श्रीगणेशाय नमः।

Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 361–370

आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् श्रपितु पाप्मा है । ईश्वर नित्य काम होता हुआ भी निर्लेप है उस का काम निष्काम है । अतएव — " कुर्वन्नपि न लिप्यते " । ऐसी काम विभूति ईश्वर में सहज सिद्ध है । जीव में भी यद्यपि यह सहज सिद्ध है, परन्तु वहाँ यदि पाप्मा आ जाते है, तो इस का सहजभाव ग्रावृत हो जाता है । बतलाना इस काम प्रपञ्च से प्रकृत में यही है कि, ईश्वरीय काम सिसृक्षा - मुमुक्षा, इन दो भागों में विभक्त हैं । इन दोनों की प्रतिष्ठा श्वोवसीयस् नाम से प्रसिद्ध अव्यय मन है । इधर जीव के निवृत्ति काम की प्रतिष्ठा बुद्धियुक्त मन है एवं प्रवृत्ति काम की प्रतिष्ठा विषय प्रधान मन है । ३ - कर्म्मविभूति: ( ७ ) सौर विद्याभाग का निरूपण करते हुए हमने बतलाया है कि, सूर्य में धिषणा - प्रारण, नाम के दो तत्व प्रतिष्ठित हैं । इन दोनों में से जिस प्रकार विवरणा भाग विद्या-अनुष्ठानलक्षणा - कर्म्मविभूति विभूति की मूल प्रतिष्ठा है, एवमेव प्राणभाग कर्म्मविभूति की आश्रय भूमि है । सूर्य्यप्राण त्रयीमय है । इसी त्रयी प्राण के आधार पर स्तोत्र-शस्त्र - ग्रह रूप यज्ञकर्म्म का वितान होता है । सौर ऋक्तत्त्व से शस्त्रकर्म्म का, सौर सामतत्त्व से स्तोत्र-कर्म्म का, एवं सौर यजुस्तत्त्व से ग्रहकर्म का स्वरूप निष्पन्न होता है । स्तोत्र श्रौद्गात्र कर्म्म है, शस्त्र-होत्र कर्म्म है, एवं ग्रह श्राध्वर्यव कर्म्म है । श्रग्नि द्वारा होत्र कर्म्म, वायु द्वारा ग्राध्वर्यव कर्म्म, एवं श्रादित्य द्वारा औद्गात्र कर्म्म सम्पन्न होता है । इस प्रकार प्रकृति मण्डल में ईश्वर संस्था में ) यह यज्ञ कर्म प्राणमूर्ति सूर्य्यत्रयी पर प्रतिष्ठित है - " सैषा त्रयी विद्यायज्ञ: " ( शत ० १ | १ | ४ | ३ ) कर्मत्रयसमष्टिरूप यज्ञ कर्म्म सौर प्रारण का प्रथम कर्म है । इसी यज्ञ कर्म्म से वह सौर प्राण पऋतु रूप संवत्सर रूप में परिणत होकर रोदसी प्रजा को उत्पन्न करता है - " सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा ० " । प्रकृति मण्डल में जितने भी कर्म्म हैं, उन सब में श्रेष्ठतम यही यज्ञ कर्म है । जिस कर्म से प्रजोत्पत्ति होती है, जो यज्ञ कर्म्म प्रजा का स्थिति का कारण है, जो यज्ञकर्म्म यज्ञेश्वर का स्वरूप सम्पादक है, जो यज्ञकर्म्म समष्टिव्यष्ट रूप से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो रहा है, उस यज्ञकर्म से बढ़कर दूसरा कौनसा कर्म्म श्रेष्ठ हो सकता? अतएव – “ इषे त्वोर्जेत्वा वायवस्थ देवो वः प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे " ( यजुः सं ० १1१ ) इस मन्त्र का व्याख्यान करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य ने - " यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म तस्मेतदाह श्रेष्ठतमाय करणे " । ( शत ० १।७।१।५ ) यह कहा है । इस यज्ञकर्म्म के अवान्तर अनेक भेद हैं, जिनका कि संक्षिप्त निदर्शन पूर्व की विज्ञानोपनिषत् में किया जा चुका है । सौर प्रारण सावित्राग्निमय है । इस प्राणमूर्ति सावित्राग्नि में निरन्तर पारमेष्ठ्य वनस्पति सोम की ग्राहुति हो रही है । इसी आहुति से सौर प्राणाग्नि प्रकाशित बन रहा है - ' त्वं ज्योतिषां वितमो ववर्थ ' ( ऋक्सं ० १ ९ १।२२ ) । इस प्रकाशित प्राणाग्नि में पारमेष्ठ्य ग्राहुत सोम एवं स्वयं प्राणाग्नि, इन दोनों का समन्वय है । दूसरे शब्दों में सोमाग्नि का समन्वित रूप ही सौर प्रकाश है । यह प्रकाश ही ईश्वर प्रजापति की तपोविभूति है । सूर्य्य क्या तप रहा है, ईश्वर प्रजापति तपः कर्म्म का अनुष्ठान कर रहे हैं, तपश्चर्य्या कर रहे हैं । तपोमूत्ति यह सौर प्राग ( सोमगर्भित अतएव प्रकाशित सम्वत्सरावच्छिन्न-[ ३२६ ]

