Part I Atma Vigyanopanishad I - Motilal Shastri — पृष्ठ 51–60
आत्म विज्ञानोपनिषत् - मोतीलाल शास्त्री १ · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना होते हुए एक प्रकार से व्याजपूर्वक धर्माचरण ( धर्माचरण का ढोंग ) कर रहे हैं सच पूछिए तो ऐसे विद्वानों की कृपा से ही राष्ट्रीयवर्ग धर्म से विमुख हुग्रा एवं होता जा रहा है । अभ्युदय ( ऐहलौकिक ), एवं निःश्रेयस ( पारलौकिक ) साधक धर्म के प्राचरण का उद्घोष करने वाले विद्वानों की जैसी प्रवृत्ति आज देखी सुनी जाती है, सचमुच वह एक उद्वेगकर समस्या है । मानसिक दासता का जैसा पूर्ण विकास विद्वद्वर्ग में उपलब्ध हो रहा है, खोजने से भी अन्यत्र उपलब्ध न होगा । प्रपाश में बाँध कर श्राप विद्वानों से यथेच्छ धर्मव्यवस्था प्राप्त कर सकते हैं । करण लोभग्रस्त विद्वान् पातकी से पातकी व्यक्ति को भी धर्म-रक्षक, धर्माचार्य्य, आदि उपाधियों से अलङ्कृत कर सकते हैं । स्वार्थवश सत्य का गला घोंट देना आज इनकी स्वाभाविकचर्या बन रही है । आत्माभिमान श्राज इनके लिए दूर से ही प्रणम्य बन रहा है । यही कारण है कि, ब्राज इस वर्ग के प्रति सभी वर्ग अश्रद्धात्मक प्रवाच्यवादों का प्रयोग करते नहीं ग्रघा रहे । तीसरा क्रमप्राप्त ग्रस्मदादि साधारण मनुष्यों का श्रद्धालुवर्ग है । यह वर्ग शास्त्र पर पूर्ण निष्ठा रखता है । कुतकियों के तर्कजाल का समुचित उत्तर देने की क्षमता न रखता हुआ भी यह आस्तिकवर्ग चिरन्तन संस्कारवश, तथा संस्कारविघातिका पाश्चात्य - शिक्षा संसर्ग के प्रभावात्मक अनुग्रह से अद्यावधि स्वधर्म्म पर यथाकथञ्चित् प्रतिष्ठित है । वस्तुस्थिति तो यह है कि, इस श्रद्धालु - वर्ग की आस्था के वल पर ही अद्यावधि धर्मनिष्ठा यथाकथञ्चित् प्रक्रान्त है । प्रास्तिकवर्ग की इस सहज श्रद्धा का हृदय से अभिनन्दन करते हुए हम उससे यह निवेदन कर देना ग्रावश्यक समझते हैं कि, जो कर्म्म, जो धर्म्म बिना ज्ञान का प्राश्रय लिए केवल प्रणाली ( ग्रन्धः प्ररणाली ) का अनुगामी बना रहता है, कालान्तर में उसमें शैथिल्य श्रा जाता है । उदाहरण के लिए श्राद्धकर्म्म ही पर्य्याप्त होगा । श्राद्ध के मौलिक रहस्यज्ञानभाव सेज श्राद्ध तिकर्त्तव्यता में अनेक दोषों का समावेश हो गया है । जहाँ श्राद्धकर्म के लिए - श्रपराह्नः पितृणाम् ' के अनुसार अपराह्न ( मध्या होत्तर ) काल नियत है, वहाँ ' पूर्वाह्नो वै देवानाम् ' के अनुसार देवकर्म्म के लिए नियत पूर्वाह्न से पहिले ही श्राद्ध तिकर्त्तव्यता पूरी करली जाती है । पिण्डप्रदान ही श्राद्धकर्म की मुख्य प्रतिष्ठा है । पिण्डगत सौम्यप्राण ही श्रद्धासूत्रद्वारा श्रद्धासूत्र के प्राधार पर वितत पुत्रादिगत श्रद्धाभाव से परलोकस्थ प्रेम पितरों की तृप्ति का कारण माना गया है । इधर आज केवल श्रङ्गकर्मात्मक ब्राह्मणभोजन कर्म्म को ही प्रधानरूपेण श्राद्ध का स्वरूपसमर्पक माना जा रहा है । बंध-विधि से वञ्चित ऐमा कम्भं न केवल व्यर्थ ही जाता, अपितु ऐसा अवैध कर्म्म ग्रभ्युदय के स्थान में प्रत्य-वायजनक बन जाता है । देवता का ग्राह्नान न करना कहीं उत्तम पक्ष है । परन्तु संकल्पद्वार देवता का आह्वान कर उसका सत्कार न करना अनर्थ का बीजवपन करना है । " मैं आज पिण्डपितृयज्ञ करूंगा ” इस मानससंकल्प से प्राणात्मक पितृदेवता श्रद्धासूत्र द्वारा परलोक से जाकर श्राद्धकर्त्ता यजमान की आध्यात्मिक संस्था में प्रतिष्ठित हो जाते हैं । इनकी तृप्ति का प्रधान साधन पिण्डगत सौम्यप्राण है । यदि इन्हें वह प्राप्त नहीं होता, तो अभिशाप देते हुए पितर पराङ्मुख हो जाते हैं । कितने एक महानुभावों के मुख से श्राद्धकर्म की उपपत्ति के सम्बन्ध में यह भी कहते सुना गया है कि, ' सामाजिक मंत्री सुरक्षित रखने के लिए ही वर्ष में १५ दिन भोजन कराने के लिए नियत कर दिए गए हैं । ' इस प्रकार अज्ञानतावश नवीन नवीन कल्पनाओं के आधार पर आज प्रत्येक कर्म्म विरुद्ध-[ ४२ ]
