Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 371–380
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 371–380
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिपत् विकास है । जीवात्मा नियतेन्द्रिय है, ईश्वर सर्वेन्द्रिय है । इसका कारण इसकी पूर्णता ही है । ईश्वर वर्त्तुल है । वर्त्तुलवृत्ताकारयुक्त पदार्थ के केन्द्र में से सभी शक्तियाँ चारों ओर समानरूप से वितत होती हैं ईश्वरशरीर का प्रत्येक अवयव सुन सकता है, देख सकता है, बोल सकता है, गन्ध ग्रहण कर सकता है । बस जीवेश्वर की इन्द्रियों में यही वैषम्य है । इन्द्रियों के सर्वतः विकास के कारण ही वह सर्वज्ञ - सर्वकर्मा -सर्वशक्ति- सर्ववित् इत्यादि नामों से व्यवहृत होता है । इसी ईश्वरीय इन्द्रियभाव का स्पष्टीकरण करती
हुई श्रुति कहती है-सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
साथ ही में यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आपके ( जीव के ) शरीर में आँख कान - नाक, श्रादि इन्द्रियों का जैसा आकार है, उसकी इन्द्रियों का वैसा ग्राकार नहीं है । दूसरे शब्दों में वह आप जैसा शरीर नहीं रखता । उसका का शरीर सर्वथा गोलाकार है । उसमें शक्ति रूप से ही इन्द्रियों का विकास है । इसी अभिप्राय से शक्त्यपेक्षया ईश्वर को पाणि - पाद- प्रक्षि - रूप इन्द्रिययुक्त मानती हुई भी श्रुति इसे आकाराभाव के कारण अपाणिपाद - बतला रही है—
पाणिपाद जवनो गृहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्ण: ।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुग्ग्रयं पुरुषं महान्तम् ॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविविजितम् ।
सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥
- श्वे ३।१६ [ ( ३३ ) ५ – अग्निगर्भितः - - उक्थापः ( ग्रात्मा ) ( २७ ) ४ – अग्निगभितः -- उक्थसोमः ( प्रात्मा ) - सर्वज्ञः सोमदण्ड : ( २१ ) ३ – सोमगर्भितः - - उक्थादित्य: ( आत्मा ) ( १५ ) २ – सोमगर्भितः - उक्थवायुः ( प्रात्मा ) ] -- हिरण्यगर्भः ( ( 2 ) १ – सोमगर्भितः - उक्थाग्निः ( ग्रात्मा ) ] — वैश्वानरः > उक्थाग्निसोममूत्तिः श्रात्मा ( मुख्य प्राणः ) [ ३३६ ।
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड चन्द्रमा : -प्रज्ञानम् ( ३३ ) ५ – प्राग्नेयार्कप्राण गर्भिताः - कपिः ( प्राणाः ) → श्रोत्रेन्द्रियम् ( २७ ) ४ - श्राग्नेयार्कप्रागभितः - प्रर्कसोमः ( प्राणाः ) + इन्द्रियमनः ( २१ ) ३- सौम्यार्कप्राणगभितः - - प्रर्कादित्यः ( प्राणाः ) → चक्षुरेन्द्रियम् ( १५ ) २ – सौम्यार्कप्राणगर्भितः - - प्रर्क वायुः ( प्राणाः ) श्राणेन्द्रियम् ( ६ ) १ – सौम्यार्कप्राणगर्भितः - - प्रर्काग्निः ( प्राणाः ) → वागिन्द्रियम् प्रारणात्मविज्ञानोपनिषत् श्रर्काग्निसोममूर्तयः प्रारणाः ( अनूचीनाः प्रारणाः ) भूतमात्रा: ५ प्रज्ञामात्राः ५ प्रारणमात्राः ५ २- भास्वरसोमो-१ – दिक्सोमो -- - दिङ्मूत्तिः