पृष्ठ 362

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् सावित्राग्नि ) पृथिवी - बुध - मङ्गल - बृहस्पति - शनि - देवसेना, आदि स्व - उपग्रहों के पोषण में प्रवर्ग्यरूप से निरन्तर खर्च हो रहा है । उधर परमेष्ठी में से इसमें निरन्तर सोम आहुत होता रहता है । श्रतएव प्रतिष्ठ प्रजायों में प्रवर्ग्य रूप से निरन्तर अपना प्राण समर्पित करता हुआ भी सूर्य स्वमात्रा से क्षीण नहीं होने पाता । बिना किसी स्वार्थ के सूर्य्य इस प्रकार निरन्तर अपने प्राणों को खर्च करता रहता है । यही सौर प्रारण का दूसरा तप कर्म है । इस तपो रूप प्राणाग्नि में हमने सोम, अग्नि, इन दो तत्त्वों का समन्वय बतलाया है । सोम भृगु है, अग्नि अङ्गिरा है । भृगु अङ्गिरा का समन्वय ही तप का प्रवर्तक है, इसी आधार पर " भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम् " ( यजुः सं ० १1१८ ) यह कहा जाता हैं । अपने प्राण को निरन्तर अन्योपयोग में खर्च करना ही तप है । इसी आधार पर तप का - " एतद्वै तप इत्याहुर्यत् स्वं ददाति " यह लक्षण किया जाता है । यही सौर प्रारण सम्वत्सर रूप में परिणत होकर स्वयं तपोमूत्ति बनता हुआ सब को तपा रहा है । इसी तप के सम्बन्ध से ग्रीष्म ऋतु के दोनों मास ( ज्येष्ठ - प्राषाढ ) तप तपस्य नाम से प्रसिद्ध । सूर्य्य के इसी तपःस्वरूप को लक्ष्य में रख कर वाजिश्रुति कहती है-१- " असौ वा आदित्यस्तपः " ( शत ० ८।७।१।५ ) । २ – " सम्वत्सरो वाव तपो नवदशः । तस्य द्वादश मासाः, षड्ऋतवः सम्वत्सर एव तपो नवदशः । तद्यत्तमाह तप इति सम्वत्सरो हि सर्वारिणतपति " ( शत ० ८ | ४ | १ | १४ इति ) जिस जीवसंस्था में तपोविभूति की प्रधानता रहती है, वह ग्रात्मोत्सर्ग ( बलिदान ) करने में समर्थ होता है, वही स्व- तपःप्रभाव से ग्रन्थों पर अपना प्रभुत्त्व प्रतिष्ठित रखने में समर्थ होता है । तीसरा है दानकर्म्म । सौर प्राणाग्नि- सम्वत्सर में से निरन्तर इसका स्वभाग प्रवृक्त होता रहता है । यही प्रवृक्त भाग " उच्छिष्ट " नाम से प्रसिद्ध है । " उच्छिष्टात् सकलं जगत् " यह सिद्धान्त प्रसिद्ध है । प्रवृक्त सौर भाग सूर्य्यसत्ता से पृथक् होता हुआ, साथ ही जिसका सत्ता से यह प्रवर्ग्य भाग प्राक्रान्त हुआ है उसके सत्त्व से युक्त बनता हुआ दान कोटि में प्रविष्ट हो जाता है । " स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वक परस्व-त्वस्थापनम् " ही दान का दानत्त्व है । इस दान भाग से सूर्य्यं अपना स्वत्त्व हटा लेता है एवं जिस पदार्थ का इस दान भाग के साथ सम्बन्ध होता है, वह इसी की वस्तु बन जाती है । यह दानवृत्ति किंवा दान-कर्म्म यज्ञ मर्य्यादित है । पृथिवी - बुध - मङ्गलादि उपर्युक्त के उपग्रह सूर्य के दान कर्म ही फल हैं । सूर्य्यं का ही प्रवृक्तांश दान रूप से पृथिवी प्रादि रूपों में परिणत हुआ है । सौर प्राण से सम्बन्ध रखने वाला यही तीसरा दान कर्म है । सूर्य्य मनःप्राणवाङ्मय बनता हुआ ज्ञान - क्रिया - अर्थमय है । इनमें ज्ञानमय मन की प्रधानता -यज्ञकर्म के साथ है, तपः कर्म क्रियामन प्राणप्रधान है एवं दान कर्म्म प्रर्थमय वाक्प्रधान है । दूसरे शब्दों में यज्ञकर्म से मनोमय ज्ञान का व्यय होता है, तपः कर्म्म से प्राणमय क्रियाभाव का एवं दान कर्म्म [ ३३० ]