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना भावानुगत होता हुआ अभ्युदय के स्थान में सर्वनाश का कारण बन रहा है । जो महानुभाव श्राद्ध - यज्ञादि नहीं करते, लोकसम्पत्ति की दृष्टि से वे सुखी देखे जाते हैं । इधर श्राद्धादि शास्त्रीय कम्र्मों की अनुगा-मिनी प्रजा दुःखी देखी सुनी जाती है । इसका क्या कारण? ' यतोभ्युदय निःश्र ेयस सिद्धिः, स धम्मंः ' कहते हुए महर्षियों ने धर्म - प्रवृत्ति को उभयलोक - सुखावाप्ति का कारण बतलाया है । हो रहा है इसके ठीक विपरीत । इसी विप्रतिपत्तिका बड़ा सुन्दर समाधान करते हुए भगवान् माज्ञवल्क्य कहते हैं— ' एक बार भारतीय श्रद्धालुवर्ग ने ग्रश्रद्धावश यज्ञकर्म का परित्याग कर दिया । उन्होंने देखा कि, जो यज्ञानुष्ठान करते हैं - वे दुःखी देखे जाते हैं, एवं जो यज्ञानुष्ठान नहीं करते - वे सुखी - समृद्ध देखे जाते हैं । ऐसी स्थिति में उन्होंने यह संकल्प कर डाला कि, आज से अपने किसी भी यज्ञकर्म्म का अनुगमन न करेंगे । दूसरे शब्दों में यों कह लीजिए कि, जिस प्रकार वर्तमान युग में ' धर्मात्मा दुःख पा रहे हैं, पापात्मा लोकबंभव से युक्त हो रहे हैं ' इस भावना से जैसे मानव समाज की धर्ममार्ग पर अश्रद्धा बढ़ती जा रही है, ठीक इसी हेतु के आधार पर पुरायुग में भी मानवसमाज यज्ञादि कर्म - कलाप के प्रति श्रद्धा करता हुआ इसे छोड़ बैठा । जब स्वर्गाधिपति इन्द्र के पास ये समाचार पहुंचे, तो उन्होंने मानवसमाज की अश्रद्धा दूर करने के लिए स्वगुरु बृहस्पति को भारतवर्षं भेजा । बृहस्पति के सामने जब मनुष्यों ने अपनी अश्रद्धा का ' य उ यजन्ते ते पापीयांसो भवन्ति, य उ न यजन्ते ते श्र ेयांसो भवन्ति । किं काम्या यजमहि, ' यह कारण उपस्थित किया, तो बृहस्पति ने अनुमान लगा लिया कि, अवश्य इन्होंने यज्ञ-कर्म्म में किसी विरुद्ध कर्म्म का समावेश कर डाला है । फलतः बृहस्पति ने आदेश दिया कि, अब एक बार तुम हमारे सामने यज्ञ करो । मनुष्यों ने आदेशानुसार यज्ञवेदि का निर्माण किया, त्रेताग्नि कुण्ड बनाए । इसी कर्म्म - परम्परा में बृहस्पति ने देखा कि यज्ञसञ्चालक ऋत्विजों ने वेदि पर कुशा बिछाने से पहिले ही वेदि का स्पर्श कर डाला है । बृहस्पति बोल पड़े कि, हे मनुष्यो! इसी दोष से ग्रभ्युदयसाधक यज्ञने तुम्हारा अनिष्ट किया है । कुशास्तरण से पूर्व वेदि का स्पर्श करने से वेदिनिर्माणार्थं खोदी गई भूमि का हिंस्रक प्राण तुम्हारे अध्यात्मयज्ञ में प्रविष्ट हो गया । इसीसे तुम्हारा यज्ञस्वरूप विकृत हो गया । सावधान! आगे से भूलकर भी वर्हिस्तरण से पूर्व वेदि का स्पर्श न करना । दर्भविद्युत् से जब वेदिगत् हिंस्रक विद्युत शान्त हो जाय, तभी तुम वेदिका स्पर्श कर सकते हो । आदेशानुसार मनुष्यों ने ऐसा ही किया, एवं इस वेद्यनवमर्शपूर्वक होने वाले यज्ञानुष्ठान से मनुष्य यज्ञ न करने वालों की अपेक्षा सुसमृद्ध
वन गए ' ( देखिए - शत ० १।२।५ ब्रा ० ) ॥