सौम्यचिदंशः प्रज्ञा - - - - दिक्सौम्यप्राणः प्राणः --- भास्वर सौम्यचिदंशः प्रज्ञा भास्वरसौम्य प्राणः प्राणः ३ – ऐन्द्रसोमो -- ऐन्द्रसौम्यचिदंशः प्रज्ञा------ ऐन्द्रप्राणः प्राणः ४ - वायव्य सोमो ---- वायव्य सोम्यचिदंशः प्रज्ञा--- - वायव्य प्राणः प्राणः ५- आग्नेय सोमो - - - प्राग्नेयसौम्य चिदशः प्रज्ञा - प्राग्नेयप्राणः प्राणः अर्थः ज्ञानम् अर्थो मूलप्रतिष्ठा----अर्थाधारे ज्ञानप्रवृत्तिः क्रिया * ज्ञानाधारे कर्म्मप्रवृत्तिः ७- पूर्णेन्द्रत्वविभूतिः ( १ ) षोडशकलो देवसत्यात्मा - ईश्वरः पूर्णेन्द्रता ईश्वर की विभूति है । इसी पूर्णता ने इसे " श्रात्मकाम " दना रखा है । इसी आत्म-कामना से यह काममय रहता हुआ भी निष्काम है । ईश्वर की सर्वव्याप्तिलक्षणा - पूणेन्द्रविभूति इसी पूर्णता में स्त्रीपुम्भाव समाविष्ट है । अपने अर्द्धभाग से वह पुरुष बन रहा है, श्रर्द्ध भाग से स्त्री बन रहा है । सर्वज्ञ - हिरण्यगर्भ -वैश्वानर की समष्टि ही ईश्वर है, यह पाठक न भूले होंगे । इस ईश्वर का रोदसी त्रिलोकी के अधिष्ठाता [ ३४० ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् कश्यपप्रजापति के साथ ही सम्बन्ध है । सूर्थ्य द्वादश प्रारणसमष्टि है । इन १२ प्राणों में से आत्मस्वरूप समर्पक, ग्रायुः प्राणाधिष्ठाता, ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ, सर्वमुख्य, अमृतप्रधान प्रारण ही " इन्द्र " नाम से प्रसिद्ध है । यह इन्द्रप्राण ( सौरप्राण ) कूम्र्म्माकृति में परिणत होकर ही सम्पूर्ण विश्व का प्रभव बनता है - " एतद्वै रूपं कृत्त्वा प्रजा श्रसृजत्, यदसृजत् - श्रकरोत्तत्, यदकरोत्तस्मात् कूर्म्मः । कश्यपो वै कूर्म्मः । तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः ” इति " ( शत ० ७।५।१।५ ) । " कश्यपात् सकलं जगत् " । इसी सौर ( प्राणमूर्ति ) कश्यप प्रजापति के गर्भ में, तद्रूप ही पूर्वोक्त ईश्वर तत्त्व प्रतिष्ठित है । सौरप्राण ही तो सम्वत्सररूप में परिणत होता है । सम्वत्सर प्रजापति ही तो ईश्वरीय देवसत्य प्रजापति है । इस कश्यप प्राण के दृश्यमण्डल - श्रदृश्यमण्डल, भेद से दो विभाग हैं । किसी निरावरण प्रान्त में ग्राप खड़े हो जाइए । वहाँ चारों ओर का भूस्तर आप को समतल दिखलाई देगा, साथ में ही चारों ओर का हरिज्जन ( क्षितिज - Horizon ) प्रकाश से संलग्न दिखाई देगा । यही दृश्य कश्यप प्रजापति की साक्षात् प्रतिकृति ( चित्र ) है । जैसा स्वरूप कूर्म्म ( कछुए ) का है, ठीक वैसा ही स्वरूप कश्यप का है, अतएव इसे " कूर्म्म " नाम से व्यवहृत किया गया है । इस सौर संस्थात्मक कश्यप, किंवा कूर्म्म -प्रजापति के चारों ओर पारमेष्ठ्य प्रप्तत्त्व व्याप्त है । दूसरे शब्दों में प्राणमूर्ति सम्वत्सरात्मक कश्यप समुद्र गर्भ में प्रतिष्ठित है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर मन्त्रश्रुति कहती है -अपां गम्भन्त्सनसीद मा त्वा सूर्योऽभिताप्सीन्माग्निर्वैश्वानरः । अच्छिन्नपत्राः प्रजा अनुवीक्षस्वानु त्वा दिव्या वृष्टिः सचन्ताम् ॥ - ( यजुः १३५३० ) आपोमय - वतुर्थ लोक के गर्भ में प्रतिष्ठित त्रैलोक्यमूर्ति इस कश्यप प्रजापति का त्रिवृत् - स्थानीय वैश्वानराग्निमय पार्थिवरस दधि ( घन ) है, पञ्चदशस्थानीय हिरण्यगर्भवायुमय प्रान्तरिक्ष्य रस घृत ( तरल ) है, एकविंश स्थानीय सर्वज्ञ श्रादित्यमय दिव्यरस मधु ( विरल ) है एवं स्वयं पारमेष्ठ्य रस अमृत ( सोम ) है । दधि भाग से हमारे अस्थि मांसादि घन भागों का, ग्रान्तरिक्ष्य घृत रस से मेद-मज्जा - कफ - लाला - प्रसृक् - रस - प्रादि तरल भागों का, दिव्य मधु रस से शुक्र का एवं पारमेष्ठ्य अमृत रस से मन का निर्माण होता है । इन्हीं चारों रसों से तो कश्यप प्रजापति प्रजा निर्माण में समर्थ होते हैं । यही अवस्था अदृश्य मण्डलस्थ कूर्म प्रजापति की है । दोनों में अन्तर केवल इतना ही है कि, दृश्य-कूर्म्म में ग्रहः स्वरूप संपादिका अदिति के सम्बन्ध से सूर्य की प्रधानता है एवं प्रदृश्य कूर्म्म में रात्रिस्व-रूप संपादिका दिति के सम्बन्ध से चन्द्रमा का साम्राज्य है । इस प्रकार खगोलात्मक ( आकाश गोला-त्मक ) कश्यप मण्डल भूपिण्ड के मध्य पतित होने से दो भागों में विभक्त होरहा है । ऊपर के अण्ड कटाह में सौर अग्नि की प्रधानता है, प्रधोऽवस्थित अण्ड कटाह में चान्द्र सोम की प्रधानता है । एक ही ग्राण्ड प्रजापति अग्नि - सोम की प्रधानता से दो भागों में विभक्त होरहा है । इसका अग्निमुख्य ऐन्द्रभाग पुरुष * पारमेष्ठ्या वृष्टि । [ ३४१ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् है, सोममुख्य ऐन्द्र भाग स्त्री है । आधा इन्द्र प्राण अग्निप्रधान बन कर पुरुष बन रहा है, श्राधा इन्द्र प्राण सोमप्रधान बनता हुआ स्त्री कहला रहा है । दोनों की समष्टि पूर्णेन्द्र रूप कश्यप प्रजापति है । है । इसके इसी दाम्पत्य स्वरूप का निरूपण करता हुआ मानव शास्त्र कहता है-द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्द्धन पुरुषोऽभवत् । श्रद्धेन नारी, तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ॥ ( मनुः १।३२ ) अपने दृश्य भाग रूप सूर्य्यप्रधान पुरुषभाग से वही पुरुषसृष्टि का कारण बनता है, चान्द्र - भाग प्रधान ग्रदृश्यभाग रूप स्त्रीभाग से वही स्त्रीसृष्टि का उपादान बनता है । दोनों अण्ड कटाहों का समु-च्चय पूर्णेन्द्र है, यही पूर्ण पुरुष है, इसीके लिए - " पूर्णमदः " यह कहा जाता है । ८ - सत्यसंकल्पत्त्व ( १ ) पूर्णेन्द्रता ही ईश्वर के सत्य संकल्प की प्रतिष्ठा है । सहृदय, सशरीरी भाव ही सत्य है । यद्यपि अध्यात्मसंस्था में भी सत्य का उक्त लक्षण समन्वित हो सकता है, परन्तु सत्यसंकल्पत्य विभूति जीव श्रद्धेन्द्र होने से पूर्ण सत्य की मर्य्यादा से च्युत हो जाता है । अतएव इसके लिए " अनृतसंहिता व मनुष्याः " ( शत ० १।१।