Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 351–360
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 351–360
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषद सत्त्वभूतों के मूल महाभूत हैं, महाभूतों के मूल अपवीकृत भूत हैं, इन के मूल पञ्चतन्मात्रा नाम से प्रसिद्ध भूत हैं । इन्हें ही ( जो कि सर्वथा अयौगिक हैं ) भारतीय विज्ञान ने " तत्व " नाम से व्यवहृत किया है । इन्हीं तत्त्वों की चरम यौगिक अवस्था शरीररूप सत्त्वभूत हैं । इन्हीं के सम्बन्ध से इस शरीर को को भूतात्मा कहा जाता है । पार्थिव उख्या त्रिलोकी से सम्बन्ध रखने वाला कम्र्मात्मा भी पार्थिव प्राण-प्रधान भूतमय बनता हुआ भूतात्मा है, इधर शरीर भी भूतात्मा है । उधर वायव्य हंसात्मा भी भूतात्मा है । तीनों में अन्तर केवल इतना ही है कि, कम्मत्मिहंसात्मरूप भूतात्मा प्राणप्रधान होते हुए अन्तरात्मा है एवं भूतप्रधान शरीररूप भूतात्मा बाह्यात्मा है । इन्हीं दोनों भूतात्मविवत के पार्थक्य का विस्पष्ट निरूपण करती हुई मत्रीश्रुति कहती है-है— " कोऽयमात्माख्यो योऽयं सितासितैः कर्मफलैरभिभूयमानः सदसद्योनिमापद्यता इति? अवाञ्चोर्ध्वा वा गतिर्द्वन्द्वैरभि-भूयमानः परिभ्रमति? ग्रस्ति खल्वन्योऽपरो भूतात्माख्यो योऽ-यं सितासितैः परिभ्रमति इत्यस्य ( प्राणात्मकस्य भोक्तुर्भतात्मन ) उपव्याख्यानम् । पञ्चतन्मात्रा भूतशब्देनोच्यन्ते । अथ पञ्च-महाभूतानि भूतशब्देनोच्यन्ते । अथ तेषां यत् समुदयं तच्छरीर-मित्युक्तम् । अथ यो ह खलु वाव शरीर इत्युक्तं स " भूतात्मा " इत्युक्तम् " ( मै ० उ ० ३ प्र ० ) इति । इस शरीररूप भूतात्मा का प्रभव भूपिण्डांशात्मक शुक्र - शोणित की समष्टि है, प्रतिष्ठा ग्रात्मा है, योनि ग्रन्न है, ग्राशय सम्पूर्ण अध्यात्मसंस्था है । यही इस प्राणात्माधिकरण का पांचवां विवर्त है । इस प्रकार भूषिण्ड, भूवायु, त्रिवृतस्तोगरूप पृथिवी में प्रतिष्ठित वैश्वानर, पञ्चप्रन्तरिक्ष में प्रति-ष्ठित हिरण्यगर्भ, एकविंश ० द्युलोक में प्रतिष्ठित सर्वज्ञ, इन पाँच पार्थिव विभूतियों से क्रमशः शरीररूप बाह्यात्मा, वायुरूप हंसात्मा वैश्वानरांशभूत वैश्वानरात्मा, हिरण्यगर्भांशभूत तैजसात्मा, सर्वज्ञांशभूत ' प्राज्ञात्मा, इन पाँच ग्राध्यात्मिक प्रपञ्चों का उदय हो जाता है, यह ग्रव तक के प्रकरण से भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । साथ ही में यह भी सिद्ध हो जाता है कि उक्त पांवों विवत्त में वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ की समष्टि हो भोक्तात्मा किंवा कम्मतिमा है । यही लोकान्तर में कर्म भोगने के लिए जाता है । साथ ही में विज्ञ पाठकों को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि उक्त पांचों विवर्त्ती से किसी विवर्त्त के साथ श्राद्धकर्म का कोई सम्बन्ध नहीं है । केवल गयाश्राद्ध का सम्बन्ध वायव्य हंसात्मा के साथ है जैसा कि आगे के श्राद्धप्रकरण में स्पष्ट हो जायगा । [ ३१ ९ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ३ - ५ - सर्वज्ञः २१ – एक ० द्यौः प्रज्ञात्मा ( ५ ) महापृथिवी भौम -विवर्त २-४-- हिरण्यगर्भः —–१५ – पञ्च ० अ ०-- तंज सात्मा ( ४ ) -- कम्मरमा ( १-३ -— वैश्वानरः ——- ε– त्रि ० पृ०—— वैश्वानरात्मा ( ३ ) २- २ - भूवायुः मूषवराह १ - १ - भूपिण्डम् —- पश्ञ्चमहाभूतानि -अन्तरात्मा → हसात्मा ( २ ) ] - - हंसात्मा शरीरम् ( १ ) ] - भूतात्मा ] बाह्यात्मा प्रकरणारम्भ से अत्र तत्र आधिदैविक - आध्यात्मिक, जिन दो संस्थानों का है, उक्तांश में दोनों ही समानधर्म्मा हैं । जितनी कलाएँ स्वरूप निरूपित हुआ ईश्वर में हैं, ठीक सर्वज्ञ - अल्पज्ञ समतुलन उतनी ही कलाएं जीत्र में हैं । ये सब तो दोनों के स्वरूप धर्म हैं । इनके अतिरिक्त विभूति - पाप्मा, ये दो विभाग बच जाते हैं । इन दोनों में से विभूति भाग ईश्वर का स्वरूप धर्म है, साथ ही में उसमें पाप्मा का प्रभाव है । जीव में रहने वाली विभूति पाप्मा के प्रभाव में जीव का स्वरूप धर्म है एवं पाप्मा के रहने पर वही विभूति प्राश्रित धर्म्मकोटि में प्रविष्ट हो जाती है । यही जीवेश्वर की पहली विषमता है । ईश्वर पूर्णेन्द्र है, सर्वज्ञ है, सर्वशक्ति है, सर्ववित है, जीव श्रद्धेन्द्र है, अल्पज्ञ है, अल्पशक्ति है, श्रल्पवित् है । यही जीवेश्वर की दूसरी विषमता है । इन सब विषमताओं का मूल पाप्मा ही है । इन पाप्मात्रों का ईश्वर संस्था से कोई सम्बन्ध नहीं हैं । यह जीवात्मा की स्वतन्त्र कमाई है । स्वतन्त्र कमाई क्या है, प्रज्ञापराध है, बन्धन के मूल हैं । यद्यपि बन्धन-मुक्ति - लक्षणा विभूति का भी यह संग्रह करता है, परन्तु वित्त- मोह से मुग्ध बना हुआ यह विशेषरूप से बन्धन के हेतुभूत पाप्मानों का ही संचय करता है । पशु - पक्षी - प्रादि आदि इतर योनियाँ प्राज्ञ भाग की अल्पता से प्रज्ञापराध करने में असमर्थ हैं । एकमात्र मनुष्य ही प्रज्ञा की पूर्णमात्रा लेकर उससे अनुचित लाभ उठाता हुआ प्रज्ञापराध कर बैठता है । इसकी स्वतन्त्रता प्रज्ञापराध के कारण इसीके बन्धन का कारण बन जाता है | जब से सृष्टिक्रम चला है, तब से अद्यावधि देवता - असुर - पितर पशु आदि किसी भी प्रजा ने ईश्वरीय सत्य - नियमों का उल्लङ्घन नहीं किया है । कारण इसका यही है कि, इनमें किसी में भी पूर्ण मात्रा नहीं है, अतएव इनमें से कोई भी ईश्वर प्रजापति के नेदिष्ठ नहीं है । एकमात्र मनुष्य ही ईश्वरी सम्पूर्ण सम्पत्ति प्राप्त कर नियति का प्रतिक्रमण करने लगता है— " ता इमाः प्रजास्तथैवोपजीवन्ति, यथैवाभ्यः प्रजापतिर्व्यदधात् । नैव देवा प्रतिक्रामन्ति, न पितरः, न पशवः । मनुष्या एवैकेऽतिक्रामन्ति " ( शत ० २४/२/५/६ ) । " देव - पितर- प्रसुरादि सबकी अपेक्षा ईश्वरीय मात्रा को पूर्णरूप से लेने के कारण, साथ ही में प्रज्ञाबल से अपनी मुक्ति का अधिष्ठाता बनने के कारण मानवतन उत्कृष्टतम, प्रतएव दुर्लभ है " – यह सर्वस्व ( पुराण ) का निश्चित सिद्धान्त है । परन्तु प्रज्ञापराधजनित पाप्मायों से प्राक्रान्त होकर मुक्ति के स्थान में यह अपने आपको और भी अधिक बन्धन में डाल लेता है । [ ३२० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् पूर्व में विभूति को हमने पाप्मा के सम्बन्ध ते जीव का ग्राश्रित धर्म कहा है एवं पाप्मा के अभाव में उसीको स्वरूप धर्म्म कहा है । इन विभूतियों के सम्बन्ध में इतना स्पष्टीकरण और कर लेना चाहिए कि कुछ विभूतियाँ तो ऐसी हैं, जो पाप्मा के रहने, न रहने, दोनों अवस्थाओं में स्वरूपधर्म्म ही बनी रहती हैं, एवं कुछ विभूतियां ऐसी हैं, जो पाप्मा के रहने पर उसी स्वरूप धर्म्मरूप में परिणत हो जाती हैं । जीववर्ग-के विभूति - पाप्मा - प्रपञ्च को थोड़ी देर के लिए छोड़िए । पहले ईश्वरीय विभूति का विचार काजिए । संख्याक्रन के अनुसार ईश्वर में २८२ ( दो सौ बियासी ) तो विभूति - कलाएँ हो जाती हैं एवं ७२ ( बह-त्तर ) आत्मकलाएँ हो जाती है । सम्भूय स्थूलदृष्टि से ईश्वर विराट् ३५४ ( तीन सौ चौवन ) कलाओं से युक्त माना जा सकता है । ग्रात्मकलाओं का दिग्दर्शन कराया जा चुका है । केवल विभूति - कलाओं के नामों का उल्लेख कर दिया जाता है । इस ईश्वरीय विभूति के भी सामान्य, विशेष रूप से दो विभाग हैं । इनमें सामान्य विभूतियाँ २३१ दोसौ इकत्तीस विशेष विभूति ५१ ( इक्यावन ) हैं । सम्भूय २८२ हो जाती हैं । इनमें २३१ सामान्य विभूतियों की ईश्वर, जीव दोनों में समानता है एवं ५१ विशेष विभूतियाँ साधारण हैं । इनमें से प्रथम सामान्य विभूतियों का ही दिग्दर्शन कराया जाता है । १ - ऋषयः १२ विरूपास इद् ऋषयः ) सब से पहली विभूति ' ऋषि ' है । असत् प्राण को ही ऋषि कहा जाता है । ये ही सृष्टि के मूल-प्रवर्तक हैं । इस ऋषि प्राण की एकषि द्वष- सप्तर्षि - त्र्यषि - श्रादि विभूतिलक्षण ' ऋषि ' तत्त्व अनेक जातियाँ हैं । " विरूपास इद् ऋषयस्त इद् गम्भीर वेपसः ” ( ऋक्सं ० १०।६२।५ ) के अनुसार यद्यषि ऋषि प्राण ग्रनन्त हैं, परन्तु सृष्टिविद्या में १२ ऋषि प्राणों को ही ईश्वर की प्रधान विभूति मान गया है । आप वसिष्ठ-कश्यप - भरद्वाज - जमदग्नि, यादि जितने ऋषि नाम सुना करते हैं, विश्वास कीजिए ये सब मौलिक प्राणों के नाम हैं । यह ऋषि प्राण वेदमूर्ति है, इसी ग्राधार पर " ऋषिर्वेदमन्त्रः " यह कहा जाता है । जिस ऋषि प्राण का जिस विद्वान् ने ग्रार्षदृष्टि से सर्वप्रथम साक्षात्कार किया, आविष्कार किया, प्रथम द्रष्टा वह विद्वान् उसी ऋषि प्रारण नाम से प्रसिद्ध होगया । वसिष्ठ - अगस्त्य - विश्वामित्रादि मौलिक ऋषिप्राणों के प्रथम द्रष्टा विद्वान् ही वसिष्ठ - प्रगस्त्य - विश्वामित्रादि नामों से प्रसिद्ध हुए हैं । इस ऋषि प्राण का-' रूपरसगन्धस्पर्शशून्यत्त्व मतएवाधामच्छदत्त्वं प्रारणत्वम् " यह लक्षण किया जासकता है । यह रूप रसादि से पृथक् होता हुआ नीरूप है, अतएव यह जगह नहीं रोकता । एक ही बिन्दु ( point ) में अनन्त प्राण समा सकते हैं । जिसे आप शक्ति ( Force ) कहते हैं, थोड़ी देर के लिए उसे ही आप ऋषि प्राण कह सकते हैं । प्राण सामान्य शब्द है । ऋषिवत् पितर देवता - गन्धर्व, सभी प्राण हैं । परन्तु जो मौलिक वेद-मूर्ति सत् प्राण है, उसे ही ऋषि कहा जायगा । इस ऋषिप्राण की विकासभूमि ईश्वरीय संस्था का " स्वयम्भू " भाग है । दूसरे शब्दों में अपौरुषेय वेदमूत्ति स्वायम्भुव ग्रसत् प्राण को ही ऋषि कहा जाता है । गोत्र सृष्टि का इसी ऋषि प्राण से सम्बन्ध है । इस विभूति का प्रधान कर्म्म है - ज्ञानतन्तुप्रसार । हमारे अध्यात्म में इस ईश्वरीय संस्था का जो ऋषि भाग प्राता है, वही " ऋषिऋण " नाम से प्रसिद्ध है । स्वाध्यययज्ञरूप ज्ञान दान ही ऋषिऋण का शोधक है । बिना अध्ययनाध्यापन ( वेदाध्ययनाध्या-[ ३२१ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् पन ) के हमारा आत्मा कभी ऋषिऋण से मुक्त नहीं हो सकता । आगे की सम्पूर्ण विभूतियाँ इसी ऋषि विभूति पर प्रतिष्ठित हैं, अतएव हम इसे मूलविभूति कह सकते हैं । जब कुछ नहीं रहता, तब एकमात्र इसी असत्प्राण का साम्राज्य रहता है । यही ग्रागे जाकर पितर- देवादि का उपादान बनता हुआ विश्व-सृष्टि का कारण बनता है - ( देखिए शत ० ६ | १ | १ ) । इस विभूति के प्रधान १२ विवर्त्त हैं । २ – पितरः ( ८ ) विजातीय अनेक अथवा दो मौलिक ऋषि प्रारणों के संयोग से उत्पन्न होने वाला यौगिक पूर्व-भाव ही पितृतत्त्व है । भार्गव - श्राङ्गिरस प्रारण के समन्वय से ही पितर विभूतिलक्षरण - पितृतत्त्व की स्वरूप निष्पत्ति होती है । यही पितर प्रारण मैथुनी सृष्टि का प्रथम आरम्भक है, अतएव इसे पितर ( वप्ता - बाप ) कहा जाता है । भार्गव प्राण सौम्य है, प्राङ्गिरस प्राण ग्राग्नेय है । दोनों ही पारमेष्ठय तत्त्व हैं । इन बारमेष्ठ्य तत्त्वों के समन्वय से उत्पन्न, दूसरे शब्दों में ऋषिप्रारण के समन्वय से उत्पन्न इन पितरों की ग्राठ जातियाँ हैं, जैसा कि ग्रागे की पितृस्वरूपनिरूपणोपनिषत् में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । अभी प्रकरण सङ्गति के लिए केवल यही जान लेना पर्य्याप्त होगा कि, अनेक ऋषि - प्राणों के योग से उत्पन्न मैथुनी सृष्टि का मूल प्रव-र्त्तक परष्मेठी से सम्बन्ध रखने वाला सांयोगिक श्रग्निगर्भित सोमप्रधान तत्त्व ( श्राग्नेय प्राणगर्भित सौम्य -प्राण ) ही पितृविभूति है । ३ – असुराः ( ९९ ) परमेष्ठी में प्रतिष्ठित भृगु की सौम्यावस्था का सम्बन्ध पितरों से है, एवं घनावस्थारूपनाप्यभाव का सम्बन्ध असुरों से । दूसरे शब्दों में प्राप्य पारमेष्ठ्य प्राण का ही विभूतिलक्षण - प्रसुरतत्त्व नाम असुर है । यह असुर प्राण संख्या में भी देवताओं से भी त्रिगुण है, एवं उत्पत्ति में भी प्रथम है । कारण, परमेष्ठी के अनन्तर ही देवावास भूमि-रूप सूर्य्य का उदय होता है । उधर देवता ३३ हैं, तो ग्रसुर प्रारण ६६ हैं । ये ही ग्रसुर प्राण जातियाँ-वृत्र, नमूचि, श्रररु, त्वष्टा, विरूपाक्ष, किलात, प्राकुली, आदि नामों से प्रसिद्ध है । बल प्रदान करना इस असुर प्राण का मुख्य कर्म है । देवता यदि ज्ञान प्रधान है, तो ग्रसुर बल प्रधान है । असुर एवं पितर दोनों विभूत्तियों का ईश्वरीय संस्था के दूसरे परमेष्ठी विवर्त के साथ सम्बन्ध है । ४ – देवाः ( ३३ ) परमेष्ठी के श्रृङ्गिरा नाम के मनोता से सोम - सम्बन्ध द्वारा जो एक ज्योतिर्म्मय प्राण उत्पन्न होता है, वही द्योतनात् देवता नाम से प्रसिद्ध है । अङ्गिरा की घनावस्था अग्नि विभूतिलक्षण- देवतत्त्व है, तरलावस्था बायु है, विरलावस्था आदित्य है । तीनों के आगे जाकर ३३ विभाग हो जाते हैं, जैसा कि पूर्व के अदिति प्रकरण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । ग्रग्निवायु- ग्रादित्यमूर्ति इन ३३ सों प्राण देवताओं की विकासभूमि ईश्वरीय संस्था का तीसरा विवर्त्त सूर्य्यं ही है । यही उस प्रजापति की चौथी विभूति है । इस देवप्राण का जो प्रवश अध्यात्म का प्रारम्भक बनता है, वही " देवऋरण " नाम से प्रसिद्ध है । ज्योतिष्टोमादि यज्ञ ही इस देवऋण के निराकरणार्थ उपयुक्त माने गये हैं । [ ३२२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ५ - मनवः ( ४ ) ६- गन्धर्वाः ( २७ ) ७ - ग्रहाः ( ४० ) ८ - पशवः ( ५ ) प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् उच्छिष्ट भागों के समन्वय [ ३२३ ] मूर्य्य संस्था के केन्द्र में रहने वाली वह विभूति, जो विराट्रूप से अण्डज पिण्डज - स्वेदज उद्भिज, इन चारों प्रजाश्नों का आरम्भक बनती है, वही " मनु " नाम से प्रसिद्ध है, विभूतिलक्षण - मनुतत्त्व जैसा कि आरम्भ के " अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् " के मन्वन्तर निरूपण में विस्तार से बतलाया जा चुका है । अतः यहां पिष्टपेषण की आवश्यकता नहीं है । यहां केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि अण्डजादि भेद से चार प्रकार का यह मनुस्तत्त्व सूर्य्यं की ही विभूति है । मनुस्तत्त्व ही मानव विवर्त्त की मूल प्रतिष्ठा है । सोमतत्त्व को श्राप्यप्राण प्रधान असुरों के आक्रमण से सुरक्षित रखने वाला सौम्य वायव्य प्राण गन्धर्व नाम से प्रसिद्ध है । गन्धर्व को अप्सरा प्राण का भी उपलक्षण विभूतिलक्षण - गन्धर्वतत्त्व समझना चाहिए | क्योंकि जहाँ गन्धर्व प्रारण रहता है, वहां अप्सरा प्राण अवश्य रहता है । गन्धर्व प्रारण ही चपलता - विलासिता का प्रवर्तक है । इसके २७ रूप है । इन सब का चन्द्रमा से सम्बन्ध है । अतएव गन्धर्व को हम चान्द्रविभूति कहने के लिए तय्यार हैं । चान्द्र सोम अर्करूप से वायव्यान्तरिक्ष में व्याप्त रहता है । वायु पात्र में प्रतिष्ठित यह चान्द्रसोम ही " ग्रह " नाम से प्रसिद्ध है । यह ग्रह जिस वायु में प्रतिष्ठित रहता है, वही विभूतिलक्षण - ग्रहतत्त्व वायु " ग्रहपात्र " नाम से प्रसिद्ध है । इस ग्रह सोम से ही ग्रहयाग निष्पन्न होता है । इस ग्रह तत्त्व की उपांशु श्रन्तर्याम उपांशुसवन - मरुत्वतीय ऐन्द्र - वायव्य-मंत्रावरुण - ग्रादि ४० जातियाँ हैं । यह एक प्रकार के गैस हैं । इन्हीं के समन्वय तारतम्य से विश्वचक्र सञ्चालित है । शतपथ ब्रह्मण के चतुर्थकाण्ड में इन चालीसों ग्रहों का सुविशद - सोपपत्तिक वैज्ञानिक निरू-पण हुआ है । हम ऐसा विश्वास रखते हैं कि जिस दिन भारतीय विद्वान् इन अान्तरिक्ष वायव्य ४० ग्रहों को पहचान कर इन से काम लेने लगेंगे, उस दिन पश्चिम का गैसकाण्ड इस ग्रहकाण्ड से ही ग्रस्त हो जायगा, परन्तु आवश्यकता है परीक्षा की । इस ग्रहविभूति का भी चन्द्रमा से ही सम्बन्ध है । त्रिवृत् पृथिवी, पञ्चदश अन्तरिक्ष, एकविंशद्यु, इन तीनों लोकों के तारतम्य से जो एक अनात्म्यभाव उत्पन्न होता है, वही पशु - विभूति है । इस विभूतिलक्षण- शुतत्त्व पशुविभूति के ' छन्दः - पोष - सलिल - प्रग्नि- प्रन्न ' भेद से ग्रवान्तर पाँच विभाग हैं । पाँचों ही पशु महापृथिवी रूप द्यावापृथिव्य हैं । इन पांचों में जो अग्नि नाम का पशु है, उसके पुनः अवान्तर पाँच विभाग हैं । वे ही पाँचों आग्नेय पशु पुरुष - श्रश्व - गौ - श्रवि - श्रज,
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ९ - जीवा: ( ३ ) सामान्य विभूतयः -( १ ) — १२ – ऋषयः ( २ ) -- ८ – पितरः ( ३ ) –εε—- ग्रसुराः ( ४ ) —३३ · – देवाः ( ५ ) –– ४ – मनवः ( ६ ) – २७ — गन्धर्वाः -४० - ग्रहाः ( ) -- ५ – पशवः ( १ ) —- ३ – जीवाः ] -२३१ में देखना चाहिए । प्रारणात्म विज्ञानोपनिषत् १ → स्वयम्भूः २ + परमेष्ठी ३ सूर्य्य: २३१ -सामान्यविभूतयः ४ चन्द्रमाः - महापृथिवी ५ + पृथिवी > → भू [ ३२४ ] इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ये पाँचों ही पशु प्रारणात्मक हैं । जिस प्राणी पशु में जिस प्राणपशु की प्रधानता रहती है, वह प्राणीषशु उस प्राणपशु के नाम से ही व्यवहृत होता है । इस पशुविभूति का सम्बन्ध स्तौम्य त्रिलोकी रूप महापृथिवी से ही है । चयन यज्ञ में इन पाँचों पशुप्राणों से कृतात्मा पाँचों प्राणी पशुओं के मस्तकों की चिति होती संसज्ञ जीव, अन्तःसंज्ञ जीव, प्रसंग जीव ( जीव - जीव, मूल - जीव, धातु - जीव ) इन तीनों जीवों की समष्टिरूप जीव विवर्त्त ईश्वर की अन्तिम विभूति है । जीवमात्र ईश्वर विभूतिलक्षण - जीवतत्त्व की महिमा है, विभूति है, ईश्वर के गर्भ में प्रविष्ट है, विभूति सम्बन्ध से ही ईश्वर जीवों में व्याप्त हो रहा है । उक्त तीनों जीव भूपिण्ड पर प्रतिष्ठित हैं, अतः ईश्वरीय संस्था के अन्तिम विवर्तरूप भूपिण्ड को ही जीवविभूति का श्रालम्बन माना जा सकता है । इस प्रकार क्रमशः स्वयम्भू की विभूतिरूप १२ ऋषि, परमेष्ठी की विभूति रूप ८ पितर एवं ६६ असुर, सूर्य की विभूति रूप ३३ देवता एवं ४ मनु, चन्द्रमा की विभूति रूप २७ गन्धर्व एवं ४० ग्रहः महापृथिवी की विभूति रूप ५ पशु, भूपिण्ड की विभूतिरूप तीन प्रकार के जीव, संकलन से कुल २३१ सामान्य विभूतियां हो जाती हैं ।. * इस विषय का सोपपत्तिक निरूपण शतपथ विज्ञान भाष्यान्तर्गत पश्वालम्भन विज्ञान प्रकरण
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् स्व ० - २ पर०-सू०-च ० पृ ०. ( १ - ऋषयः - " विरूपास इद् ऋषयस्त इद्गम्भीरवेपसः । प्रङ्गिरसः सुनवस्ते अग्नेः परिजज्ञिरे ॥ " - ऋक्सं ० ] १०।६२।५ ( २ - पितरः - " त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठमनु नेषि पन्थाम् । तव प्रणीती पितरो न इन्दो देवेषु रत्नमभजन्त धीराः ॥ — ऋक्सं ० १।६१ । १ ३ - श्रसुरा: - “ इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः । जघान नवतीर्नव ( EE ) ॥ " - ऋक्सं ० १ । ८४।१३ ४ - देवा: - " इति स्तुतासो अस्था रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिंशच्च ( ३३ ) । ५: - मनवः -- " मनोर्देवा यज्ञियासः ॥ " - ऋक्सं ० ८ । ३० । २ -- " बुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनवो धिया । पुनन्तु विश्वाभूतानि पवमानः पुनातु मा " — अथर्व सं ० ६।१६।१ ६ - गन्धर्वाः - " अप्सरसां गन्धर्वाणां मृगाणां चरणे चरन् । केशी के तस्य विद्वान्त्सखा स्वादुदिन्तमः ॥ " — ऋक्सं ० १०।१३६।६ ७ - प्रहाः - - " सुपर्णं विप्राः कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति । ८- पशवः छन्दांसि दधतो अध्वरेषु ग्रहान्त्सोमस्य मिमते द्वादश ॥ " - ऋक्सं ० १०,११४।५ - " तद् भद्रं तव दसना पाकाय चिच्छदयति । त्वां यदग्ने पशवः समासते समिद्धभपिशर्वरे ॥ ” — ऋक्सं ० ३।६।७ ६ - जीवाः – “ दशमासाच्छशयानः कुमारो ग्रधिमातरि । निरंतु जीवो ग्रक्षतो जीवो जीवन्त्या अधि ॥ " - ऋक्सं ० – ५।७८।६ अब क्रमप्राप्त विशेष विभूतियों का विचार कीजिए । ये विभूतियाँ ५१ भागों में विभक्त है । इन्हीं विभूतियों का संक्षेप में दिग्दर्शन करा दिया जाता है । [ ३२५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् १ - विद्याविभूतिः ( ४ ) पहली सर्वालम्बन विभूति विद्या है । इसका उदय सूर्य्य में होता है, अतः हम इसे सूर्य्य विभूति मानने के लिए तय्यार हैं । सूर्य्यसंस्था में धिषणा - प्रारण, ये दो विद्याचतुष्टयीलक्षरणा - विद्याविभूति विभाग । इन में धिपरगा भाग ज्ञानप्रधान बनता हुग्रा विद्या-विभूति का अधिष्ठाता बनता है । यही धिपरणात्मक विद्याभाग धर्म - ज्ञान - वैराग्य - ऐश्वर्य, इन चार भागों में विभक्त होता हुआ विद्यात्मक ग्रानन्दविज्ञानमनोमय ग्रव्यय-पुरुष प्रसाद का कारण बनता है । दूसरे शब्दों में सौर धिपरणा चतुष्टयी से ग्रव्यय का विद्याभाग बिक-सित होता है । अतएव इस बुद्धिरूप धिषणा को " विद्याविभूति " कहा जाता है । जीवसृष्टि में जिस जीव में इन चारों विद्यात्रों का पूर्ण विकास होता है, वह ईश्वर के समकक्ष होता हुत्रा अवतारपुरुष कहलात ' है । जैसा कि अभियुक्त कहते हैं—
ऐश्वर्य्यस्य च समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरिणा ॥१ ॥
उत्पत्ति प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् ।
वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥२ ॥
ईश्वर में विद्याभाव की प्रधानता है । उधर जीव में विद्या के साथ साथ पाप्मा रूप प्रविद्या भाग का भी प्राबल्य रहता । यही जीव का जीवत्व है । हमारे में ( ग्रध्यात्मसंस्था जो धर्म - ज्ञान - वैराग्य-ऐश्वर्य भावों का उदय होता है, यह एक मात्र ईश्वरविभूतिरूप धिषणात्मक सौरविद्याभाग की ही महिमा है । इस विभूति के प्रभाव से जीवात्मा श्रविद्या अस्मिता रागद्वेष अभिनिवेष रूप प्रविद्या चतुष्टयी के त्रावरण से विमुक्त होता हुआ निर्धूत किल्विष बन कर मुक्त हो जाता है । इस विद्या विभूति की प्राप्ति का उपाय है – उद्गीथ रूप से सूर्य्यं की उपासना, जिसका कि प्रकार छान्दोग्यादि उपनिषदों में विस्तार से बतलाया गया है ( देखिये छां ० उ ० २ प्र ० ) " श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ ० " ( यजुः सं ० ३१।२२ ) के अनुसार श्री एवं लक्ष्मीपति सूर्य्यनारायण के अतिरिक्त दूसरा कौन ऐश्वर्य प्रदाता य एवैष श्रादित्ये पुरुष-स्तमेवाहमुपासे ' ( कौं ० उ ० ३।४ ) – “ प्रसङ्गोऽयं पुरुषो न सज्जते, न व्यथथे, न रिष्नति " ( वृ ० उ०४।-३।१५ ) इत्यादि रूप से उपस्तुत, विश्व के प्रत्येक पदार्थ में व्याप्त रहते हुए भी सर्वथा प्रसङ्ग सौरविज्ञान तत्त्व के अतिरिक्त दूसरा कौन वैराग्यभाव का उदय कर सकता है । " धियो यो नः प्रचोदयात् " ( यजुः सं ० २२ ) " त्रयी वा एषा विद्या तपपि " ( शत ० ७ ० | ५ | २ | २ ) " त्रयीमयाय त्रिगुणात्मने नमः " इत्यादि श्रौतस्मार्त्त सिद्धांतों के अनुसार त्रयीमूत्ति, अतएव ज्ञानमूत्ति, श्रतएव च सविता ( प्रेरयिता ) प्राणात्मक सूर्य के अतिरिक्त दूसरा कौन हमारी बुद्धि में ज्ञानोदय कर सकता है । प्रकृति सिद्ध नियति भाव के सञ्चालक, विश्व मध्यस्थ अतएव अक्षरमूर्ति शास्ता नियन्ता सूर्य के अतिरिक्त और कौन हमारी बुद्धि को धर्म्ममार्ग पर ग्रारूढ रख सकता है । इस प्रकार सर्वात्मना यह सिद्ध हो जाता है कि, सौरधिषणा भाग [ ३२६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ही ईश्वर की विद्याविभूति है एवं इसके धर्म्म - ज्ञान - वैराग्य ऐश्वर्य, ये चार पर्व हैं । साथ ही में यह भी सिद्ध हो जाता है कि जीवात्मा में यह विद्याविभूति जन्मना एवं उद्गीथोपासनारूप कर्म्मणा उभयथा सूर्य्य से ही आती है । २ - कामविभूतिः ( २ ) दूसरी है काम नाम की महाविभूति । अव्यय मन से सम्बन्ध रखने वाले मन का रेतोरूप यह काम ही विश्व का मूल है । इसी कामविभूति से ईश्वर प्रजापति सत् - रस के आधार पर अबलों का ग्रन्थिवन्धन कर सृष्टि के अधिष्ठाता बनते हैं, एवं इसी काम से ग्रन्थिविमोक द्वारा मुक्ति के महाविभूतिलक्षणा - कामविभूति प्रवर्त्तक वनते हैं । ईश्वर की इसी महाविभूति का स्वरूप बतलाते हुए ऋषि कहते हैं-कामस्तदग्रे समवर्त्ततोधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत । सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीध्या कवयो मनीषा ॥ - ( ऋक् सं ० १०।१२६।४ ) । " एकोऽहं बहु स्याम् " " स ऐक्षत - सोऽकामयत भूयान्त्स्यां प्रजायेय " इत्यादि काम विभूतियों से ही ईश्वर प्रजापति विश्व एवं तत्प्रतिष्ठित प्रजोत्पत्ति में समर्थ हुआ हैं । इस काम की मूल प्रतिष्ठा अव्ययमन है, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है । इसलिए इस काम के — " सिसृक्षा " " मुमुक्षा " ये दो रूप हो जाते हैं । मन रस - बलात्मक होने से उभयात्मक है । रसानुग्राहक काम मुमुक्षा ( मुक्ति की कामना ) है, बलानु-ग्राहक काम सिक्षा ( सृष्टि की इच्छा ) है । मुमुक्षाबल निवर्त्तक बल है, सिसृक्षाबल प्रवर्त्तक बल है | शब्दार्थ की अभिन्न मर्य्यादा के ग्रनुसार सुख का वाचक “ कम् " है । भौतिक सृष्टि में नित्य ग्रन्तर्भूत रहता हुग्रा भी मन स्वस्वरूप से सर्वथा प्रसङ्ग हैं । अतएव इस प्रसङ्ग मन के लिए " प्रकार " का संकेत है । शब्दसृष्टि में ‘ ग्रकार ’ कण्ठताल्वादि के अभिघात से सर्वथा असंस्पृष्ट रहता हुमा निर्लेप है । प्रप्राप्त वस्तु की प्राप्ति के लिए कामना होती है । उदाहरण के लिए जीव कामना को सामने रखिये । हम जो भी विषय प्राप्त करना चाहते हैं, पहले उसकी कामना होती है । कामना विषय प्राप्ति का प्रथम द्वार है । बिना कामना के विषय प्राप्ति ग्रसम्भव है । इसी कामना से हमारा मंन प्राप्तव्य विषयमय ( विषयाका-कारित ) बन जाता है । इस बौद्ध विषय से मन सुख का अनुभव करने लगता है, अतएव इस बौद्ध विषय की “ कम् ” ( सुखम् ) संज्ञा रख दी गई है । मन इस विषय में डूबा रहता है । चारों ओर विषय व्याप्त रहता है । दूसरे शब्दों में मन समन्तात् विषय से घिरा रहता है । इसी नित्य स्थिति को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने इस मनोवृत्ति को " काम " शब्द से व्यवहृत किया है । काम शब्द की ' क - अ - म् - अ ' ' यह परिस्थिति है । कम् रूप विषय प्रकार रूप मन में प्रोत है, मन रूप प्रकार विषय रूप ' कम् ' में प्रोत है । यही दोनों का ( मन एवं विषय का प्रकार एवं कम् का ) ओतप्रोत भाव सम्बन्ध है । सुखांशभूत ककार के श्रागे मनोमूत्ति अकार है । इस प्रकार कम् के मध्य में क प्र म् इस रूप से प्रकार बैठा है ( सु [ ३२७ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानॊपनिषत् रूप विषय के मध्य में सुखभोक्ता मन बैठा है ) । सुखांशरूप मकार के श्रागे भी म् इस रूप से मनोमूत्ति अकार बैठा है । इस प्रकार मन विषय के बाहर भीतर सब ओर व्याप्त हो रहा है । इस क - य - म् - अ की सम्मिलित अवस्था ही " काम " है । ध्यान रखिए, एक शिल्पी पहले अपने मनो धरातल में अभिलषित चित्र बनाता है । यही ज्ञानीय ( खयाली ) चित्र है । विपयरूप चित्र पहले मन में प्रतिष्ठित होता है । यही इस का चित्रकाम ( चित्रनिर्माणेच्छा ) है । इसी कामरूप चित्र से यह इसे भौतिक रूप देता है । इस काम के, काम और इच्छा, ये दो रूप है । इन में कामात्मक काम का ईश्वरीय विभूति से सम्बन्ध हैं एवं इच्छा-त्मक काम का जीवविभूति से सम्बन्ध है । दूसरे शब्दों में ईश्वर का इच्छा " काम " कहलाती है, जीव का काम “ इच्छा ” शब्द से व्यवहृत होता है । कामत्त्वेन दोनों समान होते हुए भी दोनों सर्वथा विभक्त तत्त्व हैं । यदि विषय के साथ मन की आसक्ति हो जाती है, तो विषय प्रधान बन जाता है, मन गौण रह् जाता है । दूसरे शब्दों में मन विपयमय बन जाता है । यहाँ मन सुप्त है, विपय जाग्रत हैं । इस विषया-सक्तिप्रधान काम को काम न कह कर हम " इच्छा " कहेंगे । इट् अन्न है, सम्पूर्ण विषय मन के भोग्य बनते हुए इट्रूप अन्न है । आसक्तिवश मन इस इडन्न में सुप्त है । अतएव विषय में सुप्त, विषयाधीन मन ही - " इट् - विषयात्मकमन्नं तत्र सुप्तं मनः " - " इट - तत्र शेते " के अनुसार " इच्छा " है । इसी विषयानुबन्धिनी इच्छा को " उत्थाप्याकाङ्क्षा " कहा जाता है । इच्छारूप यही काम श्रासक्ति का मूल बनता हुआ बन्धन का कारण है । इस का सम्बन्ध एकमात्र जीव के साथ ही है । ठीक इसके विपरीत यदि अनासक्ति पूर्वक मन का विषय के साथ सम्बन्ध होता है, तो ऐसी अवस्था में मन प्रधान रहता है, एवं विषय गौण हो जाते हैं । यहाँ मन जाग्रत है, विषय सुप्त हैं । इस अनासक्तिमूलक काम को हम-" काम " ही कहेंगे । ईश्वर में इसी कामविभूति की प्रधानता है । यदि जीवात्मा इस कामविभूति का अनु-गामी बन जाता है, तो शरीर यात्रा निर्वाहक मात्र ग्रागत विषय उसके प्रज्ञान मन पर कोई प्रभाव नहीं जमा सकते । ऐसा काम काम है, ऐसे काम से कृत कर्म्म अकर्म्म हैं । ऐसी इच्छा अनिच्छा है । इसी को दर्शन भाषा में - " उत्थिताकाङ्क्षा " ( स्वाभाविकी इच्छा ) कहा जाता है । इस कामप्रधानता अनास-क्तिमूला इच्छा से होने वाली ग्रन्नाहुति ( विषय विभाग ) यज्ञार्थ कर्म्म हैं, ग्रात्मार्थ कर्म हैं, अतएव ये अबन्धन हैं । इनके अतिरिक्त जो कर्म्म प्रासक्तिमूलक बनते हुए विषय प्रधान बन जाते हैं, वे यज्ञ ( ग्रात्म ) मर्यादा से वहिर्भूत होते हुए बन्धन के कारण बन जाते हैं - " यज्ञार्थात् कर्मणाऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म्म-बन्धन: ' ( गीता ३।६ | नित्यप्रति सायं प्रातः बुभुक्षा लगना स्वाभाविक कामना है, उत्थिताकाङ्क्षा है । इस कामना के शान्त करने के लिए विषय संग्रह करना प्रबन्धन कर्म है । आप भोजन से तृप्त हो गए । सामने चाट वाले को देखकर चाट खाने की इच्छा हो पड़ती है, यही उत्थाप्याकाङ्क्षा है, यही बन्धन का मूल है । भूख लगी, भोजन कर लिया, प्यास लगी, पानी पी लिया, गरमी लगी, पंखा झल लिया, बैठे - बैठे थक गए, टहलने लगे, ये सब उत्थिताकाङ्क्षामूलक प्रबन्धन कर्म हैं । बिना स्वादवश सदा मुह में कुछ डालते रहे, बिना प्यास के ही सोड़ा - लेमन - ग्राइस्क्रीम ग्रादि को गले के नीचे उतारते रहे, बिना आव-श्यकता के ही विद्युत् व्यजन ( बिजली के पङ्ख ) से शरीर को कम्पित करते रहे, बिना थकान के ही इधर - उधर भटकते रहे, ये सब उत्थाप्याङ्क्षामूलक बन्धन कम्मं है । ऐसा इच्छारूप काम विभूति नहीं, [ ३२८ ]