पृष्ठ 363

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रारणात्म विज्ञानोपनिषत् से वाङ्मय अर्थभाव का व्यय होरहा है । तीनों ही कर्म्म निष्कामात्मक काम से सम्बन्ध रखते हुए अब-न्धन हैं । ईश्वर प्रजापति के ये कर्म्म नित्य कर्म हैं । अध्यात्मसंस्था में यज्ञ - तपो - दान, तीनों कर्म्म सूर्य्य से ही आते हैं । तीनों की मूल प्रतिष्ठा त्रयी-शास्त्र है । बिना विद्याध्ययन के तीनों की इतिकर्तव्यता सर्वथा अविदित रहती है । तीनों के स्वरूप परि-चय के लिए वेदशास्त्र का परिज्ञान नितान्त अपेक्षित है । अतएव इन तीनों को वैज्ञानिक महर्षियों ने " विद्यासमुच्चित कर्म्म " नाम से व्यवहृत किया है । प्रकृति सिद्ध नित्य यज्ञ के आधार पर प्रतिष्ठित वैधयज्ञकर्म्म यज्ञ है, प्राणदान लक्षण कर्म्म तप है, यज्ञ सम्बन्धी दक्षिणा दान है । " दरिद्रान् भर कौन्तेय मा प्रयच्छेश्वरे धनम् ” ( गीता ) वाला सिद्धान्त दान के सम्बन्ध में लाग नहीं होता । दानतत्त्व से अप-रिचित कितने ही महानुभावों से हमने यह कहते सुना है कि धनवानों को कभी दान नहीं देना चाहिए । अन्धे - लूले - लंगड़े - असमर्थ व्यक्ति ही दानपात्र हैं । उन्हें यह विदित नहीं है कि, यह दान ' दान ' शब्द से इस शास्त्रीय दान के तत्तल्लोक विभूतियों के व्यवहृत न होकर ' दत्त ' शब्द से व्यवहृत होता है । पूर्णाङ्ग - विद्वान् - याज्ञिक - ही अधिकारी हैं, चाहे वे निर्धन हों, अथवा धनी । यज्ञियदान - ब्रहशान्तिदान साधनभूत गौ- श्रश्व - वस्त्र - सुपर्ण - भूमि - श्रन्नादि दानों के अधिकारी एकमात्र योग्य विद्वान् ही हैं । यह दान दान नहीं, अपितु दक्षिणा है । इसमें दानदाता का आसन नीचा है, ग्रहीता का ग्रासन ऊंचा है । यह दान ' भेंट ' है । इसमें दाता प्रतिग्रहीता पर पूज्य दृष्टि रखता है । यदि ऐसे दान में दाता प्रतिगृहीता को निरादर की दृष्टि से देखता है, तो यह दान सर्वथा निरर्थक बनता हुआ अभ्युदय के स्थान में प्रत्य-वाय का कारण बन जाता है । इन तीनों शास्त्रीय कम्मों के सम्बन्ध में यह स्मरण रखना चाहिए कि, जिसके आत्मा में जन्म से ही सूट द्वारा यज्ञ - तपो - दान - कम्र्मों का बीजरूप से प्रवस्थान रहता है, वही वेदशास्त्र की ओर प्रवृत्त रहता है एवं वही इन तीनों कम्मों के अनुष्ठान में सफल भी होता है । यदि इन तीनों का निष्काम बुद्धि से अनुष्ठान किया जाता है तो ये तीनों आत्मविकास के कारण बन जाते हैं । इस स्थिति में ये तीनों कर्म विभूतियाँ ईश्वर विभूतियों की श्रेणी में आ जाती हैं । इसी निवृत्ति भाव प्रधान कर्म्मत्रयी की आवश्यकता पर जोर देते हुए भगवान् जहां- " यज्ञदानतपः कर्म्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् " यह आदेश देते हैं, वहां त्रिगुण भाव से सम्बन्ध रखने वाले प्रवृत्ति प्रधान इन्हीं सकाम कर्मों के सम्बन्ध में - " निस्त्रं गुण्योभवार्जुन ” ' यह कहते हैं । प्रवृत्ति पक्ष में यही कर्म्म प्रवृत्ति कर्म्म बनते हुए, ईश्वरीय विभूति कक्षा से गिरते हुए केवल देवस्वर्ग प्राप्ति के कारण रह जाते हैं । यदि अध्यात्मसंस्था में जन्म से ही उपर्युक्त सौर प्राण प्रबल रहता है, तो तत् सम्बन्धी यज्ञ - तपो-दान, तीनों ग्रन्तरात्मा में विकसित रहते हैं । यदि किसी व्यक्ति की पार्थिव भौतिक विभूति में अधिक प्रासक्ति रहती है, तो उसका प्राध्यात्मिक सौर प्राण पार्थिव भौतिक प्रारण से अभिभूत हो जाता है । ऐसी अवस्था में यज्ञ - तपो - दान, तीनों इष्ट - प्रापूर्त - दत्त इन रूपों में परिणत हो जाते हैं । ये तीनों पार्थिव कर्म्म हैं । वस्तुतस्तु— “ प्राणः प्रजानामुदयत्येषसूर्य्य: " ( प्रश्नोपनिषत् ) इस श्रौत सिद्धान्त केअनुसार कर्म्ममात्र का प्रवर्त्तक सौर प्राण ही है, परन्तु पार्थिवप्राण से प्राक्रान्त होकर पार्थिवरूप में परिणत होता [ ३३१ ]