उक्त ब्राह्मणाख्यान से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, धर्मतत्त्व का किसी परोक्ष - अचिन्त्या-प्रमेय - शक्ति से सम्बन्ध है । इसमें न तो माननीय कल्पना का समावेश ही सम्भव है, एवं न साधारण भी भूल का ही यहाँ समादर है । जिस प्रकार थोड़ी सी असावधानी से विद्य ुतयन्त्र प्रकाश प्रदान के स्थान में प्राणों का संग्राहक बन जाता है, एवमेत्र थोडा भी इतस्ततः करने से वही धार्मिक कर्मकलाप अम्यु-दय के ' स्थान में सर्वनाश का कारण वन जाता है । यदि एक स्वर - दोष से इन्द्रशत्रुवृत्र द्वारा इन्द्रवधार्थ होने वाले यज्ञ में इन्द्र के स्थान में स्वयं यज्ञकर्त्ता वृत्र मारा जा सकता है, तो अवश्यमेव धर्माष्ठानों के सम्बन्ध में होने वाली भूलें हमें अभ्युदय से वश्वित रखने के साथ साथ हमारा महा अनिष्ट भी कर सकती [ ४३ ]
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना हैं । वही वेदशास्र है, वे ही मन्त्रों में वे ही अव्यर्थ शक्तियां निहित हैं, वे ही पद्धति ग्रन्थ हैं । फिर क्या कारण है कि, आज हमारे ग्रनुष्ठान सफल नहीं होते? । आज यह कौन विश्वास करा सकता है कि, ब्राह्मणवर्ग कर्म्म - निर्वाह की कथा तो दूर, मन्त्रों का भी ठीक ठीक उच्चारण कर सकता है? ऐसी दशा में अपने प्रज्ञापराधजनित दोष से उत्पन्न नाशकारिणी दशा का उत्तरदायित्त्व धर्म पर डाल देना क्या न्यायपक्ष है? सनातनधर्मावलम्बियों की इसी भूल ने इन्हें अन्य मतवादियों की तुलना में हीन वीर्य्य बना रक्खा है । अन्यमतावलम्बी तात्कालिक लोकवैभव से बाह्य दृष्ट्या तुष्टवत प्रतीत हो रहे हैं । परन्तु हम धर्म्म का व्याज से प्राचरण करते हुए धर्म को धोका देकर उभयतः भ्रष्ट हो रहे हैं । इस पतन से त्राण पाने का एकमात्र उपाय है तत्तत् कर्म्मकलापों की मौलिक उपपत्तियों का परिज्ञान प्राप्त करना । उपपत्तिज्ञान से ही हम कर्म के वास्तविक स्वरूप से परिचय प्राप्त कर सकते हैं । तभी कर्म की अनुरू-पता का अनुगमन सम्भव हो सकता है, एवं तभी कम्र्मानुष्ठान फलप्रद बन सकता है । ' श्रद्धालुवर्ग स्वश-क्त्यनुसार शास्त्रीय कर्म - कलाप के उपपत्तिज्ञान द्वारा यथाविधि कम्मों का अनुष्ठान करे, एवं तद्द्वारा यथोक्त फलभाक् बने यही श्राद्धविज्ञाननिबन्ध की रचनाकारत्रयी के अन्तिम ( तृतीय ) कारण का संक्षिप्त निदर्शन है । सर्वान्त में प्रसङ्गात् एक स्वार्थमूलक कारण का दिग्दर्शन करा देना भी प्रासङ्गिक न माना जायेगा । आज से ८ वर्ष पहिले श्रद्धेय पितुःश्री ( बालचन्द्रशास्त्री ) का परलोकगमन हुआ । ज्येष्ठ भ्रातुःश्री के द्वारा श्रौर्ध्वदेहिक - कर्म की इतिर्त्तव्यता सम्पन्न हुई । उस असहायावस्था में यह संकल्प हुआ कि, दिवङ्गत प्रेतात्मा की तृप्ति के लिये तुम्हें भी किसी अर्थानषेक्ष अनुष्ठान का अनुगमन करना चाहिए । अन्ततोगत्वा - ' पितरो वाक्यमिच्छन्ति ' इस सिद्धान्त के आधार पर यही निश्चय किया गया कि, पितुःश्री के वार्षिक श्राद्धोपलक्ष में वाङ्मय निवन्ध ही श्रद्धापूर्वक समर्पित किया जाय । पितृप्रजापति की सहजसिद्ध ग्रनुकम्पा से वह संकल्प पूरा हुआ, एवं यही श्राद्धविज्ञानरचना - संकल्प का एक मुख्य कारण बना । श्राद्धविज्ञान- निबन्ध रचनाकारण के सम्बन्ध में निवेदन किया गया । ग्रब निबन्ध प्रतिपाद्य विषयों का संक्षेप से दिग्दर्शन कराती हुई प्रस्तावना उपरत होती है । श्रार्षप्रणाली के अनुसार सम्पूर्ण वेदशास्त्र ( मन्त्र ब्राह्मणात्मक वेदशास्र ) ' ज्ञातव्य, कर्त्तव्य ' भेद से दो भागों में विभक्त प्रतिपाद्य विषय हुआ है । वेद के जिस भाग में ज्ञातव्य विषयों का प्रतिपादन हुआ है, वह दिग्दर्शन- ' ज्ञातव्य - वेद ' है । ' स्तुति - विज्ञान - इतिहास ' ये तीन ज्ञातव्य विषय हैं । ' ऋक्-यजुः साम - प्रथर्व ' नाम की ११३१ संहिताओं में इन्हीं तीन ज्ञातव्य विषयों का स्पष्टीकरण हुआ है, अतएव संहितात्मक वेदभाग को ' ज्ञातव्य वेद ' कहा जा सकता है, जोकि ' ब्रह्म'-' मन्त्र ' आदि नामों से भी व्यवहृत हुआ है । गृहस्थाश्रमानुगत ' कर्म्मयोग, ' वानप्रस्थानुगत ' भक्तियोग, ' एवं संन्यस्ताश्रमानुगत ' ज्ञानयोग, ' ये तीन योग कर्त्तव्यात्मक हैं । ' विधि ' नामक ब्राह्मणभाग में कर्म्मयोग का, ' श्रारण्यक ' नामक ब्राह्मणभाग में भक्तियोग का, तथा ' उपनिषत् ' नामक ब्राह्मणभाग में ज्ञानयोगका प्रतिपादन हुआ है । शतायुः पुरुष ब्रह्मचर्याश्रम में ' छन्दांसि नियतः पठेत् ' इस मानवादेश के अनुसार ज्ञातव्यलक्षण ब्रह्मवेद का, तथा कर्त्तव्यलक्षरण विधि - आरण्यक उपनिषदात्मक ब्राह्मणवेद का अध्ययन समाप्त कर क्रमशः आगे के तीनों आश्रमों में कर्म्म - भक्ति- ज्ञानस्वरूप कर्त्तव्यो का अनुगमन करता हुआ अपना [ ४४ ]
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना जन्म सफल बनाने में समर्थ हो जाता है । इस प्रकार ज्ञातव्य कर्त्तव्यात्मक वेदशास्त्र के द्वारा सर्वस्वसिद्धि हो जाती है, जैसा कि ' सर्व वेदात् प्रसिद्धयति ' इत्यादि मनुवचन से प्रमाणित है । उक्त कथन से प्रकृत में यही बतलाना ग्रभीष्ट है कि, वेदशास्त्रसिद्ध ' श्राद्ध ' पदार्थ भी ज्ञातव्य-कर्त्तव्य - भेद से दो भागों में विभक्त किया जा सकता है । श्राद्धपदार्थ की ( कर्म्म की ) इतिकर्त्तव्यता ' कर्त्त-व्यात्मक श्राद्ध ' है, जिसका स्मृति, निबन्धादि ग्रन्थों में विस्तार से प्रतिपादन हुआ है । दूसरे शब्दों में ' श्राद्ध कैसे करना चाहिए? ' इस प्रश्न का समाधान करने वाली श्राद्धमयूख, श्राद्धविवेक, श्राद्धमंजरी, आदि निबन्ध ग्रन्थों में प्रतिपादित श्राद्धकर्म की पद्धति ' कर्त्तव्यात्मकश्राद्ध ' है । श्राद्धकर्मान्तर्गत ऋत्त्वर्थ कर्म्मो का मौलिक रहस्य क्या है? श्राद्धकर्म्म एवंरूपेणं व क्यों किया जाता है? श्राद्ध से पितर कैसे तृप्त हो जाते हैं? इत्यादि प्रश्नों से सम्बन्ध रखने वाला वेदशास्त्रसिद्ध उपपत्ति- विज्ञान ही ' ज्ञातव्यात्मक श्राद्ध ' है । दूसरे शब्दों श्राद्धकर्म का मौलिक विज्ञान ही ' ज्ञातव्यात्मकश्राद्ध ' है । इन उभयविध श्राद्ध-पदार्थों में से कर्त्तव्यात्मक श्राद्धपदार्थ ( श्राद्धपद्धति ) के लिए स्वतन्त्र निबन्ध लिखना सर्वथा व्यर्थ है । क्योंकि पद्धति के सम्बन्ध में प्राचीन आचार्यों के द्वारा शतशः निवन्ध लिखे जा चुके हैं । दूसरा ज्ञातव्य-भाग बच रहता है । अवश्य ही श्राद्धकर्म की वैज्ञानिक उपपत्ति के सम्बन्ध में आज कोई ऐसा स्वतन्त्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हो रहा, जिसमें श्राद्ध - विज्ञान का एकत्र स्पष्टीकरण किया गया हो । एकमात्र इसी लक्ष्य से प्रस्तुत निबन्ध को ' श्राद्ध - विज्ञान ' का प्रधान लक्ष्य माना गया है । चूंकि इसमें ज्ञातव्यात्मक-श्राद्ध - विज्ञान का ही प्रतिपादन हुआ है, अतएव इसे ' श्राद्धविज्ञान ' नाम से व्ववहृत करना अन्वर्थ समझा गया है । ' श्राद्धविज्ञान ' यह खण्डचतुष्टयात्मक सम्पूर्ण ग्रन्थ का नाम है । इस ' श्राद्धविज्ञान ' नामक एक निबन्ध ( ग्रन्थ ) में विषयप्रतिपादन सुविधा की तथा प्रतिपाद्य वियावगति की दृष्टि से ' चार खण्ड ' रक्खे गए हैं । प्रत्येक खण्ड में कई एक ' अवान्तरप्रकरण ' हैं । प्रत्येक प्रवान्तर प्रकरण में अनेक ' परिच्छेद ' हैं, एवं प्रत्येक परिच्छेद में अनेक ' वैज्ञानिक तत्त्वों का विश्लेषण हुआ है । इस प्रकार श्राद्धविज्ञान, तदन्तर्गत चार खण्ड, खण्डान्तर्गत अवान्तर प्रकरण, अवान्तर प्रकरणान्तर्गत परिच्छेद, परिच्छेदान्तर्गत वैज्ञानिक तत्त्व विश्लेषण इस दृष्टि से विषयों का विभाजन हुआ है । प्रकृत में जिन विषयों का ' तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्या: ' रूप से दिग्दर्शन कराया जाने वाला है, वे अवान्तरप्रकरणान्तर्गत ' परिच्छेद ' हैं । परिच्छेदान्तर्गत वैज्ञानिक विषयों की सूची प्रत्येक खण्ड के आरम्भ में ' विषयसूची ' नाम से समाविष्ट हुई है । ' श्राद्धविज्ञान ' निबन्ध में जितने भी विज्ञानात्मक अवान्तर प्रकरणों का समावेश हुआ है, उन्हें ' उपनिषत् ' नाम से व्यवहृत किया गया ॥ आज दिन विद्वत्समाज में ' उपनिषद ' शब्द वेद के अन्तिम भागात्मक ' ईश - केन- कठ- प्रश्न- मुण्डका ' दि ग्रन्थों में ही निरूढ़ माना जा रहा है । परन्तु हमारी दृष्टि में [ ४५ ]
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्ध विज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना ' उपनिषत् ' शब्द सर्वथा यौगिक है । मौलिक उपपत्ति - लक्षण विज्ञान - सिद्धान्त के सम्यक् परिज्ञान से हमारा आत्मा प्रतिपाद्य विषय की ओर निश्चितरूप से प्रतिष्ठित हो जाता है । दूसरे शब्दों में मौलिक रहस्य - परिज्ञान से प्रतिपाद्य विषय की सत्यता पर श्रद्धा विश्वास करते हुए उसकी इतिकर्तव्यता ( अनु-ष्ठान ) में हम प्रवृत्त हो जाते हैं । इसी ग्राधार पर - ' उप- ( विषयसमीपे ) -नि- ( नितरां निश्वयेन ) सीदति-( प्रतिष्ठितो भवत्यात्मा ययोपपत्या सा उपपत्तिस्तस्य विषयस्य, कर्म्म रगो वा उपनिषत् ' इत्यादि निर्वचन के अनुसार विषयप्रवृत्तिहेतुभूता विज्ञानात्मिका मौलिक उपपत्ति को ' उपनिषत् ' कहना ग्रन्वर्थ बन जाता है । पाश्चात्य भाषा में जिस ग्रर्थविशेष के लिए ' प्रिन्सिपल ' ( Principle ) शब्द प्रयुक्त हुआ है, यावनी-भाषा जिस अर्थ में ' उसूल ' शब्द का प्रयोग कर रही है, ठीक उसी अर्थ में आर्षभाषा ने ' उपनिषत् ' शब्द इस यौगिकार्य को स्वीकार करने से ही ' यदेव विद्यया करोति, श्रद्धयोपनिषदा, तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति'-' अरण्यमियान्न पुनरेयात् ' - ' तस्योपनिषदह मिति ' - सत्यस्योपनिषच्छद्धा ' - ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागिवोपनिषत् ' इत्यादि प्राप्तवचनों में पठित ' उपनिषद ' शब्द का समन्वय किया जा सकता है । इसी यौगिकार्थ के आधार पर गीतास्मृति का ' भगवद्गीतोपनिषत् ' नाम से व्ववहृत करना मुसङ्गत बनता है । यदि उप-निषच्छब्द केवल वेदान्त ( वेद के अन्तभाग रूप ईशादि ग्रन्थों ) में ही निरूढ होता, तो गीता को उपनि-पत् कहना सर्वथा प्रसङ्गत बन जाता । प्रस्तुत श्राद्धविज्ञाननिबन्ध के सभी अवान्तरप्रकरण चूंकि उप-पत्ति - ज्ञान का विश्लेषण करते हुए उपनिषच्छब्द के यौगिकार्थ से समतुलित हैं । एकमात्र इसी श्राधार पर उन ग्रवान्तर प्रकरणों को - ' प्रात्मविज्ञानोपनिषत् ' - पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषत् - ' सापिण्ड्यविज्ञानो b-निषत् ' - ' श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषद् ' इत्यादि रूप से ' उपनिपत् ' नामों से व्यवहृत करना उचित मान लिया गया है सम्पूर्ण निबन्ध ४ खण्डों, तथा ( लगभग २० X ३० अठपेजी साइज के ) १८०० ( ग्रठारह सौ ) पृष्ठों में सम्पन्न हुआ है । चतुः खण्डात्मक इस