१ ) यह कहा जाता है । इधर ईश्वर पूर्णेन्द्र होता हुआ पूर्ण सत्यरूप है । इसी पूर्णता के बल पर इसके हृदय से जो भी संकल्प उठता है, वह सर्वथा सत्य ( त्रिकालाबाधित ) होता है । ९ – एकरसत्त्व ( १ ) पूर्णता ही ईश्वर के एकरसत्त्व का कारण है । जो वस्तु प्रपूर्ण होती है, वही अनेक रस होती है । यदि एक पात्र में थोड़ा पानी है, तो उसमें ऊम्पियों ( लहरों ) का उदय एंकर सत्त्वविभूति होता रहेगा । यह ऊम्म भाव ही पानी का रसन है । यदि पानी ऊपर तक भरा रहता है, तो ऊम्मिय शान्त हो जाती हैं । ईश्वर पूर्णेन्द्र है श्रतएव वह अवश्य ही एक रस है । इसके गर्भ में प्रतिष्ठित प्रजा वर्ग भले ही ऊम्मि भाव से नित्य श्राक्रान्त रहे, परन्तु यह तो समष्टि रूप से समुद्रवत् सर्वथा शान्त रहता हुआ एकरस ही है । १०- एकावस्थत्त्व ( १ ) जिस प्रकार जीवात्मा जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति आदि ६ अवस्थाओं में परिवर्तित होता रहता है, वैसे यह इन अवस्थाओंों से एकान्ततः विमुक्त है । सुप्त प्रजा में यह नित्य जानत सदा एक ही अवस्था से है । परिच्छिन्न को अनेक अव-रहता हुआ युक्त वस्तु स्थानों में परिवर्तित होने का अवसर मिल सकता है, परन्तु जो पूर्ण है, एक परिवर्तन भावरूपत्व सिद्ध हो जाता है । इसी एकावस्थत्व विभूति रस है, वह किस प्रदेश में परिवर्तित हो । फलतः उसमें विभूति का निरूपण करती हुई उपनिच्छु ति कहती है-[ ३४२ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड य एषु सुप्तेषु जार्गात कामं कामं पुरुषो निम्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्व्वे तदुनात्येति कश्चन “ एतद्वै तत् " । ११ - १२ – विश्वव्यापकत्त्व एवं विश्वसृष्टत्त्व ( २ ) ( कठ ० ५८ ) । अपनी ज्ञान - क्रिया- अर्थ शक्ति से यही सम्पूर्ण विश्व को ( स्तोम्य त्रिलोकी रूप पार्थिवविश्व विश्वव्यापकत्व, विश्वसृष्टत्त्व विभूति को ) उत्पन्न कर आत्मरूप से सब में प्रविष्ट हो रहा है । सम्पूर्ण भूत इसमें प्रविष्ट हैं, सब भूतों में यह प्रविष्ट है, अतएव श्वेताश्वरादि ने इसे " सर्वभूतान्तरात्मा " कहा है । स श्रात्मन्नेव ( श्रात्मनि - एव ) प्रजातिमधत्त । " इन्हीं दोनों " प्रजापतिः सर्वमसृजत, यदिदं किञ्च । विभूतियों का उल्लेख करती हुई श्रुति कहती है—
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टा रमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥ १ ॥
- श्वे ० उ ० ५।१३ १३-१४-१५– “ सर्वसाक्षित्त्व, सर्ववशित्त्व एवं कर्माध्यक्षत्व ( ३ ) पूर्णेन्द्रता के प्रभाव से ही यह अपने विश्व एवं प्रजा का प्रत्यगात्मरूप से साक्षी बनता हुआ सर्वसाक्षित्त्व, सर्वव शिस्त्व, कम्र्माध्यक्षत्त्व विभूति साक्षी सुपर्ण नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । यही प्रत्य-गात्मरूप से शारीरकात्मा ( भोक्ता सुपर्ण ) की प्रतिष्ठा बनता हुआ नियतिर्दण्ड से उस पर शासन करता हुआ " वशी " ( वश में रखने वाला ) द्वारा हमारे कर्मों की प्रवृत्ति का कारण बनता हुआ कर्म्माध्यक्ष बन रहा है । स्वरूप परिचय कराते हुए ऋषि कहते हैं-अन्तर्यामी रूप से अपने बन रहा है । यही नियति इन्हीं तीनों विभूतियों का एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ।
