दूसरे शब्दों में लोकभाषा में धातुजीव जड़पदार्थ, ग्रादि नामों से प्रसिद्ध जीवों की जीवन सत्ता यही वैश्वानर है । श्रतएव इन्हें विज्ञान भाषा में ' ऐकात्मक ' जीव कहा जाता है, दर्शन भाषा में यही ' प्रसंज्ञ " ( जड़ ) नाम से प्रसिद्ध हैं । · शरीर में शिरा - धमनी - स्नायु, भेद से तीन प्रकार की नाड़ियाँ हैं । रक्तवहन करने वाली नाडियाँ " शिरा ' हैं । वायु वहन करने वाली धमनी हैं ' एवं ज्ञान का संचार करने वाली नाड़ियाँ " स्नायु " हैं । इन तीनों में से वैश्वानर के साथ रक्तवाहिनी ' शिरा ' नाम की नाड़ियों का ही सम्बन्ध है । रक्ताग्नि का वैश्वानर का आशय ( व्याप्तस्थान ) है, जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है । इन्हीं के द्वारा वैश्वानर अग्नि का सर्वाङ्गशरीर में सञ्चार होता है । भुक्त अन्न का परिवाक करना, केशलोमादि उत्पन्न करना, मुक्तान्न को रसासृङ्मांसादि धातुत्रों में परिणत करना, उत्पन्न धातुत्रों को स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रखना, अर्थशक्तिप्रधान वैश्वानर का ही कर्म्म है । साथ ही में वागिन्द्रिय, धातु, श्राग्नेय प्रारण ( समान - प्रपान ), शरीरसंस्था इनकी प्रतिष्ठा भी यही वैश्वानर है । भूताग्नि के सम्बन्ध से इस वैश्वानर को हम ' भूतात्मा ' कह सकते हैं । इस वैश्वानर का प्रभव त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न आधिदैविक वैश्वानरावच्छिन्न पार्थिव अन्नात्मक शुक्र है, प्रतिष्ठा ब्रह्मग्रन्थि है, योनि अन्न है, आशय सर्वाङ्ग शरीर है । त्रिमूर्ति इस वैश्वानर का स्वरूप निरूपण करती हुई वाजिश्रुति कहती है-स यः स वैश्वानरः- इमे स लोकाः । इयमेव पृथिवी विश्वं श्रग्निर्नरः ।

अन्तरिक्षमेव विश्वं वायुर्नरः । द्यौरेव विश्वं प्रादित्यो नरः ॥

- शत ० ६ | ३ | १ | ३ - * -[ ३११ ]

पृष्ठ 344

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् पार्थिव पञ्चदश स्तोम में वायुदेवता की प्रधानता है । यहाँ हृदय में वायु प्रतिष्ठित है । इस वायु के साथ पार्थिव अग्नि एवं दिव्य यादित्य का सम्बन्ध होता है । चतुर्मात्रिक वायु तेजसात्मा- क्रिया मूत्तिः में द्विमात्रिक अग्नि एवं द्विमात्रिक आदित्य का प्रवेश होता है । इस प्रकार वायुप्रधान वायु - अग्नि- आदित्य के समन्वय से जो सांयोगिक, श्वास-प्रश्वासरूप से प्रत्यक्षानुभूत अपूर्व भाव उत्पन्न होता है, वही " तेजसात्मा " है । यहाँ वा योनि है, अग्नि एवं आदित्य रेत है । दूसरे शब्दों में वायु श्रावार है, श्रग्नि है । अग्नि श्रादित्य श्रावेय हैं, सोम हैं । तंजस में प्रधानता वायु की ही है, उधर वायु ही एकमात्र क्रियातत्त्व का ग्रधिष्ठा है, अतः तत् प्रधान इस तैजसात्मा को हम ग्रवश्य ही क्रियाभूति मानने के लिए तय्यार हैं । " तेजो वे वायुः " ( तै ० ब्रा ० ३ | २ || १ ) के अनुसार वायु तेज है । इसी के सम्बन्ध से यह क्रियात्मा " तेजसात्मा " कहलाया है । औषधि वनस्पतियों में वैश्वानर के साथ - साथ इस तेजसात्मा का भी विकास रहता है । ज्ञानप्रधान प्राज्ञ श्रात्मा यहाँ सुप्त है, ग्रतएव इन्हें- श्रन्त - संज्ञ कहा जाता है - " अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुख दुःखसमन्विताः ” । दो आत्माओं के विकास के कारण ही इन्हें विज्ञानभाषा में " द्वघात्मक " जीव माना गया है । ये ही श्रर्द्धचेतन जीव हैं । इन का मूल पृथिवी के गर्भ म प्रतिष्ठित रहता है, अतः इन्हें मूलजीव भी कहा जाता है । तंजस के विकास से ही इन का ऊर्ध्वं गमन होता