श्राद्धविज्ञान में जिन अवान्तर वैज्ञानिक विषयों का स्पष्टी-करण हुआ है, उनका विशेष परिचय तत्तत् खण्डों के स्वाध्याय पर निर्भर है । एवं सामान्य परिचय तत्तत् खण्डों के आरम्भ में उद्धृत विषयसूची पर निर्भर है । प्रकृत प्रस्तावना में उनका दिग्दर्शनमात्र करा दिया जाता है । निबन्ध समाविष्ट चारों खण्ड क्रमशः निम्नलिखित नामों से व्यवहृत हुए हैं— खण्डचतुष्टयात्मक - श्राद्ध विज्ञान-१ - प्रात्मविज्ञानोपनिषत् ( प्रथमखण्ड ) | २ - पितृस्वरूपविज्ञानोपनिषतू ( द्वितीयखण्ड ) | * इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन त्रिखण्डात्मिका- उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ' के प्रथम खण्डान्तर्गत उपनिषच्छन्द रहस्य ' नामक श्रवान्तर प्रकरण में देखना चाहिए । [ ४६ ]
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ३ - सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत् ( तृतीयखण्ड ) । ४ - श्रात्मगतिविज्ञानोपनिषत् ( चतुर्थखण्ड ) । १ - श्रात्मविज्ञानोपनिषत् ( प्रथमखण्ड ) -प्रस्तावना एतन्नामक प्रथमखण्ड में आत्मस्वरूप का वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण हुआ है । ' अखण्डसखण्ड ' से आत्मा के दो मुख्य विवर्त्त हैं । इन दोनों में अखण्डात्मा सर्वधर्म्म शून्य, सर्वव्यापक, अतएव वाङ्मनस-पथातीत, अतएव च एकान्ततः शास्त्रानधिकृत है । दूसरा सखण्ड आत्मा सर्वधर्मोपपन्न है । यह सखण्ड आत्मविवर्त्त महामाया, योगमायादि मायिक निबन्धनों से आठ विवर्त्तभावों में परिणत हो रहा है । शरीर -भिन्न- आत्मसत्तावाद ही श्राद्धकर्म की मूलप्रतिष्ठा है । अतएव आरम्भ में आत्मा के स्वरूप का परिचय कराना ही आवश्यक समझा गया है । ' शरीर ही श्रात्मा है? श्रथवा श्रात्मतत्त्व शरीर से पृथक् है? ' -' यदि श्रात्मा व्यापक है, तो उसकी परलोकगति कैसे सम्भव है? ' - यदि श्रात्मा पूर्व शरीर के साथ ही अन्य शरीर धारण कर लेता है, तो पिण्डदानादि लक्षण श्राद्धकर्म्म किस के उद्देश्य से किया जाता है? ' - पार्वणादि श्राद्ध किस श्रात्मा के लिए विहित है? ' ' गया श्राद्ध किस आत्ममुक्ति का कारण बनता है? ' इत्यादि यच्चयावत् आत्मस्वरूपविपयिणी जिज्ञासाओं का वैज्ञानिक समाधान करने वाले ' आत्म-विज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथमखण्ड में निम्नलिखित अवान्तर प्रकरणों तथा परिच्छेदों का समावेश हुआ है: -१ - श्रात्मविज्ञानोपनिषदि - ( प्रथमखण्डात्मिकायाम् ) १ - अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् - प्रथमा २. – प्रव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् - द्वितीया ३ – यज्ञात्मविज्ञानोनिषत् - तृतीया ४ -- विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् - चतुर्थी ५ - महदात्मविज्ञानोनिषत् - पञ्चमी ६ - प्राणात्म विज्ञानोपनिषत् - षष्ठी ( तत्र ) १ – बंश्वानरात्मविज्ञानोपनिषद २ - तेजसात्मविज्ञानोपनिषद - प्रत्यगात्मोपनिषत् ( १ ) ३ - - प्राज्ञात्मविज्ञानो निपत् [ ४७ ]