एका वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
- * -[ ३४३ ] - श्वे ० उप ० ६।११।१२
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानापनिप १६ - पाप्मासंसृष्टत्त्व ( १ ) ईश्वर संस्था के उदर में ही सदरात् सब कुछ प्रतिष्ठित है । पाप्माओं से संसृष्ट जीव भी इसी के गर्भ में प्रतिष्ठित है । परन्तु निष्काम कर्म के प्रभाव से सब में रहता पाप्माऽसंसृष्टत्त्व विभूति हुआ भी यह इन पाप्मानों से पृथक् रहता है । क्लेशादि पाप्मा इस पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते । यही तो ईश्वर की ईश्वरता है - " पश्य मे योगमैश्वरम् । " इसी विभूति का स्पष्टीकरण करते हुए - " क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः " यह कहा जाता है । उक्त विभूतियों से युक्त अग्नि वायु प्रादित्य की समष्टि रूप अतएव अग्नि- वायु - श्रादित्यवत् उपस्तुत इसी सर्वभूतान्तरात्मा, वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञमूत्ति साक्षी देवसत्यात्मा का संग्रहरूप से निरू-परण करते हुए ऋपि कहते हैं—
निर्मूर्द्धा चक्षुषी चन्द्रसूय्यौं दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः ।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्य ेष सर्वभूतान्तरात्मा ॥१ ॥
तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्य्यः सोमात् पर्जन्य औषधयः पृथिव्याम् ।
पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात् सम्प्रसूताः ॥२ ॥
तस्माचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च ।
संवत्सरं च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्य्यः ॥ ३ ॥
तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्राणापानौ ब्रीहियवौ तपश्च श्रद्धां सत्यं ब्रह्मचय्यं विधिश्च ॥४ ॥
सप्तप्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्ताचिषः समिधः सप्तहोमाः 1 सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥५ ॥।
अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात् स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः 1 अतश्च सर्व्वा श्रौषधयो रसश्च येनैष भूर्तस्तिष्ठन्ते ह्यन्तरात्मा ॥ ६ ॥
पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् ।
एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सोम्य ॥७ ॥
[ ३४४ ] - मुण्डक ० २।१
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श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड १ – अग्निर्थयैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ८ ॥
सर्वभूतान्तरात्मा
२ - वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥९ ॥
३ – सूर्य्यो यथा सर्व्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥१० ॥