है, यही क्रियामूत्ति तैजसात्मा के प्रत्यक्ष निदर्शन हैं । इस तेजसात्मा का प्रधान सम्बन्ध वायुवाहिनी धमनी नाम की नाड़ियों से हैं । इन्हीं नाड़ियों के द्वारा यह वैश्वानर द्वारा निर्मित धातुयों का वायु द्वारा सर्वाङ्ग शरीर में संचार करता हुआ धातुयों को पुष्ट करता है । यदि तैजसात्मा न होता तो प्रादेशमित गर्भ कभी पुरुषाकार में परिणत न होता । शरीरगत दूषित भावों को निकालना, शारीरधातुत्रों का सर्वाङ्गशरीर में प्रसार करना, धातुनों को वृद्धि-गत करना, श्वासप्रश्वास का संचालन करना, इस तैजसात्मा के मुख्य कर्म हैं । प्राणेन्द्रिय ( नासेन्द्रिय ), वायव्याण ( व्यान ) प्रोज, इनकी प्रतिष्ठा भी यही तंजसात्मा है । वायुतत्व प्राणप्रधान होता हुआ ही त्रियामूर्ति है । इसी प्राण के सम्बन्ध से हम इसे " प्राणात्मा " नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । यही देव-सत्यात्मा का दूसरा विवर्त्त है । इस तेजसात्मा का प्रभव पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न आदिदैविक हिरण्यगर्भा-च्छिन्न आन्तरिक्ष्य वायु प्रधान ग्रन्नात्मक शुक्र है, प्रतिष्ठा हृदय है, योनि अन्न है, त्राशय सर्वाङ्ग-शरीर है । पार्थिव एकविंशस्तोम में आदित्य ( इन्द्र - ) तत्त्व प्रतिष्ठित है । इस इन्द्र तत्त्व के साथ पार्थिवअग्नि एवं प्रान्तरिक्ष्य वायु का सम्बन्ध होता है! यहाँ इन्द्र चतुर्मात्रिक है, अग्नि द्विमात्रिक ज्ञानमूर्ति - प्राज्ञात्मा है एवं वायु भी द्विमात्रिक है । अतएव इन्द्र की प्रधानता सिद्ध हो जाती है । इन्द्र योनि है, अग्नि एवं वायु रेत है । इन्द्र आधार है, अग्नि है, ग्रग्नि वायु आधेय हैं, सोम है । इन्द्र - तत्त्व एकविंशस्तोमावच्छिन्न द्युलोक की वस्तु है । इसके ऊपर ही त्रिणव - त्रयस्त्रिशस्तोमावच्छिन्न पारमेष्ठ्य वीघ्र सोम प्रतिष्ठित है । इस सोम का भी इन्द्र के साथ, सम्बन्ध हो जाता है । सोम महदश है, महान् ही ज्ञानधन चिदात्मा की योनि है । अतएव ( महदसोम सम्बन्ध से ) इस इन्द्र में चिच्छक्ति ( ज्ञानशक्ति ) का विकास हो जाता है । इन्द्र - सोम - चिदंश तीनों की समष्टि दिव्य इन्द्र है । [ ३१२ ]

पृष्ठ 345

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषद् इसके गर्भ में अग्नि वायु प्रतिष्ठित हैं । इस प्रकार सोमचिदशाभित इन्द्रप्रधान - इन्द्र - अग्नि वायुमृति इस तीसरे दिव्य श्रात्मा का ज्ञानमयत्व भली - भांति सिद्ध होजाता है । इसी ज्ञान के सम्बन्ध से इसे ' प्राज्ञात्मा ' कहा जाता है । चिविशिष्ट सोम प्रज्ञा है, तयुक्त प्रारण इन्द्र है । प्रज्ञाप्राण की समष्टि ही प्राज्ञात्मा है । इन्द्र ही चिदंशरूप ब्रह्म के समीपतम है, इसी आधार पर इसके लिए- " स हि नेदिष्ठं पस्पर्श " ( केनोप-निपत् ) यह कहा जाता है । भोग का ज्ञान से ही प्रधान सम्बन्ध है, अतः इस प्राज्ञ को ही हम प्रधान-तया " भोक्तात्मा " कहने के लिए तैय्यार हैं । नाथदन्त ( खूटी ) में टंगे हुए एक दबंग में जाने जाने वाले पदार्थों का प्रतिविम्व विकसित होता रहता है । प्रतिबिम्बरूप से वे पदार्थ दर्पण के उदय में मुक्त होजाते हैं । यही दर्पण का भोक्तृत्व है । जिसके उदर में जो वस्तु चली जाती है वह भोग्य है, भोग्य को उदर में रखने वाला अता हो भोक्ता है । यही भोग - भोक्ता की साधारण मीमांसा है । बिना बीध पदार्थ के यह भोग्न भोक्तृभाव उदित नहीं हो सकता एक पापाण न प्रतिविम्बों का भोक्ता हो सकता, न प्रतिबिम्ब पाषाण के उदर में मुक्त हो सकते । दर्पण वीघ्र है, अतः यहाँ भोक्तभोग्य भाव का उदय सुलभ है । वैश्वा-नर- तैजस - प्राज्ञ, तीनों में महत् सोम सम्बन्ध से एकमात्र प्राज्ञ ही वीघ्र है । इन्द्रिय - मन - बुद्धि के संयोग जनित व्यापार से पाने वाले प्रतिबिम्ब स्थानीय विषय संस्कार यही प्रतिबिम्बित होते हैं । यही संस्कारों की आवास भूमि है विषय संस्कार रूप से प्राशोदर में मुक्त है, अतः इसी को भोक्तात्मा मानना उचित होता है । इस प्राज्ञात्मा का प्रधान रूप से ज्ञानवाहिनी स्नायु नाम की नाडियों से सम्बन्ध है । इन्हीं नाडियों के द्वारा यह ज्ञानपारा सर्वत्र व्याप्त रहती है । यदि कहीं भी किसी प्रकार की भी पीड़ा होती है, तो इसी प्राज्ञ ज्ञान से तत्काल उसका अनुभव हो जाता है । यही प्राज्ञ सुख - दुःख भोक्ता है । यही संस्कार-वश जन्म लेता है । बही पाप - पुण्य का फल भोता है । यद्यपि व्यात्मक संसंज्ञ नाम से प्रसिद्ध कृमि - कोट-पक्षी - पशु - पुरुष, पांचों में प्राद का विकास है, दूसरे शब्दों में पांचों में ही वं ०० प्राज्ञ, तीनों बात्माओं का विकास है, परन्तु प्राज्ञ का पूर्ण विकास तो पुरुष में ही होता है । वं ० तं प्राज्ञ की समप्टि रूप यह देव-सत्यात्मा अर्थ - क्रिया ज्ञानमय है । यह खण्डात्मा अव्यय नाम से प्रसिद्ध मनः प्राणवाङमय उसी अखण्ड विश्वेश्वर आत्मा के आधार पर प्रतिष्ठित है । जिस क्षर भाग में आत्मा की मनः- प्राण - वाक्, इन तीनो कलाओं का पूर्ण विकास होता है, क्षरदृष्टि में वही क्षरतत्त्व पुरुष कहलाता है । धातु - मूल-पशु- पक्ष, आदि क्षर प्रजाएँ पुरुष नहीं कहलाती । कारण, इनमें वं ० तं ० प्रा ० अल्पमात्रा में अवस्थित है । मनुष्य में तीनों का पूर्ण विकास है, अत यही पुरुष कहलाता है । और जीवों की अपेक्षा वैश्वा-नर - तेजस प्राज्ञ के पूर्ण विकास के कारण एकमात्र पुरुष ही उस अव्ययेश्वर प्रजापति के नेदिष्ठ ( मिकट-तम ) कहलाता है । इसी विज्ञान के आधार पर - " पुरुष ये प्रजापतेनें दिष्टम् " ( शत ० २२५ | १ | १ | ) यह कहा जाता है । वैश्वानर अर्थशक्ति प्रधान है, यह अव्ययेश्वर की वाक् कला का विकास है । तेजस क्रियाशक्ति प्रधान है, यह अव्यय की प्रारण कला का विकास है । इस प्रकार वह देवसत्य तत्त्व मनः प्राण-वाङ्मय अन्यमेश्वर के क्षर भाग को आगे कर अग्नि वायु इन्द्र को अपना स्वरूप समर्थक बनाता हुआ वैश्वानर तेजस प्राज्ञरूप से अंशात्मना जीवस्वरूप में परिणत हो रहा है- " मर्मयांशो जीवलोके जीवभूत-सनातनः " ( गीता ) [ ३१३ ]

पृष्ठ 346

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् भूतात्मा वैश्वानर, प्राणात्मा तैजस, भोक्तात्मा प्राज्ञ, तीनों परस्पर अविनाभूत हैं । तीनों मिल कर ही प्राध्यात्मिक कर्मकलाप का संचालन करने में समर्थ होते हैं । कर्म में ज्ञान क्रिया ग्रर्थ तीनों का सहयोग अपेक्षित है । अतएव उक्त तीनों की समष्टि को हम " कम्र्मात्मा " नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । साथ ही में तीनों के अविनाभाव से समष्टि को भी वैश्वानरदृष्ट्या भूतात्मा, तैजसदृष्ट्या प्राणात्मा, प्राज्ञदृष्ट्या भोक्तात्मा कहा जा सकता है । इन तीनों में से प्राज्ञात्मा का प्रभव एकविशस्तोमावच्छिन्न श्राधिदैविक सर्वज्ञावच्छिन्न दिव्य इन्द्र प्रधान अन्नात्मक शुक्र है, प्रतिष्ठा ब्रह्मरन्ध्र है, योनि ग्रन्न है, आशय सर्वाङ्ग शरीर है । इस के अतिरिक्त पार्थिव इरारस प्रधान होने से हिरण्मय नाम से प्रसिद्ध यह पार्थिव प्राज्ञपुरुष प्रपद से भी प्रविष्ट होता है । ग्रतएव उत्पन्न शिशु के पैरों में ही सर्वप्रथम चेतना का विकास देखा जाता है | विषयानुभव, सुख - दुःख भोग, धातुवर्ग, का यथाव्यवस्थित संचालन, इत्यादि प्राज्ञ के मुख्यकर्म हैं । साथ ही में मन, चक्षुरिन्द्रिय, दिव्यप्रारण, आदि की प्रतिष्ठा भी यही है । पूर्व कथन से निष्कर्ष यह निकला कि अग्नि वायु प्रादित्य प्रधान वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञ की समष्टि रूप, ज्ञान - क्रिया अर्थ शक्तिमय उख्यत्रिलोकी में प्रतिष्ठित, वै ० हि ० सर्वज्ञमूत्ति साक्षी देवसत्य का अंशभूत चिविशिष्ट देवसत्य ही " जीवात्मा " है । स्थूलशरीर के नष्ट हो जाने पर यही कम्मत्मा कर्म्मफल भोगने के लिए लोकान्तर में जाता है । इस जीवात्मा का स्वरूप सुपर्ण ( गरुड़पक्षी ) जैसा है । पांच प्रग्नियों की चिति से इसका स्वरूप निष्पन्न हुआ । प्रकारान्तर से चार ग्रात्मा, दो पक्ष, पुच्छ प्रतिष्ठा, इस प्रकार सात अवयवों से इसका चयन हुआ है । विज्ञानभाषा में यही चिति सुपर्णचिति नाम से प्रसिद्ध है । चान्द्र मन भोगसाधन है । चान्द्र विवर्त में सोम- चिदंश प्रारण इन तीनों तत्त्वों का समावेश है । प्राण इन्द्र है ' सोम भूत है | इसी के सम्बन्ध से यहां चिदंश प्रतिष्ठित हुआ है । अतएव यह चान्द्र सोम भी दिव्य इन्द्र-वत् प्रज्ञा नाम से व्यवहृत होता है, जैसा कि पूर्व की महदात्मविज्ञानोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जा चुका है । इस प्राज्ञ प्राण की समष्टि ही प्रज्ञान सन है । बिना इसके विषयभोग सम्भव नहीं है । साथ ही में बिना बुद्धि एवं इन्द्रियों के भी भोग अनुपपन्न है । इसी आधार पर उक्त भोक्तात्मा का - " श्रात्मेन्द्रिय-मनोयुक्तं भोक्त्याहुर्मनीषिरण: " ( कठोपनिषत् १ | ३ | ४ ) यह लक्षण किया जाता है । अव्यक्त यज्ञात्मा-विज्ञान - महद्यक्त प्रज्ञान- शरीर की समष्टि ब्रह्मसत्य है, एवं वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ की समष्टि देवसत्य है । यह चान्द्र प्रज्ञान के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता, उसके बिना भोग भी नहीं बन सकता, अतएव ब्रह्मसत्यांशभूत इस चान्द्र प्रज्ञान का " एतद्वै देवसत्यं यच्चन्द्रमाः " के अनुसार देवसत्यरूप उक्त लक्षण जीवात्मा में ही अन्तर्भाव मान लिया जाता है । यह तो हुआ भूपिण्ड के आधार पर वितत पार्थिव उख्या त्रिलोकी से सम्बन्ध रखने वाले कर्मात्मा का संक्षिप्त स्वरूप परिचय | अब एमूषवराह नाम से प्रसिद्ध पार्थिव स्थिर वायु ( भूवायु ) से निष्पन्न होने वाले हंसात्मा की ओर विज्ञ पाठकों का ध्यान ग्राकर्षित किया जाता है । शुक्र -शोणित के समन्वित रूप में औपपातिक कर्म्म भोक्ता जीवात्मा गर्भाशय में प्रविष्ट होता है । ज्यों - ज्यों पार्थिव मात्रा की वृद्धि होती है, त्यों - त्यों गर्भ पुष्ट होने लगता है । वायुमूतिः- हंसात्मा ऋतुकाल में पिता योनिगत आग्नेय रुधिर में सौम्य शुक्र की प्राहुति देता है । सिक्त बीज औपपातिक आत्मा से ग्रनुग्रहित रहता हुआ एक ग्रहोरात्र की प्रतिष्ठा के अनन्तर कलल रूप में परिणत हो जाता है । ईषद्धनवर्तुलवृत्तभावापन्न शुक्रशोणित समष्टि [ ३१४ ]

पृष्ठ 347