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना ४ - हंसात्मविज्ञानोपनिषत् - प्रेतात्मोपनिषत् ( २ ) ५ -- वाह्यात्मविज्ञानोपनिषत् - शरीरात्मोपनिषत ( ३ ) १ - श्राद्धविज्ञानान्तर्गत- ' श्रात्मविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथमखण्ड-श्रात्मविज्ञानोपनिषदि - ( प्रथमखण्डात्मिकायाम् ) --'अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ' - प्रथमा १ – ' ( तत्रैते विषया निरुपिता द्रष्टव्याः ) १ - श्रात्मस्वरूप जिज्ञासा २ -- नास्तिकाभिमत आत्मस्वरूप ३ – आस्तिकाभिमत आत्मस्वरूप ४ - ग्रास्तिकों का तत्त्ववाद ५ - - स्वयम्भू प्रजापति का आत्मोपदेश ६. - व्यासाभिमत आत्मतत्त्वपरीक्षा ७ – हमारी अध्यात्मसंस्था ८-- सृष्ट्यनुगता आगमद्वयी ६ – अहोरात्रस्वरूपदिग्दर्शन १०--मनुतत्त्वस्वरूपदिग्दर्शन ११ – मनु और मन्वन्तर् प्रकरणोपसंहार १२ -- काल के विचालीभाव १३ – मन्वन्तर विज्ञान १४ - लयकालमीमांसा १५ – नित्यानित्य विवर्त १६ - ब्रह्म का त्रेधा वितान १७ - ब्रह्म की अनन्त विभूति १८ - मायोपाधिकपुरुषब्रह्म १६ - मायोपाधिक प्रकृतिब्रह्म २० - पोडशकल अमृतब्रह्म २१ – प्रणवब्रह्म के चार पाद २२ – अमृतात्मस्वरूपपरिचय समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि ' अमृतात्मविज्ञानोपनिषत् ' प्रथमा प्रात्मविज्ञानोपनिषदि -२ - ' अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् ' द्वितीया ( तते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ - ब्रह्म की विकारसृष्टि २ - वाङ्मय श्रव्यक्तात्मा ३ - अव्यक्तात्मा के तीन विवर्त ६ - उपलब्धिलक्षण वेदात्मा ७ – त्रिः सत्यप्रजापति ८ – त्रित्त्वप्रवर्तक ग्रव्यक्तात्मा [ ४८५ 1
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड ४ - नियतिलक्षण अन्तर्यामी ५ – ऋतसत्यलक्षण सूत्रात्मा ६ — प्रव्यक्तात्मा का प्रकृतिभाव १० – प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि ' अव्यक्तात्मविज्ञानोपनिषत् ' द्वितीया श्रात्मविज्ञानोपनिषदि ३ – ' यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् ' तृतीया ( तत्रैते विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ - - पारमेष्ठ्यतत्त्व परिचय २ – प्रात्मसोपानपरम्परा ३ - दः, इदं विवर्त ४ – यज्ञात्मस्वरूप परिचय ५ – यज्ञात्मा के यज्ञ - चित् नामक दो विवर्त्त ६ – यज्ञात्मक विष्णु का स्वरूप परिचय प्रकरणोपसंहार ७ – परमेष्ठी का प्रथम विवर्त्त ८ – विश्वप्रकृतिभूत यज्ञपुरुष ६- - यज्ञात्मा के विविध विवर्त १० - आध्यात्मिक यज्ञात्मा ११ – यज्ञ का योनिभाव १२ - त्रयीमय त्रिगुणात्मा समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिपदि - ' यज्ञात्मविज्ञानोपनिषत् ' तृतीया श्रात्मविज्ञानोपनिषदि प्रस्तावना : - ' विज्ञानात्म विज्ञानोपनिषत् ' चतुर्थी ( तत्र विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ – परमेष्ठी का अपेक्षाकृत श्रव्यक्तत्त्व २ – विश्वस्य हृदयम् ३ – सोम, चित्, इन्द्र, विभूतियाँ ४ – यज्ञप्रवर्त्तक विश्वात्मा ५ - - यज्ञ के विविध विवर्त प्रकरणोपसंहार ६ – सुय्र्य्यात्मिक क्षत्र रुद्र ७ - सौर अन्नादाग्नि के तीन विवर्त्त I सूर्य्यमुलक देवात्मा ६ - सूर्य्यमूलक विज्ञानात्मा १० - धिरण तथा प्राणविवर्त समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि - ' विज्ञानात्मविज्ञानोपनिषत् ' चतुर्थी [ ४ ९ ]
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड श्रात्मविज्ञानोपनिषदि -५ - ' महानात्म विज्ञानोपनिषत् ' पञ्चमी ( तत्र विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ - - महान् की महत्ता २ – महोदेव, र ' महान् ' ३ – सोम - चिदात्मक ' पितर ' ४ – त्रिविध ज्ञानविवर्त्त ५ -- प्रजापतिविवर्तत्रयी ६ -- त्रिगुणात्मक ' पुरुष ब्रह्म ' ७-- एकाक्षरलक्षण ' महद्ब्रह्म ' ८ - विश्वयोनिलक्षण ' महानात्मा ' E - सुषुप्यधिष्ठाता ' महानात्मा ' प्रस्तावना १० - आकृति - प्रहं कृत्तिलक्षण ' महानात्मा ' ११ – सत्त्व - रजस्तमोलक्षण ' महानात्मा ' १२ – चान्द्र - ' महानात्मा ' १३ – चान्द्र - ' प्रज्ञानात्मा ' प्रकरणोपसंहार समाप्ता चेयमात्मविज्ञानोपनिषदि - ' महानात्म विज्ञानोपनिषत् ' पञ्चमी श्रात्मविज्ञानोपनिषदि -६ - ' प्राणात्मविज्ञानोपनिषत् ' षष्ठी ( तत्रैता श्रात्मोपनिषदो व्याख्याता द्रष्टव्याः ) १ - वैश्वानरात्मविज्ञानोपनिषत् २ -- तैजसात्मविज्ञानोपनिषत् ३ -- प्रज्ञात्म विज्ञानोपनिषत् - प्रत्यगात्मोपनिषत् ( १ ) ४ - हंसात्म विज्ञानोपनिपत् ] प्रेतात्मोपनिषत् ( २ ) ५ – बाह्यात्मविज्ञानोपनिषत् ] शरीरात्मोपनिषत् ( ३ ) ( तस्यामेतस्याँ पष्ठयाँ - पश्वात्मोपनिषदात्मकायां- ' प्राणात्म विज्ञानोपनिषदि निम्न विषया निरूपिता द्रष्टव्याः ) १ प्र विज्ञान क्षणिक विज्ञानमूला भ्रान्ति २ विभिन्नपक्ष समर्थन ३ – व्याख्यादोषमूल प्रात्मस्वरूपविप्रतिपत्ति ४. -- प्रात्मभेदस्वरूपपरिचय ५ आत्मपरिग्रहमूलक प्रात्मस्वरूपभेद ६ - सीमाभावप्रवर्त्तक ' माया ' परिग्रह ७–– कलाप्रवर्त्तक ' कला ' परिग्रह ८ – सगुणभावप्रवर्त्तक ' गुण ' परिग्रह ६ सविकारभावप्रवर्तक ' विकार ' परिग्रह १० — सावरणभावप्रवर्त्तक ' श्रावरण ' परिग्रह [ ५० ]
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्राद्धविज्ञान प्रथम खण्ड प्रस्तावना ११ – साञ्जनभावप्रवर्त्तक ' अञ्जन ' परिग्रह १२ - विभूति, पाप्मा, परिचय १३ -- विराट् प्रजापति १४ - महेश्वर की सर्वव्याप्ति १५ – सर्वधर्मोपपन्न पुरुषात्मा १६ – प्रजापतिचतुष्टयी १७ - जीवात्मस्वरूपोपक्रम १८ - चिदात्मा, चिदश, चिदाभास, १६ - योग - बन्ध - विभूति ३६ – ' वाक्साहस्री ' का स्वरूप परिचय ४० – वाङ् मयस्तोमविवर्त ४१ – ' लोकसाहस्री ' का स्वरूप परिचय ४२ – ' अदिति - दिति विवर्त ४३ — सर्वभूतान्तरात्मा ४४ – ग्रात्मा, ब्रह्म, देव, विवर्त ४५ – ग्रात्मगत्यधिष्ठाता सुपर्णपक्षी ४६ – परिच्छिन्न मृत्युबन्धन ४७ – चामत्कारिक पुरुपात्मा २० – विदित, अविदित, उभयातीत, ग्रात्मविवर्त्त ४८ –- प्राणात्मोपनिषत् की उपनिषत् २१ - - पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौः २२ – शब्दब्रह्म विवर्त्त ४ — वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ- मूर्तिविराट् - दर्शन २३ – विश्वामुवनानि २४– रुद्रत्रैलोक्य २५ – दक्षिणामूर्ति शिवतत्त्व . २६ – वायुवेष्टित भूपिण्ड २७ – अन्नादप्रकृति, और भूपिण्ड २८ – पार्थिक ' एमूषवराह ' २६ - शूद्र, और शूकरपशु -अमृत - मृत्युलक्षरणा पार्थिवसंस्था ३०. ३१ – देवासुरप्रतिस्पर्द्धा ३२ – वित्रस्त पार्थिवप्रजापति ५० – अर्थ मूत्ति वैश्वानरात्मा ( उपनिषत् ) ५१ – क्रियामूर्ति ' तैजसात्मा ' ' > ५२ - ज्ञानमूत्ति ' प्राज्ञ श्रात्मा ' ( " ) ' ) ५३ – वायुमूर्ति ' हंसात्मा ' ५४ - भूतमूर्ति ' ब्रायात्मा ' ५५ – सर्वज्ञ - अल्पज्ञ - समतुलन ५६ - विभूतिलक्षण ' ऋषि ' तत्त्व 17 ५७– ' पितर ' तत्त्व " ५८– ' असुर ' तत्त्व 31 ५६-' देव ' तत्त्व ६०– 11 ' मनु ' तत्त्व ६१– " ' गन्धर्व ' तत्त्व ३३ – पट् शुक्रात्मक पार्थिव विवर्त्त ३४ – पार्थिवाग्नि के विविध विवर्त ३५ – पार्थिवाग्नि का अन्नादत्त्व ३६ – कृष्णाजिन, और पुष्करपर्ण ३७ – प्रग्निचितिरहस्य ३८ - अर्क, महाव्रत, उक्थ्य परिचय ६२ - विभूतिलक्षण ' ग्रह ' तत्त्व 33 ६३– ' पशु ' तत्त्व ६४ – विद्याचतुष्टयीलक्षणा ' विद्याविभूति ' ६५ - महाविभूतिलक्षणा ' कामविभूति ' ६६ – अनुगमनलक्षण ' कर्म्मविभूति ' [ ५१ ]