नित्याऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥११ ॥
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥१२ ॥
--पूर्व में जिस आत्मसंस्था का सामान्य विभूति कलाओं का एवं विशेष विभूति कलाओं का दिग्-दर्शन कराया गया है, यदि उन सबका संकलन किया जाता है, तो ईश्वरसंस्था में निम्नलिखित क्रम से ३५६ कलाएँ हो जाती हैं । इन के सम्बन्ध में भी ध्यान रखना चाहिए कि, यह संख्या व्यवस्था सर्वथा नियत ही नहीं है । अनन्त की विभूतियाँ भी अनन्त ही हैं । उनकी गणना कौन कर सकता है । उदाहरण के लिए इसकी एकमात्र रुद्र विभूति को ही लीजिए । सामान्य दृष्टि से " एको रुद्रः " के अनुसार जहाँ रुद्र उसकी एक विभूति मानी गई है, वहाँ रुद्र की ही अवान्तर विभूतियों के सम्बन्ध में " श्रसंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधि भूम्याम् " यहा कहा जाता है । अतः सर्वान्त में – “ सहस्रधा महिमानः सहस्रम् ” - एतच्छ्र ुतिमूलक " सर्वमिदमानन्त्यम् " इसी सिद्धान्त पर विश्राम मानना पड़ता है । [ ३४५ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्डे १ - प्रात्मकलाविभागाः ( ७२ ) & परात्परकलाः ह अव्ययकलाः -श्रर्द्धमात्रा ह अक्षरकला: ह आत्मक्षरकला: ह आत्मकलाः १८ प्राणकलाः -- प्रकार: --- उकारः ____ शुकलाः --मकारः प्रणवमूतिरीश्वरप्रजापतिः - कलः ७२ साक्षी -देवसत्यात्मा २ - सामान्यविभूतिकलाविभागाः ( २३१ ) ३ - विशेष विभूतिकला विभागाः ( ५१ ) १ - विद्याविभूतिः ( ४ ) ६ – एकरसत्त्व ० ( १ ) २– - कामविभूतिः ( २ ) १० - एकावस्थत्त्व ० ( १ ) ३ – कर्म्मविभूति: ( ७ ) ११ – विश्वव्यापकत्त्व ० ( १ ) ४ – शुक्र विभूति: ( १७ ) १२ – विश्वस्रष्टत्त्व ० ( १ ) ५ - प्राणविभूतिः ( ५ ) १३ – सर्वसाक्षित्त्व ० ( १ ) ६ – ज्ञानकर्मेन्द्रिय ० ( ५ ) १४ – सर्ववशित्त्व ० ( १ ) ७ - पूर्णेन्द्र व वि ० ( १ ) १५ – कर्म्माध्यक्षत्त्व ० ( १ ) १६ – पाप्मासंसृष्टत्त्व ० ( १ ) प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ८- सत्य संकल्पतत्त्व ० ( १ ) ईश्वरीय विभूतियों का दिग्दर्शन समाप्त हुआ । अब क्रमप्राप्त वैश्वानर - तेजस् प्राज्ञ मूर्ति भोक्ता जीव की विभूतियों एवं पाप्माओं का संक्षिप्त निरूपण कर इस प्राणात्म-पारयात्री भोक्तात्मा विज्ञानोपनिषत् को समाप्त किया जाता है । जीवात्मा एक पथिक है । उसे कण्टकाकीर्ण अनेक मार्ग पार करने पड़ते हैं । अपनी प्रज्ञापराधमूला असावधानी से यह पथभ्रष्ट बनता हुआ लक्ष्यस्थान ( ईश्वरीय जगत् ) में पहुँचने में असमर्थ रहता है । [ ३४६ ]
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श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् पूर्णेन्द्र विभूतिरूपः कश्यप प्रजापति परिलेख: - -सो मगर्भित साबित्राग्निः - श्रहः - पुरुषः ( श्रदिति मण्डलम् ) दृश्य- अण्डकटाहः ) - आपः ( २७-३३ सूर्य्य: सर्वज्ञः-- द्यौः ) - ( २१ हिरण्यगर्भ अमृतरस : मधुरराः ----- * - ( १.