पृष्ठ 364

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् -हुआ वह स्वविद्या भाग से तिरोहित हो जाता है । इसी आधार पर इष्ट - श्रापूर्त - दत्त नाम की कर्म्म-त्रयी को वैज्ञानिकों ने " विद्या निरपेक्ष सत्कर्म्म " इस नाम से व्यवहृत किया है । पृथिवी गृह ( घर ) है । पृथिवीका अग्नि- गृहपति इससे सम्बन्ध रखने वाले पार्थिव कर्म्म ' इष्ट ' है । जलपूरित प्राकृतिक नद-नदियों का इधर उधर बहकर प्रजा का पालन करना, औषधि वनस्पतियों का परोपकारार्थ परिपक्व होना, ये सब " आपूर्त ” हैं । वृक्षच्छाया - पर्वत कन्दरा - आदि आश्रय भूमि रूप से पार्थिव विवर्त्त का दूसरों के उपयोग में आना ही दत्त है । इन तीनों प्राकृतिक विद्या निरपेक्ष कम्मों के आधार पर क्रमशः प्रतिष्ठित पञ्चयज्ञादि नित्यकर्म एवं एकाग्नि से सम्बन्ध रखने वाले पाकयज्ञ नाम से प्रसिद्ध गृह्यकम्मं " इष्टकर्म्म " हैं । ये कर्म्म स्वार्थमूलक हैं । वापी - कूप - तडाग - धर्मशाला - पाठशाला - आदि बनवाना आपूर्ति क है एवं समर्थों को देना दत्त कर्म्म है । श्रापूर्त - प्रोर दत्त का परार्थ से सम्बन्ध है । इन तीनों हो पार्थिव कर्म्मो में शास्त्र ज्ञान अपेक्षित है । सरस्वती शत्रु एवं लक्ष्मी के अनन्य भक्त भी इन तीनों कम्मों में निष्णात देखे जाते हैं । ईश्वरीय संस्था में ये तीनों पार्थिव कर्म्म भी निष्काम भाव से सम्बन्ध रखते हुए अबन्धन है । यदि जीव भी निष्काम बुद्धि से इनमें प्रवृत्त होता है, तब तो वह भी मुक्त ही होजाता है । आसक्ति की प्रधानता में ये ही तीनों पार्थिव विभूतियाँ एकमात्र पितृस्वर्ग प्राप्ति का कारण बनती है । इन पार्थिव कर्मों के दिति, प्रदिति भेद से दो विभाग हो जाते हैं । अदिति कर्म्म सत् कर्म हैं, दिति कर्म तमः प्रधान होते हुए असत् कर्म हैं । पृथिवी से सम्बन्ध रखने वाले दिति प्रदिति, दोनों विवर्त्तो का स्वरूप पूर्व में विस्तार से बतलाया जा चुका है । प्रकरण समन्वय के लिए केवल इतना स्मरण कर लेना पर्य्याप्त होगा कि, सूर्य की ओर रहने वाला भूभाग सौर प्रारण सम्बन्ध से प्रकाशित रहता है, विरुद्ध भाग अप्रकाशित रहता है । प्रकाशित पार्थिव विवर्त्त अदिति है, अप्रकाशित मूच्छायारूप पार्थिव भाग दिति है । उपर्युक्त इष्ट आपूर्त्त दत्त कर्मों का सम्बन्ध अदिति पृथिवी से है एवं हिंसा - स्तेय - प्राल-स्यादि तमोमय कर्मों का उदय दिति भाग से सम्बन्ध है । ऐसे कर्म्म “ विद्यानिरपेक्ष असत् " कर्म्म कहलाते हैं । मादक वस्तु का सेवन - हिंसा - स्तेय, ये तीनों कर्म्म इष्ट- ग्रापूर्त्त दत्त के प्रतिद्वन्द्वी भाग हैं । दूसरे को देना जहाँ दत्त है, वहाँ दूसरे का छीन लेना स्तेय है । दूसरे का पालन करना जहाँ प्रापूर्त है, वहाँ दूसरे का नाश करना हिंसा है । अपने आत्मज्ञान को विकसित करना जहाँ इष्ट कर्म है, वहाँ मद्यादि मादक पदार्थों से अपने ज्ञान को तिरोहित कर लेना अनिष्ट कर्म्म है । सूर्य्य उत्तर में है, उत्तरपथ स्वर्गपथ है । " विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः पराहताः । न तत्र दक्षिरणा यान्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः ॥ ” उक्त श्रौत सिद्धान्त के अनुसार उपर्युक्त विद्यासापेक्षप्रवृत्तिसत्कर्म्माधिकारी उत्तर मार्ग रूप देवयान का आश्रय लेते हुए देवस्वर्ग में जाते हैं । दिग्विज्ञान के अनुसार पृथिवी दक्षिणादिक् में मानी गई है । एतत् सम्बन्धी ( अदिति पृथिवी सम्बन्धी ) विद्या निरपेक्षप्रवृत्तिसत् कम्र्माधिकारी दक्षिणायन का आश्रय लेते हुए पितृस्वर्ग में जाते हैं एवं दिति पृथिवी से सम्बन्ध रखने वाले विरुद्ध कम्र्माधिकारी ( विद्यानिरपेक्ष शास्त्रनिषिद्ध कर्म्माधिकारी ) तमोमय नरक लोकों के अधिकारी बनते हैं । ईश्वरीय संस्था में सौरकर्म-श्रदितिकर्म - दितिकर्म, तीनों ही अनासक्तिभाव के कारण विभूतिकोटि में प्रविष्ट मान लिए जाते हैं । ३३२ ]

पृष्ठ 365

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् यदि देवीसम्पत् देवी विभूति है, तो ग्रासुरीसम्पत् आसुरी बिभूति है । सदसत् ( अच्छा बुरा ), सब उस के गर्भ में निविष्ट है | उस का दोनों पर समान रूप से निग्रहानुग्रह चलता है । इस प्रकार कर्म्मविभूति के सम्बन्ध में इस कर्म के ( ईश्वरसंस्था की अपेक्षा से ) सौर यज्ञ - तप- दान, अदिति पृथिवी से सम्बन्ध पार्थिव इष्ट - प्रापूर्त - दत्त, एवं दितिकर्म्म, सात कर्म्म हो जाते हैं । जीवसंस्था के क्रम से ६ विभाग हो जाते हैं । इन में से अन्त के तीन जीवापेक्षया पाप्मा हैं । प्रारम्भ के ६ निवृत्तिपक्ष में आत्मरूपा विभूतियाँ हैं । प्रवृत्तिपक्ष में संसाररूपा विभूतियाँ हैं । जीवसंस्था के इन & विभागों में से विद्यासापेक्ष यज्ञ - तप - दान, इन तीनों की प्रतिष्ठा सूर्थ्य है । विद्यानिरपेक्ष इष्ट- श्रापूर्त - दत्त, इन तीनों सत्कर्मों की प्रतिष्ठा श्रदितिभुक्त पार्थिव शुक्लप्रारण है विद्या-निरपेक्ष अनिष्ट - हिंसा - स्तेय, इन तीनों ग्रसत्कर्मों की प्रतिष्ठा दितिभुक्त पार्थिव कृष्णप्राण है | प्रका-रान्तर से यों समझिए, सूर्ख को मनः प्रारण वाङ्मय बतलाया है । सूर्य्य की इन तीनों कलाओं से क्रमशः ज्ञान- क्रिया- अर्थ का विकास होता है । मन कामना का जनक है, प्रारण विक्षेप की प्रतिष्ठा है, एवं वाक् श्रावररण की जननी है । इन तीनों का क्रमशः सूर्य - प्रदितिमय श्रन्तरिक्ष - दितिपृथिवी, इन भागों में विकास होता है । स्वयं सूर्य्य मनःप्रधान होता हुआ ज्ञान प्रधान है । ग्रतएव सौर कर्म्म विद्यासमुच्चित-कर्म्म कह लाता है । सत्त्व का ज्ञान से सम्बन्ध है, अतः इस कर्म्मत्रयी को हम सात्विक कर्म्म कह सकते हैं । दितिय अन्तरिक्ष प्राणप्रधान होता हुआ क्रियाप्रधान है । यहाँ विद्याभाग गौण है । अतएव इस श्रदिति - कर्म्मत्रयीको विद्यानिरपेक्ष कहा गया है । रजोगुण का क्रिया से सम्बन्ध है । अतः यह कर्म्म विवर्त्त " राजकर्म्म " ' कहला सकते हैं । दितिमय पार्थिव भाग वाक्प्रधान बनता हुआ अर्थप्रधान है । यहाँ वित्तमोह की प्रधानता है । ग्रतएव इस कर्म्म को ' असत्कर्म्म ' कहा गया है । तमोगुण का आवरणरूप वाङ्मय अर्थ से सम्बन्ध है, अतः इसे " तामसक " कहा जा सकता है । इन तीनों में दो आत्म की विभूतियाँ हैं, तीसरा विभाग ईश्वर में तो विभूति, किन्तु जीव में पाप्मा है । मनः - प्राण- वाक्, तीनों ही त्रिवृतकृत हैं । अतएव प्रत्येक कर्म्म तीन - तीन भागों में विभक्त हो जाता है । कर्म्मविभूति का यही संक्षिप्त स्वरूप परिचय है । १ - विद्यासमुच्चितसतकर्म्म-१ – यज्ञः ( मनोमयः ) — काममयः २ – तपः ( प्राणमयम् ) - - विक्षेपमयम् ( तौरकर्म्मविभूतिः ( मनोमयं सात्विकं कर्म्म ) ३ - दानम् ( वाङ्मयम् ) - श्रावरण्मयम् * इस विषय का विशद विवेचन गीताविज्ञानभाष्यान्तर्गत कर्मयोगरहस्य नाम के प्रकरण में देखना चाहिये | [ ३३३ ]

पृष्ठ 366

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् 2 - विद्यानिरपेक्षसत्कर्म्म-१ - इष्टम् ( मनो ० ) —काम ० २ - श्रापूर्तम् ( प्राण ० ) – विक्षेप ० ३ - दत्तम् ( वा ० ) -- प्रावरण ० ३ - विद्यानिरपेक्षा सत्कर्म्म-१ – अनिष्टम् ( मनो ० ) - काम ० २ – हिंसा ( प्राण ० ) --विक्षेप ० ३ – स्तेयम् ( वाङ् ० ) —-आवरण ० - श्रदिति कर्म्मविभूति: ( प्राणमयं राजसं कर्म्म ) - दितिकर्म्मविभूतिः ( वाङमयं तामसं कर्म्म [ क ] ईश्वर संस्थापेक्षया विभूतिकर्मारिण - सप्त ( ७ ) ११ – यज्ञकर्म - १ – इष्टकर्म सौरक २ - तपः कर्म्म १३- दानकर्म अदितिक २– प्रापूर्त्तकर्म्म १ - दितिक ८३ - दत्तकम [ ख ] जीवसंस्थापेक्षया विभूतिकर्माणि - - षट् ( ६ ) १ – यज्ञकर्म १ - इष्टकर्म २ - तपः कर्म्म २ - श्रापूर्त क ३ – दानकर्म्म ३ – दत्तकर्म्म [ ३३४ ] विभूतिः

पृष्ठ 367

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ४ - शुक्रविभूति: ( ६ ) चौथी विभूति शुक्र है । जिस विभूति के द्वारा ईश्वरात्मा विश्व का उपादान बनने में समर्थ होता है, वही शुक्रविभूति है । यह शुक्र श्रमृत- मृत्यु, भेद से दो भागों में बन्धनलक्षरणा शुक्रविभूति विभक्त है । प्रत्येक की पुनः तीन तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । संभूय ६ शुक्र हो जाते हैं । यही ६ श्रों शुक्र विज्ञानभाषा में श्रमृतवाक् - अमृतप्रापः-अमृताग्नि, मर्त्यग्नि, मर्त्यश्रापः मर्त्यावाक्, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । अमृत वाक्शुक्र स्वयम्भूपुर का अमृत आपःशुक्र परमेष्ठीपुर का, अमृताग्निशुक्र एवं मर्त्याग्निशुक्र दोनों सूर्य्यपुर के मर्त्यापः शुक्र चन्द्रपुर का एवं मर्त्यवाक्शुक्र पृथिवीपुर का उपादान है । जब तक यह शुत्र विभूति है तभी तक शुत्रमूला विश्वविभूति ( संसार ) है । शुक्रच्छित्तिकाल ही लयावस्था कहलाती है । ५ - प्राणविभूतिः ( १७ ) पांचवीं प्राणविभूति है । इस प्राणविभूति के तीन प्रधान विवर्त्त हैं । ५ ब्रह्मसत्यात्मक ब्रह्मप्रारण हैं, ५ देवसत्यात्मक देवप्रारण हैं । सात साकञ्जप्रारण हैं । सम्भूय १७ प्राण गतिलक्षणा - प्राणविभूति हो जाते हैं । स्वयम्भू उक्थ है इसका अर्करूप मुख्यप्राण परोरजा है । पर-मेष्ठी उक्थ है, इसका अर्कप्राण वारुण है । सूर्य्य उक्थ है, अर्कप्राण ऐन्द्र है । चन्द्रमा उक्थ है, अर्कप्रारण सौम्य है । भूपिण्ड उक्थ है, अर्कप्राण श्राग्नेय है । स्वयम्भू - परमेष्ठी ग्रादि पांचों पर्वों की समष्टि ब्रह्मसत्य है । अतएव तद्विभूतिरूप इन पांचों को हम ' ब्रह्मप्रारण ” कह सकते हैं । स्तम्यत्रिलोकी में प्रतिष्ठित सर्वज्ञ - हिरण्यगर्भ वैश्वानरमूर्ति देवसत्यात्मा पार्थिव है । इन में से सर्वज्ञ उक्थ है, इसका अर्कप्राण प्राण है । हिरण्यगर्भ उक्थ है, इसका अर्कप्राण व्यान है । वैश्वानर उक्थ है, इसका अर्कप्राण अपान है । सर्वज्ञप्रतिष्ठारूप २१ स्तोमावच्छिन्न द्युलोक से अन्तरिक्ष की ओर आता दिव्यप्राण प्राण है, स्वलोक की ओर जाता हुआ वही उदान है । इसी प्रकार वैश्वानर की प्रतिष्ठा-रूप त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न पृथिकी लोक से अन्तरिक्ष की ओर जाता हुआ पार्थिवप्राण समान है, स्वलोक की ओर ग्राता हुआ वही ग्रपान है । इस प्रकार प्राणपान के दो दो रूप हो जाने से इस पार्थिव प्राण के पांच विभाग हो जाते हैं । यह देवसत्य के ग्रर्क हैं, अतः इन पांचों की " देवप्राण " कहा जा सकता है । सूर्य्य में सप्तावयव ऋषिप्रारण का विकास और होता है । सामान्य विभूति में जिस असर प्रारणाख्य ऋषितत्त्व का दिग्दर्शन कराया गया है, उनसे वह सप्तऋषिप्रारण सर्वथा विभिन्न है । वे ऋपिप्राण देव-प्रारण के पितामह स्थानीय है, ये साकञ्ज ऋषिप्रारण देवप्रारण के पुत्रस्थानीय हैं । दूसरे शब्दों में वे ऋषि-प्राण पितृद्वारा देवताओं के जनक है, ये ऋषिप्राण देवजन्य हैं । सूर्य्य देवघन है । यहीं, इसी देवप्राण से * इस विषय का विशद विवेचन ईशोपनिषद्विज्ञानभाष्यान्तर्गत ( प्रथमखण्ड ) चतुष्पाद्ब्रह्मनिरूपण प्रकरण के " शुक्रनिरुक्ति " प्रकरण में देखना चाहिए । [ ३३५ ]

पृष्ठ 368

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् इन सात सहचारी चित्य प्राणों का विकास होता है । इसी को उपनिषत् के अनुसार ग्रहप्रारण भी कहा जाता । यही साकञ्जसप्तर्षि, आदि नामों से भी प्रसिद्ध हैं । इन्हीं का दिग्दर्शन कराती हुई मन्त्रश्रुति

कहती है-साकञ्जनां ससथमाहुरेकजं षडिद्यमा ऋषयो देवजाः ।

तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजते विकृतानि रूपशः ॥

- ऋक सं ० १।१६४।१५ ।

अर्याग्बिलश्चमस ऊर्ध्व बुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम् ।

तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदाना ॥ २ ॥

- शत ० ब्रा ० १४।५।२१५ सृष्टिक्रमानुसार ऋषि से पितर पितर से देवता उत्पन्न होते हैं । परन्तु यहाँ विपरीत क्रम है । सौरप्राणरूप देवता से इन साकञ्ज ऋषिप्राणों का विकास होता है, अतएव इनके लिए " " ऋषयो देवजाः " यह कहा गया है । स्वायम्भुव विभूतिरूप ऋषि अमृतप्रधान थे । सौरविभूतिरूप ये ऋषि मृत्युप्रधान होते हुए चित्य हैं । इन सातों में चार प्राण सदा मध्य में रहते हैं, दो प्राण क्रमशः दोनों पार्श्व में रहते हैं, एक प्राण सदा मूल में रहता है । इसी अभिप्राय से " चत्वार श्रात्मा, द्वौ पक्षो, पुच्छं प्रतिष्ठा " ( शत ० ६।१।-( १।६ ) यह कहा जाता है । प्रत्येक पदार्थ का शरीर ( पिण्ड ) इसी सप्तचितिरूप साकज प्राण के संस्थान पर प्रतिष्ठित है । ईश्वरीय संस्था में सूर्य्यप्राणप्रधाना सर्वज्ञमंस्था शिरोगुहा है, हिरण्यगर्भ संस्था उरोगुहा है, वैश्वानरसंस्था उदरगुहा है, भूपिण्ड बस्तिगुहा है । इन चार स्थानों में समान रूप से इस साकञ्ज प्राण की स्वतन्त्र चिति होती है । संभूय चारों गुहानों के २८ प्राण हो जाते हैं । ये श्राईसों प्रारण सूर्य्य विभूति हैं । पूर्वोक्त प्राणोदानादि पञ्चप्राण पार्थिव विभूति है, पञ्च ब्रह्मप्राण ब्रह्मसत्यविभूति है । इनके अतिरिक्त इन्हीं की अवान्तर विभूतियों से देवदत्त - धनञ्जय - हंस श्रादि भेद से ग्रनन्त प्राण हो जाते हैं । केवल व्यानप्रारण के ही ७२००० ( बहत्तर हजार ) भेद हो जाते हैं । इस प्राणविभूति के सम्बन्ध में अधिक विस्तार नहीं किया जा सकता । इस विषय की अधिक जिज्ञासा रखने वालों को " प्राणोपनिषत्- ( प्रश्नो-पनिषत् ) - हिन्दी विज्ञानभाष्य " देखना चाहिए । प्रकृत में प्राणविभूति के सम्बन्ध में केवल यही जान लेना पर्याप्त होगा कि, ५ – ब्रह्मप्रारण ब्रह्मसत्यात्मा की ६ देवप्राण देवसत्यात्मा की एवं ७ - गुहाप्रारण सूर्य की विभूतियाँ हैं । सम्भूय १७ प्राग हो जाते हैं । प्राग विभूति का यही संक्षिप्त दिग्दर्शन है | ५ - ब्रह्मप्रारणाः – ब्रह्मसत्यात्मनि प्रतिष्ठिता विभूतिरूपाः-१ – स्वायम्भुवार्कप्राणः- परोरजा २ - पारमेष्ठ्यार्क प्राणः – वारुणः ३ – सौरार्कप्राणः – ऐन्द्र: ४ – चान्द्रार्कप्राणः – आग्नेयः [ ३३६ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् ६- देवप्राणाः- देवसत्यात्मनि प्रतिष्ठिता विभूतिरूपाः पार्थिवाः-महापृथिवी - विभूतिः १ - सर्वज्ञे प्रतिष्ठितः गतिभावयुक्तो दिव्यप्राणः--प्राणः २१- द्यौः २ - सर्वज्ञे प्रतिष्ठितः प्रागतिभावयुक्तो दिव्यप्राणः--उदानः १५ अन्त ० [ ३- हिरण्यगर्भे प्रतिष्ठितः स्थितिभावयुक्त प्रान्तरिक्ष्यप्राण: --व्यानः ( ४- वैश्वानरे प्रतिष्ठितः - गतिभावयुक्तः पार्थिवप्राणः-- समानः ६- पृथिवी २( ५- वैश्वानरे प्रतिष्ठितः - प्रागतिभावयुक्तः पार्थिवप्राण: -७ - साकञ्जप्रारणाः- सूर्य्यात्मक सर्वज्ञ - हिरण्य ० - वैश्वा ० - भूपिण्डेषु -तत्तद्गुहासु चितिरूपेण प्रतिष्ठिताः सौरविभूतिरूपाः सौराः अपानः आत्मा ग्रात्मा ४ - आत्मप्रारणाः १ २ पक्षः पक्षः २– पक्षप्राणौ ६ ५ १ - पुच्छप्रतिष्ठाप्राणः ग्रात्मा ग्रात्मा ३ ४ पुच्छम् ७ ७ -- सप्त साकञ्जप्राणाश्चित्याः — ज्ञान - कर्मेन्द्रियविभूतिः ( ५ ) इस ६ ठी विभूति का सम्बन्ध वयुनवित् केवल पार्थिव ग्रग्नि के साथ ही समझना चाहिये । वैश्वानर हिरण्यगर्भ सर्वज्ञमूर्ति ईश्वर ग्रात्मा है चन्द्रमा इसका प्रज्ञानमन है, जीवनयात्रा साधनलक्षरणा सूर्य इसकी बुद्धि हैं, परमेष्ठी इसका यज्ञात्मा है, स्वयम्भू इसका श्रात्मा ज्ञान - कर्मेन्द्रियविभूति है, पोडशी इसका ग्रालम्वन श्रात्मा है । जब मव विवर्त्त इसमें ज्यों के त्यों ( जीवन ) प्रतिष्ठित हैं तो अवश्य ही ज्ञानकर्मेन्द्रियों का भी यहां सम्बन्ध मानना पड़ेगा । मानना क्या पडेगा? है ही । यदि ईश्वरसंस्था में ज्ञानकर्मेन्द्रिय विवर्त नहीं होता, तो जीवसंस्था में इन्द्रियों का विकास असम्भव था । अब देखना यह है कि, त्रिमूर्ति देवसत्यात्मा [ ३३७ ]

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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् इस साक्षी ईश्वर की इन्द्रियों का स्वरूप कैसा है? ईश्वर तत्त्व भूपिण्ड के ग्राधार पर प्रतिष्ठित महा-पृथिवी में प्रतिष्ठित हैं । भूपिण्ड यदि मर्त्याग्निसोममय है, तो यह पृथिवी ( स्तौम्य त्रिलोकीरूपा महापृ-थिवी ) ग्रमृताग्निसोममयी है । इन दोनों की उक्थ, अर्क, भेद से दो दो अवस्थाएँ हैं, जिनका कि दिग्द-र्शन पूर्व में कराया जा चुका है - देखिये पृ ० संख्या ३०२ ) । पूर्व की प्राणविभूति में ब्रह्मसत्यांशभूत, अतएव ब्रह्मप्रारण नाम से प्रसिद्ध जिस भौम आग्नेय प्राण का दिग्दर्शन कराया गया है, इसी की घन-तरल - विरल, भेद से तीन अवस्थाएं हो जाती हैं । दूसरे शब्दों में एक ही अग्नि- अग्नि, वायु, इन्द्र, इन तीन स्वरूपों में परिणत हो रहा है । एक उक्थाग्नि के तीन उक्थ बन रहे हैं, एक साहस्री की तीन साहस्रियां बन रही हैं । एक आत्मा त्रिकल बन रहा है । भूपृष्ठ से प्रारम्भ कर ३३ वें स्तोम तक का वषट्कार मण्डल ऋत - प्रधान होता हुआ परमेष्ठी है - " ऋतमेव परमेष्ठी " । इस ऋत परमेष्ठी के गर्भ में समहिम भूपिण्ड प्रति-ष्ठित है - " ऋते भूमिरियं श्रिता " । ( गोपथब्राह्मण ) । यह ऋत पारमेष्ठय तत्त्व सोम है । ऐसी अवस्था में यह सिद्ध हो जाता है कि भूपृष्ठ से अथवा भूकेन्द्र से प्रारम्भ कर ३३ तक सोमधरातल । इस सोम धरातल के त्रिवृत्स्तोम तक उक्थरूप घनाग्निमूर्ति सहस्रभावापन्न वैश्वानरात्मा प्रतिष्ठित है, सोमधारा-तल के पश्चदश स्तोमपर्य्यन्त उक्थरूप तरला ग्निमूर्ति सहस्रभावापन्न सर्वज्ञ प्रतिष्ठित है । इन तीन स्तोमों में तो उक्थाग्नित्रयी प्रधान है, सोम गर्भ में है । अतः इन तीनों को अग्नि शब्द से ही व्यवहृत कर दिया जाता है । श्रागे के त्रिरणव त्रयत्रिंश ( २७-३३ ), इन दो स्तोमों में सोम की प्रधानता है, यहाँ अग्नि गर्भ में है । अतएव स्तोमद्वयावच्छिन्न इस अग्निगर्भित सोम लोक को - " प्रस्ति वै चतुर्थो देवलोक श्रापः " इत्यादि रूप से सोमलोक ही मान लिया जाता है । यही स्तोमलोक चन्द्रमा की प्रतिष्ठा है । इसी आधार पर देवगणना में - " श्रग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमाः " यह क्रम माना गया है । चान्द्रसोम चिदंश से युक्त होकर ज्ञानमूर्ति बना हुआ है, एवं प्राणाग्नि स्वयं क्रियामूर्ति है । इस प्रकार पञ्चसंस्थ, किंवा चतुःसंस्थ उक्था-ग्निसोममूर्ति इस देवसत्यात्मा में सोमरूप अर्थ, चिद्रूप ज्ञान, प्राणरूप क्रिया, तीनों का सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन तीनों के प्रधानरूप से ५ विवर्त हो जाते हैं । तीनों ही तत्त्व पांच भागों में विभक्त होकर प्रतिष्ठित हो रहे हैं | इनकी पूर्वोक्ता उक्थावस्था तो स्वयं आत्मा है, एवं इन पाँचों की अर्कावस्था इन्द्रियाँ हैं । पाँचों का ज्ञानांश ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, प्राणांश कर्मेन्द्रियाँ हैं, प्राणज्ञानगर्भित भूतांश भूतमात्रारूप इन्द्रियों के विषय हैं । ग्रर्क की पांच ग्रवस्थाओं के कारण ज्ञान - प्राण - भूत तीनों की पांच पांच अवस्थाएँ हो जाती हैं । संभूय पन्द्रह कलाएँ हो जाती हैं । इन १५ का अधिष्ठाता वही उक्थ देवसत्यात्मा है, - " षोडश-कलं वा इदं सर्वम् " । · अध्यात्म में जो स्थान वागेन्द्रिय का है, वही यहाँ सोमगर्भित अर्कप्रारण है । दूसरे शब्दों में यही ईश्वर की वागिन्द्रिय है । यही वाक् नामों की अधिष्ठात्री है । वागिन्द्रिय के ग्राधार पर ही नाम विवर्त प्रतिष्ठित है । प्रारण ( प्राण ) स्थानीय सोमगर्भित वायव्य अर्कप्राण है । यही गन्धमात्रा का एवं स्पर्श का श्रालम्बन है । चक्षुःस्थानीय सोमगर्भित प्रादित्यार्कप्रारण हैं । रूपों का अधिष्ठाता यही है । इन्द्रियमनः-स्थानीय अग्निगर्भित भास्वर सौम्यार्कप्राण है । श्रोत्रस्थानीय ग्रग्निगर्भित दिक्सौम्यार्कप्रारण है | दर्शना-भिमत ११ इन्द्रियों का इन्ही पांच में अन्तर्भाव हो जाता है । प्रज्ञावच्छेदेन ये ही पांच ज्ञानेन्द्रियाँ है, प्राणवच्छेदेन ये ही पांच कर्मेन्द्रिय हैं । संभूय १० इन्द्रियाँ हो जाती हैं । ईश्वर में इन इन्द्रियों का सर्वत; [ ३३८ ]