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ही कलल है । सात रात्रि में बुबुदावस्था होती है । एक पक्ष में पिण्ड निष्पत्ति होती है । एक मास में कठिनता प्राती है । दो मास में मस्तक वनता है, तीन मास में पाद निर्माण होता है । चतुर्थ मास में अंगुलियाँ, जठर एवं कटि प्रदेश सम्पन्न होते हैं । पश्चम मास में मेरुदण्ड ( रीड़ की हड्डी ) बनता है । पष्ठमास में नासा चक्षु श्रौत्र की स्वरूप निष्पति होती है । सप्तम मास में जीवनीय शक्ति उद्बुद्ध होती है । ग्रष्टमास में सर्वाङ्ग निष्पत्ति होती है । ( इन सब अङ्ग पाङ्गों की बीजावस्था के अनुसार महर्षि चरक के मतानुसार सब की एक साथ अष्टम मास में पूर्ण निष्पत्ति हो जाती है - ( देखिए चरक सं ० शा ० ३ ) * पिता के रेत ( शुक्र ) की अधिकता से पुरुष ( लड़का ) प्रजा, माता के रेत ( शोणित ) की अधिकता से स्त्री ( लड़की ) प्रजा के चिन्ह बनते हैं । दोनों की समानता से नपुंसक प्रजोत्पत्ति होती है, एवं विषमता में हुति व्यर्थ जाती है । शुक्राहुति देते समय यदि पिता का चित्त व्याकुल रहता है, उस समय उसकी जिस इन्द्रिय में, जिस अवयव में बिकार रहता है, वही विकृतावस्था प्रजा में उत्पन्न हो जाती है । अन्ध-खञ्ज - कुब्ज- वामन - बधिर - प्रतिरिक्ताङ्ग आदि विकृत भावों का यही कारण है । योनिगत प्राग्नेयवायु शुक्र-गत सौम्यवायु, आङ्गिरस भार्गव वायुनों का यदि परस्पर संघर्ष हो जाता है, तो वहाँ का “ एवयामरुत् ” नाम से प्रसिद्ध रेतोधा मातरिश्वा वायु भी दो भागों में विभक्त होता हुआ शुक्र को दो भागों में विभक्त कर देता है | द्विधा विभक्त ऐसे शुक्र से यमज ( जोड़ली ) सन्तान उत्पन्न हो जाती है । यदि एवयामरुत् के तीन - चार ग्रथवा इससे अधिक विभाग हो जाते हैं, तो उतने में ही स्वतन्त्र गर्भ बन जाते हैं । इसी वायु-विभेद की कृपा से एक ही समय में सात सात गर्भों की स्थिति देखी गई है । इस गर्भोत्पत्ति क्रम से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, गर्भ उत्तरोत्तर घन बनता जाता है । नवम मासानन्तर एवयामरुत् के प्रत्याघात से जब वह गर्भाशय से बाहर निकलकर भूमिष्ठ होता है, तो इसके साथ उसी पार्थिव स्थिर वायु का सम्बन्ध होने लगता है । इस वायु में प्रश्मा सोम रहता है । वायुद्वारा श्रश्मा सोम की घनता उत्पन्न शिशु में धीरे धीरे प्रविष्ट होने लगती । यदि माता पिता सबल एवं पूर्ण स्वस्थ होते हैं, तो इन के मिथुनभाव से उत्पन्न शिशु में पृथिवी की एक साम्वत्सरिक परिक्रमा के अनन्तर ही इसमें ग्रश्मासोम Q " दन्त " ( दांत ) रूप से प्रतिष्ठित होजाता हैं । अश्मा सोमगभित एमूषवायु एक वर्ष में ही प्रविष्ट हो जाता है, इसकी सत्ता के द्योतक दांत ही है । पृथिवी का प्रातिस्विक प्राण पूषा है । यह अश्मा सोम - विरहित है । एक वर्ष तक बच्चे में इसी पार्थिव पूषा - प्राण की प्रधानता रहती है श्रतएव इस काल में बच्चे के दांत उत्पन्न नहीं होते । इसी विज्ञान के आधार पर - " तस्मादाहुरदन्तकः पूषा " ( शत ० १।७।४।७ ) यह कहा जाता है । जब तक दांत उत्पन्न नहीं होते, तब तक भूस्थिर वायु प्रविष्ट नहीं होता, दूसरे शब्दों में प्रविष्ट होकर भी स्थिर नहीं होता । दन्तपङ्क्ति उत्पत्ति के सहकाल में ही प्रविष्ट * प्राधिक्ये रेतसः पुंसः कन्यास्यादार्त्तवाधिके । नपुंसक तयोः साम्ये यथेच्छा पारमेश्वरी ॥ ( भावप्रकाश ) 9 पहले नीचे के दांत क्यों उत्पन्न होते? नीचे के पतले संहत, ऊपर के मोटे एवं वितत क्यों होते हैं? दंष्ट्रा वरीयसी क्यों होती है?, इत्यादि प्रशनों के समाधन के लिए शतपथ विज्ञान भाष्य द्रष्टव्य है | [ ३१५ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् होने वाला यही वायव्यांश " हंसात्मा " नाम से प्रसिद्ध है हंसात्मा के उपादानभूत वायु का एमूष वराह रूप से पूर्व में निरूपण किया जा चुका है अतः यहाँ पिष्टपेषण की प्रावश्यकता नहीं है । प्रकृत में केवल हंसात्मा के कुछ एक कम्मों का दिग्दर्शन करा दिया जाता है । हंसात्मा का उपादान भूवायु है । एक वर्ष के पार्थिव परिभ्रमण से शरीर में जब घनता ( प्रतिष्ठा ) श्राजाती है, तभी दांत उत्पन्न होते हैं, यह कहा जा चुका है । तभी हंसात्मा उत्पन्न होता है । भूवायु तब तक स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है, जब तक कि भूपिण्ड स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है । ठीक इसी प्रकार यह वायव्य हंसात्मा भी तक शरीर से अवश्य ही बद्ध रहता है, जब तक कि शरीरधातु प्रति-ष्ठित रहते हैं । जीवात्मा नाम से प्रसिद्ध पूर्वोक्त कर्मात्मा के शरीर से निकलते ही अव्यक्त - यज्ञ - विज्ञान-महत् - प्रज्ञान ग्रादि सब खण्डात्मा उत्क्रान्त हो जाते हैं । परन्तु शरीर - पिण्ड से सम्बन्ध रखने वाला यह हंसात्मा यही, इसी भौतिक मर्त्यं शरीरपिण्ड से बद्ध रह जाता है । यह तब तक शरीर - पिण्ड से बद्ध रहेगा, जब तक कि शारीर भौतिक धातु अग्नि के सम्बन्ध से विशकलित न कर दिए जायेंगे । इसकी उत्पत्ति दन्तोत्पत्ति समकालीन बतलाई गई है । अतएव जिस बालक के दांत पैदा नहीं होते, धर्मशास्रने उसे केवल भूमि में गाड़ने का प्रादेश दिया है । परन्तु दांत पैदा होने के अनन्तर यदि शव को नहीं जलाया जाता है, तो हंसात्मा को शरीर के साथ बंधा रहना पड़ता है । कर्मात्मा अपने गृह रूप शरीर को छोड़ कर लोकान्तर में कर्म्म भोगने के लिए चला जाता है परन्तु हंसात्मा प्राण शून्य प्रतएव मर्त्य शरीरगृह के साथ ही बद्धरहता है । इसी ग्राधार पर अन्य संप्रदाय वाले ग्राचार्यों ने ( मुहम्मदियों ने ) कर्म्मात्मा को “ सैलानी ” ( लोकान्तर में सैर करने वाला ), एवं हंसात्मा को " मक्कानी " ( गृहरूप शरीर में बद्ध रहने वाला ) कहा । जिसका शरीर भूमि में गाड़ दिया जाता है, उनका हंसात्मा वही बद्ध रहता है । जिस प्रकार एक पक्षी दिन भर इधर उधर घूम घाम कर सायंकाल अपने कुलाय ( घोंसले ) का श्राश्रय ले लेता है एवमेव यह हंसात्मा भी दिनभर इधर उधर घूमधाम कर पुनः उसी स्थान पर विश्राम करता है । " कब्रों से रुहें निकला करती हैं " यह सच्ची किंवदन्ती है । यह " रूह " वही हंसात्मा है | परम कारुणिक अतीतानागतज्ञ प्रार्य महर्षियोंनें अपनी आर्षदृष्टि मे हंसात्मा के इस शरीर बन्धन को देखा एवं इसे इस बन्धन से मुक्त करने के लिए ही शवदाह की धर्माज्ञा प्रचलित की । दुःख है कि, अना-दृष्टि वाले हठवादी इस मर्म को न समझते हुए आज भी अपना दुराग्रह नहीं छोड़ते । इस हंसात्मा की मुक्ति मर्यादित है । किन्ही ऋषियों का मत है कि, जब सृष्टि का प्रतिसंचर ( प्रलय ) होगा, तभी हसात्मा की मुक्ति होगी, तब तक हमात्मा इसी भूवायु में घूमता रहेगा । संभव है, इसी ग्राधार पर मुहुम्मदियों का – “ कयामत के दिन खुदा ताला रूह का फैसला करेंगे, जिनकी श्राखिरी पैगम्बर मुहम्मद साहिब सिफारिश करेंगे, उन्हें बहिश्त ( स्वर्ग ) बक्शी जायगी, जिनको वे काफिर कहेंगे, उन्हें दोजख ( नर्क ) मिलेगी " यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित हो । इतना अवश्य है कि, ईश्व रवादी आस्तिकों का हसात्मा सुखी रहता है एवं ग्रनीश्वरवादी नास्तिकों का हंसात्मा दुःखी रहता है । जिस मनुष्य का सात्त्विक - राजस - तामस, तीनों में से जैसा स्वाभाव होता है, उनके हंसात्मा का भी वैसा ही स्वभाव होता है । हंसात्मा का शरीर वायव्य है एवं इसमें २८ इन्द्रियाँ हैं । यह छोटे से छोटा शरीर [ ३१६ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् धारण कर सकता है, मोटा बन सकता है । तत्तद् विशेष योनियाँ धारण कर यह मनुष्यों का उपकार-अपकार करने में समर्थ है । यह एक प्रकार की प्रेतयोनि है । इसी हंसात्मा पर मेस्मेरेजम ( Maismaradum ) किया जाता है । रामचन्द्र - कृष्ण - परशुराम व्यास कपिल - करणादादि अवतार पुरुष एवं महापुरुषों का कर्मात्मा नित्य मुक्त था, परन्तु इनके हंसात्मा आज भी प्रतिष्ठित हैं । इतना ही नहीं निरोधरूपा संयम विद्या से आज भी इसका साक्षात्कार किया जा सकता है । यही हंसात्मा दर्शनभाषा में— “ अभिमानी ” देवता नाम से प्रसिद्ध है । " अमुक देवता ने दर्शन दिए " " अमुक मनुष्य श्राज हमें स्वप्न में दिखलाई दिया " " अमुक प्रेतात्मा श्राज हमें दीखा और उसने यह कहा " यह ' अमुक ' शब्द-वाच्य यही हंसात्मा है । मनुष्य जब घोर निद्रा में ( बेखबर ) सो जाता है, तो उसका हंसात्मा उसकी रक्षा करता है । आप सो रहे हैं । कर्मात्मा प्रज्ञान विज्ञान को साथ लेकर पुरीतति नाड़ी में प्रतिष्ठित हो रहा है । ऐसी अचेतनावस्था में यदि एक विपधर सर्प आपकी ओर आता है अथवा ऊपर की छत गिरना चाहती है अथवा कोई शत्रु आक्रमण करने आ रहा है, अथवा और कोई आकस्मिक ग्रापत्ति आ रही है, तो इस समय आप अकस्मात् हड़बड़ा कर जग पड़ते हैं, ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव है । यह कर्म्म उसी हंसात्मा, विचार में स्फूति डालकर अथवा अन्य योनि में ग्राकर संकेत द्वारा ग्रापको सावधान कर देगा । आप किसी विषय की गुत्थी ( ग्रन्थि ) सुलझाने में व्यस्त हो रहे हैं । एक व्यक्ति आपके सामने से कुछ बड़बड़ाता हुआ निकल जाता है । वह उस समय ऐसी बात बोलता है, जिससे आप की गुत्थी सुलझ जाती है । यह उसी हंसात्मा का संकेत है | बच्चे का हंसात्मा निर्मल, अतएव सत्यवादी होता है । इसीलिए शकुन परीक्षक बच्चे से प्रश्न कर उस के निर्णय के आधार पर शुभाशुभ की व्यवस्था कर लेते हैं । योग प्रक्रियाविशेष से वह हंसात्मा सिद्ध हो जाता है, एवं इससे यथेच्छ काम लिया जाता है । यही सिद्धि पातञ्जल योगदर्शन में " छाया पुरुषसिद्धि " कहलाती है । ग्राप सोते समय जरा दृढ़ भावना से यह विचार कर लीजिए कि, मुझे आज प्रातः ३ बजे उठना है । घोर निद्रा में निमग्न रहते हुए भी आप अपने उसी संकल्पित समय में जग पड़ेंगे । इस सम्बन्ध में हम आप से प्रश्न करेंगे कि, कर्मात्मा विज्ञान- प्रज्ञान, सब इस समय सुप्त थे, फिर किसने ग्राम को जगाया? इस प्रश्न का एकमात्र समाधान वही हंसात्मा होगा । साथ ही में यह भी स्म-र रखिए कि कर्मात्मा जिस समय शरीर छोड़ता है, उस समय शरीर की सुखी अथवा दुःखी जैसी अवस्था होती है, उस का हंसात्मा भविष्य में उसी अवस्था से युक्त रहता है । जीवित अवस्था में भी जो अवस्था शरीर की होती है, वही अवस्था हंसात्मा की रहती है । शरीर के जला देने पर यह स्वायतनभूत भूवायु में विचरा करता है । सौर प्रकाश इस का घोर शत्रु है, चान्द्रज्योति इसका परम मित्र है । हंसा-त्मा जब रहेगा छाया में, एवं चन्द्रिका में । धूप में यह क्षणमात्र भी नहीं रह सकता । इसी हंसात्मा के स्वरूप परिचय के लिए देव प्रतिमाओं के चारों ओर विशेषतः शिरोमण्डल के चारों और एक ज्योतिर्म -ण्डल बनाया जाता है । जिस का हंसात्मा सात्त्विक पनि ज्ञानयुक्त रहता है, उन मनुष्यों के शरीर के एवं मुख मण्डल के चारों ओर भी एक कांतिमण्डल रहता है । प्रतितेजस्वी के मुख पर साधारण व्यक्ति की आंखे नही ठहर सकती । यह मण्डल उसी हंसात्मा का है । तामस हंसात्मा का वहिमंण्डल अप्रत्यक्ष रहता है | इसी वायुमय हंसात्मा को लोकभाषा में - " वातावरण " कहा जाता है । इस के परिज्ञान से [ ३१७ ]

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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् मनुष्य के मानसिक भाव विदित हो जाते हैं । कारण, मनुष्य अपने मन में जैसा संकल्प करता है, उसका हंसात्ममण्डलरूप वातावरण, किंवा बहिमंण्डल वँसे भावों से युक्त हो जाता है । मार्मिक विद्वान इससे उस के अन्तर्भावों का पता लगा लेते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर यजुःश्रुति कहती है-" तस्मादाहुः - ' मनो वै देवा मनुष्यस्याजानन्ति ' - इति । मनसा संकल्प-यति, तत्प्राणमपिपद्यते, प्राणो वातं, वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुष मनः । तस्मादेतद् ऋषिणाभ्यनूक्तम् — " मनसा संकल्पयति तद्वातमपिगच्छति । वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथाः पुरुष ते मनः ॥ ” ( शत ० ३।४।२।६ ) इस हंसात्मा का प्रभव भूवायु है, प्रतिष्ठा बहिर्मण्डल है, योनि सम्वत्सर चक्र है, आशय सर्वाङ्ग शरीर है । ईश्वर शरीर में यही एमुषवराह नाम से प्रसिद्ध है, एवं जीव शरीर में यही " हंसात्मा " नाम से व्यवहृत होता है । “ त्रिवृतं च हंसामाहुः " ( अथर्व सं ० १०।८।१७ ), " हंसो वातस्य " ( यजुः सं ० २४।३५ ) " वायु बृतीयम् " ( शत ० १० । ६ । ३ ) इत्यादि मन्त्र ब्राह्मणोक्त प्रमाणों के अनुसार ही यह वायव्यात्मा " हंसात्मा " नाम से प्रसिद्ध है । लोकभाषा में जिस तत्त्व के लिए - हंसा उड़ गया, शरीर रह गया " यह किंवदन्ती प्रचलित है, वह " हंसा " ( पक्षी ) यही हंसात्मा है । हंसात्मा का यही संक्षिप्त स्वरूप निदर्शन है । प्रारण - श्रापः - वाक् - अन्न - श्रनाद्, इन पांचों पुरञ्जनों का पश्वीकृत रूप ही भूपिण्ड है, पांचों ही अग्नि मूर्ति है, जैसा कि पूर्व प्रकरणों में कई स्थलों में स्पष्ट किया जा चुका है । बाह्यात्मा भूतमूर्तिः अग्नि गायत्र छन्द से छन्दित रहने के कारण अष्टाक्षर माना जाता है । इस गायत्र भाव के कारण प्राणादि पांचों पुरंजनों की ( प्रत्येक की ) ग्राठ - प्राठ मात्राएं हो जाती हैं । इन में चार मात्रा में प्राणादि स्वयं रहते हैं, शेष चार मात्राएं इतर पुरञ्जनों में रहती हैं, यही प्रक्रिया पञ्चीकरण नाम ते प्रसिद्ध है । इन में यदि चतुर्म्मात्रिक अन्नाद है, एवं प्राण-ग्रापः वाक् - अन्न, ये चारों एक एक मात्रिक है, तो पञ्चीकृत प्रश्नाद का स्वरूप निष्पन्न होता है । यही पञ्चीकृत ग्रन्नाद विज्ञान भाषानुसार भूत किंवा महाभूत नाम से प्रसिद्ध है । इसी पञ्चीकृत अन्नादप्रधान पञ्च महाभूतात्मक भूत से भूपिण्ड निष्पन्न हुआ है । प्राण श्राकाश है, आप वायु है, वाक् तेज है, अन्न जल हैं, ग्रन्नाद मिट्टी है । " पृथिवी वै सर्वेषां भूतानां रसः " ( शत ० १४ | ६ | ४ | १ ) इस श्रौत सिद्धांत के अनुसार भूपिण्ड में पांचों महाभूतों का समन्वय है, तभी तो इस का सर्वभूत- रसमूर्तित्त्व सिद्ध हो सकता है । इन्हीं पञ्चात्मक पञ्च महाभूतों से शरीरयष्टि का निर्माण होता है । मांस अस्थि - कपाल त्वचा - मेद मज्जा - शुक्र, ग्रादि प्रापेक्षिक घन भाग पृथिवी है । स्वेद - मूत्र रस-असृक - लाला कफ, ग्रादि तरलभाग जल है । शारीर उष्मा ( गर्मी ) तेज है श्वासप्रश्वासादि वायु है । विवर आकाश है । इस प्रकार शरीरसंस्था में पाँचों महाभूतों का सर्वथा प्रत्यक्ष हो रहा है | पञ्च महाभूतों से निष्पन्न होने वाले ये शारीर महाभूत " सत्त्वभूत " किंवा भूतभौतिक नाम से प्रसिद्ध हैं! [ ३१८ ]