५ ) अन्तरिक्षम् पृथिवी ) ६ 8 ( वैश्वानरःभूपिण्डः रसः । पृथिवी का वह भाग जो सूर्य की ओर रहता हुआ प्रकाश से युक्त रहता है, उसी को अदिति कहा जाता है । बिराट् - प्रजापति नाम से प्रसिद्ध वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ इसी प्रदितिमण्डल में क्रमशः ६-१५-२१ स्तोमों पर जन्म लेते हैं । इस महापृथिवी के गर्भ में प्रतिष्ठित ६-१५-२१ इन तीनों स्तोम प्रदेशों को क्रमशः पृथिवी - प्रन्तरिक्ष- द्यौ नामों से व्यवहृत किया जाता है । वें स्तोम पर घनाग्नि १५ वें स्तोम पय्यन्त तराग्नि ( वायु ) व २१ स्तोम पर्यन्त विरलाग्नि ( अदिति ) व्याप्त है । अर्द्धभागात्मिका पकार पृथिवी दिति पृथिवी है । यही असुरों की प्रवासभूमि है । प्रदितिमय देवता व दिति गर्भ में प्रतिष्ठित असुर ही स्तोम्य त्रैलोक्य में रहने वाली प्रजा के प्रारम्भक बनते हैं । परन्तु इन दोनों में से त्रैलोक्य का विकास ( देवता के सम्बन्ध से ) केवल अदिति पृथिवी में ही होता है । श्री बालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर ।
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ब्रह्म - स भोगेो ३ ४ १ ४ १ ) अव्ययः परात्परः परात्परःपरात्परः ई) +. 5 परात्परः परात्परः ( | m ब्रह्मा १ अव्ययः ( विष्णुरक्ष इन्द्रोऽक्ष अव्ययः अव्ययः अव्ययः सोमोक्षर / ३३ सुपर्णः देवसत्यात्मासाक्षी IIII प्रणवमूर्तिरयं कलात्मकः ३५४ ३० अर्द्धमात्रा -अमृतम् पशवः मकारः प्राणाः- उकारः आत्मा-अकारः आकाशः - प्राणौ वाक् ४६ ३७ स्वयम्भूः २८ प्राणः * १८ - प्राणौ रचि परमेष्ठी आपः ९ २३ सामान्यविभूतयः विशेषविभूतयः ऋषयः १२-६४ वायु ६५ तेजः ४८ - प्राणौ १ ४८ धिषणा XO ३८ ३८ सूर्य्यः २४ ३० वाक् २० २१ Σε आपः प्राणौ -प्रज्ञा चन्द्रमाः अन्नम् पितरः असुराः ८ - एट-५१ ) ) ( १ १ ( एकावस्थत्वम् १ -) ( ४ - विद्या १ - विश्वव्यापकत्वम् १० )( २ कामः २ -देवाः मनवः - ग्रहाः ४-३३- ४० विश्वसष्ट्रत्वा ११ -)( ७ कर्म्म ३ -- गन्धर्वाः २७ )( १ सर्वसाक्षित्वम् १२-) ( ६ शुक्रम ४-अव्ययः अव्ययः परात्परः r w देवसत्याला गर्मी -- त्यात्मा श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', जयपुर । जरातस ( परात्पर परात्परः अवश्यः , अव्ययः , अव्ययः ← RC भूतान्निरक्षर ६ वायुरक्षअग्निरक्ष ५३ . X2 ४०. ३१ / २२ ३२ 33 ३३ (Leo ) ६७ संसज्ञजीवा - प्राणौ चित 1288 सर्वज्ञः प्राणानाद ) ( ज्ञानात्मा Στ जी वा ए संज्ञ अन्तः प्राणौ -वायु हिरण्यगर्भः प्राणानादः ४२ असंज्ञजीवाः - प्राण अग्नि ) वैश्वानर ( अर्थात्मा : प्रागाचाद " ३४ २ ९ ॥ ५४ ७० भूतरसः प्राणौ -वायु ४३ भूताला प्राणो वायुरचाद ६१ ६० ४४ ७१वन-औषधि - प्राणौ भूत भूतात्मा भूः भूताबाद ३५ २६ स्पतयः ३६ २७ ६३ ६२ ४५ ७२ पशवः ५-जीवात्मानः ( १ ) ) १ ( - सर्ववशित्वम् १३ ) ( १७ - प्राणः ५ - कम्र्म्माध्यक्षत्वम् १४ ( ५ ) ज्ञानकर्मेन्द्रि ६ एकरसत्वम् १५-)( १ पूर्णेन्द्रत्वम् -- पाप्मासस १६ कल्पत्वम् ) १ ( प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड